ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

!!विशेष सूचना!!
नोट: इस ब्लाग में प्रकाशित कोई भी तथ्य, फोटो अथवा आलेख अथवा तोड़-मरोड़ कर कोई भी अंश हमारे बगैर अनुमति के प्रकाशित करना अथवा अपने नाम अथवा बेनामी तौर पर प्रकाशित करना दण्डनीय अपराध है। ऐसा पाये जाने पर कानूनी कार्यवाही करने को हमें बाध्य होना पड़ेगा। यदि कोई समाचार एजेन्सी, पत्र, पत्रिकाएं इस ब्लाग से कोई भी आलेख अपने समाचार पत्र में प्रकाशित करना चाहते हैं तो हमसे सम्पर्क कर अनुमती लेकर ही प्रकाशित करें।-ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे, सम्पादक ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका,-भिलाई, दुर्ग (छ.ग.) मोबा.नं.09827198828
!!सदस्यता हेतु !!
.''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका के 'वार्षिक' सदस्यता हेतु संपूर्ण पता एवं उपरोक्त खाते में 220 रूपये 'Jyotish ka surya' के खाते में Oriental Bank of Commerce A/c No.14351131000227 जमाकर हमें सूचित करें।

ज्योतिष एवं वास्तु परामर्श हेतु संपर्क 09827198828 (निःशुल्क संपर्क न करें)

आप सभी प्रिय साथियों का स्नेह है..

सोमवार, 25 सितंबर 2017

षष्ठमम् कात्यायनीति च :

!! ऊँ नमश्चण्डिकायै !!
'षष्ठमम् कात्यायनीति च'
भगवती कात्यायनी आप सभी की मनोकामना पूर्ण करें ! हर माताओं को सौभाग्य प्रदान करें!
कात्यायनी माता : मां दुर्गा का छठा रुप :-
भगवती माँ दुर्गा जी के छठवें स्वरुप का नाम कात्यायनी है ! इनका कात्यायनी नाम पड़ने की कथा इस प्रकार है - कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे ! उनके पुत्र - ऋषि कात्य हुए ! इन्ही कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे ! इन्होने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी ! उनकी इच्छा थी की माँ भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें ! माँ भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली थी ! कुछ काल पश्चात जब दानव महिसासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बहुत बढ़ गया तब भगवान् ब्रह्मा , विष्णु , महेश तीनो ने अपने - २ तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया ! महर्षि कात्यायन ने सर्व प्रथम इनकी पूजा की ! इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाई ! ऐसी भी कथा मिलती है कि ये महर्षि कात्यायन के यहाँ पुत्री रूप से उत्पन्न भी हुई थी ! आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्ल सप्तमी , अष्टमी , तथा नवमी तक तीन - दिन इन्होने कात्यायन ऋषि कि पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था ! माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी है ! भगवान् कृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्ही की पूजा कालिंदी - यमुना के तट पर की थी ! ये ब्रज मंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित है ! इनका स्वरुप अत्यंत ही भव्य और दिव्य है ! 

- आचार्य पण्डित विनोद चौबे
(ज्योतिष, हस्तरेखा, वैदिक वास्तु एवं रत्न विशेषज्ञ) संपादक- ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, शांतिनगर, भिलाई, जिला- दुर्ग (छ.ग.) Mobil.no. 987198828 http://ptvinodchoubey.blogspot.in/2017/09/blog-post_25.html?m=1

रविवार, 24 सितंबर 2017

एकात्म मानववाद के पिरणेता

एकात्म मानववाद संपूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की अवधारणा को मूर्त रूप देता है !वह केवल भारत के लिए ही नहीं मानव मात्र के कल्याण के लिए समर्पित है।
‘एकात्म मानववाद’ के प्रणेता  पण्डित दीनदयाल उपाध्याय, महान चिंतक, श्रेष्ठ संगठक और आदर्श राजनेता तो थे ही उन्होने संपूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की अवधारणा को मूर्त रूप दिया। वे भारत की आशा के केंद्र तत्कालीन विपक्षी दल “भारतीय जनसंघ” के अखिल भारतीय संगठन मंत्री और बाद में राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। उन्होने अपनी राजनीतिक जिम्मेदारी समझते हुये तत्कालीन राजनीति को दिशा देने  के लिए एक ऐसा सिद्धांत दिया जिसको भारत की जनता का उस समय पूर्ण समर्थन मिलता तो भारत अत्यंत अल्पकाल में ही अन्य देशों की तरह श्रेष्ठ और सबल हो गया होता। इस विचार को उन्होने “एकात्म मानव वाद “ की संज्ञा दी है। दीनदयाल जी के द्वारा प्रतिपादित ‘एकात्म मानव वाद’  केवल भारत के लिए ही नहीं मानव मात्र के कल्याण के लिए समर्पित है। उसे ‘विश्व दर्शन’ भी कहा जाए तो अनुचित नहीं होगा। अतीत में भारत ने इन्हीं विचारों के आधार पर ‘विश्वगुरु’ का सम्मान पाया था। भारत की  मूल और प्राचीन भूमिका का निर्वाहन करके आज भी ‘व्यक्ति कल्याण से विश्व कल्याण’ की उद्दात भावना को साकार किया जा सकता है।  संयोग से भारत की इस सनातन विचारधारा को अब वैश्विक स्तर पर भी  ‘वननेस’ के सिद्धांत के रूप में मान्य की जाने लगी है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जिन्हें हम निसंदेह रूपसे विकास की इस भारतीय की अवधारणा का प्रवर्तक कह सकते हैं । विकास की यह अवधारणा शेष दुनिया के लिए नई अवश्य हो सकती है पर भारत के लिए प्राचीन किन्तु नित्यनूतन,  सहज और सरल है। हमारे यहाँ सुदूर जंगलों में एकांतिक जीवन व्यतीत कर रहा जनजाति के लोग और हम उन्हें ‘निपट गंवार’ असभ्य आदि पता नहीं क्या क्या संबोधन देते हैं,  वे भी अनंत काल से इन विचारों के अनुरूप जीवन जीते आ रहे हैं और सच्चे अर्थों में वही सुखी और सार्थक जीवन जी रहा होता है। व्यावहारिक दृष्टि से यही जीवन दृष्टि हमें हमारे तमाम संकटों से मुक्ति दिला सकती है। पश्चिमी की विकास की अवधारणा जहाँ यह मानती है कि व्यक्ति का प्रादुर्भाव शनैः शनैः हुआ वहीं भारतीय दृष्टि उसे पतनोन्मुखी मानती है। इसको छोड़ भी दें तो  इतना तो सब मानते हैं कि मानव जीवन के समस्त क्रियाकलापों का उद्देश्य सुख की प्राप्ति है और मानव के समस्त  क्रियाकलापों  का केन्द्र्विंदु ‘मन की शांति ‘ ही है और वही वास्तव में विकास का रास्ता है। पश्चिम का अंधानुकरण कर हमारे देश के नीति निर्धारक भी यह मानने लगे हैं कि उपभोग के साधनों की ज्यादा से ज्यादा उपलब्धि ही ‘सुख’ है और वही विकास का  पर्याय है जो सही नहीं है । पंडित दीनदयाल उपाध्याय उपभोग या सुख को विकास का पर्याय नहीं मानते थे।  वे इसके लिए एक अत्यंत सुंदर उदाहरण दिया करते थे। उनका कहना था कि व्यक्ति को गुलाब जामुन खाना अच्छा लगता है।  गुलाब जामुन उसके सुख का कारण है और मान लीजिये जिस समय व्यक्ति गुलाब जामुन खा रहा हो, उसी समय उसे अपने किसी परिजन के देहांत की सूचना मिल  जाए, तब भी क्या उसे वह गुलाब जामुन उतना ही अच्छा लगेगा ? व्यक्ति तो वही है और उसके हाथ में वही स्वादिष्ट गुलाब जामुन है  फिर भी उसे वह गुलाब जामुन अच्छा नहीं लगेगा। न उसे खाने से उसे उतना सुख मिलेगा ।  यदि गुलाब जामुन में ही सुख है तो फिर उस समय भी व्यक्ति को सुख प्राप्त होना चाहिए था, किन्तु ऐसा होता नहीं है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का मानना था कि मन की स्थिति ही सुख की अवधारक है। मन पर नियंत्रण ही वास्तविक विकास है. वे  स्पष्ट रूप से कहते थे कि उपभोग के विकास का रास्ता राक्षसत्व की ओर जाता है और मन को नियंत्रित करने का विकास का रास्ता देवत्व की ओर जाता है।  पंडित दीनदयाल उपाध्याय इस देवत्व के रास्ते का अनुसंधान कर रहे थे । यह ठीक है कि यह नया रास्ता नहीं था. भारतीय साधु संत तथा सामान्य जन हजारों-हजारों वर्षों से इसकी साधना कर रहे थे।  मनुष्य की जितनी भौतिक आवश्यकताएं हैं उनकी पूर्ति का महत्व को भारतीय चिंतन ने स्वीकार किया है।  परंतु उसे सर्वस्व नहीं माना है।  मनुष्य के शरीर, मन, बुध्दि और आत्मा की आवश्यकता की पूर्ति के लिए और उसकी इच्छाओं व कामनाओं की संतुष्टि के साथ उसके सर्वांगीण विकास के लिए भारतीय संस्कृति में ‘पुरुषार्थ चतुष्टय’ की अवधारणा को  पंडित दीनदयाल उपाध्याय आज के युग में भारत के समग्र विकास का मूल आधार मानते थे। वे कहते हैं - धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष में संतुलन ही ‘पुरुषार्थ चतुष्टय’ है ।
मनुष्य की भौतिक आवश्यकता की पूर्ति को पश्चिम की दृष्टि में ‘सुख’ माना गया है।  पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार अर्थ और काम पर धर्म का नियंत्रण रखना आवश्यक है और धर्म के नियंत्रण से ही ‘मोक्ष पुरुषार्थ’  प्राप्त हो सकता है. यद्यपि भारतीय संस्कृति में मोक्ष को परम पुरुषार्थ माना गया है. तथापि अकेले उसके लिए प्रयत्न करने से मनुष्य का कल्याण नहीं होता। वास्तव में तो अन्य पुरुषार्थों की अवहेलना करने वाला कभी मोक्ष का अधिकारी नहीं हो सकता।
अन्य तीन 3 पुरुषार्थ भी एक दूसरे के पूरक व पोषक हैं।  यदि व्यापार भी करना है तो मनुष्य को सदाचरण, संयम, त्याग, तपस्या, सत्य, धृति,क्षमा, आदि धर्म के विभिन्न लक्षणों का निर्वाह करना पडेगा।  बिना इन गुणों के पैसा कमाया नहीं जा सकता। किसी प्रकार कमा भी लिया तो उससे सच्चा सुख प्राप्त नहीं किया जा सकता। व्यक्तिगत ‘सुख’ प्राप्त कर भी लिया तो सामाजिक ‘सुख’ प्राप्त नहीं किया जा सकता । सिध्दांतः धर्म ,अर्थ और काम का पुरुषार्थ ही राज्य का आधार है। राज्य  एक अकेली दंडनीति राज्य को ठीक ढंग से संचालित नहीं कर सकती।
पंडित दीनदयाल जी के अनुसार धर्म महत्वपूर्ण है परंतु वे कहते हैं कि यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अर्थ के अभाव में धर्म टिक नहीं पाएगा। वे इसके लिए एक सुभाषित का प्रयोग किया करते थे -  “बुभुक्षित: किं न करोति पापं, क्षीणा जना: निष्करुणा: भवन्ति. अर्थात भूखा सब पाप कर सकता है. ऐसा कहते हैं कि विश्वामित्र जैसे ऋषि ने भी भूख से पीडित हो कर शरीर धारण करने के लिए चांडाल के घर में चोरी कर के कुत्ते का जूठा मांस खा लिया था. हमारे यहां आदेश में कहा गया है कि अर्थ का अभाव नहीं होना चाहिए क्योंकि वह धर्म का द्योतक है. इसी तरह दंडनीति का अभाव अर्थात अराजकता भी धर्म के लिए हानिकारक है .

पंडित दीनदयाल उपाध्याय कहा करते थे “ अर्थ का ‘अभाव और प्रभाव’  दोनों बुरे होते हैं । व्यक्ति और समाज में अर्थ साधन न होकर साध्य बन जाएं तब अर्थ संचय के लिए व्यक्ति नानाविध पाप करता है।  इसी प्रकार जिस व्यक्ति के पास अधिक धन हो तो उसके विलासी बन जाने की अधिक संभावना है । वहीं धनाभाव  में भी व्यक्ति कोई भी अपकर्म करने को उद्यत हो जाता है। पश्चिम में व्यक्ति के जीवन को टुकडे-टुकडे में विचार किया जाता है वहीं भारतीय चिंतन में व्यक्ति के जीवन की पूर्णता शरीर, मन बुध्दि और आत्मा सभी का विकास में मानीं गई है। व्यक्ति अपनी  भूख मिटाने के लिए दूसरे की भूख की चिंता न करे ,यह तो धर्म नहीं है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने पश्चिम के विकास की  खंडित अवधारणा के विपरीत ‘एकात्म मानववाद’ की अवधारणा पर जोर दिया । 
अब यह तो पश्चिम ने भी मान लिया है कि ऋग्वेद संसार का प्राचीनत्तम ग्रंथ है और जब यह निर्विवादित हो जाता है तब अनेक प्रकार की दुबिधाएं स्वमेव ही समाप्त हो जातीं हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि भारतीय सभ्यता संसार की प्रचीनत्तम सभ्यता है। क्योंकि ऋग्वेद में प्रतिपादित विचार किसी बिखरे या अविकसित समाज के नहीं बल्कि उन्नत समाज की देन हैं। वेद की ऋचायेँ एक स्थान पर नहीं अनेक बार व्यक्ति और समष्टि में ‘ एकरूपता , परस्पर पूरकता और परस्पर निर्भरता ’ के सिद्धांत को प्रतिपादित करतीं हैं। वे विश्व को एक परिवार मानतीं हैं और व्यक्तियों के कल्याण के लिए ही नहीं प्राणिमात्र की भलाई का चिंतन करतीं हैं। और प्राणिमात्र का ही क्यों स्थिर,जंगम और प्रकृति तक की चिंतायेँ सहस्त्रों वर्ष पूर्व उसके ‘रेडार’ में आ चुकी थीं ।
आधुनिक विज्ञान के जनक माने जानेवाले वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन  कहते हैं कि जब हम अपने शरीर की अनर्निहित संरचना को देखते हैं तो पाते हैं कि करोड़ों – अरबों जीबाणुओं को समेटे यह शरीर विभिन्न प्रकार के ( असंगत )  कार्यों को एक साथ सम्पन्न करता हुआ भी सुसंगत और परस्पर पूरक है। उसका अस्तित्व भी परस्पर एक दूसरे पर निर्भर है। आइंस्टीन  महोदय फिर कहते हैं कि हमारा बाह्य जगत भी इतना विशाल है  कि समुन्द्र के रेत के कणों को तो गिना जा सकता है परन्तु ब्रम्हान्डो, आकाश गंगाओं, गृहों  और सूर्य –चंद्रों को गिनना असंभव है। फिर भी उनमें ‘एकरूपता , परस्पर पूरकता और परस्पर निर्भरता’ सन्निहित है। भारत में इस सत्य को एक छोटे से संस्कृत के वाक्य खण्ड अनूदित हो जाता है – “ यथा पिंडे- तथा ब्रह्मांडे’ । अब इसी सिद्धांत को अमरीका में कोलिफोर्निया विश्वविद्यालय के भौतिक वैज्ञानिक और फ्रिट्ज़ ऑफ काबरा के नेतृत्व में कार्यरत  ‘सेंटर फॉर इकोलिट्रेसी’ के वैज्ञानिक कई वर्षों यह  सिद्ध करने में व्यस्त हैं।
इससे पूर्व पश्चिम के वैज्ञानिक और डार्बिन जैसे समाजशास्त्री व्यक्ति को बंदर का विकसित और परिबर्द्धित रूप मानते रहे हैं। डार्बिन के इस ‘विकासवाद के सिद्धांत’  को अब पश्चिम के वैज्ञानिकों ने भी एक तरह से  नकार दिया है । वहीं संसार का प्रचीनत्तम ग्रंथ ऋग्वेद कहता है - 'सृष्टि के आदिकाल में न सत् था न असत्, न वायु थी न आकाश, न मृत्यु थी न अमरता, न रात थी न दिन, उस समय केवल ‘वह’  था जो वायुरहित स्थिति में भी अपनी शक्ति से साँस ले रहा था। उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।'
जिन सिद्धांतों को भारत का वैज्ञानिक , हमारे  ऋषि , हमारे अध्येता अपने अनुभव और शोध से बहुत पहले प्रतिपादित कर चुके थे उस ‘वह’ का साक्षात्कार और उसकी अनुभूति अब हम अब सहज और सरल रूप से कर रहे हैं। विज्ञान की विकसित अवस्था ने आज विश्व को एक विशाल परिवार के रूपमें परिवर्तित कर दिया है। सूचना प्राद्योगिकी ने जहाँ विश्व को एक ‘कॉटेज’ बना दिया है वहीं हम अनुभूति कर सकते हैं कि प्रकृतिक रूप से भी यह धरती एक साथ ‘धडक’ रही है। हम देखते हैं कि अणुबमों का कचरा अरब सागर में डाला जाता है और मछलियाँ हिन्द महासागर की मर जातीं हैं । पृथ्वी के एक सिरे की ग्लेशियर पिघलती है और सुदूर समुन्द्र उफनने लगता है।संसार में कहीं भी प्रकृति के साथ अन्याय होता है तो दूसरे छोर पर ‘सुनामी’ या ‘कैटरीना’ दण्ड देने की न्यायिक प्रक्रिया शुरू कर देती है।
फ्रिट्ज़ ऑफ काबरा के नेतृत्व में वर्क्ले ( कोलफोर्निया ) स्थिति ‘सेंटर फॉर इकोलिट्रेसी’ ने  ‘मन’ के सामर्थ्य का भी गंभीरता से अध्ययन किया है। वैज्ञानिकों ने स्टील के एक विशालकाय भारी बीम को ‘मन की शक्ति’ से हिला दिया है। यह ‘मन’ के आदेश  से हवाई जहाज चलाने के सामर्थ्य की प्रारम्भिक अवस्था भी बन सकता है जो  हमारे यहाँ के  परिचालक रहित पुष्पक विमान की संकल्पना को साकार करता है। इस विचार के मूल में ‘मैं’ का विस्तारित दर्शन है जिसे  ‘ब्रम्ह’ कहा जाता है जो पिण्ड से ब्रह्मांड तक की संरचना का कारक है। जिसे हम  ‘जीव’ ही ‘जगत’ की रचना का कारण मन सकते हैं ।  यदि सरल शब्दों में ‘एकात्म मानववाद’ को समझना  हो तो ‘आत्मबत सर्ब भूतेषु‘ ही ‘एकात्मकता’ और उसकी मानवीय दृष्टिकोण से अनुभूति ही ‘मानववाद’ है।
संसार में आजतक जितने भी राजनीतिक ‘वाद’ प्रणाली या सिद्धांत उपलब्ध है ,या जिन पर प्रयोग हो चुके हैं और जिनके आधार पर आमजन को सुखी और समृद्ध देखने की कल्पना की गई है और जिसमें ‘राज्य’ नाम की संस्था की प्रमुख भूमिका सन्निहित है । आज वे सब ‘वाद’ लगभग अपनी उपयोगिता खो चुके है। उन सबकी उत्पति का कारण ही जब प्रतिवाद था इसलिए वे मौलिक न होकर प्रतिक्रिया के पर्याय थे इसलिए उन सब से मानव कल्याण संभव नहीं है। वह फिर चाहें व्यक्तिवाद हो या पूंजीवाद ,  साम्यवाद हो या समाजवाद , वाम कहें  या दक्षिण  प्रायोगिक धरातल पर सर्वथा निर्दोष साबित नहीं हुये हैं। परिणामस्वरूप आज  सारा विश्व भटकाव और निराशा के गर्त में ढूब रहा है । ज्ञान के विस्फोट और विज्ञान के असीमित  विस्तार का वांछित लाभ भी ‘मनुष्य’ को नहीं मिल पा रहा है। वहीं पं. दीनदयाल उपाध्याय के द्वारा प्रतिपादित  “ एकात्म मानव वाद ” सर्वथा दोष रहित भारतीय भावधारा और चिंतन के अनुकूल है। भारत इन्ही विचारों के आधार पर अनंत काल तक विश्व का ‘आदर्श और पूज्य’ रहा है। होना तो यही चाहिए था कि भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अपनी नीतियाँ को इन्हीं विचारों के अनुरूप बनाईं जानी चाहिए थीं। स्वयं महात्मा गांधी ‘भारतीय परंपराओं’ के अनुरूप देश को ले जाना चाहते थे परंतु विडम्बना यह है कि आज अधिकांश राजनीतिक दल, भारतीय होते हुए भी इस राष्ट्र की मूल सभ्यता के प्रवाह से न केवल कट गए हैं बल्कि अपने तात्कालिक राजनीतिक उद्देश्य के लिए भारतीय जनमानस के संस्कृतिक प्रवाह पर आघात करने से संकोच नहीं करते। यह भी उतना ही सही है कि कोई भी राजनीतिक विचारधारा या ‘वाद’ बिना प्रत्यक्ष प्रयोग के मान्यता प्राप्त नहीं कर सकता,  इसलिए भारत सरकार को चाहिए कि वह अपनी ‘नीति’’ एकात्म मानववाद के अनुरूप बनाए और इस विषय पर खुले मन से देशभर में संवाद की प्रक्रिया शुरू कराए । भारतीय विश्वविद्यालयों के शोधों के  विषय बनाए जाने चाहिए। इस ‘एकात्म मानव वाद’ को भारतीय राजनीति की मार्गदर्शिका बनाने के लिए उसके अनुकूल राजनीतिक वातावरण बनाया जाना भी अभीष्ट होगा।
पंडित जी ने संघ की अनेक पत्र पत्रिकाओं का काफी लम्बे समय तक संपादन किया था , जिनमें स्वदेश और पाञ्चजन्य प्रमुख हैं। उन्होने अपनी संपादकियों में, आलेखों और पुस्तकों में ‘एकात्म मानववाद’ का प्रतिपादन किया है उनकी विख्यात पुस्तक “राष्ट्रजीवन की दिशा और दशा” भी उन्होने इन्हीं विचारों की व्याख्या है। वे इन्हीं विचारों को सामान्य भारतीयों और अपने कार्यकर्ताओं के व्यवहार में देखना चाहते थे ।उनका स्वयं का जीवन भी आदर्श और अनुकरणीय था।  दीनदयाल जी ने आम भारतीय चिंतन को “ राष्ट्रीय चिति ” की संज्ञा दी है। उनका मानना था कि इसी ‘चिति’ के आधार पर हमारी समस्त योजनायें और कार्यक्रम बनाए जाने चाहिए। पंडित जी एक ऐसे महान कर्मयोगी थे कि जिन्होने अपना पूरा जीवन ही उस पवित्र लक्ष्य  के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने बहुत कम समय में ही ‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ जैसे आदर्श चरित्र पर पुस्तक लिखकर भारतीय इतिहास के एक सांस्कृतिक निष्ठा वाले राज्य का चित्रण किया था और वे चाणक्य की भूमिका को अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं का आदर्श बनाना चाहते थे।  निश्चित रूप से वे  ‘शब्द और कृति’  की एकात्मकता के सर्जक थे। उन्होने ,  अपनी छोटी सी पुस्तिका - “ भारतीय जनसंघ : नीति और सिद्धांत ”  जिसका  इस विचारधारा के अनुरूप कार्य करनेवाले लोगों के लिए ‘गीता’ जैसा महत्व होना चाहिए , के उपसंहार “हमारा आराध्य ” में लिखा हैं –“ आर्थिक योजनाओं और आर्थिक प्रगति का माप समाज में ऊपर की ‘सीढी’ पर पहुँचे हुये व्यक्ति नहीं बल्कि नीचे के स्तर पर विद्यमान व्यक्ति से होगा। आज देश में करोड़ों मानव हैं जो मानव के किसी भी अधिकार का उपभोग नहीं कर पाते। शासन के नियम और व्यवस्थाएं ,योजनायें और नीतियाँ ,प्रशासन का व्यवहार और भावना इनको अपनी परिधि में लेकर नहीं चलतीं ,प्रत्युत उन्हें मार्ग का रोड़ा ही समझा जाता है। हमारी भावना और सिद्धांत है कि वह मैले- कुचेले,  अनपढ़, मूर्ख लोग हमारे ‘नारायण’ हैं। हमें इनकी पूजा करनी है । यह हमारा सामाजिक एवं मानव धर्म है। जिस दिन हम इनको पक्के ,सुंदर सभ्य घर बनाकर देंगे ,जिस दिन हम इनके बच्चों और स्त्रियों को शिक्षा और जीवन दर्शन का ज्ञान देंगे ,जिस दिन हम इनके हाथ और पाँव की बिवाइयों को भरेंगे और जिस दिन इनको उद्योग और धंधों की शिक्षा देकर इनकी आय को ऊँचा उठा देंगे ,उसी दिन तो हमारा भ्रातृभाव व्यक्त होगा। ग्रामों में जहाँ समय अचल खड़ा है ,जहाँ माता और पिता अपने बच्चों के भविष्य को बनाने में असमर्थ हैं ,वहाँ जबतक हम आशा और पुरुषार्थ का संदेश नहीं पहुँचा पायेंगे तब तक राष्ट्र के  चैतन्य को जाग्रत नहीं कर सकेंगे । हमारी श्रद्धा का केंद्र ,आराध्य और उपास्य , हमारे पराक्रम और प्रयत्न का उपकरण तथा उपलब्धियों का मानदण्ड वह मानव होगा जो आज शब्दशः अनिकेत और अपरिग्रही है । जब हम उस मानव को ‘पुरुषार्थ चतुष्टयशील बनाकर समुत्कर्ष का स्वामी और विद्या- विनय सम्पन्न करके आध्यात्मिकता के साक्षात्कार से राष्ट्र और विश्व-सेवापारायण अनिकेतन और अपरिग्रही बना सकेंगे तभी हमारा ‘एकात्म मानव’ साकार हो सकेगा।”

http://ptvinodchoubey.blogspot.in/2017/09/blog-post_20.html?m=1

-भुवन सिंह कुशवाह

'कोंख बेचवा' कथित महिलाओं तथा अय्याश चण्ड-मुंण्ड राक्षसों को 'पंचमम् स्कन्द मातेति' के उपासना का अधिकार नहीं.- आचार्य पण्डित विनोद

'कोंख बेचवा' कथित महिलाओं तथा अय्याश चण्ड-मुंण्ड राक्षसों को 'पंचमम् स्कन्द मातेति' के उपासना का अधिकार नहीं.- आचार्य पण्डित विनोद चौबे(9827198828)

आज शारदीय नवरात्र के पंचम तिथि को 'पंचमम् स्कंद माते'ति' यानी स्कंदमाता का दर्शन करते हुए, भारत में ''कोंख के क्रय-विक्रय कर्ता दलालों'' पर प्रतिबंध लगाकर दण्डित कर, उन भोली-भाली माताओं को जागरुक करना चाहिये, जो कुछेक रुपयों की एवज़ में किराये पर कोंख देती हैं या यूं कहें कोंख का विक्रय करती हैं ! ऐसा करने से ही भगवान कार्तिकेय की मां ''स्कंदमाता'' की असल भक्ति होगी ! क्योंकि भारत की यह संस्कृति कभी नहीं रही है, हमारे देश की संस्कृति तो 'स्कन्दमाता' जैसी मातृवत्सला माताओं से समृद्ध रही है ना कि 'कोंख बेचवा'' माताओं से ! आज हमें इस ओर जन-जागृति लानी चाहिये ! मैं 2010 की एक दु:खद घटना का मैं स्वत: गवाह था , जिसे नवरात्र की आज पंचमी तिथि के 'स्कंदमाता' का स्मरण करते हुए एक सच्ची-दुर्घटना को बयां कर रहा हुं, हां मित्रों यह ''दुर्घटना ही था'' ! मैं अपने निवास शांतिनगर भिलाई से निकला रेलवे ढाला पार होते हुए बीएसएनएल सेक्टर-१ कार्यालय की ओर जा रहा था, तो देखा सुपेला रेलवे ट्रैक के पास सेक्टर-१ साईट की झाड़ियों में आठ या दस घंटे का नवजात शिशु (कन्या) मां के लिये अहक अहककर रो रही थी ! शायद उसे प्रतिक्षा होगी अपने मां और अभागा पिता की ! खैर, वहां कुछ लोगों की भीड़ देख मैं भी जिज्ञासावश जानना चाहा की क्यों भींड़ है ? तो मुझे पता चला की यह किसी विधर्मी व कुलटा या ज्योतिष में पुंश्चला योग वाली कथित मां का नवजात शिशु है, जिसे लड़की होने का बतौर दण्ड "एक मां से परित्याग" के रुप में झेलना पड़ा इससे बड़ा पीड़ा और क्या हो सकती है ? गर्भपात,  दुधमुहे बच्चों का यौन शोषण करने वाली मानसिकता वना ले वहसी राक्षस लोग, परायी महिलाओं पर बदनियत रखने की घृणित सोच वाले लोगों को ''पंचमम् स्कन्द माते'ति" का पूजो-पासना करने का अधिकार है ? या जिस देश में 'जनन' यानी जन्मदात्री 'मां' ''देवकी'' से अधिक महत्व ''लालन पालन करने वाली मां यशोदा" को दिया जिनके पुत्र बलराम और श्रीकृष्ण हैं, जिस देश भारत ने '' स्कन्दमाता के रुप में हमें प्राप्त हुईं, जिन्होंने अपने पुत्र 'स्कन्द'' का लालन पालन कर महान वीर, पराक्रमी पुत्रत्व का यश प्रदान किया, ऐसे भारत में ''कोंख बेचवा'' डायनों और गर्भपात एवं  महिलाओं पर बदनियत निगाह रखने वाले चण्ड-मुण्ड राक्षसों को नवरात्र भर में ही मात्र एक ही दिन 'स्कंदमाता' की भक्ति का कोई अधिकार है.? आप विचार किजीए ! मैंने तो भिलाई के पिछले दिनों की एक घटित घटना का प्रतिकात्मक वर्णन किया ! जबकी ऐसे कुकृत्य करने वाले चण्ड-मुंडों की मौजूदगी लगभग हर बड़े शहरों में है !

-आचार्य पण्डित विनोद चौबे
(ज्योतिष, वास्तु एवं कर्मकाण्ड विशेषज्ञ)
संपादक- 'ज्योतिष का सूर्य', भिलाई,9827198828

http://ptvinodchoubey.blogspot.in/2017/09/blog-post_24.html?m=1

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

दुर्गा सप्तशती के तीनों चरित्रों का रहस्य

मित्रों आज "तृतीयम् चन्द्रघंटेति" महामाया चन्द्रघंटा देवी आप सभी के मनोरथ को पूर्ण करें... आईए दुर्गा सप्तशती के बारे में चर्चा करते हैं......
'श्री दुर्गा सप्तशती' के सात सौ मन्त्र ब्रह्म की शक्ति चण्डी के मंदिर की सात सौ सीढियाँ है, जिन्हें पारकर साधक मंदिर में पहुँचता है। मार्कण्डेय पुराणोक्त 700 श्लोकी श्री दुर्गा सप्तशती मुख्यतः 3 चरित्रों में विभाजित है-
1. प्रथम चरित्र ( मधु-कैटभ-वध)
2. मध्यम चरित्र ( महिषासुर वध)
3. उत्तम चरित्र (शुम्भ-निशुम्भ-वध)
ये तीनो चरित 3 प्रकार के कर्म संस्कारो या वासनाओं -
1.सञ्चित
2.प्रारब्ध
3.भविष्यत्
  अथवा तीन गुणों -
1.सत्व
2.रज
3. तम
   अथवा तीन ग्रंथियों -
1.ब्रह्म ग्रन्थि
2. विष्णु ग्रन्थि
3. रूद्र ग्रन्थि
के प्रति न केवल हमारा ध्यान आकर्षित करते है अपितु एक सुंदर कथा के माध्यम से इनके मूल में हमारा प्रवेश भी करा देते है और जैसे ही मनुष्य उक्त तीनो के मूल में पहुँचता है, वैसे ही वह ब्रह्म की शक्ति भगवती चण्डिका के मन्दिर अर्थात सान्निध्य में पहुँच जाता है। सप्तशती के 700 श्लोक रुपी सीढियाँ ब्रह्म की शक्ति भगवती चण्डिका के पास पहुँचने के माध्यम है। श्री दुर्गा सप्तशती के तीनों चरितो के विनियोग से ही इस विषय का स्पष्ट आभास होता है। विनियोग के बारे में आप जानते हैं..? नहीं ना तो हमारी प्रकाशनाधीन ग्रंथ '' ब्रह्म यज्ञ कल्पअवश्य पढें अपनी प्रति आज ही बुक कराएं.. मात्र 600/रु. में ! डाक व्यय अतिरिक्त(आचार्य पण्डित विनोद चौबे, भिलाई, 9827198828) 

प्रथम चरित (मधु कैटभ वध) के ऋषि ब्रह्मा है। जिस मन्त्र के जो प्रथम द्रष्टा होते है, वे ही उस मन्त्र के ऋषि होते है। इस प्रकार "मधु कैटभ वध" रुपी प्रथम चरित के मन्त्रो के प्रथम द्रष्टा श्री ब्रह्मा है। "मधु-कैटभ-वध" अथवा "सतो गुण" का प्रलय विराट मन में ही संघटित होता है। मन के ही द्वारा सृष्टि होती है। विराट मन ब्रह्मा है और यही विराट मन अर्थात सृष्टि कर्ता ब्रह्मा प्रथम चरित के प्रथम दर्शक है। कथा में भी ऐसा वर्णित है कि ब्रह्मा ही मधु कैटभ वध के प्रथम कारण है।"महाकाली" देवता है। प्रलयंकारी तामसी शक्ति के अंक में ही सत्त्वादि गुणों का अवसान होता है। "गायत्री"- छंद है। प्राण का प्रवाह अथवा स्पंदन ही छंद कहलाता है। "प्रथम चरित" में प्रविष्ट साधक का प्राण स्पंदन ठीक वेद- माता गायत्री के समान होता है,इसीलिए इसका छंद गायत्री है। नन्दा या ह्लादिनी इसकी शक्ति है- यह विष्णु की शक्ति है जिसके द्वारा विष्णु ने "मधु कैटभ का वध" किया था। रक्त दन्तिका अर्थात परा-प्रकृति का रक्त- वर्णात्मक रजो- गुणात्मक चित्त ही इसका बीज है। रजो गुण की क्रियाशीलता द्वारा ही सतो गुण का लय होता है। अग्नि या तेजस तत्व में ही सभी भावो का लय होता है, अतः अग्नि ही इसका तत्व है। अग्नि या तेजस से ऋक या वाक् का आविर्भाव होता है। अतः ऋग्वेद इसका स्वरुप है। महाकाली प्रीत्यर्थे अर्थात प्रलयंकारी तामसी मूर्ति में साधक की प्रीति या आसक्ति के लिए ही प्रथम चरित का पाठ रूप कार्य अथवा विनियोग है।

मध्यम चरित ( महिषासुर-वध) के ऋषि विष्णु है। जिस समष्टि प्राण के कारण यह विराट ब्रह्माण्ड स्थित है, वे ही विष्णु है। रजो गुण का बहिर्मुख विक्षेप रूप "महिषासुर" इसी महाप्राण के अंक में विलय को प्राप्त होता है, अतः विष्णु ही मध्यम चरित के द्रष्टा या ऋषि है। "महालक्ष्मी" देवता है। 'लक्ष्मी' प्राण शक्ति का दूसरा नाम है। जब तक देह में प्राण शक्ति विराजित रहती है, तभी तक हम सबके नामो के आगे लक्ष्मी का दूसरा पर्याय 'श्री' शब्द प्रयुक्त होता है। व्यष्टि प्राण शक्ति का नाम 'लक्ष्मी' है एवं समष्टि प्राण शक्ति का नाम 'महालक्ष्मी' है। यह ब्रह्म की शक्ति भगवती चण्डिका की रजो-गुणात्मिका महती शक्ति है। इन्ही के द्वारा विषयासक्ति रूप विक्षेप नियंत्रित अथवा निहत होता है। इसलिए "महालक्ष्मी" ही मध्यम चरित की देवता है। उष्णिक इसका छंद है। इस चरित में प्रविष्ट साधक का प्राण प्रवाह उष्णिक नामक छन्द के समान स्पन्द युक्त होता है। 'शाकाम्भरी' मध्यम चरित की शक्ति है। शाकाम्भरी के संबंध में "श्री दुर्गा सप्तशती" में माँ स्वयं कहती है --

ततो$हमखिलं लोकमात्म-देह-समुद्भावै:।
भरिष्यामि सुरा: शकीरावृषटे: प्राण धारकै:।।
शाकम्भरीति विख्यातिं, तदा यास्याम्यहं भुवि ।
अर्थात जगत में एक ऐसा समय आयेगा जब अनावृष्टि से अर्थात ब्रह्म रस धारा के अभाव में जीव गण अतिशय दुखित और संतप्त हो पड़ेंगे, जब स्थूल जगत आत्म रस को खोज नहीं पायेगा, आत्मा को जगदातीत कह कर पूर्ण रूप से बहिर्मुखी हो जाएगा, तब मेरा आविर्भाव 'शाकाम्भरी मूर्ति' में होगा। यह विश्व ही हमारा देह है, इसे जीव गण को समझा दूंगी । विश्व का प्रत्येक पदार्थ प्राणमय है, एक मात्र चैतन्य वस्तु ही इस विश्व का उपादान है, यह उस समय जीव गण सहज ही अनुभव करने लगेंगे। एक मात्र सर्व व्यापी चैतन्य शक्ति को खोज कर ही तब मनुष्य स्वयं को पुष्ट कर सकेंगे। *
'शाकाम्भरी' मूर्ति के अवतरण का यही राहास्यार्थ है। मध्यम चरित का बीज दुर्गा है। इस संबंध में भी "श्री दुर्गा सप्तशती" में स्वयं भगवती उक्त श्लोक के बाद कहती है -

तत्रैव च वदिष्यामि, दुर्गमाख्यं महा$सुरम् ।
दुर्गा देवीति विख्यातं, तन्मे नाम भविष्यति ।।
अर्थात शाकाम्भरी मूर्ति से ही दुर्गम नामक असुर का वध कर मैं दुर्गा देवी नाम से विख्यात होऊँगी। जो संपूर्ण दुर्गति का हरण करती है, वे ही दुर्गा है। इस प्रकार दुर्गति हरण ही मध्यम चरित का बीज या मूल कारण है।
वायु तत्व अर्थात प्राणशक्ति जब आत्म प्रकाश करती है तब वायु रूप में उसकी अभिव्यक्ति होती है और वायु तत्व की अनुभूति होने पर ही 'यजुर्वेद' रूप यज्ञ मय शब्द राशि का प्रादुर्भाव होता है। इसीलिए वायु देवता के मन्त्र से ही 'यजुर्वेद' का आरंभ होता है। संक्षेप में महालक्ष्मी की प्रीति अर्थात महाप्राण मयी माँ के प्रति महती प्रीति प्राप्त करने का उद्देश्य ही मध्यम चरित का विनियोग है।

उत्तम चरित ( शुम्भ-निशुम्भ-वध) के ऋषि रूद्र है। रूद्र प्रलय के देवता है। जिस प्रकार सकल जगत भाव अर्थात संपूर्ण खण्ड ज्ञान एक अखण्ड ज्ञान समुद्र में विलीन होता है - ठीक उसी प्रकार जीवत्व की शेष ग्रन्थि या अस्मिता रूप 'शुम्भासुर:' अखण्ड ज्ञान में ही निःशेष रूप से विलय को प्राप्त होता है। इसलिए प्रलय के देवता रूद्र इस उत्तम चरित के ऋषि है। महासरस्वती इसकी देवता है क्योकि ब्रह्म की ज्ञान मयी शक्ति चण्डिका की शुभ्रा सत्व गुण मयी सरस्वती मूर्ति का आश्रय करके ही विशुद्ध बोध स्वरुप आत्म सत्ता का ज्ञान होता है और जीव भाव का सम्यक रूप से अवसान होता है।
उत्तम चरित का छन्द 'अनुष्टप' है क्योकि उत्तम चरित में जब साधक पहुँचते है, उनका प्राण प्रवाह 'अनुष्टुप' नामक शान्त छन्द के समान स्पन्दन विशिष्ट होता है।
इसी प्रकार 'भीमा' शक्ति भयंकरी प्रलयकारिणी महाशक्ति के अंक में ही जीवत्व का अवसान होता है, इसलिए उत्तम चरित की शक्ति 'भीमा' है। सप्तशती में ही वर्णित है कि मुनि गणों की रक्षा के लिए 'भीमा' शक्ति का आविर्भाव होता है। मुनि गण अर्थात मनन शील साधक गण जब राक्षसी प्रकृति द्वारा उत्पीड़ित होते है, तब ब्रह्म की शक्ति भगवती चण्डिका 'भीमा' रूप में प्रकट होती है और 'भ्रामरी' बीज अर्थात 'भ्रम विनाशिनी' रूप में आविर्भूत होकर 'अनात्म वस्तुओं में आत्मत्व सम्बन्धी सभी भ्रमो का नाश: कर देती है। यह भ्रम जीव शरीर में 'षट्-स्थानों' में प्रकाशित होता है, अतः 'चिन्मयी माँ षट्-पद-रूप भ्रामरी' कही जाती है।
उत्तम चरित का तत्व 'सूर्य' है। सूर्य शब्द का अर्थ है - प्रकाश स्वरुप वस्तु ज्ञान। जिस विमल ज्ञान के उदय होने पर अनादि काल का अज्ञान रुपी तिमिर दूर होता है, वही बोध इस उत्तम चरित का तत्व या प्रतिपाद्य विषय है। 'सामवेद' अर्थात 'सम्यक'http://ptvinodchoubey.blogspot.in/2017/09/blog-post_66.html?m=1
'साम्यावस्था' जो 'तत्व ज्ञान' से प्राप्त होती है, वही उत्तम चरित का स्वरुप है। अतः महासरस्वती ज्ञान मयी देवी की प्रीति के निमित्त इस चरित का 'विनियोग' है।
--आचार्य पण्डित विनोद चौबे,
संपादक- ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई
9827198828

॥ भगवती के ५१ प्रमुख शक्तिपीठ ॥

॥ भगवती के ५१ प्रमुख शक्तिपीठ ॥

1. किरीट कात्यायनी:-
पश्चिमी बंगाल में हुगली नदी के तट पर लालबाग कोट स्थित शक्तिपीठ, जहां सती का किरीट यानी "मुकुट" गिरा था।

2. कात्यायनी वृंदावन: -
मथुरा के भूतेश्वर में स्थित है कात्यायनी वृंदावन शक्तिपीठ, जहां सती के "केशपाश" गिरे थे।

3. नैनादेवी: -
पाकिस्तान के सक्खर स्टेशन के निकट शर्कररे और हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर स्थित नैनादेवी मन्दिर स्थलों पर सती के "नेत्र" गिरे थे।

4. श्रीपर्वत शक्तिपीठ: -
इस शक्तिपीठ को लेकर लोगों में मतांतर है। कुछ लोग मानते हैं कि इस पीठ का मूल स्थल लद्दाख है, जबकि कुछ कहते हैं कि यह असम के सिलहट में है जहां माता सती की "कनपटी गिरी" थी।

5. विशालाक्षी शक्तिपीठ: -
वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर स्थित इस शक्तिपीठ पर माता सती के "दाहिने कान के मणि" गिरे थे।

6. गोदावरी तट शक्तिपीठ: -
आन्ध्र प्रदेश के कब्बूर में गोदावरी तट पर स्थित इस शक्तिपीठ में माता का " गाल" गिरा था।

7. शुचीन्द्रम शक्तिपीठ: -
कन्याकुमारी के त्रिसागर संगम स्थल पर है शुचि शक्तिपीठ, जहां सती के "दांत" गिरे थे।

8. पंच सागर शक्तिपीठ: -
इस शक्तिपीठ का कोई तय स्थान ज्ञात नहीं है। यहां माता के "नीचे के दांत गिरे" थे।

9. ज्वालादेवी शक्तिपीठ:-
हिमाचल प्रदेश के कांगडा स्थित शक्तिपीठ, "जिह्वा गिरी" थी।

10. भैरव पर्वत शक्तिपीठ: -
मध्य प्रदेश के उज्जैन के निकट क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित इस शक्तिपीठ में माता का "ऊपर का होंठ गिरा" था।

11. अट्टहास शक्तिपीठ: -
यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के लाबपुर में स्थित है। यहां माता का "निचला होंठ" गिरा था।

12. जनस्थान शक्तिपीठ: -
महाराष्ट्र में नासिक स्थित पंचवटी के इस शक्तिपीठ में माता की "ठुड्डी" गिरी थी।

13. कश्मीर शक्तिपीठ:-
जम्मू कश्मीर के अमरनाथ स्थित इस शक्तिपीठ में माता का "कंठ" गिरा था।

14. नन्दीपुर शक्तिपीठ:-
पश्चिम बंगाल के सैन्थया स्थित इस पीठ में देवी की देह का "कंठहार गिरा" था।

15. श्रीशैल शक्तिपीठ: -
आन्ध्र प्रदेश के कुर्नूल के पास है श्रीशैल शक्तिपीठ, जहां माता का "गाल गिरा" था।

16. नलहरी शक्तिपीठ: -
पश्चिम बंगाल के बोलपुर में माता की "उदरनली गिरी" थी।

17. मिथिला शक्तिपीठ: -
भारत और नेपाल सीमा पर जनकपुर रेलवे स्टेशन के पास बने इस शक्तिपीठ में माता का "वाम स्कंध" गिरा था।

18. रावली शक्तिपीठ: -
चेन्नई में कहीं स्थित है रावली शक्तिपीठ, जहां माता का "दक्षिण स्कंध" गिरने का जिक्र आता है।

19. अम्बाजी शक्तिपीठ:-
गुजरात जूनागढ के गिरनार पर्वत के प्रथत शिखर पर देवी अम्बिका का विशाल मन्दिर है, जहां माता का "उदर" गिरा था।

20. जालंधर शक्तिपीठ: -
पंजाब के जालंधर में स्थित है माता का जालंधर शक्तिपीठ। यहां माता का "बायां स्तन" गिरा था।

21. रामागिरि शक्तिपीठ: -
कुछ लोग इसे चित्रकूट तो कुछ मध्य प्रदेश के मैहर में मानते हैं, जहां माता का "दाहिना स्तन गिरा" था।

22. बैद्यनाथ हार्द शक्तिपीठ: -
झारखण्ड के देवघर स्थित शक्तिपीठ में माता का "हृदय" गिरा था। मान्यता है कि यहीं पर सती का दाह-संस्कार भी हुआ था।

23. बक्रेश्वर: -
बीरभूम, पश्चिम बंगाल के पापहर नदी से सात किलोमीटर दूर स्थित इस शक्तिपीठ में सती का "भ्रूमध्य" गिरा था।

24. कण्यकाश्रम: -
तमिलनाडु के कन्याकुमारी के तीन सागरों- हिन्द महासागर, अरब सागर तथा बंगाल की खाडी के संगम पर स्थित है कण्यकाश्रम शक्तिपीठ, जहां माता की "पीठ गिरी" थी।

25. बहुला शक्तिपीठ:-
पश्चिम बंगाल के कटवा जंक्शन के निकट केतुग्राम में स्थित है बहुला शक्तिपीठ, जहां माता की "बायीं भुजा गिरी" थी।

26. उज्जयिनी शक्तिपीठ:-
उज्जैन की पावन क्षिप्रा के दोनों तटों पर स्थित है उज्जयिनी शक्तिपीठ, जहां माता की "कुहनी गिरी" थी।

27. मणिवेदिका शक्तिपीठ:-
राजस्थान के पुष्कर में स्थित है यह शक्तिपीठ, इसे गायत्री मन्दिर के नाम से जाना जाता है। यहां माता की "कलाईयां" गिरी थीं।

28. ललितादेवी शक्तिपीठ:-
प्रयाग (इलाहाबाद) स्थित ललितादेवी शक्तिपीठ में माता के "हाथ की अंगुलियां" गिरी थीं।

29. उत्कल पीठ:-
उडीसा के पुरी में है, जहां माता की "नाभि गिरी" थी।

30. कांची शक्तिपीठ:-
तमिलनाडु के कांचीवरम में माता का "कंकाल" गिरा था।

31. कमलाधव: -
अमरकंटक, मध्य प्रदेश के सोन तट पर "बायां नितम्ब गिरा" था।

32. शोण शक्तिपीठ: -
मध्य प्रदेश के अमरकंटक का नर्मदा मन्दिर ही शोण शक्तिपीठ है। यहां माता का "दायाँ नितम्ब" गिरा था।

33. कामरूप कामाख्या:-
असम, गुवाहाटी के कामगिरि पर "योनि गिरी" थी।

34. जयंती शक्तिपीठ: -
मेघालय के जयंतिया पर वाम "जंघा गिरी" थी।

35. मगध शक्तिपीठ: -
पटना में स्थित पटनेश्वरी देवी को ही शक्तिपीठ माना जाता है। यहां माता का "दाहिनी जंघा" गिरी थी।

36. त्रिस्तोता शक्तिपीठ:-
पश्चिम बंगाल के जलपाईगुडी के शालवाडी गांव में तीस्ता नदी पर माता का "वाम पाद" गिरा था।

37. त्रिपुरा सुन्दरी शक्तिपीठ:-
त्रिपुरा के राधकिशोर गांव में स्थित है त्रिपुरा सुन्दरी शक्तिपीठ, जहां माता का "दक्षिण पाद" गिरा था।

38. विभाष शक्तिपीठ: -
पश्चिम बंगाल के मिदनापुर के ताम्रलुक गांव में स्थित है विभाष शक्तिपीठ, जहां माता का "वाम टखना" गिरा था।

39. देवीकूप पीठ कुरुक्षेत्र: -
हरियाणा के कुरुक्षेत्र जंक्शन के निकट द्वैपायन सरोवर के पास स्थित है यह शक्तिपीठ। इसे श्रीदेवीकूप
(भद्रकाली पीठ) भी कहा जाता है। यहां माता का "दाहिना चरण" गिरा था।

40. युगाद्या शक्तिपीठ (क्षीरग्राम शक्तिपीठ): -
पश्चिम बंगाल के बर्दमान में क्षीरग्राम स्थित शक्तिपीठ, जहां सती के "दाहिने चरण का अंगूठा" गिरा था।

41. विराट का अम्बिका शक्तिपीठ: -
जयपुर के वैराट ग्राम में स्थित है विराट शक्तिपीठ, जहां माता की "बायें पैर की अंगुलियां" गिरी थीं।

42. काली शक्तिपीठ:-
कोलकाता के कालीघाट नाम से यह शक्तिपीठ, जहां माता के "दायें पांव का अंगूठा छोडकर चार अन्य अंगुलियां" गिरी थीं।

43. मानस शक्तिपीठ: -
तिब्बत के मानसरोवर तट पर स्थित है मानस शक्तिपीठ, जहां माता की "दाहिनी हथेली" गिरी थी।

44. लंका शक्तिपीठ:-
लंका शक्तिपीठ, जहां माता की "पायल" गिरी थी।

45. गंडकी शक्तिपीठ: -
नेपाल में गंडक नदी के किनारे "कपोल" गिरा था.

46. गुहेश्वरी शक्तिपीठ:-
नेपाल के काठमांडू में पशुपतिनाथ मन्दिर के पास ही स्थित है गुहेश्वरी शक्तिपीठ, जहां माता सती के "दोनों घुटने" गिरे थे।

47. हिंगलाज शक्तिपीठ: -
पाकिस्तान के बलूचिस्तान में माता का "सिर" गिरा था।

48. सुगंध शक्तिपीठ:-
बांग्लादेश के खुलना में "नासिका" गिरी थी।

49. करतोयतत शक्तिपीठ: -
बांग्लादेश भवानीपुर के बेगडा में करतोयतत के तट पर माता की "बायीं पायल" गिरी थी।

50. चट्टल शक्तिपीठ:-
बांग्लादेश के चटगांव में स्थित है चट्टल का भवानी शक्तिपीठ, जहां माता की "दाहिनी भुजा" गिरी थी।

51. यशोरेवरी शक्तिपीठ:-
बांग्लादेश के जैसोर खुलना में स्थित है माता का प्रसिद्ध यशोरेवरी शक्तिपीठ, जहां माता की "बायीं हथेली" गिरी थी।।

- आचार्य पण्डित विनोद चौबे,
संपादक- ''ज्योतिष का सूर्य''
9827198828

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

वैयाकरणीय श्रीमद्देवी रहस्यम् ....

(क) शक्ति के १० रूप-यह शक्ति की पूजा है। विश्व का मूल स्रोत एक ही है पर वह निर्माण के लिये २ रूपों में बंट जाता है, चेतन तत्त्व पुरुष है, पदार्थ रूप श्री या शक्ति है। शक्ति माता है अतः पदार्थ को मातृ (matter) कहते हैं। सभी राष्ट्रीय पर्वों की तरह यह पूरे समाज के लिये है पर क्षत्रियों के लिये मुख्य है, जो समाज का क्षत से त्राण करते हैं-
क्षतात् किल त्रायत इत्युदग्रः शब्दस्य अर्थः भुवनेषु रूढः। (रघुवंश, २/५३)
वेद में १० आयाम के विश्व का वर्णन है अतः दश, दशा, दिशा-ये समान शब्द हैं। १० आयाम कई प्रकार से हैं-
(१) ५ तन्मात्रा = भौतिक विज्ञान में माप की ५ मूल इकाइयां। इनके सीमित और अनन्त रूप ५-५ प्रकार के हैं।
(२) आकाश के ३ आयाम, पदार्थ, काल, चेतना या चिति, ऋषि (रस्सी-दो पदार्थों में सम्बन्ध), वृत्र या नाग (गोल आवरण), रन्ध्र (घनत्व में कमी-बेशी, आनन्द या रस।
(३) ३ गुणों (सत्व, रज, तम) के १० प्रकार के समन्वय-क, ख, ग,कख, खक, कग, गक, खग, गख, कखग।
(ख) महाविद्या-१० आयाम की तरह १० महा-विद्या हैं, जो ५ जोड़े हैं-
(१) काली-काला रंग, तारा-श्वेत।
(२) त्रिपुरा के २ रूप-सुन्दरी, भैरवी (शान्त, उग्र)।
(३) कमला-विष्णु-पत्नी, स्थायी सम्पत्ति, युवती, सुन्दर, रोहिणी नक्षत्र, इन्द्र-लक्ष्मी-कुबेर
धूमावती-विधवा, चञ्चल-दुष्ट, वृद्धा, कुरूप, ज्येष्ठा नक्षत्र, वरुण-अलक्ष्मी-यम।
(४) भुवनेश्वरी भुवन का निर्माण करती है, छिन्नमस्ता काटती है।
(५) मातङ्गी वाणी को निकालती है, बगलामुखी (वल्गा = लगाम) रोकती है।
१० महाविद्या के आयाम हैं-
(१) तारा-शून्य विन्दु, इसकी दिशा रेखा रूप में प्रथम आयाम।
(२) भैरवी-उग्र रूप-सतह रूप में दूसरा आयाम।
(३) त्रिपुरा-३ आयाम।
(४) भुवनेश्वरी-भुवन का निर्माण-४ मुख के ब्रह्मा की तरह।
(५) काली-काल रूप में ५वां आयाम। परिवर्तन का आभास काल है।
(६) कमला-विष्णु चेतना रूप में ६ठा आयाम, उनकी पत्नी।
(७) बगलामुखी-वल्गा, रस्सी, एक रोकता है, दूसरा जोड़ता है।
(८) मातङ्गी=हाथी, वृत्र घेरकर कता है, हाथी को रोकना (वारण) कठिन है।
(९) छिन्नमस्ता-काटना रन्ध्र बनाता है।
(१०) धूमावती-१०वां आयाम अस्पष्ट है, धूम जैसा।
विश्व के रचना स्तरों के अनुसार इनके रूप हैं-
(१) काली-पूर्ण विश्व, जिसमें १ खर्व ब्रह्माण्ड तैर रहे हैं।
(२) तारा-ब्रह्माण्ड के तारा।
(३) त्रिपुरा (षोड़शी)-सूर्य के तेज से यज्ञ हो रहा है, यह १६ कला का पुरुष है, क्रिया षोड़शी है।
(४) भुवनेश्वरी-क्रन्दसी (ब्रह्माण्ड) तथा रोदसी (सौर मण्डल) के बीच में सूर्य।
(५) छिन्नमस्ता-सूर्य से निकला तेज।
(६) भैरवी-निर्माण में लगी शक्ति।
(७) धूमावती-बिखरी शक्ति जिसका प्रयोग नहीं हुआ।
(८) बगलामुखी-पृथ्वी द्वारा रोकी या शोषित शक्ति।
(९) मातङ्गी-सूर्य के विपरीत दिशा में पृथ्वी का रात्रि भाग।
(१०) कमला-पृथ्वी पर की सृष्टि।
आध्यात्मिक रूप-शरीर के चक्रों में इनका स्थान है-
(१) काली-यह मूलाधार में सोयी हुई कुण्डलिनी शक्ति है।
(२) तारा-स्वाधिष्ठान चक्र का समुद्र और चन्द्रमा है। पश्यन्ती वाक् के रूप में यह तारा है। इसका देवता राकिनी है जो तारक मन्त्र रं (राम) है।
(३) त्रिपुर सुन्दरी-यह सहस्रार में १६ कला के चन्द्र जैसा विहार करती है। वहां सुधा-सिन्धु है (भौतिक रूप में मस्तिष्क का द्रव)।
(४) भुवनेश्वरी-बीज मन्त्र ह्रीं है जिसका अर्थ हृदय है। यह हृदय के अनाहत चक्र के नीचे चिन्तामणि पीठ पर विराजमान है, इसके सभी रूप भुवनेश्वर में हैं, अतः इस नगर का यह नाम है-
सुधा-सिन्धोर्मध्ये सुर-विटप-वाटी परिवृते, मणिद्वीपे नीपो-पवन-वति चिन्तामणि गृहे।
शिवाकारे मञ्चे परम शिव पर्यङ्क निलयां, भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्द लहरीम्॥ (सौन्दर्य लहरी, ८)
सुधा-सिन्धु = बिन्दुसागर। मणिद्वीप-उसके निकट लिङ्गराज। नीप (वट वृक्ष) का उपवन-मूल = बरगढ़, तना -यज्ञाम्र = जगामरा, मुण्ड = बरमुण्डा, द्रुम से द्रुम = दुमदुमा। चिन्तामणि गृह = चिन्तामणीश्वर। शिव रूपी मञ्च = मञ्चेश्वर। परमशिव = लिङ्गराज।
(५) त्रिपुरा भैरवी-मूलाधार में कुण्डलिनी का जाग्रत रूप।
(६) छिन्नमस्ता-आज्ञा चक्र में ३ नाड़ियों का मिलन-इड़ा, पिङ्गला, सुषुम्ना।
(७) धूमावती-मूलाधार के धूम्र रूप स्वयम्भू लिङ्ग को घेरे हुये।
(८) बगलामुखी-कण्ठ में वाणी तथा प्राण का नियन्त्रण-जालन्धर बन्ध द्वारा।
(९) मातङ्गी-यह कण्ठ के ऊपरी भाग में है, जहां से वाणी निकलती है।
(१०) कमला-यह नाभि का मणिपूर चक्र है जिसे मणि-पद्म कहते हैं।
(ग) नवरात्रि- नवम आयाम रन्ध्र या कमी है जिसके कारण नयी सृष्टि होती है, अतः नव का अर्थ नया, ९-दोनों है-नवो नवो भवति जायमानो ऽह्ना केतुरूपं मामेत्यग्रम्। (ऋक् १०/८५/१९)
सृष्टि का स्रोत अव्यक्त है, उसे मिलाकर सृष्टि के १० स्तर हैं , जिनक् दश-होता, दशाह, दश-रात्रि आदि कहा गया है-
यज्ञो वै दश होता। (तैत्तिरीय ब्राह्मण २/२/१/६)
विराट् वा एषा समृद्धा, यद् दशाहानि। (ताण्ड्य महाब्राह्मण ४/८/६)
विराट् वै यज्ञः। ...दशाक्षरा वै विराट् । (शतपथ ब्राह्मण १/१/१/२२, २/३/१/१८, ४/४/५/१९)
विराट् एक छन्द है जिसके प्रति पाद में १० अक्षर हैं। पुरुष (मनुष्य या विश्व) का कर्त्ता रूप भी अक्षर है, जो १० प्रकार से कार्य करता है-
अन्तो वा एष यज्ञस्य यद् दशममहः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण २/२/६/१)
अथ यद् दशरात्रमुपयन्ति। विश्वानेव देवान्देवतां यजन्ते। (शतपथ ब्राह्मण १२/१/३/१७ )
प्राणा वै दशवीराः। (यजु १९/४८, शतपथ ब्राह्मण १२/८/१/२२)
वर्ष के ३६० दिनों में ४० नवरात्र होंगे। अतः यज्ञ के वेद यजुर्वेद में ४० अध्याय हैं, तथा ४० ग्रह हैं (ग्रह = जो ग्रहण करे)-
यद् गृह्णाति तस्माद् ग्रहः। (शतपथ ब्राह्मण १०/१/१/५)
षट् त्रिंशाश्च चतुरः कल्पयन्तश्छन्दांसि च दधत आद्वादशम्।
यज्ञं विमाय कवयो मनीष ऋक् सामाभ्यां प्र रथं वर्त्तयन्ति। (ऋक् १०/११४/६)
४० नवरात्रके लिये महाभारत में युद्ध के बाद ४० दिन का शोक बनाया गया था, जो आज भी इस्लाम में चल रहा है। आजकल वर्ष में चन्द्रमा की १३ परिक्रमा के लिये १३ दिन का शोक मनाते हैं। ४० नवरात्रों में ४ मुख्य हैं-
(१) दैव नवरात्र-उत्तरायण के आरम्भ में जो प्रायः २२ दिसम्बर को होता है। भीष्म ने इसी दिन देह त्याग किया था। वे ५८ दिन शर-शय्या पर थे-युद्ध के ८ दिन बाकी थे, ४० दिन का शोक, ५ दिन राज्याभिषेक, ५ दिन उपदेश।
(२) पितर नवरात्र-दक्षिणायन आरम्भ-प्रायः २३ जून को।
(३) वासन्तिक नवरात्र-उत्तरायण में जब सूर्य विषुव रेखा पर हो।
(४) शारदीय नवरात्र-दक्षिणायन मार्ग में जब सूर्य विषुव रेखा पर हो।-ये दोनों मानुष नवरात्र हैं।
सभी नवरात्र इन समयों के चान्द्र मास के शुक्ल पक्ष में होते हैं-पौष, आषाढ़, चैत्र, आश्विन। आश्विन मास का नवरात्र सबसे अच्छा मानते हैं क्योंकि यह देवों की अर्द्ध-रात्रि है। रात्रि की शान्ति में ही सृष्टि होती है। मनुष्य का भी भोजन और कर्म दिन में होता है, पर शरीर का विकास रात्रि में सोते समय ही होता है।
शरत् काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी। (दुर्गा सप्तशती १२/१२)
आश्विन शुक्ल प्रतिपदा (१ तिथि) के एक दिन पहले आश्विन अमावास्या को महालया होता है, जो विश्व के अव्यक्त स्वरूप का प्रतीक है और इस दिन पितरों की पूजा होती है। उसके बाद नवरात्रि के ९ दिन सृष्टि के ९ सर्गों के प्रतीक हैं। ७वें दिन चन्द्रमा मूल नक्षत्र में रहता है, जो ब्रह्माण्ड (galaxy) का केन्द्र है और इस दिन महाकाली की पूजा होती है। अगले नक्षत्र आषाढ़ के २ भाग हैं-पूर्व, उत्तर। इन दिनों महा-लक्ष्मी, महा-सरस्वती की पूजा होती है।
दुर्गा पूजा में दुर्गा-सप्तशती का पाठ होता है, जो मार्कण्डेय पुराण का अंश है।
(घ) २ दुर्बलता-राजा सुरथ ने मन्त्री-शत्रु के राजनीतिक षड्यन्त्र से राज्य खोया। समाधि वैश्य ने परिवार के षड्यन्त्र से सम्पत्ति खोयी।
अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः। कोशो बलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः॥८॥
पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः। विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम्॥२२॥ (दुर्गा सप्तशती, १)
इन समस्याओं के साथ वे सुमेधा ऋषि के पास गये, जिन्होंने मिथिला के धनुष यज्ञ के बाद महेन्द्र पर्वत पर परषुराम को भी दीक्षा दी थी। उनका उपदेश ३ विशाल खण्डों में त्रिपुरा-रहस्य है। सुमेधा ऋषि को ही बौद्ध ग्रन्थों में सुमेधा बुद्ध कहा गया है, जिनका स्थान ओड़िशा में बौध जिला है। १० महाविद्या को बौद्ध १० प्रज्ञा-पारमिता कहते हैं।
अपनी दुर्बलता दूर करने के लिये आन्तरिक तथा बाहरी शत्रुओं से युद्ध करना पड़ता है जिसके लिये समाज में एकता होनी चाहिये। विश्व तथा एकत्व की प्रतीक दुर्गा हैं। देवी तथा उनके आयुधों का निर्माण ही देवों की सम्मिलित शक्ति से हुआ। युद्ध में शुम्भ ने जब आक्षेप कियाकि तुम दूसरों के सहारे क्यों लड़ रही हो तो देवी ने कहा कि उनके अतिरिक्त और कोई नहीं है तथा सभी शक्तियां पुनः उनके शरीर में ही समा गयीं।
अन्येषां चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः। निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत॥११॥
अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम्। ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्त दिगन्तरम्॥१२॥
अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम्। एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा॥१३॥ (सप्तशती, अध्याय २)
बलावलेपाद्दुष्टे त्वं मा दुर्गे गर्वमावह्। अन्यासां बलमाश्रित्य युद्ध्यसे यातिमानिनी॥३॥ देव्युवाच॥४॥
एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा। पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः॥५॥ (अध्याय १०! 

(श्री अरुण उपाध्याय, पूर्व आईएस अधिकारी जी द्वारा शोधपूर्ण आलेख उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है)

http://ptvinodchoubey.blogspot.in/2017/09/blog-post_65.html?m=1


जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारैर्द्विज उच्यते।
विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय उच्यते॥
              - (अत्रिसंहिता, श्लोकः १४०)
ब्राह्मणकुल में उत्पन्न हाेने वाला जन्म से ही 'ब्राह्मण' कहलाता है, उपनयन संस्कार हाे जाने पर 'द्विजश्रेष्ठ' कहलाता है, विद्या प्राप्त कर लेने पर 'विप्र' कहलाता है, इन तीनाें नामाें से युक्त हुआ ब्राह्मण 'श्राेत्रिय' कहा जाता है।

नमस्तस्यै , नमस्तस्यै नमो नम:....

नवार्ण मन्त्र का अर्थ : " ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाये विच्चे नमः " का अर्थ ---'ऐं' इस वाग्बीज से चित्स्वरूपा सरस्वती बोधित होती हैं, क्योंकि ज्ञान से ही अज्ञान की निवृत्ति होती है। महावाक्यजन्य पर ब्रहम कार वृत्ति पर प्रतिबिम्बित होकर वही चिद रूपा भगवती अज्ञान को मिटाती हैं।'ह्रीं' इस मायाबीज से सद्रूपा महालक्ष्मी विवक्षित हैं। त्रिकाल बाहय वस्तु ही नित्य है। कल्पित आकाशवादि प्रपंच के अपवाद का अधिष्ठान होने से सदरूपा भगवती ही नित्यमुक्ताहैं।'क्लीं' इस कामबीज से परमानंद स्वरूपा महाकाली विवक्षित हैं। सर्वानुभव संवेध आनंद ही परम पुरूषार्थ है I वही परात्पर आनंद महाकाली रूप है।'चामुण्डाये' शब्द से मोक्षकारणीभूत निर्विकल्पक ब्रहमाकार वृत्ति विवक्षित है। विपदादिरूप चमू को जो नष्ट करके आत्मरूप कर लेती है, वही 'चामुण्डा' ब्रहमविद्या है। अधिदैव के मूला ज्ञान और तूला ज्ञान रूप चण्ड-मुण्ड को वश में करने वाली भगवती चामुण्डा कही गयी है।'विच्चे' में 'वित्' 'च', 'इ' ये तीन पद क्रमेण चित, सत, आनन्द के वाचक हैं। वित् का ज्ञान अर्थ स्पष्ट ही है, 'च' नपुंसकलिंग सत का बोधक है, 'इ' आननदब्रहममहिषी का बोधक है।स्थान, करण, प्रयत्न तथा वर्णविभागशून्य,स्वयंप्रकाश जयोति 'परा' वाक् है। सूक्ष्म बीज से उत्पन्न अंकुर के समान किंचित विकसित शक्ति ही 'पश्यन्ती' है। अन्त: संकल्परूपा वाक् ही 'मध्यमा' है, व्यक्त वर्णादिरूप 'वैखरी' है।नवार्ण मन्त्र का अर्थ 'ऐं' इस वाग्बीज से चित्स्वरूपा सरस्वती बोधित होती हैं, क्योंकि ज्ञान से ही अज्ञान की निवृत्ति💫✨💥 होती है। महावाक्यजन्य पर ब्रहम कार वृत्ति पर प्रतिबिम्बित होकर वही चिद रूपा भगवती अज्ञान को मिटाती हैं। 'ह्रीं' इस मायाबीज से सद्रूपा महालक्ष्मी विवक्षित हैं। त्रिकाल बाहय वस्तु ही नित्य है। कल्पित आकाशवादि प्रपंच के अपवाद का अधिष्ठान होने से सदरूपा भगवती ही नित्यमुक्ता हैं। 'क्लीं' इस कामबीज से परमानंद स्वरूपा महाकाली विवक्षित हैं। सर्वानुभव संवेध आनंद ही परम पुरूषार्थ है। वही परात्पर आनंद महाकाली रूप है। 'चामुण्डाये' शब्द से मोक्षकारणीभूत निर्विकल्पक ब्रहमाकार वृत्ति विवक्षित है।💫✨💥 विपदादिरूप चमू को जो नष्ट करके आत्मरूप कर लेती है, वही 'चामुण्डा' ब्रहमविद्या है। अधिदैव के मूला ज्ञान और तूला ज्ञान रूप चण्ड-मुण्ड को वश में करने वाली भगवती चामुण्डा कही गयी है। 'विच्चे' में 'वित्' 'च', 'इ' ये तीन पद क्रमेण चित, सत, आनन्द के वाचक हैं। वित् का ज्ञान अर्थ स्पष्ट ही है, 'च' नपुंसकलिंग सत का बोधक है, 'इ' आननदब्रहममहिषी का बोधक है। स्थान, करण, प्रयत्न तथा वर्णविभागशून्य,स्वयंप्रकाश जयोति 'परा' वाक् है। सूक्ष्म बीज से उत्पन्न अंकुर के समान किंचित विकसित शक्ति ही 'पश्यन्ती' है। अन्त: संकल्परूपा वाक् ही 'मध्यमा' है, व्यक्तवर्णादिरूप 'वैखरी' है।💫✨💥
[9/21, 11:33 AM] जिहाद वाला लेख कालचक्र ग्रुप में १/९/२०१७ को पोस्ट किया: #लेडी_जिन्ना_बनने_की_राह_पर_चल_रहीं_हैं
#ममता_बनर्जी?………

तृणमूल कांग्रेस प्रमुख व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी वोटबैंक की राजनीति के तहत कब अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की सारी हदें लांघ जाती हैं संभवतः उन्हें भी पता नहीं होता। उनके दर्जनों फैसले इस बात पर मुहर लगाते हैं। अल्पसंख्यकों के प्रति एकतरफा झुकाव एक तरह से ममता बनर्जी की नई राजनीतिक पहचान बनती जा रही है। कभी अपने तीखे तेवरों की वजह से अग्निकन्या कही जाने वाली ममता बनर्जी आज हिंदू विरोध की प्रतीक बन गई हैं। लोग यहां तक कहने लगे हैं कि अग्निकन्या लेडी जिन्ना बनने की ओर अग्रसर हैं।

सवाल है कि क्या खुद को सेक्यूलर साबित करने के लिए हिंदुओं की भावनाओं को आहत करना जरूरी है। अगर नहीं, तो फिर क्यों अल्पसंख्यक वोटों को तुष्ट करने के लिए वे लगातार हिंदुओं की भावनाओं पर कुठाराघात कर रही हैं। मुस्लिम नाराज न हो जायें इसके लिए अगर दुर्गा पूजा या सरस्वती पूजा जैसे परंपरागत धार्मिक आयोजनों पर भी प्रतिबंध लगाना पड़े तो भी वे नहीं चूकतीं। उनके इस तरह के एकतरफा निर्णय को देखकर लगता ही नहीं कि उन्हें हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं का जरा सा भी ख्याल है। आलम यह है कि हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाकर अल्पसंख्यकों को तुष्ट करने की यह प्रवृत्ति खतरे के निशान को पार कर रही है। परिणाम, पश्चिम बंगाल से आये दिन छोटी छोटी बातों को लेकर हिंदू मुस्लिम दंगे की खबरें आ रही हैं। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण को लेकर कई बार उन्हें कोर्ट से भी फटकार मिल चुकी है। बावजूद इसके वे कोई सबक सीखने को तैयार नहीं हैं। अभी हाल ही में उन्होंने विजयादशमी व मुहर्रम एक ही दिन होने का हवाला देते हुए मूर्तियों के विसर्जन की समय सीमा शाम 6 बजे तक कर दी। मुहर्रम के जुलूस में किसी प्रकार की कोई बाधा न आये इसके लिए उन्होंने फरमान जारी कर दिया कि दुर्गा पूजा के बाद होने वाले मूर्ति विसर्जन पर 30 सितंबर की शाम 6 बजे से लेकर 1 अक्टूबर तक रोक रहेगी।

मुख्यमंत्री ने दलील दी कि चूंकि इस वर्ष दुर्गा पूजा और मुहर्रम एक ही दिन पड़ रहा है। इसलिए मुहर्रम के 24 घंटों को छोड़कर 2, 3 और 4 अक्टूबर को मूर्ति विसर्जन किया जा सकता है। मूर्ति विसर्जन की समय सीमा तय करने के ममता के इस फरमान ने लोगों को उद्वेलित कर दिया। ममता के इस नादिरशाही फैसले के खिलाफ कई संगठन मामले को कोर्ट में ले गए। अब कोर्ट की फटकार के बाद ममता सरकार ने अपने रुख में बदलाव लाते हुए विसर्जन के समय को बढ़ाते हुए रात 10 बजे तक कर दिया है। हालांकि याचिकाकर्ता इस समय को देर रात 1 बजे तक कराना चाहते थे।

पिछले साल भी ममता ने इसी तरह से मूर्ति विसर्जन पर प्रतिबंध जारी किया था, क्योंकि तब भी विजय दशमी मुहर्रम से एक दिन पहले मनाया गया था। इस फैसले के खिलाफ कोलकाता हाइकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। इस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि यह एक समुदाय को रिझाने जैसा प्रयास है। अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा था कि इससे पहले कभी विजयदशमी के मौके पर मूर्ति विसर्जन पर रोक नहीं लगी थी। हाई कोर्ट ने सरकार के निर्णय को 'मनमाना' करार दिया था और 'जनता के अल्पसंख्यक वर्ग को खुश करने' का राज्य द्वारा 'स्पष्ट प्रयास' कहा था।

बहरहाल, धर्मनिरपेक्षता का सबसे बड़ा लबादा ओढ़ने को आतुर ममता बनर्जी की ओर से मुस्लिम तुष्टिकरण की यह कोई पहली कोशिश नहीं है। इसके पहले भी रामनवमी पर निकलने वाले जुलूसों को रोकने की असफल कोशिश के साथ वे मालदा में वर्षों से चली आ रही दुर्गा पूजा पर प्रतिबंध लगा चुकी हैं। इसी तरह अभी हाल ही में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के कार्यक्रम को रोकने के लिए महीनों पूर्व की गई हॉल की बुकिंग को निरस्त कर दिया गया। अपनी सियासी गोटी फिट करने के लिए ममता बनर्जी की ओर से की जा रही ये उलजुलूल हरकतें राज्य में अपना पांव जमाने की कोशिश कर रही भाजपा को खाद पानी मुहैया करा रहा है। बावजूद इसके कि वह भाजपा को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त करने के मूड में नहीं दिखती। कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि ममता की गलतियां ही भाजपा को राज्य में पनपने का अवसर प्रदान कर रही हैं।
- आचार्य पण्डित विनोद चौबे
9827198828

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.