ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

साहित्य साधना है, हृदय के उद्गार से चलती है लेखनी -पंडित दानेश्वर शर्मा

साहित्य साधना है, हृदय के उद्गार से चलती है लेखनी-पंडित दानेश्वर शर्मा


पंडित दानेश्वर शर्मा
-संजीव तिवारी
10 मई 1931 को विद्वान पिता पं. गंगा प्रसाद द्विवेदी तथ विदुषी माता श्रीमती इन्दिरा द्विवेदी के घर ग्राम मेडेसरा, जिला दुर्ग (छ.ग.) में जन्में तथा बी.ए., एल.एल.बी. तक शिक्षा प्राप्त श्री दानेश्वर शर्मा, भिलाई इस्पात संयंत्र के पूर्व प्रबंधक, अखिल भारतीय स्तर के साहित्यकार, लोक साहित्य के अधिकारी विद्वान तथा हिन्दी एवं छत्तीसगढ़ी के यशस्वी कवि हैं । देश के तमाम समाचार पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित हो चुका है जिनमें प्रमुख रूप से अखण्ड ज्योति, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग, ब्लिट्ज, नागपुर टाइम्स (अंग्रेजी दैनिक) आदि से लेकर स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं तथा प्रसारण दूरदर्शन के अतिरिक्त, आकाशवाणी के नागपुर, रायपुर, भोपाल, इंदौर, रीवां, छतरपुर तथ इलाहाबाद केन्द्रों से हुआ है । आप प्रधानत: हिन्दी तथ छत्तीसगढ़ी तथा गौणत:अंगेजी व संस्कृत में लिखते हैं । श्री शर्मा जी की लेखनी अनवरत जारी है, क्योंकि देश के बहुप्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में स्थायी स्तंभकार हैं जिनमें एक बहुआयामी मासिक पत्रिका ज्योतिष का सूर्य के कवि और कविता  में सारगर्भित कविताएं प्रकाशित होती हैं, इसके अलावा इन्होंने दैनिक भास्कर एवं नव-भारत दैनिक में तीन वर्ष तक लोक दर्शन नामक ललित निबन्धों का स्तम्भ नियमित रूप से लिखा । प्रकाशित पुस्तकों में छत्तीसगढ़ के लोक गीत (विवेचनात्मक, सन् 1962), हर मौसम में छन्द लिखूंगा (हिन्दी गीत संग्रह सन् 1993), लव-कुश (खण्ड काव्य सन् 2001), लोक-दर्शन (सनातन, इस्लाम, जैन, बौद्ध, मसीही, सिख आदि दर्शन व पर्वो पर निबंध संग्रह, सन् 2003) तपत करू भई तपत कुरू (छत्तीसगी कविता संग्रह, 2006) तथा गीत-अगीत (हिन्दी काव्य संग्रह, सन् 2007) है ।
देश के अनेक काव्य संग्रहों के अतिरिक्त, रविशंकर विश्वविद्यालय के एम.ए. (हिन्दी) के लोक साहित्य विषय हेतु पूर्व निर्धारित छत्तीसगढ़ी काव्य संकलन तथा वर्तमान में निर्धारित छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य किताबों में भी शर्मा जी की कविताएं संग्रहित हैं । श्री दानेश्वर प्रसाद जी शर्मा के काव्य-कौशल के साथ ही बीएसपी में कुशल प्रबंधन की क्षमता का सम्मान करते हुए प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह ने इनको छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग का अध्यक्ष अगस्त 2011 में मनोनीत किये हैं। श्री दानेश्वर शर्मा की चर्चा शिकागो विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित रिवोलुशनिज्म इन छत्तीसगढी पोएट्री में भी हुई है । श्री शर्मा विश्व प्रसिद्ध संस्था फोर्ड फाउन्डेशन द्वारा भारत में विकास हेतु सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठनों के साथ 50 वर्षीय साझेदारी पर प्रकाशित 11 पुस्तकों के संपादकीय सलाहकार हैं । आप छत्तीसगढ के एक मात्र ऐसे कवि हैं, जिनके गीतों के ग्रामोफोन रिकाडर्स व कैसेट देश की सर्वाधिक प्रसिद्ध कंपनियों यथा हिज मास्टर्स वायस (कलकत्ता) म्यूजिक इंडिया पोलीडोर (मुंबई), सरगम रिकार्डस (बनारस) तथा वीनस रिकार्डस (मुंबई) ने बनाए हैं । फीचर फिल्म मोर धरती मईया में भी इनका गीत है । भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित छत्तीसगढ़ लोक कला महोत्सव के संस्थापक-संयोजक श्री दानेश्वर शर्मा ने पंथी नर्तक देवदास, पंडवानी गायिका पदमभूषण तीजन बाई, रितु वर्माा आदि अनेक कलाकारों को अन्तर्राष्ट्रीय ,क्षितिज पर पहुचाने तथा राष्ट्रीय सम्मान उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है । इन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा में पहली बार भागवत पुरान दर्शन  की रचना किये हैं जिसका निमोचन शंकराचार्य श्रीमद निश्चलानंद सरस्वती जी ने किया है। श्री दानेश्वर शर्मा की ख्याति श्रीमद्भागवत महापुराण और देवी पुराण के अच्छे प्रवचनकार के रूप में भी हुई है । सन् 2006 में इन्हें राष्ट्रपति के द्वारा साहित्य सम्मान प्राप्त हुआ तथ सन् 2007 में अमेरिका के न्यूयार्क में आयोजित आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में भागीदारी का अवसर प्राप्त हुआ था जो छत्तीसगढ़ के लिए एक गौरव विषय है।
भिलाई इस्पात संयत्र में प्रबंधक पद पर रहते हुए साहित्य जगत में आपका कब पादार्पण हुआ..?
मुझे विरासत में साहित्य-साधना प्राप्त हुआ। मेरे पिता श्री गंगा प्रसाद द्विवेदी जी संस्कृत के उद्भट विद्वान थे। वे श्रीमदभागवत महापुराण का लगभग 600 कथा पारायण के अलावा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी के साथ 6 दिनों तक श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करने का अवशर भी उन्हें मिला। मैं पिताजी से प्रेरित हो साहित्य लेखन का कार्य शुरू किया। मेरे इस साहित्य लेखन में कभी नौकरी आड़े नहीं आयी। दरअसल हमारे पिता की इच्छा थी की मैं संस्कृत  का प्रोफेसर बनूं, किंतु मेरा एम.ए. फाईनल भी नहीं हुआ था, तभी 1959 में बी.एस.पी.में नियुक्त हो गया, और प्रोफेसर बनने की हमारी और पिताजी दोनों का सपना अधुरा ही रह गया।
न्यूयार्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र संघ भवन में विश्व हिन्दी सम्मेलन में भावुक हो गये थे..?
हां, 2007 में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन  में छत्तीसगढ़ से श्री गीरीश पंकज, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.शकुंतला तरार सहित मेरे को लेकर सात लोग गये थे। इस सम्मेलन आयोजित होने के पूर्व सुप्रसिद्ध कवि, साहित्यकार एवं पूर्व प्रधानमंत्री शरी अटल बिहारी बाजपेयी जी उसी भवन में गये हुए थे उन्होंने पहली बार सं.रा.सं. में उन्होंने हिन्दी में भाषण दिये थे। पूरे विश्व का हिन्दी के तरफ ध्यान आकर्षित किया था,  इन्होंने ही उस भवन में विश्व हिन्दी सम्मेलन कराये जाने की व्यवस्था भी किये थे. किंतु कुछ ही दिनों में भारत की केंद्र सरकार बदल गयी और पी.एम. मनमोहन जी हो गये। श्री मनमोहन जी के कार्यकाल में ही यह आयोजन न्यूयार्क में आयोजित किया गया था। जिनके प्रतिनिधीत्व में युवराज कर्ण सिंह उस सम्मेलन में मौजूद थे।
कार्यक्रम आरंभ हुआ भारत के अलावा अन्य सभी देशों से गये साहित्यकारों ने अपने-अपने विचार व्यक्त करने लगे। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि जिन्होंने पहली बार हिन्दी की आवाज बुलंद किये थे, साथ ही वे देश के प्रमुख साहित्यकार हैं। इतने बड़े हिन्दी सम्मेलन में  किसी विद्वान ने चर्चा करने की बात तो दुर श्री अटलजी का नाम तक लेने से कतराते रहे। मुझे नही रहा गया मुझे जब मौका मिला तो मैंने इस बात को प्रमुखता से उठाया था। इसके पिछे चाहें जो कारण हो, लेकिन मैं भावुक जरूर हो गया था। इस कार्यक्रम में सभी का उद्बोधन सराहनीय रहा, किंतु मैं युवराज करण सिंह जी के विचारों से बहुत प्रभावित हुआ।
छत्तीसगढ़ी-भाषा में काफी अंतर हैं जैसे-गौणी, हल्बी, सरगुजीया आदि   भिन्नता को कैसे दूर किया जा सकता है.?
केवल दुर्ग, रायपुर, बिलासपुर और महासमुंद आदि छत्तीसगढ़ के कुछ जिलों में ही बोले जाने वाली भाषा ही छत्तीसगढ़ी नहीं है, चाहे उसका रूप हल्बी हो अथवा सरगुजीया हो क्योंकि हर 20 से 25 किलोमिटर की दूरी में भाषांतर है। इस क्षेत्रानुसार बोलचाल की भाषा में अंतर है, क्योंकि वहां रहने वाले लोगों के आस-पास में अन्य प्रंातों व संकृतियों के भी लोग रहते जिसके कारण अन्य प्रंातो की भाषाओं का मिश्रण है। इस मिश्रण का कारण यह भी है कि छत्तीसगढ़ प्रदेश के सिमांत पर बोले जाने वाली भाषा भी छत्तीसगढ़ी भाषा को प्रभावित करतें हैं। जैसे-भिलाई-दुर्ग में बुंदेलखंड, बिहार, उ.प्र. आदि अन्य कई प्रंातों के लोग निवास करते हैं। इन लोगो के द्वारा जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है उनको सुनते-सुनते हम भी उन शब्दों न केवल प्रयोग करते हैं वरन उनके स्वर(बोलने का लहजा) का भी उच्चारण करने लगे हैं। कहने का आशय यह है कि, अवधी, ब्रज, भोजपुरी, बुंदेलखंडी आदि भाषाओं के शब्द हम अपनी बोलचाल में प्रयोग करते हैं। तो, अपने प्रदेश छत्तीसगढ़ की हल्वी, सादरी, सरगुजीया, कोरियाई इत्यादि शब्दों का प्रयोग हम क्यों नहीं करेंगे। शब्दकोष की व्यापकता के लिए ऐसा करना आवश्यक है। इससे छत्तीसगढ़ी भाषा की श्रीवृद्धी होगी।
आप छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अध्यक्ष हैं राजभाषा छत्तीसगढ़ी के विकास के लिए कौन-कौन और क्या योजनाएं हैं..?
सर्वप्रथम तो, प्रदेश के सभी मंत्रालयों में छत्तीसगढ़ी में ऑफिसियल काम-काज हो इसके लिए प्रयत्नशील हुं ताकि छत्तीसगढ़ी भाषी लोगों को मंत्रालयीन कार्यों की जानकारी अपनी भाषा में हो सके,यदि आवश्यकता पड़ी तो समस्त अधिकारीयों एवं कर्मचारीयों के लिए कार्यशाला भी लगायी जायेगी। दूसरा, अभी छत्तीसगढ़ी-हिन्दी-शब्द कोष का प्रकाशन होने जा रहा है। इस शब्दकोष को यहां प्रमुख सात्यिकारों द्वारा तैयार किया गया है, इसमें लुप्तप्राय छत्तीसगढ़ी शब्दों का अनेखा संग्रह किया गया है, इसे जल्द ही आम लोगों को सौंप दिया जायेगा। इसी क्रम में बीजहा-योजना के अंतर्गत स्कूली छात्र-छात्राओं तक जाकर उन्हें छत्तीसगढ़ी शब्दों के विशालतम संग्रह को उनके सामने रख कर इन नौनिहाल बच्चों को मातृभाषा छत्तीसगढ़ी के लिए प्रेरीत करने काम भी आयोग द्वारा संचालित किया जा रहा है।
प्रदेश के नवोदित युवा साहित्यकारों को क्या संदेश देना चाहेंगे..?
आप जिस विधा और जिस क्षेत्र में लेखन कर रहे हैं तो, संबंधित क्षेत्र के विद्वानों के कृतियों को भलिभांति पढऩा व समझना चाहिए। साहित्य साधना का विषय है ठिक उसी प्रकार जैसे- तप करने से ईश्वर की प्राप्ति होती है तो साहित्य-साधना करने से सरस्वती और राधा की कृपा होगी। ज्ञान (आनंद) के पिपासु जनों को व्याहार अर्थात वाणी रूपा सरस्वती है जो शब्द बनकर बाहर प्रकाशित करती है, राधा आहार रूपा हैं जो आनंद रूपी ज्ञान को अंर्तमुखी कर आह्लादित करती है, और जब अंदर ज्ञान रूपी आनंद रहेगा तभी मनुष्य का कवित्त्व और लेखनी एक दिशा में चल पड़ती है, और वह संसार को दिशा देने पर अमादा हो जाता है, तो मित्रों/नवोदित साहित्यकारों आप लोग सरस्वती एवं राधा दोनों की साधना अवश्य करें, मेरा विश्वास है कि आप लोग देश के प्रमुख साहित्यकारों में आपकी गणना होगी, जरूरत है निरंतरता की।

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