ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

!!विशेष सूचना!!
नोट: इस ब्लाग में प्रकाशित कोई भी तथ्य, फोटो अथवा आलेख अथवा तोड़-मरोड़ कर कोई भी अंश हमारे बगैर अनुमति के प्रकाशित करना अथवा अपने नाम अथवा बेनामी तौर पर प्रकाशित करना दण्डनीय अपराध है। ऐसा पाये जाने पर कानूनी कार्यवाही करने को हमें बाध्य होना पड़ेगा। यदि कोई समाचार एजेन्सी, पत्र, पत्रिकाएं इस ब्लाग से कोई भी आलेख अपने समाचार पत्र में प्रकाशित करना चाहते हैं तो हमसे सम्पर्क कर अनुमती लेकर ही प्रकाशित करें।-ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे, सम्पादक ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका,-भिलाई, दुर्ग (छ.ग.) मोबा.नं.09827198828
!!सदस्यता हेतु !!
.''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका के 'वार्षिक' सदस्यता हेतु संपूर्ण पता एवं उपरोक्त खाते में 220 रूपये 'Jyotish ka surya' के खाते में Oriental Bank of Commerce A/c No.14351131000227 जमाकर हमें सूचित करें।

ज्योतिष एवं वास्तु परामर्श हेतु संपर्क 09827198828 (निःशुल्क संपर्क न करें)

आप सभी प्रिय साथियों का स्नेह है..

बुधवार, 9 नवंबर 2011

जन्मशताब्दि महायज्ञ बना मौत यज्ञ, स्वाहा के जगह आह, कराह था गूंजायमान

जन्मशताब्दि महायज्ञ बना मौत यज्ञ, स्वाहा के जगह आह, कराह था गूंजामान
हरिद्वार में गायत्री परिवार के संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्मा की जन्मशती के आयोजन में मची भगदड़ यह बताती है कि सुरक्षा के इंतजामों को सरकार ही नहीं, हम सब भी बहुत गंभीरता से नहीं लेते। भगदड़ की वजह यह थी कि आयोजन स्थल पर पहुंचने के लिए बना एक द्वार टूटकर गिर गया। जाहिर है, आयोजकों और राज्य सरकार ने इस बात का कोई सटीक आकलन नहीं किया था कि इस द्वार से कितने लोग घुसेंगे और क्या बल्लियों जैसी चीजों से बना द्वार इतने बड़े हुजूम का दबाव सह पाएगा। अक्सर बड़े धार्मिक आयोजनों में भगदड़ की खबरें आती रहती हैं। कुछ वक्त पहले केरल के एक मंदिर की राह में भी भगदड़ की वजह से कई जानें गई थीं। हरिद्वार में भी पिछले कुंभ स्नान के मौके पर एक पुल पर भगदड़ से कुछ लोग मारे गए थे। गौरतलब है कि इतिहास में हमें भगदड़ से मरने के जिक्र लगभग नहीं मिलते। उसकी एक वजह तो यह रही होगी कि तब जनसंख्या कम थी और मंदिरों या धार्मिक आयोजनों में पहुंचना इतना कठिन था कि इतनी बड़ी भीड़ हो ही नहीं पाती थी। अब परिवहन व संचार साधनों की सुगमता की वजह से ऐसे धार्मिक स्थानों पर लाखों की तादाद में लोग पहुंच जाते हैं, जहां जाने के लिए पचास-सौ बरस पहले पचास बार सोचना पड़ता था। लेकिल अब भी धार्मिक स्थानों की सुविधाएं और इंतजाम उसी जमाने के हैं और वहां भीड़ बढ़ती जा रही है। इन आयोजनों में होने वाली भीड़ एक आधुनिक घटना है, इसलिए सुरक्षा के इंतजामात भी पुराने जमाने के नहीं रह सकते, उन्हें भी आधुनिक बनाना होगा। लाखों लोग अगर हरिद्वार जैसे शहर  में इकट्ठे होते हैं, तो उनका इंतजाम सिर्फ अंदाज से नहीं होगा, उसे निहायत वैज्ञानिक ढंग से आखिरी बिंदु तक तय करना होगा। हमारे यहां असंख्य लोग ऐसी घटनाओं में मरते हैं, जिन्हें जरा-सी सावधानी और दूरंदेशी से बचाया जा सकता है। तीन दिन बाद ही हरिद्वार में गंगा मेला होना है। उसके पहले ऐसी घटना का होना प्रशासन की तैयारी की पोल खोल देता है।
गायत्री परिवार के सदस्यों के लिए यह आयोजन एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है और उसमें परिवार के सभी सदस्य हिस्सा लेना चाहते होंगे, लेकिन एक ही आयोजन में इतने सारे लोगों का पहुंचना भी आयोजकों और प्रशासन के लिए एक मुश्किल है। कुछ वक्त पहले तक राजनीतिक कार्यक्रमों में भी भीड़ जुटती थी, लेकिन अब ऐसा कम ही होता है। टेलीविजन और दूसरे प्रचार-प्रसार के साधनों ने प्रत्यक्ष राजनीतिक कार्यक्रमों को काफी हद तक अप्रासंगिक बना दिया है। यूं भी आम तौर पर राजनीतिक रैलियों में ऐसी भदगड़ नहीं होती, क्योंकि शायद उनमें शामिल होने वाले लोग इतने श्रद्धावान नहीं होते कि किसी एक वक्त किसी एक छोटी-सी जगह पहुंचने के लिए जान की बाजी लगा दें। जैसे-जैसे सामूहिकता के अन्य अवसर कम हो रहे हैं, धार्मिक आयोजनों या स्थलों में भीड़ बढ़ने लगी है। जिन मंदिरों में कुछ वर्ष पहले दर्शन करना आसान होता था, अब उन्हीं मंदिरों में लंबी लाइनें लगाकर दर्शन करने में घंटों लग जाते हैं। नए-नए धार्मिक संप्रदायों के भी लाखों अनुयायी हैं और उनमें उत्साह पुराने संप्रदायों के अनुयायियों से ज्यादा है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि नए संप्रदाय अपने अनुयायी को ज्यादा निजी संपर्क और सामूहिकता की भावना देते हैं, जो आधुनिक समाज में दुर्लभ हो गई है। इसलिए ऐसी दुर्घटनाओं के बावजूद श्रद्धालुओं के उत्साह में कमी नहीं आएगी व लाखों लोग धार्मिक आयोजनों में पहुंचेंगे। आयोजकों का कर्तव्य है कि सुरक्षा को वे महत्वपूर्ण मानें और किसी श्रद्धालु के लिए अपनी श्रद्धा की कीमत जान से न चुकानी पड़े।
विश्व प्रसिद्ध शांतिकुंज आश्रम के संस्थापक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के जन्मशती समारोह की भव्यता पर कुप्रबंधन ने चंद मिनटों में पानी फेर दिया। हादसा स्थल में तब्दील कर दिया। देखते ही देखते लाखों चेहरों से खुशी के भाव निराशा में बदल गए। स्वाहा की गूंज आह में तब्दील हो गई। यह सबकुछ अचानक नहीं हुआ। लालजीवाला [हरिद्वार] स्थित पूरी तरह ढके यज्ञमंडप के 1551 कुंडों में जब एक साथ अग्नि प्रज्ज्वलित हुई तो वहां धुआं घिरने लगा। नतीजतन साधकों को घुटन होने लगी। ऐसे में उन्होंने यज्ञमंडप से बाहर निकलने में ही बेहतरी समझी। प्रवेशद्वार पर सिर पर काला पटका बांधे लट्ठधारी स्वयंसेवक तैनात थे।
प्रवेशद्वार के बाहर भी हजारों गायत्री साधक आहुति डालने के लिए भीतर घुसने को आतुर थे। भीड़ से दोनों तरफ के गायत्री साधक गुत्थमगुत्था हो गए और फिर..भगदड़। कितने मरे, ठीक-ठीक किसी को मालूम नहीं। प्रशासन 16 के मरने की पुष्टि कर रहा है, गायत्री परिवार के कार्यकर्ता 22 की, जबकि कई लोगों को उनके परिजनों के शव ही नहीं मिल रहे। लोगों ने यज्ञमंडप में अपने हाथों से शव गायत्री परिवार की एंबुलेंस में रखे थे। वह खुद भी एंबुलेंस से जाना चाहते थे, लेकिन उन्हें स्वयंसेवकों ने धक्के मारकर उतार दिया। घटना को छुपाने तक की साजिश होने लगी। रोते-बिलखते परिजन इधर-उधर मारे फिरते रहे, लेकिन उन्हें शवों तक नहीं पहुंचने दिया गया।

यज्ञशाला ढकना हुआ जानलेवा
डीआईजी संजय गुंज्याल ने करीब ढाई बजे मौके का जायजा लिया। उन्होंने कहा कि लोगों के दम घुटने का कारण यज्ञशाला का ढका होना था। इसी वजह से भगदड़ मची।

मिडिया  को गुमराह करते रहे प्रवक्ता
इसी को कहते हैं, 'एक तो चोरी, उस पर सीना जोरी'। सड़क के एक तरफ अस्थायी अस्पताल के दो टैंटों में गायत्री साधकों के 16 शव पड़े थे और दूसरी तरह मीडिया सेंटर में शांतिकुंज के इएमडी हेड दिव्येश व्यास दावा कर रहे थे सिर्फ पांच गायत्री साधक मारे गए हैं। वह पत्रकारों को यह नसीहत देने की कोशिश कर रहे थे कि मामले को तूल न दें। यह कोई हादसा नहीं, बल्कि सारी घटना दम घुटने के कारण हुई।
बेटा, हरिद्वार में मुझे कुछ हो जाए तो मेरा अंतिम संस्कार वहीं कर देना 
स्व.इन्द्रावती शुक्ल,
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की जन्म शताब्दी के दौरान हुई भगदड़ में जान गंवाने वाले लोगों में भरारी बिलासपुर की इंद्रादेवी शुक्ला और भिलाई कोहका निवासी गोमती देवि भी शामिल हैं। जबकि इंद्रावती शुक्ला हादसे से पहले वाली शाम को ही अपने बड़े लड़के प्रदीप व छोटे बेटे प्रणय से उनकी बातचीत हुई थी, जो खुद भी जन्म शताब्दी समारोह में शामिल होने के लिए हरिद्वार गए हुए हैं
 धनतेरस के दिन दो महिलाओं के साथ वे हरिद्वार रवाना हुयीं थीं। हरिद्वार जाने के पहले उन्होंने हरिद्वार में मुझे कुछ हो जाए तो मेरा अंतिम संस्कार वहीं करने की बात उन्होंने अपने परिजनों से अपनी वही मंशा जाहिर की थी ।
भिलाई कोहका की गोमती भी सदा के लिए स्वः हो गई
स्व.गोमती देवी 


वहीं कोहका भिलाई से 25 से तीस लोगों एक जत्था भी इस कार्यक्रम में शामिल होने हरिद्वार पहुंचे थे । इन्हीं श्रद्धालुओं में से एक थीं गोमती देवि जिनका इस हादसे में मौत हो गया । ज्ञात हो कि गोमती देवि अपने पति रामपदारथ शर्मा के साथ वहां गयीं हुयीं थी। ९ नवंबर२०११ को ज्योतिष का सूर्य संवाददाता ने रामपदारथ शर्मा से फोन पर बात कि तो वे स्व.गोमती देवि के अस्थी को लेकर शांतिकुंज अंतिम संस्कार के लिए पहुंच चुके थे।, उन्होंने बताया कि ८ नवंबर २०११ को करीब १०  बजे हम लोग यज्ञमंडप के बाहर ही थे अभी हवनकुंड तक पहुंच भी नहीं थे, कि अचानक भीड़ में अफरा-तफरी हो गया हम लोग संभल पाते कि लोगों की भींड़ ने रौंदना चालू कर दिया और उसी वक्त (हादसे में मृत मेरी पत्नि) गोमती का एक पैर पंडाल में बने अलग अलग डिवाईडर में फंस गया और वह निचे गिर पड़ी भींड़ उसके उपर से गुजरने लगी मैं बहुत चीखा चिल्लाया पर मेरा वहां सुनने वाला कौन था। अंततः गोमती मौके पर ही दम तोड़ दी । कोहका के इस जत्था में शामिल अमरेन्द्र शर्मा (गुड्डु) ने बताया कि अभी तो हमलोग यज्ञमंडप के बाहर ही थे तो अचानक मची इस भगदड़ ने करीब करीब कई एकड़ में फैले इस आयोजन को अपने आगोस में ले लिया, और एक के उपर एक सभी श्रद्धालु परस्पर में गिरते चले गये , जो सबसे निचे गिरा वह दम तोड़ दिये जिनकी संख्या अभी बता पाना मुश्किल है,
जाने वाले थे वैष्णों देवि दर्शन के लिए होनी को कुछ और ही मंजूर था
अमरेन्द्र शर्मा ने कहा कि बताया कि होनी बलवान होती है क्योंकि भिलाई के इस जत्थे में शामिल जीतनारायण यादव, काशीनाथ, राजेश्वरी देवि, शिवबालक राय, त्रिभुवन साहू, सुरेश चौहान,, पारस नाथ, गोविन्द लोधी, सुरेश मुखरैय्या, हिमांचल श्रीवास आदि अन्य १5 लोगों का ही रिजर्वेशन हुआ था बाद में रामपदारथ शर्मा ने कहा मैं भी हरिद्वार चलुंगा तो बाद में उनका और उनके पत्नी स्व.गोमती देवि का टिकीट कराया गया, जो ८ तारीख को इस शताब्दि समारोह में शामिल होने बाद दूसरे दिन ९ नवंबर २०११ सभी लोगों को वैष्णों देवि दर्शन के लिए यहीं से ट्रेन पकड़ना था लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था, ठिक ही कहा गया समय होत बलवान.।

कोई टिप्पणी नहीं:

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.