ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

आरोग्यता के साथ ही धन-समृद्धि का आगमन होगा शरद पुर्णिमा को......

ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, 
संपादक- ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई, 98271- 98828
 18 अक्टूबर 2013 को चंद्र 16 कलाओं से पूर्ण अपनी धवल प्रकाश से आच्छादित गगन में विराजित चंद्र न केवल अमृत की वर्षा करते हैं बल्कि आरोग्यता, सुख, सौभाग्य लक्ष्मी और अचल संपत्ति को भी अपने भक्तों को प्रदान करते हैं। शरद पूर्णिमा के शुभ अवसर पर सुबह उठकर व्रत करके अपने इष्ट देव का पूजन करना चाहिए। इन्द्र और महालक्ष्मी जी का पूजन करके घी के दीपक जलाकर, गंध पुष्प आदि से पूजन करना चाहिए। ब्राह्मणों को खीर का भोजन कराना चाहिए और उन्हें दान दक्षिणा प्रदान करनी चाहिए। लक्ष्मी प्राप्ति के लिए इस व्रत को विशेष रूप से किया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन जागरण करने वाले की धन-संपत्ति में वृद्धि होती है।

* इस व्रत को मुख्य रूप से स्त्रियों द्वारा किया जाता है।
* उपवास करने वाली स्त्रियां इस दिन लकड़ी की चौकी पर सातिया बनाकर पानी का लोटा भरकर रखती हैं।
* एक गिलास में गेहूं भरकर उसके ऊपर रुपया रखा जाता है और गेहूं के 13 दाने हाथ में लेकर कहानी सुनी जाती है।
* गिलास और रुपया कथा कहने वाली स्त्रियों को पैर छूकर दिए जाते हैं।

 ज्योतिष के अनुसार
मीन राशि में चंद्र, मिथुन में वृहस्पति, सूर्य, बुध, शनि और राहु तुला राशि में तथा नवमांश में चन्द्र वृश्चिक राशि में होंगे जो नवपंचम योग बना रहे हैं अत: कफ, वात दोनों रोग से पिड़ीत जनों के लिए आज के दिन औषधी ग्रहण करना बेहद लाभकारी सिद्ध होगा । साथ ही समुद्र के देवता वरुण के साथ लक्ष्मी, कुबेर का पूजन करना धन, समृद्धि के साथ दामपत्य जीवन के संबंधों में प्रेमामृत की भरपूर पूर्ति करेगा। अत: आज की रात्रि बेहद शुभकारक है।

शरद पूर्णिमा
शरद पूर्णिमा जिसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहते हैं हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा को कहते हैं। यूं तो हर माह में पूर्णिमा आती है लेकिन शरद पूर्णिमा का महत्व उन सभी से कहीं अधिक है। हिंदू धर्म ग्रंथों में भी इस पूर्णिमा को विशेष बताया गया है। ज्?योतिष के अनुसार, पूरे साल में केवल इसी दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। हिन्दी धर्म में इस दिन कोजागर व्रत माना गया है। इसी को कौमुदी व्रत भी कहते हैं। इसी दिन श्री कृष्ण ने महारास रचा था। शरद पूर्णिमा से जुड़ी कई मान्यताएं हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चंद्रमा की किरणें विशेष अमृतमयी गुणों से युक्त रहती हैं जो कई बीमारियों का नाश कर देती हैं। यही कारण है कि शरद पूर्णिमा की रात को लोग अपने घरों की छतों पर खीर रखते हैं जिससे चंद्रमा की किरणें उस खीर के संपर्क में आती है और उसके बाद उस खीर का सेवन किया जाता है। कुछ स्थानों पर सार्वजनिक रूप से खीर का प्रसाद भी वितरण किया जाता है।

कथा
एक साहुकार के दो पुत्रियाँ थी। दोनो पुत्रियाँ पुर्णिमा का व्रत रखती थी। परन्तु बडी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधुरा व्रत करती थी। परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की सन्तान पैदा ही मर जाती थी। उसने पंडितो से इसका कारण पूछा तो उन्होने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी जिसके कारण तुम्हारी सन्तान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पुरा विधिपुर्वक करने से तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती है।
उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। उसके लडका हुआ परन्तु शीघ्र ही मर गया। उसने लडके को पीढे पर लिटाकर ऊपर से पकडा ढक दिया। फिर बडी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पीढा दे दिया। बडी बहन जब पीढे पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया। बच्चा घाघरा छुते ही रोने लगा।बडी बहन बोली- तु मुझे कंलक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता। तब छोटी बहन बोली, यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है। उसके बाद नगर में उसने पुर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।

विधान
इस दिन मनुष्य विधिपूर्वक स्नान करके उपवास रखे और जितेन्द्रिय भाव से रहे। धनवान व्यक्ति ताँबे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढँकी हुई स्वर्णमयी लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करके भिन्न-भिन्न उपचारों से उनकी पूजा करें, तदनंतर सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के घी से भरे हुए 100 दीपक जलाए।इसके बाद घी मिश्रित खीर तैयार करे और बहुत-से पात्रों में डालकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखें। जब एक प्रहर (3 घंटे) बीत जाएँ, तब लक्ष्मीजी को सारी खीर अर्पण करें। तत्पश्चात भक्तिपूर्वक सात्विक ब्राह्मणों को इस प्रसाद रूपी खीर का भोजन कराएँ और उनके साथ ही मांगलिक गीत गाकर तथा मंगलमय कार्य करते हुए रात्रि जागरण करें। तदनंतर अरुणोदय काल में स्नान करके लक्ष्मीजी की वह स्वर्णमयी प्रतिमा आचार्य को अर्पित करें। इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं और मन ही मन संकल्प करती हैं कि इस समय भूतल पर कौन जाग रहा है? जागकर मेरी पूजा में लगे हुए उस मनुष्य को मैं आज धन दूँगी।
यथासंभव शाम या रात ही नहीं, सुबह भी इस मंत्र से मां लक्ष्मी का ध्यान कर लाल गंध, लाल अक्षत, लाल फूल, दूध की मिठाई या खीर का नैवेद्य अर्पित कर पूजा करें -
भवानि त्वं महालक्ष्मी: सर्वकामप्रदायिनी। सुपूजिता प्रसन्ना स्यान्महालक्ष्मि नमोस्तुते।।
नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरिप्रिये। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा में भूयात् त्वदर्चनात्।।

ध्यान व पूजा के बाद लाल आसन पर पूर्व दिशा में मुख कर बैठ मां लक्ष्मी के इस सरल मंत्र का यथाशक्ति जप करें। बाद आरती करें -
पुत्रपौत्रं धनं धान्यं हस्त्यश्वादिगवेरथम् प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे।
इस प्रकार प्रतिवर्ष किया जाने वाला यह कोजागर व्रत लक्ष्मीजी को संतुष्ट करने वाला है। इससे प्रसन्न हुईं माँ लक्ष्मी इस लोक में तो समृद्धि देती ही हैं और शरीर का अंत होने पर परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं।
(लेखक ज्योतिष एवं वास्तु पर आधारीत राष्ट्रीय मासिक पत्रिका ''ज्योतिष का सूर्य'' के संपादक एवं धर्म-संस्कृति के लिए पूर्णत: समर्पित धर्म-सचेतक हैं)
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