ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

पौराणीक मत से स्वप्नों का शुभाशुभ

पौराणीक मत से  स्वप्नों का शुभाशुभ
-ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे
मित्रों स्वप्न के बारे में भारतीय धर्मशास्त्रों में विशद वर्णन मिलता है.. इसमें वैज्ञानिकता झलकती है और सामान्य आमजनमानस पर प्रभाव भी । अतः आईए इसे पौराणीक संदर्भों पर संदर्भित समझने का प्रयास करें..
.स्वप्नाखयानं कथं देव गमने प्रत्युपस्थिते। दृश्यंते विविधाकाराः कशं तेषां फलं भवेत्॥
मत्स्य भगवान ने स्वप्नों के फलीभूत होने की अवधि के विषय में बताते हुये कहा :
 कल्कस्नानं तिलैर्होमो ब्राह्मणानां च पूजनम्। स्तुतिश्च वासुदेवस्य तथा तस्यैव पूजनम्॥6॥ नागेंद्रमोक्षश्रवणं ज्ञेयं दुःस्वप्नाशनम्। स्वप्नास्तु प्रथमे यामे संवस्तरविपाकिनः॥7॥
षड्भिर्भासैर्द्वितीये तु त्रिभिर्मासैस्तृतीयके। चतुर्थे मासमात्रेण पश्यतो नात्र संशयः॥8॥
अरुणोदयवेलायां दशाहेन फलं भवेत्। एकस्यां यदि वा रात्रौशुभंवा यदि वाशुभम्॥9।
पश्चाद् दृषृस्तु यस्तत्र तस्य पाकं विनिर्दिशेत्। तस्माच्छोभनके स्वप्ने पश्चात् स्वप्नोनशस्यते॥20॥ अर्थात, रात्रि के प्रथम प्रहर में देखे गये स्वप्न का फल एक संवत्सर में अवश्य मिलता है। दूसरे प्रहर में देखे गये स्वप्न का फल 6 माह में प्राप्त होता है। तीसरे पहर में देखे गये स्वप्न का फल 3 माह में प्राप्त होता है। चौथे पहर में जो स्वप्न दिखायी देता है, उसका फल 1 माह में निश्चित ही प्राप्त होता है। अरुणोदय, अर्थात सूर्योदय की बेला में देखे गये स्वप्न का फल 10 दिन में प्राप्त होता है। यदि एक ही रात में शुभ स्वप्न और दुःस्वप्न दोनों ही देखे जाएं, तो उनमें बाद वाला स्वप्न ही फलदायी माना जाना चाहिए, अर्थात् बाद वाले स्वप्न फल के आधार पर मार्गदर्शन करना चाहिए!

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