ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

अष्ट सिद्ध, नव नीधियों को प्राप्त करने का महापर्व विजया दशमी (हर मंत्र सिद्ध होंगी, और मनोकामनाएँ होगी पूर्ण)


Pandit Vinod Choubey,''JYOTISH KA SURYA''
विजयादशमी के पावन पर्व पर आप सभी को ढ़े सारी शुभकामनाएँ
मित्रों रविवार को यानी कल मंत्र सिद्ध करने का महापर्व है, आप लोग अपनी तैयारी आज ही कर लें..कल की साधना बहुफलदायी होती है, परन्तु मंत्र साधना आत्मकल्याणक होना चाहिए...पूर्वाग्रह, प्रतिशोधात्मक, ईर्ष्या और द्वेषपूर्ण लक्ष्य की प्राप्ति हेतु किये गये साधना अथवा प्रयंक्त मंत्रों की सिद्धी नहीं होती है।
धन, ऐश्वर्य, समृद्धि, वैभव, व्यापरिक उन्नति, राजनीतिक,, आर्थिक, सामाजिक उन्नति के लिए दुगा सप्तशती में अनेक मंत्र बताया गया है साथ ही मंत्रमहोदधि, मंत्र-संहिता, कल्प-तंत्र एवं तमाम तंत्र ग्रंथों में भिन्न मंत्रों को विस्तृत बताया गया है अपने मनोकामना के अनुसार मंत्रों का चयन कर आप विजया दशमी के दिन उन मंत्रों का जाप करके अपनी कामना पूर्ण करने की भगवती से आशीर्बाद प्राप्त कर सकते हैं।
क्योंकि ज्योतिष के अनुसार मोहरात्रि (जन्माष्टमी), कालरात्रि (नरक चतुर्दशी), दारूण रात्रि (होली) और अहोरात्रि (शिवरात्रि) इन पर्वों के दिन किया गया ध्यान-भजन, जप-तप अनंत गुना फल देता है।
वर्ष प्रतिपदा (चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा या गुड़ी पड़वा), अक्षय तृतिया (वैशाख शुक्ल तृतिया) व विजयादशमी (आश्विन शुक्ल दशमी या दशहरा) ये पूरे तीन मुहूर्त तथा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (बलि प्रतिपदा) का आधा – इस प्रकार साढ़े तीन मुहूर्त स्वयं सिद्ध हैं (अर्थात् इन दिनों में कोई भी शुभ कर्म करने के लिए पंचांग-शुद्धि या शुभ मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं रहती)। ये साढ़े तीन मुहूर्त सर्वकार्य सिद्ध करने वाले हैं।
(बालबोधज्योतिषसारसमुच्चयः 7.79.80)


 " नवरात्र में अभीष्ट कार्य सिद्धि के अनुभूत, दुर्लभ एवं विशेष प्रयोग '

गृह कलह, अशांति, एवं प्रेम वृद्धि हेतु

कई परिवारों में छोटी-छोटी बातों को लेकर गृह कलह होती है। आप पर्याप्त साधन-सम्पन्न हैं, फिर भी अशांत हैं। पति-पत्नी में कोई भी एक यदि जाप कर लेता है तो किसी एक को बुद्धि आ जाएगी। गृह कलह एवं अशांति के वातावरण से मुक्ति मिल जायेगी।

मंत्र-

धां धीं धूं धूर्जटे। पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।।

क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवी। शां शी शूं में शुभं कुरू।।



विधि-प्रात: स्नान करके काली या माँ दुर्गा के चित्र पर लाल पुष्प चढ़ायें, दीप या अगरबत्ती जला दें। किसी भी माला से 108 बार जाप करें। 21 दिनों में परिणाम मिल जाएगा। यह जाप नियमित रूप से भी किया जा सकता है। जब तक चाहें तब तक परिवार में सुखशांति का वातरण होगा।

सुहागिन रहने हेतु-

जिन स्त्रियों की इच्छा है कि उनके जीवन में उनके पति की अकाल मृत्यु या मृत्यु न हो, सम्पूर्ण जीवन पति का सामीप्य रहे, परस्पर प्रेम वृद्धि तथा सुखी गृहस्थ सुख की प्राप्ति हो तो उन स्त्रियों को इस मंत्र का जाप करना हितकर होगा।

मंत्र-

ऊँ ह्रीं ऊँ क्रीं ऊँ स्वाहा।



विधि- प्रात: काल स्नान करके दस माला का जाप नियमित रूप से करें।

वैवाहिक विघटन के संबंध में जिन अनेकानेक मंत्रों का उल्लेख मिलता है उनमें से कुछ अत्यंत उपयोगी एवं अनुभूत मंत्र हैं। इस मंत्र का प्रयोग दाम्पत्य-जीवन को सहज एवं अनुकूल बनाता है।

विवाह में ग्रह बाधा दूर करने हेतु-

यदि कन्या का विवाह भरसक प्रयास करने पर भी न हो रहा हो, माता-पिता परेशान हो रहे हो तो कन्या द्वारा निम्न मंत्रों के जाप से मनोकामना पूर्ण होती है।

विधि- शिव पार्वती तथा गणेश का ध्यान करके रूद्राक्ष अथवा स्फटिक की माला पर प्रतिदिन पांच माला अर्थात् 540 बार निम्न मंत्र का जप करने से मनोरथ की पूर्ति सम्भव है।

मंत्र-

 हे गौरी शंकरार्धागिनी यथा त्वं शंकरप्रिया।

तथा मां कुरू कल्याणि! कान्तकान्तां सुदुर्लभाम्।।

यदि संभव हो तो गौरी शंकर गणेश की पूजा करके उक्त मंत्र का जप करें तथा दशांश होम भी करें।

शीघ्र विवाह हेतु-

शिव पार्वती का ध्यान कर रुद्राक्ष की माला से 10 माला जाप रोज छह महीनें करे, सोमवार को रूद्राभिषेक किसी दस ब्राह्मण से करायें। दशांश हवन से भी शीघ्र विवाह हो जाता है।

 मंत्र-

कात्यायनि महमाये महायोगिन्यधीश्वरि।

नन्दगोपस्तुतं देवं पतिं में कुरू में नम:।।

पाप-शाप, नाश व सौभाग्यवान वर प्राप्ति हेतु-

माँ दुर्गा के चित्र के आगे देसी घी का दीपक जलाकर रुद्राक्ष की माला से दस माला (108X10) रोज चार महीने तक जाप करें। दशांश हवन से मनोवांछित पति मिलता है।

मंत्र-

ऊँ देवेन्द्राणि नमस्तुभ्यं देवेन्द्रप्रियभामिनि।

विवाहं भाग्यमारोग्यं शीघ्र लाभं च देहित में।।

इस मंत्र का जप करने से पूर्व तुलसी के वृक्ष की पूजा करके उसके परिक्रमा लगायें। परिक्रमा पूरी होने पर कन्या अपने दाहिने हाथ से दूध और बायें हाथ से जल द्वारा श्री सूर्यनारायण को बारह बार ऊपर लिखे हुए मंत्र को बोलते हुए अर्घ्य देवें। इसके बाद तुलसी की माला पर उपरोक्त मंत्र का 108 बार जप करें। इस प्रकार प्रतिदिन सूर्य का अर्घ्यदान करने से और उक्त मंत्र जप करने से शीघ्र कार्य सिद्धि होती है।

कुण्डली में ग्रह स्थिति खराब होने के कारण विवाह में बाधा हेतु-

जिस कन्या का विवाह अशुभ ग्रहों के कारण नहीं हो पा रहा हो अथवा आर्थिक संकट से नहीं हो पा रहा हो तो उसे चाहिए कि भगवान शंकर, पार्वती, गणेश का चित्र अथवा मूर्ति रखकर उसका नित्य पूजन करें, धूपबत्ती जलाये। एक गमले में अथवा एक टीन के कनस्तर में अथवा भूमि में केले के पौधे लगाकर अथवा केले के स्तंभ को रोपकर उसकी मौली से ग्यारह बार लपेट दें और उसकी पूजा करें। फिर ऊपर लिखे मंत्र को तीन माला अर्थात् 324 बार जाप करें। माला पूरी हो जाने पर उस केले के पौधे या स्तम्भ की चार बार प्रदक्षिणा करें। ऐसा करने से अवश्य ही शीघ्र वर की प्राप्ति सम्भव है। सोमवार, गुरुवार तथा शुक्रवार को ऐसा करने से विशेष लाभ सम्भव है।

मंत्र-

शं शंकराय सकल जन्मर्जितपाप विध्वंसनाय पुरूषार्थ

चतुष्टयलाभाय च पतिं में देहि कुरू कुरू स्वाहा।

मनोवांछित वर प्राप्त हेतु-

प्रात: काल बिना कुछ खाये-पिये स्नान करके गायत्री मंत्र पढ़ते हुए पूर्व दिशा की ओर मुंह करके सूर्यनारायण के सामने खड़े होकर चन्दन, पुष्प, अक्षत मिला उपयुक्त मंत्र पढ़ते हुए चार बार अर्घ्य देना चाहिए। इसके बाद धूप, दीप, गुड़ का नैवद्य लगाकर, बायां पैर ऊपर उठाकर एक पैर पर खड़े होकर 108 बार मंत्र जाप करना चाहिए। अन्त में “सूर्यनारायण! मुझे मोवांछित पति की प्राप्ति कराओ”। एक महीने तक ऐसा करने से अवश्य सफलता मिलती है। रविवार तथा शुक्ल पक्ष की सप्तमी को एक बार केवल दूध, चावल, चीनी और खीर का सेवन करना चाहिए।

मंत्र-

ऊँ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्त्रकिरणाय मम वांच्छितम् देहि देहि स्वाहा।

योग्य वर प्राप्त हेतु-

भगवान षडानन स्कन्द कुमार शिव व माँ पार्वती के पुत्र के चित्र की पूजा करके मंत्र का एक लाख पच्चीस हजार जप करने से भी योग्य वर की प्राप्ति संभव है। 10 माला जाप रोज सोमवार से आरंभ करें। एक कटोरी में गंगाजल लेकर दो छोटी इलाइची डाल दें। जाप के बाद जल पी लें। व एक इलाइची प्रात: व एक इलाइची सायं को सेवन करें।

मंत्र-

ऊँ ह्रीं कुमाराय नम: स्वाहा।


मार्कण्डेय पुराण में ब्रह्माजी ने मनुष्यों के रक्षार्थ परम गोपनीय साधन, कल्याणकारी देवी कवच एवं परम पवित्र उपाय संपूर्ण प्राणियों को बताया, जो देवी की नौ मूर्तियाँ-स्वरूप हैं, जिन्हें 'नव दुर्गा' कहा जाता है, उनकी आराधना आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी तक की जाती है। श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ मनोरथ सिद्धि के लिए किया जाता है; क्योंकि श्री दुर्गा सप्तशती दैत्यों के संहार की शौर्य गाथा से अधिक कर्म, भक्ति एवं ज्ञान की त्रिवेणी हैं। यह श्री मार्कण्डेय पुराण का अंश है। यह देवी महात्म्य धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने में सक्षम है। सप्तशती में कुछ ऐसे भी स्तोत्र एवं मंत्र हैं, जिनके विधिवत पारायण से इच्छित मनोकामना की पूर्ति होती है।

देवी का ध्यान मंत्र ;-

देवी प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोsखिलस्य। पसीद विश्वेतरि पाहि विश्वं त्वमीश्चरी देवी चराचरस्य।

इस प्रकार भगवती से प्रार्थना कर भगवती के शरणागत हो जाए। देवी कई जन्मों के पापों का संहार कर भक्त को तार देती है। वही जननी सृष्टि की आदि, अंत और मध्य है।

देवी से प्रार्थना करें - शरणागत-दीनार्त-परित्राण-परायणे!

सर्वस्यार्तिंहरे देवि! नारायणि! नमोऽस्तुते॥

सर्वकल्याण एवं शुभार्थ प्रभावशाली माना गया है -सर्व मंगलं मांगल्ये शिवे सर्वाथ साधिके । शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुऽते॥

बाधा मुक्ति एवं धन-पुत्रादि प्राप्ति के लिए-सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वितः।मनुष्यों मत्प्रसादेन भवष्यति न संशय॥

सर्वबाधा शांति के लिए-सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।एवमेव त्वया कार्यमस्मद्दैरिविनाशनम्।।

आरोग्य एवं सौभाग्य प्राप्ति के लिए इस चमत्कारिक फल देने वाले मंत्र को स्वयं देवी दुर्गा ने देवताओं को दिया है- देहि सौभाग्यं आरोग्यं देहि में परमं सुखम्‌। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषोजहि॥

अर्थात- शरण में आए हुए दीनों एवं पीडि़तों की रक्षा में संलग्न रहने वाली तथा सब की पीड़ा दूर करने वाली नारायणी देवी! तुम्हें नमस्कार है। देवी से प्रार्थना कर अपने रोग, अंदरूनी बीमारी को ठीक करने की प्रार्थना भी करें। ये भगवती आपके रोग को हरकर आपको स्वस्थ कर देगी।

विपत्ति नाश के लिए-शरणागतर्दनार्त परित्राण पारायणे। सर्व स्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोऽतुते॥

मोक्ष प्राप्ति के लिए-त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या।विश्वस्य बीजं परमासि माया।।सम्मोहितं देवि समस्तमेतत्।त्वं वैप्रसन्ना भुवि मुक्त हेतु:।।

शक्ति प्राप्ति के लिए-

सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि।गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोह्यस्तु ते।।

अर्थ:- तुम सृष्टि, पालन और संहार की शक्ति भूता, सनातनी देवी, गुणों का आधार तथा सर्वगुणमयी हो। नारायणि! तुम्हें नमस्कार है।

रक्षा का मंत्र-

शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।घण्टास्वनेन न: पाहि चापज्यानि: स्वनेन च।।

अर्थ:- देवि! आप शूल से हमारी रक्षा करें। अम्बिके! आप खड्ग से भी हमारी रक्षा करें तथा घण्टा की ध्वनि और धनुष की टंकार से भी हमलोगों की रक्षा करें।

रोग नाश का मंत्र;- रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रूष्टा तु कामान सकलानभीष्टान्।त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता हाश्रयतां प्रयान्ति।

अर्थात- देवी ! तुम प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हो और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके है। उनको विपत्ति तो आती ही नहीं। तुम्हारी शरण में गए हुए मनुष्य दूसरों को शरण देने वाले हो जाते हैं।

दारिद्र-दु:ख नाश के लिए-दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:।स्वस्थै स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।।द्रारिद्र दु:ख भयहारिणि का त्वदन्या।सर्वोपकारकारणाय सदाह्यह्यद्र्रचिता।।

ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य, संपदा प्राप्ति एवं शत्रु भय मुक्ति-मोक्ष के लिए -

ऐश्वर्य यत्प्रसादेन सौभाग्य-आरोग्य सम्पदः। शत्रु हानि परो मोक्षः स्तुयते सान किं जनै॥

भय नाशक दुर्गा मंत्र -

सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते, भयेभ्यास्त्रहिनो देवी दुर्गे देवी नमोस्तुते |


स्वप्न में कार्य सिद्घि-असिद्घि जानने के लिए-


दुर्गे देवि नमस्तुभ्यं सर्वकामार्थ साधिके।मम सिद्घिमसिद्घिं वा स्वप्ने सर्व प्रदर्शय।।

अर्थात्- शरणागत की पीड़ा दूर करने वाली देवी हम पर प्रसन्न होओ। संपूर्ण जगत माता प्रसन्न होओ। विश्वेश्वरी! विश्व की रक्षा करो। देवी ! तुम्ही चराचर जगत की अधिश्वरी हो।

माँ के कल्याणकारी स्वरुप का वर्णन-सृष्टिस्थिति विनाशानां शक्तिभूते सनातनि। गुणाश्रये गुणमये नारायणि! नमोऽस्तुते॥

अर्थात्- हे देवी नारायणी ! तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हो। कल्याणदायिनी शिवा हो। सब पुरूषार्थों को सिद्ध करने वाली शरणागतवत्सला तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम सृष्टि पालन और संहार की शक्तिभूता सनातनी देवी, गुणों का आधार तथा सर्वगुणमयी हो। नारायणी! तुम्हें नमस्कार है।
इस प्रकार देवी की शरण में जाने वालों को इतनी शक्ति प्रदान कर देती है कि उस मनुष्य की शरण में दूसरे आने लग जाते हैं। देवी धर्म के विरोधी दैत्यों का नाश करने वाली है। देवताओं की रक्षा के लिए देवी ने दैत्यों का वध किया। वह आपके आतंरिक एवं बाह्य शत्रुओं का नाश करके आपकी रक्षा करेगी। आप बारंबार उसकी शरणागत हो एवं स्वरमय प्रार्थना करें |
हे सर्वेश्वरी ! तुम तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शांत करो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो। पुन: भगवती के शरणागत जाकर भगवती चरित्र को पढ़ना, उनका गुणगान करने मात्र से सर्वबाधाओं से मुक्त होकर धन, धान्य एवं पुत्र से संपन्न होंगे। इसमें तनिक भी संदेह नहीं। भगवती के प्रादुर्भाव क‍ी सुंदर गाथाएँ सुनकर मनुष्य निर्भय हो जाता है। मुझे अनुभव है कि भगवती के माहात्म्य को सुनने वाले पुरुष के सभी शत्रु नष्ट हो जाते हैं। उन्हें कल्याण की प्राप्ति होती है तथा उनका कुल आनंदित रहता है। स्वयं भगवती का वचन है कि मेरी शरण में आया हर व्यक्ति दु:ख से परे हो जाता है। यदि आप संगणित है तथा और आपके बीच दूरियाँ हो गई है तो आप पुन: संगठित हो जाएँगे। बालक अशांत है तो शांतिमय जीवन हो जाएगा।

शांतिकर्मणि सर्वत्र तथा दु:स्वप्रदर्शने।ग्रहपीडासु चोग्रासु महात्मयं शणुयात्मम।

सर्वत्र शांति कर्म में, बुरे स्वप्न दिखाई देने पर तथा ग्रहजनित भयंकर पीड़ा उपस्थित होने पर माहात्म्य श्रवण करना चाहिए। इससे सब पीड़ाएँ शांत और दूर हो जाती है। मनुष्यों के दु:स्वप्न भी शुभ स्वप्न में परिवर्तित हो जाते है। ग्रहों से अक्रांत हुए बालकों के लिए देवी का माहात्म्य शांतिकारक है। देवी प्रसन्न होकर धार्मिक बुद्धि, धन सभी प्रदान करती है।

स्तुता सम्पूजिता पुष्पैर्धूपगंधादिभिस्तथा ददाति वित्तं पुत्रांश्च मति धर्मे गति शुभाम्।

जाप विधि- नवरात्रि के प्रतिपदा के दिन घटस्थापना के बाद संकल्प लेकर प्रातः स्नान करके दुर्गा की मूर्ति या चित्र की पंचोपचार या दक्षोपचार या षोड्षोपचार से गंध, पुष्प, धूप दीपक नैवेद्य निवेदित कर पूजा करें। मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें। शुद्ध-पवित्र आसन ग्रहण कर रुद्राक्ष या तुलसी या चंदन की माला से मंत्र का जाप एक माला से पाँच माला तक पूर्ण कर अपना मनोरथ कहें। पूरी नवरात्रि जाप करने से वांच्छित मनोकामना अवश्य पूरी होती है। समयाभाव में केवल दस बार मंत्र का जाप निरंतर प्रतिदिन करने पर भी माँ दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं।

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततंनम:। नम: प्रकृत्यै भद्राये नियता: प्रणता: स्मताम्।

देवी को नमस्कार है, महादेवी शिवा को सर्वदा नमस्कार है। प्रकृति एवं भद्रा को प्रणाम है। हम लोग नियमपूर्वक जगदंबा को नमस्कार करते हैं। शैद्रा को नमस्कार है। नित्या गौरी एवं धात्री को बारंबार नमस्कार है। ज्योत्सनामयी चंद्ररूपिणी एवं सुखस्वरूपा देवी को सतत प्रणाम है। इस प्रकार देवी दुर्गा का स्मरण कर प्रार्थना करने मात्र से देवी प्रसन्न होकर अपने भक्तों की इच्छा पूर्ण करती है।

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