ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

पुराणों में शनि और रावण की रोचक कहानी


पुराणों में शनि और रावण की रोचक कहानी
ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, 09827198828
आसुरी संस्कृति में महान् व्यक्तित्व उत्पन्न हुए, जिनका बल-पौरूष और विद्वत्ता अतुलनीय रही थी। शुम्भ-निशुम्भ, मधु-कैटभ, हिरण्यकश्यप, बलि या रावण, सभी अतुल पराक्रमी और महा विद्वान थे। यह अलग बात है कि उन्होंने अपनी शक्तियों का प्रयोग असामाजिक कृत्य और भोगों की प्राप्ति हेतु किया।  
इनमें रावण का नाम असुर कुल के विद्वानों में अग्रणी रहा है। रावण चूंकि बाम्हण वंश में उत्पन्न हुए। उनके पिता ऋषि विश्रवा और दादा पुलस्त्य ऋषि महा तपस्वी और धर्मज्ञ थे किन्तु माता असुर कुल की होने से इनमें आसुरी संस्कार आ गए थे। ऋषि विश्रवा के दो पत्नियाँ थीं। एक का नाम इडविडा था जो बाम्हण कुल से थीं और जिनके कुबेर और विभीषण, ये दो संतानें उत्पन्न हुई। दूसरी पत्नी का नाम कैकसी था,  जो असुर कुल से थीं और इनके रावण, कुंभकर्ण और सूर्पणखा नामक संतानें उत्पन्न हुई।
कुबेर इन सब में सबसे बडे थे और रावण विभीषणादि जब बाल्यावस्था में थे, तभी कुबेर धनाघ्यक्ष की पदवी प्राप्त कर चुके थे। कुबेर की पद-प्रतिष्ठा से रावण की माँ ईष्र्या करती थीं और रावण को कोसा करती थीं। रावण के मन को एक दिन ठेस लगी और अपने भाइयों ( कुंभकर्ण-विभीषण ) को साथ में लेकर तपस्या करने चला गया। रावण का भातृ प्रेम अप्रतिम था। इनकी तपस्या सफल हुई और तीनों भाइयों ने ब्रम्हाजी से स्वेच्छापूर्ण वरदान प्राप्त किया।
रावण इतना अधिक बलशाली था कि सभी देवता और ग्रह-नक्षत्र उससे घबराया करते थे। ऎसा पढने को मिलता है कि रावण ने लंका में दसों दिक्पालों को पहरे पर नियुक्त किया हुआ था। रावण चूंकि बाम्हण कुल में जन्मा था सो पौरोहित्य कर्म में पूर्ण पारंगत था। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि शिवजी ने लंका का निर्माण करवाया और रावण ने उसकी वास्तु शांति करवाई, नगर-प्रवेश करवाया और दक्षिणा में लंका को ही मांग लिया था तथा लंका विजय के प्रसंग में सेतुबन्ध रामेश्वर की स्थापना, जब श्रीराम कर रहे थे, तब भी मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा आदि का पौरोहित्य कार्य रावण ने ही सम्पन्न करवाया।
रावण की पत्नी मंदोदरी जब माँ बनने वाली थी (मेघनाथ के जन्म के समय) तब रावण ने समस्त ग्रह मण्डल को एक निश्चित स्थिति में रहने के लिए सावधान कर दिया। जिससे उत्पन्न होने वाला पुत्र अत्यंत तेजस्वी, शौर्य और पराक्रम से युक्त हो। यहाँ रावण का प्रकाण्ड ज्योतिष ज्ञान परिलक्षित होता है।
उसने ऎसा समय (मुहूर्त) साध लिया था, जिस समय पर किसी का जन्म होगा तो वह अजेय और अत्यंत दीर्घायु से सम्पन्न होगा लेकिन जब मेघनाथ का जन्म हुआ, ठीक उसी समय शनि ने अपनी स्थिति में परिवर्तन कर लिया, जिस स्थिति में शनि के होने पर रावण अपने पुत्र की दीर्घायु समझ रहा था, स्थिति परिवर्तन से वह पुत्र अब अल्पायु हो गया। रावण अत्यंत क्रोधित हो गया। उसने क्रोध में आकर शनि के पैरों पर गदा का प्रहार कर दिया। जिससे शनि के पैर में चोट लग गयी और वे पैर से कुछ लाचार हो गये, अर्थात् लँगडे हो गये।
शनि देव ही आयु के कारक हैं, आयु वृद्घि करने वाले हैं, आयुष योग में शनि का स्थान महत्वपूर्ण है किन्तु शुभ स्थिति में होने पर शनि आयु वृद्घि करते हैं तो अशुभ स्थिति में होने पर आयु का हरण कर लेते हैं। मेघनाथ के साथ भी ऎसा ही हुआ। मेघनाथ की पत्नी शेषनाग की पुत्री थी और महासती थी। मेघनाथ भी परम तेजस्वी और उपासना बल से परिपूर्ण था। इन्द्र को भी युद्घ में जीत लेने से उसका नाम च्च्इन्द्रजीतज्ज् पड गया था लेकिन दुर्भाग्यवश लक्ष्मण जी के हाथों उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रसंग में शनिदेव आयु के कारक और नाशक होते हैं, यह सिद्घ होता है।

क्रांतिकारी मन्सूबे के हैं शनिदेव...?

शनिदेव क्रांति लाने की क्षमता देते हैं। सूर्य से दूर होने के कारण सूर्य की रोशनी से वंचित शनि काले हैं कठोर है परन्तु यही कठोरता अनुशासन भी है। धर्म भाव में बैठे शनि अपने (धर्म) क्षेत्र में गहराई और अनुशासन देते हैं जो उच्चा कोटि के तपस्वी का प्रथम गुण और आवश्यकता है। इन शनिदेव को जब बृहस्पति की शुभ दृष्टि प्राप्त हो जाती है तो धर्म, आघ्यात्म और वैराग्य का अद्भुत संगम होता है। कुछ तपस्वियों की कुण्डली में इसका विश्लेषण करते हैं।
न कोई हार अंतिम हार होती है न कोई अंतिम जीत। किसी भी हार या जीत को अंतिम मान लेने से दोनों ही स्थितियों में अकर्मण्यता आ जाती है। शनिदेव, जो कठोर श्रम के प्रतीक हैं, को अकर्मण्यता बिल्कुल पसंद नहीं है। सुख-दु:ख के भँवर ही व्यक्ति को श्रम करने के लिए प्रेरित करते हैं। दण्डनायक शनि ही समय-समय पर कर्मो के लेखे-जोखों के अनुसार दण्ड देते रहते हैं जिससे सन्तुलन बना रहे। ये तो हम अज्ञानी हैं, जो शनिदेव की संतुलन की इस प्रक्रिया के वास्तविक अर्थ को समझ नहीं पाते और थोडे से ही कष्ट में चीत्कार उठते हैं।
अंग्रेजी के महान कवि एवं लेखक विलियम शेक्सपियर ने लिखा था- Adversity is the best teacher. शनिदेव वही शिक्षक हैं जो कष्ट की कसौटी पर व्यक्ति को परखते हैं, मजबूत बनाते हैं और उसके संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास करने में अहम भूमिका निभाते हैं, अत: शनिदेव और उनका न्याय न केवल हमारे कर्मो का उचित लेखा जोखा है अपितु जीवन की पाठशाला का एक महत्वपूर्ण अघ्याय भी है।

कोयले और हीरे के रासायनिक संयोजन में कोई अंतर नहीं होता, परन्तु दाब और ताप अधिक होने पर कोई कोयला, हीरे में परिवर्तित हो जाता है। ऎसे ही हैं शनिदेव और जन्मपत्रिका में उनकी स्थिति भी ऎसे ही परिणाम देने वाली होती है। कहते हैं जो तप कर निखर उठे वही सोना है, जर्रे की तो नियति ही जल कर राख हो जाना है।
शनिदेव को यदि जीवनरूपी स्वर्ण की कसौटी कहा जाए तो कतई गलत नहीं होगा। शनिदेव की कठोर परीक्षा पर जो खरा उतरा, इतिहास ने ना केवल उसे, उसके कष्ट और त्याग को याद रखा अपितु उदाहरण की तरह देखा और वे आदर्श रूप में जनमानस में छा गए चाहे राजा नल हों, विक्रमादित्य हों या फिर राजा हरिश्चन्द्र।  
आज कलियुग में हमारा दृष्टिकोण कुछ बदल सा गया है। लालबत्ती पर रूके ट्रैफिक में जब एक गरीब लडका फटे-पुराने कपडे से गाडी का काँच या बोनट साफ करता है और फिर एक-दो रूपये की मांग करता है तो हम नजर अंदाज कर देते हैं लेकिन जब शनिवार को वही लडका बर्तन में लोहे की प्रतिमा और तेल लेकर " जय शनि महाराज " बोलता हुआ हमारे पास आता है तो स्वचालित यंत्र रूपी हमारे हाथ उसके बर्तन में एक या दो अथवा उपलब्ध सिक्का डाल देते हैं। 
एक बार शनिदेव ने भगवान शंकर से कहा कि वो उन पर आना चाहते हैं। भगवान शिव ने पार्वती जी को उनके पिता के घर भेज दिया, नन्दी एवं अन्य गणों को भी कुछ समय के लिए स्वयं से दूर कर दिया। जब शनिदेव ने यह देखा तो मुस्कुरा कर कहा कि जब पत्नी, वाहन, नौकर कुछ भी पास नहीं है तो मैं आकर भी क्या करूँगा ?
संभवत: शनिदेव का व्यक्ति को परखने का यह अपना ही अंदाज है कि वे सम्पन्न व्यक्तियों को अधिक पीडा या कष्ट देते हैं जो शायद इस बात की ओर संकेत करता है कि अत्यधिक ऎशो-आराम पाने के लिए व्यक्ति ने जो भी कार्य अनुचित ढंग से किए हैं, उनके दण्ड स्वरूप उस ऎशो-आराम को अपनी दशा-अन्तर्दशा में अथवा साढेसाती में वापस लेकर व्यक्ति को यह एहसास कराना चाहते हों कि वह कहाँ-कहाँ गलत था और उस गलती के परिणाम क्या-क्या रहे हांगे ?  इसके विपरीत एक मजदूर जो दिनभर कडी मेहनत करके अपने परिवार के लिए आवश्यकतानुरूप चीजें जुटाता है, उसे कभी हमने शनिदेव से पीडित या प्रताडित होते कम ही देखा है। 

धन की वर्षा करते हैं शनिदेव...?
यदि आप धन कुबेर बनने का सपना देखते हैं, तो आप अपनी जन्म कुण्डली में इन ग्रह योगों को देखकर उसी अनुसार अपने प्रयासों को गति दें।
१ यदि लग्र का स्वामी दसवें भाव में आ जाता है तब जातक अपने माता-पिता से भी अधिक धनी होता है।
2 मेष या कर्क राशि में स्थित बुध व्यक्ति को धनवान बनाता है।
3 जब गुरु नवे और ग्यारहवें और सूर्य पांचवे भाव में बैठा हो तब व्यक्ति धनवान होता है।
4 शनि ग्रह को छोड़कर जब दूसरे और नवे भाव के स्वामी एक दूसरे के घर में बैठे होते हैं तब व्यक्ति को धनवान बना देते हैं।
5 जब चंद्रमा और गुरु या चंद्रमा और शुक्र पांचवे भाव में बैठ जाए तो व्यक्ति को अमीर बना देते हैं।
6 दूसरे भाव का स्वामी यदि ८ वें भाव में चला जाए तो व्यक्ति को स्वयं के परिश्रम और प्रयासों से धन पाता है।
७ यदि दसवें भाव का स्वामी लग्र में आ जाए तो जातक धनवान होता है।
8 सूर्य का छठे और ग्यारहवें भाव में होने पर व्यक्ति अपार धन पाता है। विशेषकर जब सूर्य और राहू के ग्रहयोग बने।
९ छठे, आठवे और बारहवें भाव के स्वामी यदि छठे, आठवे, बारहवें या ग्यारहवे भाव में चले जाए तो व्यक्ति को अचानक धनपति बन जाता है।
१० यदि सातवें भाव में मंगल या शनि बैठे हों और ग्यारहवें भाव में शनि या मंगल या राहू बैठा हो तो व्यक्ति खेल, जुंए, दलाली या वकालात आदि के द्वारा धन पाता है।
११ मंगल चौथे भाव, सूर्य पांचवे भाव में और गुरु ग्यारहवे या पांचवे भाव में होने पर व्यक्ति को पैतृक संपत्ति से, खेती से या भवन से आय प्राप्त होती है, जो निरंतर बढ़ती है।
१९ गुरु जब दसर्वे या ग्यारहवें भाव में और सूर्य और मंगल चौथे और पांचवे भाव में हो या ग्रह इसकी विपरीत स्थिति में हो व्यक्ति को प्रशासनिक क्षमताओं के द्वारा धन अर्जित करता है।
१२ गुरु जब कर्क, धनु या मीन राशि का और पांचवे भाव का स्वामी दसवें भाव में हो तो व्यक्ति पुत्र और पुत्रियों के द्वारा धन लाभ पाता है।
१३ राहू, शनि या मंगल और सूर्य ग्यारहवें भाव में हों तब व्यक्ति धीरे-धीरे धनपति हो जाता है।
१४ बुध, शुक और शनि जिस भाव में एक साथ हो वह व्यक्ति को व्यापार में बहुत ऊंचाई देकर धनकुबेर बना देता है।
१५ दसवें भाव का स्वामी वृषभ राशि या तुला राशि में और शुक्र या सातवें भाव का स्वामी दसवें भाव में हो तो व्यक्ति को विवाह के द्वारा और पत्नी की कमाई से बहुत धन लाभ होता है।
१६ शनि जब तुला, मकर या कुंभ राशि में होता है, तब आंकिक योग्यता जैसे अकाउण्टेट, गणितज्ञ आदि बनकर धन अर्जित करता है।
१७ बुध, शुक्र और गुरु किसी भी ग्रह में एक साथ हो तब व्यक्ति धार्मिक कार्यों द्वारा धनवान होता है। जिनमें पुरोहित, पंडित, ज्योतिष, प्रवचनकार और धर्म संस्था का प्रमुख बनकर धनवान हो जाता है।
१८ कुण्डली के त्रिकोण घरों या चतुष्कोण घरों में यदि गुरु, शुक्र, चंद्र और बुध बैठे हो या फिर ३, ६ और ग्यारहवें भाव में सूर्य, राहू, शनि, मंगल आदि ग्रह बैठे हो तब व्यक्ति राहू या शनि या शुक या बुध की दशा में अपार धन प्राप्त करता है।
२० यदि सातवें भाव में मंगल या शनि बैठे हों और ग्यारहवें भाव में केतु को छोड़कर अन्य कोई ग्रह बैठा हो, तब व्यक्ति व्यापार-व्यवसार द्वारा अपार धन प्राप्त करता है। यदि केतु ग्यारहवें भाव में बैठा हो तब व्यक्ति विदेशी व्यापार से धन प्राप्त करता है।
शनिदेव को कैसे करें प्रसन्न..?
शनिवार को पीपल पर जल व तेल चढाना, दीप जलाना, पूजा करना या परिक्रमा लगानाअति शुभ होता है। धर्मशास्त्रों में वर्णन है कि पीपल पूजा केवल शनिवार को ही करनी चाहिए।  
पुराणों में आई कथाओं के अनुसार ऎसा माना जाता है कि समुद्र मंथन के समय लक्ष्मीजी से पूर्व उनकी बडी बहन, अलक्ष्मी (ज्येष्ठा या दरिद्रा) उत्पन्न हुई, तत्पश्चात् लक्ष्मीजी। लक्ष्मीजी ने श्रीविष्णु का वरण कर लिया। इससे ज्येष्ठा नाराज हो गई। तब श्रीविष्णु ने उन अलक्ष्मी को अपने प्रिय वृक्ष और वास स्थान पीपल के वृक्ष में रहने का ओदश दिया और कहा कि यहाँ तुम आराधना करो। मैं समय-समय पर तुमसे मिलने आता रहूँगा एवं लक्ष्मीजी ने भी कहा कि मैं प्रत्येक शनिवार तुमसे मिलने पीपल वृक्ष पर आया करूँगी।
शनिवार को श्रीविष्णु और लक्ष्मीजी पीपल वृक्ष के तने में निवास करते हैं। इसलिए शनिवार को पीपल वृक्ष की पूजा, दीपदान, जल व तेल चढाने और परिक्रमा लगाने से पुण्य की प्राप्त होती है और लक्ष्मी नारायण भगवान व शनिदेव की प्रसन्नता होती है जिससे कष्ट कम होते हैं और धन-धान्य की वृद्धि होती है।
शनि-शिग्नापुर
महाराष्ट्र में शिरडी के पास शिग्नापुर में शनिदेव का प्रसिद्ध मंदिर है। कहते हैं- बहुत पहले एक काली शिला बहती हुई इस गाँव की नदी में आ गई। खेलते हुए बच्चों ने जब इसे लकडी के टुकडे से खींचना चाहा तो शिला में से खून बहने लगा। बच्चों ने गाँव वालों को बुलाया। सभी ने शिला को उठाने का प्रयास किया परंतु सफल नहीं हो सके। रात को एक व्यक्ति को स्वप्न में किसी दिव्य आवाज ने कहा कि जब कोई मामा-भांजा इस शिला को उठाएंगे तो ही सफल होंगे। गाँव वालों ने ऎसा ही किया और एक चबूतरे पर शिला की स्थापना की। शनिदेव की कृपा से आज तक कोई भी इस गाँव में कोई भी ताला नहीं लगाता। आज तक यह शिला खुले मे उस चबूतरे पर ही है और इसके ऊपर मंदिर बनाने के सारे प्रयास विफल रहे हैं।
नोटः  (साभार पूर्वांचल न्यूज ) 

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