ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

!!विशेष सूचना!!
नोट: इस ब्लाग में प्रकाशित कोई भी तथ्य, फोटो अथवा आलेख अथवा तोड़-मरोड़ कर कोई भी अंश हमारे बगैर अनुमति के प्रकाशित करना अथवा अपने नाम अथवा बेनामी तौर पर प्रकाशित करना दण्डनीय अपराध है। ऐसा पाये जाने पर कानूनी कार्यवाही करने को हमें बाध्य होना पड़ेगा। यदि कोई समाचार एजेन्सी, पत्र, पत्रिकाएं इस ब्लाग से कोई भी आलेख अपने समाचार पत्र में प्रकाशित करना चाहते हैं तो हमसे सम्पर्क कर अनुमती लेकर ही प्रकाशित करें।-ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे, सम्पादक ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका,-भिलाई, दुर्ग (छ.ग.) मोबा.नं.09827198828
!!सदस्यता हेतु !!
.''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका के 'वार्षिक' सदस्यता हेतु संपूर्ण पता एवं उपरोक्त खाते में 220 रूपये 'Jyotish ka surya' के खाते में Oriental Bank of Commerce A/c No.14351131000227 जमाकर हमें सूचित करें।

ज्योतिष एवं वास्तु परामर्श हेतु संपर्क 09827198828 (निःशुल्क संपर्क न करें)

आप सभी प्रिय साथियों का स्नेह है..

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

महाभारत के युद्ध में व्यूह रचनाएँ (चक्रव्यूह)............




 महाभारत के युद्ध में कौरवों और पांडवों द्वारा रचित व्यूह रचनाएँ
१. ये वज्र व्यूह है... महाभारत युद्ध के प्रथम दिन अर्जुन ने अपनी सेना को इस व्यूह के आकार में सजाया था... इसका आकार देखने में इन्द्रदेव के वज्र जैसा होता था अतः इस प्रकार के व्यूह को "वज्र व्यूह" कहते हैं!



 २. ये चक्रशकट व्यूह है... अभिमन्यु की हत्या के पश्चात जब अर्जुन, जयद्रथ के प्राण लेने को उद्धत हुए, तब गुरु द्रोणाचार्य ने जयद्रथ की रक्षा के लिए युद्ध के चौदहवें दिन इस व्यूह की रचना की थी!

३. ये मंडल व्यूह है... भीष्म पितामह ने युद्ध के सांतवे दिन कौरव सेना को इसी मंडल व्यूह द्वारा सजाया था... इसका गठन परिपत्र रूप में होता था... ये बेहद कठिन व्यूहों में से एक था... पर फिर भी पांडवों ने इसे वज्र व्यूह द्वारा भेद दिया था... इसके प्रत्युत्तर में भीष्म ने "औरमी व्यूह" की रचना की थी... इसका तात्पर्य होता है समुद्र... ये समुद्र की लहरों के समान प्रतीत होता था... फिर इसके प्रत्युत्तर में अर्जुन ने "श्रीन्गातका व्यूह" की रचना की थी... ये व्यूह एक भवन के समान दिखता था...
४. ये क्रौंच व्यूह है... क्रौंच एक पक्षी होता है... जिसे आधुनिक भाषा में Demoiselle Crane कहते हैं... ये सारस की एक प्रजाति है...इस व्यूह का आकार इसी पक्षी की तरह होता है... युद्ध के दूसरे दिन युधिष्ठिर ने पांचाल पुत्र को इसी क्रौंच व्यूह से पांडव सेना सजाने का सुझाव दिया था... राजा द्रुपद इस पक्षी के सर की तरफ थे, तथा कुन्तीभोज इसकी आँखों के स्थान पर थे... आर्य सात्यकि की सेना इसकी गर्दन के स्थान पर थे... भीम तथा पांचाल पुत्र इसके पंखो (Wings) के स्थान पर थे... द्रोपदी के पांचो पुत्र तथा आर्य सात्यकि इसके पंखो की सुरक्षा में तैनात थे...

इस तरह से हम देख सकते है की, ये व्यूह बहुत ताकतवर एवं असरदार था... पितामह भीष्म ने स्वयं इस व्यूह से अपनी कौरव सेना सजाई थी... भूरिश्रवा तथा शल्य इसके पंखो की सुरक्षा कर रहे थे... सोमदत्त, अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा इस पक्षी के विभिन्न अंगों का दायित्व संभाल रहे थे...
 ५. यही प्रसिद्ध चक्रव्यूह है... इसके बारे में सभी ने सुना है... इसकी रचना गुरु द्रोणाचार्य ने युद्ध के तेरहवें दिन की थी... दुर्योधन इस चक्रव्यूह के बिलकुल मध्य (Centre) में था... बाकि सात महारथी इस व्यूह की विभिन्न परतों (layers) में थे... इस व्यूह के द्वार पर जयद्रथ था... सिर्फ अभिमन्यु ही इस व्यूह को भेदने में सफल हो पाया... पर वो अंतिम द्वार को पार नहीं कर सका... तथा बाद में ७ महारथियों द्वारा उसकी हत्या कर दी गयी...

इसके व्यूह के बारे में ज्यादा चर्चा की आवश्यकता नहीं है... इस व्यूह का संपूर्ण विवरण आपको हर कही मिल जाएगा...


६. ये अर्धचन्द्र व्यूह है... इसकी रचना अर्जुन ने कौरवों के गरुड़ व्यूह के प्रत्युत्तर में की थी... पांचाल पुत्र ने इस व्यूह को बनाने में अर्जुन की सहायता की थी ... इसके दाहिने तरफ भीम थे... इसकी उर्ध्व दिशा में द्रुपद तथा विराट नरेश की सेनाएं थी... उनके ठीक आगे पांचाल पुत्र, नील, धृष्टकेतु, और शिखंडी थे... युधिष्ठिर इसके मध्य में थे... सात्यकि, द्रौपदी के पांच पुत्र, अभिमन्यु, घटोत्कच, कोकय बंधु इस व्यूह के बायीं ओर थे... तथा इसके अग्र भाग पर अर्जुन स्वयं सच्चिदानंद स्वरुप भगवन श्रीकृष्ण के साथ थे!
( http://mustknowtruth.blogspot.in/2013/09/blog-post.html से संकलन किया गया)

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

उत्तिष्ठोत्तिष्ठगोविन्द......देवोत्थान एकादशी

मित्रों, सुप्रभात आज योग निद्रा से देव जाग रहे हैं, इस मंगलमयी वातावरण में उनके आशीष के हम भागीदारी बनें...आईए उनका अभिवादन करें...

देवोत्थान एकादशी कार्तिक, शुक्ल पक्ष की एकादशी को कहते हैं। दीपावली के बाद आने वाली एकादशी को ही देवोत्थान एकादशी अथवा देवउठान एकादशी या 'प्रबोधिनी एकादशी' कहा जाता है। आषाढ़, शुक्ल पक्ष की एकादशी की तिथि को देव शयन करते हैं और इस कार्तिक, शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन उठते हैं। इसीलिए इसे देवोत्थान (देव-उठनी) एकादशी कहा जाता है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु, जो क्षीरसागर में सोए हुए थे, चार माह उपरान्त जागे थे। विष्णु जी के शयन काल के चार मासों में विवाहादि मांगलिक कार्यों का आयोजन करना निषेध है। हरि के जागने के बाद ही इस एकादशी से सभी शुभ तथा मांगलिक कार्य शुरू किए जाते हैं।

देव प्रबोधिनी एकादशी
भगवान विष्णु को चार मास की योग-निद्रा से जगाने के लिए घण्टा ,शंख,मृदंग आदि वाद्यों की मांगलिक ध्वनि के बीचये श्लोक पढकर जगाते हैं-

उत्तिष्ठोत्तिष्ठगोविन्द त्यजनिद्रांजगत्पते।
त्वयिसुप्तेजगन्नाथ जगत् सुप्तमिदंभवेत्॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठवाराह दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे।
हिरण्याक्षप्राणघातिन्त्रैलोक्येमङ्गलम्कुरु॥

श्रीहरिको जगाने के पश्चात् उनकी षोडशोपचारविधि से पूजा करें। अनेक प्रकार के फलों के साथ नैवेद्य (भोग) निवेदित करें। संभव हो तो उपवास रखें अन्यथा केवल एक समय फलाहार ग्रहण करें। इस एकादशी में रातभर जागकर हरि नाम-संकीर्तन करने से भगवान विष्णु अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। विवाहादिसमस्त मांगलिक कार्योके शुभारम्भ में संकल्प भगवान विष्णु को साक्षी मानकर किया जाता है। अतएव चातुर्मासमें प्रभावी प्रतिबंध देवोत्थान एकादशी के दिन समाप्त हो जाने से विवाहादिशुभ कार्य प्रारम्भ हो जाते हैं।पद्मपुराणके उत्तरखण्डमें वर्णित एकादशी-माहात्म्य के अनुसार श्री हरि-प्रबोधिनी (देवोत्थान) एकादशी का व्रत करने से एक हजार अश्वमेध यज्ञ तथा सौ राजसूय यज्ञों का फल मिलता है। इस परमपुण्यप्रदाएकादशी के विधिवत व्रत से सब पाप भस्म हो जाते हैं तथा व्रती मरणोपरान्त बैकुण्ठ जाता है। इस एकादशी के दिन भक्त श्रद्धा के साथ जो कुछ भी जप-तप, स्नान-दान, होम करते हैं,वह सब अक्षय फलदायक हो जाता है। देवोत्थान एकादशी के दिन व्रतोत्सवकरना प्रत्येक सनातनधर्मी का आध्यात्मिक कर्तव्य है।

इस एकादशी के दिन तुलसी विवाहोत्सव भी मानाया जाता है।इसके संदर्भ में कथा यह है कि जलंधर नामक असुर की पत्नी वृंदा पतिव्रता स्त्री थी. इसे आशीर्वाद प्राप्त था कि जब तक उसका पतिव्रत भंग नहीं होगा उसका पति जीवित रहेगा. जलंधर पत्नी के पतिव्रत के प्रभाव से विष्णु से कई वर्षों तक युद्ध करता रहा लेकिन पराजित नहीं हुआ तब भगवान विष्णु जलंधर का वेश धारण कर वृंदा के पास गये जिसे वृंदा पहचान न सकी और उसका पतिव्रत भंग हो गया. वृंदा के पतिव्रत भंग होने पर जलंधर मारा गया. वृंदा को जब सत्य का पता चल गया कि विष्णु ने उनके साथ धोखा किया है तो उन्होंने विष्णु को श्राप दिया कि आप पत्थर का बन जाओ.

वृंदा के श्राप से विष्णु शालिग्राम के रूप में परिवर्तित हो गये. उसी समय भगवान श्री हरि वहां प्रकट हुए और कहा आपका शरीर गंडक नदी के रूप में होगा व केश तुलसी के रूप में पूजा जाएगा. आप सदा मेरे सिर पर शोभायमान रहेंगी व लक्ष्मी की भांति मेरे लिए प्रिय रहेंगी आपको विष्णुप्रिया के नाम से भी जाना जाएगा. उस दिन से मान्यता है कि कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन भगवान शालिग्राम और तुलसी का विवाह करवाने से कन्यादान का फल मिलता है और व्यक्ति को विष्णु भगवान की प्रसन्नता प्राप्त होती है. पद्म पुराण में तुलसी विवाह के विषय में काफी विस्तार से बताया गया है।

 पौराणिक मान्यता
कहा जाता है कि चातुर्मास के दिनों में एक ही जगह रुकना जरुरी है, जैसा कि साधु संन्यासी इन दिनों किसी एक नगर या बस्ती में ठहरकर धर्म प्रचार का काम करते हैं। देवोत्थान एकादशी को यह चातुर्मास पूरा होता है और पौराणिक आख्यान के अनुसार इस दिन देवता भी जाग उठते हैं। माना जाता है कि देवशयनी एकादशी के दिन सभी देवता और उनके अधिपति विष्णु सो जाते हैं। फिर चार माह बाद देवोत्थान एकादशी को जागते हैं। देवताओं का शयन काल मानकर ही इन चार महीनों में कोई विवाह, नया निर्माण या कारोबार आदि बड़ा शुभ कार्य आरंभ नहीं होता। इस प्रतीक को चुनौती देते या उपहास उड़ाते हुए युक्ति और तर्क पर निर्भर रहने वाले लोग कह उठते हैं कि देवता भी कभी सोते हैं क्या श्रद्धालु जनों के मन में भी यह सवाल उठता होगा कि देवता भी क्या सचमुच सोते हैं और उन्हें जगाने के लिए उत्सव आयोजन करने होते हैं पर वे एकादशी के दिन सुबह तड़के ही विष्णु औए उनके सहयोगी देवताओं का पूजन करने के बाद शंख- घंटा घड़ियाल बजाने लगते हैं।

 देवोत्थान एकादशी की कथा
एक समय भगवान नारायण से लक्ष्मी जी ने कहा- 'हे नाथ! अब आप दिन-रात जागा करते हैं और सोते हैं तो लाखों-करोड़ों वर्ष तक को सो जाते हैं तथा उस समय समस्त चराचर का नाश भी कर डालते हैं। अत: आप नियम से प्रतिवर्ष निद्रा लिया करें। इससे मुझे भी कुछ समय विश्राम करने का समय मिल जाएगा।' लक्ष्मी जी की बात सुनकर नारायण मुस्काराए और बोले- 'देवी'! तुमने ठीक कहा है। मेरे जागने से सब देवों को और ख़ास कर तुमको कष्ट होता है। तुम्हें मेरी सेवा से जरा भी अवकाश नहीं मिलता। इसलिए, तुम्हारे कथनानुसार आज से मैं प्रति वर्ष चार मास वर्षा ऋतु में शयन किया करूंगा। उस समय तुमको और देवगणों को अवकाश होगा। मेरी यह निद्रा अल्पनिद्रा और प्रलयकालीन महानिद्रा कहलाएगी। यह मेरी अल्पनिद्रा मेरे भक्तों को परम मंगलकारी उत्सवप्रद तथा पुण्यवर्धक होगी। इस काल में मेरे जो भी भक्त मेरे शयन की भावना कर मेरी सेवा करेंगे तथा शयन और उत्पादन के उत्सव आनन्दपूर्वक आयोजित करेंगे उनके घर में तुम्हारे सहित निवास करूँगा।
-ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे 

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

दीपावली में सूर्यग्रहण का कोई प्रभाव नहीं...... जानिए दीपावली- पूजन एवं मुहूर्त की संपूर्ण जानकारी

दीपावली में सूर्यग्रहण का कोई प्रभाव नहीं......

जानिए दीपावली- पूजन एवं मुहूर्त की संपूर्ण जानकारी


-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका

सत्य ही सर्वप्रेरक, सर्वोत्पादक और प्रकाशमय परमात्मा परमोज्योति और शांतिमय है, जैसा कि संसार में प्रकाशमान यह सूर्य है। यह सूर्य सर्वोत्पादक परमात्मा तथा अपनी कांति से सुशोभित उषा के साथ एक रहकर प्रकाश पर्व दीपावली हमें अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा देता है। अतः आएँ इस दीपावली में अपने अंदर के अंधकार को हटाकर ज्ञान का दीप जलाएँ और सारे जगत को प्रकाशमय बनाएँ।
आप सभी सुहृद मित्रों को दीपावली की ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।
ॐ अग्रिर्ज्योतिर्ज्योतिरग्रिः स्वाहा। सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा। अग्रिर्वर्चो ज्योतिवर्चः स्वाहाः। सूर्योवर्चो ज्योतिर्वर्चःस्वाहा। ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा।

गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

आरोग्यता के साथ ही धन-समृद्धि का आगमन होगा शरद पुर्णिमा को......

ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, 
संपादक- ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई, 98271- 98828
 18 अक्टूबर 2013 को चंद्र 16 कलाओं से पूर्ण अपनी धवल प्रकाश से आच्छादित गगन में विराजित चंद्र न केवल अमृत की वर्षा करते हैं बल्कि आरोग्यता, सुख, सौभाग्य लक्ष्मी और अचल संपत्ति को भी अपने भक्तों को प्रदान करते हैं। शरद पूर्णिमा के शुभ अवसर पर सुबह उठकर व्रत करके अपने इष्ट देव का पूजन करना चाहिए। इन्द्र और महालक्ष्मी जी का पूजन करके घी के दीपक जलाकर, गंध पुष्प आदि से पूजन करना चाहिए। ब्राह्मणों को खीर का भोजन कराना चाहिए और उन्हें दान दक्षिणा प्रदान करनी चाहिए। लक्ष्मी प्राप्ति के लिए इस व्रत को विशेष रूप से किया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन जागरण करने वाले की धन-संपत्ति में वृद्धि होती है।

* इस व्रत को मुख्य रूप से स्त्रियों द्वारा किया जाता है।
* उपवास करने वाली स्त्रियां इस दिन लकड़ी की चौकी पर सातिया बनाकर पानी का लोटा भरकर रखती हैं।
* एक गिलास में गेहूं भरकर उसके ऊपर रुपया रखा जाता है और गेहूं के 13 दाने हाथ में लेकर कहानी सुनी जाती है।
* गिलास और रुपया कथा कहने वाली स्त्रियों को पैर छूकर दिए जाते हैं।

 ज्योतिष के अनुसार
मीन राशि में चंद्र, मिथुन में वृहस्पति, सूर्य, बुध, शनि और राहु तुला राशि में तथा नवमांश में चन्द्र वृश्चिक राशि में होंगे जो नवपंचम योग बना रहे हैं अत: कफ, वात दोनों रोग से पिड़ीत जनों के लिए आज के दिन औषधी ग्रहण करना बेहद लाभकारी सिद्ध होगा । साथ ही समुद्र के देवता वरुण के साथ लक्ष्मी, कुबेर का पूजन करना धन, समृद्धि के साथ दामपत्य जीवन के संबंधों में प्रेमामृत की भरपूर पूर्ति करेगा। अत: आज की रात्रि बेहद शुभकारक है।

शरद पूर्णिमा
शरद पूर्णिमा जिसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहते हैं हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा को कहते हैं। यूं तो हर माह में पूर्णिमा आती है लेकिन शरद पूर्णिमा का महत्व उन सभी से कहीं अधिक है। हिंदू धर्म ग्रंथों में भी इस पूर्णिमा को विशेष बताया गया है। ज्?योतिष के अनुसार, पूरे साल में केवल इसी दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। हिन्दी धर्म में इस दिन कोजागर व्रत माना गया है। इसी को कौमुदी व्रत भी कहते हैं। इसी दिन श्री कृष्ण ने महारास रचा था। शरद पूर्णिमा से जुड़ी कई मान्यताएं हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चंद्रमा की किरणें विशेष अमृतमयी गुणों से युक्त रहती हैं जो कई बीमारियों का नाश कर देती हैं। यही कारण है कि शरद पूर्णिमा की रात को लोग अपने घरों की छतों पर खीर रखते हैं जिससे चंद्रमा की किरणें उस खीर के संपर्क में आती है और उसके बाद उस खीर का सेवन किया जाता है। कुछ स्थानों पर सार्वजनिक रूप से खीर का प्रसाद भी वितरण किया जाता है।

कथा
एक साहुकार के दो पुत्रियाँ थी। दोनो पुत्रियाँ पुर्णिमा का व्रत रखती थी। परन्तु बडी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधुरा व्रत करती थी। परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की सन्तान पैदा ही मर जाती थी। उसने पंडितो से इसका कारण पूछा तो उन्होने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी जिसके कारण तुम्हारी सन्तान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पुरा विधिपुर्वक करने से तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती है।
उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। उसके लडका हुआ परन्तु शीघ्र ही मर गया। उसने लडके को पीढे पर लिटाकर ऊपर से पकडा ढक दिया। फिर बडी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पीढा दे दिया। बडी बहन जब पीढे पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया। बच्चा घाघरा छुते ही रोने लगा।बडी बहन बोली- तु मुझे कंलक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता। तब छोटी बहन बोली, यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है। उसके बाद नगर में उसने पुर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।

विधान
इस दिन मनुष्य विधिपूर्वक स्नान करके उपवास रखे और जितेन्द्रिय भाव से रहे। धनवान व्यक्ति ताँबे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढँकी हुई स्वर्णमयी लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करके भिन्न-भिन्न उपचारों से उनकी पूजा करें, तदनंतर सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के घी से भरे हुए 100 दीपक जलाए।इसके बाद घी मिश्रित खीर तैयार करे और बहुत-से पात्रों में डालकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखें। जब एक प्रहर (3 घंटे) बीत जाएँ, तब लक्ष्मीजी को सारी खीर अर्पण करें। तत्पश्चात भक्तिपूर्वक सात्विक ब्राह्मणों को इस प्रसाद रूपी खीर का भोजन कराएँ और उनके साथ ही मांगलिक गीत गाकर तथा मंगलमय कार्य करते हुए रात्रि जागरण करें। तदनंतर अरुणोदय काल में स्नान करके लक्ष्मीजी की वह स्वर्णमयी प्रतिमा आचार्य को अर्पित करें। इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं और मन ही मन संकल्प करती हैं कि इस समय भूतल पर कौन जाग रहा है? जागकर मेरी पूजा में लगे हुए उस मनुष्य को मैं आज धन दूँगी।
यथासंभव शाम या रात ही नहीं, सुबह भी इस मंत्र से मां लक्ष्मी का ध्यान कर लाल गंध, लाल अक्षत, लाल फूल, दूध की मिठाई या खीर का नैवेद्य अर्पित कर पूजा करें -
भवानि त्वं महालक्ष्मी: सर्वकामप्रदायिनी। सुपूजिता प्रसन्ना स्यान्महालक्ष्मि नमोस्तुते।।
नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरिप्रिये। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा में भूयात् त्वदर्चनात्।।

ध्यान व पूजा के बाद लाल आसन पर पूर्व दिशा में मुख कर बैठ मां लक्ष्मी के इस सरल मंत्र का यथाशक्ति जप करें। बाद आरती करें -
पुत्रपौत्रं धनं धान्यं हस्त्यश्वादिगवेरथम् प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे।
इस प्रकार प्रतिवर्ष किया जाने वाला यह कोजागर व्रत लक्ष्मीजी को संतुष्ट करने वाला है। इससे प्रसन्न हुईं माँ लक्ष्मी इस लोक में तो समृद्धि देती ही हैं और शरीर का अंत होने पर परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं।
(लेखक ज्योतिष एवं वास्तु पर आधारीत राष्ट्रीय मासिक पत्रिका ''ज्योतिष का सूर्य'' के संपादक एवं धर्म-संस्कृति के लिए पूर्णत: समर्पित धर्म-सचेतक हैं)
Jyotish ka surya

शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

अष्ट सिद्ध, नव नीधियों को प्राप्त करने का महापर्व विजया दशमी (हर मंत्र सिद्ध होंगी, और मनोकामनाएँ होगी पूर्ण)


Pandit Vinod Choubey,''JYOTISH KA SURYA''
विजयादशमी के पावन पर्व पर आप सभी को ढ़े सारी शुभकामनाएँ
मित्रों रविवार को यानी कल मंत्र सिद्ध करने का महापर्व है, आप लोग अपनी तैयारी आज ही कर लें..कल की साधना बहुफलदायी होती है, परन्तु मंत्र साधना आत्मकल्याणक होना चाहिए...पूर्वाग्रह, प्रतिशोधात्मक, ईर्ष्या और द्वेषपूर्ण लक्ष्य की प्राप्ति हेतु किये गये साधना अथवा प्रयंक्त मंत्रों की सिद्धी नहीं होती है।
धन, ऐश्वर्य, समृद्धि, वैभव, व्यापरिक उन्नति, राजनीतिक,, आर्थिक, सामाजिक उन्नति के लिए दुगा सप्तशती में अनेक मंत्र बताया गया है साथ ही मंत्रमहोदधि, मंत्र-संहिता, कल्प-तंत्र एवं तमाम तंत्र ग्रंथों में भिन्न मंत्रों को विस्तृत बताया गया है अपने मनोकामना के अनुसार मंत्रों का चयन कर आप विजया दशमी के दिन उन मंत्रों का जाप करके अपनी कामना पूर्ण करने की भगवती से आशीर्बाद प्राप्त कर सकते हैं।
क्योंकि ज्योतिष के अनुसार मोहरात्रि (जन्माष्टमी), कालरात्रि (नरक चतुर्दशी), दारूण रात्रि (होली) और अहोरात्रि (शिवरात्रि) इन पर्वों के दिन किया गया ध्यान-भजन, जप-तप अनंत गुना फल देता है।
वर्ष प्रतिपदा (चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा या गुड़ी पड़वा), अक्षय तृतिया (वैशाख शुक्ल तृतिया) व विजयादशमी (आश्विन शुक्ल दशमी या दशहरा) ये पूरे तीन मुहूर्त तथा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (बलि प्रतिपदा) का आधा – इस प्रकार साढ़े तीन मुहूर्त स्वयं सिद्ध हैं (अर्थात् इन दिनों में कोई भी शुभ कर्म करने के लिए पंचांग-शुद्धि या शुभ मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं रहती)। ये साढ़े तीन मुहूर्त सर्वकार्य सिद्ध करने वाले हैं।
(बालबोधज्योतिषसारसमुच्चयः 7.79.80)

बुधवार, 9 अक्तूबर 2013

क्या आपको राजनीतिक सफलता मिलेगी..?? इसका उत्तर अब्दुल रहीम खानखाना जी के जुबानी जानिए.........

Jotish Ka Surya

क्या आपको राजनीतिक सफलता मिलेगी..?? 

इसका उत्तर अब्दुल रहीम खानखाना जी के जुबानी जानिए.........


सदा से ही मनुष्य की यह जानने की इच्छा रही है कि उसका भाग्य कब व कैसे उदय होगा? भविष्य कैसा होगा? वर्तमान की स्थिति क्या है? जीवन में सफलता व असफलता कब-कब व किस-किस मात्रा में प्राप्त होगी?
गृहस्थ जीवन, आर्थिक स्थिति, नौकरी या व्यापार, लॉटरी आदि ऐसे भी प्रश्न हैं जिनका हल मनुष्य चाहता है, और इसके लिये वह यहाँ-वहाँ भटकता है। परन्तु इन सभी समस्याओं का हल यदि है तो वह केवल ज्योतिष के पास। ज्योतिषी के पास जाकर मनुष्य दो बातें जानने को विशेष ही उत्सुक रहता है- एक अर्थ व दूसरा भाग्य। मैं यहाँ इन्हीं दो भावों पर अर्थात् नवम एवं द्वितीय भाव पर ही इस लेख को केन्द्रित रखना चाहूँगा।
देश के 13वें राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की कुण्डली में मालव्य नामक राजयोग मौजूद है। इसके अलावा इनकी कुण्डली में बुधादित्य योग, ब्रह्म योग जैसे कई शुभ योग मौजूद हैं। आमिर खान, शाहरूख खान, कैटरीना कैफ- ये वो नाम हैं जिनकी कुण्डली में शश नामक राजयोग बना हुआ है।

लोकसभा में विपक्ष के नेता आडवाणी की कुण्डली में विपरीत राज योग है और गुजरात के मुख्यमंत्री की कुण्डली में रूचक नामक राजयोग मौजूद है। अगर आपकी कुण्डली में भी इस प्रकार का कोई राज योग मौजूद है तो आप भी इन कामयाब हस्तियों की तरह सफल व्यक्ति बन सकते हैं।

कैसे बनता है कुण्डली में राजयोग

जैसे ही आपको यह पता लग जाएगा कि आपकी कुंडली में कौन सा राजयोग है, आप उसका अपने जीवन पर प्रभाव जांच सकते हैं। आगे हम विभिन्न राजयोग के बारे में चर्चा करेंगे।

शश राजयोग

शनि जब अपनी राशि यानी मकर या कुंभ में होता है अथवा अपनी उच्च राशि तुला में होता है तब शश नामक योग बनता है। इस योग में जन्म लेने वाले व्यक्ति धीरे धीरे सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए समाज में यश और प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं।

मालव्य राजयोग

वृष, तुला अथवा मीन राशि में जब शुक्र होता है तब मालव्य नामक योग बनता है। इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति सुन्दर और सौभाग्यशाली होता है। प्रसिद्धि इनके साथ-साथ चलती है। ऐसा व्यक्ति जो भी काम करता है उसमें भाग्य पूरा साथ देता है।

रूचक राजयोग

यह राजयोग तब बनता है जब मंगल मकर राशि अथवा अपनी राशि मेष या वृश्चिक में केन्द्र स्थान में होता है। यह योग जिनकी कुण्डली में होता है वह बहुत ही साहसी होते हैं और कभी किसी दबाव में आकर कोई काम नहीं करते हैं। ऐसे व्यक्ति जहां भी होते हैं लोग इन्हें सम्मान देते हैं। यह राजा के समान शानो-शौकत से रहते हैं।

हंस राजयोग

कुण्डली में गुरू जब धनु, मीन अथवा कर्क में राशि में होता है तब हंस नामक राजयोग बनता है। ऐसा व्यक्ति पढ़ने-लिखने में बहुत ही बुद्धिमान होता है। इनकी निर्णय क्षमता अच्छी होती है। राजनीतिक सलाहकार, शिक्षण अथवा प्रबंधन के क्षेत्र में ऐसे लोग बहुत ही कामयाब होते हैं। इनका जीवन वैभवपूर्ण होता है।

भद्र राजयोग

यह योग बुध बनाता है जब वह मिथुन या कन्या राशि में होता है। यह योग जिनकी कुण्डली में होता है वह काफी बुद्धिमान और व्यवहार कुशल होते हैं। अपने व्यवहार और बुद्धि से लोगों से प्रशंसा प्राप्त करते हैं। बुद्धि और चतुराई से ऐसे लोग कार्य क्षेत्र में उच्च पद प्राप्त करते हैं।
 

भाग्योदय एवं द्वितीय एवं नवम भाव

 
द्वितीय भाव से वह द्रव्य जो पैत्रिक संपत्ति के रूप में प्राप्त होता है, का ज्ञान प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त इस भाव से कुटुम्ब, स्नेही, भाषण कला, सुखभोग, मृत्यु के कारण, प्रारम्भिक शिक्षा आदि का ज्ञान भी प्राप्त किया जाता है। हर उस विद्वान को जो ज्योतिष विषय में रुचि रखता हो, सर्वप्रथम निम्न बातों को अवश्य ध्यान में रखना चाहिये -
  •     दूसरे भाव की राशि।
  •     द्वितीय स्वामी व उसकी स्थिति।
  •     दूसरे भाव में स्थित ग्रह।
  •     द्वितीय या द्वितीयेश पर दृष्टि।
  •      कारक, अकारक एवं तटस्थ ग्रह।
  •      विशेष योग।
  •      मैत्री व शत्रुता।

यदि इस स्थान में मेष राशि है तो वह व्यक्ति आर्थिक मामलों में अनिश्चित रहता है। धन जिस प्रकार आता है उसी प्रकार खर्च भी हो जाता है। भाग्योदय विवाह के उपरांत होता है, परन्तु स्त्री से अनबन सदैव रहती है। इनकी प्रवृत्ति प्रदर्शनमय रहती है।
द्वितीय स्थान में वृषभ राशि होने पर अर्थ संचय होता है, पर टिकता नहीं। जीवन में कठिनाइयाँ कभी साथ नहीं छोड़तीं। जीवन में 18, 22, 24, 33, तथा 35वाँ वर्ष सफल कहा जा सकता है।
मिथुन राशि आर्थिक स्थिति को कमजोर बनाती है। जातक की भावुकता अर्थ लाभ में बाधक बनी रहती है। ये जातक व्यापार में सफल रहते हैं तथा छोटे लघु उद्योग, शिक्षा आदि के क्षेत्रों में ही सफलता प्राप्त करते हैं।
कर्क राशि कजूंसी की सूचक है। परिश्रम के अनुपात में जातक को लाभ नहीं मिलता। 20, 26, 27, 33, 34, 36, 45, 53, एवं 54वाँ वर्ष महत्वपूर्ण रहता है।
सिंह राशि द्वितीय भाव में होने पर बाल्यकाल आनन्दमय निकलता है। मध्यआयु में ये धन उड़ा देते हैं या व्यापार आदि में हानि होती है तथा भाग्य हमेशा इन्हें साथ देता है।
कन्या राशि होने पर जातक सम्पन्न नहीं होता। प्रारंभिक काल अर्थ संकट में गुजारते हुये परिश्रम से अर्थोपार्जन करते हैं। गर्म मिजाज व शीघ्र निर्णय हानि करवाता है। इन्हें व्यापार विशेष कर श्रृंगारिक वस्तुओं से लाभ होता है।
तुला राशि होने पर जातक शानो-शौकत में धन अधिक खर्च करता है, व्यापार इन्हें लाभ देता है। ये च्संद बना सकते हैं, पर निभा नहीं सकते। धन अनुचित कार्यों में व्यय होता है पर भाग्य फिर भी साथ देता है।
इस भाव में वृश्चिक राशि हो तो जातक के जीवन को डावांडोल कर देती है। नौकरी इन्हें हितकर नहीं होती। प्रवृत्ति वाणिज्य प्रधान होती है। कुटुम्ब व स्नेही ही इन्हें हानि देते हैं।
धनु राशि दूसरे घर में हो तो जातक लापरवाह होता है। साझेदारी इन्हें हानिकारक होती है। सहयोगी सदैव धोखा देते हैं। जीवन में कई उजार-चढ़ाव आते हैं। 24, 27, 28, 32, से 34, 37, 42, 48, 52, 54 तथा 58वाँ वर्ष उत्तम रहता है।
मकर राशि द्वितीय भाव में होने पर जातक सौभाग्यशाली होते हैं। ये हर योजना में सफल रहते हैं, इन्हें चाहिये कि ये स्वतन्त्र व्यापार करें।
कुंभ राशि होने पर भी जातक सम्पन्न होता है। इनकी आय के स्त्रोत कई होते हैं। पत्रकारिता, लेखन, प्रकाशन, व्यापार, राजनीति के कार्यों में लाभ प्राप्त करते हैं। अधिक विश्वासी इन्हें धोखा देता है, उत्तरार्ध जीवन को बनाता है।
मीन राशि दूसरे भाव में होने पर 22, 24, 28, 32, 33, 34, 37, 42, 48, 52, 54 एवं 55 वाँ वर्ष महत्वपूर्ण होता है। इन्हें अपने मनोभावों व विचारों पर नियंत्रण नहीं होता। ये जातक डॉक्टरी, वैद्यक दवाइयों के विक्रेता बनकर धन प्राप्त कर सकते हैं। यह धन संग्रह करने में सिद्ध हस्त होते हैं।

अब आगे की पक्तियों में द्वितीय भावस्थ ग्रहों का फल स्पष्ट करने का प्रयास करूंगा-
द्वितीय भाव में सूर्य
 घन के संबंध में चिन्तित, पितृअर्जित धन नहीं मिलता, उत्तरार्ध-पूर्वाद्ध से सफल होता है। मध्यकाल में रोग, व्यापारिक कार्यों में सफल होते हैं।
द्वितीय भाव में चंद्र – 
 सुखी, सम्पन्न, वृहद परिवार, स्त्रीपक्ष से सौभाग्यशाली, स्त्रीपक्ष के सम्पर्क से धनोपार्जन। चंद्रमा व्यक्ति को पत्रकार या लेखक बनाता है। पुस्तक व्यवसाय, प्रकाशन या लेखन से भाग्योदय होता है।
द्वितीय भाव में मंगल – 
दूसरे भाव में मंगल कमजोर आर्थिक स्थिति, धन गतिमान, कमजोर विद्या क्षेत्र, वार्तालाप मे पटु बनाता है। ऐसे जातक सेल्समेन बन सकते हैं।
द्वितीय भाव में बुध
 कट्टर धर्म प्रिय, अर्थ संचय में प्रवीण, भाषण कला में दक्ष।
द्वितीय भाव में गुरू
 दूसरे भाव में गुरू हो तो जातक धार्मिक नेता बनता है। कवि, लेखक या धर्मोपदेशक। लेखन कार्य से अर्थाेंपार्जन। सफल वैज्ञानिक हो सकता है। स्त्री पक्ष प्रबल ससुराल से अर्थ लाभ।
द्वितीय भाव में शुक्र
 बड़ा परिवार, काम निकालने में चतुर, अर्थाभाव इन्हें कभी नहीं होता। ऐसे व्यक्ति डॉक्टर, वैद्य, पत्रकार या व्यवसायी होते हैं।
द्वितीय भाव में शनि – 
यह शुभ सूचक नहीं होता। यदि शनि स्वग्रही न हो तो जातक को धनहीन, परेशान व दुःखी करता है। धन के लिये संघर्ष करना पड़ता है। पर शनि स्वग्रही बन द्वितीय स्थानस्थ हो तो जातक का बाल्यकाल दुःख व अभाव में व्यतीत होता है परंतु युवावस्था तथा वृद्धावस्था शुभ सूचक होती है। अर्थ का आभाव नहीं रहता है।
द्वितीय भाव में राहु
 जातक रोगी, स्वभाव से चिड़चिड़ा, कष्टप्रद, छोटे परिवार की स्थिति वाला होता है।
द्वितीय भाव में केतु
 कटुभाषी धोखा देने वाला, दृढ़ निश्चयी। पिता की संपत्ति इन्हें कभी प्राप्त नहीं होती। उत्तरार्द्ध सुन्दर व धन सूचक। यदि सूर्य उच्च का होकर 11 वें भाव में हो तो जातक लखपति बनता है।

कुण्डली के राजयोग

    यदा मुश्तरी कर्कटे वा कमाने, अगर चश्मखोरा पड़े आयुखाने।
    भला ज्योतिषी क्या लिखेगा पढ़ेगा, हुआ बालका बादशाही करेगा।।
उत्तरकालामृत ग्रन्थ में उल्लेखित यह ज्योतिषीय खोज अब्दुल रहीम खानखाना की है जो की मुगल काल के विद्वान थे। सैकड़ो वर्ष के उपरांत आज भी यह खोज सत्य ही प्रतीत होती है। इस ज्योतिषीय योग से स्पष्ट है कि यदि 2, 3, 5, 6, 8, 9 तथा 11, 12 में से किसी स्थान में बृहस्पति की स्थिति हो, और शुक्र 8वें स्थान में हो तो ऐसी ग्रह स्थिति में जन्म लेने वाला जातक चाहे साधारण परिवार में ही क्यों न जन्मा हो, वह राज्याधिकारी ही बनता है। यही कारण है कि कभी-कभी अत्यंत साधारण परिवार के बालकों में भी राजसी लक्षण पायें जाते हैं और वे किसी न किसी दिन राज्य के अधिकारी घोषित किये जाते हैं। विभिन्न योगों के अनुसार ही मनुष्य की चेष्टायें और क्रियायें विकसित होती हैं इस विषय पर विभिन्न शास्त्रों का भी उल्लेख दर्शनीय है। सर्वप्रथम ज्योतिष शास्त्र को लीजिये उसमें राजयोग के लक्षण इस प्रकार बतलाये गये हैं।

    जिस व्यक्ति के पैर की तर्जनी उंगली में तिल का चिन्ह हो वह पुरूष राज्य-वाहन का अधिकारी होता है।
    जिसके हाथ की उंगलियांे के प्रथम पर्व ऊपर की ओर अधिक झुके हों वह जनप्रिय तथा नेतृत्व करने वाला होता है।
    जिसके हाथ मंे चक्र, दण्ड एवं छत्रयुक्त रेखायें हों वह व्यक्ति निसंदेह राजा अथवा राजतुल्य होता है।
    जिसके मस्तिष्क मंे सीधी रेखायें और तिलादि का चिन्ह हो वह राजा के समान ही सुख को प्राप्त करता है और उसमें बैद्धिक कुशलता भी पर्याप्त मात्रा में होती है।

किन्तु वृहज्जातक के अनुसार राजयोग के बारह प्रकार होते हैं-

    तीन ग्रह उच्च के होने पर जातक स्वकुलानुसार राजा होता है। यदि उच्चवर्ती तीन पापग्रह हों तो जातक क्रूर बुद्धि का राजा होता है और शुभ ग्रह होने पर सद्बुद्धि युक्त। उच्चवर्ती पाप-ग्रहों से राजा की समानता करने वाला होता है, किन्तु राजा नहीं होता।
    मंगल, शनि, सूर्य और गुरू चारों अपनी-अपनी उच्च राशियों में हों, और कोई एक ग्रह लग्न में उच्चराशि का हो तो चार प्रकार का राजयोग होता है। चन्द्रमा कर्क लग्न में हो और मंगल, सूर्य तथा शनि और गुरू में से कोई भी दो ग्रह उच्च हों तो, भी राजयोग होता है। जैसे- मेष लग्न में सूर्य, कर्क में गुरू, तुला का शनि और मकर राशि मंे मंगल भी प्रबल राजयोग कारक हैं। कर्क लग्न से दूसरा, तुला से तीसरा, मकर से चौथा जो तीन ग्रह उच्च के हों जैसे मेष में सूर्य, कर्क में गुरू, तुला में शनि तो भी राजयोग माना जाता है।
    शनि कुंभ में, सूर्य मेष में, बुध मिथुन में, सिंह का गुरू और वृश्चिक का मंगल तथा शनि सूर्य और चन्द्रमा में से एक ग्रह लग्न में हो तो भी पांच प्रकार का राजयोग माना जाता है। सूर्य बुध कन्या में हो, तुला का शनि, वृष का चंद्रमा और तुला में शुक्र, मेष में मंगल तथा कर्क में बृहस्पति भी राजयोगप्रद ही मानेजाते हैं। मंगल उच्च का सूर्य और चन्द्र धनु में और लग्न में मंगल के साथ यदि मकर का शनि भी हो तो मनुष्य निश्चित ही राजा होता है। शनि चन्द्रमा के साथ सप्तम में हो और बृहस्पति धनु का हो तथा सूर्य मेष राशि का हो और लग्न में हो तो भी मनुष्य राजा होता है। वृष का चन्द्रमा लग्न में हो और सिंह का सूर्य तथा वृश्चिक का बृहस्पति और कुंभ का शनि हो तो मनुष्य निश्चय ही राजा होता है। मकर का शनि, तीसरा चन्द्रमा, छठा मंगल, नवम् बुध, बारहवां बृहस्पति हो तो मनुष्य अनेक सुंदर गुणों से युक्त राजा होता है।
    धनु का बृहस्पति चंद्रमा युक्त क्र अपने-अपने उच्च में लग्न गत हों तो जातक गुणावान राजा होता है। और मंगल मकर का और बुध शुक्र अपने-अपने उच्च में लग्न गत हों तो जातक गुणावान राजा होता है।
    मंगल शनि पंचम गुरू और शुक्र चतुर्थ तथा कन्या लग्न में बुध हों तो जातक गुणावान राजा होता है।
    मीन का चंद्रमा लग्न में हो, कुंभ का शनि, मकर का मंगल, सिंह का सूर्य जिसके जन्म कुण्डली में हों वह जातक भूमि का पालन करने वाला गुणी राजा होता है।
    मेष का मंगल लग्न में, कर्क का बृहस्पति हो तो जातक शक्तिशाली राजा होता है। कर्क का गुरू लग्न में हो और मेष का मंगल हो तो जातक गुणवान राजा होता है।
    कर्क लग्न में बृहस्पति और ग्याहरवें स्थान में वृष का चंद्रमा शुक्र, बुध और मेष का सूर्य दशम स्थान में होने से जातक पराक्रमी राजा होता है।
    मकर लग्न में शनि, मेष लग्न में मंगल, कर्क का चन्द्र, सिंह का सूर्य, मिथुन का बुध और तुला का शुक्र होने से जातक यशस्वी व भूमिपति होता है।
    कन्या का बुध लग्न में और दशम शुक्र सप्तम् बृहस्पति तथा चन्द्र ो भी जातक राजा होता है। हो और शनि मंगल पंचम हों तो भी जातक राजा होता है। जितने भी राजयोग हैं इनके अन्तर्गत जन्म पाने पर मनुष्य चाहे जिस जाति स्वभाव और वर्ण का क्यों न हो वे राजा ही होता है। फिर राजवंश में जन्म प्राप्त करने वाले जातक तो चक्रवर्ती राजा तक हो सकते हैं। किन्तु अब कुछ इस प्रकार के योगों का वर्णन किया जा रहा है जिनमंे केवल राजा का पुत्र ही राजा होता है तथा अन्य जातियों के लोग राजा तुल्य होते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि राजा का पुत्र राजा ही हो उसके लिये निम्नलिखित में से किसी एक का होना नितांत आवश्यक है कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि राजवंश में जन्म पाने वाला जातक भी सामान्य व्यक्ति होता है और सामान्य वंश और स्थिति में जन्म पाने वाला महान हो जाता है उसका यही कारण है।
    यदि त्रिकोण में 3-4 ग्रह बलवान हों तो राजवंशीय राजा होते हैं। जब 5-6-7 भाव में ग्रह उच्च अथवा मूल त्रिकोण में हों तो अन्य वंशीय जातक भी राजा होते हैं। मेष के सूर्य चंद्र लग्नस्थ हों और मंगल मकर का तथा शनि कुंभ का बृहस्पति धनु का हो तो राजवंशीय राजा होता है। यदि शुक्र 2, 7 राशि का चतुर्थ भाव में और नवम स्थान में चंद्रमा हो और सभी ग्रह 3,1,11 भाव में ही हों तो ऐसा जातक राजवंशीय राजा होता है। बलवान बुध लग्न में और बलवान शुक्र तथा बृहस्पति नवम स्थान में हो और शेष ग्रह 4, 2, 3, 6, 10, 11 भाव में ही हों तो ऐसा राजपुत्र धर्मात्मा और धनी-मानी राजा होता है। यदि वृष का चंद्रमा लग्न में हो और मिथुन का बृहस्पति, तुला का शनि और मीन राशि में अन्य रवि, मंगल, बुध तथा शुक्र ग्रह हों तो राजपुत्र अत्यंत धनी होता है। दशम चन्द्रमा, ग्याहरवां शनि, लग्न का गुरू, दूसरा बुध और मंगल, से राजपुत्र राजा ही होेता है। किंतु यदि मंगल शनि लग्न में चतुर्थ चंद्रमा और सप्तम बृहस्पति, नवम, शुक्र, दशम सूर्य, ग्यारहवें बुध हो तो भी यही फल होता है। चतुर्थ में सूर्य और शुक्र होने से राजपुत्र राजा ही होेता है। किंतु यदि मंगल शनि लग्न में चतुर्थ चंद्रमा और सप्तम बृहस्पति, नवम, शुक्र, दशम सूर्य, ग्यारहवें बुध हो तो भी यही फल होता है। एक बात सबसे अधिक ध्यान देने की यह है कि राजयोग का निर्माण करने वाले समस्त ग्रहों में से जो ग्रह दशम तथा लग्न में स्थित हों तो, उनकी अन्तर्दशा में राज्य लाभ होगा जब दोनों स्थानों में ग्रह हों तो उनसे भी अधिक शक्तिशाली राज्य लाभ होगा, उसके अन्तर्दशा में जो लग्न दशम में हों अनेक ग्रह हों तो उनमें जो सर्वाेत्तम बली हो उसके प्रभाव के द्वारा ही राज्य का लाभ हो सकेगा। बलवान ग्रह द्वारा प्राप्त हुआ राज्य भी छिद्र दशा द्वारा समाप्त हो जाता है। यह जन्म कालिक शत्रु या नीच राशिगत ग्रह की अन्तर्दशा छिद्र दशा कहलाती है। जो राज्य को समाप्त करती है अथवा बाधायें उपस्थित करती है।
    यदि बृहस्पति, शुक्र और बुध की राशियां 4, 12, 6, 2, 3, 6 लग्न में हों और सातवां शनि तथा दशम सूर्य हो तो भी मनुष्य धन रहित होकर भी भाग्यवान होता है और अच्छे साधन उसके लिये सदा उपलब्ध होते हैं। यदि केन्द्रगत ग्रह पाप राशि में हों और सौम्य राशियों में पापग्रह होें तो ऐसा मनुष्य चोरों का राजा होता है। इस प्रकार से विभिन्न राजयोगों के होने पर मनुष्य सुख और ऐश्वर्य का भोग करता है।
-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक-ज्योतिष का सूर्य, राष्ट्रीय मासिक पत्रिका,  भिलाई-09827198828

गुरुवार, 3 अक्तूबर 2013

घोड़े पर सवार होकर आयेंगी माँ दुर्गा - ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे,

MAA DURGA_Jyotish Ka Surya (Pandit Vinod Choubey)

Pandit Vinod Choubey (Jyotish Ka Surya)

 अश्व पर सवार होकर आयेंगी माँ दुर्गा

मित्रों, नमस्कार सर्वप्रथम आप सभी को शक्ति आराधना के इस महानुष्ठान (यज्ञ) नवरात्रि पर्व  की हार्दिक शुभकामनाएँ...5 अक्टूबर 2013 से शारदीय नवरात्रि आरंभ हो रही है, जो इस बार माँ दुर्गा का रुप कुछ अलग है और ग्रहों की भी स्थिति कुछ विलक्षण रुप में देश के केन्द्रीय सत्ता को उलट-पुलट करने वाली साबित होगी। आईए इस विषय पर चर्चा विस्तृत रुप में करने का प्रयास करते हैं...मुझे विश्वास है कि आपको अवश्य रुचिकर और आनुष्ठानिक दहलीज़ पर  शिक्षाप्रद या मार्गदर्शक के रुप में अच्छा लगेगा।

अश्व पर सवार होकर आयेंगी माँ दुर्गा - ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे

 अश्व पर सवार होकर आयेंगी माँ दुर्गा

शारदीय
नवरात्रि इस वर्ष सायं काल 05: 38 बजे के पूर्व ही कलश स्थापन इत्यादि पूजन अर्चन करना आवश्यक होगा क्योंकि इसके बाद द्वितीय तिथि आरंभ हो जायेगी। दिनांक 5 अक्टूबर 2013 दिन शनिवार से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हो रही है। माँ शक्ति का घोड़े पर सवार होकर आयेंगी जिसका फल छत्रभंग योग  होगा। शनि अपनी उच्च की राशि तुला में एवं उनका साथ दे रहे हैं राहु, बुध और ये तीनो ग्रह पंचमस्थ होने के साथ ही नीच राशि में मंगल स्थित रहेंगे। शारदीय नवरात्र में ऐसा दुर्लभ संयोग 147 वर्ष बाद बना है जो पुन:148 वें वर्ष (अर्थात् 2161) में निर्मित होगा। इसी दिन स्नान-दान की अमावस्या भी मनाई जायेगी। जबकि पितृ अमावस्या (पितृ विसर्जन) 14 अक्टूबर शुक्रवार को ही मनायी जायेगी।

घोड़े पर सवार होकर आयेगी माँ दुगार्:

काशी विश्वनाथ हृषिकेश पंचांग (काशी) के अनुसार माँ शक्ति  घोड़े पर सवार होकर आयेंगी जिसका फल छत्रभंग योग  होगा, अत: केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकार दोनों ही राजा की भूमिका में होते हैं, अत: छत्तीसगढ़ में इसका कुप्रभाव इसलिए नहीं होगा क्योंकि यहाँ विधान सभा का चुनाव स्वभावत: नवंबर-दिसंबर में होना तय है किन्तु केन्द्र सरकार के मुखिया या गठबंधन सरकार यूपीए-2 को पदच्युत होना तय है क्योंति माँ शक्ति के घोड़े की सवारी छत्रभंग योग लेकर आ रहीं हैं ।

ज्योति कलश स्थापना का मुहूतर्:

(प्रात: 08:53 से 10:22 तक राहु काल, दोप.01:19 से 02:48 तक गुलिक काल, अपराह्न 04:17 से 05:46 तक यमघंट काल उपरोक्त तीनों अवधि में ज्योति कलश की स्थापना वर्जित है)
प्रात:07:24 से 08:53 तक शुभ (चौघडिय़ा)
11:51 से 01:19 तक चर  (चौघडिय़ा)
दोप. 01:19 से 248 तक लाभ (चौघडिय़ा)
दोप. 02:48 से 04:17 तक अमृत (चौघडिय़ा)
अभिजित मुहूतर्: 11:32 से 12:26 तक
(इसके बाद सायंकाल 5: 38 से द्वितीया तिथि के आरंभ होने से कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त नहीं है।)


राशियों के अनुसार नवरात्रि में विशेष पूजनः


मेष- इस राशि के लोगों को स्कंदमाता की विशेष उपासना करनी चाहिए। दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ करें। स्कंदमाता करुणामयी हैं, जो वात्सल्यता का भाव रखती हैं।

वृषभ- वृषभ राशि के लोगों को महागौरी स्वरूप की उपासना से विशेष फल प्राप्त होते हैं। ललिता सहस्र नाम का पाठ करें। जन-कल्याणकारी है। अविवाहित कन्याओं को आराधना से उत्तम वर की प्राप्ति होती है।

मिथुन- इस राशि के लोगों को देवी यंत्र स्थापित कर ब्रह्मचारिणी की उपासना करनी चाहिए। साथ ही तारा कवच का रोज पाठ करें। मां ब्रह्मचारिणी ज्ञान प्रदाता व विद्या के अवरोध दूर करती हैं।

कर्क- कर्क राशि के लोगों को शैलपुत्री की पूजा-उपासना करनी चाहिए। लक्ष्मी सहस्रनाम का पाठ करें। भगवती की वरद मुद्रा अभय दान प्रदान करती हैं।

सिंह- सिंह राशि के लिए मां कूष्मांडा की साधना विशेष फल करने वाली है। दुर्गा मंत्रों का जप करें। ऐसा माना जाता है कि देवी मां के हास्य मात्र से ही ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई। देवी बलि प्रिया हैं, अत: साधक नवरात्र की चतुर्थी को आसुरी प्रवृत्तियों यानी बुराइयों का बलिदान देवी चरणों में निवेदित करते हैं।

कन्या- इस राशि के लोगों को मां ब्रह्मचारिणी का पूजन करना चाहिए। लक्ष्मी मंत्रों का साविधि जप करें। ज्ञान प्रदान करती हुई विद्या मार्ग के अवरोधों को दूर करती हैं। विद्यार्थियों हेतु देवी की साधना फलदाई है।

तुला- तुला राशि के लोगों को  महागौरी की पूजा-आराधना से विशेष फल प्राप्त होते हैं। काली चालीसा या सप्तशती के प्रथम चरित्र का पाठ करें। जन-कल्याणकारी हैं। अविवाहित कन्याओं को आराधना से उत्तम वर की प्राप्ति होती है।

वृश्चिक- वृश्चिक राशि के लोगों को स्कंदमाता की उपासना श्रेष्ठ फल प्रदान करती है। दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। वात्सल्य भाव रखती हैं।

धनु- इस राशि वाले मां चंद्रघंटा की उपासना करें। संबंधित मंत्रों का यथाविधि अनुष्ठान करें। घंटा प्रतीक है उस ब्रह्मनाद का, जो साधक के भय एवं विघ्नों को अपनी ध्वनि से समूल नष्ट कर देता है।

मकर- मकर राशि के जातकों के लिए कालरात्रि की पूजा सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। नर्वाण मंत्र का जप करें। अंधकार में भक्तों का मार्गदर्शन और प्राकृतिक प्रकोप, अग्निकांड आदि का शमन करती हैं। शत्रु संहारक है।

कुंभ- कुंभ राशि वाले व्यक्तियों के लिए कालरात्रि की उपासना लाभदायक है। देवी कवच का पाठ करें। अंधकार में भक्तों का मार्गदर्शन और प्राकृतिक प्रकोपों का शमन करती हैं।

मीन- मीन राशि के लोगों को मां चंद्रघंटा की उपासना करनी चाहिए। हरिद्रा (हल्दी) की माला से यथासंभव बगलामुखी मंत्र का जप करें। घंटा उस ब्रह्मनाद का प्रतीक है, जो साधक के भय एवं विघ्नों को अपनी ध्वनि से समूल नष्ट कर देता है।


कौन-कौन हैं नवदुर्गा और उनका संक्षिप्त परिचय.


1. शैलपुत्री, 2. ब्रह्मचारिणी, 3. चंद्रघंटा, 4. कूष्मांडा, 5. स्कंदमाता, 6. कात्यायनी, 7. कालरात्री, 8. महागौरी और 9. सिद्धिदात्री।
 नवरात्रि में दुर्गा के नौ रूपों की आराधना व पूजा करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। यह पर्व असत्य पर सत्य की विजय की याद है। श्रीराम ने भी रावण पर विजय प्राप्त करने से पूर्व माता दुर्गे की पूजा की थी। उनकी विजय प्राप्ति के बाद से सतयुग से यह पूजा सार्वजनिक तौर से की जाने लगी, जो आज अपने भव्य रूप में है और मंडपों व दुर्गा मंदिरों से लेकर घर में भी कलश स्थापना कर की जाती है। नौ दिनों तक होने वाली इस पूजा में प्रत्येक दिन दुर्गा के एक स्वरूप की पूजा होती है। जिसके लिए दुर्गा सप्तशती में नौ देवियों के बारे कहा गया है,
प्रथमम् शैलपुत्री च द्वितीयम् ब्रम्हचारिणी।
तृतीयम् चंद्रघंटेति कुष्मांडेति चतुर्थकम् ।
पंचमम् स्कंद मातेति षष्ठम् कत्यायणिति।
च सप्तमम् कालरात्रिति महागौरीति च अष्टमम्।
नवम सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिता:।
सभी देवियों का अपना वाहन व अलग स्वरूप है मान्यता के अनुसार अलग-अलग रूपों की पूजा करने से भिन्न-भिन्न प्रकार की शक्तियां प्राप्त होती हैं। इस अवसर पर दुर्गा सप्तशती का पाठ नौ दिनों तक किया जाता है।

- ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, शांतिनगर, भिलाई, 9827198828

रविवार, 29 सितंबर 2013

कैसा रहेगा पिता-पुत्र का संबंध, क्यों रहती है अनबन..??

कैसा रहेगा पिता-पुत्र का संबंध, क्यों रहती है अनबन..??

आजकल प्रायः देखा जाता है कि पिता पुत्र में अनबन की स्थिति बनी रहती है और कभी कभी तो ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि पुत्र पैतृक निवास का परित्याग कर अपनी पत्नी के साथ अन्यत्र निवास करने लगता है और ‘क्रौंच’ पर्वत पर निवासरत भगवान शिवपुत्र स्कन्द जैसा आजीवन पैतृक-निवास न जाने का संकल्प ले लेता है। आखिरकार ऐसी स्थिति उत्पन्न करने वाले ग्रहों की क्या भूमिका होती है, आईए इसे फलित ज्योतिष के आधार पर जानने का प्रयास करते हैः-

पिता का पुत्र से स्वाभाविक स्नेह का संबंध होता है तो पुत्र का संबंध पिता के प्रति आदर भाव एवं पिता के सम्मान से होता है। ऎसा नहीं है कि यह संबंध मानव के बनाए हैं कि अमुक का पुत्र अमुक है अपितु यह संबंध अनादिकाल से बने हैं जो धरती पर देखने में आते हैं। हमारे नवग्रह मंडल में भी कुछ ग्रहों में आपस में पिता-पुत्र संबंध हैं जो कि व्यक्ति की जन्मपत्रिका को भी प्रभावित करते हैं। यह पिता-पुत्र सूर्य एवं शनि तथा चंद्रमा एवं बुध हैं।

सूर्य एवं शनि:—

 पौराणिक कथाओं के अनुसार त्वष्टा की पुत्री संज्ञा का विवाह सूर्यदेव के साथ हुआ था। वैवस्वत मनु, यम और यमी के जन्म के बाद भी वे सूर्य के तेज को सहन नहीं कर सकीं और अपनी छाया को सूर्य देव के पास छो़डकर चली गई। सूर्य ने छाया को अपनी पत्नी समझा और उनसे सावण्र्य, मनु, शनि, तपती तथा भद्रा का जन्म हुआ। जन्म के पश्चात जब शनि ने सूर्य को देखा तो सूर्य को कोढ़ हो गया। सूर्य को जब संज्ञा एवं छाया के भेद का पता चला तो वे संज्ञा के पास चले गए। सूर्य पुत्र शनि का अपने पिता से वैर है। ज्योतिष शास्त्र में फलादेश करते समय भी इस तथ्य का ध्यान रखा जाता है। इनके वैर को इस प्रकार समझा जा सकता है कि सूर्य जहां मेष राशि में उच्चा के होते हैं वहीं शनि मेष में नीच के होते हैं। सूर्य तुला में नीच के होते हैं तो शनि तुला में उच्चा के होते हैं। यदि दोनों एक साथ किसी एक ही राशि में बैठ जाएं तो पिता-पुत्र का परस्पर विरोध रहता है या एक साथ टिकना मुश्किल हो जाता है। सूर्य के परम मित्र चन्द्रमा से शनि का वैर है और शनि की राशि में सूर्य जीवन में कुछ कष्ट अवश्य देते हैं परन्तु जैसे सोना तपकर निखरता है वैसे ही सूर्य-शनि की यह स्थिति भी कष्टों के बाद जीवन में सफलता लाती है।

सूर्य आध्यात्मिक प्रवृत्ति के हैं तथा शनिदेव आध्यात्म के कारक हैं, अत: जन्मपत्रिका में सूर्य एवं शनि की युति व्यक्ति को धर्म एवं आध्यात्म की ओर उन्मुख करती है। कुछ संतों की जन्मपत्रिका में सूर्य-शनि की युति देखी जा सकती है, जिनमें सत्य साँई बाबा एवं मीरा बाई के नाम हैं।

चन्द्र-बुध:—

 पौराणिक कथाओं के अनुसार चन्द्रमा ने अपने गुरू बृहस्पति की भार्या तारा का अपहरण किया। तारा और चन्द्रमा के सम्बन्ध से बुध उत्पन्न हुए। बालक बुध अत्यन्त सुन्दर और कांतिवान थे। अत: चन्द्रमा ने उन्हें अपना पुत्र घोषित किया और उनका जातकर्म संस्कार करना चाहा। तब बृहस्पति ने इसका प्रतिवाद किया। बृहस्पति बुध की कांति से प्रभावित थे और उन्हें अपना पुत्र मानने को तैयार थे। जब चन्द्रमा और बृहस्पति का विवाद बढ़ गया तब ब्रह्मा जी के पूछने पर तारा ने उसे चन्द्रमा का पुत्र होना स्वीकार किया। अत: चन्द्रमा ने बालक का नामकरण संस्कार किया और उसे बुध नाम दिया गया। चन्द्रमा का पुत्र माने जाने के कारण बुध को क्षत्रिय माना जाता है। यदि उन्हें बृहस्पति का पुत्र माना जाता तो उन्हें ब्राह्मण माना जाता। बुध का लालन-पालन चन्द्रमा ने अपनी प्रेयसी पत्नी रोहिणी को सौंपा। इसलिए बुध को "रौहिणेय" भी कहते हैं।

बुध-चन्द्रमा के पुत्र थे और बृहस्पति ने उन्हें पुत्र स्वरूप स्वीकार किया था। अत: चन्द्रमा और बृहस्पति दोनों के गुण बुध में सम्मिलित हैं। चन्द्रमा गन्धर्वो के अधिपति हैं। अत: उनके पुत्र होने के कारण गन्धर्व विद्याओं के प्रणेता हैं। बृहस्पति के प्रभाव के कारण ये बुद्धि के कारक हैं। चन्द्रमा ने छल से तारा का अपहरण किया था, पिता के संस्कारों एवं स्वभाव का प्रभाव पुत्र पर भी निश्चित रूप से किसी न किसी प्रकार से प़डता ही है, अत: बुध का सम्बंध भी छल कपट से जो़डा गया है, मुख्य रूप से सप्तम स्थान स्थित बुध का। जन्मपत्रिका में अकेले बुध ही कई बार व्यक्ति को छल-कपट का आचरण करने पर विवश कर देते हैं।
अपने बारे में ज्योतिषिय समाधान हेतु यहाँ संपर्क करें..http://www.jyotishkasurya.com/Contact.aspx#
-ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, संपादक ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

पार्वण श्राद्ध (पिण्डदान) की एक झलक..

पार्वण श्राद्ध (पिण्डदान) की एक झलक..


आज पितृपक्ष का अष्टमी तिथि थी। इसी तिथि को हमारी माता स्व.श्रीमती माया देवी (9जनवरी 1998) एवं  पिता स्व.श्री रामजी चौबे जी का (05जनवरी2013) को स्वर्गवास हुआ था। अतः आज अपने माता-पिता एवं पितामह, प्रपितामह (सपत्निकस्य) साथ में द्वितीय कुल मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह (सपत्निकस्य) को याद करते हुए अपराह्न काल में पार्वण श्राद्ध के अन्तर्गत जो करते बना शास्त्र सम्मत हमने पिष्डदानादि कार्य किया। मुझे विश्वास है कि भारतीय संस्कृति में पला-बढ़ा हर पुत्र यह पुनीत कार्य अवश्य करेगा।
हर युवा पीढ़ी..अपने आदरणीय पितरों को इस 16 दिवसीय पितृ-महायज्ञ में याद अवश्य करेगा। साथ ही मैं चलते-चलते यह भी बताना चाहूंगा कि जीतेजी माता-पिता की जो सेवा सुश्रुसा नहीं किया उस पुत्र को पिण्डदान देने मात्र से पितृ-दोष से मुक्ति नहीं मिलने वाला। अतः आप सभी चाहें किसी भी धर्म व सम्प्रदाय को मानने वाले हों आप लोग अपने माता-पिता का कत्तई अनादर न करें..यही वास्तवीक पितृ-यज्ञ है और पितृ-दोष से मुक्ति का उपाय भी। 













गुरुवार, 19 सितंबर 2013

''फिर ताजा होगी पितरों की भूलि-बिसरी यादें''.

''फिर ताजा होगी पितरों की भूलि-बिसरी यादें''
पितरों को समर्पित आलेख......

मित्रों सुप्रभात, 'हरिभूमि' समाचार पत्र में प्रकाशित लेख ''फिर ताजा होगी पितरों की भूलि-बिसरी यादें'' पितरों को समर्पित आलेख के माध्यम से एक बार पुनः उन पितरों को नमन करता हुँ, साथ ही ईस्पात् भूमि (हरिभूमि) के ब्यूरो चीफ श्री आलोक तिवारी Alok Tiwari जी सहित उनके तमाम सहयोगी पत्रकार साथियों का हार्दिक आभार।।..यूँ ही भारतीय संस्कृति का अलख जगाये रखें...

बुधवार, 18 सितंबर 2013

पितृ-दोष से मुक्ति पितृपक्ष में...

पितृ-दोष से मुक्ति पितृपक्ष में...

आप सभी मित्रों के पितृजनों सहित स्वयं के माता-पिता को नमन करते हुए...पितृयज्ञ के 16 दिवसीय इस महा अनुष्ठान (पितृयज्ञ) की आप सभी को बधाई...शुभकामनाएँ..भारतीय पुराकाल के समस्त ऋषि, महर्षियों, मुनियों, वेदज्ञों को नमन।

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

गजकेशरी योग में आयेंगे गणपति बप्पा (9 सितंबर 2013 सोमवार)

  गणेश महोत्सव 2013
गजकेशरी योग में आयेंगे गणपति बप्पा  (9 सितंबर 2013 सोमवार)
भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश जी का जन्म दोपहर में हुआ। अत: मध्याह्न में ही गणेश पूजन करना चाहिए। 9 सितम्बर  2013 सोमवार , भाद्र पद शुक्ल चतुर्थी संवत  2070 को गणेश पूजन का समय निम्नानुसार है -
गजकेशरी योग में मनेगी श्रीगणेश चतुर्थी
भाद्रपद मास के गणेश चतुर्थी के दिन गुरु-चंद्रमा नवम पंचम होने से गजकेशरी संयोग निर्मित हो रहा है। इस बार गणेश चतुर्थी 9 सितंबर को है। इस पर्व को गणेश चतुर्थी, विनायकी महा चतुर्थी व गणेश जयंती के रूप में 11 दिवसीय गणेशोत्सव मनाया जाता है लेकिन इस बार नवमी-दशमी एक दिन होने से 18 सितंबर को अनन्त चतुर्थी को 10वें दिन विसर्जन होगा। तिथि क्षय होने से यह स्थिति बनी है। स्वाती नक्षत्र के उपरान्त विशाखा का भोग आरंभ हो जायेगा साथ ही गुरु-चंद्रमा नवम पंचम होने से गजकेशरी संयोग निर्मित हो रहा है। गजकेशरी संयोग का यह महा संयोग न केवल गणेश अर्चना के लिए शुभ है बल्कि आज के दिन नये व्यापार की शुरुआत, सोना चाँदी की खरीदी, भवन, भूमि, वाहन आदि की का क्रय करना एवं तीर्थयात्रा की शुरुआत आदि करना बेहद लाभदायी, फलदायी साबित होगा।
गजकेशरी के इस महासंयोग में मिट्टी के द्वारा निर्मित गणपति का पूजन अर्चन अनन्तगुणा फल दायिनी होगी।

गणेश स्थापना के शुभ मुहूर्त इस प्रकार है:

अमृत का चौघड़िया - 6: 15 से 7: 42 प्रात:
शुभ का चौघड़िया -  9: 08 से  10: 35 प्रात:
लाभ की चौघड़िया - 2: 56 से  4: 23 दोप.
अमृत की चौघड़िया - 4 : 23 से 05: 50 सायं
शुभ की चौघड़िया  - 07: 17 से 08:44 रात्रि तक

वृश्चिक लग्न   -  10: 58 से 01: 10 तक दिन में
(उपरोक्त मुहूर्त का समय भिलाई के अक्षांश 21:13 पर आधारीत है, अन्य स्थान विशेष अक्षांश के अनुसार समय निर्धारीत कर लें)

गणेशोत्सव के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ -

1. गणेश उत्सव भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को शुभ मुहूर्त में गणेश पूजन से प्रारम्भ होता है तथा दस दिन बाद अनन्त चतुदर्शी को समाप्त होता है।
2. अनन्त चतुदर्शी को भक्त जन गणेश प्रतिमा को  पास के तालाब  या झील में विसर्जित करते है। अत: इसे विसर्जन दिवस भी कहा जाता है।
3. गणेश चतुर्थी को भगवान  गणेश के जन्म  दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।
4. ऐसा माना  जाता है कि इसी दिन भगवान शिव ने भगवान गणेश को अन्य देवी देवताओं से श्रेष्ठ घोषित किया था।
5. भगवान गणेश को बुद्धि , समानता और सौभाग्य के  देवता के रूप में पूजा जाता है।
6. ऐसी मान्यता है की गणेश चतुर्थी की रात्रि में चंद्रमा को नहीं देखना चाहिये। इस दिन चन्द्र दर्शन करने से चोरी का झूठा आरोप लग सकता है। इस आरोप या कलंक के निवारण हेतु स्यमन्तक की कथा को सुननी चाहिये।

गणेश जी के 12 नाम
प्रथम पूज्य गणेश जी का नाम  गणेश क्यों पड़ा ?  तो इसका सीधा संबंध संस्कृत के इस व्यूत्पत्ती से लगाया जा सकता है गणानाम् ईश: अर्थात् गणेश: गणपति आदिदेव हैं अपने भक्तों के समस्त संकटों को दूर करके उन्हें मुक्त करते हैं गणों के स्वामी होने के कारण इन्हें गणपति कहा जाता है. प्रथम पूज्य देव रूप में यह अपने भक्तों के पालनहार हैं. इनके बारह नामों:-एकदंत, सुमुख, लंबोदर, विनायक, कपिल, गजकर्णक, विकट, विघ्न-नाश, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र तथा गजानन तथा गणेश इन बारह नामों का प्रतिदिन जप करने से जीवन में सुख शांति, समृद्धि, व्यापारिक उन्नति, नौकरी में उच्चाधिकारियों से अच्छा सामंजस्य और विद्यार्थी मेधावी छात्र होकर अपने कुल का नाम रोशन करते हैं।

भगवान गणपति हमारे जीवन को सुखी, समृद्ध बनाता गणेश परिवार (ऐतिहासिक, आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य में)

भगवान शिव के पुत्र गणेश स्वयं कई संस्कृतियों के समायोजन के प्रतिमूर्ति हैं, जैसे मैदानी इलाके में निवासरत भगवान परशुराम से लेकर दक्षिण भारत में स्थित क्रौंच पर्वत जहाँ इनके बड़े भाई स्कन्द निवास करते हैं और स्वयं कैलाश पर्वत पर अपने पिता भगवान शिव के साथ विराजीत हैं जहाँ पर्वतीय संस्कृति के प्रर्वतक भगवान गणेश को ही माना गया है। इन परिस्थितियों को देखकर यह कहना यथार्थ होगा कि भारत की अखण्डता में भगवान गणेश की अहम भूमिका रही है, जिसे देखकर सर्वप्रथम पुणे में शिवाजी महराज और जीजाबाई के द्वारा गणेश महोत्सव सभी पेशवाओं को एकत्रित करने के उद्देश्य से आरंभ किया गया। जो बाद में बाल गंगाधर तिलक जी ने भारत की स्वतंत्रता में समग्र भारतवासियों के पारस्परिक भेदभाव को मिटाकर पूजा को सार्वजनिक महोत्सव का रूप देते हुए उसे केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि आजादी की लड़ाई, छुआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने तथा आम आदमी का ज्ञानवर्धन करने का उसे जरिया बनाया और उसे एक आंदोलन का स्वरूप दिया। इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
ऐसे गणपति के सारगर्भित रहस्य को जानना बेहद आवश्यक है।

गणेश परिवार में सदस्य :
भगवान गणेश के परिवार में उनकी सिद्धि, बुद्धि नामक दो पत्नियाँ तथा क्षेम और लाभ दो पुत्र हैं। उनका वाहन मूषक है। भगवान गणेश स्वयं कर्त्तव्य निष्ठता, कर्म पारायणता के प्रतीक हैं, अर्थात् जो व्यक्ति क्रियाशील होगा, कर्म पारायण होगा उन्हीं पर भगवान गणेश की कृपा होगी।  यदि गणेश जी की कृपा होगी तभी उनकी माँ लक्ष्मी की कृपा गणेश भक्तों पर होगी, क्योंकि महामाया माँ लक्ष्मी के दत्तक पुत्र गणेश हैं। सिद्धि, बुद्धि नामक दो पत्नियाँ   भगवान गणेश जी की हैं, जिन भक्तों के घर में भगवान गणेश विराजीत होंगे उन्हीं के घर लक्ष्मी रहेंगी और जिनके घर माँ लक्ष्मी रहेंगी उनके यहाँ सिद्धि और बुद्धि का निवास होगा। सिद्धि का तात्पर्य किसी भी कार्य, व्यवसाय में सफलता। बुद्धि का तात्पर्य घर में खुशनुमा माहौल का होना और मेधावी बच्चों से भरापूरा परिवार का होना, व्यारपार का संचालन बौद्धिक क्षमता की प्रबलता होती है। जिनके घर में भगवान गणेश रहेंगे वहाँ किसी भी प्रकार का विघ्नबाधा नहीं रहेगी और उनके घर गजानन पुत्र क्षेम और लाभ दोनो स्थाई तौर पर निवास करेंगे। अत: गणेश जी कर्म के प्रतीक हैं और इनका परिवार हम सभी को सदैव क्रियाशील रहने का संदेश देता है। साथी ही वाहन मूषक से भी हमें कर्मपारायणता की सीख मिलती है, क्योंकि आपने देखा होगा मूषक हमेशा किसी ना किसी वस्तु को कुतरता ही रहता है, यदि मूषक चार दिन भी कुतरना बंद कर दे तो उसका दांत इतना बढ़ जायेगा कि वह बेमौत मर जायेगा। इसलिए वह हमेशा कुछ ना कुछ कुतरते ही रहता है, जो कर्म पारायणता का द्योतक है। अत: व्यावहारिक जगत में हरेक मानवीय सिद्धांतो के दिनचर्या का सीधा संबंध भगवान गणपति से है अत: गणेश जी के पूजन अर्चन करने के साथ ही उनके जीवन चरित्र को मनुष्य यदि अपने जीवन में उतारता है तो निश्चित ही सुखी, समृद्धिशाली और देश का सबसे बड़ा उद्योगपति बन सकता है।

तजऊ चौथी के चंदा की यह कथा इस प्रकार है :-
श्री कृष्ण की द्वारकापुरी में सत्राजित ने सूर्य की उपासना से सूर्य के समान प्रकाश वाली और प्रतिदिन आठ भार सुवर्ण देनेवाली 'स्यमन्तक' मणि प्राप्त की थी। एक बार उसे संदेह हुआ कि शायद श्री कृष्ण इसे छीन लेंगे। यह सोच कर उसने वह मणि अपने भाई प्रसेन को पहना दी। दैव योग से वन में शिकार के लिए गये हुये प्रसेन को सिंह खा गया और सिंह से वह मणि जाम्बवान छीन कर ले गए। इस से श्री कृष्ण पर यह कलंक लग गया कि 'मणि के लोभ से उन्होंने प्रसेन को मार डाला। '
अन्तर्यामी श्री कृष्ण जाम्बवान की गुहा में गए और 21 दिन तक घोर युद्ध करके उनकी पुत्री जाम्बवती को तथा स्यमन्तक मणि को ले आये। यह देख कर सत्राजित ने वह मणि उन्हीं को अर्पण कर दी। कलंक दूर हो गया।

गणेश जी मुख्य आठ अवतार:

वक्रतुण्ड् महाकाय सूयर्कोटि समप्रभ
निर्विघ्नं कुरुमेदेव: सर्व कार्येषु सर्वदा॥

मुदगल पुराण में उल्लेख मिलता है कि गणेश जी के अनेक अवतार है, इनमे मुख्य आठ अवतार है. पद्म पुराण के अनुसार गणेश जी को कभी तुलसी अर्पण नही करनी चाहिए ह्यन तुलस्या गणाधिपमह्ण. गणपति जी को दूर्वा अर्थात देसी घास सबसे अधिक प्रिय है. उन्हे केवल 3 या 5 पत्ती वाली दूर्वा अर्पण करनी चाहिए. सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा करके विधि पूर्वक नवग्रह पूजन करने से सभी कार्यों का फल प्राप्त होता है और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है.

राशियों के अनुसार अलग-अलग पूजन:

मेष : आपकी राशि का स्वामी मंगल है अत: आप गणपति पूजन में विशेष तौर पर पानी में हरी इलायची डाल कर स्नान करें, लाल टीका लगाएं, लड्डू के साथ गुलाब जामुन का भोग लगाएं, हरी दूर्वा के साथ लाल फूल अर्पण करें, ओम मंगलाय नम: का जाप करें.

वृष : आपका राशीश शुक्र है अतएव श्वेत वस्तुओं का प्रयोग  अधिक करना चाहिए। पानी में दही मिला कर स्नान करें, चंदन का टीका लगाएं, बरफी व लड्डू का भोग लगाएं, ओम काव्याय नम: का जाप करें , दूर्वा अवश्य अर्पण करें.

मिथुन : बुध  आपकी राशि के कारकेश हैं अत: गणपति पक्ष में गणेश अर्चन में  गुड़ मिला कर स्नान करें, हरी दूर्वा के साथ बेलपत्र अर्पण करें, घिया (भथुआ) की बरफी का भोग लगायें, ओम मनोहराय नम: का जाप करें.

कर्क : जल के देवता चंद्र से प्रभावित आपकी राशि है, क्योंकि राशीश है अत: दूध पानी में मिला कर स्नान करें, चंदन का टीका लगाएं, लड्डू के साथ कलाकंद का भोग लगायें, दूर्वा और चमेली के फूल अर्पण करें, ओम चंद्रशेखराय नम: का जाप करें.

सिंह : थोड़ी सी शक्कर(कांदा अथवा गन्ने का) पानी में मिला कर स्नान करें, रोली का टीका लगाएं, गेहू के आटे के हलवे का भोग लगाएं, ओम कत्रे नम: का जाप करें. दूर्वा अर्पण करें.

कन्या :  हरे कपड़े से श्रृंगार, हरी दूर्वा पानी में मिला कर स्नान करें, केसर का टीका लगाएं, लड्डू के साथ पेठे का भोग लगाएं, ओम ग्रहोपमाय नम: का जाप करें, गणाती जी को दूर्वा अर्पण करें.

तुला :  मिश्री अथवा गुड़ जल में मिला कर स्नान करें, चंदन का इत्र लगाएं , रसमलाई के साथ मोदक का भोग लगाएं, दूर्वा अर्पण करें , ओम भृंगराजाय नम: का जाप करें.

वृश्चिक : लाल चंदन पानी में मिला कर स्नान करें, लाल टीका लगाएं, मूंग दाल हलवा व लड्डू का भोग लगाएं, लाल गुलाब व दूर्वा अर्पण करें, ओम प्रबोधनाय नम: का जाप करें.

धनु : सौभाग्यवती महिलाएँ एवं कुंवारी बालाएँ दोनों ही हल्दी पानी में मिला कर स्नान करें, केसर का टीका लगाएं, बेसन के लड्डू का भोग लगाएं, ओम बागिशाय नम: का जाप करें.

मकर : काले तिल पानी में मिला कर स्नान करें, चंदन का टीका लगाएं, गूढ़ेल का फूल तथा दूर्वा अर्पण करें, तिल के लड्डू का भोग लगाएं, ओम अनंतकाय नम: का जाप करें.

कुंभ : थोड़ी सी साबुत काली मिर्च पानी में डाल कर स्नान करें, सिंदूर का टीका लगाएं, दूर्वा अर्पण करें, काले गुलाब जामुन का भोग लगाएं, ओम शौरये नम: का जाप करें.

मीन : केसर जल में मिला कर स्नान करें, चंदन का तिलक लगाएं, पीला फूल व दूर्वा अर्पण करें बेसन के हलवे   का भोग लगाएं, ओम गुणानिधय नम: का जाप करें.


प्रमाणीकरण
मैं ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, निवासी शांतिनगर भिलाई (छ.ग.) यह प्रमाणित करता हुँ कि इस आलेख पर किसी का कोई प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष अधिकार नहीं है, न कहीं कहीं प्रकाशित किया गया है हमारे द्वारा संचालित ब्लॉग, साईट, सोशल पेजेस् के अलावा उपरोक्त आलेख को प्रकाशित करने का केवल अधिकार  दैनिक राजप्रकाश समाचार पत्र (भिलाई से प्रकाशित) के इतर अन्य किसी को नहीं है। अन्य कोई भी कट/पेस्ट कर हमारे आलेख को कहीं अन्यत्र प्रकाशित करता है तो उस पर संवैधानिक कार्यवाही करने को हमें बाध्य होना पड़ेगा। (आदेशानुसार- ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे,
संपादक- ज्योतिषका सूर्य, राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई- 098271- 98828

ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, भिलाई (छ.ग.) 098271- 98828

रविवार, 4 अगस्त 2013

धर्म-संस्कृति अलंकरण एवं राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन भिलाई में 25 अगस्त को

''प्रेस रिलीज़''

धर्म-संस्कृति अलंकरण एवं राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन भिलाई में 25 अगस्त को

पाश्चात्य संस्कृति का कुप्रभाव निरंतर भारतीय संस्कृति पर पड़ है ऐसे में देश के हर नागरिक का कर्तव्य है कि, देश की संस्कृति पर हो रहे आघात को हम रोकने का प्रयास करें और ऋषी मुनियों के देश भारत की रक्षा करें । यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि, ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे राष्ट्रीय मासिक पत्रिका   ''ज्योतिष का सूर्य'' के माध्यम से देश की संस्कृति को बचाने का प्रयास कर रहे हैं. ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका पाठकों के लिए अपार प्रेम और स्नेह की बदौलत चौथे वर्ष में प्रवेश कर रही है. पत्रिका की चौथी वर्षगांठ के अवसर पर प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी 'मायाराम शिक्षण विकास समिति' द्वारा भिलाई के कलामंदिर सिविक सेंटर में आगामी 25 अगस्त को 'धर्म संस्कृति अलंकरण समारोह' का आयोजन किया जा रहा है. जिसमें देश के सुप्रतिष्ठित, धर्म-सेवी, सामाजिक कार्यकर्ता, वरिष्ठ पत्रकार, एवं साहित्यकारों के अलावा भारतीय संस्कृति के पोषक, धर्मधुरीन ज्योतिष गणक एवं धर्म-संस्कृति प्रेमी जनों की गरिमामय उपस्थिति में शिक्षा, साहित्य, उद्योग, खेल, पत्रकारिता, समाजसेवा, जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ठ कार्य करने वाली 21 महान विभूतियों का सम्मान किया जाएगा. धर्म संस्कृति की रक्षा, उत्कृष्ठ पत्रकारिता और समाजसेवा में अपना अमूल्य योगदान देने के लिए च्मायाराम शिक्षण विकास समितिज् द्वारा 'श्री प्रेम शुक्ल, संपादक शिवसेना के मुखपृष्ठ 'सामना' मुंबई को इस वर्ष 'धर्म संस्कृति अलंकरण' से अलंकृत किया जायेगा।.
    ''भारतस्य प्रतिष्ठा द्वे संस्कृति संस्कृतस्तथा'' अर्थात् पूरे विश्व में भारत देश की पहचान व प्रतिष्ठा दो विषयों से है पहला संस्कृति और दूसरा संस्कृत भाषा को देववाणी भी कहते हैं। सभी धर्म सूत्रों का संग्रह इसी भाषा में की गई है। अत: संस्कृत साहित्य एवं भारतीय संस्कृति की रक्षा के बगैर ज्योतिष शास्त्र संभव नहीं है.    ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका न सिर्फ ज्योतिष पर आधारित है बल्कि इस पत्रिका के माध्यम से देशवासियों में अपने धर्म के प्रति जागरूकता लाने का भी प्रयास किया जा रहा है.'धर्म- संस्कृति और ज्योतिष साथ में जुड़े होने के कारण इस वर्ष लम्बे समय बाद एजुकेशन हब कहलाने वाली इस्पात् नगरी भिलाई में 'राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन' भी आयोजित किया जा रहा है. जिसमें देश के विभिन्न स्थानों के ज्योतिषियों का आगमन होगा. इस सम्मेलन में शामिल होने के लिए लगातार पंजीयन आरंभ है. इस राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन में हस्त रेखा, फलित ज्योतिष, अंक ज्योतिष वास्तुविद, टेरो कार्ड, जैसे विभिन्न ज्योतिष सम्मलित होंगे. आयोजक मायाराम शिक्षण विकास समिति के अध्यक्ष ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे ने कहा कि, भिलाई वासियों के लिए यह सुनहरा अवसर होगा जब एक साथ बड़ी संख्या में विभिन्न क्षेत्रों के ज्ञाता ज्योतिष एकत्रित होंगे. उन्होने कहा कि सम्मेलन के दौरान आम जन अपनी जन्म कुंडली भी काफी कम दरों पर बनवा सकेंगे साथ ही वे अपनी शंकाओं का समाधान भी वे अपने पसंदीदा ज्योतिषों के माध्यम से कर सकेंगे. इसके लिए एक फार्म वितरित किए जा रहे हैं जो आयोजन स्थल कला मंदिर भिलाई में आयोजन के दिन जमा होंगे और उसके बाद इच्छुक लोग बाहर से आने वाले ज्योर्तिविदों से मिल सकेंगे.
   ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका की चौथी वर्ष गांठ पर आयोजित 'धर्म संस्कृति अलंकरण' एवं 'राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन' के दौरान विभिन्न स्थानों से पहुँचने वाले ज्योतिषाचार्यों द्वारा अपने क्षेत्र में किए गए शोधपत्र भी पढ़े जाएंगे और उन्हीं शोध पत्रों के आधार पर सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र के लिए चयन समिति द्वारा नाम की घोषणा कर गोल्ड मेडल से अलंकृत किया जाएगा.
    ज्योतिषार्य पंडित विनोद चौबे ने कहा कि इस भव्य आयोजन के लिए लगातार समाजिक संगठनों, ज्योतिषाचार्यों, समाजसेवियों का समर्थन प्राप्त हो रहा है. उन्होंने कहा कि इस भव्य आयोजन के लिए भिलाईवासियों का सहयोग आपेक्षित है.
पत्रकार वार्ता के दौरान च्च्मायाराम शिक्षण विकास समितिज्ज् के अध्यक्ष ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौैबे जी के अलावा वरिष्ठ उद्योगपति श्री के.के.झा, कॉमर्स गुरू संतोष रॉय, टी.वी.पत्रकार एवं आयोजन समिति के उपाध्यक्ष श्री मिथलेश ठाकुर, समाजसेवी नागेंद्र मिश्र, रमेश सोनी, ज्योतिषाचार्य दादा राव बोरोड़े, ओम प्रकाश त्रिपाठी, सुनील सिंह, सुरेश राय, शिवजी यादव, हरिशंकर सिंह, शंभु जायसवाल सहित आयोजन समिति से जुड़े समस्त पदाधिकारी एवं सदस्यगण उपस्थित थे.

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

''धर्म-संस्कृति अलंकरण-2013'' समारोह एवं ''राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन'' में आप सभी आमंत्रित हैं..

आमंत्रण........... आमंत्रण ...............आमंत्रण

''धर्म-संस्कृति अलंकरण-2013'' समारोह एवं ''राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन'' में आप सभी आमंत्रित हैं..





मित्रों यह सम्मान उस व्यक्तित्त्व को दिया जाता है, जिन्होंने भारतीय संस्कृति के रक्षार्थ अतूलनीय कार्य किया है, अथवा इस पुनीत कार्य में अनवरत क्रियाशील है। ऐसे व्यक्तित्त्व की खोज उस महान व्यक्तित्त्व के सर्वतो भावेन धर्म-संस्कृति के रक्षार्थ सतत् गतिशीलता का गहन अध्ययन करने के पश्चात निर्णय लिया जाता है। इस वर्ष भारतीय संस्कृति के अवगाहक युवाओं के प्रेरणा स्रोत धर्म-संस्कृति के पोषक, धर्म धुरीन आद. श्री प्रेम शुक्ल (का.संपादक सामना )जी, मुंबई, महाराष्ट्र, भारत, को 25 अगस्त 2013 को भिलाई में धर्म-संस्कृति अलंकरण-2013  से सम्मानित किया जायेगा।
कार्यक्रम स्थानः कला मंदिर, सिविक सेंटर, भिलाई
समयः प्रातः 10 बजे से 11 बजे तक (धर्म संस्कृति अलंकरण)
                     11 बजे से ऱात्रि 08 बजे तक (राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन)
आयोजकः ज्योतिष का सूर्य राष्ट्रीय मासिक पत्रिका एवं मायाराम शिक्षण विकास समिति, भिलाई।
संपर्कः ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे -9827198828, मिथलेश ठाकुर(पत्रकार)- 9827160789, रमेश सोनी-9630819481।
नोटः राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन के प्रतिभागी देश के सभी ज्योतिष गणक महानुभावों जिनका रजिस्ट्रेशन फार्म हमें प्राप्त हो गया है उन्हें 10 अगस्त तक बाई पोस्ट अथवा ईमेल से आपको पास भेज दिया जायेगा।

बुधवार, 24 जुलाई 2013

सावन में करें शिव आराधना...शिव शिवेति शिवेति वा

सावन में करें शिव आराधना...शिव शिवेति शिवेति वा

भगवान शंकर कल्याणकारी हैं। उनकी पूजा,अराधना समस्त मनोरथ को पूर्ण करती है। हिंदू धर्मशास्त्रों के मुताबिक भगवान सदाशिव का विभिन्न प्रकार से पूजन करने से विशिष्ठ लाभ की प्राप्ति होती हैं। यजुर्वेद में बताये गये विधि से रुद्राभिषेक करना अत्यंत लाभप्रद माना गया हैं। लेकिन जो व्यक्ति इस पूर्ण विधि-विधान से पूजन को करने में असमर्थ हैं अथवा इस विधान से परिचित नहीं हैं वे लोग केवल भगवान सदाशिव के षडाक्षरी मंत्र-- ॐ नम:शिवाय का जप करते हुए रुद्राभिषेक तथा शिव-पूजन कर सकते हैं, जो बिलकुल ही आसान है।

श्रावण माह पर्यन्त प्रतिदिन शिव-आराधना व अभिषेक करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है। अधिकांश शिव भक्त इस दिन शिवजी का अभिषेक करते हैं। लेकिन बहुत कम ऐसे लोग है जो जानते हैं कि शिव का अभिषेक क्यों करते हैं?

अभिषेक शब्द का शाब्दिक अर्थ है स्नान करना या कराना। रुद्राभिषेक का मतलब है भगवान रुद्र का अभिषेक यानि कि शिवलिंग पर रुद्रमंत्रों के द्वारा अभिषेक करना। यह पवित्र-स्नान भगवान मृत्युंजय शिव को कराया जाता है। अभिषेक को आजकल रुद्राभिषेक के रुप में ही ज्यादातर जाना जाता है। अभिषेक के कई प्रकार तथा रुप होते हैं। रुद्राभिषेक करना शिव आराधना का सर्वश्रेष्ठ तरीका माना गया है। अलंकार प्रियो कृष्णः जलधारा प्रियो शिवः अर्थात् शास्त्रों में भगवान शिव को जलधाराप्रिय माना जाता है। रुद्राभिषेक मंत्रों का वर्णन ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद में किया गया है।
रुद्राष्टाध्यायी में अन्य मंत्रों के साथ इस मंत्र का भी उल्लेख मिलता है। शिव और रुद्र परस्पर एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। शिव को ही रुद्र कहा जाता है क्योंकि- रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: यानि की भोले सभी दु:खों को नष्ट कर देते हैं। हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दु:खों के कारण हैं। रुद्रार्चन और रुद्राभिषेक से हमारे पातक-से पातक कर्म भी जलकर भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है तथा भगवान शिव का शुभाशीर्वाद भक्त को प्राप्त होता है और उनके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि एकमात्र सदाशिव रुद्र के पूजन से सभी देवताओं की पूजा स्वत: हो जाती है।
रूद्रहृदयोपनिषद में शिव के बारे में कहा गया है कि- सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका: अर्थात् सभी देवताओं की आत्मा में रूद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रूद्र की आत्मा हैं।
हमारे शास्त्रों में विविध कामनाओं की पूर्ति के लिए रुद्राभिषेक के पूजन के निमित्त अनेक द्रव्यों तथा पूजन सामग्री को बताया गया है। साधक रुद्राभिषेक पूजन विभिन्न विधि से तथा विविध मनोरथ को लेकर करते हैं। किसी खास मनोरथ की पूर्ति के लिये तदनुसार पूजन सामग्री तथा विधि से रुद्राभिषेक की जाती है। जो इस प्रकार नीचे दिये गये हैं-

रुद्राभिषेक के विभिन्न पूजन के लाभ इस प्रकार हैं-
• जल से अभिषेक करने पर वर्षा होती है।
• असाध्य रोगों को शांत करने के लिए कुशोदक से रुद्राभिषेक करें।
• भवन-वाहन के लिए दही से रुद्राभिषेक करें।
• लक्ष्मी प्राप्ति के लिये गन्ने के रस से रुद्राभिषेक करें।
• धन-वृद्धि के लिए शहद एवं घी से अभिषेक करें।
• तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
• इत्र मिले जल से अभिषेक करने से बीमारी नष्ट होती है ।
• पुत्र प्राप्ति के लिए दुग्ध से और यदि संतान उत्पन्न होकर मृत पैदा हो तो गोदुग्ध से रुद्राभिषेक करें।
• रुद्राभिषेक से योग्य तथा विद्वान संतान की प्राप्ति होती है।
• ज्वर की शांति हेतु शीतल जल/गंगाजल से रुद्राभिषेक करें।
• सहस्रनाम-मंत्रों का उच्चारण करते हुए घृत की धारा से रुद्राभिषेक करने पर वंश का विस्तार होता है।
• प्रमेह रोग की शांति भी दुग्धाभिषेक से हो जाती है।
• शक्कर मिले दूध से अभिषेक करने पर जडबुद्धि वाला भी विद्वान हो जाता है।
• सरसों के तेल से अभिषेक करने पर शत्रु पराजित होता है।
• शहद के द्वारा अभिषेक करने पर यक्ष्मा (तपेदिक) दूर हो जाती है।
• पातकों को नष्ट करने की कामना होने पर भी शहद से रुद्राभिषेक करें।
• गो दुग्ध से तथा शुद्ध घी द्वारा अभिषेक करने से आरोग्यता प्राप्त होती है।
• पुत्र की कामनावाले व्यक्ति शक्कर मिश्रित जल से अभिषेक करें।
-ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, संपादक, ''ज्योतिष का सूर्य''  राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई-9827198828

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

भारतीय संस्कृति, संस्कृत और हिन्दी साहित्य की अवहेलना ही हमारे देश को मटियामेट कर देगी...

भारतीय संस्कृति, संस्कृत  और हिन्दी साहित्य की अवहेलना ही हमारे देश को मटियामेट कर देगी...


 प्रिय मित्रों, आप लोगों ने सुन्दरकाण्ड का पाथ अवश्य किया और सुना होगा साथ ही उसमें वर्णित चौपाई, छन्द, सोरठा और शेलोकों को मनन भी किये होंगे, ऐसा मेरा विश्वास है। इस काण्ड (सोपान) में श्री हनुमान जी के लंका गमन की पूरी कथा है, जो पूर्णतः आध्यात्मिक तो है ही लेकिन कुशल रणनीतिकार का प्रयोगशाला भी जहाँ हनुमानजी ने अपने नीतियों का भरपूर प्रयोग किया, जैसे प्रथम लंका में पुष्प वाटिका का विध्वंश करना अर्थात् वहाँ की आसुरी संस्कृति को सुवासित, पल्लवित करने वाले उस वाटिका का ही नास कर दिया। और दूसरा  आर्थिक क्षति पहुँचाना अर्थात् स्वर्णमयी लंका को उलट-पुलट कर जलाकर खाक् करना,आदि अर्थात् लंका पर विजय पताका फहराना था प्रभु श्रीराम को लेकिन उनके सफलता में प्रभु श्री हनुमानजी का विशेष योगदान था।
प्रिय मित्रों अपने देश के लोग भले ही सुन्दरकाण्ड को केवल पूजा अर्चना का माध्यम  मात्र  मानते हों परन्तु यह न केवल पूजा पाठ का माध्यम बल्कि इसमें राष्ट्र नीति भी छुपी है किन्तु हमारे देश के सत्ताधारी राजनेता केवल पाश्चात्य नीतियों पर अपनी निगाहें गड़ाये बैठे रहते हैं, नकी भारतीय संस्कृत साहित्य अथवा हिन्दी साहित्य के नीतियों पर। जो अत्यन्त दुःखद है।
 वहीं दूसरी ओर गहराई से चिन्तन किया जाये तो भारतीय धर्मग्रन्थों में वर्णित सभी नीतियों का अक्षरशः पालन आस-पड़ोस देश  के राजनेता कर रहे हैं और बार-बार अनदरुनी तौर पर भारत को पटखनी दे रहे हैं।
जैसे_ माना कि भारत की पुष्प वाटिका कश्मिर है , जिस पर चीन के प्रश्रय से प्रभुत्वशाली बना पाकिस्तान अपनी नज़र गड़ाये हुए हैं, और आये दिन सीज फायर कर रहा है। वहीं दूसरी ओर चीन ने हर बार भारत को पटखनी देते हुए अपने देश के प्रोडक्ट को अथवा सभी चायनीज वस्तुओं को भारत के मार्केट में उतार कर तकरीबन हर साल 100 करोड़ से भी अधिक रुपया भारत से वसूल कर रहा है। अर्थात् भारतीय समाज को अन्दर से खोखला बना रहा है गौर करने की बात यह भी है कि न केवल चायनीज वस्तुएं चीन की प्रभु सत्ता को विस्तारीत कर रहा है बल्कि भारत के नवजवानों को बेरोजगार और तमाम नये-नये रोगों से प्रभावित भी कर रहा है। और हमारे देश के राजनेता केवल फाईलों में नीतियाँ बनाने तक ही सीमट कर रह गये हैं। और बहुत हास्यास्पद बात तो हो जाती है जब फ्री में अनाज देने की परिकल्पना पाले देश का नेतृत्व  वोट बटोरने में माहिर खिलाड़ी अपने देश की जनता को पंगु बना रही है।  क्या इसे हम विकास की संज्ञा देंगे। बाते तो और भी बहुत हैं परन्तु कुल मिलाकर आज देश की दुर्दशा केवल तथाकथित प्रगतिशीलता, भारतीय संस्कृति की अवहेलना और पाश्चात्य संस्कृति को देश के नौजवानों पर थोपने की परिकल्पना तथा नीतियों को लेकर असहिष्णुता नीश्चित ही देश को गर्त में डालने का काम कर रही है।
यदि आज भी सुन्दरकाण्ड के नीतियों का परिपालन हमारे देश का नेतृत्व करे तो शायद यह दुर्गति नहीं होगी। दुर्गति के बारे में अधिक समझाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि, हमारे देश के नौजवानों के शिर काट लिये जाते हैं, हमारे देश की सीमा में बार बार चीन द्वारा घुसपैठ, पाकिस्तान का बार-बार सीजफायर आदि प्रत्यक्ष प्रमाण है। आवश्यकता है ......राष्ट्र देवो भवः।।       ।। राष्ट्रे वयं जागृयामः।। अर्थ- राष्ट्र ही देवता है यानी ईश्वर है। उस राष्ट्र रुपी ईश्वर के प्रति लोगों की आस्था को जगाना मेरा परम कर्तव्य है। बाकि सरकार और देश की जनता की मर्जी।-
पं.विनोद चौबे, संपादक, ज्योतिष का सूर्य, राष्टर्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई।09827198828

रविवार, 23 जून 2013

राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन में भाग लेने के लिए...इस फार्म को डाउनलोड करें..और परिपूर्ण भर कर फार्म को कोरियर अथवा स्पीड पोस्ट से आज ही भेजें....

  '' ज्योतिष का सूर्य ''राष्ट्रीय मासिक पत्रिका
 के चौथी वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में

''धर्म-संस्कृति अलंकरण समारोह''
एवं
''राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन'' मान्यवर......................................................................................................................................



कार्यक्रम : 25 अगस्त2013 दिन रविवार
'मायाराम शिक्षण विकास समिति '(रजि. छ.ग.-3788),  द्वारा आयोजित'' धर्म-संस्कृति अलंकरण समारोह'' एवं राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन का कार्यक्रम छत्तीसगढ़ में दुर्ग जिला के इस्पात् नगरी भिलाई में रखा गया है।

मित्रों,
विगत चार वर्षों से ज्योतिष का सूर्य राष्ट्रीय मासिक पत्रिका ने भारतीय संस्कृति, वैदिक वाङ्मय, संस्कृत एवं हिन्दी साहित्य, भारतीय प्राच्य  विद्याओं के निरन्तर प्रचार-प्रसार में स्वयं की तत्परता दिखायी है। जैसा कि आपको ज्ञात है कि भारतीय धर्म शास्त्रों में वर्णित राष्ट्र देवो भव: तथा वयं राष्ट्रे जागृयाम: इन दोनों वैदिक सूत्रों को लक्ष्य बनाकर भारतीय समाज के प्रगतिशील युवा एवं युवतियों सहित सभी वर्ग को राष्ट्र धर्म एवं  राष्ट्र संस्कृति से जोड़ने का सफलतम् प्रयास किया है, जिसकी निरंतरता आज भी बनी हुई है। इस सफलता का श्रेय आपके सहयोग एवं हमारी इस संस्था के प्रति आदर्श प्रेम को ही जाता है। आगे भी आप सभी से यही आशा है।

साथियों ... भारतीय संस्कृति, संस्कृत साहित्य, प्राच्य पुरातन भारतीय धर्म शास्त्रों का वैदेशिक शाक्तियों ने दमनकारी कुचक्र रचकर इन शास्त्रों  को अस्तीत्त्व विहीन बनाने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है, जो न केवल चिन्ता विषय है, वरन् हमें एकजूट हो उन्हें कठोर जवाब देने की भी आवश्यकता है। उन्हीं छ: शास्त्रों में (षड् वेदांग में) ज्योतिष शास्त्र है जिसे अंधविश्वास का पुलिंदा आदि शब्द बाणों से तमाम तरह की पीड़ा पहुँचाई जा रही है, जो असहनीय है। इस असह्य पीड़ा से भला कौन ज्योतिषी नहीं पीड़ित होगा। ऐसे तथाकथित वैदेशिक तत्त्वों को हम अपने गूढ़तम विचारों, आलखों, शोधपत्रों के माध्यम से मिल बैठकर एक विस्तृत चर्चा करें।

अत: मित्रों इन्हीं संदर्भों में हमने राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन का आयोजन भिलाई में आयोजित किया है, जिसमें आपकी उपस्थिति प्रार्थनीय है।

कार्यक्रम :
1. वैदिक मंत्रोच्चार के साथ दीप प्रज्वलन एवं शुभारंभ 02:00pm  2. स्वागत भाषण 02:30 pm
3. प्रख्यात ज्योतिर्विदों का उद्बोधन (विषय के अनुसार अलग-अलग) 03:00 pm to 04:00 pm
4. फेस टू फेस सवालों के जवाब..ज्योतिष एवं वास्तु समाधान (आम नागरिकों का) 04:00 Pm to 06:00pm !
5. प्रमाण पत्र वितरण (सभी ज्योतिष प्रतिभागियों को), ज्योतिष अलंकरण, पुरस्कार एवं स्वर्णपदक वितरण 06:00pm!
6. आभार प्रदर्शन 07:00 pm


शोध-पत्र विषय :


1.भारतीय संस्कृति में ज्योतिष और दैनिक जीवन में उपयोगिता।

2.कौन बनेगा प्रधानमंत्री..? वैदिक ज्योतिष  (2014 लोकसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में)

3.पर्यावरणीय ज्योतिष एवं राष्ट्रोत्थान में ज्योतिष शास्त्र की भूमिका।

4.लाल किताब एवं वैदिक ज्योतिष का तूलनात्मक अध्ययन।

5.भारतीय युवा एवं युवतिओं में बढ़ती नशाखोरी के कारण एवं ज्योतिषिय निवारण के उपाय।
6. वास्तु में शल्य शोधन, भूमि शोधन तथा जल शोधन में तकनीकि एवं वास्तु शास्त्र की भमिका।
7. राजनीतिक सफलता के योग (हस्त रेखा, टैरो कार्ड एवं अंक विज्ञान)

कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण

सर्वोत्कृष्ट वक्ता, लेखक, शोधपत्र वाचक को ताम्रपत्र (प्रतीक चिह्न), स्वर्ण पदक (गोल्ड मेडल) से सम्मानित किया जायेगा। साथ ही अन्य ज्योतिष के प्रचार-प्रसार करने वाले ज्योतिष प्रतिभागियों को वरीयता के आधार पर ज्योतिष-प्रमाण पत्र भी प्रदान किया जायेगा, इस श्रेणी में उन्हीं को शामिल किया जायेगा जो विगत 5 वर्षों से ज्योतिष, वास्तु, रत्न अवं अंक ज्योतिष के अलावा अन्य संबंधित क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।



विशेष सूचना



00. कार्यालय में 10 अगस्त 2013 तक प्राप्त आलेखों को ही स्मारिका में स्थान दिया जायेगा।
00. आप यदि उपरोक्त किसी भी विषय पर शोधपत्र पढ़ना(भाषण देना) चाहते हैं तो, सम्पूर्ण शोधपत्र की एक प्रतिलिपी (कॉपी) 15 अगस्त 2013 तक स्पीड पोस्ट/ कोरियर द्वारा हमें भेज देवें। वरियता क्रम के आधार पर आपको प्राथमिकता मिलेगी।
00. स्वयं का पासपोर्ट साईज 4 फोटो, शैक्षणिक बॉयोडाटा, स्वयं का पता लिखा 2 लिफाफा अवश्य भेजें, ताकि हमें प्रवेश-पत्र भेजने में आसानी होगी।
00.भोजन एवं आवासीय व्यवस्था नि:शुल्क रखी गई है, परन्तु संस्था द्वारा यात्रा भत्ता देय नहीं होगा। इसमें संस्था आपके सहयोग कि अपेक्षा रखता है।
00.सम्मेलन का पंजीकरण शुल्क मात्र 1100/ रुपये सहयोग के रुप में प्रत्येक प्रतिनिधी से लिया जायेगा।
00.प्रतिनिधि के साथ आये हुए किसी भी व्यक्ति को भोजन एवं आवासीय व्यवस्था नि:शुल्क नहीं की जायेगी।
00.कृपया आप अपने आने की सूचना 5 अगस्त 2013 तक अवश्य दे दें, ताकि आपकी भोजन एवं आवास की समुचित व्यवस्था ठीक ढ़ंग से हो सके।

विशेष अनुरोध
सम्माननीय सभी ज्योतिषियों से अनुरोध है कि पहले से ही अपना रजिस्ट्रेशन करा लें। रजिस्ट्रेशन कराते ही आपको प्रवेश पत्र भेज दिया जायेगा। सहयोग राशि अपने ही शहर के किसी भी बैंक में ज्योतिष का सूर्य के नाम एकाउण्ट नं.14351131000227 ओरिएण्टल बैंक आॅफ कामर्स, उत्तर गंगोत्री, सुपेला, भिलाई के शाखा में जमा कराई जा सकती है। इसके बाद दिये गये फोन अथवा मोबाईल नं. पर उसकी पुष्टि कर दें।



अधिक जानकारी के लिए..यहाँ सम्पर्क करें....
आयोजक:  ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे 9827198828, भिलाई,  संरक्षक -पण्डित श्री दयानन्द शास्त्री.9024390067 (झालरापाटन राजस्थान) एवं रमेश सोनी 9630819481 पर भी संपर्क कर सकते हैं।

नोट- यदि किन्हीं कारण वशात् तिथि एवं स्थान को परिवर्तित करना पड़ा तो इसकी सूचना आपके ''इन्ट्री पास'' में ही दे दी जायेगी। ''इन्ट्री पास'' तैयार होने का बाद निर्धारीत तिथि में कोई फेरबदल नहीं की जायेगी।

शुक्रवार, 21 जून 2013

पर्वतमालाओं की वादियों को मत देखो..केदरनाथ का दर्शन करो..और लौट आओ..नहीं तो महाविनाश तय है

पर्वतमालाओं की वादियों को मत देखो..केदरनाथ का दर्शन करो..और लौट आओ..नहीं तो महाविनाश तय है
Keoejneth(Old)

Pandit Vinod Choubey, 9827198828
  

मित्रों, नमस्कार
अभी बहुत बड़ी दैवीय विभिषिका से हजारों लासों की ढ़ेर बन चुका केदारनाथ में स्वयं प्रभु बाबा भोलेनाथ के अलावा और कोई शेष नहीं बचा, और जो लोग बच गये हैं, उनका कहना है मैने दूसरा जन्म लिया है, अर्थात् इतनी बड़ी त्रासदी का मंजर उनके आँखों में आज भी पानी भर देता है। किन्तु आश्चर्य का विषय तो यह है कि नाथ बचे हुए हैं। यह अपने आप में जरुर चौंकाने वाली बात है, लेकिन चौंकना इसलिए नहीं चाहिए क्योंकि संसार के निर्माण कर्ता स्वयं शम्भु का भला क्या बिगड़ सकता है। किन्तु आज के वास्तु शील्पियों की बढ़ते तादाद और उनका बढ़ता ताम-झाम, लोगों को अपनी ओर सहज ही खिंच लेता है और ये तथाकथित वास्तु विशेषज्ञ  बड़े बड़े दावे भी करने लगते हैं, कि मैं बहुत बड़ा वास्तु विशेषज्ञ हुँ, लेकिन वास्तवीकता तो यह है कि जिस वास्तु संविधान सूत्रों के साथ अपनी विशेषज्ञता श्री श्री आदि शंकराचार्य जी ने इस केदारनाथ बाबा भोलेनाथ की स्थापना कर किये थे। वह आज सभी वास्तु वैज्ञानिकों को सोचने को मजबूर कर दिया है। ज्ञात हो कि काल के गाल में बैठे महाकाल को बतौर जिर्णोद्धार भगवान आदि शंकराचार्य जी ने स्थापित की थी।, और आज वहाँ सबकुछ मिट गया बचा तो केवल नाथ की गर्भ गृह। इसका सारा श्रेय श्री श्री आदिशंकराचार्य जी को देना होगा। और जो मौतें हुईं हैं उनका सारा जिम्मा हम लोगों का है, जो चंद पैसों रुपयों के लालच में वहाँ 50 वर्षों से व्यापार कर रहे थे। साथ ही उन व्यापारियों का प्रोत्साहन हम बड़ी बज़ी खरीदी करके करते थे। देखते ही देखते लगातार धर्मशालाओं की संख्या बढ़ती चली गई और संख्या अनुमनित लगभग 90 पहुँच गईं। लोग बाबा का दर्शन अवश्य करने जाते थे, परन्तु साथ ही हिमालय क वादियों का कुछ देर रुक कर लुत्फ भी उठाते थे, बाद में यहाँ यह कहना लाज़मी होगा कि धिरे-धिरे मंदिर का दर्शन करना तो कम वादियों का दर्शन करना प्रमुख होता जा रहा था। जो आज कई हजार श्राद्धालुओं को अपना जान गंवाना पड़ा। हालाकि शास्त्र सम्मात शिव दर्शन में एक व्िषेष नियम है कि भगवान शिव की आधी प्रदक्षिणा की करनी चाहिए , जिसका सीछा अर्थ है कि बाकी मंदिरों की अपेक्षा शिवमंदिर में कम से कम रुकना चाहिए क्योंकि वे निष्णात पंथी शिव अकेले ही रहना पसंद करते हैं। लेकिन उनके विपरीत केदार नाथ में अधिक से अधिक लोग ऐसे दर्शनार्थी हैं जो वहाँ जाकर दो या तीन दिन रुकना चाहते हैं ताकि पर्वतमालाओं का भरपूर लुत्फ उठाया जा सके।
किन्तु ऐसा करने से निश्चित महाकाल की वक्र निगाहें जमिन्दोज करने को मजबूर कर देती है। या यूँ कहें कि अनावश्यक शिव की समीपता उनके तीसरे नेत्र को खोलने को मजबूर कर देती है।  और उस भयावह स्थिति से निपटना हमारे आपके कुबत की बात नहीं। शिव के प्रति समर्पण की भावना रखिये समिपता की नहीं। यदि समिपता रखना चाहते हैं प्योर धर्मध्वज वाहक नन्दी जैसा और माँ पार्वती तथा उद्योग के प्रतीक गणेश जैसा बनना पड़ेगा, यदि स्कन्द बनना चाहते हो तो निश्चित ही आपको कैसाश से क्रौंच पर्वत की आना होगा। अर्थात हम लोगों को भगवान शिव की समिपता कत्तई उचित नहीं है।
हालाकि जो हुआ वह बहुत गलत हुआ हमारी सभी संवेदनाएं उन धर्मभीरु तीर्थयात्रियों के साथ है। और जिनके परिजन कालकवलित हुए हैं उनको इश्वर शक्ति प्रदान करें कि वे इस दुःख की घड़ी को बर्दाश्त कर पायें।
आईए विकिपिडिया (hi.wikipedia.org/wiki/केदारनाथ_मन्दिर‎) से संलित किया हुआ केदारनाथ जी के बारे में कुछ अंश पढ़ने, व जानने की कोशिश करते हैं- उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ और केदारनाथ-ये दो प्रधान तीर्थ हैं, दोनो के दर्शनों का बड़ा ही माहात्म्य है। केदारनाथ के संबंध में लिखा है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किये बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल जाती है और केदारनापथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों के नाश पूर्वक जीवन मुक्ति की प्राप्ति बतलाया गया है।
इस मन्दिर की आयु के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, पर एक हजार वर्षों से केदारनाथ एक महत्वपूर्ण तीर्थयात्रा रहा है। राहुल सांकृत्यायन के अनुसा ये १२-१३वीं शताब्दी का है। ग्वालियर से मिली एक राजा भोज स्तुति के अनुसार उनका बनवाय हुआ है जो १०७६-९९ काल के थे। एक मान्यतानुसार वर्तमान मंदिर ८वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा बनवाया गया जो पांडवों द्वारा द्वापर काल में बनाये गये पहले के मंदिर की बगल में है। मंदिर के बड़े धूसर रंग की सीढ़ियों पर पाली या ब्राह्मी लिपि में कुछ खुदा है, जिसे स्पष्ट जानना मुश्किल है। फिर भी इतिहासकार डॉ शिव प्रसाद डबराल मानते है कि शैव लोग आदि शंकराचार्य से पहले से ही केदारनाथ जाते रहे हैं। १८८२ के इतिहास के अनुसार साफ अग्रभाग के साथ मंदिर एक भव्य भवन था जिसके दोनों ओर पूजन मुद्रा में मूर्तियाँ हैं। “पीछे भूरे पत्थर से निर्मित एक टॉवर है इसके गर्भगृह की अटारी पर सोने का मुलम्मा चढ़ा है। मंदिर के सामने तीर्थयात्रियों के आवास के लिए पण्डों के पक्के मकान है। जबकि पूजारी या पुरोहित भवन के दक्षिणी ओर रहते हैं। श्री ट्रेल के अनुसार वर्तमान ढांचा हाल ही निर्मित है जबकि मूल भवन गिरकर नष्ट हो गये।” केदारनाथ मन्दिर रुद्रप्रयाग जिले मे है!
यह मन्दिर एक छह फीट ऊँचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है। मन्दिर में मुख्य भाग मण्डप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। बाहर प्रांगण में नन्दी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं। मन्दिर का निर्माण किसने कराया, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन हाँ ऐसा भी कहा जाता है कि इसकी स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी।

    इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास संक्षेप में यह है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं।
    पंचकेदार की कथा ऐसी मानी जाती है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों से रुष्ट थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतध्र्यान हो कर केदार में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हो गया था। अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतध्र्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया। भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतध्र्यान हुए, तो उनके धड से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां पशुपतिनाथ का मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमदेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदारकहा जाता है। यहां शिवजी के भव्य मंदिर बने हुए हैं।
ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, संपादक- '' ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका , भिलाई 9827198828
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.