ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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शनिवार, 20 मई 2017

राशिनुसार रत्न धारण करने से मिलती है कमजोर ग्रहों को शक्ति


राशिनुसार रत्न धारण करने से मिलती है कमजोर ग्रहों को शक्ति
मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना,
कुण्डे कुण्डे नवं पय।
जातौ जातौ नवाचारा,
नवा वाणी मुखे मुखे।।
अर्थात् प्रत्येक मनुष्य के सोचने का ढंग अलग-अलग होता है; प्रत्येक जलाशय के जल में भी अन्तर होता है। प्रत्येक जाति का रहन-सहन भिन्न-भिन्न होता है; और प्रत्येक व्यक्ति के मुख से बात प्रकट करने का ढंग भी अलग-अलग होता है।
उपरोक्त श्लोक के अनुसार राशि रत्न धारण करने हेतु ज्योतिषीयों में काफी विभीन्नता देखी जाती है, और यदि कुण्डली के सम्यक अध्ययन के बाद ही  इन रत्नों का निर्धारण किया जाना चाहिये!
'ज्योतिष का सूर्य' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका के संपादक पण्डित विनोद चौबे बताते हैं कि रत्नों का चयन जितना महत्वपूर्ण है उससे भी महत्वपूर्ण रत्नों को सिद्ध व प्राणप्रतिष्ठित करना है! कभी कभी तो महंगे रत्नों को धारण करने के बावजूद काम नहीं करते उसके प्रमुख तीन कारण है- 










१- जन्मांक का सम्यक विचार कर ठीक ठीक राशि रत्नो का चयन न कर पाना !
२- दूसरा राशि रत्नों का ठीक -ठीक परीक्षण कर उसके शुद्ध अशुद्ध को सुनिश्चित न कर पाना! क्योंकि आजकल राशि रत्नों के लैब टेस्टींग रिपोर्ट भी दुकानदारों तथा लैब टेस्टींग करने वालों के आपसी सांठ-गांठ पर नकली  'टेस्टींग कार्ड' बनाये जा रहे हैं....!
३- कुण्डली के सम्यक तौर पर
ज्योतिष विज्ञान के अनुसार राशिचक्र की सभी राशियों को ग्रहों की चाल प्रभावित करती है। हर राशि किसी न किसी ग्रह से संचालित भी होती है यानि प्रत्येक राशि का एक स्वामी ग्रह होता है। जब कुंडली में ग्रह कमजोर हों तो जातक के जीवन में उसे अपेक्षाकृत परिणाम नहीं मिलते। अक्सर देखा जाता है कि लोग बड़े परेशान रहते हैं कि लाख कोशिशों के बावजूद उनके बने बनाये काम ऐन मंजिल के नजदीक पंहुच कर बिगड़ जाते हैं। ज्योतिषाचार्य इसका एक कारण ग्रहों का सही दशा में न होना, ग्रहों का साथ न मिलना और जातक की कुंडलीनुसार ग्रहों का कमजोर होना मानते हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या कमजोर ग्रहों को मजबूत किया जा सकता है? इसका उत्तर यही है कि समस्या है तो समाधान भी है। ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि जैसे राशि के स्वामी ग्रह होते हैं वैसे ही प्रत्येक ग्रह के कुछ रत्न भी हैं जिन्हें पहनने या कहें धारण करने से उक्त ग्रह को बल मिलता है। दरअसल ये रत्न धारण करते ही जातक की नकारात्मक ऊर्जा सकारात्मक होने लगती है और हालातों में सुधार होने लगता है। अब सवाल यह कि किस राशि के जातक को कौनसा रत्न धारण करना चाहिये? तो आइये जानते हैं सभी बारह राशियों के बारे में कि किस राशि के लिये कौनसा रत्न शुभ है।

ज्योतिष शास्त्र में रत्नों का बेहद महत्व है। ये ऐसी वस्तु है जिन्हें काफी शक्तिशाली माना गया है।  लग्न, चतुर्थ, पंचम, नवम्, दशम, द्वितीय ये शुभ भाव है। यदि इनसे सम्बन्धित ग्रह जन्मकुण्डली में स्वग्रही अथवा मित्र-राशि या उच्च राशिगत अपने भाव अथवा राशि से प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम् अथवा दशम् हो तो संबंधित राशि का रत्न नि:संकोच धारण कर लाभान्वित हो सकते हैं। जैसे- मेष व वृश्चिक लग्न के लिए मूंगा शुभ है। माणिक्य व मोती भी इनको शुभ फल देते हैं। जबकि वृषभ व तुला लग्न के लिए हीरा रत्न शुभ है। इनको पन्ना व नीलम भी शुभ प्रभाव देते हैं। इसी तरह से मिथुन व कन्या राशि के लिए पन्ना, नीलम व हीरा फलदायी है। कर्क लग्न के लिए मोती कारक रत्न है। सिंह लग्न के लिए माणिक्य के साथ पुखराज व मूंगा विशेष प्रभावी है। धनु व मीन लग्न के लिए पुखराज शुभ है। मकर व कुंभ के लिए नीलम और पन्ना श्रेष्ठ है।

मेष - एस्ट्रोगुरू पण्डित विनोद चौबे (Mob.No.9827198828) के अनुसार मेष राशि का स्वामी ग्रह मंगल है मेष जातक काफी ऊर्जावान होते हैं और बड़ी से बड़ी चुनौति को स्वीकार करने के लिये तैयार रहते हैं। इनके लिये मूंगा धारण करना काफी हितकर होता है। यह रक्त संबंधी समस्याओं एवं वित्तीय बाधाओं को दूर करने में काफी कारगर होता है।
वृषभ - वृष राशि का स्वामी शुक्र होता है यदि जातक की राशि में शुक्र कमजोर चल रहा हो तो उसके लिये हीरा, ओपल या जरकन पहनना शुभ रहता है। इनके कारण जातक का बौद्धिक विकास होता है और आपसी संबंधों में मधुरता कायम होती है। रिश्तों की कमजोर डोरी को ये रत्न प्रेम का अटूट धागा बना देते हैं।

मिथुन - मिथुन राशि वाले जातक पन्ना पहन सकते हैं। इससे उनकी बुद्धि और विवेक का स्तर बढ़ता है और जातक में संयम बनाये रखने की प्रवृति भी विकसित होती है। चूंकि मिथुन राशि का स्वामी ग्रह बुद्ध होता है इसलिये पन्ना धारण करने से कमजोर बुद्ध भी मजबूत होता है और परिणाम सकारात्मक मिलते हैं।
कर्क - चंद्रमा द्वारा संचालित कर्क जातकों के लिये मोती बहुत ही लाभकारी रहता है। यह इनके स्वभाव में निहित चंचलता को नियंत्रित कर मन में स्थिरता लाता है और नकारात्मक विचारों को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
सिंह - सिंह राशि के जातक सूर्य द्वारा संचालित होते हैं ये काफी ऊर्जावान और निर्भीक स्वभाव के होते हैं। लेकिन यदि कुंडली में सूर्य कमजोर हो तो अपेक्षात्मक परिणाम नहीं मिलते ऐसे में सिंह जातकों के लिये माणिक पहनना समस्याओं के समाधान में अहम भूमिका निभा सकता है। माणिक धारण करने से आत्मबल, आत्मविश्वास और आतंरिक ऊर्जा में वृद्धि होती है।
कन्या - चूंकि कन्या राशि के जातक भी बुद्ध द्वारा संचालित होते हैं इसलिये इस राशि के जातकों के लिये भी पन्ना धारण करना हितकर हो सकता है। यदि जातक का मन विद्या ग्रहण करने में नहीं लगता या फिर जातक को किसी विषय-वस्तु-विचार-क्रियादि में ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत आती है तो पन्ना धारण करने से उसे इस समस्या से निजात मिल सकती है। इसके अलावा पन्ना धारण करने से उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा के संचार से भी अन्य परेशानियां दूर हो सकती हैं।

तुला - शुक्र ग्रह को तुला राशि का स्वामी माना जाता है अत: तुला राशि वाले जातक भी यदि हीरा, ओपल या जरकन पहने तो इन्हें अवश्य लाभ मिलता है। इसके धारण करने से जातक की बुद्धि का विकास तो है व विद्या ग्रहण करने में आ रही परेशानियां भी दूर हो जाती हैं। प्रेम संबंधों में स्थिरता के लिये भी जातक इन्हें धारण कर सकते हैं।
वृश्चिक - चूंकि वृश्चिक राशि का स्वामी भी मंगल ग्रह है इसलिये मूंगा पहनना वृश्चिक जातकों के लिये फायदेमंद रहता है। रक्त संबंधी दिक्कतें तो दूर होती ही हैं साथ ही संपत्ती और धन से जुड़े मामलों के लिये भी यह शुभ माना जाता है। क्रोध पर नियंत्रण करने में भी यह काफी सहायक रहता है। जातक की रचनात्मकता को सकारात्मक दिशा में प्रयोग करने की प्रेरणा भी मिलने लगती है।
धनु - इनका राशि स्वामी बृहस्पति है जिसकी मजबूती के लिये धनु जातक पुखराज पहन सकते हैं। पुखराज धनु जातकों में ज्ञान और बुद्धि के विकास के साथ-साथ वित्त और रिश्तों संबंधी स्थिरता को लाता है। अन्य कार्यों में इसके धारण करने से सकारात्मक परिणाम मिलते हैं।
मकर - मकर जातकों को अपने राशि स्वामी शनि को प्रसन्न रखने के लिये नीलम पहनना चाहिये। इससे व्यक्ति अपने क्षेत्र में ख्याति प्राप्त करता है और उच्च पदों तक पहुंचता है। यदि जातक व्यवसायी है तो अपने व्यवसाय में वृद्धि के लिये भी नीलम धारण करना शुभ माना जाता है।
कुंभ - कुंभ जातक भी शनि द्वारा संचालित होते हैं। इन्हें भी तरक्की हासिल करने के लिये नीलम धारण करना चाहिये। नीलम शनि के प्रकोप से तो बचायेगा ही साथ ही सकारात्मक परिणाम दिलाने में भी यह असरदार होता है।
मीन - बृहस्पति द्वारा संचालित मीन जातकों को भी पुखराज पहनना चाहिये। यह आपको अनिश्चितता के भय से मुक्ति दिलाने में मददगार हो सकता है। इसे धारण करने के बाद आप अपने अंदर सकारात्मक परिवर्तनों को महसूस कर सकेंगें।


नोट: कई बार जातक बिना विचार विमर्श और ज्योतिषाचार्यों से परामर्श किये ही रत्न धारण कर लेते हैं। इससे आपके राशिफल पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ सकते हैं। कई बार यह आपकी सेहत के लिये भी हानिकारक हो सकता है। सटीक एवं सकारात्मक परिणामों के लिये किसी भी रत्न को अपनी कुंडली दिखाकर, दशा-महादशा आदि का अध्ययन करवा कर ज्योतिषीय परामर्श के बाद ही शुक्ल पक्ष में निर्धारित वार एवं होरा में विधिपूर्वक धारण करना चाहिये।

ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- "ज्योतिष का सूर्य" राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, सड़क-26, शांतिनगर भिलाई, जिला-दुर्ग (छ.ग.) मोबाईल नं- 09827198828
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गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

आत्महत्या, डिप्रेशन एवं आपसी शत्रुता खत्म करने में सहायक होता है 'नीलम' रत्न



 नीलम पहनना हमेशा सही नहीं होता है, इसलिए नीलम पहनने से पहले आप जरूर जांच-परख कर लें क्योंकि नीलम अगर किसी इंसान के जीवन में खुशियां ला सकता है तो वहीं दूसरी ओर वो शूट ना करने पर बर्बादी का शबब भी बन सकता है। आईये नीलम पहनने से क्या-क्या हो सकता है, इस रहस्य को जानने का प्रयास करते हैं!  १. अगर आपकी कुंडली में शनि किसी मुख्य भाव का कारक है , तो उस भाव को मजबूत करने के लिए नीलम का प्रयोग किया जाता है , नीलम रत्न को पहनने से मन में , तीव्रता आती है , व्यवहार बदलाव करता है जिससे वह अपने आस पास को अच्छे से समझ सकता है , शनि रिसर्च का कारक होता है , तो जब आपका मन शांत और तीव्र होता है तो आप अच्छे से शोध करने में सक्षम हो जाते है ।  २. नीलम में aluminium oxide और chromium पाया जाता है , तो रासायनिक तौर पर आपके दिमाग को मदद करता है कुछ खोज कर निकालने में यानी किसी गहन विषय पर गहन चिन्तन मनन करने या बेहद रिसर्च करने के बाद कोई भी कार्य करने की प्रवृत्ति नीलम रत्न देता है। और सफलता मिलना स्वाभाविक हो जाता है!  ३. मित्रों यदि आप एक के बाद एक गलत निर्णय लेना आरंभ कर दिये हैं, और इसका अहसास बाद में होता है तो आप मान के चलिये की कहीं ना कहीं आपको शनि ग्रह ने अपने लपेटे में ले लिया है तो इस समय घबराने की जरूरत नहीं हैं आप अकैदमिक यानी किसी रत्न विक्रेता दुकानदार की बजाय विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रमों से ज्योतिष की शिक्षा लेने वाले ज्योतिष विशेषज्ञ ज्योतिषी के पास जाईये और  स्वयं के जन्मकुण्डली या हस्तरेखा का विधिवत् समीक्षा कराईये और फिर बिना देर किये नीलम रत्न धारण करें और भारी नुकसान से बचें!  ४ . मेरे यहां छत्तीसगढ़ के भिलाई स्थित शांतिनगर वाले "ज्योतिष का सूर्य" मासिक पत्रिका के कार्यालय में एक ऐसा व्यक्ति आया जिसका लड़का बस थोड़ी बहुत गलतफहमी में जाकर स्वयं वह ११ वर्ष का लड़का आत्महत्या तक कर लिया मित्रों उसका जन्मांक का छाया चित्र इस लेख के साथ संलग्न कर रहा हुं!  ऐसे में शनि ग्रह की शांति कराने के साथ नीलम रत्न भी इन परिस्थितियों में बहुत सहायक सिद्ध होता है! अर्थात् आत्महत्या, डिप्रेशन एवं परस्पर गलतफहमियों से उत्पन्न शत्रुता को समाप्त करता है! ५. नीलम रत्न आपकी कुशलता बढ़ाता है , जिससे आप किसी भी कार्य को गम्भीरता से करने में सक्षम होते है । ६. जब आपको लगे कि नौकरी में दुसरे लोग आपके ऊपर कुछ ज्यादा ही हावी होते जा रहे है , आपका पड़े में मन नहीं लग रहा , जिसे कहते है कि दिमाग का saturation point आ चूका है कि अब न तो कुछ सोचने कि क्षमता है और न ही समझने कि , तो नीलम रत्न आपके लिए है । ७. नीलम रत्न दूर-दृष्टि देने वाला है , अगर किसी व्यक्ति को नीलम उसकी कुंडली के अनुसार अनुकूल होता है तो वह व्यक्ति बोहोत मेधावी बन सकता है । ८. अगर नीलम रत्न आपके लिए अनुकूल नहीं है तो आपके हाथ-पैरों में जबर्दस्त दर्द करने लगेगा , दुनिया भर से लड़ेंगे , आपके जीवन में आपके ही गलत पैसे के प्रयोग से कंगाली आ जायेगी , विपरीत बुद्धि उत्पन्न करेगा , सब गलत निर्णय दिलवाएगा जिससे परेशानियां ख़तम होने कि बजाय बढ़ती जाएँगी ।  -ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक 'ज्योतिष का सूर्य' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, हाउस नं.१२९९, सड़क-२६, शांतिनगर, भिलाई, जिला - दुर्ग (छ.ग.) पिन- ४९००२३, दूरभाष क्रमांक- 09827198828 (कार्यालय का मोबाईल नं.)gmail.com

शनिवार, 11 मार्च 2017

कब है होलिका दहन का शुभ मुहूर्त, एवं पूजन विधी..

कब है होलिका दहन का शुभ मुहूर्त, एवं पूजन विधी..-

ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे,
 भिलाई, मोबाईल नं.  9827198828

सर्व प्रथम आप सभी को होली के पावन पर्व हार्दिक शुभकामनाएं.....


वैसे तो होलिका का स्तम्भारोपण वसन्त पंचमी को ही हो जाता है, उसके बाद गांव में फाग गीतों की शुरूआत हो जाती है...सा च सायाह्नव्यापिनीग्राह्या। 
प्रदोष व्यापिनी ग्राह्या पौर्णिमा फाल्गुनी सदा।। तस्या भद्रामुखं त्यक्त्वापूज्या होला निशामुखे। इदम् भद्रायां न कार्यं प्रतिपद्भूत भद्रा सुयार्चिता होलिका दिवा।।
के अनुसार भद्रा रहित, प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा तिथि, होलिका दहन के लिये उत्तम मानी जाती है। यदि भद्रा रहित, प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा का अभाव हो परन्तु भद्रा मध्य रात्रि से पहले ही समाप्त हो जाए तो प्रदोष के पश्चात जब भद्रा समाप्त हो तब होलिका दहन करना चाहिये। यदि भद्रा मध्य रात्रि तक व्याप्त हो तो ऐसी परिस्थिति में भद्रा पूँछ के दौरान होलिका दहन किया जा सकता है। परन्तु भद्रा मुख में होलिका दहन कदाचित नहीं करना चाहिये।


पूजन सामग्री: रोली, कच्चा सूत, चावल, फूल, साबूत हल्दी, मूंग, बताशे, नारियल, उपल आदि। कृपया इस होलिका में कचड़ा ना डालें।

किसी साफ और स्वच्छ जगह गोबर से लीपकर उसमें एक चौकोर मण्डल बनाना चाहिए और उसे रंगीन अक्षतों से अलंकृत कर पवित्र गंगा जल से पहले उस स्थान को शुद्ध कर लेना चाहिए। ध्यान रखे की पूजन करते समय आपका मुख उत्तर या पूर्व दिशा में हो ।

सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में होलिका में सही मुहर्त पर अग्नि प्रज्ज्वलित कर दी जाती है। ध्यान रहे यह समय भद्रा के बाद का ही हो। अग्नि प्रज्ज्वलित होते ही डंडे को बाहर निकाल लिया जाता है। यह डंडा भक्त प्रहलाद का प्रतीक है। इसके पश्चात नरसिंह भगवान का स्मरण करते हुए उन्हें रोली, मौली, अक्षत, पुष्प अर्पित करें। इसी प्रकार भक्त प्रह्लाद को स्मरण करते हुए उन्हें रोली, मौली, अक्षत, पुष्प अर्पित करें।
इसके पश्चात् हाथ में असद, फूल, सुपारी, पैसा लेकर पूजन कर जल के साथ होलिका के पास छोड़ दें और अक्षत, चंदन, रोली, हल्दी, गुलाल, फूल तथा गूलरी की माला पहनाएं।


विधी

 विधि पंचोपचार की हो तो सबसे अच्छी है। पूजा में सप्तधान्य की पूजा की जाती है जो की गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर। होलिका के समय नयी फसले आने लग जाती है अत: इन्हे भी पूजन में विशेष स्थान दिया जाता है। होलिका की लपटों से इसे सेक कर घर के सदस्य खाते हैं और धन धन और समृधि की विनती की जाती है। होलिका के चारो तरफ तीन या सात परिक्रमा करे और साथ में कच्चे सूत को लपेटे।

होलिका पूजन के समय निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए–

“अहकूटा भयत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै:!
अतस्वां पूजयिष्यामि भूति-भूति प्रदायिनीम:”

इस मंत्र का उच्चारण एक माला, तीन माला या फिर पांच माला विषम संख्या के रुप में करना चाहिए.

होलिका दहन मुहूर्त – 18:23 से 20:23

भद्रा का पूच्छ भाग का समय : 
 04:11 से 05:23
भद्रा के मुख भाग का समय :
05:23 से 07:23

पूर्णिमा तिथि आरंभ – 
20:23 बजे (11 मार्च 2017)

पूर्णिमा तिथि समाप्त – 
20:23 बजे (12 मार्च 2017)

रंग और गुलाल की होली – 13 मार्च
 2017 मित्रों, आप सभी से विनम्र निवेदन है कि विषाणु युक्त रंग या गुलाल का प्रयोग ना करें, साथ ही जल बचायें, जल ही जीवन है साथ ही विशेष निवेदन किसी भी हिन्दु पर्वों पर नशा या फिर हिंसा बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिये। आपसी सद्भाव, भाईचारे और कई प्रकार के घर में बने स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ होली का यह पर्व मनायें।
- ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- " ज्योतिष का सूर्य " राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, शांतिनगर, भिलाई, जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ़ । मोबाईल नं- 9827198828
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बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

महाशिवरात्रि एवं महारात्रि का महापर्व... विस्तृत जानकारी अवश्य पढ़ें

भारतीय पर्वों में चार रात्रियां एवं मनुष्य के जीवन में प्रभाव.......




साथियों, जैसा की आपको ज्ञात है कि संस्कृत-साहित्य के कई उपाख्यानों में प्रसंगवश अलग अलग चार रात्रियों का वर्णन आता है, आखिरकार ये रात्रियां क्या है, और इनका मनुष्य के जीवन से क्या लेना देना है? आईये इस लेख के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं...........

पर्व, उत्सव और त्योहार किसी भी संस्कृति का दर्पण होते हैं। हिन्दू धर्म में इन पर्वों, उत्सवों एवं त्योहारों का विशिष्ट स्थान हैं तथा यह हिन्दू संस्कृति के अभिन्न अंग माने जाते हैं। प्राय: त्योहार दिन के प्रकाश में ही मनाये जाते हैं, लेकिन अपवाद स्वरूप कुछ त्यौहार ऐसें हैं, जो कि रात्रि के समय मनाए जाते हैं।
जैसे कृष्ण जन्माष्टमी, महाशिवरात्रि, दीपावली, होलिका दहन, शरद पूर्णिमा। मार्कण्डेय पुराणान्तर्गत श्री दुर्गा सप्तशती में तीन रात्रियों का उल्लेख दारूण रात्रियों के रूप में हुआ है- कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि। कालरात्रि से तात्पर्य है- होली (होलिका दहन), महारात्रि- सिवरात्रि तथा मोहरात्रि- दीपावली अथवा शरद पूर्णिमा।
कुछ शास्त्रकारों के अनुसार उपरोक्त रात्रियों को भयानक (दारूण) रात्रियां माना गया है कालरात्रि- दीपावली की रात, महारात्रि- शिवरात्रि और मोहरात्रि- कृष्णजन्माष्टमी की रात। इन विशिष्ट रात्रियों को मानव जीवन से जोड़कर देखें तो मोहरात्रि- मोहने वाले कृष्ण के जन्म की रात्रि अर्थात् मनुष्य के जन्म की रात्रि, कालरात्रि- जीवन बुढ़ापे की शुरूआत, महारात्रि- निर्वाण की रात्रि अर्थात् भगवानन शिव के चरणों में समर्पित होने की रात्रि। दीपावली और शरदपूर्णिमा तो खुशियों की रात्रियां हैं, इसे मनुष्य के वैवाहिक जीवन की शुरूआत की रात्रि के रूप में भी देखा जा सकता है। जीवन की मोहरात्रि और महारात्रि कब आ जाए किसी को मालूम नहीं, लेकिन कालरात्रि के विषय में रामायण में एक उल्लेख मिलता है। उसके अनुसार कालरात्रि (मृत्यु की रात्रि) मनुष्य की आयु में यह रात जो सतहत्तर (77वें) वर्ष के सातवें महीने के 7वें दिन पड़ती है और जिसके बाद मनुष्य नित्यकर्म आदि से मुक्त समझा जाता है। अब मनुष्य यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि आखिर यह 77 वर्ष, 7 माह, 7 दिन कैसे तय किये गए? इसका आधार क्या रहा होगा? हमारे यहां तो ये भी कहा गया है कि यह व्यक्ति ‘सठिया’ गया है या सत्तर-बहत्तर हो गया अर्थात् भुलक्कड़ हो गया है, इसे सेवानिवृत्त या नित्यकर्म से मुक्ति दे देनी चाहिए।
मैंने अपनी अल्पबुध्दि द्वारा निम्न दो फार्मूले बनाए जो कि उपरोक्त गणनाओं पर फिट बैठते हैं-
पहले फार्मूले के अनुसार, कुछ शास्त्रकारों ने माना कि चार लाख बत्तीस हजार वर्षों का यह कलियुग, इस युग से दुगुनी संख्या का द्वापर युग, इससे दुगुनी संख्या का त्रेतायुग, इससे दुगुनी संख्या का सतयुग, इस प्रकार चार युग एक बार व्यतीत होंगे। परिवर्तन होकर पुन: सतयुग प्रारम्भ हो जायेगा। इस प्रकार ये चारों युग बारह बार व्यीतत होंगे, जब विधाता का एक दिन होगा, जिसकी गणना इस प्रकार है-
कलियुग- 4,32,000 -कलियुग से दुगुनी संख्या द्वापर युग- 8,64,000, द्वापर युग से दुगुनी संख्या, त्रेतायुग- 17,28,000, त्रेतायुग से दुगुनी संख्या सतयुग-34,56,000, 12 बार घूमने पर विधाता का एक दिन- 64,80,000द12-77,77,60,000
दूसरे फार्मूले के अनुसार, कुछ विद्वान ब्रह्माजी की आयु की गणना इस प्रकार से करते हैं कि मनुष्यों का एक महीना पितरों का एक दिन, एक रात होता है। पितरों का एक वर्ष देवताओं का एक दिन-रात होता है। देवताओं के दो हजार वर्ष का ब्रह्मा जी का एक दिन होता है। इन सबका गुणा करने पर 30,360,360,2000 __/\__ 7776000000, उपरोक्त दोनों गणनाओं की संख्या को ब्रह्मा जी का एक दिन माना गया है। अगर इनमें से उपरोक्त शून्यों को हटा दें तो 7776 की संख्या आती है।
इस उम्र तक तो कार्य कर सकते हैं अर्थात् इसके अगले दिन अर्थात् 77 वर्ष, सात मास औरसात दिन से मनुष्य को नित्यकर्म आदि से मुक्त समझा जाता है। रामायण के अनुसार, उपरोक्त गणना को मैं कहां तक सही रूप दे पाया हूं, यह तो आप ही निर्णय कर पायेंगे पर यह महत्वपूर्ण रात्रियां मानव जीवन की विशिष्ट रात्रियां हैं।

अब सवाल यह उठता है, कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही क्यों कहते हैं 'महाशिवरात्रि'

थोड़ा बहुत तो मैने इस पर चर्चा की है परन्तु अब महाशिवरात्रि पर्व को महारात्रि और कुछ विद्वानों ने तो कालरात्रि के भी रूप में वर्णन किया है......तो आईये इसे विस्तृत रूप से समझने का प्रयास करते हैं......
महाशिवरात्रि फाल्गुनमास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। भगवान शिव के निराकार से साकाररूप में अवतरण की रात्रि ही महाशिवरात्रि है। ईशान-संहिता के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी की रात्रि को भगवान शिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाले लिंगरूप में प्रकट हुए। कहा जाता है कि इस दिन शिवजी समस्त शिवलिंगों में प्रवेश करते हैं; इसलिए इसे महाशिवरात्रि कहते हैं।प्रत्येक मास की कृष्णपक्ष की चतुर्दशी‘शिवरात्रि’ कहलाती है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव और आदिशक्ति का विवाह हुआ था।

फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी की महानिशा में ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य

ईशान संहिता की कथा के अनुसार सृष्टिरचना के बाद भगवान ब्रह्मा एक बार घूमते हुए क्षीरसागर पहुंचे। उन्होंने वहां शेषनाग की शय्या पर भगवान नारायण को शान्त अधलेटे देखा। भूदेवी-श्रीदेवी उनकी चरणसेवा कर रहीं थी। गरुड़, नन्द-सुनन्द, पार्षद, गन्धर्व, किन्नर आदि हाथ जोड़े खड़े थे। यह देखकर ब्रह्माजी को आश्चर्य हुआ कि ‘मैं ही सबका पितामह हूँ; यह वैभव-मण्डित होकर यहां कौन सोया हुआ है?’

ब्रह्माजी ने भगवान नारायण को जगाते हुए कहा–’तुम कौन हो, देखो जगत का पितामह आया है।’  इस पर भगवान नारायण ने कहा–’जगत मुझमें स्थित है, तुम मेरे नाभिकमल से पैदा हुए हो, तुम मेरे पुत्र हो।’ दोनों में स्रष्टा और स्वामी का विवाद बढ़ने लगा। ब्रह्माजी ने ‘पाशुपत’ और भगवान नारायण ने ‘महेश्वर’ नामक अस्त्र उठा लिए। सृष्टि में प्रलय की आशंका हो गयी। देवतागण कैलास पर भगवान शिव की शरण में गए। अन्तर्यामी शिव सब समझ गए और देवताओं को आश्वस्त किया कि मैं इन दोनों का युद्ध शान्त करुंगा। ऐसा कहकर भगवान शंकर दोनों के मध्य में अनादि-अनन्त ज्योतिर्मयलिंग के रूप में प्रकट हो गए। महेश्वर और पाशुपत अस्त्र उसी ज्योतिर्लिंग में लीन हो गए। यह लिंग निराकार ब्रह्म का प्रतीक है।

भगवान विष्णु और ब्रह्माजी ने उस लिंग की पूजा की। यह लिंग फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को प्रकट हुआ तभी से आज तक लिंगपूजा चली आ रही है। ब्रह्मा एवं विष्णुजी ने शंकरजी से कहा–जब हम दोनों लिंग के आदि-अन्त का पता न लगा सके तो आगे मानव आपकी पूजा कैसे करेगा? इस पर भगवान शिव द्वादशज्योतिर्लिंगों में बंट गए।

महाशिवरात्रि व्रत में ‘फाल्गुनमास’, ‘कृष्णपक्ष’, ‘चतुर्दशी तिथि’ व ‘रात्रि’ का महत्व

भगवान शिव को फाल्गुनमास की कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि की रात्रि ही क्यों प्रिय है? इसका गूढ़ अर्थ है–

शिव क्या हैं?

‘जिसमें सारा जगत शयन करता है, जो प्रलयकाल में सारे जगत को अपने अंदर लीन कर लेते हैं, वे ही ‘शिव’ हैं।

शिवरात्रि

शिवरात्रि का अर्थ है ‘वह रात्रि जिसका शिव के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है’ या भगवान शिव की अतिप्रिय रात्रि को ‘शिवरात्रि’ कहा गया है।

चतुर्दशी तिथि ही क्यों?

भगवान शिव चतुर्दशी तिथि के स्वामी हैं।

रात्रि ही क्यों?

भगवान शंकर संहार और तमोगुण के देवता हैं। दिन सृष्टि का और रात्रि प्रलय व संहार का द्योतक है। रात्रि के आते ही प्रकाश का, मनुष्य की दैनिक गतिविधियों का और निद्रा द्वारा मनुष्य की चेतनता का संहार हो जाता है। जिस प्रकार प्रलयकाल में भगवान शिव सबको अपने में लीन कर लेते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व अचेतन होकर रात्रि की आनन्ददायी गोद में समा जाता है। इसलिए भगवान शंकर की आराधना न केवल इस महारात्रि में वरन् सदैव प्रदोष (रात्रि के आरम्भ होने) के समय में की जाती है। रात्रि के समय भूत, प्रेत, पिशाच और स्वयं शिवजी भ्रमण करते हैं, अत: उस समय इनका पूजन करने से मनुष्य के पाप दूर हो जाते हैं। रात्रिप्रिय शिव से भेंट करने का समय रात्रि के अलावा और कौन-सा हो सकता है? अत: शिवजी की अतिप्रिय रात्रि को ‘शिवरात्रि’ कहा गया है।

ब्रह्माण्ड में सृष्टि और प्रलय का क्रम चलता रहता है। शास्त्रों में दिन और रात्रि को नित्य-सृष्टि और नित्य-प्रलय कहा है। दिन में हमारा मन, प्राण और इन्द्रियां विषयानन्द में ही मग्न रहती हैं। रात्रि में विषयों को छोड़कर आत्मा शिव की ओर प्रवृत्त होती हैं। हमारा मन दिन में प्रकाश की ओर, सृष्टि की ओर जाता है और रात्रि में अन्धकार की ओर, लय की ओर लौटता है। इसी से दिन सृष्टि का और रात्रि प्रलय का द्योतक है। इसलिए रात्रि ही परमात्मा शिव से आत्मसाक्षात्कार करने का अनुकूल समय है।

कृष्णपक्ष ही क्यों?

मन के देवता चन्द्र माने जाते हैं। शुक्लपक्ष में चन्द्रमा सबल और कृष्णपक्ष में क्षीण होते हैं। कृष्णपक्ष में चन्द्रमा के क्षीण होने से मनुष्य के अंत:करण में तामसी शक्तियां प्रबल हो जाती हैं। इन्हीं तामसी शक्तियों को आध्यात्मिक भाषा में भूत-प्रेतादि कहते हैं। भगवान शिव को भूत-प्रेतादि का नियन्त्रक देवता माना गया हैं। अत: कृष्णपक्ष की चन्द्रविहीन रात्रि को जब ये शक्तियां अपना प्रभाव दिखाने लगती हैं, तब इनके उपशमन के लिए भगवान शिव की उपासना का विधान है।

फाल्गुनमास ही क्यों?

ब्रह्माण्ड में प्रलय के बाद सृष्टि और सृष्टि के बाद प्रलय होता है। इसी तरह रात्रि के बाद दिन और दिन के पश्चात् रात्रि होती है। इसी तरह वर्षचक्र भी चलता है। क्षय होते हुए वर्ष के अंतिम मास फाल्गुन के बाद नए वर्षचक्र का आरम्भ होता है। ज्योतिष के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी में चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है। अत: उस समय में जीवरूपी चन्द्र का शिवरूपी सूर्य के साथ योग होता है। अत: फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी को शिव-पूजा करने से जीव को इष्ट की प्राप्ति होती है। इस तिथि पर जो कोई भी भगवान शिव की उपासना करता है, चाहें वह किसी भी वर्ण का क्यों न हो, वे उसे भुक्ति-मुक्ति प्रदान करते हैं।

 शिवरात्रिव्रतं नाम सर्वपापप्रणाशनम्।
आचाण्डालमनुष्याणां भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्।। (ईशान संहिता)

शिवरात्रि-व्रत

महाशिवरात्रि के समान शिवजी को प्रसन्न करने वाला अन्य कोई व्रत नहीं है। शिवरात्रि-व्रत में चार प्रहर में चार बार पूजा का विधान है। इस दिन उपवास, शिवाभिषेक, रात्रि भर जागरण और पंचाक्षर व रुद्रमन्त्रों का जप करना चाहिए। साधक का शिव के समीप वास ही उपवास है। पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियां, मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त और बुद्धि का निरोध (संयम) ही सच्ची शिव-पूजा’ या ‘शिवरात्रि-व्रत’ है।


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ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- "ज्योतिष का सूर्य" राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, सड़क-26, शांतिनगर भिलाई, जिला-दुर्ग (छ.ग.)
मोबाईल नं- 09827198828
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मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

शिवलिंग की वैज्ञानिकता.......

शिवलिंग की वैज्ञानिकता.......

"" भारत सरकार के नुक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है""

आदि काल से ही मनुष्य शिवलिंग की पूजा करते आ रहे हैं और इस संदर्भ में अलग-अलग मान्यताएं और कथाएं भी प्रचलित हैं। भारतीय सभ्यता के प्राचीन अभिलेखों एवं स्रोतों से भी ज्ञात होता है हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो की खुदाई से पत्थर के बने कई लिंग और योनि मिले हैं। एक मूर्ति ऐसी मिली है जिसके गर्भ से पौधा निकलते हुए दिखाया गया है।  शिवलिंग के तीन हिस्से होते हैं। लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और ऊपर प्रणवाख्य महादेव स्थित हैं। यह प्रमाण है कि आरंभिक सभ्यता के लोग प्रकृति-पूजक थे। वह मानते थे कि संसार की उत्पत्ति शिवलिंग से हुई थी इसी से शिवलिंग पूजा की परंपरा चल पड़ी।  शिवलिंग की पूजा भारत और श्रीलंका तक ही सीमित नहीं थी। बल्कि यूरोपीय देशों से ले कर प्राचीन मेसोपोटामिया तक भी होती थी । अब इस शिवलिंग की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि पर आप लोगों का ध्यानाकर्षण कराना चाहुंगा। 

"शिवलिंग का वैज्ञानिक रहस्य.."  साईंटीस्ट का रिसर्च........

मैं यहां साफ करना चाहूंगा कि मैं ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, भिलाई से हुं ना कि कोई साईंटीस्ट। किन्तु एक साईंटिस्ट से मुलाकात हमारे कार्यालय में हुई और चर्चा चल पड़ी "शिवलिंग की वैज्ञानिक सत्यता" विषय पर उन्होंने बताया कि- 

शिवलिंग की वैज्ञानिकता .... भारत का रेडियोएक्टिविटीमैप उठा लें, तब हैरान हो जायेगें ! भारत सरकार के नुक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है।.. शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्यूक्लियर रिएक्टर्स ही हैं, तभी तो उन पर जल चढ़ाया जाता है ताकि वो शांत रहे महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे किए बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, गुड़हल, आदि सभी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले है । क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है इसीलिए तो जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता। भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिवलिंग की तरह ही है।. शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिलकर औषधि का रूप ले लेता है। तभी तो हमारे पूर्वज हम लोगों से कहते थे कि महादेव शिवशंकर अगर नराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी। .ध्यान दें, कि हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है। जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है, वो तो चिर सनातन है। विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें।

मित्रों, इसी संदर्भ में आपको बताते चलुं की शिवलिंग की कभी भी पूरी परिक्रमा नहीं की जाती है हमेशा आधी परिक्रमा की जाती है।  स्वामी विवेकानंद ने अन्नत ब्रह्म के प्रतीक के रूप में शिवलिंग को वर्णित किया था। इनके अलावां विश्व के तमाम दार्शनिकों ने "शिव सत्ता" को सहर्ष स्वीकार किया।


-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- "ज्योतिष का सूर्य" राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, सड़क- 26, कोहका मेन रोड, शांतिनगर, भिलाई, जिला-दुर्ग (छ.ग.) 490023
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