ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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मंगलवार, 10 जुलाई 2018

जहां प्रभु श्रीराम ने " निसिचर हीन करउँ महि " का प्रण किया था वह पावन तीर्थ है 'रामटेक' और यही है वह इकलौता मंदिर जिसके गर्भगृह में रखा गया है भोंसले राजाओं का 'शस्त्र-शस्त्र' (जरुर पढें यह रोचक एवं तथ्यपरक आलेख)🙏

चौबेजी कहिन:- जहां प्रभु श्रीराम ने "
निसिचर हीन करउँ महि " का प्रण किया था वह पावन तीर्थ है 'रामटेक' और यही है वह इकलौता मंदिर जिसके गर्भगृह में रखा गया है भोंसले राजाओं का 'शस्त्र-शस्त्र' (जरुर पढें यह रोचक एवं तथ्यपरक आलेख)🙏

11/07/2018
निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ प्रण कीन्ह।
सकल मुनिन्ह के आश्रमहि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥9॥ अरण्य काण्ड
भावार्थ श्री रामजी ने भुजा उठाकर प्रण किया कि मैं पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर दूँगा। फिर समस्त मुनियों के आश्रमों में जा-जाकर उनको (दर्शन एवं सम्भाषण का) सुख दिया॥9॥
🚩🚩🙏🚩🚩
श्रीरामचरितमानस के तृतीय सोपान अरण्य काण्ड मे प्रभु श्रीराम ने जिस स्थान पर समस्त पृथ्वी को 'निसिचर हीन' करने का संकल्प लिया, वह पवित्र स्थान 'रामटेक' है, जो महाराष्ट्र में स्थित है, इसी स्थान पर कविकुल गुरु महाकवि कालिदास जी ने 'मेघदूत' काव्य का वर्णन किया। मुझे इस पावन भूमि पर कल (10/07/2018) प्रभु श्रीराम का दर्शन एवं महाकवि कालिदास स्मारक का पावन *सौभाग्य* प्राप्त हुआ, जिसका पूरा श्रेय आदरणीय डॉ. नरेन्द्र प्रसाद दीक्षित, पूर्व कुलपति (दुर्ग विश्वविद्यालय, छ.ग.) जी के सान्निध्य को जाता है और इस ऐतिहासिक 'रामटेक यात्रा' को चिरंजीवी बनाने में अहम भूमिका श्री देशदीपक सिंह जी की रही।
विश्व का यह एक इकलौता मंदिर है जहां श्रीराम मंदिर के गर्भगृह में अस्त्र-शास्त्र रखा गया है । 'रामटेक' स्थित भगवान श्रीराम के इस ऐतिहासिक तीर्थ के बारे में जितना कहा जाए वह कम है, दुर्ग विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति रहे डॉ. नरेन्द्र प्रसाद दीक्षित ने बताया की तीसरी शताब्दी में यहां 'वाकाटक नरेशों ' का किला था।
वाकाटक शब्द का प्रयोग प्राचीन भारत के एक राजवंश के लिए किया जाता है जिसने तीसरी सदी के मध्य से छठी सदी तक शासन किया था।  स्यात्‌ वकाट नामक मध्यभारत में यह स्थान रहा हो, जहाँ पर शासन करनेवाला वंश वाकाटक कहलाया। अतएव प्रथम राजा को अजंता लेख में "वाकाटक वंशकेतु:" कहा गया है। इस राजवंश का शासन मध्यप्रदेश के अधिक भूभाग तथा प्राचीन बरार (आंध्र प्रदेश) पर विस्तृत था, जिसके सर्वप्रथम शासक विन्ध्यशक्ति का नाम वायुपुराण तथा अजंता के लेख में  मिलता है। संभवत: विंध्य पर्वतीय भाग पर शासन करने के कारण प्रथम राजा 'विंध्यशक्ति' की पदवी से विभूषित किया गया। डॉ. दीक्षित कहते हैं यदि बात की जाए काव्यों के रचनाकारों की तो महाकवि कालिदास जी के 'मेघदूत' काव्य में इस पर्वत श्रृंखला को 'रामगिरि' के रुप में प्रतिष्ठित किया तो अन्य काव्यों में जैसे प्राकृत काव्य तथा सुभाषित को "वैदर्भी शैली" का नाम दिया गया है। वाकाटकनरेश वैदिक धर्म के अनुयायी थे, इसीलिए अनेक यज्ञों का विवरण लेखों में मिलता है। कला के क्षेत्र में भी इसका कार्य प्रशंसनीय रहा है।
श्री देशदीपक सिंह जी ने बताया कि 28/9/1925 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना के बाद प.पू. डॉक्टर हेडगेवार जी इस ऐतिहासिक तीर्थ 'रामटेक' आये थे। बार-बार इस पावन भूमि पर डॉक्टर हेडगेवार जी इसलिए आते थे क्योंकि भारत माता के रक्षार्थ मुगलों से कई बार 'भोंसले' राजाओं ने युद्ध किया, आज भी इस मंदिर में 'भोंसले' राजाओं के 'अस्त्र-शस्त्र' इस मंदिर के गर्भगृह में देखें जा सकते हैं। श्री देशदीपक जी ने इस संदर्भ में छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक जुड़ाव के बारे बताया कि- इंडियन एंटी क्वेरी खंड 37 पेज 204 के अनुसार यह लेख 80 पंक्तियों का है परन्तु बहुत सी मिट गई है। लेख के अधिक अंश में रामटेक के तीर्थो का वर्णन है। जिसमें हैहय वंशी राजा ब्रम्हदेव के सम्बन्ध में है जो रायपुर और खल्लारी के लेख में आते है। उसमें रामटेक में लक्ष्मण मंदिर का जिक्र किया गया है।
वनवास के समय राम के 'टिकने का स्थान' या 'पड़ाव' को 'रामटेक' कहा जाता है। कुछ विद्वानों के मत में यह महाकवि कालिदास के 'मेघदूत' में वर्णित रामगिरि है। यहाँ विस्तीर्ण पर्वतीय प्रदेश में अनेक छोट-छोटे सरोवर स्थित हैं, जो शायद 'पूर्वमेघ' में उल्लिखित 'जनकतनया स्नान पुण्योदकेषु' में निर्दिष्ट जलाशय हैं। इस पवित्र तीर्थ में भगवान श्रीराम वनवास काल में राम, लक्ष्मण तथा सीता इस स्थान पर रहे थे। रामचंद्र जी का एक सुंदर मंदिर ऊंची पहाड़ी पर बना हुआ है। मंदिर के निकट विशाल वराह की मूर्ति के आकार में कटा हुआ एक शैलखंड स्थित है। रामटेक को 'सिंदूरगिरि' भी कहते हैं। इसके पूर्व की ओर 'सुरनदी' या 'सूर्यनदी' बहती है। इस स्थान पर एक ऊंचा टीला है, जिसे गुप्तकालीन बताया जाता है। चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्त ने रामगिरि की यात्रा की थी। इस तथ्य की जानकारी 'रिद्धपुर' के ताम्रपत्र लेख से होती है। प्राचीन जनश्रुति के अनुसार रामचंद्र जी ने शंबूक का वध इसी स्थान पर किया था। रामटेक में जैन मन्दिर भी है। कुछ विद्वानों का मत है कि कालिदास के 'मेघदूत' का रामगिरि यही है।
-आचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- 'ज्योतिष का सूर्य' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका शांतिनगर भिलाई, दुर्ग, छत्तीसगढ़ मोबाइल नं.9827198828

सोमवार, 9 जुलाई 2018

आजादी के बाद ही देश के ''गद्दारों'' ने जिसे ''शारदा देश'' कहा जाता था उस ''कश्मीर'' को ''आतंक की आग में ढकेल दिया....इन सत्ता के भूखे भेड़ियों ने''

चौबेजी कहिन:- आजादी के बाद ही देश के ''गद्दारों'' ने जिसे ''शारदा देश'' कहा जाता था उस ''कश्मीर'' को  ''आतंक की आग में ढकेल दिया....इन सत्ता के भूखे भेड़ियों ने'' 😪
साथियों इस आलेख में दर्द है, पीड़ा है, शहीद जांबाज सैनिकों का शौर्य है, ऋषियों की पवित्र अमरकथा है और एक सत्तारूढ़ गद्दार के गद्दारी की अमरगाथा है जिसने धारा 370 की धधकती ज्वाला में धरती के स्वर्ग कश्मीर को नर्क बना दिया....🤔

'चौबेजी कहिन' में आज के ही दिन... पिछले वर्ष 10/7/2018 को अमरनाथ यात्रियों पर अनंतनाग में गद्दारों के सहयोग से गीदड़ आतंकियों ने हमला किया था जिसमें 7 यात्रियों की जान चली गई थी 😪 उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए 🌷🌹उस समय मेरे द्वारा लिखा एक आलेख आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूं....इस लेख को हर उस भारतीय को जरूर पढ़ना चाहिए 🙏 जिनके अन्तर्नाद में 'वंदेमातरम्' सदैव निनादित होता है, जिनका हृदय 'भारत माता के जयघोष से सदैव आह्लादित होता है....🚩🚩🚩🇮🇳🔸🔸🔸🇮🇳

अमरनाथ के यात्रियों पर हुये हमले में मारे गये शिव-भक्तों के परिजनों की चीख-पुकार न्यूज चैनलों पर सुनकर हमारी धर्मपत्नी श्रीमती रम्भा चौबे ने नम आंखों और रूंधे कण्ठ से मुझसे प्रश्न किया कि - कश्मीर में केवल आतंकी ही रहते हैं क्या..? वाकई मैं स्वयं को असहज महसूस कर रहा था।

मित्रों, मुझे आचार्य अभिनव गुप्त जी का स्मरण आया और मैंने....अपनी धर्मपत्नी श्रीमती रम्भा चौबे जी को विस्तृत व समसामयिक तथा प्रागतैहासिक 'शारदा देश'' यानी 'कश्मीर' की यात्रा कराने चल पड़ा...   कश्मीर जिसे ज्ञान-भूमि यानी  ''शारदा देश'' के नाम से जाना जाता था जो 'कन्नौज प्रांत' से 'कश्मीर' तक अमन चैन व सनातन व संस्कृति की उर्वरा भूमि रही आज उस उर्वरा भूमि को " भारतीय स्वतंत्रता के लिये आजाद, भगत, राजगुरू, सुखदेव तथा रामप्रसाद बिस्मिल सहित असंख्य नवयुवकों ने अपने प्राण की आहूति दी उनका स्मरण तो भारत के इन गद्दारों ने करना तक मुनासीब नहीं समझा और गाहे-बेगाहे इनका स्मरण किया भी तो नाम मात्र का.. क्योंकि स्वतंत्र भारत के गलियों से लेकर उच्च संस्थानों तक अधिकतर संस्थानों का  नामकरण अपने 'नाम' किया...खैर यह तो उनके 'भग्न- मानसिकता' का परिचायक है  इन 'गद्दारों' ने भारतीय इतिहास के साथ ऐसा खिलवाड़ किया की 'अकबर' को महान बताया और 'महाराणा प्रताप' के शौर्य को म्यूट कर दिया गया,
'जम्मू एण्ड कश्मीर' का मुद्दा ऐसा विवादित किया गया की वहां आजादी के बाद अब तक असंख्य भारतीय सैनिक शहीद हुये और आज भी वह स्थिति बनी हुई है...और जब कोई 'रक्तबीज राक्षस लश्कर का आतंकी मारा जाता है तो वही देश के गद्दार नेता धर्म की राजनीति, तुष्टिकरण की राजनीति पर आमादा हो जाते हैं और मीडिया भी प्रायोजित ढंग से बड़ी कव्हरेज दिखाती है ...अरे  सत्ता के भूखे गद्दारों ने उसे 'कश्मीर ' का पवित्र ज्ञान-भूमि को...  रक्त-रंजित इतिहास के रुप में उलट-पुलट कर रखने का कुत्सित प्रयास किया..
नफ़रत भरी कथित सेक्यूलरिज्म के पैरोकारों को घड़ियाली आंसू बहाने की बजाय .. अमरनाथ यात्रा के श्रद्धालुओं पर लश्कर आतंकी 'अबु स्माईल ' नामक 'रक्तबीज' राक्षस ने कायराना हमला किया इससे ज्यादा ध्यान उसको छुपाकर रखने वाले गद्दारों की भूमिका अहम है उनका पक्ष लेना बंद करें और  जिसकी वजह से 'अबु स्माईल' वहां तक पहुंचा ! पहले उनका सख्ती से विरोध कर उन्हे करें...!
  क्योंकि...  भारतीय सत्ता पर बने रहने की हर कोशीश करने वाले देश के गद्दारों ने कभी '' कन्नौज से कश्मीर के पवित्र ज्ञान-भूमि 'शारदा देश' के  सनातनी-इतिहास के पन्नों को पलट कर देखने की ख़ीदमत नहीं की ... क्योंकि उनके सत्ता-प्राप्ति में रोड़ा बन जाता...और भारत की वैश्विक मंच पर कश्मीर जिसे आध्यात्मिक पवित्र भूमि 'शारदा देश' कहा जाता था उसे ''आतंकी साये के प्रदेश के रुप में बदनाम किया जाना लक्ष्य था! तभी तो वहां से ज्ञान-तपस्वी, मां शारदा के वरद पुत्र कश्मीरी पण्डितो को खदेड़ा गया और आज ''मोदी सरकार के कुशल नेतृत्व पर उंगली उठा रहे हैं''

खैर, आईये कश्मीर का आध्यात्मिक पवित्र ज्ञान-भूमि के तपस्वी आचार्य अभिनव गुप्त जी चर्चा करते हैं.(ध्यानपूर्वक श्रीमती रम्भा चौबे जी सुनती हुईं गंभीर मुद्रा में)
..आप श्री अभिनव गुप्त जी को वगैर समझे कश्मीर को नहीं समझ पायेंगे.......तो आईये 950 ईसा पूर्व कश्मीर के पवित्र ज्ञान-भूमि पर जन्मे महान दार्शनिक शेषावतारी श्री अभिनव गुप्त जी के जीवन चरित्र के माध्यम से आपको 'कश्मीर' की यात्रा कराता हुं.

मुझे आदरणीय श्री जवाहर लाल कौल जी का एक लेख 'श्रद्धादीप समर्पण'  ने बहुत प्रभावित किया उसके कुछ अंश को उन्हीं के शब्दों में रखना चाहुंगा... भारत की ज्ञान-परंपरा में आचार्य अभिनवगुप्त एवं कश्मीर की स्थिति को एक ‘संगम-तीर्थ’ के रुपक से बताया जा सकता है। जैसे कश्मीर (शारदा देश) संपूर्ण भारत का ‘सर्वज्ञ पीठ’ है, वैसे ही आचार्य अभिनव गुप्त संपूर्ण भारतवर्ष की सभी ज्ञान-विधाओं एवं साधनों की परंपराओं के सर्वोपरि समादृत आचार्य हैं। कश्मीर केवल शैवदर्शन की ही नहीं, अपितु बौद्ध, मीमांसक, नैयायिक, सिद्ध, तांत्रिक, सूफी आदि परंपराओं का भी संगम रहा है।
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आचार्य अभिनवगुप्त भी अद्वैत आगम एवं प्रत्यभिज्ञा –दर्शन के प्रतिनिधि आचार्य तो हैं ही, साथ ही उनमें एक से अधिक ज्ञान-विधाओं का भी समाहार है। भारतीय ज्ञान दर्शन में यदि कहीं कोई ग्रंथि है, कोई पूर्व पक्ष और सिद्धांत पक्ष का निष्कर्ष विहीन वाद चला आ रहा है और यदि किसी ऐसे विषय पर आचार्य अभिनवगुप्त ने अपना मत प्रस्तुत किया हो तो वह ‘वाद’ स्वीकार करने योग्य निर्णय को प्राप्त कर लेता है। उदाहरण के लिए साहित्य में उनकी भरतमुनिकृत रस-सूत्र की व्याख्या देखी जा सकती है जिसे ‘अभिव्यक्तिवाद’ के नाम से जाना जाता है। भारतीय ज्ञान एवं साधना की अनेक धाराएं अभिनवगुप्तपादाचार्य के विराट् व्यक्तित्व में आ मिलती है और एक सशक्त धारा के रुप में आगे चल पड़ती है।
       आचार्य अभिनवगुप्त के पूर्वज अत्रिगुप्त (8वीं शताब्दी) कन्नौज प्रांत के निवासी थे। यह समय राजा यशोवर्मन का था। अभिनवगुप्त कई शास्त्रों के विद्वान थे और शैवशासन पर उनका विशेष अधिकार था। कश्मीर नरेश ललितादित्य ने 740 ई. जब कान्यकुब्ज प्रदेश को जीतकर काश्मीर के अंतर्गत मिला लिया तो उन्होंने अत्रिगुप्त से कश्मीर में चलकर निवास की प्रार्थना की। वितस्ता (झेलम) के तट पर भगवान शितांशुमौलि (शिव) के मंदिर के सम्मुख एक विशाल भवन अत्रिगुप्त के लिये निर्मित कराया गया। इसी यशस्वी कुल में अभिनवगुप्त का जन्म लगभग 200 वर्ष बाद (950 ई.) हुआ। उनके पिता का नाम नरसिंहगुप्त तथा माता का नाम विमला था।
     भगवान् पतञ्जलि की तरह आचार्य अभिनवगुप्त भी शेषावतार कहे जाते हैं। शेषनाग ज्ञान-संस्कृति के रक्षक हैं। अभिनवगुप्त के टीकाकार आचार्य जयरथ ने उन्हें ‘योगिनीभू’ कहा है। इस रुप में तो वे स्वयं ही शिव के अवतार के रुप में प्रतिष्ठित हैं। आचार्य अभिनवगुप्त के ज्ञान की प्रामाणिकता इस संदर्भ में है कि उन्होंने अपने काल के मूर्धन्य आचार्यों-गुरूओं से ज्ञान की कई विधाओं में शिक्षा-दीक्षा ली थी। उनके पितृवर श्री नरसिंहगुप्त उनके व्याकरण के गुरू थे। इसी प्रकार लक्ष्मणगुप्त प्रत्यभिज्ञाशास्त्र के तथा शंभुनाथ (जालंधर पीठ) उनके कौल-संप्रदाय –साधना के गुरू थे। उन्होंने अपने ग्रंथों में अपने नौ गुरूओं का सादर उल्लेख किया है। भारतवर्ष के किसी एक आचार्य में विविध ज्ञान विधाओं का समाहार मिलना दुर्लभ है। यही स्थिति शारदा क्षेत्र काश्मीर की भी है। इस अकेले क्षेत्र से जितने आचार्य हुए हैं उतने देश के किसी अन्य क्षेत्र से नहीं हुए| जैसी गौरवशाली आचार्य अभिनवगुप्त की गुरु परम्परा रही है वैसी ही उनकी शिष्य परंपरा भी है| उनके प्रमुख शिष्यों में क्षेमराज , क्षेमेन्द्र एवं मधुराजयोगी हैं| यही परंपरा सुभटदत्त (12वीं शताब्ती) जयरथ, शोभाकर-गुप्त महेश्वरानन्द (12वीं शताब्दी), भास्कर कंठ (18वीं शताब्दी) प्रभृति आचार्यों से होती हुई स्वामी लक्ष्मण जू तक आती है |
      दुर्भाग्यवश यह विशद एवं अमूल्य ज्ञान राशि इतिहास के घटनाक्रमों में धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई | यह केवल कश्मीर के घटनाक्रमों के कारण नहीं हुआ | चौदहवीं शताब्दी के अद्वैत वेदान्त के आचार्य सायण -माधव (माधवाचार्य) ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ 'सर्वदर्शन सङ्ग्रह' में सोलह दार्शनिक परम्पराओं का विनिवेचन शांकर-वेदांत की दृष्टि से किया है| आधुनिक विश्वविद्यालयी पद्धति केवल षड्दर्शन तक ही भारतीय दर्शन का विस्तार मानती है और इन्हे ही आस्तिक दर्शन और नास्तिक दर्शन के द्वन्द्व-युद्ध के रूप में प्रस्तुत करती है|आगमोक्त दार्शनिक परम्पराएँ जिनमें शैव, शाक्त, पंचरात्र आदि हैं, वे कही विस्मृत होते चले गए| आज कश्मीर में कुछ एक कश्मीरी  पंडित परिवारों को छोड़ दें, तो अभिनवगुप्त के नाम से भी लोग अपरिचित हैं| भारत को छोड़ पूरे विश्व में अभिनवगुप्त और काश्मीर दर्शन का अध्यापन आधुनिक काल में होता रहा है लेकिन कश्मीर विश्वविद्यालय में, उनके अपने वास-स्थान में उनकी अपनी उपलब्धियों को संजोनेवाला कोई नहीं है। काश्मीरी आचार्यों के अवदान के बिना भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन अपूर्ण और भ्रामक सिद्ध होगा। ऐसे कश्मीर और उनकी ज्ञान परंपरा के प्रति अज्ञान और उदासीनता कहीं से भी श्रेयस्कर नहीं है।...
आज कश्मीर को उसकी असल 'कश्मीरी़यत की पूर्व संस्कृति पर छोड़कर वहां से धारा 370 हटा लिया जाय और कश्मीरी पण्डितों को घर-वापसी करा दिया जाय तो'' तो पुन: कश्मीर 'शारदा देश' हो जायेगा और वह ' आध्यात्मिक पवित्र ज्ञान-भूमि की उन्नत सनातन संस्कृति की कृषि भूमि बन जायेगी'।

-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक 'ज्योतिष का सूर्य' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, शांतिनगर, भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ)
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शनिवार, 30 जून 2018

डॉक्टर डे

चौबेजी कहिन:- 'वैद्यराज नमस्तुभ्यम् यमराज सहोदरम्' को परिभाषित करने वाले डॉक्टर्स-डकैतों के बीहड़ों में है 'दूसरा भगवान' यानी 'डॉ.गोपीनाथ'🙏
1/7/2018
साथियों नमस्कार 🙏 आज 'चौबेजी कहिन' में 'डॉक्टर्स डे' पर आपको एक ऐसे डॉक्टर से परिचय कराता हूं जिन्हें 'गरीबों का मसीहा' और 'दूसरा भगवान' का दर्जा देती है भिलाई की जनता । वह शख्सियत हैं डॉ 'गोपीनाथ'🌹

आज 'डॉक्टर दिवस' है, आप सभी को बहुत बहुत बधाई, साथ ही भिलाई निवासी 'ग़रीबों का मसीहा' के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले हम सब के प्रेरणास्रोत आदरणीय डॉ. गोपीनाथ जी Gopinath Kandaswamy जी को जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 🌺🌹🌺 आपको ईश्वर ऐसी शक्ति प्रदान करते रहें की 'शताधिक वर्षों तक यूं ही गरीबों की सेवा करते रहें' 🙏🙏

वैसे तो डॉक्टर गोपीनाथ जी किसी सरकारी सम्मान के मोहताज नहीं हैं, क्योंकि उनको 'दूसरा भगवान' शब्द से भिलाई की आम जनता बहुत सम्मान देती है 🙏 किन्तु छत्तीसगढ़ सरकार को भी ऐसे डॉक्टरों को अलंकृत करना चाहिए 😊
श्री गोपीनाथ जी ऐसे चिकित्सक हैं जिन्होंने भिलाई के 'लालबहादुर शास्त्री चिकित्सालय'  को 'गरीबों की आशा' के रुप में प्रतिष्ठित किया, और आज सेवानिवृत्त होने के बावजूद आज भी गरीबों के चिकित्सा सेवा में लगे हुए हैं, इनको यहां की जनता दूसरे भगवान के सदृश सम्मान देती है 🙏
वाकई जब भी मैं इस महान शख्सियत डॉ गोपीनाथ जी के बारे में लिखता हूं तो मेरी आंखें नम हो जाती हैं, जीवन में कई घटनाएं ऐसी होती हैं जिसे कभी भूला नहीं जा सकता!🙏
हमारे पिता स्व.श्रीरामजी चौबे जी की तबीयत अचानक खराब हुई उनकी पीड़ा देखकर बेहद परेशान था, आप तो जानते ही हैं परेशान व्यक्ति को मंत्रणाओं की भरमार हो जाती है, मैं चिन्तित था, इसी दौरान मेरा एक डॉक्टर के वेश में एक 'शैतान' के यहां जाना हुआ, उसने कहा कि - अपने पिताजी को कल एडमिट कर दो, कल शाम को ऑपरेशन कर दूंगा मामूली सा 'व्रण' है ऑपरेट कर दूंगा ठीक हो जाएगा ...आप आज 7500/रु.जमा कर दीजिए ! मैंने सोचा जब ऑपरेशन ही कराना है तो एक बार डॉ गोपीनाथ जी से राय ले लेता हूं यह सोचकर डॉ गोपीनाथ जी को फोन किया लेकिन वह फोन रिसीव नहीं कर पाए, मैंने उनके सहयोगी श्री इन्द्रनील श्रीवास्तव Indraneel Srivastava जी को फोन किया उन्होंने कहा आप सेक्टर-2 क्लिनिक में आ जाईए डॉ गोपीनाथ जी आ ही रहे हैं, मैं सुपेला से सेक्टर-2 के लिए पिताजी को लेकर चल पड़ा तब तक डॉक्टर साहब का भी फोन आ गया, मैं जब वहां पहुंचा तो डॉ गोपीनाथ जी ने कहा कि- आपके पिताजी को यह सामान्य 'व्रण' नहीं है और ना ही इसका आप वगैर (वायएप्सी) जांच कराये, ऑपरेशन कराईए क्योंकि ऑपरेशन के बाद तेजी से कैंसर बहुत तेज़ी से फैल जायेगा! 😪
मैंने कहा - एक डॉक्टर तो कल ही ऑपरेशन करने का सुझाव दिया है, तब डॉक्टर गोपीनाथ जी मुस्कुराते हुए ऑपरेशन कराने से मना कर दिए!
जांच रिपोर्ट आने के बाद डॉक्टर गोपीनाथ जी के मित्र डॉ आर.पी. सिंह (सेक्टर9) सर्जन एवं डॉ.केकडे द्वारा इलाज हुआ, पिताजी तो बच नहीं पाये क्योंकि उनको प्रोस्टेश कैंसर अन्तिम स्टेज पर था और उनके उम्र के मुताबिक 'कीमो' भी नहीं दे सकते थे, अत: चार माह के बाद उनकी मृत्यु हुई!
साथियों, यदि पिताजीका ऑपरेशन करा दिया होता और डॉ गोपीनाथ जी से मुलाकात नहीं करता तो शायद पिताजी 15 दिन भी जीवित नहीं बच पाते ।
हालांकि हमने अपने पिताजी के जांच रिपोर्ट को हमने देश के कई कैंसर हॉस्पिटल के स्पेशलिस्ट डॉक्टरों को भेजकर हर संभावनाओं को तलाशने की कोशिश की जिसमें कई हमारे शिष्यों ने सहयोग किया ! उस समय निवर्तमान छत्तीसगढ़ सरकार में संसदीय सचिव (गृह,जेल एवं सहकारिता) श्री विजय बघेल Vijay Baghel जी ने भी अपने स्तर पर भारत के जाने माने डॉक्टरों की सलाह ली, परन्तु जो सलाह डॉक्टर गोपीनाथ जी ने दी वही सलाह सभी डॉक्टरों ने दी!
डॉ गोपीनाथ जी ने कभी भी 'रोगी' को 'ग्राहक' नहीं समझे जो भी उनसे करते बनता वह नि: स्वार्थ भाव से सही इलाज करते, और सटीक सलाह! सहज, सरल और उनका मिलनसार स्वभाव के धनी व्यक्तित्व डॉ. गोपीनाथ जी को महान शख्सियत बनाते हुए, ग़रीबों का मसीहा बनाता है और हजारों लोगों के लिए 'दूसरा भगवान' भी! तभी तो संयुक्त मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ राज्य बनने तक उनके सेवाकाल में कई सरकार आई और गई परन्तु कोई उनका ट्रांसफर नहीं कर पाया, जरा भी उनके ट्रांसफर की बात सुनाई देती आसपास के रहवासियों ने धरना प्रदर्शन करके डॉ गोपीनाथ जी का ट्रांसफर नहीं होने दिया।

ऐसा कम ही देखने को मिलता है जब एक सरकारी डॉक्टर के प्रति आम लोगों का जुड़ाव हो! लेकिन दु:ख की बात यह है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने आजतक कोई 'शासकीय सम्मान' नहीं दिया, जबकि इनको 'शासकीय अलंकरण' दिया जाना चाहिए, ताकि इससे प्रेरित होकर छत्तीसगढ़ में 'शताधिक डॉ.गोपीनाथ' बन सकें🙏 ऐसे महापुरुष के बारे में जितना लिखा जाए कम है, आपको पुन: जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 🌺🌹🌺🙏
- आचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- 'ज्योतिष का सूर्य'राष्ट्रीय मासिक पत्रिका शांतिनगर भिलाई, 9827198828

बुधवार, 27 जून 2018

मित्र धर्म...

मित्र धर्म 🕉️🕉️

एक बार उद्धव जी ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा  हे "कृष्ण"आप तो महाज्ञानी हैं, भूत, वर्तमान व भविष्य के बारे में सब कुछ जानने वाले हो आपके लिए कुछ भी असम्भव नही,में आपसे मित्र धर्म की परिभाषा जानना चाहता हूँ.उसके गुण धर्म क्या क्या हैं।

भगवान बोले उद्धव सच्चा मित्र वही है जो विपत्ति के समय बिना मांगे ही अपने मित्र की सहायता करे.उद्धव जी ने बीच मे रोकते हुए कहा "हे कृष्ण" अगर ऐसा ही है तो फिर आप तो पांडवों के प्रिय बांधव थे.एक बांधव के रूप में उन्होंने सदा आप पर विश्वास किया किन्तु आपने सच्चे मित्र की जो परिभाषा दी है उसके अनुरूप मित्रता नही निभाई.आप चाहते तो पांडव जुए में जीत सकते थे।

आपने धर्मराज युधिष्ठिर को जुआ खेलने से क्यों नही रोका. ठीक है आपने उन्हें नहीं रोका,लेकिन यदि आप चाहते तो अपनी दिव्य शक्ति के द्वारा पासे को धर्मराज के पक्ष में भी तो कर सकते थे लेकिन आपने भाग्य को धर्मराज के पक्ष में भी नहीं किया।

आप कम से कम उन्हें धन, राज्य और स्वयं को हारने के बाद भी तो रोक सकते थे उसके बाद जब धर्मराज ने अपने भाइयों को दांव पर लगाना शुरू किया, तब तो आप सभाकक्ष में पहुँच सकते थे।

किंतु आपने ये भी नहीं किया.इसके बाद जब दुष्ट दुर्योधन ने पांडवों को भाग्यशाली कहते हुए द्रौपदी को दांव पर लगाने हेतु प्रेरित किया और जीतने पर हारा हुआ सब कुछ वापस कर देने का लालच दिया कम से कम तब तो आप हस्तक्षेप कर ही सकते थे।

लेकिन इसके स्थान पर आपने तब हस्तक्षेप किया जब द्रौपदी लगभग अपनी लाज खो रही थी, तब जाकर आपने द्रोपदी के वस्त्र का चीर बढ़ाकर द्रौपदी की लाज बचाई किंतु ये भी आपने बहुत देरी से किया उसे एक पुरुष घसीटकर भरी सभा में लाता है, और इतने सारे पुरुषों के सामने निर्वस्त्र करने के लिए छोड़ देता है. जब आपने संकट के समय में पांडवों की सहायता की ही नहीं की तो आपको आपदा बांधव (सच्चा मित्र) कैसे कहा जा सकता है. क्या यही धर्म है।

भगवान श्री कृष्ण बोले - हे उद्धव सृष्टि का नियम है कि जो विवेक से कार्य करता है विजय उसी की होती है उस समय दुर्योधन अपनी बुद्धि और विवेक से कार्य ले रहा था किंतु धर्मराज ने तनिक मात्र भी अपनी बुद्धि और विवेक से काम नही लिया इसी कारण पांडवों की हार हुई।

भगवान कहने लगे कि हे उद्धव - दुर्योधन के पास जुआ खेलने के लिए धन तो बहुत था, लेकिन उसे पासों का खेल खेलना नहीं आता था, इसलिए उसने अपने मामा शकुनि से द्यूतक्रीडा करवाई यही तो उसका विवेक था धर्मराज भी तो इसी प्रकार विवेक से कार्य लेते हुए ऐसा सोच सकते थे और अपने चचेरे भाई को पासा देकर उनसे चाल चलवा सकते थे या फिर ये भी तो कह सकते थे कि उनकी तरफ से श्री कृष्ण यानी मैं खेलूंगा।

जरा विचार करो कि अगर शकुनी और मैं खेलते तो कौन जीतता ? पांसे के अंक उसके अनुसार आते या मेरे अनुसार,चलो इसे भी छोड़ो. उन्होंने मुझे खेल में शामिल नहीं किया, इसके लिए तो उन्हें क्षमा भी किया जा सकता है लेकिन उन्होंने विवेक हीनता से एक और बड़ी गलती तब की जब उन्होंने मुझसे प्रार्थना की, कि मैं तब तक सभाकक्ष में न आऊँ, जब तक कि मुझे बुलाया न जाए क्योंकि ये उनका दुर्भाग्य था कि वे मुझसे छुपकर जुआ खेलना चाहते थे।

इस प्रकार उन्होंने मुझे अपनी प्रार्थना से बाँध दिया.मुझे सभाकक्ष में आने की अनुमति नहीं थी इसके बाद भी मैं कक्ष के बाहर बहुत समय तक प्रतीक्षा कर रहा था कि मुझे कब बुलावा आता है।

पांडव जुए में इतने डूब गए कि भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब मुझे भूल गए और मुझे बुलाने के स्थान पर केवल अपने भाग्य और दुर्योधन को कोसते रहे.अपने भाई के आदेश पर जब दुशासन द्रोपदी को बाल पकड़कर घसीटता हुआ सभाकक्ष में लाया तब वह अपने सामर्थ्य के अनुसार जूझती रही, तब भी उसने मुझे नहीं पुकारा।

उसकी बुद्धि तब जागृत हुई, जब दुशासन ने उसे निर्वस्त्र करना प्रारंभ किया.जब उसने स्वयं पर निर्भरता छोड़कर 'हरि, हरि, अभयम कृष्णा, अभयम' की गुहार लगाते हुए मुझे पुकारा तो में बिना बिलम्ब किये वहां पहुंचा. हे उद्धव इस स्थिति में तुम्हीं बताओ मेरी गलती कहाँ रही।

उद्धव जी बोले कृष्ण आपका स्पष्टीकरण प्रभावशाली अवश्य है, किन्तु मुझे पूर्ण संतुष्टि नहीं हुई, क्या मैं एक और प्रश्न पूछ सकता हूँ ?

कृष्ण की अनुमति से उद्धव ने पूछा – इसका अर्थ यह हुआ कि आप तभी आओगे, जब आपको बुलाया जाएगा.क्या संकट से घिरे अपने भक्त की मदद करने आप स्वतः नहीं आओगे।

भगवान मुस्कुराये - उद्धव सृष्टि में हर किसी का जीवन उसके स्वयं के कर्मों के प्रतिफल के आधार पर चलता है।

में इसमें प्रत्यक्ष रूप से कोई हस्तक्षेप नही करता। मैं तो केवल एक 'साक्षी' हूँ जो सदैव तुम्हारे साथ रहकर जो हो रहा है उसे देखता रहता हूँ. यही ईश्वर का धर्म है।'भगवान को ताना मारते हुए उद्धव जी बोले "वाह वाह, बहुत अच्छा कृष्ण", तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप हमारे नजदीक खड़े रहकर हमारे सभी कर्मों को देखते रहेंगें हम पाप पर पाप करते जाएंगे और आप हमें रोकने के स्थान पर केवल देखते रहेंगे. आप क्या चाहते हैं कि हम भूल करते करते पाप की गठरी बांधते रहें और उसका फल भोगते रहें।

भगवान बोले – उद्धव, तुम धर्म और मित्रता को समीप से समझो, जब तुम समझकर अनुभव कर लोगे कि मैं तुम्हारे साथ हर क्षण रहता हूँ, तो क्या तुम पाप कर सकोगे ?तुम पाप कर ही नही सकोगे और अनेक बार विचार करोगे की मुझे विधाता देख रहा है किंतु जब तुम मुझे भूल जाते हो और यह समझने लगते हो कि तुम मुझसे छुपकर कुछ भी कर सकते हो, तुम्हे कोई देख नही रहा तब ही तुम संकट में फंसते हो।

धर्मराज का अज्ञान यह था उसने समझा कि वह मुझ से छुपकर जुआ खेल सकता हैअगर उसने यह समझ लिया होता कि मैं प्रत्येक प्राणी मात्र के साथ हर समय उपस्थित रहता हूँ तो क्या वह जुआ खेलते।

और यदि खेलते भी तो जुए के उस खेल का परिणाम कुछ और नहीं होता। भगवान के उत्तर से उद्धव जी अभिभूत हो गये और बोले – प्रभु कितना रहस्य छुपा है आपके दर्शन में।

कितना महान सत्य है ये ! पापकर्म करते समय हम ये कदापि विचार नही करते कि परमात्मा की नज़र सब पर है कोई उनसे छिप नही सकता,और उनकी दृष्टि हमारे प्रत्येक अच्छे बुरे कर्म पर है।

परन्तु इसके विपरीत हम इसी भूल में जीते रहते  हैं कि हमें कोई देख नही रहा।प्रार्थना और पूजा हमारा विश्वास है जैसे ही हम यह विश्वास करना शुरू करते हैं कि भगवान हर क्षण हमें देख रहे हैं, उनके बिना पत्ता तक नहीं हिलता तो परमात्मा भी हमें ऐसा ही आभास करा देते हैं की वे हमारे आस पास ही उपस्तिथ हैं और हमें उनकी उपस्थिति का आभास होने लगता है.हम पाप कर्म केवल तभी करते हैं जब हम भगवान को भूलकर उनसे विमुख हो जाते हैं।