ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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बुधवार, 30 नवंबर 2011

शाक्त धर्म में छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ में शक्तिपूजा

 माँ बमलेश्वरी शक्तिपीठ डोंगरगढ़  (1100 सीढ़ी ) में उपर पहाड़ी पर माता जी
के शरण में साधना करते हुए ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे

शाक्त धर्म में छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ में शक्तिपूजा
ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे,०९८२७१९८८२८, भिलाई
मित्रों जब छत्तीसगढ़ की बात होती है तो सर्वप्रथम शिव-शिवोपासना स्वयमेव ही चर्चा निकल पड़ती है । यदि शिवमय छत्तीसगढ़ है तो शक्ति की उपासना यहां के लोगों में सहज ही देखने को मिलता है और छत्तीसगढ़ राज्य पर विशेष कृपा है क्योंकि इसका प्रमाण यहां विद्यमान शक्तिपीठों से मिलता है , हो भी क्यों न क्योंकि जहां शिव हैं वहीं शक्ति हैं । यदि शिव का इकार निकाल दिया जाय तो शव शब्द शेष रह जाता है, और शव शब्द का अर्थ प्राण विहिन मरा हुआ अस्थि (लाश)। तो मित्रों इकार शक्ति का परिचायक है अतएव शिव शक्ति के वगैर अधुरा हैं इसीलिए शिव क्षेत्र छत्तीसगढ़ में शक्ति की प्रधानता है अपितु यहां अगर भोरमदेव हैं तो महा माया भगवती बमलेश्वरी भी हैं इसी प्रकार अन्य सभी शक्तिपीठों की बात की जाय तो छत्तीसगढ़ के प्रमुख शक्तिपीठों में रतनपुर, चंद्रपुर, डोंगरगढ़, खल्लारी और दंतेवाड़ा प्रमुख है- रतनपुर में महामाया, चंद्रपुर में चंद्रसेनी, डोंगरगढ़ में बमलेश्वरी और दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी देवी विराजमान हैं- लेकिन अम्बिकापुर में महामाया और समलेश्वरी देवी विराजित हैं और ऐसा माना जाता है कि पूरे छत्तीसगढ़ में महामाया और समलेश्वरी देवी का विस्तार अम्बिकापुर से ही हुआ है- शाक्त धर्म में आदि तत्व को मातृरूप मानने की सामाजिक मान्यता है- उसके अनुसार नारी पूजनीय माने जाने लगी, विशेषत: माताओं और कुवांरी बालिकाओं का शाक्त धर्म में बहुत ऊंचा स्थान है- दबिस्तां नामक फारसी ग्रंथ के मुस्लिम लेखक ने भी लिखा है कि आगमों में नारियों को बहुत ऊंचा स्थान दिया गया है।
अगर यहां के गढ़ों के उत्तराधिकारी राजाओं को देखाजाय तो उनका भी अकथनीय और आकल्प सहयोग रहा है जो छत्तीसगढ़ की एक पहचान व संस्कृति आज भी जीवंत है इस जीवंतता के पिछे उन रजवाड़ों का भी संस्मरण करना बेहद आवश्यक है तो आईए.
.मित्रों अब उनको भी जानने की कोशिश करते हैं।गढ़ों के गढ़ छत्तीसगढ़ अनेक देशी राजवंशों के राजाओं की कार्यस्थली रही है- यहां अनेक प्रतापी राजा और महाराजा हुए जो विद्वान, शक्तिशाली, प्रजावत्सल और देवी उपासक थे- यही कारण है कि यहां अनेक मंदिर और शक्तिपीठ उस काल के साक्षी हैं- ये देवियां उनकी कुलदेवी थीं- यहां देवी रियासतों की स्थापना से लेकर उसके उत्थान पतन से जुड़ी अनेक कथाएं पढ़ने और सुनने को मिलती है- यहां प्रमुख रूप से दो देवियां रतनपुर की महामाया और सम्बलपुर की समलेश्वरी देवी पूजी जाती है, शेष देवियां उनकी प्रतिरूप हैं और क्षेत्र विशेष का बोध कराती हैं- इनमें सरगुजा की सरगुजहीन दाई, खरौद की सौराईन दाई, कोरबा की सर्वमंगला देवी, अड़भार की अष्टभूजी देवी, मल्हार की डिडिनेश्वरी देवी, चंद्रपुर की चंद्रसेनी देवी, डोंगरगढ़ की बमलेश्वरी देवी, बलौदा की गंगा मैया, जशपुर की काली माता, मड़वारानी की मड़वारानी दाई प्रमुख हैं- सुप्रसिद्ध कवि पंडित शुकलाल पांडेय ने ‘‘छत्तीसगढ़ गौरव’’ में की है।

रतनपुर में महामाया देवी का सिर है और उसका धड़ अम्बिकापुर में है। प्रतिवर्ष वहां मिट्‌टी का सिर बनाये जाने की बात कही जाती है। इसी प्रकार संबलपुर के राजा द्वारा देवी मां का प्रतिरूप संबलपुर ले जाकर समलेश्वरी देवी के रूप में स्थापित करने की किंवदंती प्रचलित है- समलेश्वरी देवी की भव्यता को देखकर दर्शनार्थी डर जाते थे अत: ऐसी मान्यता है कि देवी मंदिर में पीठ करके प्रतिष्ठित हुई- सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में जितने भी देशी राजा-महाराजा हुए उनकी निष्ठा या तो रतनपुर के राजा या संबलपुर के राजा के प्रति थी- कदाचित्‌ मैत्री भाव और अपने राज्य की सुख, समृद्धि और शांति के लिए वहां की देवी की प्रतिमूर्ति अपने राज्य में स्थापित करने किये जो आज लोगों की श्रद्धा के केंद्र हैं।

चंद्रसेनी या चद्रहासिनी देवी सरगुजा से आकर सारंगढ़ और रायगढ़ के बीच महानदी के तट पर विराजित हैं- उन्हीं के नाम पर कदाचित्‌ चंद्रपुर नाम प्रचलित हुआ- पूर्व में यह एक छोटी जमींदारी थी- चंद्रसेन नामक राजा ने चंद्रपुर नगर बसाकर चंद्रसेनी देवी को विराजित करने की किंवदंती भी प्रचलित है- तथ्य जो भी हो, मगर आज चंद्रसेनी देवी अपने नव कलेवर के साथ लोगों की श्रद्धा के केंद्र बिंदु है- नवरात्रि में और अन्य दिनों में भी यहां बलि दिये जाने की प्रथा है- पहाड़ी में सीढ़ी के दोनों ओर अनेक धार्मिक प्रसंगों का शिल्पांकन है- हनुमान और अर्द्धनारीश्वर की आदमकद प्रतिमा आकर्षण का केंद्र है- रायगढ़, सारंगढ़, चाम्पा, सक्ती में समलेश्वरी देवी की भव्य प्रतिमा है।

बस्तर की कुलदेवी दंतेश्वरी देवी हैं जो यहां के राजा के साथ आंध्र प्रदेश के वारंगल से आयी और शंखिनी डंकनी नदी के बीच में विराजित हुई और बाद में दंतेवाड़ा नगर उनके नाम पर बसायी गयी- बस्तर का राजा नवरात्रि में नौ दिन तक पुजारी के रूप में मंदिर में निवास करते थे- देवी की उनके उपर विशेष कृपा थी- जगदलपुर महल परिसर में भी दंतेश्वरी देवी का एक भव्य मंदिर है।

सोमवार, 28 नवंबर 2011

भारतीय धर्म शास्त्रों में वेदों की उत्पत्ति (पौराणीक)


ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, 09827198828, भिलाई
भारतीय धर्म शास्त्रों में  वेदों की उत्पत्ति


मित्रों आज मंगलवार को जब श्री हनुमान जी का ध्यान हमारे जेहन में आता है तो वेदों की भी बाते याद आती हैं क्योकि समुच्चय वेदों के ज्ञाता भगवान शिव हैं और उन्हीं का रूप अर्थात ग्यारहवां रूद्रावतार श्री हनुमान जी हैं इस लिए आज पौराणीक मतेन वेदों का आविर्भाव के मद्देनजर चर्चा करने की इच्चा हुयी जो आपके सामने रखने जा रहा हुं आईए उसके पूर्व इस मंत्र का जप कर लिया जाय आप पढ़ते समय जरूर बोलेंगे आपका दिन शुभमय होगा क्योकि कहा गया साधू ते होई न कारज हानि . तो यह मंत्र है..ऊँ हं हनुमते दक्षिणेश्वराय रूद्रात्मकाय हुं फट् स्वाहा।।वेद शब्द संस्कृत भाषा के "विद्" धातु से बना है जिसका अर्थ है: जानना, ज्ञान इत्यादि। वेद हिन्दू धर्म के प्राचीन पवित्र ग्रंथों का नाम है । वेदों को श्रुति भी कहा जाता है, क्योकि पहले मुद्रण की व्यवस्था न होने से इनको एक दुसरे से सुन- सुनकर याद रखा गया इसप्रकार वेद प्राचीन भारत के वैदिक काल की वाचिक/श्रुति = श्रवण परम्परा की अनुपम कृति है जो पीढी दर पीढी पिछले चार-पाँच हजार वर्षों से चली आ रही है । वेद ही हिन्दू धर्म के सर्वोच्च और सर्वोपरि धर्मग्रन्थ हैं ।

वेद को 'श्रुति' भी कहा जाता है। 'श्रु' धातु से 'श्रुति' शब्द बना है। 'श्रु' यानी सुनना। कहते है�
� कि इसके मन्त्रों को ईश्वर (ब्रह्म) ने प्राचीन तपस्वियों को अप्रत्यक्ष रूप से सुनाया था जब वे गहरी तपस्या में लीन थे। सर्वप्रथम ईश्वर ने चार ऋषियों को इसका ज्ञान दिया:- अग्नि, वायु, अंगिरा और आदित्य।

वेद वैदिककाल की वाचिक परम्परा की अनुपम कृति हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी पिछले छह-सात हजार ईस्वी पूर्व से चली आ रही है। विद्वानों ने संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद इन चारों के संयोग को समग्र वेद कहा है। ये चार भाग सम्मिलित रूप से श्रुति कहे जाते हैं। बाकी ग्रन्थ स्मृति के अंतर्गत आते हैं।

संहिता : मन्त्र भाग। वेद के मन्त्रों में सुंदरता भरी पड़ी है। वैदिक ऋषि जब स्वर के साथ वेद मंत्रों का पाठ करते हैं, तो चित्त प्रसन्न हो उठता है। जो भी सस्वर वेदपाठ सुनता है, मुग्ध हो उठता है।

ब्राह्मण : ब्राह्मण ग्रंथों में मुख्य रूप से यज्ञों की चर्चा है। वेदों के मंत्रों की व्याख्या है। यज्ञों के विधान और विज्ञान का विस्तार से वर्णन है। मुख्य ब्राह्मण 3 हैं : (1) ऐतरेय, ( 2) तैत्तिरीय और (3) शतपथ।

आरण्यक : वन को संस्कृत में कहते हैं 'अरण्य'। अरण्य में उत्पन्न हुए ग्रंथों का नाम पड़ गया 'आरण्यक'। मुख्य आरण्यक पाँच हैं : (1) ऐतरेय, (2) शांखायन, (3) बृहदारण्यक, (4) तैत्तिरीय और (5) तवलकार।

उपनिषद : उपनिषद को वेद का शीर्ष भाग कहा गया है और यही वेदों का अंतिम सर्वश्रेष्ठ भाग होने के कारण वेदांत कहलाए। इनमें ईश्वर, सृष्टि और आत्मा के संबंध में गहन दार्शनिक और वैज्ञानिक वर्णन मिलता है। उपनिषदों की संख्या 1180 मानी गई है, लेकिन वर्तमान में 108 उपनिषद ही उपलब्ध हैं। मुख्य उपनिषद हैं- ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, बृहदारण्यक और श्वेताश्वर। असंख्य वेद-शाखाएँ, ब्राह्मण-ग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषद विलुप्त हो चुके हैं। वर्तमान में ऋग्वेद के दस, कृष्ण यजुर्वेद के बत्तीस, सामवेद के सोलह, अथर्ववेद के इकतीस उपनिषद उपलब्ध माने गए हैं।
अब आईए आपको वेद के उत्पत्ति के कुछ तथ्यात्मक आधार तत्व बताता हुं..............


वेद क्या है ?
वेद भारतीय संस्कृति के वे ग्रंथ हैं, जिनमें ज्योतिष, संगीत, गणित, विज्ञान, धर्म, औषधि, प्रकृति, खगोल शास्त्र आदि लगभग सभी विषयों से संबंधित ज्ञान का भण्डार भरा पड़ा है। वेद हमारी भारतीय संस्कृति की रीढ़ है। इनमें अनिष्ट से संबंधित उपाय तथा जो इच्छा हो उसके अनुसार उन्हें प्राप्त करने के उपाय संगृहीत हैं। लेकिन जिस प्रकार किसी भी कार्य में मेहनत लगती है, उसी प्रकार इन रत्नरूपी वेदों का श्रमपूर्वक अध्ययन करके ही इनमें संकलित ज्ञान को मनुष्य प्राप्त कर सकता है
सामान्य भाषा में वेद का अर्थ है-‘ज्ञान’। वस्तुतः ज्ञान वह प्रकाश है जो मनुष्य-मन के अज्ञानरूपी अंधकार को नष्ट कर देता है। वेदों को इतिहास का ऐसा स्रोत कहा गया है, जो पौराणिक ज्ञान-विज्ञान का अथाह भंडार है। ‘वेद’ शब्द संस्कृत के विद् शब्द से निर्मित है अर्थात् इस एकमात्र शब्द में ही सभी प्रकार का ज्ञान समाहित है। प्राचीन भारतीय ऋषि जिन्हें मंत्रदृष्टा कहा गया है, उन्होंने मंत्रों के गूढ़ रहस्यों को जान कर, समझ कर, मनन कर, उनकी अनुभूति कर उस ज्ञान को जिन ग्रंथों में संकलित कर संसार के समक्ष प्रस्तुत किया वे प्राचीन ग्रंथ ‘वेद’ कहलाए। यहाँ वेद का अर्थ उन्हीं प्राचीन ग्रंथों से है। इस जगत्, इस जीवन एवं परमपिता परमेश्वर; इन सभी का वास्तविक ज्ञान वेद है।
विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने शब्दों में कहा है कि वेद क्या है ? आइए पढ़ें किसने क्या कहा है-
(1) मनु के अनुसार, ‘‘सभी धर्म वेद पर आधारित हैं।’’
(2) स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, ‘‘वेद ईश्वरीय ज्ञान है।’’
(3) महर्षि दयानन्द के अनुसार, ‘‘समस्त ज्ञान विद्याओं का निचोड़ वेदों में निहित है।’’
(4) प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के अनुसार,
‘‘वेद-वेद के मंत्र-मंत्र में, मंत्र-मंत्र की पंक्ति-पंक्ति में,
पंक्ति-पंक्ति के शब्द-शब्द में, शब्द-शब्द के अक्षर स्वर में,
दिव्य ज्ञान-आलोक प्रदीपित, सत्यं शिवं सुन्दरं शोभित
कपिल, कणाद और जैमिनि की स्वानुभूति का अमर प्रकाशन
विशद-विवेचन, प्रत्यालोचन ब्रह्म, जगत्, माया का दर्शन।’’
अर्थात् वेद केवल ढकोसला मात्र नहीं है, इनमें वह पौराणिक ज्ञान समाहित है जिनके अध्ययन से धीरे-धीरे विकास हुआ और आज के आधुनिक युग की कई वस्तुओं का ज्ञान प्राचीन भारतीय ऋषियों ने पहले ही मनन कर प्राप्त कर लिया था। वेद परम शक्तिमान ईश्वर की वाणी है। अर्थात् वेद ईश्वरीय ज्ञान है। वेद श्रुति भी कहलाते हैं क्योंकि श्रुति का तात्पर्य है-सुनना। इसका अर्थ है कि प्राचीन भारतीय ऋषियों ने मनन एवं ध्यान कर अपनी तपस्या के बल पर ईश्वर के ज्ञान को ग्रहण किया, उसे आत्मसात् किया। जब उनके शिष्य उनसे शिक्षा ग्रहण करते तो वे उसी ज्ञान को उन्हें बाँटते।

यह ईश्वररीय ज्ञान मंत्रों के रूप में ऋषियों के साथ सभी को स्मरण होता गया, उन्हें कण्ठस्थ हो गया और धीरे-धीरे उन सभी से एक-दूसरे के पास पहुँचा। क्योंकि प्राचीन काल में आज की तरह स्कूल, कॉलेज नहीं थे। अपितु शिष्य, ऋषियों के आश्रय में जाकर शिक्षा ग्रहण करते थे जो गुरु-शिष्य परम्परा कहलाती थी और ऋषि मंत्रों का उच्चारण कर शिष्यों को समझाते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि ऋषियों ने जो ईश्वरीय ज्ञान सुना वह वेद है, श्रुति है। इसलिए वेदों को श्रुति भी कहा गया।
वेद ज्ञान का अनन्त भण्डार है। ये ईश्वरीय ज्ञान है। ये कोई ऐतिहासिक पुस्तकें नहीं है कि कोई घटना घटी और पुस्तकवद्ध हो गई। अतः ईश्वर की अलौकिक वाणी जो ज्ञानरूप में वेदों में निहित है, उसे समझने के लिए वेद ही वे अलौकिक नेत्र हैं जिनकी सहायता से मनुष्य ईश्वर के अलौकिक ज्ञान को समझ सकता है। वेद ही वे ज्ञान ग्रंथ हैं जिनके समकक्ष विश्व का कोई भी ग्रंथ नहीं है।
अतः वेद ईश्वरीय ज्ञान है और उनका उद्भव भी ईश्वर द्वारा ही हुआ है।
वेदों की उत्पत्ति का पौराणिक आधार
ब्रह्माजी ने सृष्टि रचना के समय देवों और मनुष्यों के साथ-साथ कुछ असुरों की भी रचना कर दी। इन असुरों में देवों के विपरीत आसुरी गुणों का समावेश था, इस कारण ये स्वभाव से अत्यंत क्रूर, अत्याचारी और अधर्मी हो गए। ब्रह्माजी ने देवगण के लिए स्वर्ग और मनुष्यों के लिए पृथ्वी की रचना की। लेकिन जब ब्रह्माजी को असुरों की आसुरी मानसिकता का ज्ञान हुआ तो उन्होंने असुरों को पाताल में निवास करने के लिए भेज दिया।
असुर स्वच्छंद आचरण करते थे। शीघ्र ही उन्होंने अपनी तपस्या से भगवान् शिव को प्रसन्न कर वरदान में अनेक दिव्य शक्तियाँ प्राप्त कर लीं और पृथ्वी पर आकर ऋषि-मुनियों पर अत्याचार करने लगे। धीरे-धीरे ये अत्याचार बढ़ते गए। इससे असुरों की आसुरी शक्तियों में भी वृद्धि होती गई। देवों की शक्ति का आधार भक्ति, सात्त्विकता और धर्म था, लेकिन स्वर्ग के भोग-विलास में डूबकर वे इसे भूल गए, इस कारण उनकी शक्ति क्षीण होती गई।
ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, 09827198828, भिलाई

भाग्यशाली यंत्र देते हैं कर्म करने का संदेश, न कि भाग्यशाली बनाते हैं

भाग्यशाली यंत्र देते हैं  कर्म करने का संदेश, न  कि भाग्यशाली बनाते हैं
-ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे , मोबा.नं.09827198828, भिलाई
मित्रों, प्राणी मात्र किसी ना किसी यंत्र में बंधा होता है यंत्र का तात्पर्य उपकरण से है जिस प्रकार कई यंत्रों को मिलाकर अथवा जोड़कर एक टू-व्हिलर गाड़ी बनायी जाती है उसी प्रकार यह सृष्टी भी कई उपकरणों अर्थात ईश्वरानुभूतियों पर आश्रीत है जिसके हम और आप एक अंशमात्र प्राणी हैं भारद्वाज मुनि कृत यंत्रणार्व ग्रन्थ के वैमानिक प्रकरण में दी गई मन्त्र, तंत्र और यंत्र की परिभाषा-

मंत्रज्ञा ब्राह्मणा: पूर्वे जलवाय्वादिस्तम्भने।

शक्तेरुत्पादनं चक्रुस्तन्त्रमिति गद्यते॥

दण्डैश्चचक्रैश्च दन्तैश्च सरणिभ्रमकादि भि:।

शक्तेस्तु वर्धकं यत्तच्चालकं यन्त्रमुच्यते॥

मानवी पाशवीशक्तिकार्य तन्त्रमिति स्मृतं - (यन्त्राणर्व)
इससे यह स्पष्ट हो जाता है की मानव जाति को यंत्र ही अपने में समाहित या यंत्रीत कर संचालित करता है जिसका संबंध सीधा इश्वर से है । मित्रों मैं यह कत्तई नहीं मानता कि यह यंत्र भाग्य को पलट देने में क्षमतावान हैं क्योंकि कर्तव्यपरायणता के वगैर कोई यंत्र-मंत्र-तंत्र काम नहीं करता  हां, किन्तु इन यंत्रों के सान्निध्य में रहने से काम करने की क्षमता अवश्य बढ़ती है। तो आईए आपको हमारे पुरा वैज्ञानिक महर्षियों द्वारा प्रदत्त अलौकीक यंत्रों के बारे में बताता हुं.
                     श्री यंत्र
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इस यंत्र को धन वृद्धि, धन प्राप्ति, कर्ज से सम्बन्धित धन पाने के लिए लोन इत्यादि प्राप्त होने के लिए लाटरी, सट्टा आदि द्वारा धन पाने के लिए उपयोग में लाया जाता है। इस यंत्र की अचल प्रतिष्ठा होती है।
अनन्त ऐश्वर्य एवं लक्ष्मी प्राप्ति के मुमक्ष को चाहिए कि श्री यंत्र के सम्मुख श्री सूक्त का नृत्य पाठ करो पंचमेवा देवी को भोग लगायें तो शीघ्र ही इसका चमत्कार होता है।
लक्ष्मी प्राप्ति जब सभी उपाय निरर्थक साबित हो जायें तब श्री यंत्र के सम्मुख आदि शंकराचार्य निर्मित स्तोत्र का पाठ करें इस स्तोत्र के स्थान से असीमित धन लाभ हो सकता है।
यंत्र का उपयोग
इस यंत्र को व्यापार वृद्धि के लिए तिजोरी में रखा जाता है धान्य वृद्धि के लिए धान्य में रखा जाता है
इस यंत्र को वेलवृक्ष की छाया में उपासना करने से लक्ष्मी शीघ्र प्रसन्न होती है और अचल सम्पत्ति प्रदान करती हैं।
इस यंत्र को सम्मुख रखकर सूखे वेलपत्र घी में डुबोकर वेल की समिधा में आहूति डालने से मां भगवती शीघ्र ही प्रसन्न होती है एवं धन ऐश्वर्य प्राप्त होता है तथा जीवन भर लक्ष्मी के लिए दुखी नहीं होना पड़ता।
 
बीसा यंत्र
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जिसके पास रहे यह बीसा। उसका क्या करे जगदीशा।।
बीसा यंत्र को अनेक परेशानियों से बचने के लिए एवं चोर भय, अग्नि भय झगड़ा, लड़ाई इत्यादि से बचने के लिए इसे बटुये में या पाॅकेट में रखा जाता है। इस यंत्र की चल प्रतिष्ठा होती है। बीसा यंत्र शक्ति का द्योतक माना जाता है यह यंत्र सभी प्रकार के जातक धारण करते हैं तथा उपासना करते हैं।
यंत्र का उपयोग
प्राचीन काल में तांत्रिक लोग एवं तंत्र से जुड़े वर्ग के लोग इस यंत्र का अत्यधिक उपयोग किया करते थे। बीसा यंत्र अनेक प्रकार के भंय को नष्ट करता है जैसे- चोर भंय, प्रेत भंय, शत्रु भय, रोग भय, दुर्घटना भय आदि।
बीसा यंत्र को सम्मुख रखकर शुभ मुहूर्त में हनुमान चालीसा का एक सौ आठ पाठ करने से बीमार मनुष्यों को बीमारी से छुटकारा मिलता है।
इस यंत्र के सम्मुख शक्ति का सावर मंत्र जप करने से मंत्र सिद्ध होता है और उसमें शक्ति जाग्रत होती है।
इस यंत्र को प्रतिदिन धूप दीप आदि से पूजन करके सिरहाने रखने से बुरे स्वप्न से छुटकारा मिलता है।
 
शुक्र यंत्र
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 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्र प्रतिकूल होने पर प्रत्येक कार्य में असफलता नजर आती है। ऐसी स्थिति में शुक्र यंत्र को चल या अचल प्रतिष्ठा करके धारण करने से अथवा पूजन करने से शुक्र का शीघ्र ही अनुकूल फल प्राप्त होने लगता है।
शुक्र यंत्र दो प्रकार के होते हैं। प्रथम नौग्रहों का एक ही यंत्र होता है द्वितीय नौग्रहों का अलग-अलग नौयंत्र होता है। प्रायः दोनों यंत्रों के एक जैसे ही कार्य एवं लाभ होते हैं
इस यंत्र को सम्मुख रखकर नौग्रहों की उपासना करने से सभी प्रकार के भयं नष्ट होते हैं शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है व्यापार आदि में सफलता मिलती है समाज उन्नति प्राप्त होती है तथा कार्यो किसी भी प्रकार की बांधा उत्पन्न नहीं होती है।
यंत्र का उपयोग
शुक्र देव को प्रसन्न करना हो तो यंत्र के सम्मुख लक्ष्मी जी की पूजा करनी चाहिए।
 
 
महालक्ष्मी यंत्र
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 इस यंत्र को निरन्तर धन वृद्धि के लिए अधिक उपयोगी माना गया है। कम समय में ज्यादा धन वृद्धि के लिए यह यंत्र अत्यन्त उपयोगी है इस यंत्र की चल या अचल दोनों तरह से प्रतिष्ठा की जाती है।
महालक्ष्मी यंत्र अत्यन्त दुर्लभ परंतु लक्ष्मी प्राप्ति के लिए रामबाण प्रयोग है तथा अपने आप में अचूक, स्वयं सिद्ध, ऐश्वर्य प्रदान करने में सर्वथा समर्थ है। इस यंत्र का प्रयोग दरिद्रता का नाश करता है। यह स्वर्ण वर्षा करने वाला यंत्र कहा गया हैै। रंक को राजा बनाने की सामथ्र्य है इसमें। इसकी कृपा से गरीब व्यक्ति एकाएक धनोपार्जन करने लगता है।
यह अद्भुत स्तोत्र तुरंग फलदायनीय है परंतु इस स्तोत्र पाठ के सामने ’कनकधारा यंत्र’ होना चाहिए जिसकी प्राण-प्रतिष्ठा उतनी ही दुर्लभ व दुःसाध्य है जछिल प्रक्रिया के कारण बहुत कम लोग इसे सिद्ध कर पाते हैं। सिद्ध होने पर यह कनकधारा यंत्र व्यापार वृद्धि दारिद्रय नाश करने व ऐश्वर्य प्रदान करने में आश्चर्यजनक रूप से काम करता है।
दीपावली के शुभ अवसर पर सिंह लग्न में इस यंत्र को सम्मुख रखकर धूप दीप आदि द्वारा पूजन करने के पश्चात ऋग्वेद, का श्री सूक्त और कनक धारा को सम्पुटित करके सोलह पाठ करने से तथा अनेक प्रकार के उपचार से महालक्ष्मी का पूजन करने से माता लक्ष्मी वर्षपर्यंत उस स्थान में निवास करती हैं तथा अपने भक्ति गणों अनुग्रहीत करती हैं।
 
वशीकरण यंत्र
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 अपने से विपरीत कार्य करने वाले को प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष कार्य करने के लिए प्रेरित करने की क्रिया को वशीकरण कहते है। यह यंत्र स्त्री,पुरुष, वृद्ध बालक, राजा, मंत्री, सभी तरह के लोगों को आकर्षित करता है। और यंत्र धारी को वांछित सफलता प्रदान करता है।
अभिचार कर्म से अच्छा है कि शत्रु को वशीकृत कर लिया जावे। इससे प्रथम लाभ तो यह कि दुष्टजन में सुधार आएगा, द्वितीय यह कि कर्ता किसी दोष का शिकार भी नहीं होगा। यह मन्त्र भी भगवान वज्रांग अर्थात् हनुमान जी से सम्बन्धित है।
इस वशीकरण यं़त्र से साधक इस जगत में सर्वप्रिय लोकप्रिय हो जाता है वह जिस व्यक्ति से मिलता है वह उससे प्रभावित हुये विना नहीं रह सकता। वशीकरण यंत्र मुख्यतः माँ कामाख्या का ध्यान करते हुए एवं उन्हीं का मंत्र जप करते हुये इसे यंत्र को सिद्ध किया जाता है और उपयोग में लाया जाता है।
यंत्र का उपयोग
जब पति कुमार्गगामी हो जाए और उसके सुधार के सारे बाह्य प्रयास असफल हो जाएँ तो पत्नी को ऐसे प्रयोगों के माध्यम से पराँम्बा की शरण लेनी चाहिए।
इस यंत्र का प्रयोग समाज के किसी भी स्त्री, पुरुष पर किया जा सकता है जब पति-पत्नी के आपसी विवाद में सामान्जस कम हो जाये तो ऐसी स्थिति में इस यंत्र का उपयोग अत्यन्त लाभकारी सिद्ध होता है।
 
 
 
चंद्र यंत्र
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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चन्द प्रतिकूल होने पर प्रत्येक कार्य में असफलता नजर आती है। ऐसी स्थिति में चन्द यंत्र को चल या अचल प्रतिष्ठा करके धारण करने से अथवा पूजन करने से चन्द का शीघ्र ही अनुकूल फल प्राप्त होने लगता है।
चन्द्र यंत्र दो प्रकार के होते हैं। प्रथम नौग्रहों का एक ही यंत्र होता है द्वितीय नौग्रहों का अलग-अलग नौयंत्र होता है। प्रायः दोनों यंत्रों के एक जैसे ही कार्य एवं लाभ होते हैं
इस यंत्र को सम्मुख रखकर नौग्रहों की उपासना करने से सभी प्रकार के भयं नष्ट होते हैं शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है व्यापार आदि में सफलता मिलती है समाज मंे उन्नति प्राप्त होती है तथा कार्यो किसी भी प्रकार की बांधा उत्पन्न नहीं होती है।
यंत्र का उपयोग
चन्द्र देव को प्रसन्न करना हो तो यंत्र के सम्मुख भोले शिव की उपासना करनी चाहिए।
कभी-कभी ग्रह अनुकूल होने पर भी अनेक रोग व्याधि से मानव पीड़ित होता है अस्तु जहां तक उपाय का प्रश्न है इनमें महामृत्युंजय मंत्र का जप भी लाभ प्रत होता कभी-कभी राहु की शान्ती के लिए सरसों और कोयले का दान अत्यन्त लाभकारी होता है।
केतु की शान्त के लिए कुत्ते को भोजन कराया जाता है। इसलिये यह उपाय लाभकारी रहेगा। सूर्य आदि ग्रहों की शान्त एक मौलिक नियम यह भी है कि जिस ग्रह पर पाप प्रभाव पड़ रहा हो उसको बलवान किया जाना अभीष्ट है उससे सम्बन्धित रत्न आदि धारण किया जाय अथवा यंत्र रखकर वैदिक मंत्रों द्वारा अनुष्ठान किया जाये।
 
गायत्री यंत्र
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गायत्री यंत्र पाप को नष्ट करने और पुण्य को उदय करने की अद्भुद शक्ति का पुन्ज कहा जाता है। इस यंत्र की       पूजा उपासना करने से इस लोक में सुख प्राप्त होता है एवं विष्णु लोक में स्थान प्राप्त होता है। तथा अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। ओर दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है। इस यंत्र की अचल प्रतिष्ठा होती है।
माँ गायत्री चारों वेदों की प्राण, सार, रहस्य एवं तन (साम) साम संगीत का यह रथन्तर आत्मा के उल्लास को उद्वेलित करता है जो इस तेज को अपने में धारण करता है उसकी वंश परम्परा तेजस्वी बनती चली जाती है। उसकी पारिवारिक संतति और अनुयायिओं की श्रृंखला में ऐ से एक बढ़कर तेजस्वी प्रतिभाशाली उत्पन्न होते चले जाते हैं।
यंत्र का उपयोग
साधना चेता क्षेत्र का ऐसा पुरुषार्थ है जिसमें सामान्य श्रम एवं मनोयोग का नियोजन भी असामान्य विभूतियों एवं शक्तियों को जन्म देता है। साधारण स्थिति में हर वस्तु तुच्छ है। यदि गायत्री यंत्र की उपासना द्वारा उसको पूर्ण बनाया जाय तो वह वस्तु उत्कृष्ट बन जाती है।
हमने संसार के कठिन से कठिन कार्य का सदा सहज रूप में कर सकने की सामथ्र्य गायत्री-साधना से ही जुटाई है। हजारो ऋषि-मुनियों, साधकों, महापुरुषों ने इस साधना को बिना सोचे-समझे, बिना प्रयोग-परीक्षण किये नहीं अपनाया है।
 
संतान गोपाल यंत्र
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 मानव जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए एक अच्छे संतान की आवश्यकता होती हैं। परन्तु-कुछ लोग संतान विहीन होते हैं और संतान की प्राप्ति के लिए अनेक प्रयास करते हैं। ऐसी स्थिति में संतान प्राप्ति हेतु यह यंत्र अत्यन्त चमत्कारिक है। इस यंत्र की प्रतिष्ठा पूजा करने से मनोवांछित संतान की प्राप्ति होती है। और वह दीर्घायु और गुणवान होता है।
संतान गोपाल यंत्र की साधना अत्यन्त प्रसिद्ध है जिन्हें संतान नहीं उत्पन्न होती है वे बालकृष्ण की मूर्ति के साथ संतान गोपाल यंत्र स्थापित करते हैं तथा उनके सामने संतानगोपाल स्तोत्र का पाठ करते हैं। कुछ लोग ’पुत्रोष्टि यज्ञ’ करते हैं पुत्रेष्टि यज्ञ एवं संतान गोपाल यंत्र के द्वारा अवश्य ही संतान की प्राप्ति होती है।
यंत्र का उपयोग
संतान गोपाल यंत्र को गुरुपुष्य नक्षत्र में पूजन एवं प्रतिष्ठा करने के पश्चात् संतान गोपाल स्त्रोत्र का पाठी करने से शीघ्र ही गृह में कुलीन एवं अच्छे गुणों से युक्त संतान की उत्पत्ति होती है तथा माता पिता की सेवा में ऐसी संतानें हमेशा तत्पर रहती हैं।
संतान गोपाल यंत्र को गोशाला में प्रतिष्ठित करके गोपालकृष्ण का मंत्र का जप श्रद्धापूर्वक करने से वध्या को भी शीघ्र ही पुत्ररत्न उत्पन्न होता है तथा सभी गुणों से सम्पन्न होता है।
 

महाकाली यंत्र
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दशमहाविद्याओं में काली प्राथमिता सर्वत्र देखी जाता है कालका पुराण के अनुसार मातंग मुनि के आश्रम में मां काली का सभी देवताओं ने स्तवन किया था महाकाली प्रलय काल से सम्बद्ध होने से अतएव कृष्णवर्णा हैं। वे शव पर आरूढ़ इसीलिए है। कि शक्तिविहीन विश्व मृत ही है। शत्रुसंहारक शक्ति भायावह होती हैं, इसीलिए काली की मूर्ति भयावह है। शत्रु संहार के बाद विजयी योद्धा का अट्टहास भीषणता के लिए होता है, इसलिए महाकाली हँसती रहती हैं।
आद्यशक्ति मां महाकाली अपरोक्ष या परोक्ष बाधांओं को नष्ट करके शक्ति प्रदान करती है। इस अद्भुत शक्ति द्वारा मानव अनेक सफलता प्राप्त करता है। और निश्चिन्त जीवन व्यतीत करता है। इस यंत्र की चल अचल दोनों तरह से प्रतिष्ठा होती है।
यंत्र का उपयोग
महाकाली की पूजा सर्वकामनाओं की पूर्ति के लिए की जाती है विशेष रूप से अत्याचारी शत्रु से रक्षा व त्राण पाने के लिए। माया के जाल से छूटकर मोक्ष प्राप्ति के लिए महाकाली की पूजा सर्वश्रेष्ठ है। संसारी जीव असुरों, दुष्टों से रक्षा के लिए मां की पूजा करते हैं।
वाद-विवाद, मुकदमें में जीतने के लिए, प्रतियोगिता में प्रतिद्वन्द्वी को परास्त करने के लिए, दौड़, कुश्ती आदि युद्ध में मल्लयुद्ध में किसी भी प्रकार के युद्ध, शास्त्रार्थ में विजय के लिए काली की उपासना तरुन्त फल देती है।
 
 
व्यापार वृद्धि यंत्र
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 कोई भी व्यापार हो अगर उसमें बार-बार हानि हो रही है। चोरभय, अग्नि भय इत्यादि बार-बार परेशान करता हो। अथवा किसी अन्य प्रकार से व्यापार में बांधा उत्पन्न होती हो तो यह यंत्र वहां प्रतिष्ठित करने से शीघ्र ही व्यापार वृद्धि एवं लाभ होता है। इस यंत्र की चल अचल दोनों तरह से प्रतिष्ठा होती है।
इस यंत्र को काम्यकर्म अर्थात कामनापूर्ती के लिए किया जाता है इस यंत्र को सम्मुख रखकर भिन्न- भिन्न कामनाओं के लिए पृथक्-पृथक् वस्तुओं से होम करने का विधान शास्त्रों में वर्णित है, उन-उन वस्तुओं से होम करने से तत्-तत् कामनाएँ पूर्ण होती हैं।
यंत्र का उपयोग
व्यापार वृद्धि यंत्र को पूजा प्रतिष्ठा करने के पश्चात् व्यापार से सम्बन्धित ब्रह्मस्थल में स्थापित किया जाता है और हमेशा पूजा की जाती है ऐसा करने से रूके व्यापार में वृद्धि होती है तथा धन का आगमन होता हैं
व्यापार में निरन्तर घाटा होने की स्थिति में इस यंत्र को सम्मुख रखकर व्यापार वृद्धि का दस हजार ऋद्धि- सिद्धि मंत्र जप ने से शीघ्र ही व्यापार में लाभ होता है।
इस यंत्र की अचल प्रतिष्ठा करके व्यक्ति को अपने पास में रखने से अनेक तरह से व्यापार में लाभ होता है। प्रतिकूल रहने वाले व्यक्ति भी अनुकूल हो जाते हैं और अनेक प्रकार से लाभ प्रदान करने के लिए आतुर होने लगते हैं तथा निरन्तर व्यापार में लाभ होता जाता हैं।
 
बगलामुखी यंत्र
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 श्रीबगला पीताम्बरा को तामसी मानना उचित नहीं, क्योंकि उनके आभिचारिक कृत्यों मे रक्षा की ही प्रधानता होती है और कार्य इसी शक्ति द्वारा होता है। शुक्ल-आयुर्वेद की माध्यंदिन संहिता के पाँचवें अध्याय की 23, 24, 25वीं कण्डिकाओं में अभिचार-कर्मकी निवृत्ति में श्रीबगलामुखी को ही सर्वोत्तम बाताया गया है, अर्थात् शत्रु के विनाश के लिए जो कृत्याविशेष को भूमि में गाड़ देते हैं, उन्हें नष्ट करने वाली वैष्णवी महाशक्ति श्रीबगलामुखी ही हैं।
शत्रुओं को नष्ट करने के लिए पराजित करने के लिए प्रभावित करने के लिए चाहे वह अपरोक्ष हो या परोक्ष यह यंत्र अत्यन्त उपयोगी है अपने बलशाली शत्रुओं को प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य पराजित नहीं कर सकता यद्यपि इस यंत्र द्वारा शत्रुओं पर विजय पायी जा सकती है। और वांछित सफलता प्राप्त हो सकती है। इस यंत्र की अचल प्रतिष्ठा होती है।
यंत्र का उपयोग
इस यंत्र को शुभ मूहुर्त में सम्मुख रखकर जपकर्ता को पीला वस्त्र पहन कर हल्दी की गांठ की माला से जप करना चाहिए। देवी की पूजा और होम में पीले पुष्पों, प्रियंगु कनेर, गेंदा आदि के पुष्पों का प्रयोग करना चाहिए।
इस यंत्र को सम्मुख रखकर मां बगलामुखी का मंत्र छत्तीस हजार की संख्या में जप करने से शत्रुओं का किया गया अभिचार कार्य नष्ट होता है तथा साधक की मनोकामनायें भगवती शीघ्र ही पूर्ण करती है।
 
 
सूर्य यंत्र
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 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य प्रतिकूल होने पर प्रत्येक कार्य में असफलता नजर आती है। ऐसी स्थिति में सूर्य यंत्र को चल या अचल प्रतिष्ठा करके धारण करने से अथवा पूजन करने से सूर्य का शीघ्र ही अनुकूल फल प्राप्त होने लगता है।
सूर्य यंत्र दो प्रकार के होते हैं। प्रथम नौग्रहों का एक ही यंत्र होता है द्वितीय नौग्रहों का अलग-अलग नौयंत्र होता है। प्रायः दोनों यंत्रों के एक जैसे ही कार्य एवं लाभ होते हैं
इस यंत्र को सम्मुख रखकर नौग्रहों की उपासना करने से सभी प्रकार के भयं नष्ट होते हैं शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है व्यापार आदि में सफलता मिलती है समाज उन्नति प्राप्त होती है तथा कार्यो किसी भी प्रकार की बांधा उत्पन्न नहीं होती है।
यंत्र का उपयोग
सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिए इस यंत्र को सम्मुख रखकर विष्णु भगवान का पूजन, हरिवंश पुराण की कथा की व्यवस्था करनी चाहिए।
कभी-कभी ग्रह अनुकूल होने पर भी अनेक रोग व्याधि से मानव पीड़ित होता है अस्तु जहां तक उपाय का प्रश्न है इनमें महामृत्युंजय मंत्र का जप भी लाभ प्रत होता कभी-कभी राहु की शान्ती के लिए सरसों और कोयले का दान अत्यन्त लाभकारी होता है।
सूर्य आदि ग्रहों की शान्त एक मौलिक नियम यह भी है कि जिस ग्रह पर पाप प्रभाव पड़ रहा हो उसको बलवान किया जाना अभीष्ट है उससे सम्बन्धित रत्न आदि धारण किया जाय अथवा यंत्र रखकर वैदिक मंत्रों द्वारा अनुष्ठान किया जाये।
 
 
 
शनि यंत्र
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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि प्रतिकूल होने पर अनेक कार्यों में असफलता देता है, कभी वाहन दुर्घटना, कभी यात्रा स्थागित तो कभी क्लेश आदि से परेशानी बढ़ती जाती है ऐसी स्थितियों में ग्रह पीड़ा निवारक शनि यंत्र की शुद्धता पूर्ण पूजा प्रतिष्ठा करने से अनेक लाभ मिलते हैं। यदि शनि की ढै़या या साढ़ेसाती का समय हो तो इसे अवश्य पूजना चाहिए।
उपयोग से लाभ
श्रद्धापूर्वक इस यंत्र की प्रतिष्ठा करके प्रतिदिन यंत्र के सामने सरसों के तेल का दीप जलायें नीला, या काला पुष्य चढ़ायें ऐसा करने से अनेक लाभ होगा। मृत्यु, कर्ज, केश, मुकद्दमा, हानि, क्षति, पैर आदि की हड्डी, बात रोग तथा सभी प्रकार के रोग से परेशान लोगों हेतु यंत्र अधिक लाभकारी होगा। नौकरी पेशा आदि के लोगों को उन्नति भी शनि द्वारा ही मिलती है अतः यह यंत्र अति उपयोगी यंत्र है जिसके द्वारा शीघ्र ही लाभ पाया जा सकता है।
 
सुख समृद्धि यंत्र
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व्यापार, विदेश गमन, राजनीति, गृहस्थ जीवन नौकरी पेशा आदि में इस यंत्र का उपयोग करने से सुख एवं समृद्धि प्राप्त होती है। इस यंत्र की चल एवं अचल दोनों तरह से प्रतिष्ठा होती है।
जिस लोगों अनेक तरह की भ्रत्तियां उत्पन्न होती हैं घर में निरन्तर क्लेश रहता हो तथा आपसी सम्बन्धों में कटुता उत्पन्न हुयी हो तो यह यंत्र उन लोगों के लिए वरदान स्वरूप साबित होता है। ऐसे लोगो के लिए इस यंत्र की पूजा उपासना करने से उन्हें मानसिक शान्ती एवं सहिष्णुता में वृद्धि होती हैं
यंत्र का उपयोग
जब वाहन, मान नौकरों से कोई न कोई तकलीफ रहती हो व्यापार व्यवसाय में भयानक उतार चढ़ाव आते हो तथा घाटा होता हो तो ऐसी स्थिति में व्यापारिक एवं व्यवसायिक स्थिति अनुकूल होने के लिए इस यंत्र की पूजा उपासना करना उचित होगा।
अथक परिश्रम करने के बाद भी वांछित सफलता जिन्हें नहीं मिलती तथा कार्यो में असफलता मिलती है। बार-बार अपयश का सामना होता है। तो ऐसी स्थिति में यह यंत्र अत्यन्त लाभकारी है इस यंत्र की चल अचल दोनों प्रतिष्ठा होती है।
इस यंत्र के सम्मुख लक्ष्मी और गणेश का सम्पुटित मंत्र जप करने से सुख समृद्धि प्राप्त होती है। तथा आकरण हुये अपमान का शत्रु प्रायश्चित करता है और जीवन परयंत्र सम्मान प्रदान करता है।
 
 
मंगल यंत्र
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 किसी विशेष कार्य को करने के लिए लोगों में अनेक संसय उत्पन्न होते हैं कार्य सफल होगा या असफल होगा ऐसी भावनायें बार-बार मन में उठती हैं। कई बार कार्य असफल भी होते हैं। ऐसे कार्यो को निर्धारित समय में बिना किसी परेशानी के सफलता पाने के लिए यह यंत्र अत्यन्त उपयोगी है इस यंत्र की अचल प्रतिष्ठा होती है।
ार, विदेश गमन, राजनीति, गृहस्थ जीवन नौकरी पेशा आदि में इस यंत्र का उपयोग करने से सुख एवं समृद्धि प्राप्त होती है। इस यंत्र की चल एवं अचल दोनों तरह से प्रतिष्ठा होती है।
यंत्र का उपयोग
जब वाहन, मान नौकरों से कोई न कोई तकलीफ रहती हो व्यापार व्यवसाय में भयानक उतार चढ़ाव आते हो तथा घाटा होता हो तो ऐसी स्थिति में व्यापारिक एवं व्यवसायिक स्थिति अनुकूल होने के लिए इस यंत्र की पूजा उपासना करना उचित होगा।
अथक परिश्रम करने के बाद भी वांछित सफलता जिन्हें नहीं मिलती तथा कार्यो में असफलता मिलती है। बार-बार अपयश का सामना होता है। तो ऐसी स्थिति में यह यंत्र अत्यन्त लाभकारी है इस यंत्र की चल अचल दोनों प्रतिष्ठा होती है।
इस यंत्र के सम्मुख सिद्धि विनायक मंत्र जप करने से सुख समृद्धि प्राप्त होती है। तथा आकरण हुये अपमान का शत्रु प्रायश्चित करता है और जीवन परयंत सम्मान प्रदान करता है।
 
 
केतु यंत्र
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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार केतु प्रतिकूल होने पर प्रत्येक कार्य में असफलता नजर आती है। ऐसी स्थिति में केतु यंत्र को चल या अचल प्रतिष्ठा करके धारण करने से अथवा पूजन करने से केतु का शीघ्र ही अनुकूल फल प्राप्त होने लगता है।
केतु यंत्र दो प्रकार के होते हैं। प्रथम नौग्रहों का एक ही यंत्र होता है द्वितीय नौग्रहों का अलग-अलग नौयंत्र होता है। प्रायः दोनों यंत्रों के एक जैसे ही कार्य एवं लाभ होते हैं
इस यंत्र को सम्मुख रखकर नौग्रहों की उपासना करने से सभी प्रकार के भयं नष्ट होते हैं शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है व्यापार आदि में सफलता मिलती है समाज उन्नति प्राप्त होती है तथा कार्यो किसी भी प्रकार की बांधा उत्पन्न नहीं होती है।
यंत्र का उपयोग
केतु देव को प्रसनन करना होतो यंत्र के सममुख गणेश जी की पूजा की व्यवस्था करनी चाहिए।
केतु की शान्त के लिए कुत्ते को भोजन कराया जाता है। इसलिये यह उपाय लाभकारी रहेगा।
कभी-कभी ग्रह अनुकूल होने पर भी अनेक रोग व्याधि से मानव पीड़ित होता है अस्तु जहां तक उपाय का प्रश्न है इनमें महामृत्युंजय मंत्र का जप भी लाभ प्रत होता कभी-कभी राहु की शान्ती के लिए सरसों और कोयले का दान अत्यन्त लाभकारी होता है।
केतु की शान्त के लिए कुत्ते को भोजन कराया जाता है। इसलिये यह उपाय लाभकारी रहेगा।
 
 
नवग्रह यंत्र
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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नवग्रह प्रतिकूल होने पर प्रत्येक कार्य में असफलता नजर आती है। ऐसी स्थिति में नवग्रह यंत्र को चल या अचल प्रतिष्ठा करके धारण करने से अथवा पूजन करने से नवग्रहों का शीघ्र ही अनुकूल फल प्राप्त होने लगता है।
नवग्रह यंत्र दो प्रकार के होते हैं। प्रथम नौग्रहों का एक ही यंत्र होता है द्वितीय नौग्रहों का अलग-अलग नौयंत्र होता है। प्रायः दोनों यंत्रों के एक जैसे ही कार्य एवं लाभ होते हैं
इस यंत्र को सम्मुख रखकर नौग्रहों की उपासना करने से सभी प्रकार के भयं नष्ट होते हैं शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है व्यापार आदि में सफलता मिलती है समाज उन्नति प्राप्त होती है तथा कार्यो किसी भी प्रकार की बांधा उत्पन्न नहीं होती है।
यंत्र का उपयोग
सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिए इस यंत्र को सम्मुख रखकर विष्णु भगवान का पूजन, हरिवंश पुराण की कथा की व्यवस्था करनी चाहिए।
चन्द्र देव को प्रसन्न करना हो तो यंत्र के सम्मुख भोले शिव की उपासना करनी चाहिए।
मंगल देव को प्रसन्न करना हो तो यंत्र के सम्मुख हनुमान जी की पूजा करनी चाहिए।
बुध देव को प्रसन्न करना हो तो यंत्र के सम्मुख दुर्गाजी की पूजा तथा दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए।
बृहस्पति देव को प्रसन्न करना हो तो यंत्र के सम्मुख ब्रह्माजी की पूजा करनी चाहिए। यदि सन्तान का प्रश्न हो तो हरि पूजन करें।
शुक्र देव को प्रसन्न करना हो तो यंत्र के सम्मुख लक्ष्मी जी की पूजा करनी चाहिए।
शनि देव को प्रसन्न करना हो तो यंत्र के सम्मुख भौरव जी की पूजा करनी चाहिए।
राहु देव को प्रसन्न करना हो तो यंत्र के सम्मुख भैरव जी की पूजा करना चाहिए।
केतु देव को प्रसनन करना होतो यंत्र के सममुख गणेश जी की पूजा की व्यवस्था करनी चाहिए।
शान्त एक मौलिक नियम यह भी है कि जिस ग्रह पर पाप प्रभाव पड़ रहा हो उसको बलवान किया जाना अभीष्ट है उससे सम्बन्धित रत्न आदि धारण किया जाय अथवा यंत्र रखकर वैदिक मंत्रों द्वारा अनुष्ठान किया जाये।
 
 
 
महामृत्युंजय यंत्र
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 यह यंत्र मानव जीवन के लिए अभेद्य कवच है बीमारी अवस्था में एवं दुर्घटना इत्यादि से मृत्यु के भय को यह यंत्र नष्ट करता है। डाक्टर, वैद्य से सफलता न मिलने पर यह यंत्र मनुष्य को मृत्यु से बचाता है। एवं शारीरिक एवं मानसिक पीड़ा को नष्ट करता है। इसे चल अचल दोनों तरह से प्रतिष्ठित किया जा सकता है।
महामृत्युंजय यंत्र को सम्मुख रखकर रुद्र सूक्त का पाठ करने से अनोखा लाभ होता है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से रुद्रसूक्त के मंत्रों में रश्मि विज्ञान के आधार पर इसमें गूढ़ रहस्य छुपे हैं जिस खोजने के लिए शुद्ध वैज्ञानिक मष्तिष्क् चाहिए। महामृत्युंजय यंत्र उच्चकोटि का दार्शनिक यंत्र है जिसमें जीवन-मृत्यु का रहस्य छिपा हुआ है।
यह स्पष्ट है कि नीलआभायुक्त किरण (न्सजतंअपवसमज तंले) घातक होती है। इसे आधुनिक विज्ञान ने स्वीकार किया है सूर्य की किरणों में सात रंग होते हैं जिसमें बैंगनी रंग की किरण सबसे ज्यादा खतरनाक एवं घातक मानी गयी है। स्टोव-गैस इत्यादि दैनिक प्रयोग की वस्तुओं में भी हम देखते हैं कि अग्नि की ज्वाला जब नीलआभायुक्त होती है तक वह घातक और विषैली हो जाती है।
महामृत्युंजय यंत्र भगवान मृत्युंजय से सम्बन्धित है जिसका शाब्दिक अर्थ स्पष्ट है कि मृत्यु पर विजय इस देवता की आकृति देदीप्यमान है तथा ये नाना रूप धारण करने वाला है यह सब औषधि का स्वामी है तथा वैद्यों में सबसे बड़ा वैद्य है यह अपने उपासकों के पुत्र-पौत्रादि (बच्चों) तक को आरोग्य व दीर्घायु प्रदान करता है। इसके हाथों को ’’मृणयाकु’’ (सुख देने वाला) ’’जलाष’’ (शीतलता, शांति प्रदान करने वाला ) तथा ’’भेषज’’ (आरोग्य प्रदान करने वाला) कहा गया है।
 
 
सरस्वती यंत्र
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आज का युग बौद्धिक युग है। बौद्धिक विकास को लेकर चारों तरफ तरह-तरह के परीक्षण, कम्पिटीशन, परीक्षाएं एवं प्रतियोगिताएं संपन्न हो रही हैं। बुद्धिहीन व्यक्ति मूर्ख कहलाता है, उसकी कहीं कोई इजजत नहीं। ऐसे मुद्धिशाली व्यक्तियों की बुद्धि को कुशाग्र करने के लिए, मंदबुद्धि वालों की बौद्धिक क्षमता बढ़ोने के लिए एवं स्मरण-शक्ति की तीव्रता के लिए सिद्ध सरस्वती यंत्र एक मात्र अवलम्बन है, जिससे हम आज के इस बौद्धिक युग में सर्वाधिक सफल व्यक्ति हो सकते हैं।
विद्या प्रदान करने की अपरमित शक्ति मां सरस्वती में ही है यह यंत्र मां सरस्वती के बीज मंत्रों द्वारा निर्मित होता है आज वैज्ञानिक युग में हर किसी को ज्ञान और विद्या की आवश्यकता है ज्ञान और विद्या विहीन व्यक्ति कभी सफल नहीं हो पाता। अतः हर क्षेत्र के लोगों को यह यंत्र अत्यन्त लाभकारी साबित हो सकता है तथा सफलता के लिए ज्ञान एवं विद्या प्रदान करता है। इस यंत्र की चल प्रतिष्ठा उचित है।
यंत्र का उपयोग
जो मनुष्य इस यंत्र को श्रृद्धा पूर्वक विधि के अनुसार पूजन दर्शन या धारण करता है वह विद्या-संपन्न, धनवान् और मधुरभाषी हो जाता है, साथ ही सरस्वती की कृपा से ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है।
बुद्धि-विद्या की देवी सरस्वती है, शिक्षा में मन लगे, आपकी बुद्धि प्रखर हो, परीक्षा में सफलता मिले, इस उद्देश्य से सरस्वती यंत्र का पूजा उपासना या धारण करना सर्वश्रेष्ठ हैं।
 
 
 
 
गणेश यंत्र
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देवों के देव भगवान् गणपती आदि महाशक्ति के रूप में जाने जाते हैं और प्रथम पूज्यनीय है विघ्नों के विनाश के लिए ये अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। किसी भी क्षेत्र में ऋद्धि-सिद्धि हेतु श्री गणेश यंत्र सदैव लाभ देता है और कार्यो को निर्विघ्न सम्पन्न होने के लिए सहायता करता है। यह यंत्र चल एवं अचल दोनों तरह से प्रतिष्ठित किया जाता है।
गणेश विघ्न निवारण के देवता हैं सभी कार्यो में सफलता हेतु भगवान गणेश की उपासना ही सर्वश्रेष्ठ मानी गयी है। चारों में वेदों एवं पुराणों में भगवान श्री गणेश की श्रेष्ठता का वर्णन बार-बार आता है इससे यह प्रतीत होता है विघ्नों को नष्ट करने के लिए गणेश की उपासना आवश्यक है।
यंत्र का उपयोग
श्री गणेश यंत्र को सम्मुख रखकर घृत मिश्रित अन्न की आहुतियाँ देने से मनुष्य धन धान्य से समृद्ध हो जाता है। चिउड़ा अथवा नारिकेल अथवा मरिच से प्रतिदिन एक हजार आहुति देने से एक महीने के भीतर बहुत बड़ी सम्पत्ति प्राप्त होती है।
जीरा, सेंधा नमक एवं काली मिर्च से मिश्रित अष्टद्रव्यों से प्रतिदिन एक हजार आहुति देने से व्यक्ति एक ही पक्ष (15दिनों) में कुबेर के समान धनवान् हो जाता है। इतना ही नहीं प्रतिदिन मूलमन्त्र से 444 बार तर्पण करने से मनुष्यों को मनो वांिछत फल की प्राप्ति हो जाती है।
 
 
 
कुबेर यंत्र
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स्वर्ण लाभ, रत्न लाभ, गड़े हुए धन का लाभ एवं पैतृक सम्पत्ती का लाभ चाहने वाले लोगों के लिए कुबेर यंत्र अत्यन्त सफलता दायक है। इस यंत्र द्वारा अनेकानेक रास्ते से धन का आवागमन होता है एवं धन संचय होता है। इस यंत्र की अचल प्रतिष्ठा होती है।
’शिव पुराण’ के अनुसार यक्षराज कुबेर अलकावती नामक नगरी के राजा थे। ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार मेरु पर्वत की चोटी मंदार पर ’चैत्ररथ’ नामक एक दिव्य बगीचा है, जहाँ कुबेर आराम करते हैं। अनेक प्रकार के किन्न-गन्धर्व व अप्सरायें यहाँ कुबेर आराम करते हैं। अनेक प्रकार के किन्नर-गन्धर्व व अप्सरायें यहाँ कुबेर आराम करते हैं अनेक प्रकार के किन्नर-गन्धर्व व अप्सरायें यहाँ कुबेर का नित्य पूजन करती है। जिस जगह पर कुबेर ने तपस्या की वह स्थल नर्मदा नदी एवं कावेरी का संगम स्थल था। वह स्थल आज भी ’कौबेर तीर्थ’ के नाम से पूजा जाता है।
यंत्र का उपयोग
विल्व-वृक्ष के नीचे बैठकर यंत्र को सम्मुख रखकर कुबेर मंत्र को शुद्धता पूर्वक जप करने से यंत्र सिद्ध होता है तथा यंत्र सिद्ध होने के पश्चात् इसे गल्ले, तिजोरी या सेफल में स्थापित किया जता है। इसके स्थापना के पश्चात् दरिद्रता का नाश होकर, प्रचुर धन व यश की प्राप्ति होती देखी गई है। यह अनुभूत परीक्षित प्रयोग है।
 
 
 
राहु यंत्र
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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार राहु प्रतिकूल होने पर प्रत्येक कार्य में असफलता नजर आती है। ऐसी स्थिति में राहु यंत्र को चल या अचल प्रतिष्ठा करके धारण करने से अथवा पूजन करने से राह का शीघ्र ही अनुकूल फल प्राप्त होने लगता है।
राहु यंत्र दो प्रकार के होते हैं। प्रथम नौग्रहों का एक ही यंत्र होता है द्वितीय नौग्रहों का अलग-अलग नौयंत्र होता है। प्रायः दोनों यंत्रों के एक जैसे ही कार्य एवं लाभ होते हैं
इस यंत्र को सम्मुख रखकर नौग्रहों की उपासना करने से सभी प्रकार के भयं नष्ट होते हैं शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है व्यापार आदि में सफलता मिलती है समाज उन्नति प्राप्त होती है तथा कार्यो किसी भी प्रकार की बांधा उत्पन्न नहीं होती है।
यंत्र का उपयोग
राहु देव को प्रसन्न करना हो तो यंत्र के सम्मुख भैरव जी की पूजा करना चाहिए।
कभी-कभी ग्रह अनुकूल होने पर भी अनेक रोग व्याधि से मानव पीड़ित होता है अस्तु जहां तक उपाय का प्रश्न है इनमें महामृत्युंजय मंत्र का जप भी लाभ प्रत होता कभी-कभी राहु की शान्ती के लिए सरसों और कोयले का दान अत्यन्त लाभकारी होता है।
 
 
हनुमान यंत्र
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हनुमान् देवता प्रोक्तः सर्वाभीष्टफलप्रदः।
श्रीहनुमान् जी भगवान् श्रीराम के भक्त हैं। इनका जन्म वायुदेव के अंश से और माता अंजनि के गर्भ से हुआ है। श्रीहनुमान् जी बालब्रह्मचारी महान् वीर अत्यन्त बुद्धिमान्, स्वामिभक्त है।
तदास्य शांस्त्र दास्यामि येन वाग्मि भविष्यति।
न चास्य भविता कश्चिद् सदृशः शास्त्रदर्शने।।
आदि काव्य के अनुसार ब्रह्मा द्वारा प्रेरति होकर श्रीसूर्यदेव ने हनुमान् को अपने तेज का सौवाँ भाग प्रदान करते हुए आशीर्वा दिया कि मैं इन्हें शास्त्र ज्ञान दूँगा। जिससे यह श्रेष्ठ वक्ता होंगे तथा शास्त्र में समता करने वाला कोई नहीं होगा।
यंत्र का उपयोग
हनुमान यंत्र पौरुष को पुष्ट करता हैं पुरुषों की अनेक बीमारियों को नष्ट करने के लिए इसमें अद्भुत शक्ति पायी जाती है जैसे- स्वप्न दोष, रक्त दोष, वीर्य दोष, मूर्छा, धातु रोग, नपुंसकता आदि को नष्ट करने के लिए यह अत्यन्त लाभकारी यंत्र है। इस यंत्र की प्रतिष्ठा चल एवं अचल दोनों प्रकार से की जाती है।
यह यंत्र मनुष्यों को विष, व्याधि, शान्ति, मोहन, मारण, विवाद, स्तम्भन, द्यूत, भूतभय संकट, वशीरकण, युद्ध, राजद्वार, संग्राम एवं चैरादि द्वारा संकट उपस्थित होने पर निश्चित रूप से इष्ट सिद्धि प्रदान करता है।
 
नवदुर्गा यंत्र
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मार्कण्डेय पुराण में नव दुर्गा के बारे में अनेक चमत्कारिक प्रयोग बताये गये हैं जिनमें से एक नव दुर्गा यंत्र है। इस यंत्र की श्रद्धा पूर्वक पूजा प्रतिष्ठा करने से मानव कल्याण एवं अनेक परेशानियों से छुटकारा मिलता है, मां भगवती के कई मूल मंत्रों कोे इस यंत्र में समाहित किया गया है जो इसकी विशेषता का प्रतीक है।
नौ दुर्गा यंत्र को घर, दुकान, वाहन, व्यापार, संस्थान, आदि में स्थापित किया जा सकता है। इस यंत्र के प्रभाव से अनेक लाभ हैं तथा उपासना विधि अत्यन्त सरल है जिसे हर कोई करने में सफल हो सकता है और लाभ ले सकता है।
यंत्र का उपयोग
इस यंत्र को सम्मुख रखकर (प्रातःकाल) धूपदीप आदि द्वारा साधारण पूजा करके माता दुर्गा के अष्टोत्तर शत नामावली का पाठ करने मात्र से वांछित लाभ मिलता है तथा शीघ्र ही इसका प्रभाव वहां के सम्पूर्ण वातावरण को शुद्ध करता है। इस यंत्र द्वारा चोर भय, प्रेत भय, शत्रु भय, रोग भय, बन्धन भय आदि से छुटकारा पाया जा सकता है। इस यंत्र की विशेष सिद्धि भौमावस्या को सूर्योदय से पहले (2घंटे) की जाती है जिसकी अधिक जानकारी दुर्गा सप्तसती में उल्लिखित है।
 
 
वास्तु दोष निवारक यंत्र
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भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की तृतीया तिथि, शनिवार, कृतिका नक्ष्ज्ञत्र, व्यतीपात योग, विष्टि करण, भद्रा के मध्य में कुलिक मूहूर्त में वास्तु की उत्पत्ति हुई उसके भंयकर गर्जना से चकित होकर ब्रह्मा ने कहा जो भी व्यक्ति ग्राम, नगर, दुर्ग, यरही, मकान, प्रसाद, जलाशय, उद्यान के निर्माणारम्भ के समय मोहवश आपकी उपासना नहीं करेगा या आपके यंत्र को स्थापित नहीं करेगा वह पग-पग बांधाओं का सामना करेगा और जीवन पर्यंत अस्त-व्यस्त रहेगा।
मकान चाहे विशाल या साधारण हो दुकान हो या कम्पनी हो धर्मशाला हो या मन्दिर हो यहां तक कि मोटरगाड़ियों में भी वास्तु का निवास होता है। अगर किसी कारण वस स्थान निर्माण में वास्तु दोष उत्पन्न होता है तो वास्तु देवता को प्रसन्न एवं सन्तुष्ट करने के लिए अनेक उपाय किये जाते हैं। जिनमें वास्तु यंत्र सरल एवं अधिक उपयोगी है इस यंत्र को स्थापित करने से वास्तु दोष का निवारण होता है। तथा उस स्थान में सुख समृद्धि का वर्चस्व होता है। इस यंत्र को चल या अचल दोनों प्रकार से प्रतिष्ठित किया जाता है।
प्रत्येक वर्ष यज्ञादि में, पुत्र जन्म पर, यज्ञोपवीत, विवाह, महोत्सवों में, जीर्णोद्धार, धान्य संग्र्रह में, बिजली गिरने से टूटू हुए घर में, अग्नि से जल हुए घर पर, सर्प व चांडाल से घिरे हुए घर पर, उल्लू और कौआ सात दिन तक जिस घर में रहते हैं, जिस घर में रात्रि में मृत वास करें, गौ व मार्जार गर्जना करें, हाथी, घोड़े विशेष शब्द करें और जिसमें स्त्रियों के झगड़े होते हों, जिस घर में कबूतर रहते हों, मधुमक्खियों का छत्ता हो और अनेक प्रकार के उत्पात होते हों वहां वास्तुयंत्र अवश्य स्थापित करें। -ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे , मोबा.नं.09827198828, भिलाई

रविवार, 27 नवंबर 2011

वेदान्त क्या है ?


वेद और वेदान्त क्या है ?
ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे , 09827198828, भिलाई
    मित्रों आज मैने आपके लिए वेदांत के बारे में एक संकलन रखने जा रहा हुं..तो सर्व प्रथम वेदांत  शब्द के अर्थ को जानने की कोशिश करते हैं तो आईए..
वेदान्त वेदानाम् अंतः इति वेदांतः जिसका शाब्दिक अर्थ है वेदों का अंतअथवा सार, हिन्दू दर्शन की सबसे महत्त्वपूर्ण शाखा है. यह ज्ञानयोग की एक शाखा है जो व्यक्ति को ज्ञान प्राप्ति की दिशा में उत्प्रेरित करता है। इसका मुख्य स्त्रोत उपनिषद है जो वेद ग्रंथो और अरण्यक ग्रंथों का सार समझे जाते हैं। वेदान्त की तीन शाखाएँ जो सबसे ज्यादा जानी जाती हैं वे हैं: अद्वैत वेदांत, विशिष्ट अद्वैत और द्वैत। आदि शंकराचार्य, रामानुज और श्री मध्वाचार्य जिनको क्रमश: इन तीनो शाखाओं का प्रवर्तक माना जाता है, इनके अलावा भी ज्ञानयोग की अन्य शाखाएँ हैं। ये शाखाएँ अपने प्रवर्तकों के नाम से जानी जाती हैं जिनमें भास्कर, वल्लभ, चैतन्य, निम्बारक, वाचस्पति मिश्र, सुरेश्वर, और विज्ञान भिक्षु. आधुनिक काल में जो प्रमुख वेदांती हुये हैं उनमें रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, अरविंद घोष, स्वामी शिवानंद और रमण महर्षि उल्लेखनीय हैं. ये आधुनिक विचारक अद्वैत वेदांत शाखा का प्रतिनिधित्व करते हैं। दूसरे वेदांतो के प्रवर्तकों ने भी अपने विचारों को भारत में भलिभाँति प्रचारित किया है परन्तु भारत के बाहर उन्हें बहुत कम जाना जाता है।
अब इसे दर्शन के माध्यम से भी जानने का प्रयत्न करते हैं.

    भारतीय चिन्तन धारा में जिन दर्शनों की परिगणना विद्यमान है, उनमें शीर्ष स्थानीय दर्शन कौन सा है ? ऐसी जिज्ञासा होने पर एक ही नाम उभरता है, वह है-वेदान्त। यह भारतीय दर्शन के मन्दिर का जगमगाता स्वर्णकलश है- दर्शनाकाश का देदीप्यमान सूर्य है। वेदान्त की विषय वस्तु, इसके उद्देश्य, साहित्य और आचार्य परम्परा आदि पर गहन चिन्तन करें, इससे पूर्व आइये, वेदान्त शब्द का अर्थ समझें।

वेदान्त का अर्थ-

वेदान्त का अर्थ है- वेद का अन्त या सिद्धान्त। तात्पर्य यह है- ‘वह शास्त्र जिसके लिए उपनिषद् ही प्रमाण है। वेदांत में जितनी बातों का उल्लेख है, उन सब का मूल उपनिषद् है। इसलिए वेदान्त शास्त्र के वे ही सिद्धान्त माननीय हैं, जिसके साधक उपनिषद् के वाक्य हैं। इन्हीं उपनिषदों को आधार बनाकर बादरायण मुनि ने ब्रह्मसूत्रों की रचना की।’ इन सूत्रों का मूल उपनिषदों में हैं। जैसा पूर्व में कहा गया है- उपनिषद् में सभी दर्शनों के मूल सिद्धान्त हैं।

वेदान्त का साहित्य

ब्रह्मसूत्र- उपरिवर्णित विवेचन से स्पष्ट है कि वेदान्त का मूल ग्रन्थ उपनिषद् ही है। अत: यदा-कदा वेदान्त शब्द उपनिषद् का वाचक बनता दृष्टिगोचर होता है। उपनिषदीय मूल वाक्यों के आधार पर ही बादरायण द्वारा अद्वैत वेदान्त के प्रतिपादन हेतु ब्रह्मसूत्र सृजित किया गया। महर्षि पाणिनी द्वारा अष्टाध्यायी में उल्लेखित ‘भिक्षुसूत्र’ ही वस्तुत: ब्रह्मसूत्र है। संन्यासी, भिक्षु कहलाते हैं एवं उन्हीं के अध्ययन योग्य उपनिषदों पर आधारिक पराशर्य (पराशर पुत्र व्यास) द्वारा विरचित ब्रह्म सूत्र है, जो कि बहुत प्राचीन है।

यही वेदांत दर्शन पूर्व मीमांसा के नाम से प्रख्यात है। महर्षि जैमिनि का मीमांसा दर्शन पूर्व मीमांसा कहलाता है, जो कि द्वादश अध्यायों में आबद्ध है। कहा जाता है कि जैमिनि द्वारा इन द्वादश अध्यायों के पश्चात् चार अध्यायों में संकर्षण काण्ड (देवता काण्ड) का सृजन किया था। जो अब अनुपलब्ध है, इस प्रकार मीमांसा षोडश अध्यायों में सम्पन्न हुआ है। उसी सिलसिले में चार अध्यायों में उत्तर मीमांसा या ब्रह्म-सूत्र का सृजन हुआ। इन दोनों ग्रन्थों में अनेक आचार्यों का नामोल्लेख हुआ है। इससे ऐसा अनुमान होता है कि बीस अध्यायों के रचनाकार कोई एक व्यक्ति थे, चाहे वे महर्षि जैमिनि हों अथवा बादरायण बादरि। पूर्व मीमांसा में कर्मकाण्ड एवं उत्तर मीमांसा में ज्ञानकाण्ड विवेचित है। उन दिनों विद्यमान समस्त आचार्य पूर्व एवं मीमांसा के समान रूपेण विद्वान् थे। इसी कारण जिनके नामों का उल्लेख जैमिनीय सूत्र में है, उन्हीं का ब्रह्मसूत्र में भी है। वेदान्त संबंधी साहित्य प्रचुर मात्रा में विद्यमान है, जिसका उल्लेख अग्रिम पृष्ठों पर ‘वेदान्त का अन्य साहित्य और आचार्य परम्परा’ शीर्षक में आचार्यों के नामों सहित विवेचित किया गया है।

वेदान्त दर्शन का स्वरूप और प्रतिपाद्य-विषय

‘वेदों’ के सर्वमान्य, सर्वश्रेष्ठ सिद्धान्त ही ‘वेदान्त’ का प्रतिपाद्य हैं। उपनिषदों में ही ये सिद्धान्त मुख्यत: प्रतिपादित हुए हैं, इसलिए वे ही ‘वेदान्त’ के पर्याय माने जाते हैं। परमात्मा का परम गुह्य ज्ञान वेदान्त के रूप में सर्वप्रथम उपनिषदों में ही प्रकट हुआ है। ‘वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्था:…..’(मुण्डक. )। ‘वेदान्ते परमं गुह्यम् पुराकल्पे प्रचोदितम्’ (श्वेताश्ववतर. ) ‘यो वेदादौ स्वर: प्रोक्तो वेदान्ते च प्रतिष्ठित:’ (महानारायण, ) इत्यादि श्रुतिवचन उसी तथ्य का डिंडिम घोष करते हैं। इन श्रुति वचनों का सारांश इतना ही है कि संसार में जो कुछ भी दृश्यमान है और जहाँ तक हमारी बुद्धि अनुमान कर सकती है, उन सबका का मूल स्रोत्र एकमात्र ‘परब्रह्म’ ही है।

इस प्रकार ब्रह्मसूत्र प्रमुखतया ब्रह्म के स्वरूप को विवेचित करता है एवं इसी के संबंध से उसमें जीव एवं प्रकृति के संबंध में भी विचार प्रकट किया गया है। यह दर्शन चार अध्यायों एवं सोलह पादों में विभक्त है। इनका प्रतिपाद्य क्रमश: निम्रवत् है-

1-    प्रथम अध्याय में वेदान्त से संबंधित समस्त वाक्यों का मुख्य आशय प्रकट करके उन समस्त विचारों को समन्वित किया गया है, जो बाहर से देखने पर परस्पर भिन्न एवं अनेक स्थलों पर तो विरोधी भी प्रतीत होते हैं। प्रथम पाद में वे वाक्य दिये गये हैं, जिनमें ब्रह्म का स्पष्टतया कथन है, द्वितीय में वे वाक्य हैं, जिनमें ब्रह्म का स्पष्ट कथन नहीं है एवं अभिप्राय उसकी उपासना से है। तृतीय में वे वाक्य समाविष्ट हैं, जिनमें ज्ञान रूप में ब्रह्म का वर्णन है। चतुर्थ पाद में विविध प्रकार के विचारों एवं संदिग्ध भावों से पूर्ण वाक्यों पर विचार किया गया है।

2-    द्वितीय अध्याय का विषय ‘अविरोध’ है। इसके अन्तर्गत श्रुतियों की जो परस्पर विरोधी सम्मतियाँ हैं, उनका मूल आशय प्रकट करके उनके द्वारा अद्वैत सिद्धान्त की सिद्धि की गयी है। इसके साथ ही वैदिक मतों (सांख्य, वैशेषिक, पाशुपत आदि) एवं अवैदिक सिद्धान्तों (जैन, बौद्ध आदि) के दोषों एवं उनकी अयथार्थता को दर्शाया गया है। आगे चलकर लिंग शरीर प्राण एवं इन्द्रियों के स्वरूप दिग्दर्शन के साथ पंचभूत एवं जीव से सम्बद्ध शंकाओं का निराकरण भी किया गया है।

3-    तृतीय अध्याय की विषय वस्तु साधना है। इसके अन्तर्गत प्रथमत: स्वर्गादि प्राप्ति के साधनों के दोष दिखाकर ज्ञान एवं विद्या के वास्तविक स्रोत्र परमात्मा की उपासना प्रतिपादित की गयी है, जिसके द्वारा जीव ब्रह्म की प्राप्ति कर सकता है। इस उद्देश्य की पूर्ति में कर्मकाण्ड सिद्धान्त के अनुसार मात्र अग्निहोत्र आदि पर्याप्त नहीं वरन् ज्ञान एवं भक्ति द्वारा ही आत्मा और परमात्मा का सान्निध्य सम्भव है।

4-    चतुर्थ अध्याय साधना का परिणाम होने से फलाध्याय है। इसके अन्तर्गत वायु, विद्युत एवं वरुण लोक से उच्च लोक-ब्रह्मलोक तक पहुँचने का वर्णन है, साथ ही जीव की मुक्ति, जीवन्मुक्त की मृत्यु एवं परलोक में उसकी गति आदि भी वर्णित है। अन्त में यह भी वर्णित है कि ब्रह्म की प्राप्ति होने से आत्मा की स्थिति किस प्रकार की होती है, जिससे वह पुन: संसार में आगमन नहीं करती। मुक्ति और निर्वाण की अवस्था यही है। इस प्रकार वेदान्त दर्शन में ईश्वर, प्रकृति, जीव, मरणोत्तर दशाएँ, पुनर्जन्म, ज्ञान, कर्म, उपासना, बन्धन एवं मोक्ष इन दस विषयों का प्रमुख रूप से विवेचन किया गया है।
अब आइये आपको वेद के बारे में कुछ अहम जानकरिया देते हैं ...   वेद का अर्थ है ज्ञान। वेद शब्द विद सत्तायाम,विदज्ञाने,विदविचारणे एवं विद्लाभे इन चार धातुओं से उत्पन्न होता है। संक्षिप्त में इसका अर्थ है, जो त्रिकालबाधित सत्तासम्पन्न हो, परोक्ष ज्ञान का निधान हो, सर्वाधिक विचारो का भंडार हो और लोक परलोक के लाभों से परिपूर्ण हो। जो ग्रंथ इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट के परिहार के उपायों का ज्ञान कराता है, वह वेद है। भारतीय मान्यता के अनुसार वेद ब्रह्मविद्या के ग्रंथभाग नही, स्वयं ब्रह्म हैं-शब्द ब्रह्म हैं। प्राचीन काल से हमारे ऋषि-महर्षि, आचार्य तथा भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले विद्वानों ने वेद को सनातन, नित्य और अपौरूषेय माना हैं। उनकी यह मान्यता रही है कि वेद का प्रादुर्भाव ईश्वरीय ज्ञान के रूप में हुआ है। इसका कारण यह भी है कि वेदों का कोई भी निरपेक्ष या प्रथम उच्चरयिता नहीं है। सभी अध्यापक अपने पूर्व-पूर्व के अध्यापकों से ही वेद का अध्ययन या उच्चारण करते रहे हैं। वेद का ईश्वरीय ज्ञान के रूप में ऋषि-महर्षियों ने अपनी अन्तर्दृष्टि से प्रत्यक्ष दर्शन किया। द्रष्टाओं का यह भी मत है कि वेद श्रेष्ठतम ज्ञान-पराचेतना के गर्भ में सदैव से स्थित रहते हैं। परिष्कृत-चेतना-सम्पन्न ऋषियों के माध्यम से वे प्रत्येक कल्प में प्रकट होते हैं। कल्पान्त में पुनः वहीं समा जाते हैं।
    
वेद को श्रुति, छन्दस् मन्त्र आदि अनेक नामों से भी पुकारा जाता है। विष्णु, भागवत, वायु, मत्स्य आदि पुराणों के अनुसार त्रेतायुग के अन्त तक वेद एक ही था। द्वापर के अन्त में महर्षि वेदव्यास ने वेद के चार विभाग कियेः-

१-ऋग्वेद । २-यजुर्वेद । ३-सामवेद । ४-अथर्ववेद ।

 जिसमें नियताक्षर वाले मंत्रों की ऋचाएँ हैं,वह ऋग्वेद कहलाता है। जिसमें स्वरों सहित गाने में आने वाले मंत्र हैं, वह सामवेद कहलाता है। जिसमें अनितह्याक्षर वाले मंत्र हैं, वह यजुर्वेद कहलाता है। जिसमें अस्त्र-शस्त्र, भवन निर्माण आदि लौकिक विद्याओं का वर्णन करने वाले मंत्र हैं, वह अथर्ववेद कहलाता है। वेद मंत्रों के समूह को शूक्त कहा जाता है, जिसमें एकदैवत्य तथा एकार्थ का ही प्रतिपादन रहता है।
    
वेद की समस्त शिक्षाएँ सर्वभौम है। वेद मानव मात्र को हिन्दू,सिख, मुसलमान, ईसाई बौद्ध,जैन आदि कुछ भी बनने के लिये नहीं कहतें। वेद की स्पष्ट आज्ञा है-मनुर्वभ। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में सृष्टि के मूल तत्व, गूढ़ रहस्य का वर्णन किया गया है। सूक्त में आध्यात्मिक धरातल पर विश्व ब्रह्मांड की एकता की भावना स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त हुई है। भारतीय संस्कृति में यह धारणा निश्चित है कि विश्व-ब्रह्मांड में एक ही सत्ता विद्यमान है, जिसका नाम रूप कुछ भी नहीं है ।
    
ऋक् संहिता में १० मंडल, बालखिल्य सहित १०२८ सूक्त हैं। वेद मंत्रों के समूह को सूक्त कहा जाता है, जिसमें एकदैवत्व तथा एकार्थ का ही प्रतिपादन रहता है। कात्यायन प्रभति ऋषियों की अनुक्रमणी के अनुसार ऋचाओं की संख्या १०५८०, शब्दों की संख्या १५३५२६ तथा शौनक कृत अनुक्रमणी के अनुसार ४,३२,००० अक्षर हैं। ऋग्वेद की जिन २१ शाखाओं का वर्णन मिलता है, उनमें से चरणव्युह ग्रंथ के अनुसार पाँच ही प्रमुख हैं- १. शाकल, २. वाष्कल, ३.आश्वलायन, ४. शांखायन और माण्डूकायन । ऋग्वेद में ऋचाओं का बाहुल्य होने के कारण इसे ज्ञान का वेद कहा जाता है। ऋग्वेद में ही मृत्युनिवारक त्र्यम्बक-मंत्र या मृत्युञ्जय मन्त्र (७/५९/१२) वर्णित है,ऋग्विधान के अनुसार इस मंत्र के जप के साथ विधिवत व्रत तथा हवन करने से दीर्घ आयु प्राप्त होती है तथा मृत्यु दूर हो कर सब प्रकार का सुख प्राप्त होता है। विश्वविख्यात गायत्री मन्त्र (ऋ० ३/६२/१०) भी इसी में वर्णित है। ऋग्वेद में अनेक प्रकार के लोकोपयोगी-सूक्त, तत्त्वज्ञान-सूक्त, संस्कार-सुक्त उदाहरणतः रोग निवारक-सूक्त (ऋ०१०/१३७/१-७),श्री सूक्त या लक्ष्मी सुक्त (ऋग्वेद के परिशिष्ट सूक्त के खिलसूक्त में), तत्त्वज्ञान के नासदीय-सूक्त (ऋ० १०/१२९/१-७) तथा हिरण्यगर्भ-सूक्त (ऋ०१०/१२१/१-१०) और विवाह आदि के सूक्त (ऋ० १०/८५/१-४७) वर्णित हैं, जिनमें ज्ञान विज्ञान का चरमोत्कर्ष दिखलाई देता है।
   
 यजुर्वेदः-ऋग्वेद के लगभग ६६३ मंत्र यथावत् यजुर्वेद में हैं। यजुर्वेद वेद का एक ऐसा प्रभाग है, जो आज भी जन-जीवन में अपना स्थान किसी न किसी रूप में बनाये हुऐ है। संस्कारों एवं यज्ञीय कर्मकाण्डों के अधिकांश मन्त्र यजुर्वेद के ही हैं। यजुर्वेदाध्यायी परम्परा में दो सम्प्रदाय-१. ब्रह्म सम्प्रदाय अथवा कृष्ण यजुर्वेद, २. आदित्य सम्प्रदाय अथवा शुक्ल यजुर्वेद ही प्रमुख हैं। वर्तमान में कृष्ण यजुर्वेद की शाखा में ४ संहिताएँ -१. तैत्तिरीय, २. मैत्रायणी, ३.कठ और ४.कपिष्ठल कठ ही उपलब्ध हैं। शुक्ल यजुर्वेद की शाखाओं में दो प्रधान संहिताएँ- १. मध्यदिन संहिता और २. काण्व संहिता ही वर्तमान में उपलब्ध हैं। आजकल प्रायः उपलब्ध होने वाला यजुर्वेद मध्यदिन संहिता ही है। इसमें ४० अध्याय, १९७५ कण्डिकाएँ (एक कण्डिका कई भागों में यागादि अनुष्ठान कर्मों में प्रयुक्त होनें से कई मन्त्रों वाली होती है।) तथा ३९८८ मन्त्र हैं। विश्वविख्यात गायत्री मंत्र (३६.३) तथा महामृत्युञ्जय मन्त्र (३.६०) इसमें भी है।
     

सामवेदः- सामवेद संहिता में जो १८७५ मन्त्र हैं, उनमें से १५०४ मन्त्र ऋग्वेद के ही हैं। सामवेद संहिता के दो भाग हैं, आर्चिक और गान। पुराणों में जो विवरण मिलता है उससे सामवेद की एक सहस्त्र शाखाओं के होने की जानकारी मिलती है। वर्तमान में प्रपंच ह्रदय,दिव्यावदान, चरणव्युह तथा जैमिनि गृहसूत्र को देखने पर १३ शाखाओं का पता चलता है। इन तेरह में से तीन आचार्यों की शाखाएँ मिलती हैं- (१) कौमुथीय, (२) राणायनीय और (३) जैमिनीय। सामवेद का महत्व इसी से पता चलता है कि गीता में कहा गया है कि -वेदानां सामवेदोऽस्मि। (गीता-अ० १०, श्लोक २२)। महाभारत में गीता के अतिरिक्त अनुशासन पर्व में भी सामवेद की महत्ता को दर्शाया गया है-सामवेदश्च वेदानां यजुषां शतरुद्रीयम्। (म०भा०,अ० १४ श्लोक ३२३)। सामवेद में ऐसे मन्त्र मिलते हैं जिनसे यह प्रमाणित होता है कि वैदिक ऋषियों को एसे वैज्ञानिक सत्यों का ज्ञान था जिनकी जानकारी आधुनिक वैज्ञानिकों को सहस्त्राब्दियों बाद प्राप्त हो सकी है। उदाहरणतः- इन्द्र ने पृथ्वी को घुमाते हुए रखा है। (सामवेद,ऐन्द्र काण्ड,मंत्र १२१), चन्द्र के मंडल में सूर्य की किरणे विलीन हो कर उसे प्रकाशित करती हैं। (सामवेद, ऐन्द्र काण्ड, मंत्र १४७)। साम मन्त्र क्रमांक २७ का भाषार्थ है- यह अग्नि द्यूलोक से पृथ्वी तक संव्याप्त जीवों तक का पालन कर्ता है। यह जल को रूप एवं गति देने में समर्थ है। अग्नि पुराण के अनुसार सामवेद के विभिन्न मंत्रों के विधिवत जप आदि से रोग व्याधियों से मुक्त हुआ जा सकता है एवं बचा जा सकता है, तथा कामनाओं की सिद्धि हो सकती है। सामवेद ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग की त्रिवेणी है। ऋषियों ने विशिष्ट मंत्रों का संकलन करके गायन की पद्धति विकसित की। अधुनिक विद्वान् भी इस तथ्य को स्वीकार करने लगे हैं कि समस्त स्वर, ताल, लय, छंद, गति, मन्त्र,स्वर-चिकित्सा, राग नृत्य मुद्रा, भाव आदि सामवेद से ही निकले हैं।

अथर्ववेदः- अथर्ववेद संहिता के बारे में कहा गया है कि जिस राजा के रज्य में अथर्ववेद जानने वाला विद्वान् शान्तिस्थापन के कर्म में निरत रहता है, वह राष्ट्र उपद्रवरहित होकर निरन्तर उन्नति करता जाता हैः-

यस्य राज्ञो जनपदे अथर्वा शान्तिपारगः। निवसत्यपि तद्राराष्ट्रं वर्धतेनिरुपद्रवम् ।। (अथर्व०-१/३२/३)।

      भूगोल, खगोल, वनस्पति विद्या, असंख्य जड़ी-बूटियाँ,आयुर्वेद, गंभीर से गंभीर रोगों का निदान और उनकी चिकित्सा,अर्थशास्त्र के मौलिक सिद्धान्त, राजनीति के गुह्य तत्त्व, राष्ट्रभूमि तथा राष्ट्रभाषा की महिमा, शल्यचिकित्सा, कृमियों से उत्पन्न होने वाले रोगों का विवेचन, मृत्यु को दूर करने के उपाय, प्रजनन-विज्ञान अदि सैकड़ों लोकोपकारक विषयों का निरूपण अथर्ववेद में है। आयुर्वेद की दृष्टि से अथर्ववेद का महत्व अत्यन्त सराहनीय है। अथर्ववेद में शान्ति-पुष्टि तथा अभिचारिक दोनों तरह के अनुष्ठन वर्णित हैं। अथर्ववेद को ब्रह्मवेद भी कहते हैं। चरणव्युह ग्रंथ के अनुसार अथर्व संहिता की नौ शाखाएँ- १.पैपल, २. दान्त, ३. प्रदान्त, ४. स्नात, ५.सौल, ६. ब्रह्मदाबल, ७. शौनक, ८. देवदर्शत और ९. चरणविद्य बतलाई गई हैं। वर्तमान में केवल दो- १.पिप्पलाद संहिता तथा २. शौनक संहिता ही उपलब्ध है। जिसमें से पिप्लाद संहिता ही उपलब्ध हो पाती है। वैदिकविद्वानों के अनुसार ७५९ सूक्त ही प्राप्त होते हैं। सामान्यतः अथर्ववेद में ६००० मन्त्र होने का मिलता है परन्तु किसी-किसी में ५९८७ या ५९७७ मन्त्र ही मिलते हैं।

      वेदाङ्गः (वेदार्थ ज्ञान में सहायक शास्त्र)

      वेद समस्त ज्ञानराशि के अक्षय भंडार है, तथा प्राचीन भारतीय संस्कृति,सभ्यता एवं धर्म के आधारभूत स्तम्भ हैं। वेद धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष- इन चार पुरुषार्थों के प्रतिपादक हैं। वेद भी अपने अङ्गों के कारण ही ख्यातिप्राप्त हैं, अतः वेदाङ्गों का अत्याधिक महत्व है। यहां पर अङ्ग का अर्थ है उपकार करनेवाला अर्थात वास्तविक अर्थ का दिग्दर्शन करानेवाला। वेदाङ्ग छः प्रकार के हैः-

(१) शिक्षा, (२) कल्प, (३) व्याकरण, (४) निरुक्त, (५) छन्द और (६) ज्योतिष । (१)- शिक्षाः- स्वर एवं वर्ण आदि के उच्चारण-प्रकार की जहाँ शिक्षा दी जाती हो,उसे शिक्षा कहाजाता है। इसका मुख्य उद्येश्य वेदमन्त्रों के अविकल यथास्थिति विशुद्ध उच्चारण किये जाने का है। शिक्षा का उद्भव और विकास वैदिक मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण और उनके द्वारा उनकी रक्षा के उदेश्य से हुआ है। (२)-कल्पः- कल्प वेद-प्रतिपादित कर्मों का भलीभाँति विचार प्रस्तुत करने वाला शास्त्र है। इसमें यज्ञ सम्बन्धी नियम दिये गये हैं। (३)-व्याकरणः-वेद-शास्त्रों का प्रयोजन जानने तथा शब्दों का यथार्थ ज्ञान हो सके अतः इसका अध्ययन आवश्यक होता है। इस सम्बन्ध में पाणिनीय व्याकरण ही वेदाङ्ग का प्रतिनिधित्व करता है। व्याकरण वेदों का मुख भी कहा जाता है। (४)-निरुक्तः-इसे वेद पुरुष का कान कहा गया है। निःशेषरूप से जो कथित हो, वह निरुक्त है।इसे वेद की आत्मा भी कहा गया है। (५)-छन्दः-इसे वेद पुरुष का पैर कहा गया है।ये छन्द वेदों के आवरण है। छन्द नियताक्षर वाले होते हैं। इसका उदेश्य वैदिक मन्त्रों के समुचित पाठ की सुरक्षा भी है। (६)-ज्योतिषः-यह वेद पूरुष का नेत्र माना जाता है। वेद यज्ञकर्म में प्रवृत होते हैं और यज्ञ काल के आश्रित होते है तथा जयोतिष शास्त्र से काल का ज्ञान होता है। अनेक वेदिक पहेलियों का भी ज्ञान बिना ज्योतिष के नहीं हो सकता। वेद
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