ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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सोमवार, 19 नवंबर 2018

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में किसको मिलेगी सत्ता ?

 छत्तीसगढ़ में भाजपा को सत्ता वापसी की राह आसान कर रहे हैं ये तीन ग्रह चंद्र, बुध और शुक्र वहीं कांग्रेस के लिए सबसे बड़े बाधक हैं न्यायाधीश 'शनि' ग्रह 🌷

कर्क लग्न वाले छत्तीसगढ़ राज्य गठन कुण्डली के मुताबिक गोचर में चन्द्रमा छत्तीसगढ़ की धनु राशि से चौथे भाव में भ्रमण कर रहे हैं, वहीं मंगल तीसरे भाव में जो पूर्व के सत्तारूढ़ पार्टी के लिए अति शुभ गोचर है, और छत्तीसगढ़ की कुण्डली में राज्येश मंगल अपनी नीच राशि कर्क राशि के हैं जो जहां एक ओर सत्ताधारी पार्टी भाजपा में आपसी शह-मात में उलझने के बावजूद सत्ता वापसी करेगी वहीं यह मंगल चूंकि गोचर में यानी 16 नवम्बर से 16 दिसम्बर 2018 तक विपक्ष ीी पार्टी कांग्रेस आपस की गुटबाजी से उबर नहीं पाएगी, ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जबसे धनु राशि में शनि प्रवेश किए हैं तभी से छत्तीसगढ़ कांग्रेस में समय-समय पर कई फूट हुए उसी का एक हिस्सा छत्तीसगढ़ जोगी कांग्रेस है जो छत्तीसगढ़ कांग्रेस (अखिल भारतीय कांग्रेस) और 19 जून 1970 को दोपहर 2 बजकर 48 मिनट पर जन्मे राहुल गांधी की कुण्डली के अनुसार तुला लग्न की कुंडली में गुरु लग्न में हैं और वर्तमान में 14 सितंबर 2018 से दशमेश चंद्रमा की अन्तर्दशा चल रही है जो चंद्र इनको बहुत संतोषजनक सफलता नहीं दे पाएंगे जबकि इसके पूर्व इनको मंगल की अन्तर्दशा ने कई सफलताएं दिया है। अत: राहुल गांधी को (भूपेश बघेल,अध्यक्ष, छत्तीसगढ़) सत्ता वापसी नामुमकिन बना दिया है। अब जरा विंशोत्तरी महादशा की बात की जाए तो अभी वर्तमान में 15/8/2018 से 25/12/2018 तक शुक्र की महादशा में शनि का अन्तर एवं शुक्र का प्रत्यंतर चल रहा है जो भाजपा और मोदी जी के जन्मांक (2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर विस्तृत विश्लेषण हमारे इस यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध है जिसका लिंक है https://youtu.be/XhA6nyVHQxw) शुक्र ही वह प्रबल ग्रह है जो नरेंद्र मोदी जी को पीएम पद तक पहुंचानेमें सहयोग किया। कुल मिलाकर अभी हालिया राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को संतोषजनक सफलता नहीं मिलती दिख रही है वहीं भाजपा शासित राज्यों में ले देकर सत्ता में वापसी करेगी जबकि कल 20/11/2018 को छत्तीसगढ़ में हो रहे विधानसभा चुनाव में गोचर में ग्रहबल भाजपा को बेहतरीन सफलता देंगे।

-आचार्य पण्डित विनोद चौबे, शांतिनगर, भिलाई-दुर्ग

सोमवार, 12 नवंबर 2018

विश्वव्यापी सूर्योपासना का महापर्व 'छठ पूजा'

चौबेजी कहिन:- क्याें है विश्वव्यापी सूर्योपासना का महापर्व 'छठ पूजा' ।
‘आदित्याज्जायते  वृष्टिवृष्टरन्नं ततः प्रजाः’। सूर्य से वर्षा, वर्षा से अन्न और अन्न से प्रजा (प्राणी) का जन्म होता है। 🌷🙏 (पूरा आलेख अवश्य पढ़ें और अन्य मित्रों को शेयर करें) 🙏🌷
सूर्य षष्ठी व्रत (छठ पूजा) के पावन पर्व पर आप सभी देशवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 🌷🌷 आइए आज 'चौबेजी कहिन' सूर्योपासना के विषय पर आज विस्तृत चर्चा करेंगे। साथियों, पौराणिक कथाओं के अनुसार सूर्य महर्षि कश्यप के पुत्र होने के कारण ‘काश्यप’ कहलाये। उनका लोकावतरण महर्षि की पत्नी अदिति के गर्भ से हुआ, अतः उनका एक नाम ‘आदित्य’ भी लोकविख्यात एवं प्रसिद्ध हुआ। उपनिषदों में आदित्य को ब्रह्म के प्रतीक के रूप में दर्शाया गया है। छान्दोग्योपनिषद् ‘आदित्यो ब्रह्म’ कहता है तो तैत्तिरियारण्यक ‘असावादित्यो ब्रह्म’ की उपमा देता है।अथर्ववेद की भी यही मान्यता है। इसके मतानुसार आदित्य ही ब्रह्म का साकार स्वरूप है।

ऋग्वेद में सर्वव्यापक ब्रह्म तथा सूर्य में समानता का स्पष्ट रूप से बोध होता है। यजुर्वेद सूर्य और भगवान् में भेद नहीं करता। कपिला तंत्र में सूर्य को ब्रह्मांड के मूलभूत पंचतत्त्वों में से वायु का अधिपति घोषित किया गया है। हठयोग के अंतर्गत श्वास (वायु) को प्राण माना गया है और सूर्य इन प्राणों का मूलाधार है, अतः ‘आदित्यौ वै प्राणः’ कहा गया है। योग साधना में प्रतिपादित मणिपूरक चक्र को ‘सूर्यचक्र’ भी कहते हैं। हमारा नाभिकेन्द्र (सूर्यचक्र) प्राण का उद्गम स्थल ही नहीं बल्कि अचेतन मन के संस्कारों तथा चेतना का संप्रेषण केन्द्र भी है। सूर्यदेव इस चराचर जगत् में प्राणों का प्रबल संचार करते हैं- ‘प्राणः प्रजानामुदयत्येषं सूर्यः’। सूर्य भगवान् को मार्तण्ड भी कहते हैं क्योंकि ये जगत् को अपनी ऊष्मा तथा प्रकाश से ओतप्रोत कर जीवनदान देते हैं। सूर्यदेव कल्याण के उद्गम स्थान होने के कारण शम्भु कहलाते हैं। भक्तों का दुःख दूर करने अथवा जगत् का संहार करने के कारण इन्हें त्वष्ट भी कहते हैं। किरण को धारण करने वाले सूर्य देव अंशुमान् के नाम से भी जाने जाते हैं। दरअसल सूर्य हम सभी पृथ्वी वासियों के पितृदेव भी हैं जिनको हम जलाञ्जली भी अर्पित करते हैं चाहे वह पितृपक्ष में तर्पण हो या प्रतिदिन अर्घ्य प्रदान करना हो किसी ना किसी बहाने हम सभी सूर्योपासना करते ही हैं। ऋग्वेद के पांच सबसे प्रभावशाली देवताओं में अग्नि, सूर्य  आदि प्रमुख हैं।
सूर्योपासना भिन्न-भिन्न रूपों में अनादिकाल से भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि समस्त विश्व के विभिन्न भागों में भक्ति एवं श्रद्धापूर्वक की जाती रही है। अमेरिका के रेड इंण्डिनों द्वारा आबाद क्षेत्रों में सूर्य मंदिर प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। कई प्रकार की सूर्य गाथाएँ हवाई द्वीप, जापान, दक्षिण अमेरिका तथा कैरिबियन द्वीपों में प्रचलित हैं, जो बताती हैं कि सूर्य सबका उपास्य रहा है। चीन के विद्वान् सूर्य को ‘याँग‘ मानते हैं। जापान सूर्य पूजक राष्ट्र है तथा दिनमान का आगमन सर्वप्रथम उसी देश से हुआ माना जाता है। बौद्ध जातकों में सूर्य का प्रसंग वाहन के रूप में स्थान-स्थान पर आया है तथा अजवीथि, नागवीथि और गोवीदि नाम के मार्गों के आधार पर उसकी तीन गतियाँ मानी गयी हैं। इस्लाम में सूर्य को ‘इल्म अहकाम अननजुमे’ का केन्द्र माना गया है। अर्थात् सूर्य इच्छा शक्ति को बढ़ाने वाली चैतन्य सत्ता के प्रतीक हैं। ईसाई धर्म में न्यूटेस्टामेण्ट में सूर्य के धार्मिक महत्त्व का विशद् एवं विस्तृत वर्णन है। सेण्टपाल ने इसीलिए रविवार का दिन पवित्र घोषित कर इस दिन प्रभु की आराधना दान दिये जाने आदि को अत्यन्त फलदायी माना है। ग्रीक और रोमन विद्वानों ने भी इसी दिन को पूजा का दिन स्वीकार किया है।

यद्यपि कालचक्र के दुष्प्रभाव से वर्तमान समय में सूर्योपासना की परम्परा का अत्यन्त ह्रास हो गया है, परन्तु फिर भी धर्म प्रधान भारत वर्ष में सनातन धर्मी जनता आज भी किसी न किसी रूप में सूर्य को देवता मानकर उनकी पूजा अभ्यर्थना करती है। इसी क्रम में सूर्यषष्ठी व्रत को मनाया जाता है। बिहार एवं झारखण्ड की जनता इस पावन तिथि को ‘छठपूजा’ के रूप में अत्यन्त श्रद्धा-उत्साह एवं उमंग के साथ मनाती है। वाराणसी एवं पूर्वांचल में इसे ‘डालछठ’ कहा जाता है। कार्तिक शुक्ल चतुर्थी के दिन नियम-स्नानादि से निवृत्त होकर फलाहार किया जाता है। पंचमी में दिन भर उपवास करके सायंकाल किसी नदी या सरोवर में स्नान करके अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके पश्चात् अस्वाद भोजन किया जाता है। लेकिन इस पर्व को देश की राजनीति ने अपने कुत्सित प्रभाव से रौंदकर 'बिहारियों का पर्व' बनाकर प्रांतीय-परप्रांतीय का जहर घोलने का काम किया, जो निंदनीय है।-आचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- "ज्योतिष का सूर्य" राष्ट्रीय मासिक पत्रिका शांतिनगर भिलाई-दुर्ग छत्तीसगढ़ मोबाइल नं. 9827198828 🙏🌷

शनिवार, 10 नवंबर 2018

अल्ट्रावॉयलेट किरणों से रक्षा करने वाला विश्व का सबसे लोकप्रिय पर्व है 'छठपूजा'

छठ पर्व लोक पर्व नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर मनाए जाने वाला महापर्व है ज्योतिष के अनुसार जब सूर्य नीच राशि तुला राशि पर होते हैं उस समय पृथ्वी पर सूर्य की नकारात्मक ऊर्जा (अल्ट्रावायलेट किरणों) की अधिकता होती है, अतः उससे पृथ्वी वासियों को बचाने के लिए ृृृ ऋग्वेद में कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को (सूर्यास्त) सायंकालीन एवं सप्तमी तिथि को प्रातः कालीन (सूर्योदय) के समय अर्घ्य प्रदान करने की परम्परा की शुरुआत हुई जो आज 'छठपूजा' के रुप में प्रसिद्ध हुआ। उत्तर भारत में अधिक मान्यता इस व्रत को लेकर है, यह व्रत विशेष रूप से संतान प्राप्ति, संतान के दीर्घायु के लिए किया जाता है। यह व्रत यदि किसी कारणवश महिलाएं यह व्रत करने में असमर्थ होती हैं तो पुरुष भी इस व्रत को करते हैं।




छठ व्रतियों को इस दौरान स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जाता है, और संतान की दीर्घायु, सुख समृद्धि सहित मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए स व्रत को किया जाता है। जिनकी मनौती पूरी हो जाती है वे सांध्यकालीन अर्घ्य देकर घाट से घर आने के बाद गन्ना का मण्डप बना कर चतुर्मुखी दीपक वाले कलश में चुडा (पोहा) मिठाई रखकर अपने पितरों को स्मरण करते हुए छठी मईया की गीत गाती हैं। इस व्रत में केला, सेव, अनानास, संतरा, नींबू, मुली, कंद-मूल एवं अनेक प्रकार के ऋतु फल के साथ ठेकुआ चढ़ाया जाता है। उपरोक्त सभी सामग्री को दौरी में जलते हुए दीपक के साथ घाट पर जाते हैं और वहां सूर्य मंत्र का वाचन करते हुए गाय का दुध मिश्रित जल से बांस की सुपेली (सूपा) या पितल के सूपा में सभी प्रकार के ऋतु फल रखकर सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय अर्घ्य प्रदान करना चाहिए।