ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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गुरुवार, 31 मार्च 2011



शिक्षा की गुणवत्ता के नाम पर
शोषण..ठगी.. कालाबाजारी
विश्व स्तर पर आज हमारा भारत देश हर तरह से संपन्न और प्रगतिशील माना जाता हैं। आज देश ने आकाश से बढ़कर ब्रह्माण्ड को छूने में कामयाबी हासिल की हैं। लेकिन इस पूरे प्रगतिशील दौर में आज भी देश में शिक्षा का स्तर पहले अधिक चिंताजनक बना हुआ है। आज भले ही हमारे पास हर एक किलोमीटर पर स्कूल और पाठशालाएं मौजूद हों लेकिन शिक्षा का स्तर लगातार गिरता जारहा है। आज दौर में भले ही हमने ज्यादा से ज्यादा बच्चों को स्कूल में दाखिला दिला दिया हो लेकिन शिक्षा के पैमानों में इन बच्चों की स्थिति और भी अधिक चिंताजनक हो गई है। देश में सभी के लिए मुफ्त शिक्षा का बिल भले ही पास हो गया हो लेकिन यह आधारभूत अधिकार अभी भी केवल कागजों पर ही है। वर्ष 2002 में संविधान बच्चों को मुफ्त में शिक्षा देना को फंडामेंटल राइट में शामिल किया था। इसकी तरह काफी बहस के बाद  शिक्षा का अधिकार बिल भीपास कर दिया था।
स्कूली शिक्षा की समस्याओं पर विचार करने के सिलसिले में जो कुछ प्रश्न बार-बार उठाए जाते हैं वे हैं- शिक्षकों की अनुपस्थिति, अभिभावकों की उदासीनता, सही पाठय़क्रम का अभाव, अध्यापन में खामियां इत्यादि। परंतु इन समस्याओं को अलग-अलग रूप में देखा नहीं जा सकता, क्योंकि इनकी जड़ें सारी व्यवस्था में फैली हैं। इसलिए व्यवस्था में आमूल परिवर्तन लाना जरूरी है। इसके लिए हमें स्कूली शिक्षा व्यवस्था की मूल समस्याओं पर गौर करना होगा। पहली मूल समस्या है प्रवेश (ऐक्सेस) की कमी। आजादी के 62 साल बाद भी हमारे देश में करोड़ों बच्चे पढ़ाई से वंचित रह जाते हैं। पूरे देश में यह संख्या 30 प्रतिशत से कम नहीं होगी। दाखिले का अनुपात (ग्रॉस एनरोलमेन्ट रेशियो) सूचक नहीं हो सकता। क्योंकि दाखिल बच्चों में से अधिकांश विभिन्न कारणों से बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। आधुनिकतम सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कक्षा 10 तक पहुंचते-पहुंचते 61 प्रतिशत बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी थी। प्रवेश की समस्या के समाधान के लिए सबसे पहला कार्य होना चाहिए – अतिरिक्त स्कूलों का निर्माण, अतिरिक्त शिक्षकों की बहाली और अतिरिक्त शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों का निर्माण। शिक्षा की दूसरी मूल समस्या है, इसकी अति निम्न गुणवत्ता। इसे बढ़ाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपाय है न्यूनतम मानकों (नौर्म्स) का निर्धारण कर उन्हें सभी स्कूलों में लागू करना। शिक्षा अधिकार विधेयक की अनुसूची में कुछ मानक निर्धारित किए गए हैं। परंतु ये नितान्त अपर्याप्त हैं। अनेक अत्यावश्यक मानकों का इसमें जिक्र ही नहीं है जैसे- जन आबादी से स्कूल की दूरी, प्रति स्कूल और प्रति क्लास में छात्रों की संख्या, कक्षाओं में फर्नीचर, पाठय़-उपकरण, प्रयोगशाला का स्तर, शिक्षकों की योग्यता, प्रशिक्षण, वेतनमान एवं सेवा की शर्ते इत्यादि। कुछ मानकों का जिक्र तो है पर उनका स्पष्ट उल्लेख करने के बदले कहा गया है, ‘जैसा सरकार निर्धारित करे।’ इसका मतलब यह भी हो सकता है कि अयोग्य शिक्षकों (पैरा टीचर्स) की बहाली और बहु कक्षा पढ़ाई का मौजूदा सिलसिला जारी रहेगा। फिर तो गुणवत्ता की बात करना भी फिजूल है।
प्रवेश एवं गुणवत्ता, इन दोनों समस्याओं का असली कारण है वित्त का अभाव। शिक्षा अधिकार विधेयक से संलग्न वित्तीय स्मरण-पत्र में कहा गया है, ‘विधेयक को अमल में लाने के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधनों का परिणाम निर्धारित करना फिलहाल संभव नहीं है।’ यह कथन गलत है। पिछले 10 वर्षो में भारत के हर बच्चे को नि:शुल्क प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करने में जो खर्च होगा उसका कई बार अनुमान लगाया जा चुका है। 1999 में तापस मजूमदार समिति ने बताया कि इसके लिएअगले 10 वर्षों में 1,37,000 करोड़ अतिरिक्त रकम लगेगी। 2005 में शिक्षा-परामर्श बोर्ड (केब) के एक विशेषज्ञ दल ने अनुमान लगाया था कि इस पर 6 साल तक प्रतिवर्ष न्यूनतम 53,500 करोड़ और अधिकतम 73 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त व्यय होगा। फिलहाल प्रारंभिक शिक्षा के लिए सर्वशिक्षा अभियान के माध्यम से धनराशि उपलब्ध कराई जाती है। दसवीं पंचवर्षीय योजना की तुलना में करीब दोगुनी वृद्धि के बाद भी ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में सर्वशिक्षा अभियान के लिए प्रतिवर्ष करीब 30,000 करोड़ रुपए का प्रावधान है। इस रकम से न तो देश के सभी बच्चों को स्कूल में प्रवेश दिलाया जा सकता है और न गुणवत्ता में विशेष परिवर्तन लाया जा सकता है।
हमारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था की तीसरी मूल समस्या है, इसमें व्याप्त असमानता और भेदभाव। देश के सामाजिक वर्गीकरण के साथ-साथ हमारे यहां स्कूलों का भी वर्गीकरण है, जिसके मुताबिक धनी और विशिष्ट वर्ग के बच्चे ज्यादा फी वाले अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं, और गरीब व निम्न वर्ग के बच्चे जिनकी संख्या कुल स्कूली छात्रों का करीब 80 प्रतिशत है। इसके चलते देश का सामाजिक विभाजन और भी बढ़ता जा रहा है। सभी स्कूलों में न्यूनतम मानक लागू करना न केवल शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ा सकता है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में मौजूद भेदभाव को मिटाने में भी मदद कर सकता है। भेदभाव मिटाने का दूसरा उपाय है पड़ोस के स्कूल के सिद्धांत को लागू करना जिसके मुताबिक हर स्कूल को उसके लिए निर्धारित पोषक क्षेत्र अथवा पड़ोस के सभी बच्चों को दाखिला देना होगा। इसका भी शिक्षाधिकार विधेयक में कोई प्रावधान नहीं है। बल्कि, स्कूलों के वर्तमान वर्गीकरण को कायम रखने की व्यवस्था है।
देश के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा का अधिकार देने के बाद सरकार अब माध्यमिक शिक्षा का अधिकार भी देने जा रही है। मानव संसाधन विकास के अनुसार आने वाले पाँच वर्षों में माध्यमिक शिक्षा को भी बच्चों के मौलिक आधार के रूप में शामिल किया जा सकता है। जिसके तहत बच्चों के लिए माध्यमिक शिक्षा भी अनिवार्य व मुफ्त होगी। उल्लेखनीय है कि संसद ने पहले ही 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए मुफ्त तथा अनिवार्य शिक्षा बिल पारित किया था। इसके तहत शिक्षा बच्चों का मौलिक अधिकार बन गई थी। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के मुताबिक 2013 या 2015 तक सरकार बच्चों के लिए माध्यमिक शिक्षा भी मुफ्त व अनिवार्य कर सकती है। मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून को लागू करने में सरकार को पाँच साल में एक लाख 71 हजार 484 करोड़ रुपए खर्च करने पड़ेंगे और पाँच लाख दस हजार शिक्षकों को भर्ती करना पड़ेगा। इसी वर्ष 27 अगस्त को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून भारत के गजट में प्रकाशित हो गया। लेकिन अभी यह कानून लागू नहीं हुआ है।
हालांकि देश के 86वां संविधान संशोधन के अनुच्छेद 21(क) में शिक्षा को जोड़कर मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार 6 से 14 आयु समूह के बच्चों तक सीमित कर दिया था। यह बिल इसी अनुच्छेद के तहत लाया गया है। वर्ष १९५0 में जब संविधान ने सरकार को 14 वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा देने के निर्देश दिए थे, तब के सामाजिक-आर्थिक हालात आज से एकदम अलग थे। आज १२वीं कक्षा की परीक्षा पास किए बगैर रोजगार की बात तो दूर, आईटीआई व पॉलीटेक्निक या फिर अन्य किसी व्यावसायिक कोर्स में भी दाखिला नहीं मिल सकता, तो फिर देश के बच्चों को आजादी के बाद हर साल इंतजार करवाकर कौन-सा मौलिक अधिकार दिया जा रहा है?
ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में शिक्षा के क्षेत्र में सार्वजनिक-निजी सहभागिता (पीपीपी) का सिद्धांत लागू करने की नीति बन चुकी है। यानी अब सार्वजनिक धन का उपयोग सरकार शिक्षा के निजीकरण और बाजारीकरण के लिए करने जा रही है। कुछ प्रदेश सरकारों ने तो सरकारी स्कूलों को निजी कंपनियों को देने के लिए टेंडर तक जारी करने या फिर अन्य तरीकों से सौंपने की पूरी तैयारी कर ली है।अप्रैल2009 में योजना आयोग ने स्कूली शिक्षा को सार्वजनिक-निजी सहभागिता के सांचे में ढालने के लिए एक बैठक बुलाई थी, जिसमें १८ कॉपरेरेट घरानों के प्रतिनिधि मौजूद थे, एक भी शिक्षाविद् या शिक्षक नहीं था। शिक्षा को कारोबार में बदलने की इस घोषित सरकारी नीति के चलते इस बिल का खोखलापन अपने आप जाहिर हो जाता है।
वैश्वीकरण की नवउदारवादी नीति की तर्ज पर बने इस सरकारी बिल के पैरोकार सरकार के बाहर भी हैं। उनका कहना है कि यह बिल निजी स्कूलों की भी जवाबदेही तय करता है। उनका इशारा उस प्रावधान की ओर है, जो निजी स्कूलों में कमजोर वर्गो और वंचित समुदायों के बच्चों के लिए 25 फीसदी सीटें आरक्षित करता है। इनकी फीस सरकार की ओर से दी जाएगी। इससे बड़ा फूहड़ मजाक और क्या हो सकता था। एक, आज 6-14 आयु समूह के लगभग 20 करोड़ बच्चों में से ४ करोड़ बच्चे निजी स्कूलों में हैं। इनके 25 फीसदी यानी महज एक करोड़ बच्चों के लिए यह प्रावधान होगा। शेष बच्चों का क्या होगा? दूसरा, सब जानते हैं कि निजी स्कूलों में ट्यूशन फीस के अलावा अन्य कई प्रकार के शुल्क लिए जाते हैं, जिसमें कम्प्यूटर, पिकनिक, डांस आदि शामिल है। यह सब और इन स्कूलों के अभिजात माहौल के अनुकूल कीमती पोशाकें गरीब बच्चे कहां से लाएंगे? इनके बगैर वे वहां पर कैसे टिक पाएंगे? तीसरा, यदि किसी तरह वे 8वीं कक्षा तक टिक भी गए, तो उसके बाद उनका क्या होगा? ये बच्चे फिर सड़कों पर आ जाएंगे जबकि उनके साथ पढ़े हुए फीस देने वाले बच्चे १२वीं कक्षा पास करके आईआईटी व आईआईएम या विदेशी विश्वविद्यालयों की परीक्षा देंगे। इन सवालों का एक ही जवाब था- समान स्कूल प्रणाली जिसमें प्रत्येक स्कूल (निजी स्कूलों समेत) पड़ोसी स्कूल होगा।
सुप्रीम कोर्ट के उन्नीकृष्णन फैसले (1993) के अनुसार अनुच्छेद ४१ के मायने हैं कि शिक्षा का अधिकार 14 वर्ष की आयु में खत्म नहीं होता, वरन सैकंडरी व उच्चशिक्षा तक जाता है। फर्क इतना है कि 14 वर्ष की आयु तक की शिक्षा के लिए सरकार पैसों की कमी का कोई बहाना नहीं कर सकती, जबकि सैकंडरी व उच्चशिक्षा को देते वक्त उसकी आर्थिक क्षमता को ध्यान में रखा जा सकता है। जनता को उम्मीद थी कि यह बिल उच्चशिक्षा के दरवाजे प्रत्येक बच्चे के लिए समानता के सिद्धांत पर खोल देगा। तभी तो रोजगार के लिए सभी समुदायों के बच्चे बराबरी से होड़ कर पाएंगे और साथ में भारत की अर्थव्यवस्था में समान हिस्सेदारी के हकदार बनेंगे। क्या ऐसे कानून के लिए और आधी सदी तक इंतजार किया जाए या संसद पर जन-दबाव बनाकर इसी बिल में यथोचित संशोधन करवाने के लिए कमर कसी जाए?
इन सभी सरकारी आंकड़ों से शिक्षा की कार्यशैली से तो आम जनता को भ्रमित किया जा सकता है ।पर शिक्षा के लिए शिक्षायोजना अधिकार का क्रियांवयन होना जरूरी है.सिर्फ शिक्षा का मौलिक अधिकार का कानून सरकारी दस्तावेजों से ही नहीं मिल सकताहै। सरकारी और गैर सरकारी संगठनो को अब जड़ चेतनके साथ जुडकर शुरूआत करनी होगी। आम जनता की भागीदारी के लिए मीड़िया को भी सामने आना होगा लोगों को जागरूक और प्रोत्साहित करना होगा। शिक्षा के इस अधिकार को पूरी तरह से सफल बनाने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार किया जा सकता है।
1. शिक्षित युवाओं को शिक्षक बननेकी राह में प्रोत्साहित किया जाना चाहिए एवं उचित ट्रेनिंग और आय देना चाहिए।
2. सरकार को स्कूली पाठ्यक्रम में अधिक गुणवत्ता के साथ शिक्षा की उचित व्यवस्था पर केंद्रित होना चाहिए।
3. इस चुनौती को जन भागीदारी,मीड़िया, और गैर सरकारी संगठनों द्वारा एक साथ मिलकर किया जाना चाहिए।
4. सिर्फ शहरों और जिलो तक ही सीमित ना रह कर गांवों और छोटे कस्बों तक शिक्षा के सही मायनों को पहुचाना होगा। शिक्षा नीति के सही क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे महाराज (सम्पादक)
'ज्योतिष का सूर्य' (हिन्दी मासिक पत्रिका)
भिलाई,दुर्ग (छ.ग.)

क्या इन अधिकारीयों को छोड़ना उइन अधिकारीयों को छोड़ना उचित होगा।


क्या इन अधिकारीयों को छोड़ना उइन अधिकारीयों को छोड़ना उचित होगा।
जानकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि मै भारत जैसे दुनिया के सबसे अजीब देश में रह रहा हूँ ! क्या कहने इस देश के ! खैर अब आते हैं मूल मुद्दे पर ! काफी दिनों से व्यापक रूप से बहस चल रही है कि जनता बेवकूफ है जो गंदे नेताओं को चुनती है, नेता गंदे हैं, पुलिस भ्रष्ट है, सेना ऐसी है, वो वैसा है , मीडिया न जाने कैसी है , और फलां फलां फलां..!
शर्म तब आई जब २१वि शदी की सबसे जागरूक जनता के सामने यह सब घटित होते देख रहा हूँ और हम सब इन चीजों को स्वीकार करने के लिए बाध्य हैं ! चीखना चिल्लाना कब तक करे, किस से करे ? सड़क पर जाके लोगो को आप लाख बताइए , लोग फिर अगले चुनाव में वही रंग रूप दिखाएंगे ! कोई लाल रंग के पीछे भागेगा और कोई हरे तो कोई बैंगनी ! कोई पंजे कि तरफ तो कोई कमल के फूल कि तरफ ! और काहिर ये लोग भी तो वही हैं जो हम आप हैं ! मीडिया में भी वही लोग हैं हमारे आपके जैसे ! असल में ये भारत के पानी, मिटटी, हवा का असर है !" सब चलता है यहाँ " !
जब छत्तीसगढ़ के तमाम हीस्सों में आये दीन एक के बाद एक अदधिकारी,पटवारी से लेकर आयूक्त स्तर के धोखेबाज अफसरानों की लम्बी फेहरिश्त रिश्वत-खोरी में रंगे हाथ पकड़े जाते हैं. पकड़ने की बात तो समाचार पत्रों में जरूर आ दो-चोर दिन आती है लेकिन ठोस-सबुत के अभाव में और राजनेताओं के दबाव के कारम चार दिनों के बाद मामला ठंडा पड़ जाता है। और वह अधिकारी पुनः उसी पद पर बहाल हो जाता है। ऐसे में क्या इन अधिकारीयों को छोड़ना उइन अधिकारीयों को छोड़ना उचित होगा।
और ऐसे समाज जहाँ सरकार के पास तंत्र है इन लोगों पर लगाम कसने के लिए, वो भी चुप ! चुनाव आयोग जो कि बहुत से सराहनीय प्रयास करता आ रहा है ऐसे अवांछनीय तत्वों को रोकने के लिए, वो भी क्यों चुप है ! क्यों न ममता दीदी पर ऐसे लोगो का खुले आम साथ देने के लिए चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी जाए !
क्या इन घटनाओं को स्वीकार करके हम ऐसे अवांछनीय तत्वों को बढ़ावा नही दे रहे ? और हमारे जवानो के मनोबल का क्या , जो अपनी जान पे खेल के इनसे लोहा ले रहे हैं दिन रात ! और शायद कुछ जवानो कि ड्यूटी उस दिन इन देश विरोधी ताकतों कि सुरक्षा में भी लगी हो !
गरीबी, बेरोजगारी, भूखमरी जैसी लाख समस्याओं के बावजूद ऐसी चीजे मन को झकझोर देती हैं ! ऐसे लोगो के लिए तिरंगे कि भी क्या कीमत होगी !
उनका सर तो सिर्फ लाल झंडे के सजदे में झुकता होगा !

समय है परिवर्तन का ! युवा नेतृत्व और सोच को आगे लाने का !!
हाथ बढ़ाएँ, हाथ मिलाएं !

मोहाली सेमी फाईनल की भविष्य वाणी सच हुयी..

मोहाली सेमी फाईनल की भविष्य वाणी सच हुयी..
प्यारे मित्रों,
क्रिकेट एक खेल है जो केवल भाग्य के बल बुते और अथक प्रयास से ही जीता जा सकताहै मने कल अभी '' तक न्यूज (टीवी) चैनल '' पर भविष्यवाणी ग्रह-गोचर के आधार पर किया था । कि ' भारत का मोहाली में जीतना तय है 'वह सत्य हुयी । रात को इस सेमिफाईनल मैच में जब सचिन जी अभी दो ही बार बाल-बाल आउट होने से बचे तो हमारे एक परममित्र का फोन आया कि- महाराज जी लगता है भारत हार जायेगा क्योंकि सचिन का लक साथ नहीं दे रहा है। मैने उनको जवाब दिया कि -भाई साहब कोई भी ज्योतिषिय भविष्यवाणी किसी के वर्तमान की परिस्तिति को देखकर नही किया जाता । आप निश्चिन्त रहीए भारत की जीत तय है। हाँ सचिन की भूमिका अहम रहेगी। इसी क्रम में हमारे प्रिय मित्र एवं बड़े भाई ' सम्पूणानन्द पान्डेय ' जी का फेस बुक पर सन्देश आया कि मोहली में क्या होगा
मैने उनको जवाब दिया कि भारत का जीतना तय है और सचिन का बल्ला बी चलेगा लेकिन 100 शतक नहीं बन पायेगा।
ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे महाराज (सम्पादक)
'ज्योतिष का सूर्य' (हिन्दी मासिक पत्रिका)
भिलाई,दुर्ग (छ.ग.)

बुधवार, 30 मार्च 2011

अप्रैल-फूल का मतलब महामूर्ख -दिवस नहीं..

अप्रैल-फूल का मतलब महामूर्ख -दिवस नहीं..
एक अप्रैल का ऐतिहासिक ऱूप से भारतीय संस्कृति से रहा है। आज के बदलते परिवेश मेंयह केवल मज़ाक के जरिए एक-दूसरे को सार्वजनिकरूप से मूर्ख बनाने का संवैधानिक अधिकार हर आदमी को फोकट में मिल जाता है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि इस दिन के अलावा आदमी आदमी को मूर्ख बनाता ही नहीं है। मगर इस दिन जिस भक्ति भाव से आदमी वॉलेंटियरली मूर्ख बनने को उत्साहपूर्वक राजी हो जाता है,उसके इसी मूढ़ उल्लास ने अप्रैल फूल के पावन पर्व को दुनिया का नंबर एक त्योहार बना दिया है। आखिर आदमी इस दिन मूर्ख बनने को इतना उत्साहित रहता क्यों है,इसका जवाब मेरे अलावा दुनिया के किसी समझदार आदमी के पास नहीं है। विश्वकल्याण की उत्सवधर्मी भावुकता से ओतप्रोत होकर जिसे मैं जनहित में आज सार्वजनिक कर रहा हूं। शर्त ये है कि इसे आप अप्रैल फूल का मज़ाक कतई न समझें। तो ध्यान से सनिए- यह त्योहार उस महान शैतान के प्रति आदमजात के अखंड एहसानों के इजहार का त्योहार है,जिस दिन उसने स्वर्ग के इकलौते आदमी और औरत को वर्जित सेव खिलानें का धार्मिक कार्य किया था। वह एक अप्रैल का ऐतिहासिक दिन था। जब सेव का मज़ा चखने के जुर्म में इस जोड़े को तड़ीपार के गैरवपूर्ण अपमान से सम्मानित करके ईश्वर ने दुनिया में धकेल दिया था। न शैतान सेव खिलाता न दुनिया बसती। मनुष्य जाति को बेवकूफ बनाने के धारावाहिक सीरियल का ये सबसे पहला एपीसोड था। आज भी धारावाहिकों के जरिए आदमी को बेवकूफ बनाने का ललित लाघव पूरी शान से जारी है। सारी दुनिया उस शैतान की एहसानमंद है जिसके एक ज़रा से मजाक ने सदियों से वीरान पड़ी दुनिया बसा दी। ज़रा सोचिए अगर ये दुनिया नहीं बसती तो आजके प्रॉपर्टी डीलरों की मौलिक प्रजाति तो अप्रकाशित ही रह जाती। इसीलिए शैतान और शैतानी को जितने पवित्र मन से यह लोग सम्मानित करते हैं,दुनिया में और कोई नहीं करता। ये दुनिया एक शैतान की शैतानी का दिलचस्प कारनामा है। जहां चोर है,सिपाही है। मुहब्बत है,लड़ाई है। बजट है,मंहगाई है। इश्क है,रुसवाई है।नेता है,झंडे हैं। मंदिर हैं,पंडे हैं। तिजोरी है,माल है। ये सब अप्रैल फूल का कमाल है। दुनिया वो भी इतनी हसीन और नमकीन कि देवता भी स्वर्ग से एल.टी.ए.लेकर धरती पर पिकनिक मनाने की जुगत भिड़ाते हैं। और अपनी लीलाओं से मानवों को अप्रैल फूल बनाते हैं,कभी-कभी खु़द भी बन जाते हैं। विद्वानों का तो यहां तक मानना है कि देवता इस धरती पर आते ही लोगों को अप्रैल फूल बनाने के लिए हैं,क्योंकि स्वर्ग में इसका दस्तूर है ही नहीं। यह तो पृथ्वीवासियों की ही सांस्कृतिक लग्जरी है। जो शैतान के सेव की सेवा से आदम जात को हासिल हुई है। देवता इसे मनाने के लिए अलग-अलग डिजायन के बहुरूपिया रूप धरते हैं। वामन का रूप धर के तीन पगों में तीन लोकों को नापकर राजा बली को बली का बकरा मिस्टर विष्णु ने पहली अप्रैल को ही बनाया था। अप्रैल फूल बनाने का चस्का फिर तो इन महाशयजी को ऐसा लगा कि अगले साल मोहनीरूप धर के भस्मासुर नाम के किसी शरीफ माफिया का बैंड बजा आए। तो किसी साल शेर और आदमी का टू-इन-वन मेकअप करके हरिण्यकश्यपु नामक अभूतपूर्व डॉन को भूतपूर्व बना आए। अप्रैल फूल की विष्णुजी की इस सनसनाती मस्ती को देखकर अपने जी स्पेक्ट्रमवाले राजा नहीं,सचमुच के स्वर्ग के, सच्चीमुच्ची के राजा इंद्र का भी मन ललचा उठा। इंद्रासन छोड़कर,सारे बंधन तोड़कर पहुंच गए मुर्गा बनकर गौतम ऋषि के आश्रम पर। ऐसी कुंकड़ूं-कूं करी कि भरी रात में ही अपने अंडर गारमेंट्स लिए बाबा गौतम पहुंच गए नदी पर नहाने। वहां आदमी-ना-आदमी की जात। समझ गए कि किसी ने अप्रैल फूल बना दिया है। मुंह फुलाए घर पहुंचे तो अपने डमी-डुप्लीकेट को बेडरूम से खिसकते पाया। अप्रैल फूल बनने की खुंदक शाप देकर वाइफ पर उतारी। शिला बन गई बेचारी। जब दैत्यों को भनक लगी कि स्वर्ग से आकर देवता अप्रैल फूल- अप्रैल फूल खेल रहे हैं तो उन्होंने भी देवताओं को अप्रैल फूल बनाने की ठान ली। सोने का हिरण बनकर,अपने पीछे दौड़ाकर जहां मारीचि ने श्रीयुत रामचंद्र रघुवंशीजी को अप्रैल फूल बना दिया,वहीं रावण ने साधु का वेश धारण कर सीताजी को लक्ष्मण-रेखा लंघवाकर हस्बैंड-वाइफ दोनों को अप्रैल फूल बना डाला। ये त्योहार है ही ऐसा। देवता और दैत्य सब एक-दूसरे से मज़ाक कर लेते हैं। फर्श ऐसा लगे जैसे पानी का सरोवर। महाभारत काल में ऐसे ही स्पेशल डिजायन के महल में दुर्योधन को बुलाकर द्रौपदी ने उसे अप्रैल फूल बनाया था। मगर दुर्योधन हाई-ब्ल्ड-प्रेशर का मरीज था।मज़ाक में भी खुंदक खा गया। और उसने अगले साल चीर हरण के सांस्कृतिक कार्यक्रम के जरिए द्रौपदी को अप्रैल फूल बनाने की रोमांचक प्रतिज्ञा कर डाली। मगर द्रौपदी के बाल सखा मथुरावासी श्रीकृष्ण यादवजी को भनक लग गई। ऐन टाइम पर साड़ी का ओवर टाइम उत्पादन कर के उन्होंने कौरवों की पूरी फेमिली को ही अप्रैल फूल बना दिया। मज़ाक को मजाक की तरह ही लेना चाहिए। अब हमारे नेताओं को ही लीजिए। पूरे पांच साल तक जनता को अप्रैल फूल बनाते हैं। कभी मूड में आकर कहते हैं कि हम भ्रष्टाचार मिटा देंगे। जनता तारीफ करती है। कि नेताजी का क्या गजब का सेंस ऑफ ह्यूमर है। फिर नेताजी भ्रष्टाचार,घोटाले में फंस जाते हैं। जनता हंसती है- अब नेताजी कुछ दिन सीबीआई-सीबीआई खेलेंगे। हाईकमान ने तो क्लीनचिट देने के बाद ही घोटाला करवाया है,नेताजी से। सब अप्रैल फूल का मामला है। इसका अंदाज ही निराला है। पूरा जी स्पैक्ट्रमवाला है। कसम,कॉमनवेल्थ गेम की। हम सब भारतवासी खेल के नाम पर भी खेल कर जाने वाले खिलाड़ियों के खेल को भी खेल भावना से ही लेते हैं। अप्रैल फूल त्योहार की अपनी अलग कूटभाषा है। जिसने बना दिया वो सिकंदर जो बन गया वो तमाशा है। अप्रैल फूल,मूर्ख बनाने का मुबारक जलसा, जो भारत से ही दुनिया के दूसरे देशों में एक्सपोर्ट हुआ है। हमारे आगे टिकने की किसमें दम है। न्यूजीलैंड,इंग्लैंड,आस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका में दोपहर के 12 बजे तक ही अप्रैल फूल का मजाक चलता है। फ्रांस,अमेरिका,आयरलैंड,इटली,दक्षिण कोरिया.जापान,रूस,कनाडा और जर्मनी में यह पूरे दिन चलता है। मगर हमारे देश में यह मज़ाक जीवन पर्यंत चलता है। अप्रैल फूल के मजाक को याद करके हम भारतवासी मरणोपरांत भी हंसते रहते हैं। और जबतक ज़िंदा रहते हैं नमक और मिर्च को बांहों में-बांहें डाले अपने ही जख्म के रेंप पर डांस करता देखकर बिलबिलाकर उनके साथ भरतनाट्यम करते हुए अप्रैल फूल –जैसे प्राचीन पर्व की आन-बान-शान को हम ही बरकरार रखते हैं। अप्रैल फूल त्योहार का कच्चा माल हम भारतीय ही हैं। अप्रैल फूल मनाने का ग्लोबल कॉपीराइट भारतीयों के ही पास है।क्योंकि सबसे पहले अप्रैल फूल बननेवाले इस दुनिया में ही नहीं जन्नत में भी हम भारतीय ही थे। शैतान के सेव के सनातन सेवक। वसुधैव कुटुंबकम..सारी दुनिया हमारी ही फेमली है। और अप्रैल फूल हमारा ही फेमिली फेस्टिवल है

सोमवार, 28 मार्च 2011

''ज्योतिष का सूर्य'' (हिन्दी मासिक पत्रिका)


''ज्योतिष का सूर्य'' (हिन्दी मासिक पत्रिका)
 राष्ट्र चेतना एवं ज्योतिष पर आधारित छत्तीसगढ़ का एकमात्र  ज्योतिष का सूर्य (हिन्दी मासिक पत्रिका) अब लोकप्रियता के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में अहम भूमिका नीभा रही है।
उद्देश्य :-
1. ज्योतिष विज्ञानं तथा ज्योतिष विज्ञानं से संबंधित सभी विधाओं एवं विद्याओं का प्रचार एवं प्रसार किया जा रहा है|
2. ज्योतिष विज्ञानं तथा इससे संबंधित विद्याओं का शैक्षणिक संसथान स्थापित कर रही है |
3. ज्योतिष विज्ञानं संबंधित विद्याओं और विद्याओं पर आधारित पुस्तक पत्रिका तथा अन्य प्रकाश्य सामग्री प्रकाशित करना |
4. ज्योतिष विधा पर राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन, सेमिनार, संगोष्ठी शिविर, प्रवचन एवं सभाएं आयोजित करना |
5. जन कल्याणार्थ शैक्षणिक एवं विकासोन्मुख क्रियाकलापों से सम्बंधित गोष्ठियां, सभा, सेमिनार, सिम्पोजिय, वाद-विवाद प्रतियोगिता, क्विजेज,   फ़रम,पर्यटन,     वन-विज्ञानं, प्रदर्शनी आदि का आयोजन करना विश्वस्तर पर पूरी दुनिया में |
6. ज्योतिष विज्ञानं (शास्त्र) तथा इससे सम्बंधित प्राचीन ग्रंथो एवं नवीन पुस्तकों का संचय करना तथा सुरक्षित रखना, शोध-शैक्षणिक व्यवस्था हेतु उपकरणों और अन्य वस्तुओं का क्रय-विक्रय करना, आयत-निर्यात करना साथ ही निर्माण करना|
7. देश में प्रचलित परम्परागत शिक्षा पद्धति का विश्वव्यापी प्रचार करने के लिए वैदिक ज्योतिष का पोर्टल स्थापित करना, इसपर भारतीय ज्योतिष देश-विदेश की शिक्षा संस्थाओं में एवं शैक्षिक पत्याकर्मो की जानकारी ज्योतिष शिक्षा राष्ट्रीय/अंतराष्ट्रीय संसथान, विश्वविद्यालय, विश्वज्योतिष अध्यातम विश्वविध्यपिठ कीस्थापना करना तथा अन्यान्य परम्परागत वेद्शालावों एवं ज्योतिष के क्षेत्र में कार्यरत स्वयंसेवी संस्थाओ एवं विद्वान देवज्ञों से संपर्क बनाना, जानकारी लेना तथा दुर्लभ ग्रन्थ एवं पांडुलिपियों को रोमन लिपि में तथा संस्कृत के साथ हिंदी व अंग्रेजी में अनुवाद किया जाता है |
8 . समाज के जैव सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक पहलुओं पर अनुसंधात्मक कार्य किया जाना, संसार के सभी धर्म, जाती, लिंग आदि भेदभावों से पुरे रहकर निःस्वार्थ कार्य करना| मानवशास्त्र और ज्योतिष से सम्बंधित विषयों पर अन्वेषनात्मक कार्य करना | वातावरण विज्ञान, मौसम विज्ञान, खगोल शास्त्रीय मान्यताएं, अध्यात्म-सिन्धु आदि से सम्बंधित मानवीय कल्याण के विभिन्न स्रोतों को अध्ययन क्षेत्र में रखा जाना|
9 . ज्योतिष विज्ञान से सम्बंधित विद्याओं एवं विद्याओं के सन्दर्भ में जन्मकुंडली निर्माण, वर्षफल, जीवन का सम्पूर्ण फलादेश, राष्ट्रीय पंचांग, जंत्री, कैलेण्डर, मासिक पत्रिका, (वेद-वेदांत) साप्ताहिक समाचार-पत्र, पत्र-पत्रिकाएं तथा अन्य पठन सामग्री जन्कल्यानार्थ विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित करना, क्रय-विक्रय करना और आयत-निर्यात करना |
10 . ज्योतिष विज्ञान पद्धति द्वारा वैकल्पिक चिकित्सा से विभिन्न रोगों का निदान करना | यन्त्र-तंत्र-मंत्र एवं अध्यात्म-योग्य सम्बंधित विद्याओं और विद्याओं द्वारा अंधविश्वास, भय, भ्रम एवं ठागगिरी आदि से लोगों को बचाना एवं दोषी लोगों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराकर क़ानूनी करवाई करना |
11. अध्यातम ज्योतिष विज्ञान, तंत्र-यन्त्र-मंत्र, विद्या द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले रत्ना, उपरत्न, रत्नों के पेड़-पोधे, , यन्त्र, रुद्राक्ष एवं रत्नों की मूर्ति का उत्पादन, निर्माण, क्रय-विक्रय, आयात-निर्यात करना तथा जन-कल्याणार्थ निःशुल्क परीक्षण करना |
12. संस्थान ज्योतिष प्रेमी/ विद्यार्थी/शोधकर्ता छात्र-छात्राओं के उच्च शिक्षा हेतु नियमित / पत्राचार द्वारा ज्योतिष विज्ञान के अंतर्गत वैदिक विज्ञान, मौसम विज्ञान, प्राच्य पराविद्या, खगोलशास्त्र, धर्म, अध्यातम, आत्मचिंतन, अंकविद्या,हस्तरेखा ज्ञान, हस्ताक्षर-विज्ञान, वास्तु-फेंगसुई, पिरामिड, यन्त्र-मंत्र-तंत्र कर्मकांड, स्वाध्याय, साधना, प्राणायाम, योग, ध्यान, रेकी विद्या, एक्युप्रेशर चिकित्षा, ज्योतिष, सम्मोहन, चुम्बकीय चिकित्षा, रत्न विज्ञान, रंग चिकित्षा, मुखाकृति चिकित्षा, रत्न विज्ञान, रंग चिकित्षा, मुखाकृत विज्ञान आदि विषयों के शिक्षा ज्ञान की व्यवस्था है |
13. वेद कर्मकांड, भवन निर्माण तथा भू-खंड चयन हेतु फेंगसुई ज्ञाता/वास्तुशास्त्री उपलब्ध कराना, सभी प्रकार की समस्याओं का सरल व सस्ता समाधान करना, कंप्यूटर, दूरभाष, दूरदर्शन, चलचित्र, आकाशवाणी एवं अन्य संचार साधनों द्वारा ज्योतिष विज्ञान इससे सम्बंधित विधाओं एवं विद्याओं के सन्दर्भ में जानकारी तथा सूचनाएं प्राप्त करना और उपलब्ध कराना | ज्योतिष के आवश्यक पहलुओं को उजागर करनी तथा प्रचार-प्रसार हेतु फिल्म (चलचित्र) निर्माण करना, दूरदर्शन द्वारा लोकहित में प्रदर्शन करना|
14 . संस्थान  सभी धर्मो के, सभी क्षेत्रों के विद्धान, ज्योतिष दैवज्ञ, बुजुर्ग पंडितों पादरी, बौद्धभिक्षु, जैन सन्यासियों/साध्वी, सिक्ख, मौलाना, कर्म कंदियों व देवज्ञ मनीषियों के 60 वर्ष के बाद आवश्यकता पूर्ति हेतु धर्मार्थ, कल्याणार्थ पेंशन दिलाने हेउ भारत सर्कार से संपर्क करना | पीड़ित, बीमार, अस्वस्थ्य भारतीय विद्धान, साहित्यकार, कवि वैज्ञानिक, शोधकर्ताओं एवं ज्योतिष दैवज्ञों को हर संभव मदद करेगी | विश्व के किसी भी रास्ट्र, राज्य व किसी भी विषय के विद्वान सहित ज्योतिष-मनीषियों के मान-मर्यादा की रक्षा करेगी एवं संस्था के सभी ज्योतिष-विज्ञानों के लिए ग्रुप-इंश्योरेंस, व्यक्तिगत बिमा योजना की भी व्यवस्था करना ताकि भविष्य सुरक्षित हो | संस्था द्वारा सभी शाखा में फर्स्ट एड बाक्स की भी व्यवस्था करना |
15 . ज्योतिष विद्या सम्बंधित सरकारी , गैर सरकारी, देशी-विदेशी संस्थाओं से संपर्क स्थापित कार मान्यता प्राप्त करना एवं सहयोग प्राप्त करना तथा प्रदान करना होगा |
१६. ज्योतिष संबंधित विद्वान विभूतियों का विशिष्ठ सम्मान करना एवं जयंती मनाना | तथा सम्मानित किया जाता है |
१७. विश्वस्तरीय ज्योतिष विज्ञान के शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्थापित कर संचालित किये जा रहे है |
१८. यह संस्थान ज्योतिष के क्षेत्र में अब अध्ययन एवं शोध के क्षेत्र में कार्यरत ज्योतिष विद्वान, शिक्षण संस्थानों एवं स्वयंसेवी संस्थान के ज्योतिष दैवज्ञों हेतु उपरोक्त कार्य विश्व कल्याणार्थ किये जायेंगे | ज्योतिष विज्ञान के प्रायोगिक अनुसंधानों को गति देने तथा गहन अनुसंधात्मक कार्यकर्मों के क्रियान्वयन हेतु कार्य करना |
१९ . नवग्रह सताइस नक्षत्र एवं बारह राशियों से सम्बंधित जरी (मूल), पोधे
एवं वृक्ष का रोपण करना तथा पौधशाला का निर्माण करना |
२0 पुरुष, महिला सहित सभी प्राणियों की सेवा करना, आर्यावर्त सहित विश्व के सभी विश्वविद्यालयों में संस्कृत व ज्योतिष को नियमित पाठ्यकर्म में लागु करने हेतु हर संभव प्रयत्न करना एवं शिक्षा को घर-घर तक पहुँचाना साथ ही साक्षर बनाना |
२१ . रास्ट्र कल्याण हेतु उन सभी कार्यो को करना जो समाज के लिए उपयोगी सिद्ध हो |-------------------------------------------
ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे महाराज (अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त )
सम्पादक ,ज्योतिष का सूर्य (हिन्दी मासिक पत्रिका)
जीवन ज्योतिष भवन,कोहका मेन रोड,सड़क-26,शांतिनगर,भिलाई,दुर्ग (छ.ग.)
मोबा.नं.09827198828

''ज्योतिष का सूर्य'' (हिन्दी मासिक पत्रिका)

''ज्योतिष का सूर्य'' (हिन्दी मासिक पत्रिका)
 राष्ट्र चेतना एवं ज्योतिष पर आधारित छत्तीसगढ़ का एकमात्र  ज्योतिष का सूर्य (हिन्दी मासिक पत्रिका) अब लोकप्रियता के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में अहम भूमिका नीभा रही है।
उद्देश्य :-
1. ज्योतिष विज्ञानं तथा ज्योतिष विज्ञानं से संबंधित सभी विधाओं एवं विद्याओं का प्रचार एवं प्रसार किया जा रहा है|
2. ज्योतिष विज्ञानं तथा इससे संबंधित विद्याओं का शैक्षणिक संसथान स्थापित कर रही है |
3. ज्योतिष विज्ञानं संबंधित विद्याओं और विद्याओं पर आधारित पुस्तक पत्रिका तथा अन्य प्रकाश्य सामग्री प्रकाशित करना |
4. ज्योतिष विधा पर राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन, सेमिनार, संगोष्ठी शिविर, प्रवचन एवं सभाएं आयोजित करना |
5. जन कल्याणार्थ शैक्षणिक एवं विकासोन्मुख क्रियाकलापों से सम्बंधित गोष्ठियां, सभा, सेमिनार, सिम्पोजिय, वाद-विवाद प्रतियोगिता, क्विजेज,   फ़रम,पर्यटन,     वन-विज्ञानं, प्रदर्शनी आदि का आयोजन करना विश्वस्तर पर पूरी दुनिया में |
6. ज्योतिष विज्ञानं (शास्त्र) तथा इससे सम्बंधित प्राचीन ग्रंथो एवं नवीन पुस्तकों का संचय करना तथा सुरक्षित रखना, शोध-शैक्षणिक व्यवस्था हेतु उपकरणों और अन्य वस्तुओं का क्रय-विक्रय करना, आयत-निर्यात करना साथ ही निर्माण करना|
7. देश में प्रचलित परम्परागत शिक्षा पद्धति का विश्वव्यापी प्रचार करने के लिए वैदिक ज्योतिष का पोर्टल स्थापित करना, इसपर भारतीय ज्योतिष देश-विदेश की शिक्षा संस्थाओं में एवं शैक्षिक पत्याकर्मो की जानकारी ज्योतिष शिक्षा राष्ट्रीय/अंतराष्ट्रीय संसथान, विश्वविद्यालय, विश्वज्योतिष अध्यातम विश्वविध्यपिठ कीस्थापना करना तथा अन्यान्य परम्परागत वेद्शालावों एवं ज्योतिष के क्षेत्र में कार्यरत स्वयंसेवी संस्थाओ एवं विद्वान देवज्ञों से संपर्क बनाना, जानकारी लेना तथा दुर्लभ ग्रन्थ एवं पांडुलिपियों को रोमन लिपि में तथा संस्कृत के साथ हिंदी व अंग्रेजी में अनुवाद किया जाता है |
8 . समाज के जैव सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक पहलुओं पर अनुसंधात्मक कार्य किया जाना, संसार के सभी धर्म, जाती, लिंग आदि भेदभावों से पुरे रहकर निःस्वार्थ कार्य करना| मानवशास्त्र और ज्योतिष से सम्बंधित विषयों पर अन्वेषनात्मक कार्य करना | वातावरण विज्ञान, मौसम विज्ञान, खगोल शास्त्रीय मान्यताएं, अध्यात्म-सिन्धु आदि से सम्बंधित मानवीय कल्याण के विभिन्न स्रोतों को अध्ययन क्षेत्र में रखा जाना|
9 . ज्योतिष विज्ञान से सम्बंधित विद्याओं एवं विद्याओं के सन्दर्भ में जन्मकुंडली निर्माण, वर्षफल, जीवन का सम्पूर्ण फलादेश, राष्ट्रीय पंचांग, जंत्री, कैलेण्डर, मासिक पत्रिका, (वेद-वेदांत) साप्ताहिक समाचार-पत्र, पत्र-पत्रिकाएं तथा अन्य पठन सामग्री जन्कल्यानार्थ विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित करना, क्रय-विक्रय करना और आयत-निर्यात करना |
10 . ज्योतिष विज्ञान पद्धति द्वारा वैकल्पिक चिकित्सा से विभिन्न रोगों का निदान करना | यन्त्र-तंत्र-मंत्र एवं अध्यात्म-योग्य सम्बंधित विद्याओं और विद्याओं द्वारा अंधविश्वास, भय, भ्रम एवं ठागगिरी आदि से लोगों को बचाना एवं दोषी लोगों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराकर क़ानूनी करवाई करना |
11. अध्यातम ज्योतिष विज्ञान, तंत्र-यन्त्र-मंत्र, विद्या द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले रत्ना, उपरत्न, रत्नों के पेड़-पोधे, , यन्त्र, रुद्राक्ष एवं रत्नों की मूर्ति का उत्पादन, निर्माण, क्रय-विक्रय, आयात-निर्यात करना तथा जन-कल्याणार्थ निःशुल्क परीक्षण करना |
12. संस्थान ज्योतिष प्रेमी/ विद्यार्थी/शोधकर्ता छात्र-छात्राओं के उच्च शिक्षा हेतु नियमित / पत्राचार द्वारा ज्योतिष विज्ञान के अंतर्गत वैदिक विज्ञान, मौसम विज्ञान, प्राच्य पराविद्या, खगोलशास्त्र, धर्म, अध्यातम, आत्मचिंतन, अंकविद्या,हस्तरेखा ज्ञान, हस्ताक्षर-विज्ञान, वास्तु-फेंगसुई, पिरामिड, यन्त्र-मंत्र-तंत्र कर्मकांड, स्वाध्याय, साधना, प्राणायाम, योग, ध्यान, रेकी विद्या, एक्युप्रेशर चिकित्षा, ज्योतिष, सम्मोहन, चुम्बकीय चिकित्षा, रत्न विज्ञान, रंग चिकित्षा, मुखाकृति चिकित्षा, रत्न विज्ञान, रंग चिकित्षा, मुखाकृत विज्ञान आदि विषयों के शिक्षा ज्ञान की व्यवस्था है |
13. वेद कर्मकांड, भवन निर्माण तथा भू-खंड चयन हेतु फेंगसुई ज्ञाता/वास्तुशास्त्री उपलब्ध कराना, सभी प्रकार की समस्याओं का सरल व सस्ता समाधान करना, कंप्यूटर, दूरभाष, दूरदर्शन, चलचित्र, आकाशवाणी एवं अन्य संचार साधनों द्वारा ज्योतिष विज्ञान इससे सम्बंधित विधाओं एवं विद्याओं के सन्दर्भ में जानकारी तथा सूचनाएं प्राप्त करना और उपलब्ध कराना | ज्योतिष के आवश्यक पहलुओं को उजागर करनी तथा प्रचार-प्रसार हेतु फिल्म (चलचित्र) निर्माण करना, दूरदर्शन द्वारा लोकहित में प्रदर्शन करना|
14 . संस्थान  सभी धर्मो के, सभी क्षेत्रों के विद्धान, ज्योतिष दैवज्ञ, बुजुर्ग पंडितों पादरी, बौद्धभिक्षु, जैन सन्यासियों/साध्वी, सिक्ख, मौलाना, कर्म कंदियों व देवज्ञ मनीषियों के 60 वर्ष के बाद आवश्यकता पूर्ति हेतु धर्मार्थ, कल्याणार्थ पेंशन दिलाने हेउ भारत सर्कार से संपर्क करना | पीड़ित, बीमार, अस्वस्थ्य भारतीय विद्धान, साहित्यकार, कवि वैज्ञानिक, शोधकर्ताओं एवं ज्योतिष दैवज्ञों को हर संभव मदद करेगी | विश्व के किसी भी रास्ट्र, राज्य व किसी भी विषय के विद्वान सहित ज्योतिष-मनीषियों के मान-मर्यादा की रक्षा करेगी एवं संस्था के सभी ज्योतिष-विज्ञानों के लिए ग्रुप-इंश्योरेंस, व्यक्तिगत बिमा योजना की भी व्यवस्था करना ताकि भविष्य सुरक्षित हो | संस्था द्वारा सभी शाखा में फर्स्ट एड बाक्स की भी व्यवस्था करना |
15 . ज्योतिष विद्या सम्बंधित सरकारी , गैर सरकारी, देशी-विदेशी संस्थाओं से संपर्क स्थापित कार मान्यता प्राप्त करना एवं सहयोग प्राप्त करना तथा प्रदान करना होगा |
१६. ज्योतिष संबंधित विद्वान विभूतियों का विशिष्ठ सम्मान करना एवं जयंती मनाना | तथा सम्मानित किया जाता है |
१७. विश्वस्तरीय ज्योतिष विज्ञान के शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्थापित कर संचालित किये जा रहे है |
१८. यह संस्थान ज्योतिष के क्षेत्र में अब अध्ययन एवं शोध के क्षेत्र में कार्यरत ज्योतिष विद्वान, शिक्षण संस्थानों एवं स्वयंसेवी संस्थान के ज्योतिष दैवज्ञों हेतु स्थापना करेगी | एशिया महादेश सहित संसार के सर्वमान्य ज्योतिष दैवज्ञों से सहयोग लेगी तथा उन्हें शामिल किया जायेगा | उपरोक्त कार्य विश्व कल्याणार्थ किये जायेंगे | ज्योतिष विज्ञान के प्रायोगिक अनुसंधानों को गति देने तथा गहन अनुसंधात्मक कार्यकर्मों के क्रियान्वयन हेतु कार्य करना |
१९ . नवग्रह सताइस नक्षत्र एवं बारह राशियों से सम्बंधित जरी (मूल), पोधे
एवं वृक्ष का रोपण करना तथा पौधशाला का निर्माण करना |
२० ''ज्योतिष का सूर्य'' का मुख्य उद्देश्य पुरुष, महिला सहित सभी प्राणियों की सेवा करना, आर्यावर्त सहित विश्व के सभी विश्वविद्यालयों में संस्कृत व ज्योतिष को नियमित पाठ्यकर्म में लागु करने हेतु हर संभव प्रयत्न करना एवं शिक्षा को घर-घर तक पहुँचाना साथ ही साक्षर बनाना |
२१ . रास्ट्र कल्याण हेतु उन सभी कार्यो को करना जो समाज के लिए उपयोगी सिद्ध हो |-------------------------------------------
ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे महाराज (अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त )
सम्पादक ,ज्योतिष का सूर्य (हिन्दी मासिक पत्रिका)
जीवन ज्योतिष भवन,कोहका मेन रोड,सड़क-26,शांतिनगर,भिलाई,दुर्ग (छ.ग.)
मोबा.नं.09827198828

भारतीय संस्कृति के विकास में आद्य शंकराचार्य का विशेष योगदान रहा है। आचार्य शंकर का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी तिथि ईसवी 788को तथा मोक्ष 820ई. को स्वीकार किया जाता है। शंकर दिग्विजय, शंकरविजयविलास,शंकरजयआदि ग्रन्थों में उनके जीवन से सम्बन्धित तथ्य उद्घाटित होते हैं। दक्षिण भारत के केरल राज्य (तत्कालीन मलाबारप्रांत) में आद्य शंकराचार्य जी का जन्म हुआ था। उनके पिता शिव गुरु तैत्तिरीय शाखा के यजुर्वेदी ब्राह्मण थे। भारतीय प्राच्य परम्परा में आद्यशंकराचार्यको शिव का अवतार स्वीकार किया जाता है। कुछ उनके जीवन के चमत्कारिकतथ्य सामने आते हैं। जिससे प्रतीत होता है कि वास्तव में आद्य शंकराचार्य शिव के अवतार थे। आठ वर्ष की अवस्था में गोविन्दपादके शिष्यत्व को ग्रहण कर संन्यासी हो जाना, पुन:वाराणसी से होते हुए बद्रिकाश्रमतक की पैदल यात्रा करना, सोलह वर्ष की अवस्था में बद्रीकाश्रमपहुंच कर ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखना, सम्पूर्ण भारत वर्ष में भ्रमण कर अद्वैत वेदान्त का प्रचार करना, दरभंगा में जाकर मण्डनमिश्रसे शास्त्रार्थ कर वेदान्त की दीक्षा देना तथा मण्डन मिश्र को संन्यास धारण कराना, भारतवर्ष में प्रचलित तत्कालीन कुरीतियों को दूर कर समभावदर्शीधर्म की स्थापना करना, ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक,मांडूक्य,ऐतरेय,तैत्तिरीय, बृहदारण्यकऔर छान्दोग्योपनिषद्पर भाष्य लिखना भारत वर्ष में राष्ट्रीय एकता अखण्डता तथा सांस्कृतिक अखण्डता की स्थापना करना। उनके अलौकिक व्यक्तित्व का परिचायक है। चार धार्मिक मठों में दक्षिण के श्रृंगेरीशंकराचार्यपीठ, पूर्व (उडीसा) जगन्नाथपुरीमें गोवर्धनपीठ,पश्चिम द्वारिका में शारदामठतथा बद्रिकाश्रममें ज्योतिर्पीठभारत की एकात्मकताको आज भी दिग्दर्शितकर रहा है। कुछ लोग श्रृंगेरीको शारदापीठतथा गुजरात के द्वारिका में मठ को काली मठ कहते र्है।उक्त सभी कार्य को सम्पादित कर 32वर्ष की आयु में मोक्ष प्राप्त करना, अलौकिकताकी ही पहचान है। शंकराचार्य के विषय में कहा गया है
अष्टवर्षेचतुर्वेदी, द्वादशेसर्वशास्त्रवित्
षोडशेकृतवान्भाष्यम्द्वात्रिंशेमुनिरभ्यगात्
अर्थात् आठ वर्ष की आयु में चारों वेदों में निष्णात हो गए, बारह वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत, सोलह वर्ष की आयु में शांकरभाष्यतथा बत्तीस वर्ष की आयु में शरीर त्याग दिया। ब्रह्मसूत्र के ऊपर शांकरभाष्यकी रचना कर विश्व को एक सूत्र में बांधने का प्रयास भी शंकराचार्य के द्वारा किया गया है, जो कि सामान्य मानव से सम्भव नहीं है। शंकराचार्य के दर्शन में सगुणब्रह्मतथा निर्गुणब्रह्मदोनों का हम दर्शन, कर सकते हैं। निर्गुणब्रह्मउनका निराकार ईश्वर है तथा सगुण ब्रह्म साकार ईश्वर है। जीव अज्ञानव्यष्टिकी उपाधि से युक्त है। तत्त्‍‌वमसि तुम ही ब्रह्म हो, अहं ब्रह्मास्मिमै ही ब्रह्म हूं। अयामात्मा ब्रह्म यह आत्मा ही ब्रह्म है, इन बृहदारण्यकोपनिषद्तथा छान्दोग्योपनिषद्वाक्यों के द्वारा इस जीवात्मा को निराकार ब्रह्म से अभिन्न स्थापित करने का प्रयत्‍‌न शंकराचार्य जी ने किया है। ब्रह्म को जगत् के उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय का निमित्त कारण बताए हैं। ब्रह्म सत् (त्रिकालाबाधित) नित्य, चैतन्यस्वरूपतथा आनंद स्वरूप है। ऐसा उन्होंने स्वीकार किया है। जीवात्मा को भी सत् स्वरूप, चैतन्य स्वरूप तथा आनंद स्वरूप स्वीकार किया है। जगत् के स्वरूप को बताते हुए कहते हैं कि नामरूपाभ्यां व्याकृतस्य अनेककर्तृभोक्तृसंयुक्तस्य प्रतिनियत देशकालनिमित्तक्रियाफलाश्रयस्य मनसापि अचिन्त्यरचनारूपस्य जन्मस्थितिभंगंयत: अर्थात् नाम एवं रूप से व्याकृत, अनेक कत्र्ता, अनेक भोक्ता से संयुक्त, जिसमें देश, काल, निमित्त और क्रियाफल भी नियत हैं। जिस जगत् की सृष्टि को मन से भी कल्पना नहीं कर सकते, उस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा लय जिससे होता है, उसको ब्रह्म कहते है। सम्पूर्ण जगत् के जीवों को ब्रह्म के रूप में स्वीकार करना, तथा तर्क आदि के द्वारा उसके सिद्ध कर देना, आदि शंकराचार्य की विशेषता रही है। इस प्रकार शंकराचार्य के व्यक्तित्व तथा कृतित्वके मूल्यांकन से हम कह सकते है कि राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का कार्य शंकराचार्य जी ने सर्वतोभावेनकिया था। भारतीय संस्कृति के विस्तार में भी इनका अमूल्य योगदान रहा है।
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.