ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

महाशिवरात्रि एवं महारात्रि का महापर्व... विस्तृत जानकारी अवश्य पढ़ें

भारतीय पर्वों में चार रात्रियां एवं मनुष्य के जीवन में प्रभाव.......




साथियों, जैसा की आपको ज्ञात है कि संस्कृत-साहित्य के कई उपाख्यानों में प्रसंगवश अलग अलग चार रात्रियों का वर्णन आता है, आखिरकार ये रात्रियां क्या है, और इनका मनुष्य के जीवन से क्या लेना देना है? आईये इस लेख के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं...........

पर्व, उत्सव और त्योहार किसी भी संस्कृति का दर्पण होते हैं। हिन्दू धर्म में इन पर्वों, उत्सवों एवं त्योहारों का विशिष्ट स्थान हैं तथा यह हिन्दू संस्कृति के अभिन्न अंग माने जाते हैं। प्राय: त्योहार दिन के प्रकाश में ही मनाये जाते हैं, लेकिन अपवाद स्वरूप कुछ त्यौहार ऐसें हैं, जो कि रात्रि के समय मनाए जाते हैं।
जैसे कृष्ण जन्माष्टमी, महाशिवरात्रि, दीपावली, होलिका दहन, शरद पूर्णिमा। मार्कण्डेय पुराणान्तर्गत श्री दुर्गा सप्तशती में तीन रात्रियों का उल्लेख दारूण रात्रियों के रूप में हुआ है- कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि। कालरात्रि से तात्पर्य है- होली (होलिका दहन), महारात्रि- सिवरात्रि तथा मोहरात्रि- दीपावली अथवा शरद पूर्णिमा।
कुछ शास्त्रकारों के अनुसार उपरोक्त रात्रियों को भयानक (दारूण) रात्रियां माना गया है कालरात्रि- दीपावली की रात, महारात्रि- शिवरात्रि और मोहरात्रि- कृष्णजन्माष्टमी की रात। इन विशिष्ट रात्रियों को मानव जीवन से जोड़कर देखें तो मोहरात्रि- मोहने वाले कृष्ण के जन्म की रात्रि अर्थात् मनुष्य के जन्म की रात्रि, कालरात्रि- जीवन बुढ़ापे की शुरूआत, महारात्रि- निर्वाण की रात्रि अर्थात् भगवानन शिव के चरणों में समर्पित होने की रात्रि। दीपावली और शरदपूर्णिमा तो खुशियों की रात्रियां हैं, इसे मनुष्य के वैवाहिक जीवन की शुरूआत की रात्रि के रूप में भी देखा जा सकता है। जीवन की मोहरात्रि और महारात्रि कब आ जाए किसी को मालूम नहीं, लेकिन कालरात्रि के विषय में रामायण में एक उल्लेख मिलता है। उसके अनुसार कालरात्रि (मृत्यु की रात्रि) मनुष्य की आयु में यह रात जो सतहत्तर (77वें) वर्ष के सातवें महीने के 7वें दिन पड़ती है और जिसके बाद मनुष्य नित्यकर्म आदि से मुक्त समझा जाता है। अब मनुष्य यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि आखिर यह 77 वर्ष, 7 माह, 7 दिन कैसे तय किये गए? इसका आधार क्या रहा होगा? हमारे यहां तो ये भी कहा गया है कि यह व्यक्ति ‘सठिया’ गया है या सत्तर-बहत्तर हो गया अर्थात् भुलक्कड़ हो गया है, इसे सेवानिवृत्त या नित्यकर्म से मुक्ति दे देनी चाहिए।
मैंने अपनी अल्पबुध्दि द्वारा निम्न दो फार्मूले बनाए जो कि उपरोक्त गणनाओं पर फिट बैठते हैं-
पहले फार्मूले के अनुसार, कुछ शास्त्रकारों ने माना कि चार लाख बत्तीस हजार वर्षों का यह कलियुग, इस युग से दुगुनी संख्या का द्वापर युग, इससे दुगुनी संख्या का त्रेतायुग, इससे दुगुनी संख्या का सतयुग, इस प्रकार चार युग एक बार व्यतीत होंगे। परिवर्तन होकर पुन: सतयुग प्रारम्भ हो जायेगा। इस प्रकार ये चारों युग बारह बार व्यीतत होंगे, जब विधाता का एक दिन होगा, जिसकी गणना इस प्रकार है-
कलियुग- 4,32,000 -कलियुग से दुगुनी संख्या द्वापर युग- 8,64,000, द्वापर युग से दुगुनी संख्या, त्रेतायुग- 17,28,000, त्रेतायुग से दुगुनी संख्या सतयुग-34,56,000, 12 बार घूमने पर विधाता का एक दिन- 64,80,000द12-77,77,60,000
दूसरे फार्मूले के अनुसार, कुछ विद्वान ब्रह्माजी की आयु की गणना इस प्रकार से करते हैं कि मनुष्यों का एक महीना पितरों का एक दिन, एक रात होता है। पितरों का एक वर्ष देवताओं का एक दिन-रात होता है। देवताओं के दो हजार वर्ष का ब्रह्मा जी का एक दिन होता है। इन सबका गुणा करने पर 30,360,360,2000 __/\__ 7776000000, उपरोक्त दोनों गणनाओं की संख्या को ब्रह्मा जी का एक दिन माना गया है। अगर इनमें से उपरोक्त शून्यों को हटा दें तो 7776 की संख्या आती है।
इस उम्र तक तो कार्य कर सकते हैं अर्थात् इसके अगले दिन अर्थात् 77 वर्ष, सात मास औरसात दिन से मनुष्य को नित्यकर्म आदि से मुक्त समझा जाता है। रामायण के अनुसार, उपरोक्त गणना को मैं कहां तक सही रूप दे पाया हूं, यह तो आप ही निर्णय कर पायेंगे पर यह महत्वपूर्ण रात्रियां मानव जीवन की विशिष्ट रात्रियां हैं।

अब सवाल यह उठता है, कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही क्यों कहते हैं 'महाशिवरात्रि'

थोड़ा बहुत तो मैने इस पर चर्चा की है परन्तु अब महाशिवरात्रि पर्व को महारात्रि और कुछ विद्वानों ने तो कालरात्रि के भी रूप में वर्णन किया है......तो आईये इसे विस्तृत रूप से समझने का प्रयास करते हैं......
महाशिवरात्रि फाल्गुनमास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। भगवान शिव के निराकार से साकाररूप में अवतरण की रात्रि ही महाशिवरात्रि है। ईशान-संहिता के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी की रात्रि को भगवान शिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाले लिंगरूप में प्रकट हुए। कहा जाता है कि इस दिन शिवजी समस्त शिवलिंगों में प्रवेश करते हैं; इसलिए इसे महाशिवरात्रि कहते हैं।प्रत्येक मास की कृष्णपक्ष की चतुर्दशी‘शिवरात्रि’ कहलाती है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव और आदिशक्ति का विवाह हुआ था।

फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी की महानिशा में ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य

ईशान संहिता की कथा के अनुसार सृष्टिरचना के बाद भगवान ब्रह्मा एक बार घूमते हुए क्षीरसागर पहुंचे। उन्होंने वहां शेषनाग की शय्या पर भगवान नारायण को शान्त अधलेटे देखा। भूदेवी-श्रीदेवी उनकी चरणसेवा कर रहीं थी। गरुड़, नन्द-सुनन्द, पार्षद, गन्धर्व, किन्नर आदि हाथ जोड़े खड़े थे। यह देखकर ब्रह्माजी को आश्चर्य हुआ कि ‘मैं ही सबका पितामह हूँ; यह वैभव-मण्डित होकर यहां कौन सोया हुआ है?’

ब्रह्माजी ने भगवान नारायण को जगाते हुए कहा–’तुम कौन हो, देखो जगत का पितामह आया है।’  इस पर भगवान नारायण ने कहा–’जगत मुझमें स्थित है, तुम मेरे नाभिकमल से पैदा हुए हो, तुम मेरे पुत्र हो।’ दोनों में स्रष्टा और स्वामी का विवाद बढ़ने लगा। ब्रह्माजी ने ‘पाशुपत’ और भगवान नारायण ने ‘महेश्वर’ नामक अस्त्र उठा लिए। सृष्टि में प्रलय की आशंका हो गयी। देवतागण कैलास पर भगवान शिव की शरण में गए। अन्तर्यामी शिव सब समझ गए और देवताओं को आश्वस्त किया कि मैं इन दोनों का युद्ध शान्त करुंगा। ऐसा कहकर भगवान शंकर दोनों के मध्य में अनादि-अनन्त ज्योतिर्मयलिंग के रूप में प्रकट हो गए। महेश्वर और पाशुपत अस्त्र उसी ज्योतिर्लिंग में लीन हो गए। यह लिंग निराकार ब्रह्म का प्रतीक है।

भगवान विष्णु और ब्रह्माजी ने उस लिंग की पूजा की। यह लिंग फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को प्रकट हुआ तभी से आज तक लिंगपूजा चली आ रही है। ब्रह्मा एवं विष्णुजी ने शंकरजी से कहा–जब हम दोनों लिंग के आदि-अन्त का पता न लगा सके तो आगे मानव आपकी पूजा कैसे करेगा? इस पर भगवान शिव द्वादशज्योतिर्लिंगों में बंट गए।

महाशिवरात्रि व्रत में ‘फाल्गुनमास’, ‘कृष्णपक्ष’, ‘चतुर्दशी तिथि’ व ‘रात्रि’ का महत्व

भगवान शिव को फाल्गुनमास की कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि की रात्रि ही क्यों प्रिय है? इसका गूढ़ अर्थ है–

शिव क्या हैं?

‘जिसमें सारा जगत शयन करता है, जो प्रलयकाल में सारे जगत को अपने अंदर लीन कर लेते हैं, वे ही ‘शिव’ हैं।

शिवरात्रि

शिवरात्रि का अर्थ है ‘वह रात्रि जिसका शिव के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है’ या भगवान शिव की अतिप्रिय रात्रि को ‘शिवरात्रि’ कहा गया है।

चतुर्दशी तिथि ही क्यों?

भगवान शिव चतुर्दशी तिथि के स्वामी हैं।

रात्रि ही क्यों?

भगवान शंकर संहार और तमोगुण के देवता हैं। दिन सृष्टि का और रात्रि प्रलय व संहार का द्योतक है। रात्रि के आते ही प्रकाश का, मनुष्य की दैनिक गतिविधियों का और निद्रा द्वारा मनुष्य की चेतनता का संहार हो जाता है। जिस प्रकार प्रलयकाल में भगवान शिव सबको अपने में लीन कर लेते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व अचेतन होकर रात्रि की आनन्ददायी गोद में समा जाता है। इसलिए भगवान शंकर की आराधना न केवल इस महारात्रि में वरन् सदैव प्रदोष (रात्रि के आरम्भ होने) के समय में की जाती है। रात्रि के समय भूत, प्रेत, पिशाच और स्वयं शिवजी भ्रमण करते हैं, अत: उस समय इनका पूजन करने से मनुष्य के पाप दूर हो जाते हैं। रात्रिप्रिय शिव से भेंट करने का समय रात्रि के अलावा और कौन-सा हो सकता है? अत: शिवजी की अतिप्रिय रात्रि को ‘शिवरात्रि’ कहा गया है।

ब्रह्माण्ड में सृष्टि और प्रलय का क्रम चलता रहता है। शास्त्रों में दिन और रात्रि को नित्य-सृष्टि और नित्य-प्रलय कहा है। दिन में हमारा मन, प्राण और इन्द्रियां विषयानन्द में ही मग्न रहती हैं। रात्रि में विषयों को छोड़कर आत्मा शिव की ओर प्रवृत्त होती हैं। हमारा मन दिन में प्रकाश की ओर, सृष्टि की ओर जाता है और रात्रि में अन्धकार की ओर, लय की ओर लौटता है। इसी से दिन सृष्टि का और रात्रि प्रलय का द्योतक है। इसलिए रात्रि ही परमात्मा शिव से आत्मसाक्षात्कार करने का अनुकूल समय है।

कृष्णपक्ष ही क्यों?

मन के देवता चन्द्र माने जाते हैं। शुक्लपक्ष में चन्द्रमा सबल और कृष्णपक्ष में क्षीण होते हैं। कृष्णपक्ष में चन्द्रमा के क्षीण होने से मनुष्य के अंत:करण में तामसी शक्तियां प्रबल हो जाती हैं। इन्हीं तामसी शक्तियों को आध्यात्मिक भाषा में भूत-प्रेतादि कहते हैं। भगवान शिव को भूत-प्रेतादि का नियन्त्रक देवता माना गया हैं। अत: कृष्णपक्ष की चन्द्रविहीन रात्रि को जब ये शक्तियां अपना प्रभाव दिखाने लगती हैं, तब इनके उपशमन के लिए भगवान शिव की उपासना का विधान है।

फाल्गुनमास ही क्यों?

ब्रह्माण्ड में प्रलय के बाद सृष्टि और सृष्टि के बाद प्रलय होता है। इसी तरह रात्रि के बाद दिन और दिन के पश्चात् रात्रि होती है। इसी तरह वर्षचक्र भी चलता है। क्षय होते हुए वर्ष के अंतिम मास फाल्गुन के बाद नए वर्षचक्र का आरम्भ होता है। ज्योतिष के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी में चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है। अत: उस समय में जीवरूपी चन्द्र का शिवरूपी सूर्य के साथ योग होता है। अत: फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी को शिव-पूजा करने से जीव को इष्ट की प्राप्ति होती है। इस तिथि पर जो कोई भी भगवान शिव की उपासना करता है, चाहें वह किसी भी वर्ण का क्यों न हो, वे उसे भुक्ति-मुक्ति प्रदान करते हैं।

 शिवरात्रिव्रतं नाम सर्वपापप्रणाशनम्।
आचाण्डालमनुष्याणां भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्।। (ईशान संहिता)

शिवरात्रि-व्रत

महाशिवरात्रि के समान शिवजी को प्रसन्न करने वाला अन्य कोई व्रत नहीं है। शिवरात्रि-व्रत में चार प्रहर में चार बार पूजा का विधान है। इस दिन उपवास, शिवाभिषेक, रात्रि भर जागरण और पंचाक्षर व रुद्रमन्त्रों का जप करना चाहिए। साधक का शिव के समीप वास ही उपवास है। पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियां, मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त और बुद्धि का निरोध (संयम) ही सच्ची शिव-पूजा’ या ‘शिवरात्रि-व्रत’ है।


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ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- "ज्योतिष का सूर्य" राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, सड़क-26, शांतिनगर भिलाई, जिला-दुर्ग (छ.ग.)
मोबाईल नं- 09827198828
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मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

शिवलिंग की वैज्ञानिकता.......

शिवलिंग की वैज्ञानिकता.......

"" भारत सरकार के नुक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है""

आदि काल से ही मनुष्य शिवलिंग की पूजा करते आ रहे हैं और इस संदर्भ में अलग-अलग मान्यताएं और कथाएं भी प्रचलित हैं। भारतीय सभ्यता के प्राचीन अभिलेखों एवं स्रोतों से भी ज्ञात होता है हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो की खुदाई से पत्थर के बने कई लिंग और योनि मिले हैं। एक मूर्ति ऐसी मिली है जिसके गर्भ से पौधा निकलते हुए दिखाया गया है।  शिवलिंग के तीन हिस्से होते हैं। लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और ऊपर प्रणवाख्य महादेव स्थित हैं। यह प्रमाण है कि आरंभिक सभ्यता के लोग प्रकृति-पूजक थे। वह मानते थे कि संसार की उत्पत्ति शिवलिंग से हुई थी इसी से शिवलिंग पूजा की परंपरा चल पड़ी।  शिवलिंग की पूजा भारत और श्रीलंका तक ही सीमित नहीं थी। बल्कि यूरोपीय देशों से ले कर प्राचीन मेसोपोटामिया तक भी होती थी । अब इस शिवलिंग की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि पर आप लोगों का ध्यानाकर्षण कराना चाहुंगा। 

"शिवलिंग का वैज्ञानिक रहस्य.."  साईंटीस्ट का रिसर्च........

मैं यहां साफ करना चाहूंगा कि मैं ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, भिलाई से हुं ना कि कोई साईंटीस्ट। किन्तु एक साईंटिस्ट से मुलाकात हमारे कार्यालय में हुई और चर्चा चल पड़ी "शिवलिंग की वैज्ञानिक सत्यता" विषय पर उन्होंने बताया कि- 

शिवलिंग की वैज्ञानिकता .... भारत का रेडियोएक्टिविटीमैप उठा लें, तब हैरान हो जायेगें ! भारत सरकार के नुक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है।.. शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्यूक्लियर रिएक्टर्स ही हैं, तभी तो उन पर जल चढ़ाया जाता है ताकि वो शांत रहे महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे किए बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, गुड़हल, आदि सभी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले है । क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है इसीलिए तो जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता। भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिवलिंग की तरह ही है।. शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिलकर औषधि का रूप ले लेता है। तभी तो हमारे पूर्वज हम लोगों से कहते थे कि महादेव शिवशंकर अगर नराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी। .ध्यान दें, कि हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है। जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है, वो तो चिर सनातन है। विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें।

मित्रों, इसी संदर्भ में आपको बताते चलुं की शिवलिंग की कभी भी पूरी परिक्रमा नहीं की जाती है हमेशा आधी परिक्रमा की जाती है।  स्वामी विवेकानंद ने अन्नत ब्रह्म के प्रतीक के रूप में शिवलिंग को वर्णित किया था। इनके अलावां विश्व के तमाम दार्शनिकों ने "शिव सत्ता" को सहर्ष स्वीकार किया।


-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- "ज्योतिष का सूर्य" राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, सड़क- 26, कोहका मेन रोड, शांतिनगर, भिलाई, जिला-दुर्ग (छ.ग.) 490023
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 (कृपया उपरोक्त आलेख को वगैर अनुमति कहीं अन्यत्र प्रकाशित ना करें, और अनधिकृत तौर पर कहीं अन्यत्र तोड़-मरोड़कर कॉपी-पेस्ट करते हुये पाये जाने पर "ज्योतिष का सूर्य" द्वारा दाण्डिक कार्यवाही की जायेगी)

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

महाशिवरात्रि व्रत, एवं माहात्म्य और ज्योतिष के अनुसार अभिषेक द्रव्य..एवं चार प्रहर में कैसे करें शिव-पूजन.. (24 फरवरी - 2017)


श्री महाशिवरात्रि व्रत, एवं माहात्म्य और ज्योतिष के अनुसार अभिषेक द्रव्य..एवं चार प्रहर में कैसे करें शिव-पूजन.. (24 फरवरी - 2017)



साथियों, 
हमारे धर्म ग्रंथों में चार रात्रियों का वर्णन मिलता है " कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारूणा"  उन्हीं चार रात्रियों में से एक रात्रि है, महाशिवरात्रि जो हिंदू धर्म में एक प्रमुख त्योहार के रूप में मनाय जाता हैं !महाशिवरात्रि को महारात्रि के नाम से भी जान जाता हैं। हिंदू संस्कृति में भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिये सबसे पवित्र दिन माना जाता हैं।



-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- "ज्योतिष का सूर्य" राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, शांतिनगर, भिलाई, मोबाईल नं. 9827198828

देवों के देव भगवान भोले नाथ के भक्तों के लिये श्री महाशिवरात्रि का व्रत विशेष महत्व रखता हैं। यह पर्व फाल्गुन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन मनाया जाता है। वर्ष 2017 में यह शुभ उपवास, 24 फरवरी - शुक्रवार के दिन का रहेगा। इस दिन का व्रत रखने से भगवान भोले नाथ शीघ्र प्रसन्न हों, उपवासक की मनोकामना पूरी करते हैं। इस व्रत को सभी स्त्री-पुरुष, बच्चे, युवा, वृद्धों के द्वारा किया जा सकता हैं।


24 फरवरी - 2017 के दिन विधिपूर्वक व्रत रखने पर तथा शिवपूजन,रुद्राभिषेक, शिवरात्रि कथा, शिव स्तोत्रों का पाठ व "उँ नम: शिवाय" का पाठ करते हुए रात्रि जागरण करने से अश्वमेघ यज्ञ के समान फल प्राप्त होता हैं। व्रत के दूसरे दिन  यथाशक्ति वस्त्र-क्षीर सहित भोजन, दक्षिणादि प्रदान करके संतुष्ट किया जाता हैं।

*चार प्रहर पूजन अभिषेक  विधान*

प्रथम प्रहर- सायं 6:00 से रात्रि 9:00तक

द्वितीय प्रहर- रात्रि 9:00 से रात्रि 12:00 तक

तृतीय प्रहर- रात्रि 12:00 से रात्रि 3:00 तक

चतुर्थ प्रहर- रात्रि 3:00 से प्रातः 6:00 बजे तक

*शिवरात्री व्रत की महिमा*

इस व्रत के विषय में यह मान्यता है कि इस व्रत को जो जन करता है, उसे सभी भोगों की प्राप्ति के बाद, मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत सभी पापों का क्षय करने वाला है, व इस व्रत को लगातार 14 वर्षो तक करने के बाद विधि-विधान के अनुसार इसका उद्धापन कर देना चाहिए.

*महाशिवरात्री व्रत का संकल्प*

व्रत का संकल्प सम्वत, नाम, मास, पक्ष, तिथि-नक्षत्र, अपने नाम व गोत्रादि का उच्चारण करते हुए करना चाहिए। महाशिवरात्री के व्रत का संकल्प करने के लिये हाथ में जल, चावल, पुष्प आदि सामग्री लेकर शिवलिंग पर छोड दी जाती है।

*महाशिवरात्री व्रत की सामग्री*

उपवास की पूजन सामग्री में जिन वस्तुओं को प्रयोग किया जाता हैं, उसमें पंचामृत (गंगाजल, दुध, दही, घी, शहद), सुगंधित,चावल, रोली, कलावा, जनेऊ, फूल, शुद्ध वस्त्र, बिल्व पत्र,धतूरा, समीपत्र, आक पुष्प, दूर्वा, धूप, दीप, नैवेध, चंदन का लेप, ऋतुफल,नारियल और अभिषेक के लिए दूध आदि।

*महाशिवरात्री व्रत की विधि*

महाशिवरात्री व्रत को रखने वालों को उपवास के पूरे दिन, भगवान भोले नाथ का ध्यान करना चाहिए। प्रात: स्नान करने के बाद भस्म का तिलक कर रुद्राक्ष की माला धारण की जाती है। इसके ईशान कोण दिशा की ओर मुख कर शिव का पूजन धूप, पुष्पादि व अन्य पूजन सामग्री से पूजन करना चाहिए।

इस व्रत में चारों पहर में पूजन किया जाता है। प्रत्येक पहर की पूजा में "उँ नम: शिवाय" व " शिवाय नम:" का जाप करते रहना चाहिए। अगर शिव मंदिर में यह जाप करना संभव न हों, तो घर की पूर्व दिशा में, किसी शान्त स्थान पर जाकर इस मंत्र का जाप किया जा सकता हैं। चारों पहर में किये जाने वाले इन मंत्र जापों से विशेष पुन्य प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त उपावस की अवधि में रुद्राभिषेक करने से भगवान शंकर अत्यन्त प्रसन्न होते है।

*शिव अभिषेक विधि*

महाशिव रात्रि के दिन शिव अभिषेक करने के लिये सबसे पहले एक मिट्टी का बर्तन लेकर उसमें पानी भरकर, पानी में बेलपत्र, आक धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर शिवलिंग को अर्पित किये जाते है। व्रत के दिन शिवपुराण का पाठ सुनना चाहिए और मन में असात्विक विचारों को आने से रोकना चाहिए। शिवरात्रि के अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेलपत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है।

*पूजन करने का विधि-विधान*

महाशिवरात्री के दिन शिवभक्त का जमावडा शिव मंदिरों में विशेष रुप से देखने को मिलता है। भगवान भोले नाथ अत्यधिक प्रसन्न होते है, जब उनका पूजन बेल- पत्र आदि चढाते हुए किया जाता है। व्रत करने और पूजन के साथ जब रात्रि जागरण भी किया जाये, तो यह व्रत और अधिक शुभ फल देता है। इस दिन भगवान शिव की शादी हुई थी, इसलिये रात्रि में शिव की बारात निकाली जाती है। सभी वर्गों के लोग इस व्रत को कर पुन्य प्राप्त कर सकते हैं।



*महाशिवरात्रि व्रत कथा*

एक बार. 'एक गाँव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया।

अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए।

एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ. शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना। ' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई।

शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था  उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी. इस समय मुझे मत मार।

शिकारी हँसा और बोला, 'सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ. मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे।

उत्तर में मृगी ने फिर कहा, 'जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के आभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला,' हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े, मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा।

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।

उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।

देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की. तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।

महाशिवरात्रि पर असाध्य रोगों का ज्योतिषीय निदान

महाशिवरात्रि को हिंदू धर्म में एक प्रमुख त्योहार के रूप में मनाय जाता हैं। महाशिवरात्रि को कालरात्रि के नाम से भी जान जाता हैं। हिंदू संस्कृति में महाशिवरात्रि भगवान शंकर का सबसे पवित्र दिन माना जाता हैं।



महाशिवरात्रि पर रुद्राभिषेक का बहुत महत्त्व माना गया है और इस पर्व पर रुद्राभिषेक करने से सभी रोग और दोष समाप्त हो जाते हैं। 
  ज्योतिष शास्त्र में भगवान शिव को सुख देने का आधार माना गया है. इसीलिए शिवरात्रि पर. अनेक प्रकार के अनुष्ठान कर
मनोनुकूल फल प्राप्ति के लिए   शिवजी की पूजा इस प्रकार करें-   
1 गुड़ के जल से अभिषेक करें । मीठी रोटी का भोग चढ़ाएं। लाल चंदन व कनेर की फूल से पूजा करें। भूमि, भवन आदि अचल संपत्ति प्राप्त होगी।
2 दही से अभिषेक करें। शक्कर, चावल, सफेद चंदन व सफेद फूल से पूजा करें । परिवार में सुख-शांति आएगी।
3 गन्ने के रस से भगवान का अभिषेक करें। मूंग, दूब और कुशा से पूजा करें। धन लाभ होगा।
4घी से अभिषेक कर चावल, कच्चा दूध, सफेद आक व शंखपुष्पी से शिवलिंग की पूजा करें। व्यक्तित्व विकास होगा। चिंता का नाश होगा।

5 गुड़ के जल से अभिषेक कर गुड़ व चावल से बनी खीर का भोग लगाएं। मंदार के फूल से पूजा करें। आत्मसुख मिलेगा। बिगड़े काम बन जाएंगे
6 गन्ने के रस से शिवलिंग का अभिषेक करें। भगवान शंकर को भांग, दूब व पान अर्पित करें। रोजगार के अवसर मिलेंगे।

7  सुगंधित तेल या इत्र से भगवान का अभिषेक कर दही, शहद व श्रीखंड का भोग लगाएं। सफेद फूल से शिवजी की पूजा करें।  कार्य में आ रही बाधाएं दूर होंगी।

8  पंचामृत से अभिषेक करें। मावे की मिठाई का भोग लगाएं। लाल फूल से भगवान की पूजा करें। धन लाभ होगा।
9  हल्दी युक्त दूध से अभिषेक कर बेसन की मिठाई का भोग लगाएं। पीले फूल से शिवजी की पूजा करें। रोगों से मुक्ति मिलेगी।
10  नारियल पानी से अभिषेक कर उड़द से बनी मिठाई का भोग लगाएं। गेंदे के फूल चढ़ाएं।  विवाह के लिए रिश्ते आएंगे।
11  तिल के तेल से अभिषेक कर मिठाई का भोग लगाएं । शमी के फूल से शिवजी की पूजा करें।  प्रतियोगी परीक्षा में सफलता मिलेगी।

12  केसरयुक्त दूध से शिवजी का अभिषेक कर दही-चावल का भोग लगाएं। पीली सरसों और नागकेसर से पूजा करें।  परिवार में प्रेम बढ़ेगा।

भगवान शिव आरोग्य के देवता हैं। वे सभी बीमारियों से मुक्ति दिलाते हैं। यदि आप किसी बीमारी से ग्रसित हैं और काफी इलाज करवाने के बाद भी आपका रोग ठीक नहीं हो रहा हैं तो शिवरात्रि के दिन पूजा अभिषेक जरूर करे |  शीघ्र ही शिवजी की कृपा से आपका रोग दूर हो जाएगा।
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-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- "ज्योतिष का सूर्य" राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, शांतिनगर, भिलाई, मोबाईल नं. 9827198828

बुधवार, 11 जनवरी 2017

कब ? और कैसे ? मनायें मकर संक्रांति......

कब ? और कैसे ? मनायें मकर संक्रांति......

साथियों, नमस्कार सर्वप्रथम आप सभी देश वासियों को मकर संक्रांति के पावन अवसर पर ढेर सारी शुभकामनाएं । "संक्रमणति इति संक्रांति" अर्थात् एक राशि से दूसरी राशि पर सूर्य के राशि प्रवेश को ही  "संक्रांति" कहते हैं।

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

हिन्दु, हिन्दुत्व और इष्टदेव की साधना तथा प्राच्य ज्योतिष.....

हिन्दु, हिन्दुत्व और इष्टदेव की साधना तथा प्राच्य ज्योतिष.....


"ज्योतिष के सरलीकरण का मतलब ये नहीं प्राच्य ज्योतिष के श्लोकबद्ध सिद्धांत-सूत्रों को तोड़-मरोड़ कर रखा जाय...यह बर्दाश्त नहीं ..."

साथियों,
पारम्परिक ज्योतिषियों को छोड़ जहां आजकल के कुछ मुठ्ठी भर कथित ज्योतिषीयों द्वारा ज्योतिष को अपने अपने ढंग से अलग-अलग फलकथनाध्यायों में पॉकेट-बुक्स के माध्यम से जिस ज्योतिष के रूप-स्वरूप तथा भ्रान्तिपूर्ण योगायोगों को परिभाषित किया जा रहा है, उससे में थकित, चकित और हतप्रभ हुं। कि आखिर ये लोग ज्योतिष को और कितना नुकसान पहुंचायेंगे, हालाकि यह शास्वत शास्त्र है, जिसको कोई आंच नहीं आ सकता। हां, आम जनमानस भ्रमित हो अवश्य जाता है, जिससे इस विधा से लोगों अनास्था बढ़ने के आसार पुख्ता होने लगते हैं। 
इस लेख मे मैं अपने जीवन से जड़ी एक घटना का भी जिक्र करूंगा मैं अपने जन्म स्थान यूपी के जनपद देवरिया में स्थित मौना गढ़वां से वाराणसी की यात्रा में था। बीच में एक स्टेशन पड़ता है मऊ जं., वहां एक एक बंधु सवार हुये। चर्चा चल पड़ी उन्होंने कहा कि फलित ज्योतिष से जुड़े कई अलग-अलग ग्रंथों का अध्ययन किया लेकिन हर ग्रंथों मे फलकथन भिन्न मिला ऐसे में जातक को किस प्रकार से सटीक फलकथन कर संतुष्ट किया जाय ? मित्रों यह बात तो सही है भृगु संहिता, वृहदज्जातकम्, जातकपारिजात, षटपंचासिका (कुंजी), पराशर संहिता सहित तमाम ग्रंथों में द्वादश भाव तथा भावस्थ ग्रहों के फल कथन में ना केवल भिन्नता है बल्कि कई योगों को लेकर मत मतांतर भी हैं। मैने उनसे कहा कि बंधुवर, अभीतक पिछले १६ या १७ वर्षों के अध्ययन में पाया कि-  ज्योतिष तो त्रिस्कन्ध है यानी इसके तीन प्रमुख स्तम्भ हैं – गणित (होरा), संहिता और फलित | केवल फलित पढ़ कर, मुझे नहीं लगता कि मैं ज्योतिष का ज्ञान ले सकता हूँ | ज्योतिष का तो अर्थ ही ज्योति पिंडो का अध्ययन है, केवल कुंडली बांचने से मैं ज्योतिषी नहीं बन सकता | मेरा मानना है कि यही कारण है की बहुत से ज्योतिषियों की भविष्यवाणी ६०% सही और ४०% गलत या प्रायः गलत होती हैं |
ज्योतिष की वगैर पारंगतता और ईष्टदेव की कृपा एवं फलकथन में पराश्रयी कभी सटीक दैवज्ञ नहीं बन सकता। हमारी चर्चा अब मुकाम की ओर बढ रही थी, इधर ट्रेन भी वाराणसी जंक्शन पहुंचने वाली थी। मैने उनसे कहा कि जिस प्रकार हर महाभारत का अध्ययन करने वाला "टेस्ट-ट्यूब-बेबी" का आविष्कारक नहीं बन सकता।
प्रसंगवश मुझे उस वैज्ञानिक की बात याद आ रही है जिसने "टेस्ट-ट्यूब-बेबी" की खोज की थी। उन्होंने अपने जीवन काल के ४दशक का समय इस शोध में व्यतीत किया तदुपरान्त सफलता मिलने के बाद उनसे प्रेस रिपोर्टर ने पूछा कि - आपने इस विषय पर रिसर्च किस पद्धति या बुक से किया ? तो उन्होंने तपाक से जबाब दिया कि - भारतीय धर्मग्रंथों में एक ग्रंथ है जिसका नाम है 'महाभारत' । मैने 'महाभारत' के आदिपर्व में धृतराष्ट्र की पत्नि गांधारी द्वारा महर्षि व्यास के बताये अनुसार वीर्य संग्रह के १०० टुकड़े कर अलग अलग पात्रों में रखा गया और किसी भी वस्तु के १०० टुकड़े किये जायेंगे तो वह १०१ हो ही जायेंगे, और परिणाम १०० कौरव तथा उनकी १ बहन का जन्म हुआ" इसी कथा को मैंने बार-बार पढा और उस पर ४० वर्षों तक लगातार अध्ययन किया तब जाकर यह सफलता मिली मैं इस उपलब्धि को महाभारत को समर्पित करता हुं। 
उन्होंने आगे कहा कि मैंने ज्ञान-समुद्र महाभारत का ४० वर्षों तक लगातार गोता लगाया तब जाकर मैं मात्र एक मोती चुन पाया हुं।
कहने का मतलब यह था कि, आज जिस प्रकार के ज्योतिष के सरलीकरण के प्रतिस्पर्द्धा में वैदिक गणीतिय ढांचे को तहस-नहस किया जा रहा है वह ना केवल चिन्तनीय बल्कि निन्दनीय भी है।

सीधे कुंडली पढना, जल्दी से जल्दी फलित बांचना, बस यही ज्योतिष का अर्थ रह गया है |

वादी व्याकरणं विनैव विदुषां 
धृष्टः प्रविष्टः सभां
जल्पन्नल्पमतिः स्म्यात्पटुवटुभङ्ग्वक्रोक्तिभिः |
ह्रीणः सन्नुपहासमेति गणको गोलानभिग्यस्तथा
ज्योतिर्वित्सदसि प्रगल्भगणकप्रश्नप्रपन्चोक्तिभिः ||

अर्थात – जिस प्रकार तार्किक व्याकरण ज्ञान के बिना पंडितों की सभा में लज्जा और अपमान को प्राप्त होता है, उसी प्रकार गोलविषयक गणित के ज्ञान के अभाव में ज्योतिषी ज्योतिर्विदो की सभा में गोलगणित के प्रश्नो के सम्यक् उत्तर न दे सकने के कारण लज्जा और अपमान को प्राप्त होता है |

आज भारतेतर देशों में ज्योतिष के प्राच्य सिद्धांत-सूत्रों के संस्कृत श्लोकों से छेड़-छाड़ नहीं किया जाता, वरन एक-एक संदर्भों पर विशेष पारखी नजर से शोध किया जाता है। और प्राप्त परिणामों के संदर्भ-सूत्रों को नयी तकनीकि से जोड़कर उसका टेक्नीकल वेश (आधार) बनाकर एक के बाद एक नयी नयी खोज कर आसमां से भी ऊपर खगोल की गहराईयों तक अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे हैं। वहीं भारत के हम रहवासियों ने ज्योतिष का संदर्भ ही बदल डाला है। जो विद्वद् समाज को एक जूट हो लगाम लगाने की आवश्यकता है।

-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक -"ज्योतिष का सूर्य" राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, हाऊस नं. - 1299, सड़क- 26, शांतिनगर, भिलाई, जिला- दुर्ग, छत्तीसगढ़-490023
Mod.no.-9827198828

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