ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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रविवार, 29 सितंबर 2013

कैसा रहेगा पिता-पुत्र का संबंध, क्यों रहती है अनबन..??

कैसा रहेगा पिता-पुत्र का संबंध, क्यों रहती है अनबन..??

आजकल प्रायः देखा जाता है कि पिता पुत्र में अनबन की स्थिति बनी रहती है और कभी कभी तो ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि पुत्र पैतृक निवास का परित्याग कर अपनी पत्नी के साथ अन्यत्र निवास करने लगता है और ‘क्रौंच’ पर्वत पर निवासरत भगवान शिवपुत्र स्कन्द जैसा आजीवन पैतृक-निवास न जाने का संकल्प ले लेता है। आखिरकार ऐसी स्थिति उत्पन्न करने वाले ग्रहों की क्या भूमिका होती है, आईए इसे फलित ज्योतिष के आधार पर जानने का प्रयास करते हैः-

पिता का पुत्र से स्वाभाविक स्नेह का संबंध होता है तो पुत्र का संबंध पिता के प्रति आदर भाव एवं पिता के सम्मान से होता है। ऎसा नहीं है कि यह संबंध मानव के बनाए हैं कि अमुक का पुत्र अमुक है अपितु यह संबंध अनादिकाल से बने हैं जो धरती पर देखने में आते हैं। हमारे नवग्रह मंडल में भी कुछ ग्रहों में आपस में पिता-पुत्र संबंध हैं जो कि व्यक्ति की जन्मपत्रिका को भी प्रभावित करते हैं। यह पिता-पुत्र सूर्य एवं शनि तथा चंद्रमा एवं बुध हैं।

सूर्य एवं शनि:—

 पौराणिक कथाओं के अनुसार त्वष्टा की पुत्री संज्ञा का विवाह सूर्यदेव के साथ हुआ था। वैवस्वत मनु, यम और यमी के जन्म के बाद भी वे सूर्य के तेज को सहन नहीं कर सकीं और अपनी छाया को सूर्य देव के पास छो़डकर चली गई। सूर्य ने छाया को अपनी पत्नी समझा और उनसे सावण्र्य, मनु, शनि, तपती तथा भद्रा का जन्म हुआ। जन्म के पश्चात जब शनि ने सूर्य को देखा तो सूर्य को कोढ़ हो गया। सूर्य को जब संज्ञा एवं छाया के भेद का पता चला तो वे संज्ञा के पास चले गए। सूर्य पुत्र शनि का अपने पिता से वैर है। ज्योतिष शास्त्र में फलादेश करते समय भी इस तथ्य का ध्यान रखा जाता है। इनके वैर को इस प्रकार समझा जा सकता है कि सूर्य जहां मेष राशि में उच्चा के होते हैं वहीं शनि मेष में नीच के होते हैं। सूर्य तुला में नीच के होते हैं तो शनि तुला में उच्चा के होते हैं। यदि दोनों एक साथ किसी एक ही राशि में बैठ जाएं तो पिता-पुत्र का परस्पर विरोध रहता है या एक साथ टिकना मुश्किल हो जाता है। सूर्य के परम मित्र चन्द्रमा से शनि का वैर है और शनि की राशि में सूर्य जीवन में कुछ कष्ट अवश्य देते हैं परन्तु जैसे सोना तपकर निखरता है वैसे ही सूर्य-शनि की यह स्थिति भी कष्टों के बाद जीवन में सफलता लाती है।

सूर्य आध्यात्मिक प्रवृत्ति के हैं तथा शनिदेव आध्यात्म के कारक हैं, अत: जन्मपत्रिका में सूर्य एवं शनि की युति व्यक्ति को धर्म एवं आध्यात्म की ओर उन्मुख करती है। कुछ संतों की जन्मपत्रिका में सूर्य-शनि की युति देखी जा सकती है, जिनमें सत्य साँई बाबा एवं मीरा बाई के नाम हैं।

चन्द्र-बुध:—

 पौराणिक कथाओं के अनुसार चन्द्रमा ने अपने गुरू बृहस्पति की भार्या तारा का अपहरण किया। तारा और चन्द्रमा के सम्बन्ध से बुध उत्पन्न हुए। बालक बुध अत्यन्त सुन्दर और कांतिवान थे। अत: चन्द्रमा ने उन्हें अपना पुत्र घोषित किया और उनका जातकर्म संस्कार करना चाहा। तब बृहस्पति ने इसका प्रतिवाद किया। बृहस्पति बुध की कांति से प्रभावित थे और उन्हें अपना पुत्र मानने को तैयार थे। जब चन्द्रमा और बृहस्पति का विवाद बढ़ गया तब ब्रह्मा जी के पूछने पर तारा ने उसे चन्द्रमा का पुत्र होना स्वीकार किया। अत: चन्द्रमा ने बालक का नामकरण संस्कार किया और उसे बुध नाम दिया गया। चन्द्रमा का पुत्र माने जाने के कारण बुध को क्षत्रिय माना जाता है। यदि उन्हें बृहस्पति का पुत्र माना जाता तो उन्हें ब्राह्मण माना जाता। बुध का लालन-पालन चन्द्रमा ने अपनी प्रेयसी पत्नी रोहिणी को सौंपा। इसलिए बुध को "रौहिणेय" भी कहते हैं।

बुध-चन्द्रमा के पुत्र थे और बृहस्पति ने उन्हें पुत्र स्वरूप स्वीकार किया था। अत: चन्द्रमा और बृहस्पति दोनों के गुण बुध में सम्मिलित हैं। चन्द्रमा गन्धर्वो के अधिपति हैं। अत: उनके पुत्र होने के कारण गन्धर्व विद्याओं के प्रणेता हैं। बृहस्पति के प्रभाव के कारण ये बुद्धि के कारक हैं। चन्द्रमा ने छल से तारा का अपहरण किया था, पिता के संस्कारों एवं स्वभाव का प्रभाव पुत्र पर भी निश्चित रूप से किसी न किसी प्रकार से प़डता ही है, अत: बुध का सम्बंध भी छल कपट से जो़डा गया है, मुख्य रूप से सप्तम स्थान स्थित बुध का। जन्मपत्रिका में अकेले बुध ही कई बार व्यक्ति को छल-कपट का आचरण करने पर विवश कर देते हैं।
अपने बारे में ज्योतिषिय समाधान हेतु यहाँ संपर्क करें..http://www.jyotishkasurya.com/Contact.aspx#
-ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, संपादक ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

पार्वण श्राद्ध (पिण्डदान) की एक झलक..

पार्वण श्राद्ध (पिण्डदान) की एक झलक..


आज पितृपक्ष का अष्टमी तिथि थी। इसी तिथि को हमारी माता स्व.श्रीमती माया देवी (9जनवरी 1998) एवं  पिता स्व.श्री रामजी चौबे जी का (05जनवरी2013) को स्वर्गवास हुआ था। अतः आज अपने माता-पिता एवं पितामह, प्रपितामह (सपत्निकस्य) साथ में द्वितीय कुल मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह (सपत्निकस्य) को याद करते हुए अपराह्न काल में पार्वण श्राद्ध के अन्तर्गत जो करते बना शास्त्र सम्मत हमने पिष्डदानादि कार्य किया। मुझे विश्वास है कि भारतीय संस्कृति में पला-बढ़ा हर पुत्र यह पुनीत कार्य अवश्य करेगा।
हर युवा पीढ़ी..अपने आदरणीय पितरों को इस 16 दिवसीय पितृ-महायज्ञ में याद अवश्य करेगा। साथ ही मैं चलते-चलते यह भी बताना चाहूंगा कि जीतेजी माता-पिता की जो सेवा सुश्रुसा नहीं किया उस पुत्र को पिण्डदान देने मात्र से पितृ-दोष से मुक्ति नहीं मिलने वाला। अतः आप सभी चाहें किसी भी धर्म व सम्प्रदाय को मानने वाले हों आप लोग अपने माता-पिता का कत्तई अनादर न करें..यही वास्तवीक पितृ-यज्ञ है और पितृ-दोष से मुक्ति का उपाय भी। 













गुरुवार, 19 सितंबर 2013

''फिर ताजा होगी पितरों की भूलि-बिसरी यादें''.

''फिर ताजा होगी पितरों की भूलि-बिसरी यादें''
पितरों को समर्पित आलेख......

मित्रों सुप्रभात, 'हरिभूमि' समाचार पत्र में प्रकाशित लेख ''फिर ताजा होगी पितरों की भूलि-बिसरी यादें'' पितरों को समर्पित आलेख के माध्यम से एक बार पुनः उन पितरों को नमन करता हुँ, साथ ही ईस्पात् भूमि (हरिभूमि) के ब्यूरो चीफ श्री आलोक तिवारी Alok Tiwari जी सहित उनके तमाम सहयोगी पत्रकार साथियों का हार्दिक आभार।।..यूँ ही भारतीय संस्कृति का अलख जगाये रखें...

बुधवार, 18 सितंबर 2013

पितृ-दोष से मुक्ति पितृपक्ष में...

पितृ-दोष से मुक्ति पितृपक्ष में...

आप सभी मित्रों के पितृजनों सहित स्वयं के माता-पिता को नमन करते हुए...पितृयज्ञ के 16 दिवसीय इस महा अनुष्ठान (पितृयज्ञ) की आप सभी को बधाई...शुभकामनाएँ..भारतीय पुराकाल के समस्त ऋषि, महर्षियों, मुनियों, वेदज्ञों को नमन।

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

गजकेशरी योग में आयेंगे गणपति बप्पा (9 सितंबर 2013 सोमवार)

  गणेश महोत्सव 2013
गजकेशरी योग में आयेंगे गणपति बप्पा  (9 सितंबर 2013 सोमवार)
भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश जी का जन्म दोपहर में हुआ। अत: मध्याह्न में ही गणेश पूजन करना चाहिए। 9 सितम्बर  2013 सोमवार , भाद्र पद शुक्ल चतुर्थी संवत  2070 को गणेश पूजन का समय निम्नानुसार है -
गजकेशरी योग में मनेगी श्रीगणेश चतुर्थी
भाद्रपद मास के गणेश चतुर्थी के दिन गुरु-चंद्रमा नवम पंचम होने से गजकेशरी संयोग निर्मित हो रहा है। इस बार गणेश चतुर्थी 9 सितंबर को है। इस पर्व को गणेश चतुर्थी, विनायकी महा चतुर्थी व गणेश जयंती के रूप में 11 दिवसीय गणेशोत्सव मनाया जाता है लेकिन इस बार नवमी-दशमी एक दिन होने से 18 सितंबर को अनन्त चतुर्थी को 10वें दिन विसर्जन होगा। तिथि क्षय होने से यह स्थिति बनी है। स्वाती नक्षत्र के उपरान्त विशाखा का भोग आरंभ हो जायेगा साथ ही गुरु-चंद्रमा नवम पंचम होने से गजकेशरी संयोग निर्मित हो रहा है। गजकेशरी संयोग का यह महा संयोग न केवल गणेश अर्चना के लिए शुभ है बल्कि आज के दिन नये व्यापार की शुरुआत, सोना चाँदी की खरीदी, भवन, भूमि, वाहन आदि की का क्रय करना एवं तीर्थयात्रा की शुरुआत आदि करना बेहद लाभदायी, फलदायी साबित होगा।
गजकेशरी के इस महासंयोग में मिट्टी के द्वारा निर्मित गणपति का पूजन अर्चन अनन्तगुणा फल दायिनी होगी।

गणेश स्थापना के शुभ मुहूर्त इस प्रकार है:

अमृत का चौघड़िया - 6: 15 से 7: 42 प्रात:
शुभ का चौघड़िया -  9: 08 से  10: 35 प्रात:
लाभ की चौघड़िया - 2: 56 से  4: 23 दोप.
अमृत की चौघड़िया - 4 : 23 से 05: 50 सायं
शुभ की चौघड़िया  - 07: 17 से 08:44 रात्रि तक

वृश्चिक लग्न   -  10: 58 से 01: 10 तक दिन में
(उपरोक्त मुहूर्त का समय भिलाई के अक्षांश 21:13 पर आधारीत है, अन्य स्थान विशेष अक्षांश के अनुसार समय निर्धारीत कर लें)

गणेशोत्सव के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ -

1. गणेश उत्सव भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को शुभ मुहूर्त में गणेश पूजन से प्रारम्भ होता है तथा दस दिन बाद अनन्त चतुदर्शी को समाप्त होता है।
2. अनन्त चतुदर्शी को भक्त जन गणेश प्रतिमा को  पास के तालाब  या झील में विसर्जित करते है। अत: इसे विसर्जन दिवस भी कहा जाता है।
3. गणेश चतुर्थी को भगवान  गणेश के जन्म  दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।
4. ऐसा माना  जाता है कि इसी दिन भगवान शिव ने भगवान गणेश को अन्य देवी देवताओं से श्रेष्ठ घोषित किया था।
5. भगवान गणेश को बुद्धि , समानता और सौभाग्य के  देवता के रूप में पूजा जाता है।
6. ऐसी मान्यता है की गणेश चतुर्थी की रात्रि में चंद्रमा को नहीं देखना चाहिये। इस दिन चन्द्र दर्शन करने से चोरी का झूठा आरोप लग सकता है। इस आरोप या कलंक के निवारण हेतु स्यमन्तक की कथा को सुननी चाहिये।

गणेश जी के 12 नाम
प्रथम पूज्य गणेश जी का नाम  गणेश क्यों पड़ा ?  तो इसका सीधा संबंध संस्कृत के इस व्यूत्पत्ती से लगाया जा सकता है गणानाम् ईश: अर्थात् गणेश: गणपति आदिदेव हैं अपने भक्तों के समस्त संकटों को दूर करके उन्हें मुक्त करते हैं गणों के स्वामी होने के कारण इन्हें गणपति कहा जाता है. प्रथम पूज्य देव रूप में यह अपने भक्तों के पालनहार हैं. इनके बारह नामों:-एकदंत, सुमुख, लंबोदर, विनायक, कपिल, गजकर्णक, विकट, विघ्न-नाश, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र तथा गजानन तथा गणेश इन बारह नामों का प्रतिदिन जप करने से जीवन में सुख शांति, समृद्धि, व्यापारिक उन्नति, नौकरी में उच्चाधिकारियों से अच्छा सामंजस्य और विद्यार्थी मेधावी छात्र होकर अपने कुल का नाम रोशन करते हैं।

भगवान गणपति हमारे जीवन को सुखी, समृद्ध बनाता गणेश परिवार (ऐतिहासिक, आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य में)

भगवान शिव के पुत्र गणेश स्वयं कई संस्कृतियों के समायोजन के प्रतिमूर्ति हैं, जैसे मैदानी इलाके में निवासरत भगवान परशुराम से लेकर दक्षिण भारत में स्थित क्रौंच पर्वत जहाँ इनके बड़े भाई स्कन्द निवास करते हैं और स्वयं कैलाश पर्वत पर अपने पिता भगवान शिव के साथ विराजीत हैं जहाँ पर्वतीय संस्कृति के प्रर्वतक भगवान गणेश को ही माना गया है। इन परिस्थितियों को देखकर यह कहना यथार्थ होगा कि भारत की अखण्डता में भगवान गणेश की अहम भूमिका रही है, जिसे देखकर सर्वप्रथम पुणे में शिवाजी महराज और जीजाबाई के द्वारा गणेश महोत्सव सभी पेशवाओं को एकत्रित करने के उद्देश्य से आरंभ किया गया। जो बाद में बाल गंगाधर तिलक जी ने भारत की स्वतंत्रता में समग्र भारतवासियों के पारस्परिक भेदभाव को मिटाकर पूजा को सार्वजनिक महोत्सव का रूप देते हुए उसे केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि आजादी की लड़ाई, छुआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने तथा आम आदमी का ज्ञानवर्धन करने का उसे जरिया बनाया और उसे एक आंदोलन का स्वरूप दिया। इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
ऐसे गणपति के सारगर्भित रहस्य को जानना बेहद आवश्यक है।

गणेश परिवार में सदस्य :
भगवान गणेश के परिवार में उनकी सिद्धि, बुद्धि नामक दो पत्नियाँ तथा क्षेम और लाभ दो पुत्र हैं। उनका वाहन मूषक है। भगवान गणेश स्वयं कर्त्तव्य निष्ठता, कर्म पारायणता के प्रतीक हैं, अर्थात् जो व्यक्ति क्रियाशील होगा, कर्म पारायण होगा उन्हीं पर भगवान गणेश की कृपा होगी।  यदि गणेश जी की कृपा होगी तभी उनकी माँ लक्ष्मी की कृपा गणेश भक्तों पर होगी, क्योंकि महामाया माँ लक्ष्मी के दत्तक पुत्र गणेश हैं। सिद्धि, बुद्धि नामक दो पत्नियाँ   भगवान गणेश जी की हैं, जिन भक्तों के घर में भगवान गणेश विराजीत होंगे उन्हीं के घर लक्ष्मी रहेंगी और जिनके घर माँ लक्ष्मी रहेंगी उनके यहाँ सिद्धि और बुद्धि का निवास होगा। सिद्धि का तात्पर्य किसी भी कार्य, व्यवसाय में सफलता। बुद्धि का तात्पर्य घर में खुशनुमा माहौल का होना और मेधावी बच्चों से भरापूरा परिवार का होना, व्यारपार का संचालन बौद्धिक क्षमता की प्रबलता होती है। जिनके घर में भगवान गणेश रहेंगे वहाँ किसी भी प्रकार का विघ्नबाधा नहीं रहेगी और उनके घर गजानन पुत्र क्षेम और लाभ दोनो स्थाई तौर पर निवास करेंगे। अत: गणेश जी कर्म के प्रतीक हैं और इनका परिवार हम सभी को सदैव क्रियाशील रहने का संदेश देता है। साथी ही वाहन मूषक से भी हमें कर्मपारायणता की सीख मिलती है, क्योंकि आपने देखा होगा मूषक हमेशा किसी ना किसी वस्तु को कुतरता ही रहता है, यदि मूषक चार दिन भी कुतरना बंद कर दे तो उसका दांत इतना बढ़ जायेगा कि वह बेमौत मर जायेगा। इसलिए वह हमेशा कुछ ना कुछ कुतरते ही रहता है, जो कर्म पारायणता का द्योतक है। अत: व्यावहारिक जगत में हरेक मानवीय सिद्धांतो के दिनचर्या का सीधा संबंध भगवान गणपति से है अत: गणेश जी के पूजन अर्चन करने के साथ ही उनके जीवन चरित्र को मनुष्य यदि अपने जीवन में उतारता है तो निश्चित ही सुखी, समृद्धिशाली और देश का सबसे बड़ा उद्योगपति बन सकता है।

तजऊ चौथी के चंदा की यह कथा इस प्रकार है :-
श्री कृष्ण की द्वारकापुरी में सत्राजित ने सूर्य की उपासना से सूर्य के समान प्रकाश वाली और प्रतिदिन आठ भार सुवर्ण देनेवाली 'स्यमन्तक' मणि प्राप्त की थी। एक बार उसे संदेह हुआ कि शायद श्री कृष्ण इसे छीन लेंगे। यह सोच कर उसने वह मणि अपने भाई प्रसेन को पहना दी। दैव योग से वन में शिकार के लिए गये हुये प्रसेन को सिंह खा गया और सिंह से वह मणि जाम्बवान छीन कर ले गए। इस से श्री कृष्ण पर यह कलंक लग गया कि 'मणि के लोभ से उन्होंने प्रसेन को मार डाला। '
अन्तर्यामी श्री कृष्ण जाम्बवान की गुहा में गए और 21 दिन तक घोर युद्ध करके उनकी पुत्री जाम्बवती को तथा स्यमन्तक मणि को ले आये। यह देख कर सत्राजित ने वह मणि उन्हीं को अर्पण कर दी। कलंक दूर हो गया।

गणेश जी मुख्य आठ अवतार:

वक्रतुण्ड् महाकाय सूयर्कोटि समप्रभ
निर्विघ्नं कुरुमेदेव: सर्व कार्येषु सर्वदा॥

मुदगल पुराण में उल्लेख मिलता है कि गणेश जी के अनेक अवतार है, इनमे मुख्य आठ अवतार है. पद्म पुराण के अनुसार गणेश जी को कभी तुलसी अर्पण नही करनी चाहिए ह्यन तुलस्या गणाधिपमह्ण. गणपति जी को दूर्वा अर्थात देसी घास सबसे अधिक प्रिय है. उन्हे केवल 3 या 5 पत्ती वाली दूर्वा अर्पण करनी चाहिए. सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा करके विधि पूर्वक नवग्रह पूजन करने से सभी कार्यों का फल प्राप्त होता है और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है.

राशियों के अनुसार अलग-अलग पूजन:

मेष : आपकी राशि का स्वामी मंगल है अत: आप गणपति पूजन में विशेष तौर पर पानी में हरी इलायची डाल कर स्नान करें, लाल टीका लगाएं, लड्डू के साथ गुलाब जामुन का भोग लगाएं, हरी दूर्वा के साथ लाल फूल अर्पण करें, ओम मंगलाय नम: का जाप करें.

वृष : आपका राशीश शुक्र है अतएव श्वेत वस्तुओं का प्रयोग  अधिक करना चाहिए। पानी में दही मिला कर स्नान करें, चंदन का टीका लगाएं, बरफी व लड्डू का भोग लगाएं, ओम काव्याय नम: का जाप करें , दूर्वा अवश्य अर्पण करें.

मिथुन : बुध  आपकी राशि के कारकेश हैं अत: गणपति पक्ष में गणेश अर्चन में  गुड़ मिला कर स्नान करें, हरी दूर्वा के साथ बेलपत्र अर्पण करें, घिया (भथुआ) की बरफी का भोग लगायें, ओम मनोहराय नम: का जाप करें.

कर्क : जल के देवता चंद्र से प्रभावित आपकी राशि है, क्योंकि राशीश है अत: दूध पानी में मिला कर स्नान करें, चंदन का टीका लगाएं, लड्डू के साथ कलाकंद का भोग लगायें, दूर्वा और चमेली के फूल अर्पण करें, ओम चंद्रशेखराय नम: का जाप करें.

सिंह : थोड़ी सी शक्कर(कांदा अथवा गन्ने का) पानी में मिला कर स्नान करें, रोली का टीका लगाएं, गेहू के आटे के हलवे का भोग लगाएं, ओम कत्रे नम: का जाप करें. दूर्वा अर्पण करें.

कन्या :  हरे कपड़े से श्रृंगार, हरी दूर्वा पानी में मिला कर स्नान करें, केसर का टीका लगाएं, लड्डू के साथ पेठे का भोग लगाएं, ओम ग्रहोपमाय नम: का जाप करें, गणाती जी को दूर्वा अर्पण करें.

तुला :  मिश्री अथवा गुड़ जल में मिला कर स्नान करें, चंदन का इत्र लगाएं , रसमलाई के साथ मोदक का भोग लगाएं, दूर्वा अर्पण करें , ओम भृंगराजाय नम: का जाप करें.

वृश्चिक : लाल चंदन पानी में मिला कर स्नान करें, लाल टीका लगाएं, मूंग दाल हलवा व लड्डू का भोग लगाएं, लाल गुलाब व दूर्वा अर्पण करें, ओम प्रबोधनाय नम: का जाप करें.

धनु : सौभाग्यवती महिलाएँ एवं कुंवारी बालाएँ दोनों ही हल्दी पानी में मिला कर स्नान करें, केसर का टीका लगाएं, बेसन के लड्डू का भोग लगाएं, ओम बागिशाय नम: का जाप करें.

मकर : काले तिल पानी में मिला कर स्नान करें, चंदन का टीका लगाएं, गूढ़ेल का फूल तथा दूर्वा अर्पण करें, तिल के लड्डू का भोग लगाएं, ओम अनंतकाय नम: का जाप करें.

कुंभ : थोड़ी सी साबुत काली मिर्च पानी में डाल कर स्नान करें, सिंदूर का टीका लगाएं, दूर्वा अर्पण करें, काले गुलाब जामुन का भोग लगाएं, ओम शौरये नम: का जाप करें.

मीन : केसर जल में मिला कर स्नान करें, चंदन का तिलक लगाएं, पीला फूल व दूर्वा अर्पण करें बेसन के हलवे   का भोग लगाएं, ओम गुणानिधय नम: का जाप करें.


प्रमाणीकरण
मैं ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, निवासी शांतिनगर भिलाई (छ.ग.) यह प्रमाणित करता हुँ कि इस आलेख पर किसी का कोई प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष अधिकार नहीं है, न कहीं कहीं प्रकाशित किया गया है हमारे द्वारा संचालित ब्लॉग, साईट, सोशल पेजेस् के अलावा उपरोक्त आलेख को प्रकाशित करने का केवल अधिकार  दैनिक राजप्रकाश समाचार पत्र (भिलाई से प्रकाशित) के इतर अन्य किसी को नहीं है। अन्य कोई भी कट/पेस्ट कर हमारे आलेख को कहीं अन्यत्र प्रकाशित करता है तो उस पर संवैधानिक कार्यवाही करने को हमें बाध्य होना पड़ेगा। (आदेशानुसार- ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे,
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