ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

मानव और दानव

मानव और दानव ...

भारत में धर्म की जड़ें अधिक गहरी थीं, अतः कलियुग में असुरों का प्रभाव बढ़ने पर भी केवल भारत में ही सनातन धर्म बच पाया, सबसे बुरे प्रभाव तो पाकिस्तान से मोरक्को तक और अफ्रीका एवं अमरीकी महादेशों में पड़े | उन क्षेत्रों में पूरी की पूरी सभ्यताओं को मिटा दिया गया और पूरी आबादी का सफाया हुआ या दास बनाया गया |
कहने को पाकिस्तान भारत का हिस्सा था लेकिन द्वापर युग के अन्त में ही वहां के संस्कार पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुके थे यह महाभारत में वर्णित है |
ईसाइयों ने मुसलमानों से अधिक अत्याचार किये हैं - अमरीकी महादेशों और अफ्रीका पर, केवल USA में चार करोड़ रेड इण्डियन का जंगली जानवरों की तरह शिकार किया गया | भारत में बन्दूकें और तोपें थी अतः भारतीय जिन्दा बच पाए, केवल अधीन बनाए गए |
यूरोप से सनातनी परम्परा को मिटाने के लिए रोमनों और बाद में रोमन चर्च ने भयंकर अत्याचार किये | चर्च का ईसा की शिक्षाओं  से कोई लेना-देना नहीं था, अभी जो बाइबिल है उसमें ईसा का कोई विचार नहीं है | ईस्वी 300 के बाद रोमनों ने नए ईसाई सम्प्रदाय को अपने स्वार्थ के लिए खड़ा किया | पुराने सनातनी एवं आसुरी सम्प्रदायों को मानने वालों को जादूगर कहकर जिन्दा जलाया गया |
भारत में जन्मे किसी भी सम्प्रदाय ने धर्म के नाम पर नरसंहार कभी नहीं किया, भले ही कलियुग में अनेक कुरीतियाँ भारत में भी फैली | बौद्ध सम्प्रदाय जबतक भारत में फला-फूला, धार्मिक बना रहा, विदेश गया तो गोमाँस खाकर अहिंसा पर लम्बे प्रवचन देने वाला आसुरी सम्प्रदाय बन गया | जैसा की बहुत भारतीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि - "दलाई लामा प्रतिदिन नवजात बछड़ा ("veal") खाते हैं, तभी तो नोबेल पुरस्कार मिला है ! हिंसा नहीं करते, बछड़े का खाना-पीना बन्द करा देते है ताकि वह स्वयं अहिंसापूर्वक मर जाय ! अभी तक तीस करोड़ रूपये से अधिक के बछड़े खा चुके हैं -- वह धन चीन के अत्याचार से पीड़ित तिब्बती शरणार्थियों के लिए दान के नाम पर आता है" हालाकी मैं व्यक्तिगत तौर पर दलाई लामा गोवंश-मांश खाते हैं इस बात से मैं सहमत नहीं हुं ! लेकिन यदि उपरोक्त बातें सही हैं तो....दलाई लामा जैसे लोग कोई धर्मगुरु नहीं वरन् विधर्म प्रवृत्ति-प्रधान भोगवादी गुरु है जिसको तात्कालीन भारतीय सत्ताधारी सरकार ने लामा को भारत में राजनैतिक केन्द्र खोलने की अनुमति देने के कारण भारत का चीन से सम्बन्ध बिगड़ा ! हालाकी चीन भी भारत के पीठ में हमेशा छुरा ही घोंपने का किया है, और अब तो पाकिस्तान को मोहरा बनाकर चीन अघोषित युद्ध कर रहा है भारत से ! चीन+पाक दोनों ही असुरों का देश हैं!

मेगास्थनीस ने लिखा था कि भारत में दास नहीं थे | दासप्रथा के स्थान पर वर्ण व्यवस्था थी, शूद्रों के कारण दासों की आवश्यकता ही नहीं थी | कुछ दास भारत में भी थे, किन्तु उनकी हालत यूरोप के दासों से लाख गुनी बेहतर थी | शूद्रों को दास कहना गलत है, शूद्रों की खरीद-बिक्री सम्भव नहीं थी और उनको नागरिकों वाले वैधानिक अधिकार प्राप्त थे |
फिर भी हमें पढ़ाया जाता है कि हिन्दुओं में मानवाधिकार की स्थिति ठीक नहीं है !!   दानवाधिकार आयोग वालों से और आशा ही क्या ?? जबकी इन लोगों ने 'दास' शब्द की व्याख्या गलत तरीके से किये ! "दास" शब्द तो सनातन धर्म में उत्तम माना गया है ! अब पहली बार भारत में मजबूत इरादों वाली सरकार आई है, जिसका भारतीय जनता द्वारा गुजरात आदि होने वाले चुनावों में विजयी बनाकर मोदी सरकार का मनोबल बढ़ावें ! ताकी बहुत से लंबित पड़े कार्य संपन्न हो सके !
अब देखिए ना जयोतिष के मुताबिक  कालचक्र ने 2000 ईस्वी की मेष संक्रान्ति के बाद पलटा खाया है, 42 हज़ार वर्षों तक भारत के लगातार उत्थान का युग आरम्भ हो चुका है | अब दानवों के पीछे हटने का काल है | जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण आपको मान. न्यायालय द्वारा दिये गये प्रदूषण नियंत्रण हेतु वह आदेश ! जो  दिल्ली मे दीपावली पर पटाखा-बैन की बावजूद दिल्ली में हिन्दुओं ने ठीक उसी तरह मिल,जुलकर फटाका फोड़ा, जैसे ध्वनि प्रदूषण पर मान. न्यायालय द्वारा बैन लगाये जाने के बावजूद कानफोड़ू ध्वनि में अज़ान पढ़ा जाता हैपटाखा फोड़ा गया ! मित्रों,
किन्तु  सनातन धर्म को सबसे अधिक खतरा घर के भेदियों से है जो झूठमूठ हिन्दू-हिन्दू चिल्लाकर सनातन धर्म की जड़ें खोखली करना चाहते हैं, हिन्दुत्व से कोई सरोकार नहीं है | घर ठीक रहेगा तभी बाहरी शत्रुओं से लड़ पायेंगे | ऐसे कथित हिन्दुओं की वजह से ही भारतीय संस्कृति में हिन्दुओं को जाति, वर्ग और स्थानीय भाषाओं के आधार पर हिन्दुओं को परस्पर में बांटकर आरक्षण की आग में झोंक दिया और आपस में लड़ाकर विखण्डित करके रखा ! अब तो बुद्ध और अम्बेडकर को जपने वाले युगपुरुष भी जय श्री राम बोलने लगे हैं !! राहुल गांधी भी अब मंदिर मंदिर भ्रमण करने लगे हैं ..क्योंकि..अब इनको अहसास हो गया है की जो विकास के साथ साथ यहां की सांस्कृतिक संरचनाओं के प्रतीक 'राम' के इस देश में भारत में जो 'राम' की बात करेगा वही सत्ता में बने रहेगा ! दरअसल मानव और दानवोंं में सदियों से युद्ध होता चला आ रहा है, जिसमें मानव का ही विजय होगा, और होता रहा है !

आचार्य पण्डित विनोद चौबेभिलाई,
संपादक- 'ज्योतिष का सूर्य' 09827198828

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शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

स्वयंसेवकों की हो रही नृशंस हत्याओं पर चुप्पी क्यों ?

राष्ट्र देवो भव: को मानने वाले  "स्वयंसेवकों के लिए राष्ट्र ही सर्वोपरि है और यही संघ का संस्कार भी,और इसलिए, राष्ट्र के प्रति समर्पित स्वयंसेवक अगर राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण न हो तो न केवल भारत अपने परम वैभव को नहीं प्राप्त कर पायेगा बल्कि एक कृतघ्न राष्ट्र भी कहलायेगा। ऐसे में देशतोड़क शक्तियां जो वैदेशिक धन पर पलने वाली देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्त वामियों द्वारा आरएसएस को स्लाम विरोधी बताकर स्वयंसेवकों पर एक राष्ट्रव्यापी कुचक्र रचा जा रहा है, जिसके फलस्वरुप केरल से लेकर प.बंगाल होते हुए यूपी के गाज़ीपुर के राजेश मिश्र तक द्वि: शताधिक राष्ट्रसेवकों की नृशंस हत्याओं को अंजाम दिया जा रहा है, जो घोर निन्दनीय है !

जो भी शक्तियां स्वयंसेवकों की ऐसी नृशंश हत्या के माध्यम से संघ, स्वयंसेवकों अथवा समाज को जो भी सन्देश देने का प्रयास कर रही हैं, शायद उन्हें न तो संघ की शक्ति का अनुमान है और न ही स्वयंसेवकों के दृढ़ निश्चय का ! अगर संघ के स्वयंसेवक राष्ट्र की रक्षा करने में सक्षम हैं तो स्वाभाविक है की वो अपना और अपने स्वजनों की रक्षा करने का भी सामर्थ्य रखते हैं। हां , इस प्रकार के कुचक्रों से स्वयंसेवक डरने वाले नहीं हैं, वामपंथी ताकतों का डटकर सामना करते रहेंगे, हमारी उदारता को कमजोरी समझने की भूल ना करें, और पिछे से हिंसक वार करने की बजाय देश के अलग अलग मंचों पर वैचारिक डीबेट करलें, समझ में आ जायेगा, कि उनके साथ देश की कितनी जनता है और स्वयंसेवकों के विचारों की समर्थक कितनी जनता है ! बजाय हिंसा के मुख्यधारा के सरोकार बन भारत के सांस्कृतिक विकास में योगदान दें ! स्वयंसेवकों की हत्याएं करके ऐसे तत्व कभी भी अपनी मंसूबों पर सफल नहीं हो पायेंगे ! अभी विगत दिनों शाखा से घर जा रहे स्वयंसेवक ६० वर्षीय श्री रविन्द्र गोसाईं को गोली मार दी गयी, जबकी इसके पहले पंजाब के जालंधर में पंजाब संघ प्रचारक ब्रिगेडियर जगदीश गगनेजा को दो बाईक सवारों ने पाश कालोनी में नजदीक से गोली मार दी थी ! ठीक उसी प्रकार यूपी के संघ स्वयंसेवक श्री राजेश मिश्र जी को भी दो बाईक सवारों ने बिल्कुल नजदीक से गोली मारकर हत्या कर दी गई !
देश में चहुंओर एक जैसे ही स्वयंसेवकों की हो रहीं नृशंस हत्याओं पर मानवाधिकार, और पुरस्कार वापसी गिरोह क्यों चुप हैं ? यह बड़ा यक्षप्रश्न है !

http://ptvinodchoubey.blogspot.in/2017/10/blog-post_21.html?m=1

कांग्रेस और वामपंथियों की मिलीभगत से चल रहे इस खूनी खेल जो वर्षों से केरल में चल रहा है, क्या यही केरल सरकार और ममता दीदी का .बंगाल में 'सहिष्णुता" है ? बात बात में अपनी राय रखने वाले छपास बिमारी से पीड़ित नेता चुप क्यों है ? मुखर होकर आवाज क्यों नहीं उठाते ? यदि इस हिंसा के विरोधी ये लोग हैं तो सामने आकर विरोध क्यों नहीं करते ? करें भी कैसे इन लोगों ने तो कश्मिर में पंडितों पर कह़र बरपते देख जश्न मना रहे थे ! इन्हीं लोगों ने सियासत चमकाने के लिये कर्नल श्रीकांत पुरोहित, रमेश उपाध्याय तथा साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर चटजुल्म ढाहे, और 'भगवा आतंवाद' शब्द को दन्म दिया ! इन लोगों से उम्मीद भी क्या की जा सकती है, जिन्होंने भारत विरोधी नारे देने वालों की जमात का अ'कन्हैया को दत्तक पुत्र बना उसके साथ जेएनयू में प्रोटेस्ट करने जाते हैं, जिसके अन्दर का पप्पु भी पीगल हो गया हो, भला उन्हें स्वयंसेवक 'विलेन' ही दिखेंगे ! आज मैं आचार्य पण्डित विनोद चौबे (9827198828), भिलाई स्थित अपने निवास से बाहर निकला तो चर्चा चल रही थी की, जो भी हो 'आरएसएस कार्यकर्ता कभी हिंसा नहीं कर सकते' , यह सुनकर हमें गर्व होता है, कि गांव, और कसबों की चौक-चौपाटी के लोग आरएसएस पर इतना विश्वास करते हैं, संघ की विचारधारा को समझते हैं, लेकिन कांग्रेस और वामपंथी आजतक 'संघ' क्यों नहीं समझ पाई ? समझ से परे है, और चिन्ता का विषय भी क्योंकि यही नेता 'संघ' के स्वयंसेवकों के प्रति कुछेक भाड़े के लोगों को भड़काते हैं , जो बेहद तिन्ताजनक है !

चिंता तो उस व्यवस्था की है जिसने आज समाज को इतना अव्यवस्थित और सामान्य नागरिकों को इतना असुरक्षित कर दिया है; हमारी लड़ाई किसी राजनेता, राजनीतिक दल अथवा सत्ता के पक्ष से नहीं बल्कि उन परिस्थितियों से है जिनसे वर्त्तमान त्रस्त है, यदि भाजपा शासीत राज्यों में या गैर-भाजपा शासित प्रदेशों में केन्द्र सरकार हस्तक्षेप करती भी हैं, तो "मानवाधिकार" प्रकट हो कर विरोध करने लगते हैं !
ऐसे में, आज जब वर्त्तमान स्वयं की प्रेरणा से राष्ट्र की सेवा में समर्पित स्वयंसेवकों के रक्त से रंजीत होना
तो ऐसा कोई कारन ही नहीं की हम अपने परिवर्तन लाने के प्रयास से पीछे हटें; आखिर खोने का  क्या है ;

एक वीर कभी पराजित नहीं होता क्योंकि उसके लिए  संघर्ष के पास परिणाम के रूप में केवल दो ही विकल्प होते हैं, या तो विजयश्री या वीरगति , और दोनों  ही परिस्थितियों में उसका प्रयास ही उसके लिए सम्मान अर्जित करता  है और यही उसके जीवन की उपलब्धि भी;

वीर वही जो प्रतिकूल परिस्थितियों को अपने संघर्ष से अनुकूल बनाने  का प्रयास करे और भीरु वह जो जो जीवन की सरलता और सुविधा के लिए परिस्थितियों से समझौता करना सीख जाए।          

ऐसे में, आज जब वर्त्तमान ने हमारे समक्ष व्यवस्था परिवर्तन की आवश्यकता द्वारा प्रायोजित संघर्ष की चुनौती प्रस्तुत की है तो क्या आपको नहीं लगता की भीरु के जीवन  से कहीं बेहतर  एक वीर की मृत्यु होगी;

हमें न तो बलिदान  की चिंता  है  न ही परिणाम  की क्योंकि  हम जानते हैं की किसी   भी समर्पित व् सतत  प्रयास से तो अस्मभव भी संभव होता आया है, ऐसे में, भारत के परम वैभव के उद्देश्य की प्राप्ति से अधिक महत्वपूर्ण और गौरवशाली लक्ष्य वर्त्तमान में किसी भी स्वयंसेवक के लिए  भला और  हो  भी क्या सकता है;"स्वयंसेवकों के लिए राष्ट्र ही सर्वोपरि है और यही संघ का संस्कार भी,और इसलिए, राष्ट्र के प्रति समर्पित स्वयंसेवक अगर राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण न हो तो न केवल भारत अपने परम वैभव को नहीं प्राप्त कर पायेगा बल्कि एक कृतघ्न राष्ट भी कहलायेगा।

जो भी शक्तियां स्वयंसेवकों की ऐसी नृशंश हत्या के माध्यम से संघ, स्वयंसेवकों अथवा समाज को जो भी सन्देश देने का प्रयास कर रही हैं, शायद उन्हें न तो संघ की शक्ति का अनुमान है और न ही स्वयंसेवकों के दृढ़ निस्चय का ; अगर संघ के स्वयंसेवक राष्ट्र की रक्षा करने में सक्षम हैं तो स्वायभाविक है की वो अपना और अपने स्वजनों की रक्षा करने का भी सामर्थ रखते हैं।

चिंता तो उस व्यवस्था की है जिसने आज समाज को इतना अव्यवस्थित और सामान्य नागरिकों को इतना असुरक्षित कर दिया है; हमारी लड़ाई किसी राजनेता, राजनीतिक दल अथवा सत्ता के पक्ष से नहीं बल्कि उन परिस्थितियों से है जिनसे वर्त्तमान त्रस्त है;

ऐसे में, आज जब वर्त्तमान स्वयं की प्रेरणा से राष्ट्र की सेवा में समर्पित स्वयंसेवकों के रक्त से रंजीत हो ही चूका है, तो ऐसा कोई कारन ही नहीं की हम अपने परिवर्तन लाने के प्रयास से पीछे हटें; आखिर खोने का  क्या है ;

एक वीर कभी पराजित नहीं होता क्योंकि उसके लिए  संघर्ष के पास परिणाम के रूप में केवल दो ही विकल्प होते हैं, या तो विजयश्री या वीरगति , और दोनों  ही परिस्थितियों में उसका प्रयास ही उसके लिए सम्मान अर्जित करता  है और यही उसके जीवन की उपलब्धि भी;

वीर वही जो प्रतिकूल परिस्थितियों को अपने संघर्ष से अनुकूल बनाने  का प्रयास करे और भीरु वह जो जो जीवन की सरलता और सुविधा के लिए परिस्थितियों से समझौता करना सीख जाए।          

ऐसे में, आज जब वर्त्तमान ने हमारे समक्ष व्यवस्था परिवर्तन की आवश्यकता द्वारा प्रायोजित संघर्ष की चुनौती प्रस्तुत की है तो क्या आपको नहीं लगता की भीरु के जीवन  से कहीं बेहतर  एक वीर की मृत्यु होगी;

हमें न तो बलिदान  की चिंता  है  न ही परिणाम  की क्योंकि  हम जानते हैं की किसी   भी समर्पित व् सतत  प्रयास से तो अस्मभव भी संभव होता आया है, ऐसे में, भारत के परम वैभव के उद्देश्य की प्राप्ति से अधिक महत्वपूर्ण और गौरवशाली लक्ष्य वर्त्तमान में किसी भी स्वयंसेवक के लिए  भला और  हो  भी क्या सकता है; क्या आपको ऐसा नहीं लगता ?"क्या आपको ऐसा नहीं लगता ?"

कुल मिलाकर मेरा मन क्षुब् है, व्यथित है, और इस ओर देश के हर वर्ग के लोगों को संगठित कर आगाह करना चाहता हुं, की आपके बीच ऐसे 'हिंसा-प्रेमी देशतोड़क वामियों की जमात' द्वारा युवाओं को स्वयंसेवकों के प्रति बरगलाया जाता है तो आप सचेत रहें और और एक बार देश के किसी भी शाखा में जायें और आरएसएस को समझने का प्रयास करें, ताकी इन हिंसावादी ताकतों को वैचारिकता के बल से मुंहतोड़ जवाब दे सकें! !! वंदे मातरम्!!
- आचार्य पण्डित विनोद चौबे,
संपादक - 'ज्योतिष का सूर्य' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई, मोबाईल नं. -9827198828
(विशेष सूचना : कृपया इस आलेख का कापी-पेस्ट ना करें, ऐसा पाये जाने पर आपके उपर संवैधानिक कार्यवाही की जायेंगी)

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शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

कार्तिक मांह में 'गावो विश्वस्य मातर:' एवं 'बोनस तिहार' के बाद अब 'मातर तिहार के आगाज़'

हिन्दू धर्मग्रंथो में कार्तिक महीना बेहद शुभ माना जाता है। इस महीने का एक अहम त्यौहार है गोवर्धन -पूजा है क्योंकि इस माह की शुरुआत ही इसी पर्व से होती है, इस माह प्रतिदिन दीप जलाने का महत्व है, इस माह के स्वामी भगवान विष्णु हैं, और हमारे भिलाई, दुर्ग राजनांद गांव सहित पूरे छत्तीसगढ़ में तो आज से मातर तिहार मनावे बर सब्बो डाहन से गांव दिहात से अब्बड़कन तैयारी चलत हे, एखर पहिली हमन छत्तीसगढि़या मन हा 'बोनस तिहार' मनाय हवयं, अब मातर मनाबो, मोर शांतिनगर, ( ज्योतिष भवन) के घर डाहन 'गावो विश्वस्य मातर:' के अलख जगावे बर जरुर आबो । छत्तीसगढ़ गोवर्धन पूजा को कई लोग अन्नकूट के नाम से भी जानते हैं। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण, गोवर्धन पर्वत और गाय माता की पूजा की जाती है। महाभारत,  समेत कई हिन्दू ग्रंथों में इस व्रत का वर्णन किया गया है।

इस दिन प्रातः स्नान करके पूजा स्थल पर गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाना चाहिए। इस पर्वत पर श्रद्धापूर्वक अक्षत,चंदन, धूप, फूल आदि चढ़ाना चाहिए। पर्वत के सामने दीप जलाना चाहिए तथा पकवानों के साथ श्रीकृष्ण प्रतिमा की भी पूजा करनी चाहिए।

इसके बाद पकवान जैसे गुड़ से बनी खीर, पुरी, चने की दाल और गुड़ का भोग लगाकर गाय को खिलाना चाहिए तथा पूजा के पश्चात परिवार के सभी सदस्यों को भी भोग लगे हुए प्रसाद को ही सबसे पहले खाना चाहिए।

गोवर्धन पूजा की कथा श्रीकृष्ण काल से जुड़ी है। विष्णु पुराण के अनुसार ब्रज में इंद्र देव की पूजा करने का रिवाज था, जिसे समाप्त कर भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन की पूजा करना प्रारंभ किया था। श्रीकृष्ण जी का यह तर्क था कि इंद्रदेव तो वर्षा कर मात्र अपने कर्म को निभा रहे हैं लेकिन गोवर्धन पर्वत हमें ईंधन, फल आदि देकर हमारी सेवा भी करता है। इस बात पर देव इंद्र को बहुत क्रोध आया और उन्होंने ब्रज में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न कर दी।

बाढ़ से ब्रजवासी बड़े परेशान हो गए तथा अपने प्राण बचाने के लिए इधर -उधर भागने लगें। इस स्थिति में भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कानी ऊंगली पर उठा लिया, जिसके नीचे आकर सभी ब्रजवासियों ने अपने प्राण बचाए। इस घटना के बाद से ही गोवर्धन पर्वत की पूजा की परंपरा चली आ रही है।

मान्यता है कि इस दिन श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत की सहायता से इंद्र का घमंड चूर किया था तथा स्वयं गोवर्धन पर्वत ने ब्रजवासियों को अपने दर्शन देकर छप्पन भोग द्वारा उनकी भूख मिटायी थी। इस प्रकार गोवर्धन पूजा करने से घर में दरिद्रता का वास नहीं होता तथा घर हमेंशा धन और अन्न से भरा रहता है।

(कल भाई दूज है, अग्रिम बधाई और इस मांह के विभिन्न पर्व प्रसंगो पर लघु आलेख लेकर प्रस्तुत होते रहूंगा, प्रतिक्षा है आपके प्रतिक्रिया की)

- आचार्य पण्डित विनोद चौबे,

 संपादक - "ज्योतिष का सूर्य" राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई, मोबाईल नं. 9827198828

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मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

रुप चौदश का श्रृंगारवती महात्म्य

मित्रों, आज रुप चतुर्दशी या नरक चतुर्दशी और हनुमान जयंती एवं दारिद्र्य-खेदन आदि पर्व है, इस अवसर पर आज विशेष तौर पर आप सभी सनातनी श्रृंगारवती माताओं बहनों को रुप चतुर्दशी पर्व पर अनंत शुभकामनाएं ! एवं उन हर भारतीय आर्य नारियों, जनन कर्त्री जननियों जो समय समय पर १६ श्रृंगार करती हों उनको आचार्य पण्डित विनोद चौबे (9827198828) की ओर से सादर प्रणाम !!

साथियों, आज कार्तिक कृष्ण चौदस को यदि माताएं उबटन लगाकर स्नान करती हुई सोलह श्रृंगार करती हैं तो उनके पकियों की उम्र में वृद्धि होती है, आपने देखा होगा विश्व का एक ऐसा धर्म है जो बहुत तेजी से धर्मांतरण कराकर संक्रमण रोग की भांति हमारे भारतीय लोगों को आगोश में लेने बेताब है, इस धर्म से जुड़ीं महिलाओं को आपने देखा होगा, ये लोग कोई श्रृंगार नहीं करतीं, सिन्दूर तो बिल्कुल भी लगातीं है, तो इन महिलाओं के पतियों की उम्र या पारस्परिक पति-पत्नि के संबंधो की विश्वसनियता न के बराबर होता है, तभी तो इनके संतानों को ठीक ठीक अपने पिता का नाम भी पता नहीं होता ! तो मेरे देश की सनातनी श्रृंगारवती माताओं आप अपने पति के समक्ष श्रृंगार करके अवश्य उपस्थित हों ताकि आपके पति की आयु और प्रेम में वृद्धि हो सके ! कुल मिलाकर हमारे भारतीय संस्कृति में श्रृंगार का विशेष महत्व है मैं पुन: किसी अन्य आलेख में विस्तृत चर्चा करुंगा ! लेकिन आज के दिन ही भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था, इसलिये नरक चतुर्दशी भी कहते हैं ! आज ही कुछ पौराणिक संदर्भो के मुताबिक दक्षिणेश्वर महाकाल श्री हनुमान जी का जन्म हुआ था ! आज आप लोगों को यम के लिये १४ दीये अवश्य जलाना चाहिये !
अब आईये विस्तृत चर्चा करें हनुमान जयंती पर जो अलग अलग तिथियों में मनायी जाती हैं ! अभी कुछ दिन पूर्व हमारी यात्रा दक्षिण भारत के बेंगलोर की हुई थी बेंगलोर  के हृदय स्थल में स्थित हनुमान जी की ३५ फीट उंची भव्य प्रतिमा जहां बाद में एक मस्जिद का भी निर्माण करा दिया गया है, वहां हमने कुछ मंदिर के पुजारियों के द्वारा बताया गया कि दक्षिण भारत में मार्गशीर्ष माह के मूल नक्षत्र मे हनुमान जयंती मनायी जाती है, वहीं अपने छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश आदि तटवर्ती प्रदेशों में चैत्र शुक्ल पुर्णिमा को हनुमान जयंती मनायी जाती है, किन्तु इससे अलग वाराणसी यानी काशी प्रक्षेत्र में आज कार्तिक कृष्ण चौदश को ही भोर में हनुमान जयंती मनायी जाती है ! हमको याद है कि हम लोग  बीएचयू मे स्थित रुईया हॉस्टल से नरीया गेट से भगवान पुर वाले जंगल होते हुए संकटमोचन हनुमान मंदिर प्रसाद खाने पहुंच जाते थे ! वहां शुद्ध देशी घी का लड्डू और पेंड़ा तो मानों आज भी बरबस खिंचता है ! ज्ञात हो कि इस हनुमान जी के प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा स्वयं गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया था!
(कल आप लोगों को दीप पर्व से जुड़ीं कुछ अहम बातें बताउंगा साथ ही शुभ मुहूर्त भी, अधिक जानकारी के लिये आप मुझसे संपर्क करें आचार्य पण्डित विनोद चौबे, मोबाईल नं. 9827198828, भिलाई)

http://ptvinodchoubey.blogspot.in/2017/10/blog-post_17.html?m=1

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