ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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बुधवार, 18 सितंबर 2013

पितृ-दोष से मुक्ति पितृपक्ष में...

पितृ-दोष से मुक्ति पितृपक्ष में...

आप सभी मित्रों के पितृजनों सहित स्वयं के माता-पिता को नमन करते हुए...पितृयज्ञ के 16 दिवसीय इस महा अनुष्ठान (पितृयज्ञ) की आप सभी को बधाई...शुभकामनाएँ..भारतीय पुराकाल के समस्त ऋषि, महर्षियों, मुनियों, वेदज्ञों को नमन।


-ज्योतिषाचार्य पं विनोद चौबे, शांतिनगर, भिलाई
जब सूर्य कन्या राशि पर गोचर कर रहा होता है। तब पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किया गया दान, तर्पण, भोजन पिंड आदि देकर पितृ दोष शांति करने से पितरों के आशीर्वाद से व्यक्ति का जीवन सफल हो जाता है और व्यक्ति की कुंडली में स्थित पितृ दोष का प्रभाव भी कम हो जाता है। पितृ दोष निवारण का अनुकूल समय पितृपक्ष पितृ (पितर) पूजा भारतीय संस्कृति का मूलाधार है। 'श्रद्धया यत् क्रियते तत् श्राद्धम्Ó पितरों को प्रसन्न करने के लिए श्रद्धा द्वारा हविष्ययुक्त (पिंड) प्रदान करना ही श्राद्ध कहलाता है। वेदों में पितृयज्ञ का वर्णन आया है, जो पितृ श्राद्ध का ही पर्याय है। अथर्ववेद में भी इसका उल्लेख हैं : पितृणां लोकमपि गच्छन्ति ये मृता:। जो मृत हैं वे पितरों के लोक को जाते हैं। पितृपक्ष आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा(20/9/2013) से प्रारंभ होकर अमावस्या तक रहता है। इस पक्ष में विशेष रूप से पितरों का श्राद्ध और तर्पण आदि होता है। मनुष्यों के लिए मुख्य तीन ऋ ण शास्त्रों में वर्णित हैं। देवऋण, ऋ षिऋण और पितृऋण। यज्ञादि के द्वारा देवऋण, स्वाध्याय के द्वारा ऋ षिऋण उतारा जाता है और पितृऋण श्राद्ध के द्वारा उतारा जाता है। श्राद्ध शब्द का अर्थ है श्रद्धा से किया जाए। श्रद्धापूर्वक अन्य कार्य भी किये जा सकते हैं परंतु यह शब्द पितरों के लिए किये गये पिंडदान आदि के अर्थ में रूढ़ हो गया है। मृत्यु के उपरांत औध्र्वदैहिक क्रिया के साथ पिण्डदानादि भी श्राद्ध के ही अंतर्गत आते हैं परंतु जिस तिथि को माता-पिता आदि की मृत्यु हुई हो पितृपक्ष में उसी दिन श्राद्ध करना चाहिए।
 जो पितर किसी योनी में जन्म ले चुके हैं उनका भाग सार रूप से अग्निष्वात, सोमप, आज्यप, बहिर्पद ,रश्मिप,उपहूत,आयन्तुन ,श्राद्धभुक्,नान्दीमुख नौ दिव्य पितर जो नित्य एवं सर्वज्ञ हैं, ग्रहण करते हैं तथा जीव जिस शरीर में होता है वहाँ उसी के अनुकूल भोग प्राप्ति करा कर उन्हें तृप्त करते हैं।

पितृ अमावस्या का महत्व
पितरों के निमित्त अमावस्या तिथि में श्राद्ध व दान का विशेष महत्व है। सूर्य की सहस्र किरणों में से अमा नामक किरण प्रमुख है जिस के तेज से सूर्य समस्त लोकों को प्रकाशित करते हैं। उसी अमा में तिथि विशेष को चंद्र निवास करते हैं। इसी कारण से धर्म कार्यों में अमावस्या को विशेष महत्व दिया जाता है ेपितृगण अमावस्या के दिन वायु रूप में  सूर्यास्त तक घर के द्वार पर उपस्थित रहते हैं तथा अपने स्वजनों से श्राद्ध की अभिलाषा करते हैं। पितृ पूजा करने से मनुष्य आयु, पुत्र, यश कीर्ति, पुष्टि, बल, सुख व धन धान्य प्राप्त करते हैं।

ज्यतिष के अनुसार श्राद्ध का समय :
श्राद्ध का ज्योतिषीय महत्त्व की अपेक्षा धार्मिक महत्व अधिक है क्योंकि यह हमारी धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है। पितृलोक के स्वामी अर्यमा सभी मृत (आत्मा) प्राणियों को अपने-अपने स्थान पर श्राद्ध का अवसर प्रदान करते हैं। आश्विन कृष्ण पक्ष में जब सूर्य कन्या राशि पर गोचर कर रहा हो, तब पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक किया गया दान, तर्पण, भोजन पिण्ड आदि उन्हें मिलता है। पौराणिक एवं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध पक्ष की 16 तिथियों में प्रत्येक तिथि को पितर प्रात: सूर्योदय से सूर्यास्त तक अपने पुत्र-पुत्रों के प्रति आशान्वित होकर आते हैं एवं उनसे श्रद्धापूर्वक दिए दान की अपेक्षा रखते हैं। पदम् पुराण, बृहत्पराशर स्मृति, विष्णु पुराण, गरुड़ पुराण, मत्स्य पुराण, मार्कण्डेय पुराण आदि धार्मिक ग्रंथों के अनुसार मृत प्राणी का श्राद्ध उसकी मृत्यु-तिथि के दिन करना ही श्रेष्ठ है जिससे मृतात्मा को तृप्ति मिलती है। इसलिए अपने पूर्वजों का श्राद्ध उनके (स्वर्गवास) की तिथि को ही करें। किसी भी व्यक्ति की जन्म कुंडली में किसी भी प्रकार से यदि सूर्य पीडि़त होता है, तो वह पितृशाप दोष का परिचायक है। पिता के स्थान-दशम् भाव का स्वामी 6, 8, 12 वें भाव में चला जाए एवं गुरु पापी ग्रह प्रभावित या राशि में हो साथ ही लग्न व पंचम के स्वामी पाप ग्रहों से युति करे तो ऐसी कुंडली पितृशाप दोष युक्त कहलाती है। पितृ दोष निवारण के लिए श्राद्धकत्र्ता श्राद्ध के दिन पांच पत्तों पर अलग-अलग भोजन सामग्री रखकर पंचबलि करें- ये हैं- गौ बलि, श्वान बली, काक बली, देवादि बली तथा पिपिलिकादि बली (चींटियों को)। इसके बाद अग्नि में भोजन सामग्री तथा सूखे आंवले एवं मुनक्का का भोग लगाएं। फिर ब्राह्मण को साम्र्थ्यानुसार संखया में भोजन करायें। श्राद्ध केवल अपराह्न काल में ही करें, पूर्वाह्न तथा रात्रि में नहीं।

श्राद्ध से जुड़ीं महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ :
1.श्राद्ध व पितृ तर्पण में काले तिल एवम चांदी का प्रयोग पितरों को प्रसन्न करता हैे।
2. श्राद्ध में भोजन के समय ब्राह्मण एवं श्राद्धकर्ता का हंसना या बात चीत करना निषिद्ध है।
3. जिस श्राद्ध पर रजस्वला स्त्री,बासी अन्न, केश युक्त दूषित भोजन, रसोई बनाते समय कलह, श्राद्ध के समय मौन न रहना व दक्षिणा रहित होने पर श्राद्ध व्यर्थ होता है।
4. श्राद्ध करते समय भूमि पर जो भी पुष्प, गंध,जल,अन्न गिरता है उस से पशु पक्षी ,सर्प,कीट,कृमि आदि योनियों में पड़े पितर तृप्ति प्राप्त करते हैं।

यात्रा में हों तो कैसे करें श्राद्ध?
धन व ब्राह्मण के अभाव में ,परदेश में, पुत्र जन्म के समय या किसी अन्य कारण से असमर्थ होने पर श्राद्ध में यथा शक्ति कच्चा अन्न ही प्रदान करे। काले तिल व जल से बायां घुटना भूमि पर लगा कर तथा यज्ञोपवीत या कपड़े का साफा दाहिने कंधे पर रख कर, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तथा अपने पितरों का नाम, गोत्र बोलते हुए पितृ तीर्थ ( अंगूठे और तर्जनी के मध्य ) से तीन-तीन जलान्जलियाँ देने से ही पितर तृप्त हो जाते हैं तथा आशीर्वाद दे कर अपने लोक में चले जाते हैं। जो मनुष्य इतना भी नहीं करता उसके कुल व धन संपत्ति में वृध्दि नहीं होती तथा वह परिवार सहित सदा कष्टों से पीडि़त रहता है।
श्राद्ध के आरम्भ व अंत में तीन तीन बार निम्नलिखित अमृत मन्त्र का उच्चारण करने से श्राद्ध का अक्षय फल प्राप्त होता है —देवताभ्य: पितृभ्यश्च
महायोगिभ्य एव च। नम: स्वधायै स्वाहायै। नित्यमेव नमो नम:।।
एकैकस्य तिलैर्मिश्रांस्त्रींस्त्रीन
दद्याज्जलाञ्जलीन।
यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणदेव नश्यति।
श्राद्ध पक्ष में अपने दिवंगत पितरों के निमित्त जो व्यक्ति तिल, जौ, अक्षत, कुशा, दूध, शहद व गंगाजल सहित पिण्डदान व तपर्णादि, हवन करने के बाद ब्राह्माणों को यथाशक्ति भोजन, फल-वस्त्र, दक्षिणा, गौ आदि का दान करता है, उसके पितर संतृप्त होकर साधक को दीर्घायु, आरोग्य, स्वास्थ्य, धन, यश, सम्पदा, पुत्र-पुत्री आदि का आशीर्वाद देते हैं।

(लेखक: ज्योतिष का सूर्य, राष्ट्रीय मासिक पत्रिका के संपादक एवं धर्म-संस्कृति के प्रति समर्पित धर्मगुरु हैं)

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