ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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शनिवार, 18 नवंबर 2017

दिन की अमृतमयी शुरुआत करें

अतितॄष्णा न कर्तव्या तॄष्णां नैव परित्यजेत्।
शनै: शनैश्च भोक्तव्यं स्वयं वित्तमुपार्जितम् ॥
अधिक इच्छाएं नहीं करनी चाहिए पर इच्छाओं का सर्वथा त्याग भी नहीं करना चाहिए। अपने कमाये हुए धन का धीरे-धीरे उपभोग करना चाहिये ।

सनातन के उपहास की साजिश, अंजाने में हम सब हुए शिकार....

सनातन के उपहास की साजिश,
अंजाने में हम सब हुए शिकार.....

यदि आपने यह पोस्ट पढ़ने का निर्णय किया है तो इसे गहराई से और आराम-आराम से पढ़ना होगा क्योंकि इसे पढ़ने के बाद आपको भटके हुए सनातनियों को जो अपनी मूर्खता और भय में सनातन को हानि पहुंचा रहे हैं उन्हें समझाना भी होगा.धार्मिक होने का मतलब सिर्फ पूजा-पाठ करना नहीं होता, अधर्म को रोकना भी जरूरी होता है. गीता का यही सार है.प्रश्न है कि हम ईश्वर से डरते क्यों हैं? ईश्वर डराने वाली शक्ति है ही नहीं.डराने वाली शक्ति तो आसुरी शक्ति है. इस डर के बीच में क्यों जी रहे हैं हम.सोशल मीडिया पर आजकल ऐसे पोस्ट से भरा पड़ा है- इस दिन किया ये काम तो हो जाएगा नुकसान. इस दिन कर लो ये काम तो होगी मुश्किल आसान. आज ये मत करना, कल वो मत करना. आदि, आदि…एक इंसान कितनी चीजें कर सकता है और कितनी चीजें नहीं कर सकता! क्या उसके पास किस्मत बदलने वाले इन छद्मवेशियों के तुक्के,टोटके मानने के अलावा कोई काम-धाम नहीं बचा.क्या संभव है ऐसा कि आप सारे टोटके पूरे कर सकें. इसके दो बड़े नुकसान हैं-पहला तो आप धीरे-धीरे करके एक मानसिक बीमारी के फेर में फंसते जाएंगे जहां आपको हर चीज से डर लगेगा और उस डर का निदान टोटकों में खोजते फिरेंगे. यह बीमारी तेजी से बढ़ रही है. बढ़ती-बढ़ती यही पशुबलि और मानव बलि जैसे अपराध तक पहुंचा देती है.दूसरी, यदि आप इन टोटकों में फंस गए तो आपका सारा समय तो इसी में निकल जाएगा. फिर घर-परिवार आपका शत्रु हो जाएगा क्योंकि आपके पास उनके लिए समय ही नहीं होगा.गहरी साजिश हो रही है जिसे हिंदू समझ ही नहीं रहे. पहले तो उनमें डर का माहौल बनाया जा रहा है फिर उस डर का कारोबार हो रहा है.क्या आपने स्वयं यह महसूस नहीं किया?ऐसा कोई दिन नहीं होता जब आपको व्हॉट्सएप्प पर पोस्ट न मिलते हों जिसमें लिखा होता है-यदि यह पोस्ट भेजेंगे तो यह काम बन जाएगा और यदि पोस्ट नहीं भेजा तो तुम्हारा अनिष्ट हो जाएगा.कभी आता होगा कि यह सीधा बालाजी से आया है, यह सीधा शिरडी से आया है, फलां गांव में हनुमानजी आए. किसी ने मूर्ति बनवा दी तो उसका काम बन गया, जिसने नकार दिया उसका नाश हो गया. यह पोस्ट शेयर नहीं किया तो सात दिन में सब नाश हो जाएगा.आप भी ऐसे मैसेज से परेशान होते होंगे, संभव है आपमें से कुछ लोग किसी अनिष्ट कीआशंका में आगे भेज भी देते हों.आपको अंदाजा है अंजाने में आपने जीवहत्या जैसा पाप कर दिया?ईश्वर की शक्तियों को एक मैसेज में कोई समेटकर सिद्ध कर लेगा और उसके आधार पर डर बना देगा. जो इतना डरता है वास्तव में वह भगवान का उपहास कर रहा है. अंजाने में वह कितना बड़ा अपराध कर रहा है, उसे इसका आभास ही नहीं. इस पाप की मुक्ति के लिए तो कोई व्रत भी नहीं बताया गया है.ग्रंथों के आधार पर समझते हैं- कैसे और कितना बड़ा पाप हुआ है अंजाने में!शिवपुराण में इस विषय में चर्चा आती है. भगवान भोलेनाथ किसी पर जल्दी कुपित नहींहोते और कुपित हो जाएं तो भस्म ही कर देते हैं जैसे कामदेव को किया था.तो शिवजी किस पर कुपित होते हैं? इस पर लंबा विवरण है. यहां मैं उसमें से वह बात दे रहा हूं जिसका इस विषय से संदर्भ है-महादेव उस पर कुपित होते हैं जो मिथ्याचार करता है, जो किसी को शिवभक्ति से किसी को रोकता है, जो शिव की निंदा करता या सुनता है जो शिव की शरण में आए भक्त को भय दिखाता है.इसमें से शिव के शरणागत को भय दिखाने वाला प्रसंग विशेष रूप से देखने योग्य है. भद्रायु ने शिवजी की शरण ली थी. वह शिवजी का ध्यान कर रहे थे परंतु उनकी आयुपूरी हो चुकी थी. काल अपना कार्य करने आए और भद्रायु को भयभीत करना शुरू कर दिया.काल को तो अपना कर्तव्य करना था इसलिए तरह-तरह से डराने लगे ताकि भद्रायु कुछ पल के लिए ही थोड़े से बेचैन हों और शिवजी की भक्ति से ध्यान हटे तो इसके प्राण हरने का अवसर मिले. पर भद्रायु कालके प्रयासों से विचलित ही न हुए.काल ने और डराना शुरू किया तो भोलेनाथ स्वयं प्रकट हुए और काल को ही भस्म कर दिया. त्राहि-त्राहि मच गई.देवों ने कहा- प्रभु आपका कोप उचित है किंतु काल यदि न होगा तो सृष्टि की व्यवस्था बिगड़ जाएगी. महाकाल के रूप में देवों ने तरह-तरह से शिवजी की स्तुति की. तब शिवजी ने काल को पुनः जीवन दिया.शिवजी को प्रसन्न करने के लिए देवताओं ने कहा- हे महाकाल आज से जो भी किसी को आपकी भक्ति से विचलित करने का प्रयास करेगा, आपके भक्त के मन में भय उत्पन्न करेगा, वह आपके साथ-साथ हम सभी के कोप का भी अधिकारी होगा. उसकी कोई व्रत-स्तुति स्वीकार नहीं होगी.ऐसा ही वर्णन श्रीमद्भागवत में भी है. जो भी सदाचारी व्यक्ति जीवों को धर्म का उपदेश करता है, उनके विचारों को शुद्ध करके धर्म के संकल्प के साथ जोड़ता है, उन्हें धर्मनिष्ठ बनाता है उसके वश में स्वयं देवराज इंद्र हो जाते हैं.उसके लिए संसार में कुछ भी अलभ्य नहीं होता अर्थात उसके लिए संसार के सभी ऐश्वर्य सुलभ हो जाते हैं.जो किसी धर्मनिष्ठ को बल से, दंड से, लोभ में डालकर, अथवा किसी भी अनुचित प्रयोग से धार्मिक प्रसंग या अनुष्ठान के लिए बाधित करता है ऐसे व्यक्ति के सारे अर्जित पुण्यों का तत्काल नाश हो जाता है, उसके अनुष्ठान देवगण स्वीकार नहीं करते.ऐसे मनुष्य का शील, धर्म, सत्य, वृत और बल इन पांचों का नाश हो जाता है. इनके नाश होते ही लक्ष्मी उसका त्याग कर देती हैं.नारद पुराण की एक कथा .एक राजा ने कठोर नियम लगा रखा था कि उसके राज्य के प्रत्येक नागरिक यहां तक कि मवेशियों को भी एकादशी का व्रत करना होगा. बड़ा कठोर नियम था. किसी को भोजन दिया ही नहीं जाता था. भूल से भी कोई करे तो राज्य से निकाल दिया जाता था.भगवान ऐसी बलात् भक्ति से दुखी थे.उनकी प्रेरणा से एक भक्त उस राज्य में आया और उसने एकादशी का व्रत तो नहीं ही किया, साथ में भगवान को भी अपने साथ भोजन कराया. राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ कि मैं सबको व्रत के लिए प्रेरित कर रहा हंा फिरभी हरि ने मुझे दर्शन नहीं दिए!भगवान ने कहा- तुम किसी को प्रेरित नहीं कर रहे थे, बाध्य कर रहे थे. तुम्हारा एक भी व्रत मैंने स्वीकार ही नहीं किया है. जो भक्ति का प्रचार करके व्रत-आदि की उपयोगिता, विधि-विधान समझाकर किसी को इसके लिए उत्साहित करता है मैं बस उसके व्रत ही स्वीकार करता हूं. थोपी गई भक्तिमुझे स्वीकार ही नहीं.ऐसे अनगिनत प्रसंग और उद्धरण मैं बता सकता हूं. पर विवेकशील व्यक्ति के विवेक को जागृत करने के लिए इतना पर्याप्त है. इससे ज्यादा की आवश्यकता तो मूढ़ के लिए है. क्या अब भी आपको नहीं लगता कि अंजाने में अधर्म हो रहा है.अब मुद्दे की बातःतो आप जिसे यह मैसेज भेज रहे हैं कि यह नहीं किया तो वह हो जाएगा इस तरह आप उसे भगवान का नाम लेने और उसे आगे भेजने के लिए विवश कर रहे हैं. आपकी कोई पूजा तो स्वीकार नहीं ही हुई आपने जो भी अब तक पुण्य संचित किए हों शायद वह भी चले गए हों. इसलिए तत्काल इसे रोकिए.आपने अंजाने में ही जो कार्य किए हैं उससे आपका शील, धर्म, सत्य, वृत और बल इन पांचों का नाश हो जाता है. इनके नाश होते ही लक्ष्मी उसका त्याग कर देती हैं.अंजाने में हुए अपराध के लिए ईश्वर से तत्काल क्षमा प्रार्थना करिए और संकल्प लीजिए कि आगे से ऐसा नहीं करेंगे. यदि आप फिर भी ऐसा करते हैं तो फिर आप जानें आपके कर्म जानें.जो भी व्यक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ईशनिंदा को सुनता है, उसे प्रचारित करता है वह तत्काल ईश्वर की कृपा से वंचित हो जाता है. धर्म के विरूद्ध आचरण को भी ईशनिंदा माना जाता है. ईशनिंदकों से तुरंत सभी संबंध विच्छेद कर लेने चाहिए.इस प्रकार ऐसे मैसेज ईशनिंदा की श्रेणी के ही हुए. तो यदि आपने नहीं भेजा लेकिन आपके पास लोग ऐसे मैसेज भेज रहे हैं उनकेसाथ तत्काल अपने संबंध तोड़ें अन्यथा यहभी अधर्म है.उन्हें जो ऊपर बात कही है उसे बताकर समझाने का प्रयास करें या ऐसे लोगों को ब्लॉक कर सकते हैं ताकि वे दोबारा ऐसा न कर पाएं.संसार के बहुत से धर्मों में बलात् यानी तलवार के बल प्रयोग से धर्म में खींचकर लाने की बात कही गई है परंतु सनातन में ऐसा कदापि नहीं है. एक भी प्रसंग आपको कहीं भी नहीं मिलेगा जहां बलप्रयोग से धर्माचरण के लिए विवश किया गया हो.इसीलिए सनातन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि यह बल से नहीं सौहार्द से आदर्श जीवन की विधि बताता है.क्या आपको अब आभास हुआ कि जो हो रहा है वहउचित नहीं हो रहा.इससे भी गंभीर एक प्रश्न है- क्या आपको यह महसूस हो रहा है कि सनातनियों में लगातार ह्रास होता जा रहा है. मर्यादाएं धूमिल हो रही हैं?

गंभीरता से सोचिए, विचारिए तो समझ में आएगा कि अप्रत्यक्ष रूप से धर्म की हानि कराने के कितने प्रपंच चल रहे हैं. सात्वकिता का जो रक्षाकवच हमें सुरक्षित रखता है उसे भेदने के लिए अधर्मियों ने कितना बड़ा षडयंत्र किया है.ऐसे मैसेज विधर्मियों द्वारा बनाया जा रहे हैं. वे हमें धोखे से अधर्म के चक्रव्यूह में फंसाकर सनातन की हानि करारहे हैं. हमारा धर्मकवच लगातार टूट रहा है. पूजा-हवन, तीर्थ-यज्ञ आदि के कारण बने रक्षा कवच में सेंध लग रही है.यदि आपको इस बात में जरा सी भी सच्चाई लगती है तो धर्म की रक्षा के लिए लोगों को जागृत करें. प्रेम से उन्हें समझाएं, सुधारें.मैंने धर्म यात्रा पेज में सिर्फ धर्म की कथाओं से आपको परिचित कराने के लिए बनाया है मैंने, धर्म का प्रचार-प्रसार करने और धर्म पर आने वाली हर बाधा से सावधान करनेके लिए बनाया है. इस मिशन, इस संकल्प के साथ आप जुड़ें. ऐसे विचारों का और मंथन आवश्यक है.यदि सनातन के उपहास से आपका मन भी दुखित है तो आह्वान करता हूं, आइए हम सब साथ जुड़ें. धर्मरक्षा के लिए धर्म के सार का प्रसार करें. सूप के समान बनें.सार-सार को गहि रहे, थोड़ा दे उडाय.सूप फटकारने का कार्य कितने अच्छे से करता है. वह अच्छी चीजों को रख लेता है और बेकार चीजों को फटकारकर बाहर कर देता है.बात उचित लगी हो तो आइए धर्मो रक्षति रक्षितः अर्थात तुम धर्म की रक्षा करो, धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा.

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

आज शनिश्चरी अमावस्या है...

आज शनिश्चरी अमावस्या है...

पौराणिक शास्त्रों के मुताबिक शनिवार के दिन आने वाली अमावस्या को शनि अमावस्या कहते हैं। यह दिन शनि भक्तों के लिए विशेष फलदायी माना जाता है। इस दिन शनिदेव अपने भक्तों पर कृपा बरसाकर उन्हें पापों व कष्टों से भी मुक्ति दिलाते हैं। भविष्यपुराण में ऐसा उल्लेख है कि शनि अमावस्या के दिन शनि का पूजन विशेष फलदायी होता है। शनि देव के अच्छे फल प्राप्त करने के लिए शनिश्चरी अमावस्या के दिन शनिदेव का विधिवत पूजन कर पर्याप्त लाभ उठा सकते हैं। शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए यहां बताए गए उपाय सभी जातकों को सफलता दिलाएंगे।

1. - उड़द दाल की खिचड़ी दान करें।
2. - तिल से बने पकवान, उड़द से बने पकवान गरीबों को दान करें।
3. - काले रंग का श्वान इस दिन से पालें और उसकी सेवा करें।
4. - शनि अमावस्या के दिन या रात्रि में शनि चालीसा का पाठ, शनि मंत्रों का जाप एवं हनुमान चालीसा का पाठ करें।
5. - अमावस्या की रात्रि में 8 बादाम और 8 काजल की डिब्बी काले वस्त्र में बांधकर संदूक में रखें।
6. - शनि यंत्र, शनि लॉकेट, काले घोड़े की नाल का छल्ला धारण करें।
7. - इस दिन नीलम या कटैला रत्न धारण करें। जो फल प्रदान करता है।
8. - इस दिन पीपल के पेड़ पर सात प्रकार का अनाज चढ़ाएं और सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
- आचार्य पण्डित विनोद चौबे
संपादक- 'ज्योतिष का सूर्य' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, शांतिनगर, भिलाई, मोबाईल नं.09827198828

उच्च राशि के गुरु बनाते हैं 'गृहमंत्री' या 'विदेशमंत्री'

आपकी कुण्डली में उच्च राशि का वृहस्पति है तो मंत्री, गृहमंत्री अथवा विदेशमंत्री पद भी प्राप्त कराता है , यथा नीचे दिये सारावली के इस इस उद्धरण को देखें...हालाकी मेरा (आचार्य पण्डित विनोद चौबे Bhilai,9827198828) मानना है कि किसी भी जातक के जन्मांक का फलादेश केवल लग्न के आधार पर ही किया जाना न्यायसंगत नहीं होगा ! परन्तु 1953 मे बनारस से प्रकाशित 'सारावली' के 'राजयोगाध्याय' के आठवें श्लोक के मुताबिक नीचे दिये गये श्लोक से लग्नानुसार फलादेश कुछ इस प्रकार है :-

''स्वोच्चे गुराववनिजे क्रियगे विलग्ने,
मेषोदये च सकुजे वचसामधीशे !
भूपो भवेदिह सयस्य विपक्षसैन्यम्,
तिष्ठेन्न जातु पुरत: सचिवा वयस्या !!''

१)  गुरु अपने उच्च राशि में तथा मंगल मेष राशि का होकर लग्न में स्थित हो !
२) मेष लग्न में ही मंगल और गुरु स्थित हों तो गृहमंत्री अथवा विदेशमंत्री पद को प्रदान करने वाला यह योग होता है !
३) मेष लग्न में जन्म लेने वाला व्यक्ति निर्बल ग्रहों के होने पर पुलिस अधिकारी होता है !
४) मेष लग्न के व्यक्ति के जन्मांक में क्रूर ग्रह शनि, रवि, और मंगल उच्च या मूलत्रिकोण के हों और गुरू नवम भाव में हो तो वह व्यक्ति रक्षामंत्री बनता है !
मेरे पास संग्रह में तकरीबन 1450 की संख्या में मेरे शांतिनगर, भिलाई स्थित 'बगलामुखी पीठ (ज्योतिष कार्यालय) में मौजूद है किन्तु उसमें इस योग की साम्यता के अनुरुप शत-प्रतिशत सटीक नही बैठता, जब इसका सूक्ष्म अध्ययन करके देखा तो यदि उपरोक्त योग की साम्यता के साथ ही यदि उस व्यक्ति के नवमांश में भी उच्चाभिलाषी राजयोग तथा गोचर में ग्रह-संक्रमण अनुकूल है तो निश्चित तौर पर यह फलादेश कथन शत-प्रतिशत सही रहेगा ! मित्रों, आप सभी का देश भर से फोन (कॉल्स) आते हैं किन्तु सभी को फोन पर ज्योतिष परामर्श दे पाना हमारे लिये संभव नहीं है ! किन्तु इसके लिए हमने एक समय सुनिश्चित किया है, और एक व्यवस्था भी ! सायंकाल 7 pm -to- 9 pm आप इस समय हमें इस व्हाट्सएप नं.  9827198828 पर अपना डिटेल भेजें , इसके पश्चात् आपको हमारे व्हाट्सएप संचालक की ओर से बैंक डिटेल दिया जायेगा उसमें आप प्रत्येक कुण्डली विचार (किन्ही दो प्रश्नों का) मात्र 1100/₹ पारितोषिक रुपये उस बैंक अकाउण्ट में जमा कर रिसीप्ट की छायाप्रति व्हाट्सएप करना होगा, तदुपरान्त आपके व्यक्तिगत स्वयं से जुड़े 'ज्योतिष एवं वास्तु या हस्तरेखा' का परामर्श दिया जायेगा ! हां सप्ताह के मंगलवार को उपरोक्त समय पर नि:शुल्क समाधान देंगे, जिसको वरियता क्रम के आधार पर सुनिश्चित किया जाता है !! जयतु संस्कृति, संस्कृतम् च जयतु भारत !! वंदे मातरम !!
- आचार्य पण्डित विनोद चौबे संपादक- 'ज्योतिष का सूर्य' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका
मोबा.नं. 9827198828, शांतिनगर, भिलाई !

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

वेद-वेदांग रहस्यम् (पुष्प-1)

वेद-वेदांग रहस्य (पुष्प- 1)

"विनम्र निवेदन साथियों !  

मैं कुछ दिनों से सोच रहा था ! अपने प्रिय पाठकों केे लिये कुछ नियमित नूतन व सारगर्भित तथा संक्षिप्त, अनुकूल, सरल और सुगम जानकारियां आपके समक्ष प्रस्तुत करुं ! इस श्रृंखला में वेद-वेदांग पर चर्चा हम करेंगे !  

 ऋग्वेद संसार के सभी प्राचीन ग्रंथो व धार्मिक किताबों में सबसे प्राचीन स्त्रोत (वैसे तो वेद अपौरुषेय है और करोड़ों वर्ष पूर्व ही वेद का प्राकट्य हो गया था परन्तु, भारतीय एवं वैदेशिक विद्वानों के शोध के मुताबिक 3500 वर्षों से भी अधिक प्राचीन ) है. साथ ही इसे चारों वेदों में भी प्रथम स्थान प्राप्त है. ऋग्वेद दो शब्दों का समूह है – ऋग + वेद, जिनमें “ ऋग “से अभिप्राय “ स्तुतिपरक मंत्र “ से है और “ वेद “ का अर्थ “ ज्ञान और ज्ञाता “ से है. इसीलिए ऋग्वेद में देवी देवताओं की स्तुति, उनकी अराधना और उनके यज्ञ में आवाहन के लिए मंत्र व सूक्त पायें जाते है. सूक्त से अभिप्राय वेद मन्त्रों के समूह से ही है. हर सूक्तों की खास बात ये है कि इनमेएकदैवत्व और एकार्थ का प्रतिपादन मिलता है. ऋग को “ ऋक “ भी कहा जाता है. इसके अलावा ऋग को ब्रह्मा, प्राण और अमृत भी कहा जाता है तो इस तरह से ऋग्वेद का एक अर्थ ब्रह्मज्ञान से भी है अर्थात, ऋग्वेद के मन्त्रों के जाप से ब्रह्म की व अमरत्व की प्राप्ति होती है.

ऋग्वेद संहिता विभाजन :
ऐसा माना जाता है कि पहले चारों वेद एक ही संहिता के हिस्से थे किन्तु इन्हें समझना बहुत कठिन होता था, तो लोगों की भलाई के लिए और इनको अध्ययन में सुगम बनाने के लिए महर्षि वेद व्यास जी ने इन्हें 4 हिस्सों में बाँट दिया ( इसीलिए उन्हें वेद व्यास के नाम से जाना जाता है ), जिन्हें आज हम जानते है. साथ ही उन्होंने इसे दो भागों में भी विभाजित कर दिया. जिनमे पहला है अष्टक क्रम और दुसरा है मंडल क्रम. चारों वेदों में ऋग्वेद संहिता सबसे बड़ी भी है. ऋग्वेद में ना सिर्फ देवताओं बल्कि पंचतत्वों ( अग्नि, वायु, पृथ्वी, जल और आकाश ) और प्राकृतिक के संचालक तत्वों जैसेकि विधुत, सूर्य, बादल, वर्षा इत्यादि का भी पूर्ण वर्णन मिलता है.

1.       अष्टक क्रम : अष्टक क्रम में ऋग्वेद की संहिता को 8 अष्टकों में बांटा गया है साथ ही हर अष्टक में 8 ही अध्याय है. इसीलिए इसे अष्टक क्रम कहा जाता है. हर अष्टक के हर अध्याय को कुछ वर्गों में विभाजित किया गया है जिनमे ऋचाओं ( गेय मंत्र ) का वर्णन मिलता है. अष्टक क्रम में कुल मिलाकर 64 ( 8 * 8 = 64 ) अध्याय और 2006 वर्ग मिलते है.

2.       मंडल क्रम : जहाँ तक मंडल क्रम की बात है तो सम्पूर्ण संहिता को कुल 10 मंडलों / किताबों में बांटा गया है. जहाँ हर मंडल में कई अनुवाक मिलते है और हर अनुवाक सूक्तों से मिलकर बना है. हर सूक्त में कुछ कल्याणकारी मंत्र दिया गये है. गणना के अनुसार ऋग्वेद की सम्पूर्ण संहिता में 10 मंडल के अतिरिक्त 85 अनुवाक व 1028 सूक्त मिलते है. इन 1028 सूक्तों में कुल मिलाकर 10552 मंत्र दिया गएँ है.

अगर ध्यान से देखा जाएँ तो पूरी ऋग्वेद को इतने सुंदर तरीके से विभाजित व व्यवस्थित किया गया है कि इनका हर कोई सुगमता से अध्ययन कर सकता है और यही इनको विभाजित करने का मूल उद्देश्य भी था. वेद के हर अक्षर, हर शब्द, हर मंत्र इत्यादि को इतने ध्यान से और गिनकर लिखा गया है ताकि कोई भी वेदों में मिलावट ना कर सके.

ऋग्वेद संहिता
ऋग्वेद के ख़ास मंत्र और सूक्त :
वैसे तो ऋग्वेद का हर मन्त्र और सूक्त बहुत ख़ास और लाभकारी है लेकिन ऋग्वेद में मृत्यु पर विजय दिलाने वाला और दीर्घ आयु दिलाने वालामहामृत्युंजय मंत्र व हर सुख और मानसिक शान्ति दिलाने वाला महानविख्यात गायत्री मंत्र भी वर्णित किया गया है. इनके अलावा ऋग्वेद में लोगों की भलाई के लिए अन्य अनेक सूक्त जैसा कि रोग निवारक सूक्त, श्री युक्त, हिरण्यगर्भ सूत्र व विवाह सूत्र इत्यादि का वर्णंन भी ऋग्वेद में मिलता है.

-आचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- 'ज्योतिष का सूर्य' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई, मोबाईल नं. -9827198828 

(विशेष अनुरोध है कॉपी-पेस्ट की जगह, आप अपनी प्रतिक्रिया दें, ताकी हमारा उत्साह वर्द्धन हो सके)

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

आस्ट्रेलिया, फिलिपींस के मध्यवर्ती 'पापुआ' टापू निवासी 'जय और विजय' की राजधानी 'वामन' और 'वैदिक-वास्तु कला'

" वैदिक संस्कृति में वर्णित कई ऐसे प्रसंग है जो आज की आधुनिक संस्कृति के वैज्ञानिकों के लिये चुनौती बना हुआ हैं !" 

मैं कल एक मांगलिक कार्यक्रम से दोपहर 3 बजे अपने निवास शांतिनगर, भिलाई स्थित कार्यालय पहुंचा ! वैसे भी 17/12/2017 को आयोजित होने वाले 'धर्म-संस्कृति अलंकरण समारोह' की तैयारी को लेकर थोड़ी व्यस्तता अवश्य है पर कभी कभी कुछ विषय होते हैं जिनपर चर्चा होती है तो कुछ ऐसा 'प्रसंग बन जाता है, जिसे आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत करने के लिये बाध्य हो जाता हुं' ! देखिए ना कल मुझसे एक सज्जन से *वैदिक-वास्तु* के कुछ उद्धरणों को लेकर विस्तृत चर्चा हुई थी ! कुछ विषयों को लेकर मेरा मन वैदिक-भौगोलिक एवं ज्योतिष-खगोलिक ज्ञान सागर में गोता लगा रहा था, उसी समय अचानक मेरा ध्यान *मठाम्नाय (महाअनुशासनम्)* नामक शंकराचार्य जी द्वारा वर्णित पीठाचार्य के अधिकार क्षेत्र के भौगोलिक- क्षेत्र वर्णन पर गया और प्रसंग मिला 'जय और विजय' के राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का, मुझे बेहद आश्चर्य हुआ की आस्ट्रेलिया के उस टापू पर जिसे 'जय और विजय' के राज्य की राजधानी 'वामन' नामक टापू आज भी आधुनिक खोजकर्ताओं की पहुंच से कोषों दूर है, और चुनौति भी ! इस क्षेत्र का आँखो देखा हाल परिमाप सहित  प्रस्तुत है श्री आदि शंकराचार्य जी के पीठों के अधिकार क्षेत्र में ! आस्ट्रेलिया के उत्तर में और फिलिपींस के दक्षिण-पूर्व में विद्यमान पापुआ द्वीप पर एक राज्य है जिसका नाम है - "जय-विजय," जिसकी राजधानी का नाम है - "वामन" - आश्चर्य है कि प्राचीन काल में भारतीय वैदिक संस्कृति कैसे इन सुदूर टापुओं तक पहुंची होगी, जिन टापुओं पर आज तक आधुनिक संस्कृति भी नहीं पहुंची है।
संदर्भ- मठाम्नाय (महाअनुशासनम्)
- आचार्य पण्डित विनोद चौबे, (ज्योतिष, वास्तु एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ) भिलाई मोबाईल नं.9827198828


सोमवार, 13 नवंबर 2017

माहात्म्य उत्पन्ना एकादशी व्रत का

सूतजी कहने लगे- हे ऋषियों! इस व्रत का वृत्तांत और उत्पत्ति प्राचीनकाल में भगवान कृष्ण ने अपने परम भक्त युधिष्ठिर से कही थी। वही मैं तुमसे कहता हूँ।

एक समय यु‍धिष्ठिर ने भगवान से पूछा था ‍कि एकादशी व्रत किस विधि से किया जाता है और उसका क्या फल प्राप्त होता है। उपवास के दिन जो क्रिया की जाती है आप कृपा करके मुझसे कहिए। यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण कहने लगे- हे युधिष्ठिर! मैं तुमसे एकादशी के व्रत का माहात्म्य कहता हूँ। सुनो।

सर्वप्रथम हेमंत ऋ‍तु में मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी से इस व्रत को प्रारंभ किया जाता है। दशमी को सायंकाल भोजन के बाद अच्छी प्रकार से दातुन करें ताकि अन्न का अंश मुँह में रह न जाए। रात्रि को भोजन कदापि न करें, न अधिक बोलें। एकादशी के दिन प्रात: 4 बजे उठकर सबसे पहले व्रत का संकल्प करें। इसके पश्चात शौच आदि से निवृत्त होकर शुद्ध जल से स्नान करें। व्रत करने वाला चोर, पाखंडी, परस्त्रीगामी, निंदक, मिथ्याभाषी तथा किसी भी प्रकार के पापी से बात न करे।
स्नान के पश्चात धूप, दीप, नैवेद्य आदि सोलह चीजों से भगवान का पूजन करें और रात को दीपदान करें। रात्रि में सोना या प्रसंग नहीं करना चाहिए। सारी रात भजन-कीर्तन आदि करना चाहिए। जो कुछ पहले जाने-अनजाने में पाप हो गए हों, उनकी क्षमा माँगनी चाहिए। धर्मात्मा पुरुषों को कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षों की एकादशियों को समान समझना चाहिए।

जो मनुष्य ऊपर लिखी विधि के अनुसार एकादशी का व्रत करते हैं, उन्हें शंखोद्धार तीर्थ में स्नान करके भगवान के दर्शन करने से जो फल प्राप्त होता है, वह एकादशी व्रत के सोलहवें भाग के भी समान नहीं है। व्यतिपात के दिन दान देने का लाख गुना फल होता है। संक्रांति से चार लाख गुना तथा सूर्य-चंद्र ग्रहण में स्नान-दान से जो पुण्य प्राप्त होता है वही पुण्य एकादशी के दिन व्रत करने से मिलता है।
अश्वमेध यज्ञ करने से सौ गुना तथा एक लाख तपस्वियों को साठ वर्ष तक भोजन कराने से दस गुना, दस ब्राह्मणों अथवा सौ ब्रह्मचारियों को भोजन कराने से हजार गुना पुण्य भूमिदान करने से होता है। उससे हजार गुना पुण्य कन्यादान से प्राप्त होता है। इससे भी दस गुना पुण्य विद्यादान करने से होता है। विद्यादान से दस गुना पुण्य भूखे को भोजन कराने से होता है। अन्नदान के समान इस संसार में कोई ऐसा कार्य नहीं जिससे देवता और पितर दोनों तृप्त होते हों परंतु एकादशी के व्रत का पुण्य सबसे अधिक होता है।
हजार यज्ञों से भी ‍अधिक इसका फल होता है। इस व्रत का प्रभाव देवताओं को भी दुर्लभ है। रात्रि को भोजन करने वाले को उपवास का आधा फल मिलता है और दिन में एक बार भोजन करने वाले को भी आधा ही फल प्राप्त होता है। जबकि निर्जल व्रत रखने वाले का माहात्म्य तो देवता भी वर्णन नहीं कर सकते।
युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवन! आपने हजारों यज्ञ और लाख गौदान को भी एकादशी व्रत के बराबर नहीं बताया। सो यह तिथि सब तिथियों से उत्तम कैसे हुई, बताइए।
भगवन कहने लगे- हे युधिष्ठिर! सतयुग में मुर नाम का दैत्य उत्पन्न हुआ। वह बड़ा बलवान और भयानक था। उस प्रचंड दैत्य ने इंद्र, आदित्य, वसु, वायु, अग्नि आदि सभी देवताओं को पराजित करके भगा दिया। तब इंद्र सहित सभी देवताओं ने भयभीत होकर भगवान शिव से सारा वृत्तांत कहा और बोले हे कैलाशपति! मुर दैत्य से भयभीत होकर सब देवता मृत्यु लोक में फिर रहे हैं। तब भगवान शिव ने कहा- हे देवताओं! तीनों लोकों के स्वामी, भक्तों के दु:खों का नाश करने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाओ।

वे ही तुम्हारे दु:खों को दूर कर सकते हैं। शिवजी के ऐसे वचन सुनकर सभी देवता क्षीरसागर में पहुँचे। वहाँ भगवान को शयन करते देख हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे‍कि हे देवताओं द्वारा स्तुति करने योग्य प्रभो! आपको बारम्बार नमस्कार है, देवताओं की रक्षा करने वाले मधुसूदन! आपको नमस्कार है। आप हमारी रक्षा करें। दैत्यों से भयभीत होकर हम सब आपकी शरण में आए हैं।

आप इस संसार के कर्ता, माता-पिता, उत्पत्ति और पालनकर्ता और संहार करने वाले हैं। सबको शांति प्रदान करने वाले हैं। आकाश और पाताल भी आप ही हैं। सबके पितामह ब्रह्मा, सूर्य, चंद्र, अग्नि, सामग्री, होम, आहुति, मंत्र, तंत्र, जप, यजमान, यज्ञ, कर्म, कर्ता, भोक्ता भी आप ही हैं। आप सर्वव्यापक हैं। आपके सिवा तीनों लोकों में चर तथा अचर कुछ भी नहीं है।

हे भगवन्! दैत्यों ने हमको जीतकर स्वर्ग से भ्रष्ट कर दिया है और हम सब देवता इधर-उधर भागे-भागे फिर रहे हैं, आप उन दैत्यों से हम सबकी रक्षा करें।

इंद्र के ऐसे वचन सुनकर भगवान विष्णु कहने लगे कि हे इंद्र! ऐसा मायावी दैत्य कौन है जिसने सब देवताअओं को जीत लिया है, उसका नाम क्या है, उसमें कितना बल है और किसके आश्रय में है तथा उसका स्थान कहाँ है? यह सब मुझसे कहो।

भगवान के ऐसे वचन सुनकर इंद्र बोले- भगवन! प्राचीन समय में एक नाड़ीजंघ नामक राक्षस थ उसके महापराक्रमी और लोकविख्यात मुर नाम का एक पुत्र हुआ। उसकी चंद्रावती नाम की नगरी है। उसी ने सब देवताअओं को स्वर्ग से निकालकर वहाँ अपना अधिकार जमा लिया है। उसने इंद्र, अग्नि, वरुण, यम, वायु, ईश, चंद्रमा, नैऋत आदि सबके स्थान पर अधिकार कर लिया है।

सूर्य बनकर स्वयं ही प्रकाश करता है। स्वयं ही मेघ बन बैठा है और सबसे अजेय है। हे असुर निकंदन! उस दुष्ट को मारकर देवताओं को अजेय बनाइए।

यह वचन सुनकर भगवान ने कहा- हे देवताओं, मैं शीघ्र ही उसका संहार करूंगा। तुम चंद्रावती नगरी जाओ। इस प्रकार कहकर भगवान सहित सभी देवताओं ने चंद्रावती नगरी की ओर प्रस्थान किया। उस समय दैत्य मुर सेना सहित युद्ध भूमि में गरज रहा था। उसकी भयानक गर्जना सुनकर सभी देवता भय के मारे चारों दिशाओं में भागने लगे। जब स्वयं भगवान रणभूमि में आए तो दैत्य उन पर भी अस्त्र, शस्त्र, आयुध लेकर दौड़े।

भगवान ने उन्हें सर्प के समान अपने बाणों से बींध डाला। बहुत-से दैत्य मारे गए। केवल मुर बचा रहा। वह अविचल भाव से भगवान के साथ युद्ध करता रहा। भगवान जो-जो भी तीक्ष्ण बाण चलाते वह उसके लिए पुष्प सिद्ध होता। उसका शरीर छिन्न‍-भिन्न हो गया किंतु वह लगातार युद्ध करता रहा। दोनों के बीच मल्लयुद्ध भी हुआ।

10 हजार वर्ष तक उनका युद्ध चलता रहा किंतु मुर नहीं हारा। थककर भगवान बद्रिकाश्रम चले गए। वहां हेमवती नामक सुंदर गुफा थी, उसमें विश्राम करने के लिए भगवान उसके अंदर प्रवेश कर गए। यह गुफा 12 योजन लंबी थी और उसका एक ही द्वार था। विष्णु भगवान वहां योगनिद्रा की गोद में सो गए।

मुर भी पीछे-पीछे आ गया और भगवान को सोया देखकर मारने को उद्यत हुआ तभी भगवान के शरीर से उज्ज्वल, कांतिमय रूप वाली देवी प्रकट हुई। देवी ने राक्षस मुर को ललकारा, युद्ध किया और उसे तत्काल मौत के घाट उतार दिया।

श्री हरि जब योगनिद्रा की गोद से उठे, तो सब बातों को जानकर उस देवी से कहा कि आपका जन्म एकादशी के दिन हुआ है, अत: आप उत्पन्ना एकादशी के नाम से पूजित होंगी। आपके भक्त वही होंगे, जो मेरे भक्त हैं।
- आचार्य पण्डित विनोद चौबे
संपादक- 'ज्योतिष का सूर्य' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई, मोबाईल नं. 9827198828

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