ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

!!विशेष सूचना!!
नोट: इस ब्लाग में प्रकाशित कोई भी तथ्य, फोटो अथवा आलेख अथवा तोड़-मरोड़ कर कोई भी अंश हमारे बगैर अनुमति के प्रकाशित करना अथवा अपने नाम अथवा बेनामी तौर पर प्रकाशित करना दण्डनीय अपराध है। ऐसा पाये जाने पर कानूनी कार्यवाही करने को हमें बाध्य होना पड़ेगा। यदि कोई समाचार एजेन्सी, पत्र, पत्रिकाएं इस ब्लाग से कोई भी आलेख अपने समाचार पत्र में प्रकाशित करना चाहते हैं तो हमसे सम्पर्क कर अनुमती लेकर ही प्रकाशित करें।-ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे, सम्पादक ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका,-भिलाई, दुर्ग (छ.ग.) मोबा.नं.09827198828
!!सदस्यता हेतु !!
.''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका के 'वार्षिक' सदस्यता हेतु संपूर्ण पता एवं उपरोक्त खाते में 220 रूपये 'Jyotish ka surya' के खाते में Oriental Bank of Commerce A/c No.14351131000227 जमाकर हमें सूचित करें।

ज्योतिष एवं वास्तु परामर्श हेतु संपर्क 09827198828 (निःशुल्क संपर्क न करें)

आप सभी प्रिय साथियों का स्नेह है..

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

शनि अमावस्या पर पिता (सूर्य)-पुत्र (शनि)का दुर्लभ मिलन....

शनि अमावस्या पर पिता (सूर्य)-पुत्र (शनि)का दुर्लभ मिलन....

मित्रों, नमस्कार कल शनिचरी अमावस्या है सर्वप्रथम आप सभीको ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ.....और आईए अब चर्चा करते हैं कल के महापर्व की। 
1 मार्च 2014 को शनिचरी अमावस्या है। अमावस्या तिथि के स्वामी पितृदेव हैं और पितृदेव विश्वेदेव अर्थात सूर्य को माना गया है, आज कुंभ राशि पर सूर्य हैं साथ ही अमावस्या को भी शतभिषा नक्षत्र यानी बनती है कुंभ राशि, जिसका स्वामी शनि जो सूर्यपुत्र है, अत: आज पिता पुत्र का दुर्लभ मिलन हो रहा है, जो मिथुन, सिंह तथा तुला राशि के लिए बेहद शुभ फल देने वाले साबित होंगे। वहीं धनु, मेष तथा कर्क राशि वाले लोगों को सूर्यपुत्र शनिदेव के शरण में जाना उचित होगा साथ ही सावधानी भी बरतें।

कैसे करें शनिचरी अमावस्या पर पूजन अर्चन:

प्रात: स्नान आदि से निवृत्त हो कर भगवान शनिदेव के मंदिर जायें और काला कपड़े में बंधा हुआ नारीयल, कुछ छुट्टे पैसे, प्रसाद, सूखा फल मेवा आदि का भोग लगाकर,अगरबत्ती (धूप), दीप से पूजन करने के बाद शनि सोतोत्र का पाठ करना चाहिए। तत्पश्चात् सरसों के तेल का दान करना चाहिए। तैलाभिषेक का महत्त्व काफी महत्त्वपूर्ण बताया गया है धर्म शास्त्रों में। इससे कुण्डली में शनि जनित दोष, साढ़ेसाती, ढ़ैय्या अथवा शनि से उत्पन्न शारीरिक विकलांगता, शिक्षा में अरुचि, भत पिशाचादि बाधा, पति-पत्नि में पारस्परीक मतभेद, व्यापारिक नुकासान तथा नशे की लत से पागलपन आदि में राहत मिलती है।

इसके अलावा हनुमानजी के मंदिर में 49 बार हनुमान चालिसा का पाठ करना भी शनि जनित दोषों से मुक्ति मिलती है। सूर्यपुत्र शनि के इस दुर्लभ मिलन और परस्पर नवपंचम योग से प्रभावित राशि वालों को एकादशमुखी हनुमत्कवच का पाठ करने के बाद हनुमानजी को गुड़, देशी से बना हुआ रोट का भोग लगाना चाहिए।
-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, शांतिनगर, भिलाई

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

कई दुर्लभ संयोग बन रहा है महाशिवरात्रि पर्व पर....शिवसंकल्पमस्तु

कई दुर्लभ संयोग बन रहा है महाशिवरात्रि पर्व पर....शिवसंकल्पमस्तु

इस बार महाशिवरात्रि 27 फरवरी 2014 को शनि तथा सूर्य परस्पर नवपंचम योग बना रहा है, साथ ही श्रवण नक्षत्र, और त्रयोदशी के उपरान्त गुरुवार को ही सायं 6 बजकर 20 मिनट से चतुर्दशी तिथि आरंभ हो रही है, जो आगामी यानी 28 ता. के अपराह्न 4बजकर34 मिनट तक अतः इसबार 27 फरवरी को कई दुर्लभ संयोग समेटे त्योहार (महापर्व) है। शिव सानिध्य की पूर्णता की ओर इशारा कर रहा है। आईए विस्तृत चर्चा करते हैं....

नमस्ते हरसे शोचिषे नमस्तेऽअस्वचिषे।
अन्यौस्तेऽअस्मन्तपन्तु हेतय: पावकोऽअस्मभ्य ॐ शिवो भव।।

हे परमेश्वर। आपके दुखहर्ता स्वरूप को नमन है, आपके ज्ञाता स्वरूप को नमन है, आपके प्रकाशदाता स्वरूप को नमन है। आपकी दंड व्यवस्था हमसे भिन्न दूसरे दुष्ट पुरुषों के लिए तपाने वाली हो और आपका पवित्र स्वरूप हमारा कल्याण करें।।
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए थे। इस संबंध में एक पौराणिक कथा भी है। उसके अनुसार-
भगवान विष्णु की नाभि से कमल निकला और उस पर ब्रह्माजी प्रकट हुए। ब्रह्माजी सृष्टि के सर्जक  हैं और विष्णु पालक। दोनों में यह विवाद हुआ कि हम दोनों में श्रेष्ठ कौन है? उनका यह विवाद जब बढऩे लगा तो तभी वहां एक अद्भुत ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ। उस ज्योतिर्लिंग को वे समझ नहीं सके और उन्होंने उसके छोर का पता लगाने का प्रयास किया, परंतु सफल नहीं हो पाए। जब दोनों देवता निराश हो गए तब उस ज्योतिर्लिंग ने अपना परिचय देते हुए कहां कि मैं शिव हूं। मैं ही आप दोनों को उत्पन्न किया है।
तब विष्णु तथा ब्रह्मा ने भगवान शिव की महत्ता को स्वीकार किया और उसी दिन से शिवलिंग की पूजा की जाने लगी। शिवलिंग का आकार दीपक की लौ की तरह लंबाकार है इसलिए इसे ज्योतिर्लिंग कहा जाता है। एक मान्यता यह भी है कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को ही शिव-पार्वती का विवाह हुआ था इसलिए महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है।

कारोबार वृद्धि के लिए
महाशिवरात्रि के सिद्ध मुहर्त में पारद शिवलिंग को प्राण प्रतिष्ठित करवाकर स्थापित करने से व्यवसाय में वृद्धि व नौकरी में तरक्की मिलती है।

बाधा नाश के लिए
शिवरात्रि के प्रदोष काल में स्फटिक शिवलिंग को शुद्ध गंगा जल, दूध, दही, घी, शहद व शक्कर से स्नान करवाकर धूप-दीप जलाकर निम्न मंत्र का जाप करने से समस्त बाधाओं का शमन होता है। ॥ ॐ तुत्पुरूषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रूद्र: प्रचोदयात्॥

बीमारी से छुटकारे के लिए
शिव मंदिर में लिंग पूजन कर दस हज़ार मंत्रों का जाप करने से प्राण रक्षा होती है। महामृत्युंजय मंत्र का जाप रुद्राक्ष की माला पर करें।

शत्रु नाश के लिए
शिवरात्रि को रूद्राष्टक का पाठ यथासंभव करने से शत्रुओं से मुक्ति मिलती है। मुक़दमे में जीत व समस्त सुखों की प्राप्ति होती है।

मोक्ष के लिए
शिवरात्रि को एक मुखी रूद्राक्ष को गंगाजल से स्नान करवाकर धूप-दीप दिखा कर तख्ते पर स्वच्छ कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। शिव रूप रूद्राक्ष के सामने बैठ कर सवा लाख मंत्र जप का संकल्प लेकर जाप आरंभ करें। जप शिवरात्रि के बाद भी जारी रखें। ॐ नम: शिवाय। 

चार प्रहर की पूजा 
''प्रथम प्रहर संध्या 6:30 से 7:30 तक।। द्वितीय प्रहर 09:20 से 10:20 तक।। तृतीय प्रहर अद्र्धरात्रि 12:10 से 01:10 तक।। चतुर्थ प्रहर 04:30 से 05:30 तक।।''
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.