ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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शनिवार, 20 जनवरी 2018

47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक में, आईए समझें कैसे लगता है पितृदोष ??

*🙏मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में*🙏और पितरो के निमित्त पिंडदान न करने से लगता है पितृदोष

*मृत्यु एक ऐसा सच है जिसे कोई भी झुठला नहीं सकता। हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद स्वर्ग-नरक की मान्यता है। पुराणों के अनुसार जो मनुष्य अच्छे कर्म करता है, वह स्वर्ग जाता है, जबकि जो मनुष्य जीवन भर बुरे कामों में लगा रहता है, उसे यमदूत नरक में ले जाते हैं। सबसे पहले जीवात्मा को यमलोक ले जाया जाता है। वहां यमराज उसके पापों के आधार पर उसे सजा देते हैं।*

*मृत्यु के बाद जीवात्मा यमलोक तक किस प्रकार जाती है, इसका विस्तृत वर्णन गरुड़ पुराण में है। गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि किस प्रकार मनुष्य के प्राण निकलते हैं और किस तरह वह पिंडदान प्राप्त कर प्रेत का रूप लेता है।- गरुड़ पुराण के अनुसार जिस मनुष्य की मृत्यु होने वाली होती है, वह बोल नहीं पाता है। अंत समय में उसमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है और वह संपूर्ण संसार को एकरूप समझने लगता है। उसकी सभी इंद्रियां नष्ट हो जाती हैं। वह जड़ अवस्था में आ जाता है, यानी हिलने-डुलने में असमर्थ हो जाता है। इसके बाद उसके मुंह से झाग निकलने लगता है और लार टपकने लगती है। पापी पुरुष के प्राण नीचे के मार्ग से निकलते हैं।*

*मृत्यु के समय दो यमदूत आते हैं। वे बड़े भयानक, क्रोधयुक्त नेत्र वाले तथा पाशदंड धारण किए होते हैं। वे नग्न अवस्था में रहते हैं और दांतों से कट-कट की ध्वनि करते हैं। यमदूतों के कौए जैसे काले बाल होते हैं। उनका मुंह टेढ़ा-मेढ़ा होता है। नाखून ही उनके शस्त्र होते हैं। यमराज के इन दूतों को देखकर प्राणी भयभीत होकर मलमूत्र त्याग करने लग जाता है। उस समय शरीर से अंगूष्ठमात्र (अंगूठे के बराबर) जीव हा हा शब्द करता हुआ निकलता है।*

*यमराज के दूत जीवात्मा के गले में पाश बांधकर यमलोक ले जाते हैं। उस पापी जीवात्मा को रास्ते में थकने पर भी यमराज के दूत भयभीत करते हैं और उसे नरक में मिलने वाली यातनाओं के बारे में बताते हैं। यमदूतों की ऐसी भयानक बातें सुनकर पापात्मा जोर-जोर से रोने लगती है, किंतु यमदूत उस पर बिल्कुल भी दया नहीं करते हैं।*
*इसके बाद वह अंगूठे के बराबर शरीर यमदूतों से डरता और कांपता हुआ, कुत्तों के काटने से दु:खी अपने पापकर्मों को याद करते हुए चलता है। आग की तरह गर्म हवा तथा गर्म बालू पर वह जीव चल नहीं पाता है। वह भूख-प्यास से भी व्याकुल हो उठता है। तब यमदूत उसकी पीठ पर चाबुक मारते हुए उसे आगे ले जाते हैं। वह जीव जगह-जगह गिरता है और बेहोश हो जाता है। इस प्रकार यमदूत उस पापी को अंधकारमय मार्ग से यमलोक ले जाते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार यमलोक 99 हजार योजन (योजन वैदिक काल की लंबाई मापने की इकाई है। एक योजन बराबर होता है, चार कोस यानी 13-16 कि.मी) दूर है। वहां पापी जीव को दो- तीन मुहूर्त में ले जाते हैं। इसके बाद यमदूत उसे भयानक यातना देते हैं। यह याताना भोगने के बाद यमराज की आज्ञा से यमदूत आकाशमार्ग से पुन: उसे उसके घर छोड़ आते हैं।*

- *घर में आकर वह जीवात्मा अपने शरीर में पुन: प्रवेश करने की इच्छा रखती है, लेकिन यमदूत के पाश से वह मुक्त नहीं हो पाती और भूख-प्यास के कारण रोती है। पुत्र आदि जो पिंड और अंत समय में दान करते हैं, उससे भी प्राणी की तृप्ति नहीं होती, क्योंकि पापी पुरुषों को दान, श्रद्धांजलि द्वारा तृप्ति नहीं मिलती। इस प्रकार भूख-प्यास से बेचैन होकर वह जीव यमलोक जाता है।*

*जिस पापात्मा के पुत्र आदि पिंडदान नहीं देते हैं तो वे प्रेत रूप हो जाती हैं और लंबे समय तक निर्जन वन में दु:खी होकर घूमती रहती है। काफी समय बीतने के बाद भी कर्म को भोगना ही पड़ता है, क्योंकि प्राणी नरक यातना भोगे बिना*

मनुष्य शरीर नहीं प्राप्त होता। गरुड़ पुराण के अनुसार मनुष्य की मृत्यु के बाद 10 दिन तक पिंडदान अवश्य करना चाहिए। उस पिंडदान के प्रतिदिन चार भाग हो जाते हैं। उसमें दो भाग तो पंचमहाभूत देह को पुष्टि देने वाले होते हैं, तीसरा भाग यमदूत का होता है तथा चौथा भाग प्रेत खाता है। नवें दिन पिंडदान करने से प्रेत का शरीर बनता है। दसवें दिन पिंडदान देने से उस शरीर को चलने की शक्ति प्राप्त होती है।*

- *गरुड़ पुराण के अनुसार शव को जलाने के बाद पिंड से हाथ के बराबर का शरीर उत्पन्न होता है। वही यमलोक के मार्ग में शुभ-अशुभ फल भोगता है। पहले दिन पिंडदान से मूर्धा (सिर), दूसरे दिन गर्दन और कंधे, तीसरे दिन से हृदय, चौथे दिन के पिंड से पीठ, पांचवें दिन से नाभि, छठे और सातवें दिन से कमर और नीचे का भाग, आठवें दिन से पैर, नवें और दसवें दिन से भूख-प्यास उत्पन्न होती है। यह पिंड शरीर को धारण कर भूख-प्यास से व्याकुल प्रेतरूप में ग्यारहवें और बारहवें दिन का भोजन करता है।- यमदूतों द्वारा तेरहवें दिन प्रेत को बंदर की तरह पकड़ लिया जाता है। इसके बाद वह प्रेत भूख-प्यास से तड़पता हुआ यमलोक अकेला ही जाता है। यमलोक तक पहुंचने का रास्ता वैतरणी नदी को छोड़कर छियासी हजार योजन है। उस मार्ग पर प्रेत प्रतिदिन दो सौ योजन चलता है। इस प्रकार 47 दिन लगातार चलकर वह यमलोक पहुंचता है। मार्ग में सोलह पुरियों को पार कर पापी जीव यमराज के घर जाता है। - इन सोलह पुरियों के नाम इस प्रकार है - सौम्य, सौरिपुर, नगेंद्रभवन, गंधर्व, शैलागम, क्रौंच, क्रूरपुर, विचित्रभवन, बह्वापाद, दु:खद, नानाक्रंदपुर, सुतप्तभवन, रौद्र, पयोवर्षण, शीतढ्य, बहुभीति। इन सोलह पुरियों को पार करने के बाद यमराजपुरी आती है। पापी प्राणी यमपाश में बंधा मार्ग में हाहाकार करते हुए यमराज पुरी जाता है।*

अगर अपने पितर के निमित्त कर्मकांड और पिंड दान न कर पाये
तो सलाह के लिए सम्पर्क करे

आचार्य पण्डित विनोद चौबे,  संपादक- 'ज्योतिष का सूर्य' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई
9827198828

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

स्थान का महत्व....? अवश्य पढ़ें

स्थान का महत्व....? अवश्य पढ़ें 

पदस्थितस्य पद्मस्य मित्रे वरुणभास्करे ।

पदच्युतस्य तस्यैव क्लेशदाहकरावुभौ ।

मित्रों, 

जब कमल अपने स्थान पर होता है (तालाब में) तब जल के देव वरुण तथा सूर्य दोनों उसके मित्र होते है । और वहीं कमल जब स्थानभ्रष्ट होता है, तब वरुण और सूर्य दोनों उसे क्लेश और दाह देनेवाले होते है।! मंगलमयी सुप्रभात !! वरिष्ठ जनों को सादर प्रणाम, कनिष्ठ जनों को मंगल आशीष !!

- आचार्य पण्डित विनोद चौबे, 09827198828, भिलाई

डूबते सूरज की धूमिल चमक से चौंधिया गये कांग्रेस के प्रखर वक्ता अखिलेशजी.

डूबते सूरज की धूमिल चमक से चौंधिया गये कांग्रेस के प्रखर वक्ता अखिलेशजी...

डूबते सूरज की चमक से चौंधियाये कांग्रेसी प्रवक्ता श्री अखिलेश प्रताप सिंह जी, पूर्व सैन्य अधिकारियों को टीबी डिबेट कार्यक्रम में जो भला-बुरा कह रहे हैं, वह एक भारतीय नेता के लिये ठीक नहीं चाहे वह किसी भी पार्टी, कुनबे या परिवार का हो ! यदि इस मामले में कांग्रेस के अधिकृत प्रवक्ता अखिलेशजी का समर्थन (राहुल कांग्रेस) करती है तो इससे बड़ा अभारतीय नेतृत्व और क्या हो सकता है! संदीप दिक्षित से लेकर कई कांग्रेसी नेताओं द्वारा बार बार सेना का अपमान करना यह दर्शाता है कि- कहीं ना कहीं कांग्रेस भारतीय सेना से डर गई है ! इसका मतलब सेना अब और ताकतवर हो गई है ! जो पाक़परस्त शक्तियों का समर्थन करने वाले मुठ्ठी भर दो चार ही कुछ लोग हैं  उनका बिलबिलाना स्वाभाविक है ! इसीलिये तो नफ़रत भी कर रहे हैं, भारत में बैठकर भारत के खिलाफ साजिश़ भी कर रहे हैं ! राजनीति करनी है तो करो लेकिन 'सेना' पर तो गंदी राजनीति करना बंद करो ! पहले तुम लोगों 'कर्नल श्रीकांत पुरोहित' को 'विलेन' बनाकर भारतीय सेना की साख़ पर बट्टा लगाया बाद में 'गोगोई' जैसे सेना को 'विलेन' बनाकर कश्मीरियों के दिलो दिमाग मे सेना के विरुद्ध भड़काने का काम किया और एक तुम्हारे ही नेता 'सेना को गलीछाप गुंडा' बोलता है, शर्म आनी चाहिये, ऐसी घटिया राजनीति पर ! विरोध करो ना जितना हो सके मोदी का, कौन रोका है पानी पी पी कर खूब गरियाओ मोदी सरकार को, तुम विपक्ष मे हो इसके अलावां और क्या कर भी सकते हो लेकिन भारतीय सेना को काहें बदनाम कर रहे हो, रिटा. सेना के अधिकारियों को टीबी डिबेट के लाईव कार्यक्रमों में काहे को गरियाते, डांटते और डपते फिर रहे हो ! मोदी की चुनौति तो स्वीकार नहीं कर पा रहे चले हो सेना को जलील करने...इससे माईनस मे ही जाओगे अखिलेश जी !
-आचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- 'ज्योतिष का सूर्य' मासिक पत्रिका, शांति नगर, भिलाई

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

'द्वितीयं ब्रह्मचारिणीम्' गुप्त नवरात्री के दूसरे दिन की देवी स्तुति :-

'द्वितीयं ब्रह्मचारिणीम्' गुप्त नवरात्री के दूसरे दिन की देवी स्तुति :-
रक्ष त्वं मुण्ड-धारी गिरि-गुह-विवरे निर्झरे पर्वते वा।
संग्रामे शत्रु-मध्ये विश विषम-विषे संकटे कुत्सिते वा।।
व्याघ्रे चौरे च सर्पेऽप्युदधि-भुवि-तले वह्नि-मध्ये च दुर्गे।
रक्षेत् सा दिव्य-मूर्तिः प्रदहतु दुरितं मुण्ड-चण्डे प्रचण्डे।।
!! मंगलमयी सुप्रभात !! मंगलमस्तु !! शुभमस्तु !! आज का दिन शुभ हो !!
मां आपकी सभी मनोकामना पूर्ण करें
- आचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- 'ज्योतिष का सूर्य' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका 9827198828, भिलाई

काशी विश्वनाथ मंदिर पर औरंगजेब की क्रूरता

1669 मे औरंगजेब के हाथों विध्वस्त हो जाने
के बाद 1775 तक काशी मे विश्वनाथजी का
मन्दिर ही ना रहा।

1775 मे अहिल्या बाई ने ज्ञानव्यापी मस्जिद
के बगल मे रहने वाले बहुत ही छोटे से मण्डप
मे एक छोटी सी रचना का निर्माण करवाया जिसे आजकल मन्दिर कहा जाता है।

1857 के सैन्य संग्राम मे मुसलमानों ने विश्वेश्वर
जी के इस छोटे से मन्दिर पर हरा झण्डा फहराने
की कोशिश की थी।
उससे अंग्रेजों को ही फायदा पहुंचा था।

अपनी हुकुमत को बनाये रखने के लिये अंग्रेजों
ने धार्मिक संतुलन का जो सुत्र अपनाया था, 
उसी को अधिकार ग्रहण करने वाले भारत के राजकारण के मुखियाओं ने संविधान का पवित्र नियम सा बना डाला।

इससे मुसलमानों को यह तर्क प्रस्तुत करने का अवसर मिल गया कि इससे पहले अपने हाथों विध्वस्त किये गये हिन्दुओं के मन्दिरों के पवित्र स्थानों को वापस हिन्दुओं को नहीं लौटाने का
कानूनी हक तथा सविंधान का समर्थन उन्हे
प्राप्त हुआ है।

1803 मे लॉर्ड वेलेंशिया नाम के अंग्रेज अफसर
ने लिखा था " औरंगजेब की मस्जिद की ऊंची
मिनारों को देखने के बाद, मेरे मन मे एक हिन्दु
की भावना जगी।

मैने विचार किया की आंखों मे व्यथा भर देने
वाले इस झगडे को समाप्त करके इस पवित्र
नगर के इस स्थल को उसके पुराने मालिकों
के हाथों सौंप देना चाहिये।
( जार्ज वैंकाउट वेलेंशिया: Voyage and
Travels of Lord Valentia Pt. 1; P.90; London,1811)

मुसलमानों की हुकुमत समाप्त होने के बाद भी तीर्थक्षेत्रों की पौर-सभायें इस यात्रा शुल्क को
वसूल करती आ रही हैं।

विदेशी हुकुमतों के हाथों ढाये गये इस हीन
आचरण को समाप्त करने के बदले,उसको
जारी रखते हुये आने वाले स्वदेश के हुकुमत
परस्तों की विवेकहीनता के बारे मे क्या कहें ???

चित्र ज्ञानवापी मस्जिद में शिव मन्दिर का भग्नावशेष !!
- साभार

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