ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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बुधवार, 14 दिसंबर 2011

अंधश्रद्धा-बलि..आखिर क्यों नहीं करते सच का सामना..?


अंधश्रद्धा-बलि..........
आखिर क्यों नहीं करते सच का सामना..? 
खराब होने के डर से घिरे रहने वाले लोगों की जिंदगी को खुशहाल बनाने का अलग फलसफा है, बिना मेहनत के सुख का सपना देखने वालों की तादाद लाखों-करोड़ों में है, मगर सवाल यह उठता है कि ठोकर पर ठोकर खाने के बाद भी लोग सच का सामना क्यों नहीं करना चाहते? काल्पनिक पीर-फकीर, तांत्रिक-मांत्रिक क्या सचमुच हमारी जिंदगी को खुशहाल बना सकते हैं? इस सवाल का जवाब बड़ा ही पेचीदा है, क्योंकि जिंदगी को शक की नजर से देखने वाले कुछ लोग तो इस अंधविश्वास की खाई से मानों निकलना ही नहीं चाहते। मसान में आधी रात तप, घोर-अघोर तंत्र-मंत्र, बुरी शक्तियों या सिद्धियों का प्राप्त करने के लिये जप-तप, जादू-टोना, बलि व तमाम अंधविश्वास से जुड़ी अनेक खबरें हम देखते व जानते हैं लेकिन फिर भी इनका कुप्रभाव, इनकी वास्तविकता हमारे देश, हमारे समाज में लोगों को जाने क्यों आईना नहीं दिखा पा रही हैं। जहां तक आस्तिकता व श्रद्धा की बात कही जाये हम सब उस परम् शक्ति परमेश्वर को मानते हैं लेकिन श्रद्धा के भाव को बदल आसुरी शक्ति व छल बल के चक्कर से समाज के लोगों को बाहर निकाल लेने के बाद ही देश की उन्नति व लोगों की तरक्की संभव हो सकेगी।

मुगल सल्तनत के आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर को अपने ही मुल्क में दफन होने के लिए दो गज जमीन बेशक न मिली हो लेकिन इसी देश में नेशनल हाईवे पर शहरों से लेकर गांवों तक पाए जाने वाले काल्पनिक पीरों, उनकी मजारों और दरगाहों के पास बेशुमार दौलत ही नहीं बल्कि बेहिसाब जमीन जायदाद भी है। चमत्कारों, साधु संतों, पंडे पुजारियों से लेकर काल्पनिक दु:खभंजक पीरों के मुर्शिदों का धर्म की आड़ में चलने वाली दुकानें पूरे देश में हर 10 से 15 किलोमीटर की दूरी पर देखने को जरूर मिल जाएंगी। अगर इसी क्रम में शनि, साईं और सती के मठों व मसानियों को जोड़ दिया जाये तो यह धंधा दुनिया के किसी भी कारोबार के मुकाबले सबसे अधिक मुनाफे वाला धंधा है, जिसके लिये चढऩे वाली चढ़ोत्तरी व मिलने वाले दान के लिये न तो कोई आय कर निर्धारित है और न ही अन्य टैक्स।
एक सच्चाई यह भी है कि दु:ख व घरेलु परेशानियों से छुटकारे की तलाश में ऐसे स्थानों पर हर रोज नाक-माथा रगडऩे वालों में कितनों की मुरादें पूरी हुई, न हुईं लेकिन यहां के मुर्शिदों, पंडों, तांत्रिक-मांत्रिक व पुजारियों की तिजोरियां अवश्य भरी हैं। हाल ही में धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ राज्य की ट्विनसिटी भिलाई के रूआबांधा में काल्पनिक तांत्रिक परिवार ने दो मासूम बच्चों की बलि चढ़ा दी। हालांकि इस तंत्र-मंत्र प्रक्रिया से सिद्धी व शक्ति की कामना लिये ये लोग अब कानून की नजरों में आकर सींखचों के पीछे धकेल दिये गये हैं लेकिन एजुकेशन हब माने जाने वाले भिलाई जैसे हाई प्रोफाइल शहर में ऐसी घटनाओं ने एक हद तक सामाजिकता को भी शर्मसार किया है।

00 करें सात्विक पूजा-अर्चना, आसुरी श्रद्धा से रहें दूर..........
तंत्र-मंत्र की आड़ में देश भर में बलि की घटनाएं हमेशा खबरों में बनी रही हैं, इंसानी जिंदगियों के आलावा उल्लू, बकरा, मुर्गे-मुर्गियों सहित कई पक्षी व जानवर भी इस तरह की उल-जुलूल टोने-टोटके में बलि की भेंट चढ़ते रहे हैं। देश में बेरोजगारी, भूखमरी, एक-दूसरे के बीच बढ़ती वैमनस्यता, हर दूसरे से खुद को बड़ा दिखाने की चाहत के चलते सात्विक पूजा-अर्चना की बजाय लोग काल्पनिक अघोरी, पीर फकीर, तांत्रिक-मांत्रिकों के झांसे मेें आकर अपना धन-वैभव तो निरर्थक खर्च कर ही रहे हैं साथ ही ऐसी अंधश्रद्धा में फंस देश व समाज को भी शर्मसार कर रहे हैं।
हम जानते हैं कि शनि, साईं, पीर, फकीर की मजारों पर देश भर में हिन्दू, मुस्लिम सहित अन्य धर्मों से जुड़े बड़े तबके का मजमा जुटता रहा है, परम परमेश्वर के प्रति श्रद्धा व अगाध विश्वास से कहीं न कहीं हमें लाभ अवश्य होता आया है लेकिन जब यही सात्विक पूजा-अर्चना लोगों की नासमझी, निरक्षरता के कारण आसुरी पूजा का रूप लेती है तो ऐसे छलावे में फंसे इंसान का कभी कोई अच्छा नहीं हुआ है, ऐसे तंत्र-मंत्र से केवल भला उन्हीं लोगों का हुआ है जिन्होंने ऐसे छलावे में फंसा कर लोगों को बेवकूफ बनाया है।
आखिर हमें और समाज को कितनी जरूरत है ऐसे काल्पनिक पीर-फकीरों, तांत्रिकों व बैगाओं की? कितना दम है इनकी परस्ती में? ये सारे सवालों की गहराई तक जाया जाये तो वास्तविकता यही कहती है कि जहां तक बात श्रद्धा व विश्वास की है, एक हद तक इन्हें समझा जा सकता है लेकिन इसकी आड़ में हो रही लूट खसोट, बलि के नाम पर मासूमों की मौत, जानवरों की मौत इस समाज से जुड़े उस व्यक्ति व परिवार को केवल और केवल गर्त की ओर ही धकेलती रही है, फिर भी क्यों अंजान बन कर लोग ऐसी अंधश्रद्धा के शिकार होते हैं या किसी और को बनाते हैं? इस पर समाज के हर व्यक्ति को चिंतन करना चाहिए।
मैं यहां किसी धर्म विशेष की बात नहीं कर रहा, क्योंकि सभी धर्म और सम्प्रदायों में आस्था व श्रद्धा को हम झुठलाना भी नहीं चाहते लेकिन इनकी आड़ में कुछ लोगों द्वारा चोला बदल अंध विश्वास के नाम पर जिस तरह लूट खसोट करते परेशान लोगों का दर्द हरने का हवाला दे जिस तरह उन्हें और भी दु:ख व दर्द की खाई में धकेलने का सिलसिला जारी है, आपत्ति उन्हीं लोगों से है। क्योंकि धर्म की दुकान चलाने वाले सभी धर्मों में मौजूद हैं और उनका नेटवर्क इतना मजबूत होता है कि कानून भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता।

00 बेशकीमत जमीनें कब्जे में, चल रहा है धंधा..........
पिछले 31 जुलाई के फैसले को ही लें, जब सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दलवीर भंडारी और मुकुंदकम शर्मा पर आधारित बेंच ने सार्वजनिक जगहों पर धार्मिक ढांचा बनाने वालों के खिलाफ ढिलाई बरतने पर सरकार को तगड़ी फटकार लगाई थी। दोनों जस्टिस ने सालिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमणियम को कहा कि वह राज्य सरकारों से 4 सप्ताह में सभी की सहमति सुनिश्चित कर यह हलफनामा दाखिल करें कि भविष्य में सार्वजनिक जगहों पर पीर, मंदिर, मस्जिद, चर्च या गुरूद्वारा नहीं बनने दिया जायेगा। पीठ ने यह हलफनामा गुजरात हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली केन्द्र सरकार की याचिका पर तलब किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर यह निर्देश दिया कि सड़क के किनारे गैर कानूनी ढांचा खड़ा करने वालों के खिलाफ सख्ती बरतते हुए उन्हें सजा भी दी जाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश पर कितना अमल हो रहा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लगभग 2 सौ स्थानों पर हाईवे में बाधा खड़ी करने वाले पीठ, मठ और मंदिर जहां सुचारू आवागमन के लिये आज भी बाधक बने हुए हैं वहीं बाबा फरीद, शाह मुहम्मद, बुल्लेशाह वारिसशाह, कबीर, रहीम, रसखान, हाली जैसे सूफी संतों और समाज सुधारकों के नाम पर बना दिये गये मकबरे कब और कहां-कहां बने हैं इनकी संख्या उंगलियों में कत्तई नहीं गिनी जा सकती। घर बैठे कमाई करने की आड़ में पैदा होने वाले पीरों की कहानी शीशे की तरह साफ है, शुरू में हरे या नीले रंग का झंडा लगाया जाता है, फिर 4-5 फुट का चबुतरा नजर में आता है, जो कि धीरे-धीरे वहां इमारत और दरगाह का रूप ले लेता है। धीरे-धीरे धूप, अगरबत्ती, फूल, प्रसाद की दुकानें सजने लगती हैं और चंद वर्षों बाद ही इन मंदिर, मजारों की देखरेख करने वाले लोगों की श्रद्धा व अंधविश्वास का फायदा उठाते अच्छी खासी प्रापर्टी पर कब्जा जमा बशकीमत जमीन का मालिक तो बन ही जाते हैं साथ ही लोगों को यज्ञ-तज्ञ, तंत्र-मंत्र का हवाला दे न सिर्फ अपनी आजीविका को दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ाते जाते हैं बल्कि दु:ख दर्द लेकर पहुँचे लोगों की अस्मत तक से खेलने की भी घटनाएं कारित करने लगे हैं।

00 दो मासूमों की बलि से ट्विनसिटी शर्मसार...........
भिलाई में भी पिछले कुछ वर्षों के दौरान भगवान गजानन व मां भवानी की मूर्तियों के दूध पीने, घरों के बाहर गोबर से ओम् न लिखने पर रात में मर चुकी बुढिय़ा के घर आने जैसी तमाम अफवाहें व अंधश्रद्धा की घटनाएं खबरों में रही हैं लेकिन 23 नवंबर को रूआबांधा बस्ती में दो मासूमों के बलि की घटना ने जहां ट्विनसिटी के रहवासियों को चिंतन के घेरे में डाल दिया है वहीं प्रशासन भी इस संबंध में सोचने के लिये विवश हो गया है।
रूआबांधा बस्ती में ढाई वर्ष के बालक चिराग की बलि दिये जाने के मामले में पुलिस ने जब आरोपी ईश्वरी बैगा के घर में खुदाई की तो वहां से एक लापता छ: वर्ष की बच्ची का भी कंकाल मिला है। ईश्वरी के घर से मूर्ति के नीचे बच्ची का कंकाल मिलने के बाद निठारी हत्याकांड सहज् ही लोगों के बीच पुन: चर्चा में आ गया। अंधविश्वास का ऐसा दुष्परिणाम भिलाई जैसी हाई प्रोफाईल सिटी के लिये अब भी बदनुमा धब्बा सा लगने लगा है। शहर में अनेक लोगों ने इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए भिलाई की श्रमिक बस्तियों में अंधविश्वास के खिलाफ अभियान शुरू करने की मांग की। वजह जो भी हो लेकिन यह भी एक बड़ी सच्चाई है कि अनेक अभियान चलाये जाने के बाद भी समाज का एक बड़ा तबका लगातार अंधविश्वास की चपेट में आता जा रहा है। पढ़े-लिखे लोगों में भी ऐसी अंधश्रद्धा का पनपना समाज को गर्त की ओर ले जा सकता है।

च्च्ज्योतिष का सूर्यज्ज् से चर्चा में एसपी अमित कुमार ने बताया कि आरोपी ईश्वरी यादव बैगा उसकी पत्नी किरण यादव, हेमंत, अजय, खान बाबा, सुखदेव, महानंद यादव, कृष्णा उर्फ तम्बी ने मिलकर योजनाबद्ध तरीके से अपने ही आंगन में खेल रहे पोषण राजपूत के पुत्र चिराग उम्र ढाई वर्ष को घर से उठाया और उसकी बलि दे दी। संदेह के आधार पर पुलिस को काली मूर्ति के पास एक दोने में खून दिखा, जिससे पुलिस का शक और पुख्ता हो गया। उसके बाद पुलिस ने डाग स्काड की मदद ली। कुत्ते ने बालक चिराग के जूते को सुंघा उसके बाद सीधे मूर्ति के पास पहुंच गया। पुलिस इस जगह की खुदाई की तब वहां से बच्चे का शव मिला। जिसके गले को चापडऩुमा हथियार से रेता गया था। ईश्वरी के घर में और गहरी खुदाई करने पर जानवरों के कंकाल भीतर मिलने लगे। एक अन्य बच्चे के कंकाल मिलने पर खुदाई कर रही टीम के होश उड़ गये थे। आरोपियों ने बताया कि वह कंकाल छ: वर्षीय बच्ची मनीषा का है जो कि दुर्ग साईं मंदिर के पास से गायब की गई थी।
रूआबांधा बस्ती में ईश्वरी यादव के संबंध में जानकारी रखने वाले लोगों ने छत्तीसगढ़ से चर्चा में बताया कि ईश्वरी व उसके परिवार की तंत्र-मंत्र, टोना-टोटका के लिये लम्बे समय से अंधश्रद्धा बरकरार थी। रूआबांधा में ही पिछले कुछ वर्ष के भीतर उसने तीन घर बदले थे। अपने घर को यादव परिवार द्वारा सब्जियों की लता तथा पेड़-झाडिय़ों से इस तरह ढांक कर रखा जाता था कि भीतरी गतिविधियों की जानकारी आसानी से आस-पड़ोस वाले नहीं देख सकते थे। इसके पहले ईश्वरी कुछ माह तक नेवई भाठा में भी निवास कर चुका है। वहां पर वह तंत्र-मंत्र क्रियाएं करने लगा था जिससे नाराज होकर वहां के लोगों ने इसे मारपीट कर भगाया भी था। लगभग डेढ़ वर्ष से रूआबांधा बस्ती में ईश्वरी का परिवार रहने लगा था।
00 आठ महीने पहले चढ़ाई थी मनीषा की बलि................
कंकाल मिलने के बाद कड़ाई से पूछताछ पर आरोपियों ने बताया कि 4 मार्च 2010 को दुर्ग सिविल लाईन से राजेन्द्र महार व महानंद यादव ने 6 वर्षीय मनीषा पिता वीरू देवार को मोटर साइकिल से अपहरण कर ईश्वर लाल के यहां ले आए। वहां तीन दिनों तक उसकी पूजा की और बाद में गला रेत बलि चढ़ा दी गई। आरोपियों ने पुलिस को बताया कि मनीषा काफी भोली भाली बच्ची थी। माता-पिता से अलग होने के बाद भी रोई नहीं थी। भूख लगने पर ही वह तंग करती थी। बलि चढ़ाने के पूर्व दोनों बच्चों को नहलाकर उनकी पूजा की। बाद में उनकी हत्या कर दी।
00 पांच शिष्यों को पांडव का नाम दिया था..........
मुख्य आरोपी ईश्वर व उसकी पत्नी ने तंत्र-मंत्र क्रिया के लिये शिष्य के रूप में हेमंत साहू, सुखदेव, खान बाबा, तम्बी उर्फ कृष्णा, अजय यादव को रखा हुआ था। ये लोग यादव परिवार के साथ शक्ति व सिद्धि के लिये अंधश्रद्धा के दौरान अपनाई जाने वाली क्रियाओं में उनका पूरा सहयोग करते थे। दोनों नर बलि में आरोपियों ने शव को दफनाकर उसके ऊपर देवी की प्रतिमा रख दी थी। ईश्वर यादव को उनके शिष्य गुरू बाबा व उसकी पत्नी किरण यादव को माता के नाम से संबोधित करते थे।
00 स्वप्न में देवी ने मांगा था बलि, इसीलिये............
यादव परिवार में तंत्र-मंत्रि क्रियाओं के लिये शिष्यों की माता कहलाने वाली आरोपी किरण यादव ने बताया कि पूर्व में उसे सपना आया था कि वह किसी बच्चे की बलि दे तो सिद्धि प्राप्त करेगी। उसी स्वप्न को देवी का आदेश मान सभी आरोपियों ने योजनाबद्ध तरीके से मनीषा का अपहरण किया। उसकी बलि चढ़ाई। लेकिन कुछ दिन बाद किरण को फिर स्वप्न आया जिसमें देवी ने कहा कि बलि लड़की नहीं लड़के की चढ़ाई जाये। दीपावली के पहले ही यादव परिवार ने लड़के की बलि के लिये चिराग के संबंध में राय मशविरे के बाद उसे दीपावली के पहले अगवा करना था लेकिन उनकी योजना सफल नहीं हो पाई। दीपावली त्यौहार मनाने के बाद उनका प्रयास शुरू हुआ और उन्होंने चिराग को घर के सामने से उठा कर उसी शाम बलि दे दी।
- संतोष मिश्रा-
(पत्रकार)
4/4 सीजी हाऊसिंग बोर्ड कालोनी
औद्योगिक क्षेत्र, भिलाई-490026
(मो. 09329-117655)
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