ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

2013 में क्या कहते हैं सितारे - पं.विनोद चौबे


2013 में क्या कहते हैं सितारे - पं.विनोद चौबे


-ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, संपादक  'ज्योतिष का सूर्य' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, मोबाईल नं. 09827198828, भिलाई

1 जनवरी 2013 को रात्रि ०१: 00 मिनट पर कन्या लग्न में वर्ष 2013 का प्रवेश हो रहा है उस समय सूर्य धनु राशि एवं चंद्र कर्क राशि पर मौजूद रहें तथा आश्लेषा नक्षत्र रहेगा नक्षत्र स्वामी बुध (कन्या, मिथुन राशि का स्वामी होता है) यह संयोग की बात है कि कमिथुन राशि के छत्तीसगढ़ का गठन भी कर्क लग्न में 1 नवंबर 2000 को हुआ था अतएव यह वर्ष छत्तीसगढ़ के लिये काफी अच्छा साबित होगा  हालॉकि राहु, शनि के वृश्चिक राशि पर मौजूद रहने से देश के दक्षिणी इलाके व राज्य आगजनी, दैविय विभिषिका तथा राज्य सरकारों के विरुद्ध लोगों में आक्रोश दिखेगा परन्तु वास्तु के अनुसार छत्तीसगढ़ की भौगोलिक स्थिति उत्तर - दक्षिण की ओर लंबवत होने के साथ ही बैकुंठपुर से देवसिल तक का हिस्सा उत्तर पूर्व की ओर बढ़ा हुआ हिस्सा गोमुखी मुद्रा बन जाता है, जिसके कारण छत्तीसगढ़ राहु, शनि के वृश्चिक राशि पर संचरण करने से कोई कुप्रभाव नही राज्य की जनता व सरकार पर नहीं पड़ेगा। यदि बात की जाय दुर्ग, बालोद और बेमेतरा कि तो यह छत्तीसगढ़ के मध्य भूभाग पर स्थित है अथ: यहाँ किसी भी प्रकार का राहु, शनि जनित कुप्रभाव नहीं पड़ेगा। वहीं दक्षिणवर्ती इलाका दंतेवाड़ा, चिंतनलार तथा आंध्र प्रदेश से सटे स्थानों पर आगजनी, हिंसा तथा लोगों में भय की व्याप्ति आदि की संभावना राहु, शनि दे सकते हैं। ज्ञात हो कि जनवरी 2013 के बाद राहु व शनि तुला राशि में इकठ्ठे हो जाएंगे। यह युति 18 महीनों तक रहेगी। इन दोनो ग्रहों के एक राशि पर रहने से देश में महंगाई बढ़ेगी, बाहरी शक्तियों के इशारे पर  देश में सरकार के प्रति लोगों में गलतफहमियाँ बढ़ेंगी। इसलिए नकारात्मक घटनाओं में बढ़ौतरी हो सकती है। राहु व शनि का गोचर में इकठ्ठे होना अच्छा नहीं है, परन्तु व्यक्तिगत कुंडलियों में दोनों ग्रहों की स्थिति उनके कुण्डली में स्थित ग्रहों के अनुसार शुभाशुभ फल कहा जा सकता है।

1. मेष राशि: सप्तम में शनि एवं अष्टम में शनि राहु की आपके स्वास्थ्य पर पैनी निगाह है अत: आप स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहें। फिलहाल राजनीतिक, समाजिक व पारिवारिक वर्चस्व बढ़ेगा। आय में बढ़ोत्तरी होगी। नौकरी में उन्नति के योग हैं। शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि के आसार।
2. वृषभ राशि:  आपकी राशि पर गुरु, केतु की यूती और सप्तम में राहु, शनि मिश्रीत फल देने वाले होंगे। व्यापार में सफलता। यात्रा के योग तथा विशिष्ट कार्य सिद्धि के साथ आत्मबल बढ़ेगा।
3. मिथुन राशि : आपके राशि के पंचम शनि राज्याधिकार से वंचित कर सकता है अत: गुप्त शत्रुओं से सावधानी बरतें। अधिक क्रोध से व्यापार प्रभावित हो सकता है, अत: वाणी पर संयम रखें। पीड़ा तथा कर्ज की स्थिति वाला रहेगा। खर्च पर संयम करना पड़ेगा।
4.कर्क राशि : आंग्ल नवर्षारम्भ के समय आपकी ही राशि पर चंद्र स्थित हैं, तथा चौथे शनि-ढैय्या आगे आने वाली कठिनाईयों को दर्शाते हैं अत: क्षमता से अधिक कर्ज लेने से आपको बचना होगा। वैसे सामान्यतया वर्र्ष पर्यन्त मन में उत्साह, बल, बुद्धि का परिवर्तन होगा। विविध कार्य से आर्थिक स्थिति सुधरेगी।
5. सिंह राशि: शत्रुभाव में मंगल उच्च का है अत: नये व्यापार की शुरुआत में आ रही कठिनाईयाँ समाप्त होंगी और सफलता भी मिलेगी।यह वर्ष मंगलकारी, व्यापार-कारोबार में विस्तार वाला रहेगा। राज्य पक्ष से मान-सम्मान मिलने के योग है। स्थिर मन से काम करना होगा। जानवर एवं वाहन से सावधान रहें। अति स्वाभिमान, क्रोध का त्याग करें।
6. कन्या राशि: आपकी ही राशि कन्या में वर्ष 2013 का प्रवेश हो रहा है। अत: भाग्य-वृद्धि, लाभ प्रतिष्ठा में इच्छित फल देने वाला रहेगा। मनोरथ सिद्ध होने के साथ कोष-खजाने में वृद्धि होगी। स्थायी संपत्ति के योग है। जीवन सुखमय होगा। भावुकता पर काबू रखें धोखा हो सकता है।
7. तुला राशि:  वालों के लिए यह वर्ष शनि की साढ़ेसाती के दूसरे ढैया वाला रहेगा। यह वर्ष मिश्रित फल वाला रहेगा। सुख-दुख के साथ पूर्वाद्र्ध में अपमान, अपयश, संघर्ष जैसी स्थिति कर्ज, खर्च अनायास विषमता का सामना करना पड़ेगा। स्वास्थ्य की तकलीफ हो सकती है। अपनी वाणी पर भी संयम रखें।
8. वृश्चिक राशि:  वालों के लिए यह वर्ष शनि की साढ़ेसाती के प्रथम ढैय्या वाला रहेगा। शुभाशुभ मिश्रित फलवाला, मानसिक तनाव व चिड़चिड़ापन एवं अनेक भूचाल के साथ सफलता मिलने वाला वर्ष रहेगा। महत्वकांक्षा त्याग कर अपने समय अनुसार फल पाकर संतोष रहेगा। असमय अपवाद की स्थिति निर्मित हो सकती है।
9. धनु राशि : आपकी राशि के दूसरे भाव में मंगल है अत: क्रोध पर काबू रखें। नई योजना, भूमि-भवन, वाहनआदि कार्यों में सफलता तो मिलेगी परन्तु कर्ज भी बढ़ सकता है। वर्ष के मध्य अर्थात् जून से घर में मांगलिक कार्य के योग बनते हैं।
10.मकर राशि: यह वर्ष आपके लिए उत्तम रहेगा। साझेदारी के काम में असफलता हो सकती बिचौलिए परस्पर में भ्रम कि स्थिति उत्पन्न कर सकते हैं। अत: संजिदगी से काम लेना पड़ेगा। नौकरी में उन्नति के योग हैं। शिक्षा का स्तर तो बढ़ेगा ही साथ ही उत्तम सफलता मिलने से मन प्रफुल्लित होगा।
11. कुंभ राशि : चौथे गुरु एवं भाग्य भाव में शनि आपके आर्थिक सुधार में मदद करेंगे। कार्य व्यवसाय में सफलता मिलेगी। घर में मांगलिक कार्य होने के आसार। संतानोत्पत्ति से मन में हर्ष होगा। उत्तर दिशा की यात्रा होगी।
 12. मीन राशि: अष्टम में शनि आपके स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। जल का अधिक सेवन करें स्नायुतंत्र की परेशानी आ सकती है। पारीवारिक मनमुटाव समाप्त होगा। पत्नि के स्वास्थ्य में सुधार होगा। नया व्यापारीक निवेश शुभ है लाभ व सफलता भी। भूमि व मकान का योग है।

-ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, संपादक   'ज्योतिष का सूर्यÓ राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, मोबाईल नं. 09827198828, भिलाई

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

महज़ अफवाह है माया कलेण्डर के द्वारा कि गई प्रलय की भविष्यवाणी

महज़ अफवाह है माया कलेण्डर के द्वारा कि गई प्रलय की भविष्यवाणी


भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गलत व अफवाह मात्र है। महा प्रलय का जिक्र  भरतीय ज्योतिष के अनुसार  कल्पांत यानि 4 अरब बत्तीस करोड़ वर्ष के बाद दूसरे कल्प के संधिकाल में होता है। और अभी वर्तमान में श्वेतवाराह कल्प का 1955885113 वाँ वर्ष ही चल रहा है, साथ ही एक कलप में 14 मन्वमतर होते हैं और अभी वैवस्वत मन्वनवंतर चल रहा है और एक मन्वंतर में 71 चतुर्युगी अर्थात् 71 बार चारों युग भ्रमण करते हैं अभी वर्तमान में 71 वें चतुर्युगी का 28 वाँ चतुर्युगी कमें कलियुग 432000 वर्ष में मात्र 5113 वर्ष ही व्यतीत हुआ है अतएव कुल मिलाकर सिद्धांत ज्योतिष के अनुसार तकरीबन दो-ढ़ाई अरब वर्ष महाप्रलय होने में शेष बचा है। तो सवाल ही नहीं उठता कि माया पंचांग के आधार पर प्रलय की गणना किसी भी दृष्टि से मानी जाय। आँ यह अवश्य है कि 21-12-12 को मूलांक 9 बन रहा है अतएव 9 मूलांक का स्वामी मंगल है जो अक्रामक और हिंसक है अत_ भूस्खलन, हिमस्खलन तथा कुछ अग्निजनित दैविय आपदायें आ सकती हैं वह भी इन सभी घटनाओं से भारत बिल्कुल सुरक्षित है, पश्चिमी देश तथा दक्षिणी देश प्रभावित हो सकते हैं।- ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, भिलाई 09827198828

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

नवलखा हार बनवा दो

नवलखा हार बनवा दो..........


  प्रिय पाठकों,
यह अंक  वार्षिक राशिफल नक्षत्र-2013 के रुप में आप सभी को समर्पित है, आंग्ल नूतन वर्ष-2013 की शुभकामनाओं के साथ मैं इस अंक के माध्यम से भारतीय हिन्दू नववर्ष के ज्योतिषिय आॅकलन को भी मैने जोड़ने का प्रयास किया है, अर्थात् उसे ही आधार बनाकर ग्रह जनित शुभाशुभ प्रभावों के बारे में विस्तृत चर्चा की गई है। मुझे आशा ही नहीं वरन् पुरा विश्वास है कि, आप सभी के लिए लाभोपयोगी सिद्ध होगा।
मित्रों अब चर्चा करते हैं, समसामयिक आज के राजनीतिक घमाशान इस दौर में सर्वप्रथम गुजरात विधानसभा चुनाव का। गुजरात में नरेन्द्र मोदी तीसरी बार विजेता के रुप में अपने आपको राष्ट्रीय राजनीति में अव्वल नेतृत्त्व क्षमता को प्रदर्शित करने में कामयाब होते दिख रहे हैं। किन्तु आप लोगों का ध्यान चुनवी मौसम के इनसाईड स्टोरियों पर आकर्षित करुंगा..मुझे एक वाकया याद आ रहा है जिसे मैं अपने शब्दों में आपके समक्ष रखना चाहूँगा। यह वाकया था नवविवाहित नवदंपति का। पति से पत्नी ने कहा कि ..मुझे  नवलखा हार बनवा दो नहीं तो...डूब मरुँगी.। वही हाल चुनाव के दौरान लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों के राजनेताओं का होता है। उसी तर्ज पर गुजरात में केशूभाई पटेल ने गुजरात विकास पार्टी बनाकर इतने लंबे राजनीतिक करियर को शूली पर चढ़ा दी, और हाथ कुछ नहीं लगा। आपको याद होगा कि छत्तीसगढ़ में भी टिकट बंटवारे को लेकर अपनी नाराजगी पूर्व सांसद ताराचंद साहू ने छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच का गठन कर किया था। हालॉकि बाद में उन्होंने छत्तीसगढ़ में तीसरा मोर्चा बनाने में सफल नहीं हो पाये तो राकांपा के सुप्रीमो शरद पवार से समर्थन मांगा था, लेकिन ईश्वर को मंजूर नहीं था  वे दूनिया छोड़कर चले गये। येदुरप्पा भी उसी  लाईन में आ खड़ें हैं। पार्टी से नाराजगी क्या रंग लाती है, यह समय बतायेगा। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि जब भी चुनाव आते हैं, तो उलट-पुलट लगभग सभी पार्टियों में होते ही हैं, क्योंकि नवलखा हार पहनने की होड़ जो रहती है।
अब बात करते है वैदेशिक राजनीति की जरा हम आॅकलन करें कि हम कहाँ खड़ें हैं, वे कहाँ हैं..? विगत दिनों पाकिस्तान  के गृह मंत्री रहमान मलिक भारत के दौरे पर आये थे। उन्होंने अपनी बेशर्मियत की सभी हदें पार करते हुए, भारत के अंदरुनी मामलों पर टिप्पड़ी करते हुए, उन्होंने 26 /11 को दिल दहला देने वाली मुंबई में हुए हमले की तुलना अयोध्या के बाबरी मस्जिद से कर देश में साम्प्रदायिकता की आग लगाने का पुरजोर प्रयास किया। इस बात पर तल्ख टिप्पड़ी करते हुए नरेन्द्र मोदी सहित विपक्षी पार्टियों ने शब्द बांण छोड़े, लेकिन भारतीय सत्ताधारी पार्टी के नेताओं को रहमान को छोड़ नरेन्द्र मोदी द्वारा उठाये गये सर क्रीक के मामले पर तीखा प्रहार करना ही बेहतर समझा क्या यही देश की अखण्डता है...? अपने देश में आकर कोई भी बाहरी नेता कुछ भी बोलकर चला जाय, और अपनी सत्ता बचाये रखने के लिए विरोध करने वाले राजनेता पर तीखा प्रहार करना  क्या उचित है..?
ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि देशप्रेम से अधिक महत्त्व पार्टी प्रेम अथवा पार्टी के आकाओं से प्रेम मायने रखता है, ऐसे प्रेमी हैं, जिन्होंने कभी अपने माता-पिता अथवा घर के बुजूर्गों का चरण स्पर्श करने की  बात तो दूर कभी आदर से उन्हें याद तक नहीं करते। किसी भी पार्टी का एक सिद्धांत होता है, और उन सिद्धांतो पर चलने वाले उस पार्टी के वफादार साथी, और इन सभी साथियों को एक नेतृत्त्व में समेट कर ले चलने वाला नेता अर्थात् नयति इति नेता। लेकिन आज कोई सिद्धांत नहीं है, केवल बस एक ही चाह है कि- शार्टकट, जुगाड़ तंत्र , जातिगत, सम्प्रदायगत, क्षेत्रगत तथा सुरा सन्दरी के दम पर जल्द से जल्द  नवलक्खा हार हमारे गले में कोई डाल दे। -

ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

शिक्षा समाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम है- डॉ. बसीर

शिक्षा समाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम है- डॉ. बसीर

भिलाई के जामुल स्थित उदय महाविद्यालय में मनोविज्ञान-विश्लेषण पर आधारीत विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया, जिसमें पं.रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के डा.बसीर हसन (डायरेक्टर इन्स्टिीट्यूट ऑफ टीचर एजूकेशन) बतौर मुख्य वक्ता के रुप में उपस्थित थे।

कार्यक्रम की शुरुआत माँ सरस्वती का पूजन अर्चन व दीप प्रज्जवलन कर किया गया। मुख्य अतिथि डॉ.बसीर हसन का स्वागत डॉ.टी.आर.साहू (डायरेक्टर) ने बुके प्रदान कर किया, एवं विशिष्ट अतिथि डॉ. अब्दुल सत्तार का स्वागत उदय महाविद्यालय के प्राचार्य ने बुके प्रदान कर की,वहीं कुमारी किरण प्रजापति, धनेश्वरी साहू, कुसुम गिरी आदि बी.एड. की छात्राओं ने सरस्वती वन्दना को लयबद्ध गाकर उपस्थित जनों को मन्त्र मुग्ध कर दिया। स्वागत भाषण के दौरान ही डॉ.बसीर हसन का संक्षिप्त परिचय मोहम्मद हारुन रसीद ने अपने रुपहले अंदाज में इस प्रकार प्रस्तुत किये की बी.एड. के छात्र एवं छात्राएँ डॉ.बसीर के जीवन परिचय से खासा प्रभावित हुए।

मुख्य वक्ता डॉ. बसीर हसन उपस्थित सभी छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षा एक पवित्र माध्यम है जिससे संस्कारवान समाज का निर्माण होता है और देश की तरक्की होती है। शिक्षा ही एक ऐसा जरीया है जिसके माध्यम से समाज में व्याप्त कुरीतियाँ, रुढ़ीवादिता को मिटाकर स्वच्छ व चरित्रवान समाज का निर्माण किया जा सकता है। इसलिए कहा गया है शिक्षा समाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम है। डॉ.हसन ने रोचक अन्दाज में शिक्षण की बारिकीयों को समझाते हुए उन्होंने कहा कि बर्बल रीजनिंग के अन्तर्गत डिफरेन्सल एप्टिट्यूट टेस्ट एक समूह मानक तय करके बच्चों की योग्यता, उपलब्धि एवं अभिक्षमता का आकलन करना आवश्यक है ताकि आप उस छात्र के मानसिकता को पढ़ सकें, और उसी आधार पर उसे शिक्षण देंगे तो निश्चित ही वह बच्चा विषय को आसानी से समझ सकेगा। उन्होंने आगे बताया कि यदि हम अपने क्षमता को भलिभाँति जानकर उसी क्षेत्र का चयन करें तो सफलता अवश्य मिलेगी।
 वहीं डॉ. अब्दुल सत्तार ने 1986 में लागू किये गये कोठारी आयोग शिक्षण नीति का जिक्र करते हुए बताया कि हॉई स्कूल में सभी विषयों को पढ़ाया जाना एक तरह से समय की मांग थी, जो अब सफल होते नजर आ रही है, उससे शिक्षा में रोचकता तो आई ही वरन् स्त्री-पुरुषों के साक्षरता का आँकड़ा नाम मात्र का था वह अब 2011 के सर्वे रिपोर्ट में बढ़ कर महिलाओं का प्रसेन्टेज 52, वहीं पुरुषों का आँकड़ा बढ़कर 72 प्रतिशत हो गई है, जो बेहद सुखद है।
कार्यक्रम में प्रमुख रुप से श्रीमति अलीफा साहू, श्रीमति यास्मिन शेख, प्रभा साहू एवं ईश्वर प्रसाद यदु आदि अध्यापकों के अलावा बी.एड. के सभी छात्र एवं छात्राएँ उपस्थित थीं। आभार प्रदर्शन कॉलेज के लेक्चरर श्री मोहम्मद हारुन रसीद ने की।
इस कार्यक्रम में मैं भी उपिस्थत था।

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

''जिद करो दुनिया बदलो'' के धुन के होंगे आज के जन्मे बच्चे- पं.विनोद चौबे

  ''जिद करो दुनिया बदलो'' के धुन के होंगे आज के जन्मे बच्चे- पं.विनोद चौबे

 भारतीय धर्म शास्त्रों के अनुसार आंग्ल तिथियों के ऐसे संयोग को देखकर डिलेवरी कराना अथवा विवाह आदि मांगलिक कार्य कर सेलिब्रेट करना तो उचित नहीं है फिर भी ईश्वरेच्छा से जिन बच्चों का आज के दिन जन्म हुआ है आइए जानते हैं कि 12.12.12 के दिन जन्मे बच्चों की कुंडली के बारे में ज्योतिषाचार्य पं. विनोद  चौबे का क्या कहना है।
ग्रहों की स्थिति का आंकलन करने पर ज्ञात होता है इस दिन जन्म लेने वाले बच्चे की कुण्डली में सूर्य और चन्द्रमा दोनों ही राहु के साथ होंगे। यानी नवग्रहों के स्वामी सूर्य तथा चन्द्र दोनों को ही राहु का ग्रहण लगेगा। ऐसे में इस दिन जन्म लेने वाले बच्चे को जीवन में संघर्ष करना पड़ सकता है। साथ ही वैमनस्यकारी, आन्दोलनकारी तथा अपनी ही बात मनवाने लिए किसी भी हद तक कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार रहने वाले स्वभाव का रहता है, लेकिन शनि उच्च का होना इनके लिए थोड़ा लाभदायक रहेगा। लेकिन यहां भी स्थिति यही है कि  भाग्य इनका परिश्रम पर निर्भर करेगा। इन्हें जीवन में काफी उतार-चढ़ाव देखना पड़ सकता है।
साहसिक कार्य, सैन्य, सुरक्षा विंग में अहम स्थान प्राप्त करने वाला तथा अग्नि से संबंधित कार्य, भूमि एवं प्रोपर्टी से जुड़े कार्यों में इस दिन जन्म लेने वाले व्यक्ति अधिक सफल हो सकते हैं। वृश्चिक राशि होने की वजह से इस दिन जन्म लेने वाले बच्चे एक्टिव होंगे लेकिन स्वभाव से क्रोधी होंगे। इनमें बदला लेने की भावना होगी।  अग्नि तत्व के होने के कारण इनका सिर चौड़ा होगा और बाल लंबे होंगे और दिखने में ताम्रवर्ण के हो सकते हैं। यह हठी और ईष्यालु भी हो सकते हैं। कुल मिलाकर इन्हें चन्द्र (भगवान शिव ) की पूजा अर्चना तथा मोती रत्न धारण करना पड़ेगा ताकि इनका चित्त शांत रहे। शिक्षा के क्षेत्र में भी जिद करो दुनिया बदलो की भाँति काफी परिश्रम कर शिर्षस्थ पद को हथियाने का प्रयास करेंगे, यदि व्यापार करते हैं तो भी शिर्षस्थ  भूमि, मकान एवं कृषि के क्षेत्र में अग्रणी पायदान पर रहना ही पसन्द करेंगे।
-ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, 09827198828 Bhilai

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

सदी का दुर्लभ संयोग 12-12-12 + 9 =स्वामी मंगल '' भारत बहुमुखी विकास कर शक्तिसम्पन्न देश के पायदान पर बना रहेगा'' - ज्योतिषाचार्य: पं.विनोद चौबे


सदी का दुर्लभ संयोग 12-12-12 + 9 =स्वामी मंगल

मित्रों, नमस्कार,

पंचांग के अनुसार, 12 दिसंबर, 2012 को बुधवार अनुराधा नक्षत्र, धृती योग, विष्कुंभ करण, प्रात: 7.48 मिनट तक है। चंद्रमा दिनमान वृश्चिक राशि में है। इसके अलावा प्रात: 12 बजकर 12 मिनट 12 सेकेण्ड पर (दिन में) कुंभ लग्न होगा और लग्नेश शनि अपने मित्र ग्रह शुक्र के गृह अर्थात् भाग्य भाव में होगा। अत: भारत के लिए आर्थिक विकास दर को झटका अवश्य लगेगा किन्तु खनिज के क्षेत्र में बहुमुखी विकास कर शक्तिसम्पन्न देश के पायदान पर बना रहेगा।

चूंकि उपरोक्त शुभ संयोग का आगमन 100 वर्षो बाद हुआ है हालाकि इसके पूर्व 21/12/2012 को बना था। यदि बात की जाय नवोदित राज्य छत्तीसगढ़ की तो 1 नवंबर 2000 को इस राज्य का 26 वें राज्य के रुप में आदरणीयश्री अटलजी के प्रधानमंत्रीत्त्व काल में हुआ था। जिसका मूलांक 5 होता है और स्वामी बुध एवं इस महासंयोग में स्वामीत्त्व मंगल कर रहे हैं। मंगल स्वभाव से क्रूर एवं हिंसक, युद्धक ग्रह माना गया है अतएव छत्तीसगढ़ पिछले कई वर्षों से नक्सल गतिविधियों से पिड़ीत रहा है और यदा कदा उनकी उपस्थिति छिटपुट घटनाओं से देखी जा सकती है। इस महासंयोग का प्रभाव भी नक्सलीयों पर पड़ेगा जो नक्सलीयों के मध्य फुट पडऩा और ढ़ेर सारे नक्सली सरकार के समक्ष हथियार डालने को तैयार हो जायेंगे।

जिन लोगों ने इस दुर्लभ संयोग को विाह, पुत्रोत्पादन(अत्याधुनिक मेडिकली सुविधानुसार) आदि के लिए सेलिब्रेट करना चाहते हैं तो उनके लिए दु:खद समाचार है क्योंकि मंगल अक्रामकता का प्रतीक है, और आज के दिन विवाह अथवा जबरन संतानोत्पत्ति आदि करना अथवा डाक्टरों पर इसके लिए दबाव बनाना उचित नहीं है, मंगल के प्रकृति, गुण से प्रभावित हो सकता है। यदि ईश्वरेच्छानुसार ऐसा होता है तो उसे मांगलिक ही माना जायेगा।  लेकिन जो सेलिब्रेट करना चाहते हैं उनके लिए विशेष तौर पर सावधानी बरतें। जिनका मूलांक 5 अथवा 8 है उनके लिए विशेष शुभफलदायी रहेगा। बाकि मूलांक वाले जातकों के लिए थोड़ी जोखिम भरा रहेगा।

12 दिसम्बर, 2012 को अनुराधा नक्षत्र रहेगा, जो शनि का नक्षत्र है। इसमें नवीन कार्य का शुभारंभ और नवीन वस्तु की खरीदारी स्थायी व शुभ फलदायी होगी। इस दिन सूर्योदय प्रात: 7.10 बजे होगा वहीं रात्रि 8.49 बजे तक अमृत सर्वार्थ सिद्धि योग भी रहेगा। इस दिन वृश्चिक राशि में पंचग्रही योग भी बनेगा, जिसमें सूर्य, चंद्रमा, बुध, शुक्र व राहु भ्रमण करेंगे। द्वादश मूलांक का धार्मिक व ज्योतिष गणना के अनुसार विशेष महत्व है।

यह दिन 5 और 8 मूलांक वाले लोगों के लिए बहुत अच्छा है। अंक विज्ञान के अनुसार 12-12-12 यानी 3 3 3= 9 होता है। यह तारीख मंगल कार्य के लिए उत्तम है। यह भी देखना पड़ेगा कि जिन कपल का आपसी तालमेल मंगल के कारण बिगड़ रहा है, उन्हें यह तारीख परेशान कर सकती है। वह बताते हैं कि यह तारीख उन जोड़ों के लिए बेहतरीन है, जिनकी जन्म कुंडली का मंगल स्ट्रॉन्ग है।

  • 1- अंक : सावधानी बरतें, व्यावसायिक निवेश से बचें।, 

  • 2 अंक : लाभ में कमी रहेगी, कलह से राहत मिलेगा। 

  • 3 अंक : संतान से कष्ट सम्भव है, व्यवहार में नरमी बरतें। 

  • 4 अंक : उच्चपद की प्राप्ति में थोड़ी विलंब हो सकती है। प्रयासरत रहें।

  •  5 अंक : आकस्मिक धनलाभ होगा, आगन्तुकों आगमन लाभदायी रहेगा। रुके कार्य में सफलता मिलेगी।

  •  6 अंक: मांगलिक कार्य में सफलता, क्रोध पर काबू रकखें। 

  • 7 अंक : व्यापार में मेहनत की आवश्यकता है, प्रतिस्पद्र्धा में पिछड़ रहे हैं। 

  • 8 अंक : विकास व प्रगति के मार्ग खुलेंगे, आने वाला वर्ष 2013 लाभपूर्ण रहेगा। 

  • 9 अंक : संतानसुख मिलेगा, लम्बित कार्य पूर्ण होगा।


 - ज्योतिषाचार्य पं विनोद चौबे, सम्पादक ' ज्योतिष का सूर्य ' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका , भिलाई - ०९८२७१९८८२८



परिचय

मूल रूपसे मेरा कार्य-क्षेत्र ज्योतिष-विषयक सलाह और वैदिक कर्मकाण्ड को विशिष्टता से तर्कपूर्ण वेज्ञानिक पद्धति से संपन्न कराना है लेकिन साथ ही भारतीय संस्कृति, संस्कृत एवं सामाजिक कुप्रथाओं पर चिन्तन के साथ ही ज्योतिष विषयक संदर्भों पर चर्चा करना एवं 'संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी'' से 'नव्य व्याकरण'' विषय से आचार्य एवं 'ज्योतिष का सूर्य ' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका का अगस्त 2009 से अनवरत प्रकाशन एवं बतौर संपादक, देश की सम-सामयिक मुद्दों पर बेबाक टिप्पड़ी, समीक्षा और सत्साहित्यों के आधारभूत रचनाओं के माध्यम से लोगों को जागरूक करना.ही परम कर्तव्य मानता हूँ।'' भारत प्राच्य विद्याओं से समृद्ध है, लेकिन अभी समझ ही नहीं पाये, केवल पश्चिमी देशों के वैक्सिन (रसायनीक दवाईयों) पर दीठ लगये बैठे हैं..जबकि अपने देश की तूलसी, गोमूत्र और लौकीक, वैदिक एवं आध्यात्मिक योग का भी अपमान कर रहे हैं...ऐसे में क्या भारत विश्वगुरू बन पायेगा...इन्हीं उलझनों में भारत की ओर देखते हुए..इंडिया में जी रहा हुँ''....ज्योतिषाचार्य: पं.विनोद चौबे

सम्पादक,' ज्योतिष का सूर्य ' हिन्दी मासिक पत्रिका

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

क्यों मनाते हैं कार्तिक पुर्णिमा...???

Pandit Vinod Choubey

ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे, संपादक, ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई..।27/11/2012
मित्रों नमस्कार, कल कार्तिक पुर्णिमा है, आप सभी को ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ....आईए थोड़ी बहुत भगवद् चर्चा की जाय...।

क्यों मनाते हैं कार्तिक पुर्णिमा...???

कार्तिक पूर्णिमा
हिंदू धर्म में पूर्णिमा का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष पंद्रह पूर्णिमाएं होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर १६ हो जाती है। कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा या गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है । इस पुर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा की संज्ञा इसलिए दी गई है क्योंकि आज के दिन ही भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का अंत किया था और वे त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए थे। ऐसी मान्यता है कि इस दिन कृतिका में शिव शंकर के दर्शन करने से सात जन्म तक व्यक्ति ज्ञानी और धनवान होता है। इस दिन चन्द्र जब आकाश में उदित हो रहा हो उस समय शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का पूजन करने से शिव जी की प्रसन्नता प्राप्त होती है। इस दिन गंगा नदी में स्नान करने से भी पूरे वर्ष स्नान करने का फाल मिलता है।

पौराणिक और लोककथाएँ
पुराणों में

इसी दिन भगवान विष्णु ने प्रलय काल में वेदों की रक्षा के लिए तथा सृष्टि को बचाने के लिए मत्स्य अवतार धारण किया था।
महाभारत में

महाभारत काल में हुए १८ दिनों के विनाशकारी युद्ध में योद्धाओं और सगे संबंधियों को देखकर जब युधिष्ठिर कुछ विचलित हुए तो भगवान श्री कृष्ण पांडवों के साथ गढ़ खादर के विशाल रेतीले मैदान पर आए। कार्तिक शुक्ल अष्टमी को पांडवों ने स्नान किया और कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी तक गंगा किनारे यज्ञ किया। इसके बाद रात में दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए दीपदान करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की। इसलिए इस दिन गंगा स्नान का और विशेष रूप से गढ़मुक्तेश्वर तीर्थ नगरी में आकर स्नान करने का विशेष महत्व है।
मान्यता

मान्यता यह भी है कि इस दिन पूरे दिन व्रत रखकर रात्रि में वृषदान यानी बछड़ा दान करने से शिवपद की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति इस दिन उपवास करके भगवान भोलेनाथ का भजन और गुणगान करता है उसे अग्निष्टोम नामक यज्ञ का फल प्राप्त होता है। इस पूर्णिमा को शैव मत में जितनी मान्यता मिली है उतनी ही वैष्णव मत में भी।
वैष्णव मत में

इसमें कार्तिक पूर्णिमा को बहुत अधिक मान्यता मिली है इस पूर्णिमा को महाकार्तिकी भी कहा गया है। यदि इस पूर्णिमा के दिन भरणी नक्षत्र हो तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। अगर रोहिणी नक्षत्र हो तो इस पूर्णिमा का महत्व कई गुणा बढ़ जाता है। इस दिन कृतिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और बृहस्पति हों तो यह महापूर्णिमा कहलाती है। कृतिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और विशाखा पर सूर्य हो तो "पद्मक योग" बनता है जिसमें गंगा स्नान करने से पुष्कर से भी अधिक उत्तम फल की प्राप्ति होती है।
महत्व

कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान, दीप दान, हवन, यज्ञ आदि करने से सांसारिक पाप और ताप का शमन होता है। इस दिन किये जाने वाले अन्न, धन एव वस्त्र दान का भी बहुत महत्व बताया गया है। इस दिन जो भी दान किया जाता हैं उसका कई गुणा लाभ मिलता है। मान्यता यह भी है कि इस दिन व्यक्ति जो कुछ दान करता है वह उसके लिए स्वर्ग में संरक्षित रहता है जो मृत्यु लोक त्यागने के बाद स्वर्ग में उसे पुनःप्राप्त होता है।

शास्त्रों में वर्णित है कि कार्तिक पुर्णिमा के दिन पवित्र नदी व सरोवर एवं धर्म स्थान में जैसे, गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, गंडक, कुरूक्षेत्र, अयोध्या, काशी में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
स्नान और दान विधि

महर्षि अंगिरा ने स्नान के प्रसंग में लिखा है कि यदि स्नान में कुशा और दान करते समय हाथ में जल व जप करते समय संख्या का संकल्प नहीं किया जाए तो कर्म फल की प्राप्ति नहीं होती है। शास्त्र के नियमों का पालन करते हुए इस दिन स्नान करते समय पहले हाथ पैर धो लें फिर आचमन करके हाथ में कुशा लेकर स्नान करें, इसी प्रकार दान देते समय में हाथ में जल लेकर दान करें। आप यज्ञ और जप कर रहे हैं तो पहले संख्या का संकल्प कर लें फिर जप और यज्ञादि कर्म करें।

सोमवार, 5 नवंबर 2012

इख लख पुत सवालख नाती ता रावण घर दिया न बाती...

इख लख पुत सवालख नाती ता रावण घर दिया न बाती...
लगता नितीन गडकरी जी का समय खराब चल रहा है...या मीडिया उनके पिछे पड़ी है ये साफ नहीं है...। परन्तु इतना जरूर है कि भगवा आतंक कहने वाली कांग्रेस अब उसी भगवा धारी स्वामी विवेकानन्द जी के भक्त बन गई है..। इतना परिवर्तन कांग्रेस का बगुला भक्ति ही कहा जा सकता है..। बाकि कभी कांग्रेसी भगवा आतंक कह कहकर देश के छोटे बड़े सभी सन्तों को एक लाईन में खड़ी कर दिये थे। और यह तब हुआ था जब देश के गृहमंत्री श्रीमान पी.चिदम्बरम जी थे। उस समय तो भगवा आतंक कहने के पहले यह बयान जारी नहीं किया कि स्वामी विवेकानन्दजी को छोड़कर बाकि सभी भगवा धारी आतंकी गतिविधियों में संलिप्त हैं। देश की जनता सब जानती है...श्री मनीष तिवारी जी आप लोगों का घमंड शिर चढ़कर बोल रहा है...लेकिन बोलने और गरजने में अन्तर होता है ..जैसे की इस समय नरेन्द्र मोदी जी हमेशा गरजते रहते हैं...। शायद ऐसी गर्जना कांग्रेस के किसी अन्य नेता में हो। अभी तो अरविन्द-अमोघ अस्त्र, स्वामी सुब्रह्मण्यम स्वामी का आग्न्येयास्त्र, बाबा रामदेव का वरुणास्त्र, अन्ना हजारे जी का इकतीस फणीश बांण कब तक बर्दाश्त कर पाओंगे। वह दिन दूर नहीं कि ''इख लख पुत सवालख नाती ता रावण घर दिया न बाती''..की प्रांसंगिकता कांग्रेस पर फिट बैठ जाये।

शनिवार, 3 नवंबर 2012

मुहूर्त- मंगल-पुष्य नक्षत्र, धनतेरस एवं दीपावली के सभी मुहूर्त



''   मित्रों, प्रिय पाठकों एवं ज्योतिष का सूर्य राष्ट्रीय मासिक पत्रिका के नियमीत पाठकों हालाकि इस बार का अंक दीप-पर्व विशेषांक था जिसमें महालक्ष्मी-पूजन व शुभ मुहूर्तों के बारे में विस्तृत चर्चा की गई है, किन्तु जिन पाठकों तक यह अंक नहीं पहुँच पाया है उन्हें इस ब्लाग के माध्यम से आप सभी को सादर समर्पित है। सर्व प्रथम आप सभी को दीप पर्व पर ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ....। और अब चर्चा करते हैं महा लक्ष्मी जी के प्रसन्नार्थ पूजन के लिए शुभ मुहूर्तों के लिए, मुझे विश्वास है, आप इससे अवश्य लाभान्वित होंगे।''


रविवार, 21 अक्तूबर 2012

अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे....

Pt.Vinod Choubey
छत्तीसगढ़ के भिलाई से प्रकाशित एकमात्र भारतीय धर्म-संस्कृति पर आधारित....राष्ट्र देवो भवः राष्ट्रे वयं जागृयामः का लक्ष्य ही भारत को विश्वमहाशक्ति और गुरु बना सकता है। ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका का ''दीप-पर्व स्पेशल'' अंक 2012 को आप नेट पर पढ़ें और अपने मित्रों को पढ़ाएं...।



अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे....

प्रिय पाठकों,
धन की प्राप्ति के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं किन्तु उनमें आस्था की दुनिया में धन की प्रतीक माँ लक्ष्मी को माना गया है और उनको प्रसन्न करने के लिए श्री सूक्तम् का पाठ प्राय: हम सभी करते हैं। श्री सूक्तम में कहा गया है अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे.... अर्थात अलक्ष्मी अथवा अनावश्यक तौर पर आने वाला धन जिसको काला धन कहा जाता है उसका नाश करें और हमें आप स्वयं वरण करें। लेकिन इसके बावजूद हम लोग दिनरात उसी अलक्ष्मी (भ्रष्टाचार के द्वारा अर्जित धन) के पीछे दौड़ते रहते हैं, जो एक ना एक दिन पर्दाफाश होकर अपने हाथ से निकल जाता है, साथ ही प्रतिष्ठा भी गंवानी पड़ती है। हालांकि वास्तविक लक्ष्मी (अर्जित धन) से मनुष्य धर्म और धर्मं से आरोग्यता (सुख) और अंतत: त्रिलोक-विजयी होकर मान-सम्मान, पद, प्रतिष्ठा को प्राप्त करता है। हम लोग इस सूक्त का पाठ करते हैं परन्तु यह भूल जाते हैं कि इस काले धन का माँ लक्ष्मी के नजर में भी कोई स्थान नहीं होता है।  माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करना चाहते हैं तो पहले अपने व्यापार, उद्योग, कर्मक्षेत्र को परिशोधन करने की आवश्यकता है।
यह अंक दीपोत्सव विशेषांक में समाज के अन्तगर्भित विचारों से भाग्य के प्रति किए गए छिद्रान्वेषण के वैज्ञानिकीय, सामाजिक, सामयिकी, ज्योतिषीय, दार्शनिक, तंत्र-मंत्र विज्ञान पर आधारित लेख सामग्री से परिपूर्ण यह पत्रिका आपको समर्पित है। चूंकि इसमें कर्म से भाग्य और भाग्य से सौभाग्य तथा लक्ष्मी की साधना का विशेष रूप से सम्पूर्ण पूजा विधान दिया गया है।
दीप दूसरों को प्रकाशित करता है किन्तु स्वयं को जलाकर अर्थात् अग्नि के ताप को स्वयं अंगीकार करते हुए दूसरों को प्रकाशित करता है। यह परोपकार का प्रतीक है जो मनुष्य परोपकाराय सतां विभूतय: के सूत्र को अपनाता है वही लक्ष्मीवान हो सकता है।
आजकल एक के बाद एक घोटाले, भ्रष्टाचार से अर्जित किया गये कालेधन से बने धनवान वास्तव में सबसे बड़े दरिद्र हैं क्योंकि विपन्नता छल और कपट से उत्पन्न होती है। जिस धन और जिस लक्ष्मी की परिकल्पना भारतीय शास्त्रों में की गई है वह धन परोपकार धन है इसलिए ऐसे परोपकारी सज्जनों को विभूति से परिभाषित किया गया अतएव परोपकाराय सताम् विभूतय:।
केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकार और तमाम अफसर यहाँ तक कि मध्यप्रदेश के एक अध्यापक के यहाँ करोड़ों का कालाधन मिलना अपने आप में सबसे बड़ी विपन्नता का परिचायक है क्योंकि धन के बाद धर्म का पायदान है और धर्म के बाद ही मनुष्य उस धन का सुख भोग पाता है अन्यथा कारागार में कारागार में जीवन यापन करने को विवश हो जाता है। इसीलिए कहा गया है- धनात् धर्मम् तत: सुखम्।
साथ ही मैं यह भी बताना चाहूँगा कि, जहाँ धर्म है वहीं विजय है चाहे वह राजनीतिक हो, सामाजिक हो, पारवारिक हो या युद्धभूमि हो या व्यापारिक प्रतिस्पर्धा का द्वंद्व युद्ध हो।
यतो धर्मस्ततो जय:।
सभी देश वासियों को धनतेरस और दीपावली पर्व पर हार्दिक शुभ कामनाओं के साथ महामाया लक्ष्मी से कामना करता हूं कि आपके जीवन में आरोग्य, सुख, समृद्धि, शांति का उल्लास भर दें।
ऋण रोगादि दारिद्वयं पाप क्षुदपमृत्यव:।
भय शोक मनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा॥
श्रीर्वर्चस्वभायुषअण मारोग्यमा विधाच्छो भमानं महीयते।
धनम् धान्यं पशुं बहुपुत्रलाभं शत संवत्सरं दीर्घमायुर आरोग्यमस्तु। शुभमस्तु। कल्याणमस्तु।
संपादक- ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे
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अब पुनश्च चलते चलते...
सभी देश वासियों को धनतेरस और दीपावली पर्व पर हार्दिक शुभ कामनाओं के साथ महामाया लक्ष्मी से कामना करता हूं कि आपके जीवन में आरोग्य, सुख, समृद्धि, शांति का उल्लास भर दें।

सोमवार, 15 अक्तूबर 2012

भगवती दुर्गा की आराधना क्यों और कैसे


Pandit Vinod Choubey (jyotishacharya)

 भगवती दुर्गा की आराधना क्यों और कैसे

हमारे इस ब्लाग के नियमित पाठकों, ''ज्योतिष का सूर्य '' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका के प्रिय पाठकों एवं समस्त देश वासियों आप सभी को नवरात्र के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ... आईए कल से यानी 16 अक्टूबर 2012 से शारदीय नवरात्र आरम्भ हो रहा है, अतएव आज शक्ति के पूजन-अर्चन एवं साधना विषयक कुछ प्रमुख बिन्दुओं पर चर्चा करें...। मुझे विश्वास है आप सभ अवश्य लाभान्वित होंगे साथ ही खुश भी, क्योंकि...चर्चा माँ की हो रही है...और माँ इक पुत्र के लिए कितनी प्यारी होती है....। और जब चर्चा माँ की हो तो पुत्र को खुश होना ही है।
ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, सम्पादक, ''ज्योतिष का सूर्य '' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई-098271-98828 (यह ज्योतिष का सूर्य पत्रिका के सितम्बर 2010 के अंक में प्रकाशित हो चुका है)
भगवती दुर्गा की आराधना का सर्वोत्तम अवसर नवरात्र हैं जिसके हर दिन भगवती के नवीन स्वरूपों की पूजा-अर्चना होती है और जप-पाठ आदि के धार्मिक अनुष्ठान आयोजित होते हैं। श्रद्धालु भक्त भगवती के नव स्वरूपों की पूजा कर कृतार्थ होते हैं और देवी की अनुकपा से उनके सभी मनोरथ पूरे होते हैं। चाहे कोई भी संकट हों, विघ्न-बाधाओं के बादल प्रलय ढाने को तैयार हों, ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव हों – हर प्रकार की कठिनाइयां भगवती दुर्गा के आशीर्वाद से दूर हो जाती हैं। यही वजह है कि सनातन काल से लोग भगवती की नवरात्रों में विशेष पूजा किया करते हैं। नवरात्र के अवसर पर प्रस्तुत हैं माकण्डेय पुराण से संकलित देवी माहात्म्य को रेखांकित करने वाली प्रथम चरित्र-कथा जिसमें भगवती ने मधु कैटभ दैत्य का संहार किया था। कौष्टुकि मुनि के पूछने पर महर्षि मार्कण्डेय जी ने उन्हें श्री शनिदेव के भ्राता सावर्णि मनु की उत्पत्ति का प्रसंग सुनाने के बाद उनके मन्वंतर के स्वामी बनने का आख्यान सुनाने के क्रम में भगवती के प्रथम चरित्र का भी गान किया।
मार्कण्डेय जी बोले - सूर्य के पुत्र साविर्णि जो आठवें मनु कहे जाते हैं, उनकी उत्पत्ति की कथा विस्तार पूर्वक कहता हूँ, सुनो। सूर्य कुमार महाभाग सवर्णि भगवती महामाया के अनुग्रह से जिस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी हुए, वही प्रसंग सुनाता हूँ। पूर्वकाल की बात है,स्वारोचिष मन्वन्तर में सुरथ नाम के एक राजा थे, जो चैत्र वंश में उत्पन्न हुए थे। उनका समस्त भूमण्डल पर अधिकार था । वे प्रजा का अपने और पुत्रों की भाँति धर्मपूर्वक पालन करते थे। फिर भी उस समय कोलाविध्वंसी नाम के क्षत्रिय उनके शत्रु हो गये। राजा सुरथ की दण्डनीति बड़ी प्रबल थी। उनका शत्रुओं के साथ संग्राम हुआ। यद्यपि कोलाविध्वंसी संख्या में कम थे, तो भी राजा सुरथ युद्ध में उनसे परास्त हो गये। तब वे युद्ध भूमि से अपने नगर को लौट आये और केवल अपने देश के राजा होकर रहने लगे (समूची पृथ्वी से अब उनका अधिकार जाता रहा) किंतु वहाँ भी उन प्रबल शत्रुओं ने उस समय महाभाग राजा सुरथ पर आक्रमण कर दिया।
राजा का बल क्षीण हो चला था, इसलिये उनके दुष्ट, बलवान एवं दुरात्मा मंत्रियों ने वहाँ उनकी राजधानी में भी राजकीय सेना और खजाने को वहाँ से हथिया लिया। सुरथ का प्रभुत्व नष्ट हो चुका था, इसलिये वे शिकार खेलने के बहाने घोड़े पर सवार हो वहाँ से अकेले ही एक घने जंगल में चले गये। वहाँ उन्होंने विप्रवर मेधा मुनि का आश्रम देखा, जहाँ कितने ही हिसंक जीव (अपनी स्वाभाविक हिंसावृत्ति छोड़कर) परम शान्त भाव से रहते थे। मुनि के बहुत से शिष्य उस वन की शोभा बढ़ा रहे थे। वहां जाने पर मुनि ने उनका सत्कार किया और वे उन मुनि श्रेष्ठ के आश्रम पर इधर-उधर विचरते हुए कुछ काल तक वहां रहे। फिर ममता से आकृष्टचित्त होकर उस आश्रम में इस प्रकार चिंता करने लगे – पूर्वकाल में मेरे पूर्वजों ने जिसका पालन किया था, वहीं नगर आज मुझसे रहित है। पता नहीं, मेरे दुराचारी भृत्यगण उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मद की वर्षा करने वाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओं के अधीन होकर न जाने किन भोगों को भोगता होगा? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पाने से सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओं को अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगों के द्वारा खर्च होते रहने के कारण अत्यन्त कष्ट से जमा किया हुआ मेरा वह खजाना भी खाली हो जायेगा। ये तथा और भी कई बातें राजा सुरथ निरंतर सोचते रहते थे।
एक दिन उन्होंने वहाँ विप्रवर मेधा के आश्रम के निकट एक वैश्य को देखा और उससे पूछा – भाई, तुम कौन हो? यहां तुम्हारे आने का क्या कारण है? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने से दिखायी देते हो? राजा सुरथ का यह प्रेम पूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर वैश्य ने विनीत भाव से उन्हें प्रणाम करके कहा – राजन्! मैं धनियों के कुल में उत्पन्न एक वैश्य हँ। मेरा नाम समाधि है। मेरे दुष्ट स्त्री-पुत्रों ने धन के लोभ से मुझे घर से बाहर निकाल दिया है। मैं इस समय धन, स्त्री और पुत्र से वंचित हूँ। मेरे विश्वसनीय बंधुओं ने मेरा ही धन लेकर मुझे दूर कर दिया है, इसलिये दुखी होकर मैं वन में चला आया हँ। यहाँ रहकर मैं इस बात को नहीं जानता कि मेरे पुत्रों की, स्त्री की और स्वजनों का कुशल है या नहीं। इस समय घर में वे कुशल से रहते हैं, अथवा उन्हें कोई कष्ट है? वे मेरे पुत्र कैसे हैं? क्या वे सदाचारी हैं अथवा दुराचारी हो गये हैं?
राजा ने पूछा – जिन लोभी स्त्री-पुत्र आदि ने धन के कारण तुम्हें घर से निकाल दिया, उनके प्रति तुम्हारे चित्त में इतना स्नेह क्यों है?
वैश्य बाला – आप मेरे विषय में जो बात कहते हैं, वह सब ठीक है। किंतु क्या करूँ, मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण करता। जिन्होंने धन के लोभ में पड़कर पिता के प्रति स्नेह, पति के प्रति प्रेम तथा आत्मीयजन के प्रति अनुराग को तिलाञ्जलि दे मुझे घर से निकाल दिया है, उन्हीं के प्रति मेरे हृदय में इतना स्नेह है। महामते, गुणहीन बन्धुओं के प्रति भी जो मेरा चित्त इस प्रकार प्रेम मग्न हो रहा है, यह क्या है – इस बात को मैं जानकर भी नहीं जान पाता। उनके लिये मैं लंबी साँसें ले रहा हँ और मेरा हृदय अत्यन्त दु:खित हो रहा है। उन लोगों में प्रेम का सर्वथा अभाव है, तो भी उनके प्रति जो मेरा मन निष्ठुर नहीं हो पाता, इसके लिये क्या करुँ।
मार्कण्डेयजी कहते हैं – तदन्तर राजाओं में श्रेष्ठ सुरथ और वह समाधि नामक वैश्य दोनों साथ-साथ मेधा मुनि की सेवा में उपस्थित हुए और उनके साथ यथायोग्य न्यायानुकूल विनयपूर्ण बर्ताव करके बैठे। तत्पश्चात वैश्य और राजा ने कुछ वार्तालाप आरंभ किया।
राजा ने कहा – भगवन् मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, उसे बताइये। मेरा चित्त अपने अधीन न होने के कारण वह बात मेरे मन को बहुत दु:ख देती है। मुनिश्रेष्ठ जो राज्य मेरे हाथ से चला गया है, उसमें और उसके सम्पूर्ण अंगों में मेरी ममता हो रही है। यह जानते हुए भी कि वह अब मेरा नहीं है, अज्ञानी की भाँति मुझे उसके लिये दु:ख होता है, यह क्या है? इधर यह वैश्य भी घर से अपमानित होकर आया है। इसके पुत्र, स्त्री और भृत्यों ने इसको छोड़ दिया है। स्वजनों ने भी इसका परित्याग कर दिया है, तो भी इसके हृदय में उनके प्रति अत्यन्त स्नेह है। इस प्रकार यह तथा मैं दोनों ही बहुत दुखी हैं। जिसमें प्रत्यक्ष दोष देखा गया है, उस विषय के लिये भी हमारे मन में ममता जनित आकर्षण पैदा हो रहा है। महाभाग हम दोनों समझदार है,तो भी हममें जो मोह पैदा हुआ है, यह क्या है? विवेकशून्य पुरुष की भाँति मुझमें और इसमें भी यह मूढ़ता प्रत्यक्ष दिखायी देती है।
ऋषि बोले – महाभाग, विषय मार्ग का ज्ञान सब जीवों को है। इसी प्रकार विषय भी सबके लिये अलग-अलग हैं। कुछ प्राणी दिन में नहीं देखते, और दूसरे रात में ही नहीं देखते। तथा कुछ जीव ऐसे हैं, जो दिन और रात्रि में भी बराबर ही देखते हैं। यह ठीक है कि मनुष्य समझदार होते हैं, किंतु केवल वे ही ऐसे नहीं होते। पशु-पक्षी और मृग आदि सभी प्राणी समझदार होते हैं। मनुष्यों की समझ भी वैसी ही होती है, जैसी उन मृग और पक्षियों की होती है तथा जैसी मनुष्यों की होती है, वैसी ही उन मृग-पक्षी आदि की होती है। यह तथा अन्य बातें भी प्राय: दोनों में समान ही हैं। समझ होने पर भी इन पक्षियों को तो देखो, यह स्वयं भूख से पीडि़त होते हुए भी मोहवश बच्चों की चोंच में कितने चाव से अन्न के दाने डाल रहे हैं। नरश्रेष्ठ, क्या तुम नहीं देखते कि ये मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किये हुए उपकार का बदला पाने के लिये पुत्रों की अभिलाषा करते हैं? यद्यपि उन सबमें समझ की कमी नहीं है, तथापि वे संसार की स्थिति (जन्म-मरण की परम्परा) बनाये रखने वाले भगवती महामाया के प्रभाव द्वारा ममतामय भँवर से युक्त मोह के गहरे गर्त में गिराये जाते हैं। इसलिये इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। जगदीश्वर भगवान विष्णु की योगनिद्रारूपा जो भगवाती महामाया हैं, उन्हीं से यह जगत मोहित हो रहा है। वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं। वे ही इस संपूर्ण चराचर जगत की सृष्टि करती हैं तथा वे ही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिये वरदान देती हैं। वे ही पराविद्या, संसार-बंधन और मोक्ष की हेतुभूता सनातनी देवी तथा संपूर्ण ईश्वरों की भी अधीश्वरी हैं।
राजा ने पूछा – भगवन, जिन्हें आप महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं? ब्रह्मन्! उनका अविर्भाव कैसे हुआ? तथा उनके चरित्र कौन-कौन हैं ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे, उन देवी का जैसा प्रभाव हो, जैसा स्वरूप हो और जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ हो, वह सब मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूँ।
ऋषि बोले – राजन्! वास्तव मे तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं। सम्पूर्ण जगत् उन्हीं का रूप है तथा उन्होंने समस्त विश्व को व्याप्त कर रखा है, तथापि उनका प्राकटय अनेक प्रकार से होता है। वह मुझ से सुनो। यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं, तथापि जब देवताओं को कार्य सिद्ध करने के लिये प्रकट होती हैं, उस समय लोक में उत्पन्न हुई कहलाती हैं। कल्प के अन्त में जब सम्पूर्ण जगत् एकार्णव में निमग् हो रहा था और सबके प्रभु भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या बिछाकर योगनिद्रा का आश्रय ले सो रहे थे, उस समय उनके कानों की मैल से दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए, जो मुध और कैटभ के नाम से विख्यात थे। वे दोनों ब्रह्मा जी का वध करने को तैयार हो गये।
भगवान विष्णु के नाभिकमल में विराजमान प्रजापति ब्रह्माजी ने जब उन दोनों भयानक असुरों को अपने पास आया और भगवान को सोया हुआ देखा तो एकाग्रचित्त होकर उन्होंने भगवान विष्णु को जगाने के लिए उनके नेत्रों में निवास करने वाली योगनिद्रा का स्तवन आरम्भ किया। जो इस विश्व की अधीश्वरी, जगत को धारण करने वाली, संसार का पालन और संहार करने वाली तथा तेज:स्वरूप भगवान विष्णु की अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवी की भगवान ब्रह्मा स्तुति करने लगे।
ब्रह्मा जी ने कहा – देवि तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्वधा और तम्ही वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणव में अकार, उकार, मकार – इन तीन मात्राओं के रूप में तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओं के अतिरिक्त जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है, जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व ब्रह्माण्ड को धारण करती हो। तुम से ही इस जगत की सृष्टि होती है। तुम्हीं से इसका पालन होता है और सदा तुम्ही कल्प के अंत में सबको अपना ग्रास बना लेती हो।
जगन्मयी देवि! इस जगत की उत्पप्ति के समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-काल में स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्त के समय संहाररूप धारण करने वाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोह रूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ह्रीं और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लाज्जा , पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खङ्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शंख और धनुष धारण करने वाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ – ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो – इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्याधिक सुन्दरी हो। पर और अपर – सबसे परे रहने वाली परमेश्वरी तुम्हीं हो।
सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्-असत् रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हींहो। ऐसी अवस्था में तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है। जो इस जगत की सृष्टि, पालन और संहार णकरते हैं, उन भगवान को भी जब तुमने निद्रा के अधीन कर दिया है तो तुम्हारी स्तुति करने में यहाँ कौन समर्थ हो सकता है। मुझको, भगवान शंकर को तथा भगवान विष्णु को भी तुमने ही शरीर धारण कराया है। अत: तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें है। देवि! तुम तो अपने इन उदार प्रभावों से ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्घर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोह में डाल दो और जगदीश्वर भगवान विष्णु को शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान असुरों को मार डालने की बुद्धि उत्पन्न कर दो।
ऋषि कहते हैं – राजन्! जब ब्रह्मा जी ने वहाँ मधु और कैटभ को मारने के उद्देश्य से भगवान विष्णु को जगाने के लिए तमोगुण की अधिष्ठात्री देवी योगनिद्रा की इस प्रकार स्तुति की, तब वे भगवान के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्ष स्थल से निकलकर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजी की दृष्टि के समक्ष खडी हो गयी।
योगनिद्रा से मुक्त होने पर जगत के स्वामी भगवान जनार्दन उस एकावर्णव के जल में शेषनाग की शय्या से जाग उठे। फिर उन्होंने उन दोनों असुरों को देखा। वे दुरात्मा मधु और कैटभ अत्यन्त बलवान तथा परक्रमी थे और क्रोध से ऑंखें लाल किये ब्रह्माजी को खा जाने के लिये उद्योग कर रहे थे। तब भगवान श्री हरि ने उठकर उन दोनों के साथ पाँच हजार वर्षों तक केवल बाहु युद्ध किया। वे दोनों भी अत्यन्त बल के कारण उन्मत्त हो रहे थे। इधर महामाया ने भी उन्हें मोह में डाल रखा था, इसलिये वे भगवान विष्णु से कहने लगे – हम तुम्हारी वीरता से संतुष्ट हैं। तुम हम लोगों से कोई वर माँगो।
श्री भगवान् बोले – यदि तुम दोनों मुझ पर प्रसन्न हो तो अब मेरे हाथ से मारे जाओ। बस, इतना सा ही मैंने वर माँगा है। यहाँ दूसरे किसी वर से क्या लेना है।
ऋषि कहते हैं – इस प्रकार धोखे में आ जाने पर जब उन्होंने सम्पूर्ण जगत में जल ही जल देखा तब कमलनयन भगवान से कहा – जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो जहाँ सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो।
ऋषि कहते हैं- तब तथास्तु कहकर शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान ने उन दोनों के मस्तक अपनी जाँघ पर रखकर चक्रसे काट डाले। इस प्रकार ये देवी महामाया ब्रह्माजी की स्तुति करने पर स्वयं प्रकट हुई थीं।

दुर्गा सप्तशती में भगवती दुर्गा के सुन्दर इतिहास के साथ-साथ गूढ़ रहस्यों का भी वर्णन किया गया है। राजा सुरथ ने भी दुर्गा आराधना से ही अखण्ड साम्राज्य प्राप्त किया था। न जाने कितने की आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु तथा मंत्र साधक माँ दुर्गा के सिद्ध मंत्र की साधना कर अपने मनोरथों को पूरा करने में सफलता प्राप्त कर चुके हैं। नवरात्रों अथवा ग्रहण काल में दुर्गा मंत्र की साधना कर आप भी अपने मनोरथ पूर्ण कर सकते हैं। यह मंत्र साधना सभी प्रकार के फल प्रदान करती है। ? ह्रीं दुं दुर्गायै नम: – यह आठ अक्षरों का भगवती दुर्गा का सिद्धि मंत्र है जिसका पाठ रक्तचन्दन की 108 दाने की माला से प्रतिदिन शुद्ध अवस्था में साधक को करना चाहिये।

साधना विधि – नवरात्र, सूर्य या चन्द्र ग्रहण के समय अथवा किसी भी शुभ मुहूर्त में इस साधना को करें। नवरात्र में पूरे 9 दिनों तक नियम के साथ दैनिक पूजन और मंत्र जप करें। ग्रहण काल में जितना समय ग्रहणकाल रहता है उतने ही समय तक मंत्र जाप साधना करनी चाहिये। नवरात्र के 9 दिनों की साधना में प्रतिदिन 27 माला जपने का विधान है। 9 दिनों में 24000 मंत्र जप के बाद 9वें दिन इसी मंत्र को पढ़ते हुए 108 बार आहुति देकर हवन करना चाहिये। इस प्रकार यह मंत्र सिद्ध हो जाता है। इस दुर्गा मंत्र का प्रभाव अचूक है।
यदि साधक ने 9 दिनों तक नियमित मंत्र जप और हवन की क्रिया पूरी कर ली तो वह कभी भी इस मंत्र को पढ़कर, दूब से जल छिड़कते हुये किसी की आपदाओं या बाधाओं का निवारण कर सकता है – चाहे कोई भी आर्थिक संकट हो, भूतादि ग्रहों की पीड़ा हो, प्रेत-पिशाच बाधा हो, दुर्भाग्य हो, नवग्रह पीड़ा हो, रोग अथवा बीमारी हो, शत्रु षडयंत्र की पीडा हो।
दुर्गाजी की प्रतिमा चित्र तथा श्री सिद्ध दुर्गा यंत्र जिसे नवार्ण मंत्र से प्रतिष्ठित किया गया हो। उसे लाल रंग के शुद्ध रेशमी कपड़े पर आसीन करके स्नान करायें। लाल चंदन, पुष्प, दीप व नैवेद्य अर्पित करें, फिर दुर्गाजी की स्तुति और ध्यान करें -

अध्यारूढ़ां मृगेन्द्रं सजल जलधर श्यामलां हस्त पद्मां।
शूलं वाणं कृपाणं त्वसि जलज गदा चाप पाशान् वहन्ती।
चंद्रोतंशां त्रिनेत्रां चितसृणिरसिमाखेटं विभ्रतीभि:।
कन्याभि: सेव्यमाना प्रतिभट भयदां शूलिनीं भावयाम:॥

ध्यान स्तुति के बाद परम तन्मय भाव से उपर्युक्त सिद्ध दुर्गा मंत्र का जाप करे। सिद्ध दुर्गा साधना के लिये सर्वप्रथम शुद्ध स्थान पर आसन बिछाकर, पूजा की सारी सामग्री पहले से वहां रख लें। ताम्र पत्र अथवा भोजपत्र पर रचित श्री सिद्ध दुर्गा यंत्र काठ के पीढ़े पर एक कपड़ा बिछाकर उस पर स्थापित करें। यंत्र तथा मूर्ति अथवा चित्र जो भी हो उसकी रक्त चंदन, पुष्प, अक्षत, धूप-दीपादि से पूजा करके रक्त चंदन की 108 दाने की माला से दुर्गा अष्टाक्षर मंत्र का 27 माला जप करें। जप के समय घी का दीपक दुर्गाजी के सम्मुख जलाये। विकल्प के रूप में मीठे तेल के दीपक से भी काम चलाया जा सकता है। इस उपासना के लिये ऊनी आसन का ही प्रयोज्य होता है। माला लाल चंदन की, कुशाग्रंथि की अथवा रुद्राक्ष की भी ले सकते हैं। रक्त चंदन की माला सर्वश्रेष्ठ होती है। जप के लिये अर्द्धरात्रि का समय उत्तम होता है।
मंत्र जप समाप्त होने पर पूजा से उठने के पूर्व क्षमा याचना करते हुये दुर्गा जीे की स्तुति पढऩी चाहिये। स्तुति पढऩे या याद करने में असुविधा हो तो के वल श्री दुर्गायै नम: का सात बार जप करके देवी की प्रतिमा को क्षमा याचना हेतु प्रणाम करना चाहिये। मंत्र जप हो जाने पर कभी भी, किसी भी प्रकार प्रतिकूलता के शमन की आवश्यकता पडने पर इसे पढ़ते हुए उस पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
-ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, सम्पादक, ज्योतिष का सूर्य, राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई-098271-98828
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