ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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सोमवार, 24 जुलाई 2017

    महिमा रुद्राक्ष की......

      महिमा रुद्राक्ष की......

रुद्राक्ष मे स्पदंन होता है। जो व्यक्ति को बाहरी/नकारात्मक ऊर्जा से बचाता है। रुद्राक्ष की जिस माला से आप जाप करते हैं उसे धारण नहीं किया जाना चाहिए एवं रुद्राक्ष को अंगूठी में नहीं जड़ाना चाहिए। रुद्राक्ष एक मुखी से लेकर 21-मुखी तक होते हैं, जिन्हें अलग-अलग प्रयोजन के लिए पहना जाता है। जैसे.....

'एक मुखी रुद्राक्ष - एक मुखी रुद्राक्ष सतारुढ़ ग्रह सूर्य है अत: जन्मपत्री मे सूर्य के शुभ फलों की प्राप्ति तथा सूर्य की अनुकूलता हेतु इसे धारण किया जाता है। यह आध्यात्मिकता का प्रकाशक बनकर मुक्ति का मार्ग प्रश्स्त करके अकाल मुत्यु दोष को भी समाप्त करता है। नेत्रों, सिरदर्द, हृदय रोग,  नजर दोष, उदर संबंधी रोग, स्नायु रोग, अतिसार से संबंधित रोगों को दूर करने में एक मुखी रुद्राक्ष लाभदायक होता है।

'दोमुखी रुद्राक्ष' - दोमुखी रुद्राक्ष को देवदेवेश्वर कहा गया है। इसके धारक का क्षेत्र में सम्मान बढ़ता है, रूप, सौंदर्य एवम वाक्शक्ति की वृद्धि करता है। पति पत्नी के आपसी मतभेदों को कम करके ग्रहस्थ सुख की बढ़ोतरी करता है। इसके धारण से भूत प्रेत की बाधा भी दूर होती है। दो मुखी रुद्राक्ष भगवान चन्द्र देव के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसके धारण करने से मन में चन्द्रमा की चांदनी जैसी शीतलता प्रदान होती है।

'तीनमुखी रुद्राक्ष' - तीन मुखी रुद्राक्ष को अग्नि देव का स्वरुप माना गया है। जिस प्रकार अग्नि स्वर्ण को भी शुद्ध कर देती है उसी प्रकार अग्नि का स्वरुप होने के कारण यह रुद्राक्ष शरीर को शुद्ध करने में सहायक होता है। जिस व्यक्ति का मन किसी काम में ना लगता हो या जीवन जीने का आनन्द समाप्त हो चुका हो, शरीर किसी न किसी प्रकार के बुखार से पीड़ित रहता हो, भोजन खाने पर पेट की अग्नि मंद होने के कारण से भोजन के ना पचने के रोग में यह रुद्राक्ष अत्यधिक लाभदायक साबित होता है। नौकरी करने वाले और पेट से सम्बंधित कष्ट पाने वालों के लिए यह रुद्राक्ष अत्यंत लाभदायक है।

'चारमुखी रुद्राक्ष' - चार मुखी रुद्राक्ष सीधे रूप से ब्रह्मा जी का स्वरुप है। इस रुद्राक्ष को ह्रदय प्रदेश से स्पर्श होते ही मनुष्य का मन धार्मिक हो जाता है और कई प्रकार के आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकता है। चार मुखी रुद्राक्ष संतान प्राप्ति में भी सहायता करता है और वाणी में मिठास और दूसरों को अपना बनाने की कला व्यक्ति के अन्दर उत्पन होती है।

'पांचमुखी रुद्राक्ष' – मन के रोगों को दूर करके मानसिक तौर पर स्वस्थ करने में यह रुद्राक्ष अति उत्तम फल प्रदान करता है। बढती आयु में जब समृधि का नाश होने लगता है और व्यक्ति अपने अर्जित ज्ञान को भूलने लगता है उस समय पांच मुखी रुद्राक्ष को धारण करने मात्र से सभी परेशानियों में सफलता मिलनी प्रारंभ हो जाती है। ब्रहस्पति देव पांच मुखी रुद्राक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं इसलिए इसको धारण करने से ब्रहस्पति देव की कृपा भी प्राप्त होती है।

'छहमुखी रुद्राक्ष'-  छह मुखी रुद्राक्ष धारण करने से ज्ञान की प्राप्ति होती है, बुद्धि तीव्र होती है, शरीर को रोग मुक्त करने में सहायक होता है और धन प्राप्ति भी करवाता है। यह रुद्राक्ष विशेष कर पढने वाले बालकों को धारण करना चाहिए। इस रुद्राक्ष को धारण करने से व्यक्ति में नेत्रित्व करने का गुण आ जाता है। भाषण आदि कला में भी वाक शक्ति प्रबल होती है।

'सातमुखी रुद्राक्ष' - सात मुखी रुद्राक्ष को कामदेव का स्वरुप पाने वाला यह रुद्राक्ष अनन्त नाम से जाना गया है। ऐसे मनुष्य जिनका भाग्य उनका साथ नहीं देता और नौकरी या व्यापार में अधिक लाभ नहीं होता ऐसे जातकों को सात मुखी रुद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए क्योंकि इसके धारण से धन का अभाव व् दरिद्रता दूर होकर व्यक्ति को धन, सम्पदा, यश, कीर्ति एवं मान सम्मान की भी प्राप्ति होती है। ग्रन्थों के अनुसार सात मुखी रुद्राक्ष पर शनि देव का प्रभाव माना गया है इसलिए जो व्यक्ति मानसिक रूप से परेशान हों या जोड़ो के दर्द और सेक्स बीमारी से परेशान हों उनके लिए यह शरीर में सप्त धातुओं की रक्षा करता है और शरीर के मेटाबोलिज्म को दुरुस्त करता है।

'आठमुखी रुद्राक्ष' - आठ मुखी रुद्राक्ष भैरोदेव का स्वरुप माना गया है। यह रुद्राक्ष के धारण करने से उच्च पद की प्राप्ति व् मन की एकाग्रता में सुधार होता है। यह रुद्राक्ष ऋद्धि सिद्धि दायक है।

'नौ मुखी रुद्राक्ष' - नौ मुखी रुद्राक्ष माँ भगवती की नौ शक्तियों का प्रतीक माना गया है। माँ भगवती की असीम अनुकम्पा नौ मुखी रुद्राक्ष पर होने से यह कवच का काम करता है।  महाशिवपुराण के अनुसार देवी दुर्गा का स्वरुप होने के कारण से विशेष कर महिलाओं के लिए यह रुद्राक्ष अत्यंत उपयोगी है। इसके धारण से इच्छा शक्ति प्रबल होती है और मानसिक शांति प्राप्त होती है।

'दस मुखी रुद्राक्ष'- दस मुखी रुद्राक्ष साक्षात रूप से भगवान विष्णु का स्वरुप माना गया है। दस रुद्रों का आशीर्वाद होने के कारण से भूत प्रेत, डाकिनी शाकिनी, पिशाच व् ब्रह्म राक्षस जनित ऊपरी बाधाएं व् जादू टोने को दूर करने में सहायक होता है। तंत्र मंत्र की साधना करने वाले साधकों के लिए यह रुद्राक्ष अति उत्तम माना गया है।

बाजार मे रुद्राक्ष की जगह भद्राक्ष भी मिलते है। भद्राक्ष का पेड़ उत्तर प्रदेश, बिहार और आसपास के क्षेत्रों में बहुतायत में होता है। पहली नजर में यह बिलकुल रुद्राक्ष की तरह दिखता है। देखकर आप दोनों में अंतर बता नहीं सकते। अगर आप संवेदनशील हैं, तो अपनी हथेलियों में लेने पर आपको दोनों में अंतर खुद पता चल जाएगा। भद्राक्ष जहरीला होता है, इसलिए इसे शरीर पर धारण नहीं करना चाहिए। वर्ना कुछ दिनों मे शरीर मे एलर्जी हो जाती है!

ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- "ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई mobil. No.9827198828,

(परामर्श सशुक्ल है, और फोन पर ज्योतिषीय परामर्श नहीं दिया जाता)

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"डोकलम" बना चीन के लिये "भस्मासुर"

"डोकलम" बना चीन के लिये "भस्मासुर"

चीन भस्मासुरी-चाल में स्वत: जलकर भस्म होने की कगार पर .....राह देख रहा है की कैसे 'डोकलम' से पीछे जाऊं...और देखिए चीन की बनरघुड़की चीनी सेना का प्रवक्ता भारत को युद्ध की धमकी दे रहा है.... यह जानते हुए की अब वक्त बदला है..हमारी सेना का मनोबल बढ़ा है हमारे देश के वीर सैनिकों के वीरता को देखकर पूरा विश्व नतमस्तक है साथ ही अब भारत की सत्ताधारी नेता 'राजमाता की जय बोलने वाले नहीं बल्कि, ''वंदे मातरम्'' बोलकर शत्रु के सामने शीश झुकाने या पीठ दिखाकर हार स्वीकारने की बजाय अन्तिम स्थिति तक शौर्य-नीति, विदेश-नीति तथा कुशल 'कूट-नीति' से बिना थमें लड़ते रहने वाले नेता हैं...'कुशल नेतृत्व' जो मिला है! हमारे देश की सेना हो या नेता या हो आम जनता...ये सवा सौ करोड़ का विशाल जनसमूह तबतक शत्रु से लड़ते रहेंगे जबतक की "विजय हासिल" ना हो जाय... इसके लिये भले ही क्यों ना शीश का बलिदान करना पड़ जाये....

-पण्डित विनोद चौबे, संपादक- 'ज्योतिष का सूर्य' भिलाई

आईये थोड़ा समझने का यत्चीन करते हैं हैं कि-  क्यों पीछे खिसकने के बहाने ढूंढ रहा हैं, डोकलाम से ?? ये सच है कि चीन की हेकड़ी निकल चुकी है। इसके कारण ये हैं:

1) चीनी सेना ने अपनी सरकार से कहा कि बिना युद्ध के भारतीय सेना पीछे हटने को तैयार नहीं है। वे युद्ध के लिए पूरी तैयारी किये हुए हैं। पर पहले वार नहीं कर रहे हैं इससे लगता कि उनका इरादा खतरनाक है, ये युद्ध छिटपुट नहीं संपूर्णता से होगा। हमें भी वैसी तैयारी करनी पड़ेगी।

2) चीन की खुफिया सूत्रों ने ये खतरनाक रिपोर्ट्स भारत और भूटान की मिटींग की भेजी जिसमें ये तय हुआ था कि बिना चीन द्वारा अधिगृहित जमीन वापस लिए इस क्षेत्र में शान्ति संभव नहीं है। निहायत जरूरी है कि 1947 के समय जो भूस्थिति थी उसे फिर बहाल किया जाय।

3) चीन के रक्षासूत्रों ने सूचित किया कि युद्ध की स्थिति में भारत एकसाथ जल,थल व नभ से पूरा प्रहार करेगा।उसने चीन के सभी मुख्य शहरों को अग्नि से निशाने पर ले रखा है ।सीमापर ब्रह्मोस तैनात है।उसके सैनिक भी 1962 का दाग धोना चाहते हैं ।

4) चीन के सेना कमान ने कहा कि हमारे सैनिकों का मनोबल गिरा हुआ है, वेतन नियमित नहीं मिलने से भी वे नाराज चल रहे हैं। अज्ञात कारणवश वे भयभीत भी हैं।जमीनी युद्ध में हमें काफी नुकसान हो सकता है। भारत पहले के जमीन को वापस लेने का मन बनाये हुए है।

5) इसके आलावा चीन आकलन कर रहा था कि विश्व पटल पर वह अकेला हो चुका है, 23 देशों से उसके सीमा विवाद हैं, उन सब को मोदी गूँथकर माला बना चुके हैं, वियतनाम तो इतने गुस्से में है, कि ब्रह्मोस मिलते ही चीन को ठोक देगा । पाकिस्तान एक साथ दे सकता है पर उस लगभग दिवालिया हो चुके आतंकवादी देश की कोई औकात बची नहीं है ।

6. और सब से बड़ा कारण, 

अगर चीन और भारत का युद्ध होता हैं, तो भारतीय जनमत पूरी तरह से चीनी उत्पादों के विरुद्ध हो जाएगा । इस में मोदी सरकार के आने के बाद भारतीय जनमानस में जागे राष्ट्रवाद का बहुत बड़ा योगदान होगा । इसके अतिरिक्त GST लगने के कारण अब चीन से भारत में Under Invoicing द्वारा माल भेजना असंभव हो गया हैं, ऐसे में चीन के उत्पाद भारत में पहले के कांग्रेस शासन की तरह सस्ते नहीं रहेंगे । परिणाम स्वरूप चीनी उद्योगों को अपना उत्पादन 35 से 40% तक कम करनी पड़ेगया, और इसके Chain Effect उनकी लागतों में वृद्धि, और फिर भारतीय उत्पादों के मुकाबले महंगे पड़ने के रूप में सामने आएगा ।

बस चीन के पक्ष में और हिंदुस्तान के दुर्भाग्य स्वरूप 2 ही तथ्य हैं :

1. "मोदी हटाओ, क्योंकि उसने मेरे धंधे पर GST लगा दिया ।"

और

2. देश के चिर युवा युवराज और उनकी महान पार्टी, सेकुलर और भारत में बसा पाकिस्तान से भी बड़ा पाकिस्तान चीन के सबसे बड़े ब्रह्मास्त्र सिद्ध होंगे ।

मर्जी आपकी, क्योंकि, देश आपका, जिंदगी आपकी ।

कुछ सत्यता लगे तो शेयर करने का आग्रह ।

-"ज्योतिष का सूर्य'' 

http://ptvinodchoubey.blogspot.com/2017/07/blog-post_24.html?m=1

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

बहुत सुन्दर लेख श्री आनंद कुमार जी का अवश्य पढें...

अपनी बात शुरू करने से पहले हम आपको एक प्रसिद्ध कविता की लाइन याद दिला दें, जो रुडयार्ड किपलिंग ने लिखी थी : “East is East and West is West, and never the twain shall meet.” राष्ट्रवाद पर चर्चा शुरू करने से पहले ही ये याद दिला देना जरूरी हो जाता है | भारत को कोई धर्म भारत नहीं बनाता, कोई भाषा भी हमें एक नहीं करती, संस्कृति भी यहाँ अलग अलग है | यही कारण होता है कि जब हम किसी विदेशी चश्में से भारत में राष्ट्रवाद को समझने की कोशिश करते हैं तो कामयाबी मिलने की संभावना कम, बहुत कम हो जाती है | भारत के लिए राष्ट्र की परिभाषा कम से कम महाभारत के काल से तो जरूर है | युधिष्ठिर जब शर शैय्या पर पड़े भीष्म से कुछ सीखने गए थे तो कई अन्य चीज़ों के साथ, भीष्म ने राष्ट्र के बारे में भी बताया था |

समय बीतता गया और श्रुति की परंपरा का लोप होते होते लोग महाभारत जैसे ग्रंथों की पुरानी परिभाषाएं भूलने भी लगे | राष्ट्रवाद की जो आधुनिक परिभाषाएं हैं उनमें से एक अर्नेस्ट रेनन के 1882 के सोरेबोन्न यूनिवर्सिटी में दिए गए लेक्चर से आती है | उन्होंने कहा था, राष्ट्र लम्बे समय के संघर्ष, बलिदानों और भक्ति भाव की परिणिति है | गर्व से भर देने वाली कथाओं, शौर्य की गाथाओं, और महानायकों का इतिहास ही वो सामाजिक पूँजी है जिसपर एक राष्ट्र की भावना का आधार रखा जाता है | एक राष्ट्र की भावना को समाज में समाहित करने के लिए गौरवशाली इतिहास की जरुरत होती है, अपने महानायक चाहिए | साझा सांस्कृतिक विरासत और भविष्य में, साथ मिलकर, ऐसे ही गौरवशाली कार्यों को अंजाम देने की मंशा ही राष्ट्र को जन्म देती है |

एक राष्ट्र के नागरिक होने के लिए ये जरूरी कारण हैं | राष्ट्र के नागरिक इसी एकीकरण की भावना से जुड़े होते हैं | इसलिए किसी राष्ट्र के बारे में जानना है और राष्ट्र की भावना के बारे में जानना है तो उसका एकमात्र तरीका है, जनमत संग्रह | राष्ट्र उसके नागरिक होते हैं, नागरिकों के अलावा कोई भी राष्ट्र का निर्धारण नहीं कर सकता |

ये परिभाषा जिस काल में आई थी, उस दौर में अंतर्राष्ट्रीय क्रांति के काल (1830 - 1848) को बीते कुछ जमाना हो चला था | भारत का पहला स्वतंत्रता समर कुचला जा चुका था | ये उतनी तेज़ उलट पलट का दौर नहीं था जब विचारों के बदले कारवाही का प्रभाव ज्यादा हो | अंतर्राष्ट्रीय मंच पर एक देश, या एक राष्ट्र की भावना के उदय से भारत भी अछूता नहीं रहा था | अगर भारत के ही पहले स्वतंत्रता समर को देखेंगे तो कई राजा सन 57 में अलग अलग नहीं लड़ रहे थे | उन्होंने अंतिम मुग़ल बादशाह जफ़र को एक नेता के तौर पर लेकर लड़ाई शुरू की थी | इसलिए जब कहा जाता है की वो छोटे मोटे राजा थे जो अपनी रियासत बचाने की लड़ाई लड़ रहे थे तो वो अधूरा सच है |

लोग ये समझ चुके थे कि एकीकृत राष्ट्र के तौर पर ही वो अपनी स्वाधीनता की रक्षा कर सकते हैं | कौन बाहर का है, कौन अपना, और कौन सा अपना किसी आक्रमणकारी का साथ दे रहा है उसकी लकीरें साफ़ साफ़ खिंची जा चुकि थी | सिंधिया जैसे राजघराने जो फिरंगियों का साथ दे रहे थे वो भी हमलों से बच नहीं पाए थे | लेकिन ये दौर आज जैसा नहीं था, विद्रोह की भावना को शस्त्रों से कुचलने की परंपरा थी | सेनाओं के हारते ही दमन का चक्र आम नागरिकों पर चलना शुरू हुआ | 19 वीं शताब्दी का आरंभ होते होते भारत की अपनी शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त की जा चुकि थी | और तो और मंदिर, जो कि समाज को जोड़ने का काम करते थे उनको भी फिरंगी हुकूमत ने अपने कब्ज़े में ले लिया |

एकीकृत समाज को कुचलने की मुश्किलें फिरंगियों को दिखने लगी थी इसलिए जातिवाद जैसी परम्पराओं को विदेशी हुक्मरानों ने बढ़ावा देना शुरू किया | जाति के आधार पर इंसान को अपराधी घोषित करने की फिरंगी परंपरा उनके बड़े काम आई | 1900 आते आते भारत में दो पीढ़ियाँ गुजर चुकि थीं | अशिक्षित समाज को ना तो अपना ऐतिहासिक गौरव याद था, ना ही उसमें दोबारा लड़ने की ताकत बची थी | ऐसे में जब क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के जरिये कानूनी तौर पर जाति-आधारित भेदभाव को सरकारी प्रश्रय मिलना शुरू हुआ तो विदेशी हुक्मरानों के पोषित भूरे साहबों ने भी मौके का खूब फायदा उठाया | समाज के एक बड़े हिस्से को संपत्ति, जमीन, शिक्षा जैसे अधिकारों से वंचित कर दिया गया |

ऐसे ही दौर के लिए अंग्रेजी शब्दों Nationalist और Patriot को याद रखा जाना चाहिए | दोनों में आज आपको भाव एक सा लग सकता है | 1850 वाले ही दौर में भारतीय समाज में राजा राम मोहन और विद्यासागर जैसी भी विभूतियाँ थी | इन्हें आज कैसे पहचानेंगे आप ? क्या इनके लिए patriot शब्द का प्रयोग सही लगता है ? या फिर Nationalist कहना चाहेंगे ? नेशनलिस्ट को हिंदी में राष्ट्रवादी कहते हैं, ये राष्ट्र से प्रेम करता है, उसके विकास के लिए प्रयासरत होगा, राष्ट्र की खामियों से निपटने के लिए भी संघर्ष करेगा, लेकिन उसे शासन व्यवस्था से कोई ख़ास लेना देना नहीं होता है |

यहाँ पेट्रियट बिलकुल अलग हो जाता है, उसे हिंदी में स्वदेशानुरागी कहना ठीक होगा | पेट्रियट वैसा व्यक्ति होगा जिसे अपने राष्ट्र पर शासन भी अपना चाहिए | अगर राज्य व्यवस्था किसी और की होगी तो कानून किसी और का होगा और विदेशी कभी उसके देश का हित नहीं करेगा ये चीज़ एक पेट्रियट के दिमाग में बिलकुल साफ़ होती है | यही कारण है कि जब रानी झाँसी की बात होती है तो वो पेट्रियट होती हैं, दुर्गा भाभी का जिक्र होगा तो पेट्रियट कहा जायेगा, तांत्या टोपे या मंगल पाण्डेय के नाम के साथ पेट्रियट शब्द आएगा, खुदी राम बोस, सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह और चद्रशेखर आज़ाद इसी वजह से पेट्रियट हो जाते हैं | बस यही मामूली सा फर्क है कि आप राजा राम मोहन राय या फिर रवीन्द्रनाथ टैगोर को नेशनलिस्ट तो कह सकते हैं मगर पेट्रियट नहीं कह पा रहे |

( राष्ट्र के नागरिक होने के नाते मेरी जिम्मेदारी है कि मेरे राष्ट्र की परिभाषा जैसी जरूरी चीज़ हम कुछ मुट्ठी भर, गिने-चुने, बुद्धि-पिशाचों के हाथ में ना छोड़ दें | चर्चा जारी रहेगी | )

सौ साल से भी पुरानी बात है । उस ज़माने में दक्षिण अफ्रीका में फिरंगियों की हुकूमत थी । सभी भारतीय लोगों को वहां अपने पास पहचान के दस्तावेज़ रखने पड़ते थे ।  एक ही शासन में एक जगह दूसरी जगह जाने पर भारतीय लोगों को अपना परिचय पत्र दिखाना पड़ता था । सभी भारतीय लोगों लिए  पंजीकरण (registration) करवाना अनिवार्य था ।

1906 से ही मोहनदास करमचंद गांधी इसका विरोध करना शुरू कर दिया था । विरोध प्रदर्शन के दौरान परिचय पत्र (pass) जलाने की ही कोशिश में उन्हें पहली बार 1908 में गिरफ़्तार कर लिया गया । इस तरह शुरू हुआ मोहनदास का "महात्मा गांधी" बनने का सफर !

दिल्ली के सर्वोच्च सदन में ऐसे ही एक पंजीकरण के ख़िलाफ़ हरियाणा की कुमारी शैलजा की आवाज सुनाई दी है । उन्होंने जाति / गोत्र पूछे जाने पर आपत्ति दर्ज करवाई है । वो महात्मा गांधी वाले राजनैतिक दल Indian National Congress से हैं तो हम उनसे गांधी जी की रवायत की उम्मीद करते हैं । उन्हें संसद में जाने के लिए और कई संवैधानिक पदो की दावेदारी के लिए "जाति प्रमाण पत्र" दिखाना पड़ता है और अपने इलाके में पंजीकरण भी करवाना पड़ता है । ये अन्याय है !

आप मॉल जैसी जगहों पर गए होंगे, वो एस्केलेटर भी देखा ही होगा आपने | वही स्वचालित सीढ़ी जैसी चीज़ जो अपने आप ऊपर या नीचे जा रही होती है | देखी है ? फिर ठीक है चलिए अब काम की बात पर आते हैं |

राष्ट्र क्या है ? कोई व्यक्ति है ? चीज़ है ? उसे छूकर, सूंघ कर, चख कर, किसी तरह से महसूस कर सकते हैं क्या ? नहीं ना ! राष्ट्र एक अवधारणा है, एक कंसेप्ट | जैसे जैसे देश में मौजूद एक पीढ़ी आगे बढती है और दूसरी पीढ़ी को जगह मिलती है उसी के साथ ये भी बदलती रहती है | सोच के साथ साथ आगे चलेगी, विरोधाभास होंगे, टकराव भी होंगे | इन सब के साथ परिवर्तन जारी रहेगा | सिर्फ आजादी के समय को देख लें तो नजर आ जायेगा कि जो देश अहिंसा की परोकारी करता दिखता था उसने क्या किया ?

गोवा को आजाद करवाने के लिए कोई अहिंसात्मक, गांधीवादी प्रदर्शन नहीं हुए थे | पांडिचेरी, या दमन दिव जैसी जगहें भी सत्याग्रह से नहीं छुड़ाई गई थीं | और तो और जब पटेल को हैदराबाद लेना था तो निज़ाम के दरवाजे पर कोई कांग्रेसी धरने पर नहीं बैठा था | सीधा लट्ठ चला था |

अब जरा जाति को देखिये | किसी पच्चीस साल के लड़के से पूछने पर, आज वो अगर ओबीसी बताता है तो 25 साल बाद क्या बताएगा ? जाहिर है जैसे पिछले 70 साल में SC/ST बिलकुल भी नहीं बदला आज भी अनुसूचित जाति ही है, वैसे ही बाकि सबकी जाति भी एक फिक्स्ड, रुकी हुई चीज़ है | बिलकुल भी नहीं बदलती |

ऐसे ही राजनैतिक विचारधारा को देखिये | कांग्रेस की विचारधारा बदली है क्या ? बीजेपी ने हिंदुत्व कि अपनी अवधारणा में कोई परिवर्तन किया है क्या ? वामपंथियों की तथाकथित विचारधारा कितनी बदल गई है ? ये सब भी अटकी हुई, स्थायी रहने वाली चीज़ें हैं |

अब जरा क्षेत्रवाद को देखिये | उत्तर पूर्व के लोगों को चिंकी बुलाना छोड़ा किसी ने ? बिहार-उत्तर प्रदेश के भैया जी को अनपढ़ मूर्ख मानना छोड़ा ? दक्षिण श्रीदेवी, रेखा, जैसों को बरसों देखने के बाद दक्षिण भारतीय लोगों के लिए क्या धारणा है मन में ? मतलब क्षेत्रवाद भी रुकी हुई चीज़ है |

भाषा की क्या स्थिति होती है ? लिखने बोलने के तरीकों में कितना परिवर्तन आया है ? जैसे हम “फिक्स्ड” यानि एक अंग्रेजी के शब्द को हिंदी में इस्तेमाल कर रहे हैं, देवनागरी में लिख डाला है उस से कितने शुद्धतावादी सहमत होंगे ? “बहता पानी निर्मला...” जैसी कहावतों के वाबजूद हम हिंदी साहित्यकारों में इसके लिए समर्थन नहीं जुटा सकते |

अब वापिस आते हैं एस्केलेटर पर | एक पांव जमीन पर और एक चलते हुए एस्केलेटर पर रखेंगे तो क्या होगा ? इसके अलावा आपने कई बार नए लोगों को एस्केलेटर पर पांव रखने में डरते, हिचकिचाते भी देखा होगा | लगातार आगे बढती, बदलती, ऊपर-नीचे जाती हुई चीज़ के साथ चल देने में डर भी लगता है | इसमें कोई शर्माने की भी बात नहीं, क्योंकि “डर के आगे... जीत है !”

एक साथ आप जातिवादी और राष्ट्रवादी नहीं हो सकते | एक साथ क्षेत्रवादी और राष्ट्रवादी भी नहीं हो सकते | एक साथ भाषा-वादी और राष्ट्रवादी भी नहीं हो सकते | एक साथ राजनैतिक पार्टी के समर्थक और राष्ट्रवादी भी नहीं हो सकते |

बाकि एस्केलेटर पर पांव रखना है या फिर परिवर्तन की हलचल के बदले जमीन पर टिके रहना है ये फैसला आप खुद कीजिये |

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साभार 

आनंद कुमार

अब कुछ बातें धर्म ग्रन्थों और कुछ पौराणिक संदर्भ 

धर्म हमारे राष्ट्र के कण-कण में संव्याप्त है इसलिए

भारतीय राष्ट्रवाद आध्यात्मिक राष्ट्रीयता के

रूप में जाना जाता रहा है। यही  कारण रहा है

कि हमारे ऋषियों ने भारत भूमि को माता कहा है। “माता भूमि पुत्रोहं

पृथिव्याः” वाला यह राष्ट्र ही है जहाँ ऋषियों ने

ब्रह्मज्ञान पाया व ब्रह्मसाक्षात्कार किया। विश्व को परिवार मानने

की सुंदर

कल्पना भी इसी भूमि से

उपजी है।

राष्ट्र का शाब्दिक अर्थ है-रातियों का संगम स्थल। राति शब्द देने

का पर्यायवाची है। राष्ट्रभूमि और

राष्ट्रजनों की यह संयुक्त इकाई राष्ट्र

इसीलिए कही जाती है

कि यहाँ राष्ट्रजन अपनी-अपनी देन

राष्ट्रभूमि के चरणों में अर्पित करते है।

स्वामी विवेकानंद ने राष्ट्र को व्यष्टि का समष्टि में

समर्पण कहते हुए

इसकी व्याख्या की है। आध्यात्मिक

राष्ट्रीयता के उद्घोषक श्री अरविंद ने

कहा है-राष्ट्र हमारी जन्मभूमि है।

 मनुस्मृति हमारे देश की साँस्कृतिक

यात्रा की ओर संकेत करती है। भगवान

मनु कहते हैं कि भारतवर्ष रूपी यह पावन अभियान

सरस्वती और दृषद्वती नामक

दो देवनदियों के मध्य देव विनिर्मित देश ब्रह्मावर्त से आरंभ

हुआ। सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् ।

तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते ।।

तस्मिन्देशे  य  आचार:  पारम्पर्यक्रमागत: ।

वर्णानां  सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ।।

एतद्देशप्रसूतस्य  सकाशादग्रजन्मन: ।

स्वं स्वं चरित्रम् शिक्षेरन्पृथिव्यां  सर्वमानवा:  ।।

--मनुस्मृति  १/१३६,१३७,१३९  

 इस प्रकार मनु महाराज द्वारा सदाचार,

नैतिकता देवत्व के सम्वर्द्धन प्रचार प्रसार में विश्वास रखने

वाली भारतीय संस्कृति को बताया गया है।

 महाभारत के भीष्म पर्व में भारत

की यशोगाथा का वर्णन कुछ इस तरह हुआ है-

अत्रतेकीर्तयिष्यामिवर्षभारतभारतम्।

प्रिययमिंद्रस्यदेवस्यमनोवैंवस्वतस्यच॥

अर्थात् “हे भारत! अब मैं तुम्हें उस भारतवर्ष

की कीर्ति सुनाता हूँ, जो देवराज इन्द्र

को प्यारा था, जिस भारत को वैवस्वत मनु ने अपना प्रियपात्र बनाया था, भारतीय

राष्ट्रवाद की व्याख्या करते हुए विष्णुपुराण में लिखा है-

 उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रे: चैव दक्षिणम्। वर्षम् तद्

भारतम् नाम भारती यत्र संतति:’ (२,३,१)।

इस प्रकार हमारे देश का प्राचीन नाम ब्रह्मावर्त  और  भारतवर्ष है ।

हाथ की रेखाओं में छुपा है भूत भविष्य और वर्तमान

हाथ की रेखाओं में छुपा है भूत भविष्य और वर्तमान

ज्योतिष एक विज्ञान है जिसके माध्यम से जीवन में घटने वाली सभी घटनाओं पर प्रकाश डालने का काम करता है।ज्योतिष के मुख्य दो भाग है, प्रथम  गणित और दुसरा फलित । फलित और गणित दोनों में अनुनाश्रय संबंध है ठिक उसी प्रकार जैसे भाषा और व्याकरण, किंतु ज्योतिष में एक और भी प्रभाग है जिसको हस्त में बने चिन्हों एवं पर्वों को अलग अलग राशियों में विभाजित कर उससे भी भूत भविष्य और वर्तमान का आकलन किया जाता है आगे चलकर हस्तरेखा सम्राट सर्वश्री किरो जी ने एक नया रूप दिया जो हस्तसामुद्रिक शास्त्र के रूप में काफी प्रचलित हुआ मैं ऐसा मानता हुं कि हस्त सामुद्रिक शास्त्र तो पहले से था ही पर किरो जी ने इसको अत्यनेत रोचकता पुर्वक आमजनमानस के बीच रखा जो आज एक चुनौती भरा सत्य सिद्ध प्रमाण युक्त भविष्य कथन का सोपान बन गया । इस शास्त्र के माध्यम से अनेकों की गयी भविष्यवाणियां लगभग पूर्णतया सत्य होती हैं।
मैं आज आप लोगों को उसी हस्त सामुद्रिक शास्त्र के बारे में रोचक जानकारियां प्रस्तुत करने जा रहा हुं। ज्योतिषी मानते हैं कि हस्तरेखा-विज्ञान से किसी भी व्यक्ति के भूत, भविष्य, वर्तमान और उसकी प्रकृति के बारे में जाना जा सकता है। भारत ही नहीं, पाश्चात्य देशों में भी पामिस्ट्रीका प्रचलन है।
ज्योतिष और हस्तरेखा-विज्ञान में मूलभूत अंतर यह है कि ज्योतिष में कुंडली के आधार पर व्यक्ति के बारे में बताया जाता है और दूसरे में हस्त रेखाओं के आधार पर। यह संभव नहीं है कि किन्हीं दो व्यक्तियों के हाथ की रेखाएं समान हों। ज्योतिष में समय के हेर-फेर से किसी व्यक्ति की कुंडली गलत भी बन सकती है, लेकिन हाथ की रेखाएं तो सामने होती हैं। इसलिए आकलन गलत होने का प्रश्न ही नहीं उठता। कर्म से तय होती है भाग्य रेखा पश्चिमी ज्योतिषी कीरो ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया है। फ्रांस के सेंट फ्रांसिसका भी इस क्षेत्र में अमूल्य योगदान है। उन्होंने हाथों के चित्रों के सहारे भविष्य बताने की इस कला को पूरी तरह समझाया है।
हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार, प्रमुख रेखाएं हैं- जीवनरेखा,मस्तिष्क रेखा, हृदय रेखा और भाग्य रेखा। छोटी रेखाओं में आती हैं विद्या रेखा, विवाह या प्रणय रेखा, संतान रेखा, यात्रा रेखा, चिंता रेखा आदि।
हस्तरेखाविद दाहिनी और बाईदोनों हथेलियों को देखते हैं। बाई हथेली यह स्पष्ट करती है कि हम अपने भाग्य में क्या लेकर आए हैं और दाई से यह पता चलता है कि अपने कर्मो से हमने अब तक क्या कुछ प्राप्त किया है।
इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि महत्व केवल रेखाओं का नहीं, व्यक्ति के कर्म का भी है। यदि वह अकर्मण्य है, तो जो कुछ उसके हाथ में लिखा है, वह उसे पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं कर सकता। यदि वह कर्मठ है, तो हाथ में जितना कुछ नहीं लिखा है, उससे भी अधिक प्राप्त कर सकता है। इस संबंध में एक पाश्चात्य चिंतक का उद्धरण उपयोगी है-यदि हम ईश्वर को साथ लेकर अपने कर्म के प्रति पूर्ण मनोयोग से समर्पित हो जाएं, तो हम अपने भाग्य की रेखाओं को भी बदल सकते हैं। निश्चित ही कर्म के आधार पर हाथ की रेखाएं बनती और बिगडती हैं। यदि किसी के हाथ में विद्या रेखा नहीं है और वह कठोर कर्म के आधार पर विद्या प्राप्त कर लेता है, तो विद्या रेखा उसके दाहिने हाथ में उग आएगी। फल का निर्धारण हस्तरेखा-विज्ञान को लेकर कई महत्त्वपूर्ण बातें उल्लेखनीय हैं। किसी भी रेखा का स्वरूप उसके फल को निर्धारित करता है। यदि किसी रेखा पर क्रॉसका चिह्न है या वह कहीं पर कटी हुई है या उस पर कहीं टापू बना हुआ है, तो यह सब उस रेखा के विरुद्ध जाते हैं। उदाहरण के लिए जीवन रेखा पर यदि ऐसा कोई चिह्न होगा, तो वह घोर बीमारी का सूचक होगा। यदि जीवन रेखा और मस्तिष्करेखाअपने उद्गम स्थान पर एक साथ नहीं मिलती हैं, तो वह व्यक्ति क्रांतिकारी स्वभाव का होता है। ऐसे लोग ही समाज के बंधनों को तोडकर कुछ भी कर लेते हैं। यदि हाथों की उंगलियों के बीच अंतर [फांक] है, तो ऐसा व्यक्ति फिजूलखर्च होता है।

महत्त्वपूर्ण बातें आपको जानने के लिए जरूरी है

यदि हथेलियां गहरी हों, तो व्यक्ति धनी होता है। किसी व्यक्ति की भाग्य-रेखा चंद्रस्थान(हथेली के नीचे बाईं तरफ) से निकलती है, तो वह निश्चित ही लेखक, कवि, संगीतकार या अन्य किसी कला में पारंगत होता है। यदि किसी व्यक्ति का अंगूठा हथेली के साथ नब्बे या उससे अधिक डिग्री का कोण बनाता है, तो वह व्यक्ति अपना निर्णय स्वयं लेता है और किसी के परामर्श पर नहीं जाता है। इसके विपरीत जिसका अंगूठा झुका रहता है, वह अपना निर्णय कभी भी स्वयं नहीं ले सकता है।यदि किसी व्यक्ति के अंगूठेमें तीन के बदले चार चिह्न होते हैं, तो उसे बाहरी संपत्ति प्राप्त होती है। जिसके अंगूठेका ऊपरी भाग बडा होता है, वह निश्चित ही महत्वाकांक्षी होता है। तिल का महत्व काले तिल का महत्व हस्तविज्ञानमें बहुत है। यदि यह किसी ग्रह के स्थान पर है, तो शुभ है। यदि किसी रेखा पर है, तो उसे बर्बाद कर देता है। इस सम्बंध में मैं एक निजी अनुभव प्रस्तुत करता हूं। हस्तरेखा शास्त्री होने के नाते मुझे एक बार ग्यारह वर्ष के एक बालक का हाथ देखने का अवसर मिला, जो पागल था। मैंने उसकी मस्तिष्क रेखा को अच्छी तरह देखा। न तो उस पर क्रॉसथा, न आइलैंड,न वह टूटी थी, न कहीं से टेढी। पागल होने का एक और कारण होता है वह है मस्तिष्क रेखा का चंद्रमा के स्थान की ओर मुडना। ऐसा भी नहीं था।मैं आपको सत्य घटना बताउंगा क्योंकि एक बार मे पास एक कि एक विक्षिप्त  आया और , जब मैंने उनका हस्त रेखा देखा तो मैं पाया कि - इसके तो हाथ में पागलपन का कोई चिह्न नहीं था। तभी मेरा ध्यान उसके एक तिल पर गया, जो उसकी मस्तिष्क रेखा के मध्य में था और ठीक उसी के सामने जीवन रेखा पर भी। निश्चित था कि इन दो तिलों के कारण वह आजीवन पागल रहेगा। Anchorवैसे तो गणित और फलित ज्योतिष अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण विज्ञान है लेकिन यदि जन्म समय, दिनांक, इ.सन् आदि का सही होना इन दोनों पद्धतियों में बेहद आवश्यक होता है , लेकिन उपरोक्त सभी में किसी एक की भी असमंजस की स्थिति है तो गणित और फलित दोनों के फल कथन गलत हो जाते हैं उस समय एक ही विकल्प रह जाता है वह है हस्तसामुद्रीक शास्त्र इस तरह हाथ की रेखाएं कुंडलियों या अंक विज्ञान से अधिक कारगर होती हैं और यदि उन्हें सही पढने वाला हो, तो एक खुली पुस्तक की तरह मनुष्य के जीवन की घटनाओं को पढ़ सकता है। इसिलिए मैं कहता हुं कि मनुष्य का भूत भविष्य और वर्तमान उसके हाथों में ही छीपा है जरूरत है एक ऐसे दैवज्ञ की जो सटीक जीवन की घटनाओं पर प्रकाश डाल सके।-ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, (ज्योतिष का सूर्य, मासिक पत्रिका के संपादक) संपर्क-09827198828, भिलाईमेरा मोबाईल एप्प 'हस्तरेखा विज्ञान' से साभार https://play.google.com/store/apps/details?id=palmistry.newhindiapps.hastrekhavigyan

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