ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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आप सभी प्रिय साथियों का स्नेह है..

बुधवार, 23 अगस्त 2017

अखण्ड सौभाग्य प्रदान करने वाले हरतालिका व्रत (तीजा) महापर्वशुभ मुहूर्त..


आप सभी माता एवं बहनों को मेरी ओर से यानी पण्डित विनोद चौबे 9827198828 की ओर से सादर प्रणाम एवं अभिवादन साथ ही अखण्ड सौभाग्य प्रदान करने वाले हरतालिका व्रत (तीजा) महापर्व पर अनंत शुभकामनाएं....प्रस्तुत है व्रत करने का शुभ मुहूर्त.....एवं संक्षिप्त व्रत विधान.....

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

ऊँ गणानां त्वा गणपतिं... 25 अगस्त शुभ मुहूर्त में करें गणेश स्थापना व पूजन ..(शोधपूर्ण आलेख अवश्य पढ़ें)

25 अगस्त को होगी पंडालों में गणेश-प्रतिमाओं का अनावरण.... ऊँ गणानां त्वा गणपतिं... 25 अगस्त शुभ मुहूर्त में करें गणेश स्थापना व पूजन ..(शोधपूर्ण आलेख अवश्य पढ़ें, शुभ मुहूर्त की पूर्ण जानकारी)

गणेश शब्द की व्युत्पत्ति हुई है गणानां जीवजातानां यः ईशः स्वामी सः गणेशः से। अर्थात,जो समस्त जीव जाति के ईश-स्वामी हैं वह गणेश हैं। इनकी पूजा से सभी विघ्न नष्ट होते हैं।

आईये वेदों में गणेश जी को समझने का प्रयास करते हैं ...

क्या पौराणिक 'गणपति' और 'पूज्य गणपति' में क्या अन्तर है..? क्या ये दोनों गणेश विग्रह अलग अलग हैं ? इस हम समझने का प्रयास कर रहे हैं.....संस्कृत विद्वद्जनेषु द्वारा ज्ञातुम शक्नोमि स्म.... अहो 'अन्तर्नाद व्हाट्सएप 9827198828 ग्रुप' समूहस्य जना: श्रुयताम्....
" गणानां त्वा गनपतिं हवामहे...."(२\२३\१) एवं "विषु सीदा गणपतेः"(१०\११२\९) गणपतेः धारणां जनयन्ति। यद्यपि पौराणिकगणेशस्य वर्तमाने पूज्यमानस्य गणेशस्य च भेदाः सन्ति तथापि नैके विशारदाः मन्यन्ते यत्-"गणपति-ब्रह्मणस्पति"-तः एव "गजवदन-गणेश-विघ्नेश्वर"स्य धारणा विवर्तितास्ति।(Hindu Gods and Goddesses, Swami Harshananda, Sri Ramakrishna Math, Chennai, 1981, p.125)

ऋग्वेदकालिकस्य गणपतेः वृहस्पतिः, वाचस्पतिः इति च अपरनाम आसीत्। गणेशः सर्वदा नृत्यसंगीतकारीसमूहे (यच्च 'गणः’ इत्युच्यते) विराजमानः भवति । तथा देवतानां रक्षकरूपेणैव कल्पितः आसीत्।(Hindu Gods and Goddesses, Swami Harshananda, Sri Ramakrishna Math, Chennai, 1981, p. 125-27)

भिन्नमतानुसारेण, भारतवर्षस्य आदिवासीजनैः पूजिता हस्तिदेवता एवञ्च लम्बोदरयक्षस्य कल्पनायाः मिश्रणेन एव गणेशस्य उद्भवः जातः । इति 'गणपति' 'ब्राह्मणस्पति:' द्वौ विग्रह: संयोज्य भवताम् समक्ष प्रस्तुत कर्तुमीति च!

(उपरोक्त संदर्भ को संस्कृत में रखने का प्रयास किया हुं, उम्मीद है कुछ त्रुटियां सम्भावित है परन्तु हमने पूरी कोशीश की है की शुद्ध, सिद्ध एवं शोधपूर्ण हो सके)

 गणेश जन्म की कई कथायें हैं, हर युग में अलग अलग अवतार की बात कही गई है ! मैं उस मत-मतांतर में नहीं जाना चाहता लेकिन मां पार्वती ने अपनी शरीर में लगाई उवटन के झल्लियों (मैल) से एक पुतले का निर्माण कर उसमें प्राण का समावेश किया और उसे द्वार पर बैठाकर स्वयं स्नानागार में स्नान करने चलीं गईं, और मां पार्वती ने कहा था उस बालक से तुम किसी को अन्दर प्रविष्ट मत होने देना. उसी समय शिव जी का आगमन होता है और वे अन्दर जाने का हठ करते हैं, वह बालक उनसे युद्ध करने की चुनौति देता है, और कहता है मां का आदेश है मैं आपको घर के अन्दर प्रवेश नहीं करने दूंगा ! उसी युद्ध में भगवान शिव ने उस बालक का सर धड़ से अलग कर दिया.. बाद में उसी बालक के धड़ पर पुन: हाथी के सर को जोड़ा गया ! वही बालक गणेश हुए ! अब इसी क्रम को  आगे बढाते हुए...*अन्तर्नाद* व्हाट्सएप ग्रुप के साथियों... गणेश जी प्रथम पूज्य गणेश की आराधना सनातनी-संस्कारों, मांगलिक कार्यों सहित कामनापरक हो या निष्काम अनुष्ठानादिक यज्ञ सभी उत्सवों, महोत्सवों में प्रथम पूजन व अर्चन गणेश जी की होती है ! इसके पिछे एक पौराणिक प्रसंग है ! एक बार पूरे ब्रह्माण्ड का परिक्रमा करने की बात भगवान शिव ने कही, साथ में शर्त थी स्कन्द और गणेश दोनों मे प्रथम परिक्रमा जो लगाकर आयेगा उसका विवाह ऋद्धि- सिद्धी से होगा ! मयूर वाहन पर सवार होकर षडानन कार्तिकेय स्कन्द ब्रह्माण्ड परिक्रमा करने निकल पड़े, वहीं गणेश जी मूषक वाहन पर सवार होकर कैलाश पर्वत पर बैठे अपने माता-पिता का परिक्रमा कर गणेश जी ने कहा पूरे ब्रह्माण्ड में सर्वाधिक पूज्य माता-पिता हैं ! यह देख प्रशन्न होकर भगवान शिव ने गणेश को प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया ! कुल मिलाकर 'मातृ देवो भव:, पितृ देवो भव:' की परिकल्पना केवल भारतीय संस्कृति के सनातन-संविधान-सूत्र ग्रंथो में ही की गई है ! 

गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास की चतुर्थी से चतर्दर्शी तक यानी दस दिनों तक चलती है। इस बार ये 11 दिन चलेगी।

 वरद गणेश चतुर्थी  24/8/2017 को रात्रि 9:15 बजे आरंभ होकर 

चतुर्थी तिथि समाप्ति = 25 / अगस्त / 2017 बजे 9:22 बजे 09:01

गणेश जी को इस मंत्र से प्रसन्न करना चाहिए:

*गणेश प्रतिमा स्थापन का विशेष मुहूर्त*

11:00 से 13:30 अवधि = 2 घंटे 30 मिनट !

(धर्म शास्त्रों में 'तजऊ चौथि चंद की नाईं' यानी भाद्रपद सुदी गणेश चौथ को चन्द्र दर्शन वर्जित है, इससे प्रसेनजीत के स्यमन्तक मणी एवं श्रीकृष्ण से जुड़ी कथा है स्यमन्तक मणी के चोरी करने का कृष्ण पर कलंक लगा था ! - ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, 9827198828)

वर्जित चन्द्र दर्शन का समय = 24/8/2017 को रात्रि  8:27 बजे से  8:35 तक यानी केवल 8 मिनट तक ही चन्द्र दर्शन वर्जित है !

वर्जित चन्द्र दर्शन का समय :

25/8/2017 को  प्रात: 0 9: 01 से रात्रि 09 :15 अवधि = 12 घंटे 13 मिनट तक चन्द्र दर्शन वर्जित है !

दिन की चौघड़िया मुहूर्त :

चर     09:31:19 - 11:06:19
लाभ     11:06:19 - 12:41:19
अमृत     12:41:19 - 14:16:20
शुभ       15:51:20 - 17:26:20

रात की चौघड़िया मुहूर्त:

लाभ     20:26:20 - 21:51:20
शुभ     23:16:20 - 24:41:19

25 / 8/ 2017 को गणेश प्रतिमा की स्थापना होगी और 11 वें दिन (अनंत चतुर्दशी) गणेश विसर्जन 5 सितंबर, 2017 को होगा।
कुछ लोग गणेश चतुर्थी के अगले दिन गणेश विसर्जन करते हैं, हालांकि कुछ लोग गणेश चतुर्थी के बाद 3, 5, 7, 10 वें और 11 वें दिन पर गणेश विसर्जन करते हैं।
 विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय |
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते ||

-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे,
''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका 9827198828

वैदिक दर्शन का बड़ा चोर- स्टीफन हॉकिंग

वैदिक दर्शन का बड़ा चोर- स्टीफन हॉकिंग...

'दुर्गम' नामक राक्षस कहा जाये तो कम नहीं...मैं इसलिये ऐसा कह रहा हुं क्योंकि मार्कण्डेय पुराण में 'दुर्गम' नामक राक्षस स्वयं की पूजा कराने के लिये चारों वेद एवं छः शास्त्रों का चोरी कर लिया था और उनकों कन्दराओं में छिपा दिया था। ऐसा इसलिये किया था क्योंकी वह पृथ्वी को वैदिक संस्कृति से अलग करना चाहता था। बाद में देव, ऋषि, गंधर्वों में हाहाकार मटने के बाद शक्ति का प्राकट्य हुआ और मां शक्ति ने उस राक्षस का वध किया तो 'दुर्गम' नामक राक्षस के वध करने से उसी शक्ति का नाम दुर्गा पड़ा....मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि -  स्टीफन हॉकिंग जैसे असंख्य भारतेतर वैज्ञानिकों ने हमारे देश के ऋषियों द्वारा किये गये शोध और वेदों में वर्णित शोध-सूत्रों को लेकर थोड़ा बहुत नवीनता करके उस खोज को अपने नाम कर लिये और हमारे देश का खराब सिस्टम तथा 'सेक्यूलरिज्म के पिठ्ठू नेताओं'' ने जरा भी उधर ध्यान नहीं दिया , ना ही उस दिशा में कोई प्रयास किया ताकी हमारी वैदिक शोध संरचनाओं को संजोया जा सके....खैर आईय़े आगे चर्चा बढ़ाते हैं...

भारतीय दर्शन से चोरी करके अपने नाम से सिद्धांत गढ़ देना पाश्चात्य वैज्ञानिकों की पुरानी आदत है। हर खगोलीय सिद्धांत उन्होंने उपनिषदों से या वैदिक धारणाओं से चुराया और अपने नाम से गढ़ दिया। भारतीय ऋषियों को तो अपनी शोध के आगे नाम न लिखने की त्याग भावना थी और इन आधुनिक वैज्ञानिकों को चोरी के माल को अपने नाम से कर लेने की आदत है। मैं कुछ ऎसे सिद्धांत, जो भारतीय परम्परा से उड़ा लिए गए उनकी चर्चा करके और उनके उस नए सिद्धांत की चर्चा करूंगा जिसमें उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व को ही नकार दिया है।
1. विश्व को माया माना गया है। वेदांत के अन्तर्गत ईश्वर सृष्टि को प्रकट करने के लिए माया का सहारा लेते हैं। माया को मिथ्या माना गया है।
2. स्टीफन हॉकिंग्स ने ब्लैकहोल का सिद्धांत बताते हुए उसे वैदिक अवधारणाओं की तरफ ले जाने का प्रयास किया।
3. "ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम" में उन्होंने स्पष्टत: स्वीकार किया कि बिग बैंग (खगोलीय महाविस्फोट) से ठीक पहले ब्रह्माण्डीय रचना जाल की कोई न कोई योजना ईश्वर प्रदत्त थी। वे स्वीकार कर चुके थे कि ब्लैकहोल का सिद्धांत पहले से मौजूद था और 200 वर्ष के चिंतन के बाद अमेरिकन वैज्ञानिक व्हीलर ने इसे प्रकट किया।
4. इससे पूर्व भी "शून्य" की अवधारणा भारतीय वाङग्मय में उपलब्ध थी जो पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने ग्रहण की।
5. श्रीपति ने कैपलर से सैकड़ों वर्ष पूर्व कक्षाओं के दीर्घवृत्त में होने का तर्क प्रस्तुत किया था।
6. ग्रहों की अवधारणा में भारतीयों ने बहुत पहले बता दिया था कि असंख्य मंदाकिनियां खगोल मे उपलब्ध हैं और उनके अलग-अलग ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं। गर्ग संहिता और ब्रह्मवैवर्त पुराण मे इस अवधारणा को खुलकर कहा गया है। अब हम जानते हैं कि असंख्य मंदाकिनियां हैं परन्तु पाश्चात्य वैज्ञानिक इनकी योजक कडिय़ों को नहीं खोज पाए हैं। गर्ग संहिता बताती है कि भगवान कृष्ण ही इन सबके महायोजनाकार हैं।
7. भारतीय ज्योतिष मे मंगल को भूमि पुत्र कहा गया है। आधुनिक खगोल शास्त्री आज तक यह सिद्ध नहीं कर पाए हैं कि यह पृथ्वी से कब अलग हुआ।
8. बुध को चन्द्र तनय कहा गया है। ऎसा तब कभी हुआ होगा जब पृथ्वी और सूर्य के बीच मे चन्द्रमा एक बड़ा पिण्ड था और सूर्य के आकर्षण से वह टूट गया और बुध, शुक्र की परिक्रमा को पार करके भी सूर्य का सबसे निकटस्थ ग्रह हो गया। ऎसी घटनाएं होती रहती हैं परन्तु भारतीय ऋषियों को इसका पता था और खगोल वैज्ञानिक इस खोज को उड़ा ले गए। पौराणिक मिथक हैं कि बुध को लेकर चन्द्रमा और बृहस्पति में प्रतिद्वंद्विता थी। शास्त्र बताते हैं कि आधुनिक बुध, बृहस्पति की परिक्रमा में भी जा सकता था। इससे संकेत है कि बृहस्पति और शुक्र के गुरूत्वाकर्षण बल अत्यधिक रहे हैं और संभवत: सूर्य के टूटने की प्रक्रिया में बृहस्पति कदाचित् सबसे बड़ा पिण्ड रहा होगा। सौरमण्डल में आज भी बृहस्पति सबसे बड़े हैं।
9. राहु-केतु की अवधारणाएं तब दी गई जबकि कोई दूरबीन नहीं थी और ग्रहों को नंगी आंखों से देखा जाना या समझ पाना बहुत मुश्किल था। फिर राहु-केतु तो अदृश्य थे व गणितीय बिन्दु थे। न केवल उनकी स्थिति का पता लगाया गया बल्कि उनकी गति का भी पता लगाया गया। परन्तु यह सिद्धांत पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने उठा लिया।
10. सूर्य के स्पैक्ट्रम को लेकर भी वैदिक ऋषि एकदम स्पष्ट थे और उन्हें सप्ताश्व या सप्तरश्मि बताया गया। द्वादश आदित्य के सिद्धांत के माध्यम से भी उन्होंने सूर्य के विभिन्न वर्गीकरण किए जो कि आगे चलकर राशियों इत्यादि के आधार बने। यह सब किसी न किसी रूप मे वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया और अपनी-अपनी शोध में इसे शामिल किया।
11. अखिल ब्रह्माण्ड के कई आयामी होने और निरन्तर विस्तार की अवधारणाएं भारतीय दर्शनों मे मिलती हैं। यह बात बाद में पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने अपना ली।
12. स्वयं स्टीफन हॉकिंग्स ने न्यूटन और आइंस्टीन का हवाला देकर यह स्वीकार किया कि ब्रह्माण्ड के विस्तार की गति निरन्तर बढ़ रही है तथा किसी भी घटना का भूत और भविष्य दोनों होता है।
13. अनंत गति का सिद्धांत पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने बहुत बाद मे स्वीकार किया। वे हाल तक भी सूर्य रश्मियों की गति से अधिक किसी भी अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। मन की गति पर अब शोध चल रही हैं।
14. जीव या आत्मा या चैतन्य के सिद्धांत को वैज्ञानिक आधार पर प्रमाणित करने में बहुत बाधा थी। चैतन्य या आत्मा नित्य है और सत्य है तथा वह विभिन्न कायाओं में प्रवेश कर सकती है, इसका वैज्ञानिक परीक्षण असंभव था इसलिए वैज्ञानिकों को स्वीकार्य भी नहीं हुआ। आत्मा ईश्वर का ही कोई रूप है, इस महायोजना को वैज्ञानिक एकदम स्वीकार नहीं कर पाए परन्तु जैनेटिक्स को मान्यता देते हुए तथा पूर्व जन्म के कर्म तथा स्मृति जीन के माध्यम से एक जन्म से दूसरे जन्म में प्रवाहित हो जाती है, को स्वीकार करके वैज्ञानिकों ने अप्रत्यक्ष रूप से कर्मफल या पुनर्जन्म के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया था।
15. बौद्ध दर्शन ने और जैन दर्शन ने पुनर्जन्म के सिद्धांत की पुनप्र्रतिष्ठा की। बौद्ध दर्शन तो यहां तक मानता है कि प्रति क्षण नया जन्म होता है और प्रत्येक कण अगले क्षण मे गत क्षण की स्मृतियों को अवतरित कर लेता है। यह मत जैनेटिक्स के आधार पर भी खरा उतरता है। पाश्चात्य वैज्ञानिक अप्रत्यक्ष रूप से कुछ बातों को स्वीकार करते हैं। हैं।
स्टीफन हॉकिंग्स की नई व्याख्या
स्टीफन हॉकिंग्स ने 1988में लिखी अपनी पुस्तक की मूल अवधारणाओं से उलट नई अवधारणाएं दे दीं। इसमें उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व को ही नकार दिया है और यह कहा है कि विश्व की उत्पत्ति और उसके नियम स्वयंचालित हैं और इसके लिए किसी ईश्वर की आवश्यकता नहीं है। हम स्टीफन के कुछ पूर्व में स्वीकार किए गए तथ्यों का उल्लेख यहां करते हैं कि वे कैसे ईश्वरवादी थे और अब पलट गए हैं।
ब्लैक होल
स्टीफन हॉकिंग्स ने ब्लैक होल का सिद्धांत यह मानते हुए दिया कि किसी महाविस्फोट के समय एक सूक्ष्म बिन्दु जो अत्यंत उच्चातम तापमान पर था, ने विस्तार पाना शुरू किया। इसके तुरन्त कुछ क्षण बाद ही तापमान करोड़ों डिग्री नीचे गिर गया। विश्व के अनन्त विस्तार में तापमान हर क्षण गिरता रहा। उनका मानना है कि जैसे-जैसे भौतिक सृष्टि का विस्तार होता है, केन्द्र बिन्दु का तापमान लगातार गिरता चला जाता है और वह एक अनन्त विस्तार के बाद पुन: महाविस्फोट जैसी स्थिति में आ जाता है। ऎसी कल्पनाओं को देते समय उन्होंने यह माना कि न्यूटन के गति के दूसरे नियम का उल्लंघन कहीं हो सकता है।
इस क्रम में ब्लैक होल अंतरिक्ष में कहीं-कहीं रह गये। यह ड्डठ्ठह्लद्बद्वड्डह्लह्लद्गह्म् या सृष्टि के विपरीत क्रम का एकमात्र केन्द्र बिन्दु नहीं था। ब्लैक होल के बारे में उनकी धारणा यह थी कि इसमें गया हुआ कोई भी प्रकाश का कण अंदर ही अंदर समाहित हो सकता है। ब्लैक होल के अंदर गये हर पदार्थ का उसमें अंदर ही समाहित हो जाना उसकी अंतिम नियति है। बहुत बाद में हॉकिंग्स ने माना कि ब्लैक होल जगत् का अंतिम स्थान नहीं है, बल्कि उसके परे भी अन्य जगत् या किसी जगत् का बाकी भाग हो सकता है। प्रारंभिक धारणा यही थी कि ब्लैक होल में कुछ भी पदार्थ या कण या कोई तरंग जाने के बाद वापस नहीं आ सकती। बाकी भाग हो सकता है। प्रारंभिक धारणा यही थी कि ब्लैक होल में कुछ भी पदार्थ या कण या कोई तरंग जाने के बाद वापस नहीं आ सकती।
महाविस्फोट से पूर्व की स्थिति में अत्यंत उच्च्तम तापमान के कारण कोई भी दो अणु या परमाणु आपस में जुड़ नहीं सकते, वे बहुत तीव्र गति से एक-दूसरे के पास-पास गमन करते रहेंगे। हम जिस भौतिक सृष्टि को देखते हैं उसके निर्माण की एक ही शर्त है कि तापमान कम होता चला जाये। जब बहुत ठण्डा हो जायेगा, तब पदार्थ के दो कण आपस में जुडऩे की स्थिति में आ सकते हैं। यही सृष्टि के विस्तार और अस्तित्व का रहस्य है।
भारतीय ऋषि जिस एक सिद्धांत पर कार्य करते रहे थे, वह यही था कि अंतिम सत्य ऊर्जा और गति में निहित है। ऊर्जा भी अंतिम सत्य नहीं हो सकता, क्योंकि ऊर्जा होने या न होने से गति कम या अधिक हो सकती है। इसीलिए भारतीय ऋषियों ने गति को अंतिम स्थान दिया। यह ईश्वर के सबसे निकटतम वाला एक तथ्य है। अगर गति अनन्त हुई तो कोई भी सूक्ष्म पदार्थ ईश्वर के अस्तित्व के लगभग पास तक पहुंच जायेगा। अगर गति अत्यन्त क्षीण हुई तो वह पदार्थ का कण भौतिक सृष्टि में बदल जायेगा। वैदिक दर्शन के हजारों वर्ष बाद न्यूटन व आईन्सटीन व बाद में हॉकिंग ने इन्हीं सब तथ्यों पर अपना मस्तिष्क खपाया और किसी भी नये निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सके।
हॉकिंग्स ने यह माना कि जितना ब्लैक होल का द्वड्डह्यह्य (आईन्सटीन के श्व=रूष्ट का रू) कम होगा, उतना ही अधिक उसका तापमान होगा और उतना ही अधिक तेजी से तापमान का विकिरण होगा, नतीजे के तौर पर ब्लैक होल का द्वड्डह्यह्य तेजी से कम होता चला जायेगा। वह यह कल्पना नब्बे के दशक में व वजन लगभग शून्य तक पहुंच जायेगा तो वह अंतिम भयानक महाविस्फोट में बदल जायेगा जोकि करोड़ों हाइड्रोजन बमों की ऊर्जा के विकिरण के रूप में प्रकट होगा। हम यह कह सकते हैं कि हॉकिंग्स अपनी कल्पनाओं के जाल में यद्यपि उलझ गये थे, पर वह सृष्टि की उत्पत्ति के रहस्य को तब तक ईश्वर के आधीन ही मान रहे थे। अब वह पुन: मैदान में आये हैं और अपनी नई पुस्तक "द ग्रांड डिजाइन" में उन्होंने अपनी मुख्य धारणाओं को उलटते हुए ईश्वर के अस्तित्व को मानने से इंकार कर दिया है और कहा है कि प्रकृति अपने स्वयं के नियमों से ही संचालित है और उसमें ईश्वर या ऎसी किसी सत्ता का अस्तित्व नजर नहीं आता। कर चुके थे कि जब ब्लैक होल का आयतन व वजन लगभग शून्य तक पहुंच जायेगा तो वह अंतिम भयानक महाविस्फोट में बदल जायेगा जोकि करोड़ों हाइड्रोजन बमों की ऊर्जा के विकिरण के रूप में प्रकट होगा। हम यह कह सकते हैं कि हॉकिंग्स अपनी कल्पनाओं के जाल में यद्यपि उलझ गये थे, पर वह सृष्टि की उत्पत्ति के रहस्य को तब तक ईश्वर के आधीन ही मान रहे थे। अब वह पुन: मैदान में आये हैं और अपनी नई पुस्तक "द ग्रांड डिजाइन" में उन्होंने अपनी मुख्य धारणाओं को उलटते हुए ईश्वर के अस्तित्व को मानने से इंकार कर दिया है और कहा है कि प्रकृति अपने स्वयं के नियमों से ही संचालित है और उसमें ईश्वर या ऎसी किसी सत्ता का अस्तित्व नजर नहीं आता।
स्टीफन हॉकिंग्स की किसी भी कल्पना को हम ऎसे ही स्वीकार नहीं कर सकते। दुनिया में कोई भी वैज्ञानिक धरती पर दिखने वाली सामान्य-सी घटनाओं का विश्लेषण नहीं कर सकता। उदाहरण के तौर पर :-
1. ब्रह्माण्ड में जितने भी प्राणी हैं, वे साँस क्यों लेते हैं और सबकी श्वसन प्रणाली एक जैसी क्यों हैक्
2. समस्त प्राणियों की रक्त संचार प्रणाली एक जैसी क्यों हैक्
3. समस्त प्राणियों का जीवन-चक्र लगभग निर्धारित क्यों हैक्
4. भौतिक सृष्टि के अतिरिक्त समस्त प्राणियों के अंदर वह चेतना किसी न किसी रूप में क्यों रहती हैक्
5. जगत् के हर कण के अंदर एक स्मृति समूह होता है, वह अनन्त काल तक जारी रह सकता है, चाहे वह कण कितने ही पुनर्जन्म ले ले। इन स्मृतियों का भौतिक अस्तित्व से क्या संबंध हैक्
6. पुनर्जन्म की घटनायें पृथ्वी पर कहीं न कहीं मौजूद हैं। वे गत शरीर की स्मृतियों को साक्षात् करती हैं। स्टीफन हॉकिंग्स का कोई भी नियम इन घटनाओं की पुष्टि नहीं कर पायेगा।
7. गति, ऊर्जा व गुरूत्वाकर्षण बल अपने आप कैसे उत्पन्न हो गयेक् बिना कारण के कोई घटना कैसे जन्म ले सकती हैक्
8. ऊर्जा क्षय क्यों नहीं होती हैक् सृष्टि को रूप बदल-बदल कर संचालित क्यों करती हैक्
9. कोई महान योजनाकार ही इस महान सृष्टि के नियमों का संचालक हो सकता है। वैदिक ऋषियों ने ऋत् नाम की एक व्यवस्था का उल्लेख किया है, जो ईश्वरीय सत्ता का संचालन पक्ष है।
10. इन सब तर्को का उत्तर किसी के पास नहीं है, ईश्वर को किसी ने नहीं देखा। ईश्वर को तर्क या गणित से ही सिद्ध किया गया है और हॉकिंग्स जैसे वैज्ञानिक गणित का भी सहारा नहीं ले रहे हैं। मानसिक कल्पनाओं व तर्क के सहारे ईश्वर के अस्तित्व को नकारने मे लगे हैं तथा माया के अस्तित्व को अपने कल्पना लोक के माध्यम से सिद्ध करने में लगे हैं। हम हॉकिंग्स के दिमाग के दिवालियेपन का खण्डन करते हैं। हॉकिंग जैसे वैज्ञानिकों ने सबकुछ वैदिक दर्शन से चुराया है। उनको अपनी कल्पनाओं के तर्क जाल के फ्रेम में गढ़ा है और दुनिया के सामने मनमाने ढंग से परोस दिया है। अगर हॉकिंग्स सृष्टि के रहस्य को समझ गये हैं तो अपनी आयु एक लाख वर्ष क्यों नहीं बढ़ा लेते। अपनी शारीरिक क्षमताओं को क्यों नहीं बढ़ा लेते। चार्वाक ने भी नास्तिकवाद का प्रतिपादन करके समस्त भारतीय दार्शनिकों को इस हद तक झकझोर दिया था कि कोई भी दार्शनिक अपनी धारणाओं का प्रतिपादन करने से पूर्व चार्वाक के नास्तिकवाद का खण्डन पहले करता है और अपने दर्शन का मण्डन बाद में करता है। हॉकिंग्स चार्वाक से कहीं अधिक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक हैं। वे अपनी पुस्तक "ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम" के माध्यम से संसार को समझा पाये थे कि सृष्टि का संचालन कोई महान योजनाकार ही कर रहा है। सृष्टि के रहस्यों को समझने की मानवीय सीमाओं से परे जाकर भी ईश्वर की माया को कोई समझ नहीं पाया है। उन्होंने मानव मस्तिष्क की सीमाओं से पार जाकर, जब ईश्वर के रहस्य तक नहीं पहुंच पाये तो उसे मानने से ही इंकार कर दिया है। मेरा मानना है कि हॉकिंग्स अपने शेष जीवन काल में ही सृष्टि और ईश्वर के परस्पर संबंध को मान्यता दे देंगे। अन्यथा कोई और वैज्ञानिक आयेगा और इस तथ्य की पुष्टि अपने किसी शोध के माध्यम से भविष्य में करेगा।
भारतीय दर्शन सृष्टि के त्रिआयामी होने के तथ्य को कभी भी मान्यता नहीं देते। चार या पाँच आयाम की चर्चा तो खुले आम होती है। जब ईश्वर या जीव को या आत्मा को सर्वव्याप्त, अनिर्वचनीय तथा निर्गुण माना है तो उसके अनन्त आयाम होना तर्क से सिद्ध होता है। शून्य से सृष्टि उत्पन्न हुई है और पुन: शून्य में विलीन हो जायेगी। ऎसा पुन:-पुन: होगा। हॉकिंग्स जैसे वैज्ञानिक इस तथ्य को कभी का स्वीकार कर गये हैं, परन्तु उस महाशून्य की परिभाषा कभी भी नहीं दे पाये हैं। हॉकिंग्स यह कभी भी नहीं कह पाये कि बहुत सारे ब्लैक होल मिलकर किसी दिन एक ही ब्लैक होल बन जायेंगे और वह किसी दिन महाशून्य में बदल जायेगा। पर हम भारतीय वाङग्मय में इस बात के प्रमाण पाते हैं कि ऎसा दिन महाप्रलय का दिन होता है। उस दिन ईश्वर सृष्टि के प्रलय, विलय और प्रारंभ का सूत्रपात करते हैं।
-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे,
''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका 9827198828

सोमवार, 21 अगस्त 2017

छत्तीसगढ़ का पोला-तिहार एवं कुशोत्पाटनी अमावस्या

बैलो के श्रृँगार व गर्भ पूजन का पर्व-पोला

किसी भी राज्य की सार्थक पहचान उनकी संस्कृति से होती है।

जिसमें छत्तीसगढ़ राज्य भारत देश का एक मात्र ऐसा राज्य है जो पूर्णतः कृषि कार्य प्रधान राज्य है। यहाँ के निवासी पूरे वर्ष भर खेती कार्य मे लगे रहते है।धान की खेती यहाँ की प्रमुख फसल है।

यहाँ के निवासियों ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को कुछ इस तरह संजोकर रखा है। कि कृषि कार्यो के दौरान साल के विभिन्न अवसरो पर- खेती कार्य आरंभ होने के पहले अक्ती, फसल बोने के समय सवनाही , उगने के समय एतवारी-भोजली , फसल लहलहाने के समय हरियाली, आदि आदि अवसरो व ऋतु परिवर्तन के समय को धार्मिक आस्था प्रकट कर पर्व-उत्सव व

त्योहार के रूप मे मनाते हुए जनमानस मे एकता का संदेश देते है।यहाँ के निवासी, पेड़-पौधों , जीव-जंतुओं तथा प्रकृति को भी भगवान की ही तरह पूजा करते है।

इन अवसरो पर मेहमानों का आदर-सत्कार करने व तरह तरह के व्यंजन बनाने मे यहाँ की माताएँ माहिर है। जो हर पर्व -त्योहार मे अलग अलग तरह की पारंपरिक व्यंजन बनाती है।तथा आतिथ्य सत्कार करती है। इसी कारण छत्तीसगढ़, पूरे भारत देश मे अपना अलग पहचान बनाकर रखा है। और यहाँ के रहवासी अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते है।

इन्हीं पर्व-त्योहार की श्रृँखला मे एक महत्वपूर्ण त्योहार है पोला

इसे छत्तीसगढी मे पोरा भी कहते है।

भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला यह पोला त्योहार, खरीफ फसल के द्वितीय चरण का कार्य (निंदाई कोडाई ) पूरा हो जाने तथा फसलों के बढ़ने की खुशी मे किसानों द्वारा बैलो की पूजन कर कृतज्ञता दर्शाते हूए प्रेम भाव अर्पित करते हुए यह त्योहार मनाते है क्योंकि बैलो के सहयोग द्वारा ही खेती कार्य किया जाता है ।

 पोला पर्व की पूर्व रात्रि को गर्भ पूजन किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन अन्न माता गर्भ धारण करती है। अर्थात धान के पौधों मे दुध भरता है। इसी कारण पोला के दिन किसी को भी खेतों मे जाने की अनुमति नही होती ।

रात मे जब गाँव के सब लोग सो जाते है तब गाँव का पुजारी-बैगा , मुखिया तथा कुछ पुरुष सहयोगियों के साथ अर्धरात्रि को गाँव तथा गाँव के बाहर सीमा क्षेत्र के कोने कोने मे प्रतिष्ठित सभी देवी देवताओं के पास जा- जाकर विशेष पूजा आराधना करते है। यह पूजन प्रक्रिया रात भर चलता है। इनका प्रसाद उसी स्थल पर ही ग्रहण किया जाता है घर ले जाने की मनाही रहती है। इस पूजन मे ऐसा व्यक्ति नही जा सकता जिसकी पत्नी गर्भवती हो। इस पूजन मे जाने वाला कोई भी व्यक्ति जुता-चप्पल पहन कर नही जाता फिर भी उसे काटा-कंकड नही चुभता या शारीरिक कष्ट नही होती ।

सूबह होते ही गृहिणी घर मे गुडहा चीला, अनरसा, सोहारी, चौसेला, ठेठरी, खूरमी, बरा, मुरकू , भजिया , मूठिया , गुजिया, तसमई आदि छत्तीसगढी पकवान बनाने मे लग जाती है।

किसान अपने गौमाता व बैलो को नहलाते धोते है । उनके सीग व खूर मे पेन्ट या पालिस लगाकर कई प्रकार से सजाते है। गले मे घुघरू, घंटी या कौडी से बने आभूषण पहनाते है। तथा पूजा करके आरती उतारते है।

अपने बेटों के लिए, कुम्हार द्वारा मिट्टी से बनाकर आग मे पकाये गये बैल या लकड़ी से बनाए बैल के पैरों मे चक्के लगाकर सुसज्जित करके तथा बेटियो के लिए रसोई घर मे उपयोग की जाने वाली छोटे छोटे मिट्टी के पके बर्तनो(चुकिया, जाता, पोरा आदि) को पूजा करके , बनाये हुए पारंपरिक पकवानो को भोग लगाने के बाद ये खिलौने खेलने व मनोरंजन के लिए बच्चों को देते है। इसके पीछे का तर्क यह है कि इन मिट्टी या लकड़ी के बने बैलो से खेलकर बेटे कृषि कार्य तथा बेटियाँ रसोईघर व गृहस्थी की संस्कृति व परंपरा को समझते हुए जीवन मे योगदान देंगे । इस तरह पूजा के बाद भोजन के समय गाँव के नाते-रिस्तेदारो, संबंधियो व पड़ोसियो को भी सम्मान पूर्वक आमंत्रित करते हुए एक दूसरे के घर जाकर भोजन करते है। जो कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति-परंपरा मे आपसी भाईचारे व प्रेम को मजबूती प्रदान करता है।

शाम के समय गाँव की युवतियाँ अपनी सहेलियों के साथ गाँव के बाहर मैदान या चौराहों पर(जहाँ नंदी बैल या साहडा देव की प्रतिमा स्थापित रहती है) पोरा पटकने जाते है। इस परंपरा मे सभी अपने - अपने घरों से एक - एक मिट्टी के खिलौने को एक निर्धारित स्थानो पर पटककर-फोडते है।जो कि नंदी बैल के प्रति आस्था प्रकट करने की परंपरा है। तथा युवा वर्ग कबड्डी, खो खो आदि खेलते मनोरंजन करते हुए त्योहार को उत्साह पूर्वक मनाते है।

इस पर्व को छत्तीसगढ़ के आलावा महाराष्ट्र, हिमाचल, उत्तराखंड, असम, सिक्किम तथा पड़ोसी देश नेपाल मे भी कुशोत्पाटिनी या कुशग्रहणी अमावस्या, अघोरा चतुर्दशी व स्थानीय भाषा मे डगयाली के नाम से भी मनाया जाता है। 

कुशग्रहणी या कुशोत्पाटिनी अमावस्या इसलिये कहा गया है। कि इस दिन वर्ष भर किए जाने वाले धार्मिक कार्यों तथा श्राद्ध आदि कार्यों के लिए कुश एकत्रित किया जाता है।

रविवार, 20 अगस्त 2017

अनूठा प्रयास व्हाट्सएप ग्रुप 'अन्तर्नाद', समाजसेवा के लिये तत्पर.

अनूठा प्रयास व्हाट्सएप ग्रुप 'अन्तर्नाद', अब करेगा समाजसेवा ..

भिलाई नगर। जून 2016 में शांति नगर निवासी विनोद चौबे द्वारा बनाए गए वाट्सअप ग्रुप
'अन्तर्नाद' का वार्षिक मिलन समारोह 20 अगस्त को शांति नगर में सम्पन्न हुआ। देश की एकता, समसामयिक विषयों पर तथा समाज में संस्कृति के अस्तित्व को पल्लवित करने उत्कृष्ठ लेखों के माध्यम से सकारात्मक विचारों के आदान प्रदान के उद्देश्य से बने इस समूह में भिलाई दुर्ग, रायपुर सहित न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, दिल्ली से जम्मू तक अनेक प्रांतों का बुद्धिजीवी वर्ग सदस्य है।
समारोह के प्रथम सत्र में वैचारिक गोष्ठी में मुख्य वक्ता श्री कनिराम सह प्रांत प्रचार प्रमुख राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ थे। एडमिन टीम में शामिल श्रीमती साधना जोगलेकर, श्री विजय बघेल पूर्व संसदीय सचिव, पंडित विनोद चौबे के आलावा सदस्य श्री मिथलेश ठाकुर, श्री रुपेश शर्मा, श्री संतोष मिश्रा ने भी विचार रखे। समारोह में निश्चित किया गया कि यह ग्रुप सदस्यों से सहयोग एकत्रित कर श्रमिक बस्तियों में जरुरतमंदों को शिक्षा व अन्य सहयोग हेतु समाजसेवा के लिए कृत संकल्पित रहेगा।  समारोह में इस हेतु विचारों का संकलन कर रूपरेखा भी तय की गई। इस अवसर पर वर्ष 2009 से प्रकाशित पत्रिका *ज्योतिष का सूर्य* के 97वें अंक का विमोचन हुआ।
समारोह में अजय मिश्रा, आरए यादव, कान्हा महाराज, मनीष शुक्ल, वी राजेन्द्रन, गंगाप्रसाद दुबे, अमरेन्द्र शर्मा, संजय पाण्डेय, योगेश पाण्डेय, शम्भुनाथ जायसवाल, अनुज, मान सिंह, प्रमोद चौबे, बसन्त शुक्ला, श्रीमती सविता साहू, जी शंकर राव, अरुण राय, श्रीमती ममता शुक्ल, सत्येन्द्र मिश्र, मृदुल शुक्ल, इन्द्रपाल चंद्राकर, मनीष शुक्ल, ओमप्रकाश शुक्ल, मदन मिश्रा, मंतोष सिंह, आरएन कोरी, विष्णु पाठक, श्री नागेन्द्र मिश्रा, सन्नी राव, अनिरुद्ध गुप्ता, राजेश सिंह, अमित दुबे, नीतेश सिंह, चंदन राय, श्रीमती रम्भा चौबे, सुधा मिश्रा, अमिता चौबे, जी शंकर, शालिनी राव, श्रीमती प्रमिला दुबे,  श्रीमती अमिता, अमरेन्द्र शर्मा, श्रीमती रेखा मिश्रा, श्रीमती आर लीला, श्रीमती संगीता मिश्रा, श्रीमती श्यामा कृष्णमोहन मिश्रा,  श्रीमती त्रिगुणा, आरती मिश्रा, श्रीमती ज्योत्सना महापात्रा, नाशीर अहमद खान, अनिल यादव सहित मंच के सैकड़ों सदस्य उपस्थित थे।।
- संतोष मिश्र, पत्रकार, भिलाई

शनिवार, 19 अगस्त 2017

...केवल मोदी इफेक्ट है डोकलाम विवाद..चाईना, भारत को महाशक्ति बनने से रोकना चाहता है..

.....केवल मोदी इफेक्ट है डोकलाम विवाद..चाईना, भारत को महाशक्ति बनने से रोकना चाहता है..

साथियों, नमस्कार...

 डोकलाम विवाद से चल रही तनातनी यूं ही लंबी खिंचती जाए तो भारत के लिए यह काफी फायदेमंद साबित हो सकता है । अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक ओर तो अमेरिका, इजराइल, रूस और जापान जैसे देशों का रुख भारत के पक्ष में स्पष्ट होता जा रहा है । वहीं दूसरी ओर, घरेलू मोर्चे पर चीनी सामान के बहिष्कार का संदेश लगातार चर्चा में बने रहने से आम आदमी में निचले स्तर तक इस जागरूकता का फैलाव बढ़ता जा रहा है ।
उधर, सरकार के स्तर पर भी दबाव बढ़ा है कि चीनी सामान के आयात को उत्तरोत्तर कम करने के लिए गंभीरता से दीर्घकालिक समयबद्ध नीति का निर्धारण हो और उसे शीघ्रता से लागू किया जाए। केंद्र सरकार ने पिछले दिनों सभी मंत्रालयों को इस संदर्भ में दिशा-निर्देश जारी किया है ।

भारत से युद्ध करने में अंदर ही अंदर चीन के पसीने छूट रहे है।उसे मालूम है अगर भारत से युद्ध हुआ तो रूस,अमेरिका और जापान भारत के साथ खड़े होंगे ,उधर इजराइल और फ्रांस भारत को आधुनिक युद्धक साजो सामान देने के लिए उतावले हो रहे है।ऐसे में यदि भारत के साथ युद्ध किया गया तो सन 1962 में हथियाया गया लद्दाख का बड़ा भूभाग और हिन्दू तीर्थ मानसरोवर से हाथ धोना पड़ सकता है। सारी हकीकत और भारत के साथ युद्ध करने का नफा नुकसान जानकर ही चीन भारत से युद्ध करने में पीछे हटने लगा है। केवल मोदी इफेक्ट !!

- पण्डित विनोद चौबे, संपादक- ' ज्योतिष का सूर्य' http://ptvinodchoubey.blogspot.com/2017/08/blog-post_19.html

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

भक्त की परीक्षा..भक्त नामदेव का प्रेरक प्रसंग...... .

भक्त की परीक्षा..भक्त नामदेव का प्रेरक प्रसंग......
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श्री नामदेव जी महाराष्ट्र के एक सुप्रसिद्ध संत थे। वे विट्ठल भगवान के बहुत बड़े भगत हुए हैं।
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उनका ध्यान सदा विट्ठल भगवान के दर्शन, भजन और कीर्तन में ही लगा रहता था। सांसारिक कार्यों में उनका जरा भी मन नहीं लगता था।
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वे एकादशी व्रत के प्रति पूर्ण निष्ठावान थे। वे उस दिन जल भी नहीं पीते थे। एकादशी की सम्पूर्ण रात्रि को हरिनाम संकीर्तन करते थे।
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एकादशी को वे न अन्न खाते और न किसी को खिलाते।
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एक दिन एकादशी की रात्रि को वे हरिनाम संकीर्तन कर रहे थे। उनके साथ अनेकानेक भक्त भी संकीर्तन कर रहे थे।
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अचानक एक क्षीणकाय, हड्डियों का ढाचा मात्र एक वृद्ध ब्राह्मण उनके द्वार पर आया और बोला,‘मैं अत्यन्त भूखा हूं। मुझे भोजन कराओ अन्यथा मैं भूख के मारे मर जाऊंगा।’
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श्री नामदेव जी बोले,‘मैं एकादशी को न अन्न खाता हूं और न अन्न किसी और को खिलाता हूँ।
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अतः ब्राह्मण देवता प्रातः काल सूर्योदय का इंतजार करो। व्रत का पारण कर आपको भर पेट भोजन कराऊंगा।’
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ब्राह्मण बोला,‘मुझे तो अभी ही भोजन चाहिए। मैं एक सौ बीस वर्ष का बूढ़ा हूं। एकादशी व्रत आठ वर्ष से लेकर अस्सी वर्ष तक के लोगों के लिए है।
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मैं भूख से मर जाऊंगा और तुमको ब्रह्म हत्या का पाप लगेगा।’
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श्री नाम देव जी ने कहा,‘ब्राह्मण देवता चाहे कुछ भी हो जाए मैं आपको भोजन नहीं करा सकता। कृपया आप सुबह तक प्रतिक्षा करें।’
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श्री नाम देव जी के ऐसे व्यवहार के प्रति अन्य ग्राम-वासियों ने नाम देव जी को निष्ठुर कहा और ब्राह्मण को भोजन देना चाहा परन्तु ब्राह्मण ने भोजन लेने से इंकार कर दिया और कहा,
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‘यदि मैं भोजन ग्रहण करूंगा तो सिर्फ और सिर्फ नामदेव से ही करूंगा।’
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श्री नाम देव जी ने जब ब्राह्मण को भोजन न दिया तो कुछ ही समय में उसके प्राण पखेरू उड़ गए।
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वहां उपस्थित सभी लोग श्री नामदेव जी के प्रति अपशब्द कहने लगे और उन्हें हत्यारा कह कर संबोधित करने लगे।
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श्री नाम देव जी कुछ न बोले पूर्ववत विट्ठल भगवान के भजन और कीर्तन में ही लगे रहे... तथा एक पल के लिए उठे और मृतक शरीर को ढक कर रख दिया व मृत देह के समक्ष नाम संकीर्तन करते रहे।
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प्रातःकाल श्री नाम देव जी ने व्रत पारण किया और एक चिता बनवाई। स्वयं उस ब्राह्मण के पार्थिव शरीर को अपनी गोद में लेकर चिता पर बैठ गए।
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चिता को प्रज्वलित किया गया। जब आग की लपटें श्री नामदेव जी तक पहुंचने ही वाली थी तो अचानक वह ब्राह्मण उठा और श्री नाम देवजी को उठाकर चिता से बाहर कूद पड़ा...
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जब तक नामदेव जी कुछ समझ पाते वह बूढ़ा अंतर्धान हो गया।
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स्वयं विट्ठल भगवान ही उनकी परीक्षा लेने आए थे।
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इस घटना को देख कर सब आश्चर्यचकित हो गए और श्री नाम देव जी की जय-जयकार करने लगे। धन्य हैं श्री नामदेव जी।
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चित में प्रज्ञा का प्रकाश, ज्ञान का दीपक जले तभी ठाकुर जी का निराकार स्वरूप दिखाई देता है।
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भागवत श्रवण से चित रूपी दीपक जलाने का प्रयास मानव को करना चाहिए। मानव को अज्ञानता से लडऩा चाहिए मगर आलोचना और अज्ञानता पर चर्चा करके अपना समय बर्बाद नहीं करना।
~ ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, भिलाई 9827198828

'धनवान' बनने का योग आपकी कुण्डली में है या नहीं ?

'धनवान' बनने का योग आपकी कुण्डली में है या नहीं ? आईये समझने का प्रयास करते हैं.....

शनिवासरीय मंगलमयी सुप्रभात...........
यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः। 
स पण्डितः स श्रुतिमान गुणज्ञः।
स एवं वक्ता स च दर्शनीयः। 
सर्वेगुणाः कांचनमाश्रयन्ति।।

नीति का यह श्लोक आज के अर्थ-प्रधान युग का वास्तविक स्वरूप व सामाजिक चित्र प्रस्तुत करता है। आज के विश्व में धनवान की ही पूजा होती है। जिस मनुष्य के पास धन नहीं होता, वह कितना ही विद्वान हो, कितना ही चतुर हो, उसे महत्ता नहीं मिलती। इस प्रकार ऐसे बहुत से व्यक्ति मिलते हैं, जो सर्वगुण सम्पन्न हैं, परन्तु धन के बिना समाज में उनका कोई सम्मान नहीं है। यही हमारे समाज की कड़वा सच्चाई है  अतः यह आवश्यक है कि जन्म कुंडली में धन द्योतक ग्रहों एवं भावों का पूर्ण रूपेण विवेचन किया जाये। http://ptvinodchoubey.blogspot.in/2017/08/blog-post_18.html?m=1

ज्योतिष शास्त्र में जन्म कुंडली में धन योग के लिए द्वितीय भाव, पंचम भाव, नवम भाव व एकादश भाव विचारणीय है।

 पंचम-एकादश धुरी का धन प्राप्ति में विशेष महत्व है। महर्षि पराशर के अनुसार जैसे भगवान विष्णु के अवतरण के समय पर उनकी शक्ति लक्ष्मी उनसे मिलती है तो संसार में उपकार की सृष्टि होती है। उसी प्रकार जब केन्द्रों के स्वामी त्रिकोणों के भावधिपतियों से संबंध बनाते हैं तो बलशाली धन योग बनाते हैं।

यदि केन्द्र का स्वामी-त्रिकोण का स्वामी भी है, जिसे ज्योतिषीय भाषा में राजयोग भी कहते हैं। इसके कारक ग्रह यदि थोड़े से भी बलवान हैं तो अपनी और विशेषतया अपनी अंतर्दशा में निश्चित रूप से धन पदवी तथा मान में वृद्धि करने वाले होते हैं। पराशरीय नियम, यह भी है कि त्रिकोणाधिपति सर्वदा धन के संबंध में शुभ फल करता है। चाहे, वह नैसर्गिक पापी ग्रह शनि या मंगल ही क्यों न हो।

यह बात ध्यान रखने योग्य है कि जब धनदायक ग्रह अर्थात् दृष्टि, युति और परिवर्तन द्वारा परस्पर संबंधित हो तो शास्त्रीय भाषा में ये योग महाधन योग के नाम से जाने जाते हैं। लग्नेश, धनेश, एकादशेश धन कारक ग्रह गुरु तथा सूर्य, व चंद्र अधिष्ठित राशियों के अधिपति सभी ग्रह धन को दर्शाने वाले ग्रह हैं। इनका पारस्परिक संबंध जातक को बहुत धनी बनाता है।

 नवम भाव, नवमेश भाग्येश, राहु केतु तथा बुध ये सब ग्रह भी शीघ्र अचानक तथा दैवयोग द्वारा फल देते हैं। धन प्राप्ति में लग्न का भी अपना विशेष महत्व होता है। लग्नाधिपति तथा लग्न कारक की दृष्टि के कारण अथवा इनके योग से धन की बढ़ोत्तरी होती है। योग कारक ग्रह (जो कि केन्द्र के साथ-साथ त्रिकोण का भी स्वामी हो) सर्वदा धनदायक ग्रह होता है। यह ग्रह यदि धनाधिपति का शत्रु भी क्यों न हो तो भी जब धनाधिपति से संबंध स्थापित करता है तो धन को बढ़ाता है। जैसे कुंभ लग्न के लिए, यदि लाभ भाव में योग कारक ग्रह ‘शुक्र’ हो और धन भाव में (वृहस्पति) स्वगृही हो तो अन्य बुरे योग होते हुए भी जातक धनी होता है, क्योंकि योग कारक ‘शुक्र’ व धनकारक ‘गुरु.′ व लाभाधिपति ‘गुरु’ का केन्द्रीय प्रभाव है। यद्यपि ये दोनों ग्रह एक दूसरे के शुभ हैं। उपरोक्त धनागम के यह योग बनते कैसे हैं, जानने का प्रयास करें ...

कैसे बनते हैं ये योग इस विषय पर चर्चा करें –

1- किसी नीच ग्रह से कोई उच्च का ग्रह जब दृष्टी सम्बंध या क्षेत्र सम्बंध बनाता हैं तो यह स्थिति नीच भंग राज योग बनाने वाली होती हैं ।

2- नीच का ग्रह अपनी उच्च राशि के स्वामी के प्रभाव में हो ( युति  या दृष्टी सम्बंध हो) नीच भंग योग बनता हैं ।

3- परस्पर दो नीच ग्रहो का एक दूसरे को देखना भी नीच भंग योग होता हैं ।

4- नीच राशि के स्वामी ग्रह के साथ होना या उसके प्रभाव में होना नीच भंग होता हैं ।

5- चंद सूर्य से केंद्रगत होने पर भी नीच ग्रह का दोष समाप्त हो जाता हैं ।

6- जन्म कुंडली के योगकारक ग्रह तथा लग्नेश से सम्बंध होने पर नीच भंग राजयोग बनता हैं

7- नीच ग्रह नवांश कुंडली में उच्च का हो तो नीच भंग राजयोग बनता हैं ।

8- दो उच्च ग्रहो के मध्य स्थित नीच ग्रह भी उच्च समान फल दायी होता हैं ।

9- नीच का ग्रह वक्री हो तो नीच भंग राज योग बनता हैं ।

10- नीच राशि में स्थित ग्रह उच्च ग्रह के साथ स्थित हो तो नीच भंग राजयोग बनाता हैं । 

साथियों अगले पोस्ट में उपरोक्त विषय पर विस्तृत चर्चा करेंगे!

-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, शांतिनगर, भिलाई
9827198828

गुरुवार, 17 अगस्त 2017

आपकी कुण्डली में 'अभिनेता' का योग है..?? जानिए.. आप 'नायक' या बनेंगे 'खलनायक'.?

आपकी कुण्डली में 'अभिनेता' बनने का योग है ?? जानिए....आप 'नायक' य़ा "खलनायक" ?

        'बालीवुड' हो या हमर छत्तीसगढ के 'छालीवुड' मोर छत्तीसगढ़िया युवा मन हा सब्बो डाहन अपन छाप छोड़े हवय, चाहे पिपली लाईव के 'नत्थू' हो या 'छालीवुड' के हा ' 'अनुज शर्मा ' घलो छाप छोड़े हवय !

संगवारी मन हो...   आज फिल्म इण्डस्ट्री में भी अपार संभावनाएं हैं, आज की युवा-युवतियों में कला, अभिनय एवं कुशल टीवी एंकर आदि बनने की सोच बढी है ! कुछ युवा तो रत्नसारपुरी नगर अर्थात् मुंबई में खासा प्रयास करते हैं, लेकिन उनको सफलता न के बराबर ही मिल पाती है ! और कुछ बिल्कुल भी कोशीश नहीं करते देखते ही देखते वह सुपर स्टार बन जाते हैं ! 

तो क्या है ज्योतिषीय योग आईये जानने का प्रयास करते हैं!

शुक्र ग्रह गायन-वादन, कला-सौन्दर्य से सम्बन्धित है। ये कुछ विशेष योग हैं जो अभिनेता और फिल्मों, सीरीयलों में नायकत्व को सुनिश्चित करते हैं...

 १. चर, द्विस्वभाव लग्न, शुक्र और लग्नेश का दशम से सम्बन्ध अवश्य होता है। 

२. उच्च का मंगल और गुरू का योग हो। 

३.  गजकेशरी योग भी अच्छा रहता है।

 ४. लग्न व त्रिकोण में बृहस्पति हो। चरित्र अभिनेताओं का कर्क व मीन लग्न होता है।

 ५. खलनायक में लग्नेश मंगल, शनि या राहु पापग्रह वहां होता है। खलनायकों का जन्म मकर, वृश्चिक लग्न में होता है।

 ६.  अच्छे कलाकारों के दो-तीन ग्रह स्वक्षेत्री होते है। 

७.  अभिनेत्रियों के गजकेसरी योग, गन्धर्व योग और मालव्य योग होता है।

 ८.  संवाद लेखकों में मंगल-राहु एवं मंगल-चन्द्रमा का योग रहता है।

और विस्तृत जानकारी से ओत-प्रोत आलेख पुन: प्रस्तुत करुंगा ! 

चलते चलते....
२० अगस्त २०१७ दिन रविवार को भिलाई के शांतिनगर में 'अन्तर्नाद' व्हाट्सएप ग्रुप का 'वार्षिक मिलन समारोह' है आप सभी ग्रुप के साथियों से आग्रह है कि आप अवश्य उपस्थित हों !

-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, 

संपादक-'ज्योतिष का सूर्य' मासिक पत्रिका शांतिनगर, भिलाई, दुर्ग, छत्तीसगढ़

मोबाईल नं. 9827198828

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.