ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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गुरुवार, 30 जून 2011

कैसा रहेगा आपके लिए 1 जुलाई को सूर्य ग्रहण और राशियों पर प्रभाव

कैसा रहेगा आपके लिए 1 जुलाई को सूर्य ग्रहण और राशियों पर प्रभाव वर्ष 2011 का तीसरा ग्रहण 1 जुलाई को सूर्यग्रहण के रूप में लग रहा है जो भारत में नहीं दिखेगा.
यह अंटार्कटिका को छोड़कर दुनिया में कहीं और दिखाई नहीं देगा.
आंशिक सूर्य ग्रहण शुक्रवार को भारतीय समयानुसार दोपहर एक बजकर 23 मिनट पर शुरू होकर 2 बजकर 53 मिनट तक रहेगा. दोपहर 2 बजकर 9 मिनट पर यह चरम पर होगा. यह खगोलीय घटना करीब डेढ घंटे जारी रहेगी.
साइंस पॉपुलराइजेशन एसोसिएशन आफ कम्यूनिकेटर्स एंड एजुकेटर्स (स्पेस) के अध्यक्ष सी. बी. देवगन ने कहा कि आंशिक सूर्य ग्रहण केवल अंटार्कटिका और दक्षिणी अक्षांश से दिखाई देगा.
वर्ष 2011 में लगने वाले चार आंशिक सूर्यग्रहणों में शुक्रवार को ग्रहण तीसरा है. इससे पहले 4 जनवरी, और 1 जून को ग्रहण पड़ चुका है तथा शुक्रवार के बाद 25 नवंबर 2011 को अगला सूर्य ग्रहण लगेगा.
इस ग्रहण को अनोखा कहा जा सकता है क्योंकि दक्षिणी गोलार्ध ठंड का मौसम है.
ज्योतिष शास्त्र के जानकारों के मुताबिक ग्रहण के असर के कारण आने वाले दिनों में इन जगह प्राकृतिक आपदाएं आने के योग बन सकते हैं. लगातार तीन ग्रहण होने से दुनिया के कुछ हिस्सों में प्राकृतिक प्रकोप या कोई बड़ी दुर्घटना होने की आशंका जताई जा रही है.

इस साल पड़ने वाले अन्य सूर्य ग्रहण:
25 नवंबर 2011, खंडग्रास सूर्यग्रहण होगा. यह भी भारत में नहीं दिखेगा.
10 दिसंबर 2011, शनिवार को खग्रास चंद्रग्रहण, जो भारत में दिखाई देगा.
क्या होता है पूर्ण सूर्य ग्रहण ?
पूर्ण सूर्य ग्रहण उस समय होता है जब चन्द्रमा पृथ्वी के काफ़ी पास रहते हुए पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है और चन्द्रमा पूरी तरह से पृ्थ्वी को अपने छाया क्षेत्र में ले लेता है. इसके फलस्वरूप सूर्य का प्रकाश पृ्थ्वी तक पहुंच नहीं पाता है और पृ्थ्वी पर अंधकार जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है तब पृथ्वी पर पूरा सूर्य दिखाई नहीं देता. इस प्रकार बनने वाला ग्रहण पूर्ण सूर्य ग्रहण कहलाता है.

आंशिक सूर्य ग्रहण
आंशिक सूर्यग्रहण में जब चन्द्रमा सूर्य व पृथ्वी के बीच में इस प्रकार आए कि सूर्य का कुछ ही भाग पृथ्वी से दिखाई नहीं देता है अर्थात चन्दमा, सूर्य के केवल कुछ भाग को ही अपनी छाया में ले पाता है. इससे सूर्य का कुछ भाग ग्रहण ग्रास में तथा कुछ भाग ग्रहण से अप्रभावित रहता है तो पृथ्वी के उस भाग विशेष में लगा ग्रहण आंशिक सूर्य ग्रहण कहलाता है.

वलयाकार सूर्य ग्रहण
वलयाकार सूर्य ग्रहण में जब चन्द्रमा पृथ्वी के काफ़ी दूर रहते हुए पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है अर्थात चन्द्र सूर्य को इस प्रकार से ढकता है, कि सूर्य का केवल मध्य भाग ही छाया क्षेत्र में आता है और पृथ्वी से देखने पर चन्द्रमा द्वारा सूर्य पूरी तरह ढका दिखाई नहीं देता बल्कि सूर्य के बाहर का क्षेत्र प्रकाशित होने के कारण कंगन या वलय के रूप में चमकता दिखाई देता है. कंगन आकार में बने सूर्यग्रहण को ही वलयाकार सूर्य ग्रहण कहलाता है.



साल 2011 में ढेर सारी खगोलिय घटनाएं देखने को मिलेंगी। इस साल कुल 6 ग्रहण लगेंगे। साल में छह ग्रहण जैसी स्थिति महाभारत के काल में बनी थी, जिसका सबसे बुरा प्रकोप भारत पर देखने को मिला था। इसी क्रम के अंतर्गत 1 जुलाई को आंशिक सूर्य ग्रहण पड़ेगा। यह ग्रहण दोपहर 1:24 बजे से शुरू हो गा और 2:55 बजे तक रहेगा। यह ग्रहण भारत में नहीं दिखाई देगा, लेकिन फिर भी इसके प्रभाव भारत में देखने को मिलेंगे।

गुरु को छोड़ सभी ग्रह इस ग्रहण की चपेट में आयेंगे। इस ग्रहण के भारत व लोगों पर क्‍या प्रभाव पड़ेगा इस बारे में हमें बता रहे हैं लखनऊ के ज्‍योतिषाचार्य अनुज के शुक्‍ला।

भारत की राशि वृषभ है और वृषभ राशि के लिए यह ग्रहण अच्‍छा नहीं है। इसके प्रभाव स्‍वरूप भारतीय राजनीति में उथलपुथल की आशंका बन रही है। बाढ़, आंधी, तूफान व भूकंप के खतरे बनने लगे हैं।

अब बात करते हैं किस राशि पर क्‍या होगा प्रभाव ? मेष: पुराने कार्यों में प्रगति मिलेगी, महिलाओं को सिर दर्द की शिकायत हो सकती है, व्‍यापारी वर्ग को धन लाभ मिल सकता है।
वृषभ: जीवन साथी से तनाव हो सकता है। अच्‍छी खबर सुनाई देगी, मंगल कार्य होंगे व धन की प्राप्ति होगी।
मिथुन: नौकरी पेशे वाले सावधान रहें। परिवार में छोटे मेहमान के आने की खबर मिल सकती है। घर में ढेर सारी खुशिया आयेंगी।
कर्क: संतान की ओर से परेशानी बढ़ सकती है, स्‍वास्‍थ्‍य बिगड़ सकता है, जोड़ों के दर्द की शिकायत हो सकती है।
सिंह: नौकरी में सफलता, व्‍यापारी वर्ग को अचानक यात्रा करनी पड़ सकती है, तनाव बढ़ सकता है।
कन्‍या: अचानक तनाव बढ़ सकता है, धन की हानि व किसी से झगड़ा हो सकता है। शत्रुओं से सावधान रहें।
तुला: सरकारी कार्यों को लेकर भागदौड़ बनी रहेगी, महिलाएं अपनी निजी बातें किसी को ना बतायें। खर्च बढ़ेगा।
वृश्चिक: व्‍यापारी वर्ग को धनहानि हो सकती है, संतान की ओर से चिंता बढ़ेगी। घरेलू नौकरों से सावधान रहें।
धनु: सौंदर्य व लेखन से जुड़े लोगों को प्रसिद्ध मिलेगी, मां की ओर से चिंता बढ़ेगी।
मकर: भौतिक सुखों में वृद्धि होगी, धारदार हथियार व वस्‍तुओं से दूर रहें। शत्रुओं से सावधान रहने की जरूरत है।
कुंभ: यह ग्रह विशेष रूप से फलदायी होगा। चारों तरफ से खुशियां आयेंगी।
मीन: धन के मामलों में नई योनाएं शुरू हो सकती हैं। वाहन संभाल कर चलायें, दुर्घटना की आशंका है।

बुधवार, 29 जून 2011

भारतीय प्राच्य विद्याओं और संस्कृति के अलावा धर्म , आध्यात्म , वास्तु शास्त्र एवम ज्योतिष पर आधारित मासिक पत्रिका। छत्तीसगढ़ के संस्कारधानी भिलाई से प्रकाशित ।

क्या शंकर गुहा नियोगी के हत्यारों का सचमुच होगा पर्दाफाश........?

क्या शंकर गुहा नियोगी के हत्यारों का सचमुच होगा पर्दाफाश........?

उच्चतम न्यायालय से रिहा हो शंकर गुहा नियोगी हत्याकांड का एक प्रमुख आरोपी चंद्रकांत शाह बीस वर्षों बाद अब हत्याकांड से जुड़े असली तथ्यों को उजागर करना चाहता है, उसका कहना है कि मुझे और पल्टन मल्लाह को हत्याकांड में सिर्फ बलि का बकरा बनाया गया जबकि नियोगी की हत्या में कु...
छ बड़े उद्योगपति, शराब माफिया व उस दौर के राजनीतिज्ञ सभी शामिल थे। चंद महीने पहले अन्ना हजारे के आंदोलन से प्रभावित चंद्रकांत शाह ने खुले आम ऐलान कर दिया है कि नियोगी हत्याकांड में संलिप्त लोगों को अब वह नहीं छोड़ेगा, केस को री-ओपन करवाने के प्रयास में लगे चंद्रकांत ने इस मामले को लेकर स्वामी अग्निवेश तक गुहार लगा दी है, शाह का कहना है कि वो नियोगी को देवता की तरह पूजने वाले संगठन छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा को भी इस न्याय की लड़ाई में शामिल करने की मंशा रखता है।

00 सच्ची श्रद्धांजलि की चाहत रखता हूं-चंद्रकांतचर्चा में चंद्रकांत शाह ने जो कुछ तथ्य सामने रखे हैं, अगर उनमें सच्चाई है तो यह मामला एक बार फिर जबर्दश्त रूप ग्रहण करेगा। चंद्रकांत के ऐलान से एक बार फिर श्रमिक संगठनों में नियोगी हत्याकांड के आरोपियों को सजा दिलवाने की मंशा उफान पर है। चंद्रकांत ने कहा है कि स्थानीय पुलिस ने सबसे पहले गलती की और चंद लोगों को बेवजह इस मामले में घसीट लिया और जो वास्तविक रूप से नियोगी की हत्या की नियत से बैठकें करते रहे, प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से शामिल हुए उन्हें या तो बड़ी आसानी से बाहर निकाल लिया गया या फिर उनके नाम पर चर्चा करना स्थानीय पुलिस प्रशासन से उचित नहीं समझा। हत्याकांड में आरोपी बनाये गये चंद्रकांत शाह चार वर्षों की सजा का दंश अब भी नहीं भूला सके हैं। उनका कहना है कि स्थानीय पुलिस द्वारा बनाये गये खाका को ही आधार मान सीबीआई उसी ढर्रे पर काम करती रही नतीजतन नियोगी के वास्तविक हत्यारे आज भी खूली हवा में सांस ले रहे हैं, ऐशो-आराम का जीवन व्यतीत करते हुए समाज सेवक की भूमिका तक बना बैठे हैं, उन सभी लोगों को बेनकाब कर सजा दिलवाना ही शंकर गुहा नियोगी के प्रति उनकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। दिल्ली में मौजूद श्री शाह ने बताया कि सीनियर वकीलों से वे इस संबंध में चर्चा कर चुके हैं। स्वामी अग्निवेश से उन्हें फिलहाल कोई जवाब नहीं मिला है। कुछ विशेषज्ञों ने चर्चा में उन्हें कहा है कि पहले इस मामले में जनसमर्थन जुटा कर लोगों में जागरूकता पैदा करें, उसके बाद कानूनी लड़ाई प्रारम्भ की जायेगी।

00 हवाई महल से नहीं निकल सकी सीबीआईजहां तक निचली अदालतों की बात की जाये, नियोगी हत्याकांड में बनाये गये सभी आरोपी एक के बाद एक बरी होते रहे अंत में उच्चतम न्यायालय ने केवल पल्टन मल्लाह को ही सजा का पात्र माना। चंद्रकांत शाह का कहना है कि नियोगी हत्याकांड में दोषी पाया गया पल्टन एक मोहरा है, जबकि उसके पीछे छिप कर वार करने वाले सारे लोग अब भी आजाद हैं, उनके खिलाफ ठोस सबूत का दावा भी चंद्रकांत करते हुए कहते हैं कि सीबीआई जांच अफसरों की भूमिका भी इस केस में संदेह के दायरे में थी। उन्होंने कहा कि स्थानीय पुलिस प्रशासन ने जो कहानी गढ़ हवाई महल तैयार किया था उसी में सीबीआई उड़ती रही। हत्याकांड में नाम लाने व हटाने की धौंस दे कर पुलिस प्रशासन व अन्य जांच एजेंसियों ने अपनी जेबें ब्लेकमेलर की भूमिका में रहते हुए भरी हैं।
नियोगी हत्याकांड के बीस वर्ष बाद अचानक चंद्रकांत का सामने आना और इस तरह का ऐलान एक बार फिर भिलाई, रायपुर के उद्योग जगत में हलचलें बढ़ा गया है। बरी होने के चार वर्ष बाद चंद्रकांत के सामने आने के सवाल पर उनका जवाब है कि वे उस समय अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों में फंसे हुए थे। नियोगी हत्याकांड का आरोपी बना दिये जाने से साथी उद्योगपति, व्यावसायी, दोस्त, रिश्तेदार सबके सब मेरे परिवार व मुझसे किनारा कर चुके थे। बरी होने के बाद भी मेरा नाम सुन कर लोग आसानी से यह दुहरा देते हैं कि नियोगी हत्याकांड वाले चंद्रकांत शाह.........? शाह का कहना है कि नियोगी जब औद्योगिक क्षेत्र में उद्योगपतियों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे, अनेक बड़े-छोटे उद्योगों में हड़ताल होने लगी थी तब भी उनके द्वारा संचालित ओसवाल उद्योग के श्रमिक पूरी तरह संतुष्ट थे, उनकी फर्म में न तो कभी हड़ताल की नौबत आई और न ही तालाबंदी की। ऐसी स्थिति में वे बार-बार ये कहते रहे कि नियोगी की हत्या करवाने के पीछे मेरे पास कोई वजह ही नहीं थी फिर मुझे क्यों फंसाया जा रहा है, लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी।

00 अब सक्षम हूं इसलिये अवश्य खोलूंगा राजशाह कहते हैं कि अनेक दरवाजे पर खुद को बेकसूर साबित करने की लगने वाली गुहार के बदले में मुझे खुले तौर पर धमकियां मिलने लगीं कि चुप न रहने पर परिवार को जान से मार देंगे। चूंकि उन दिनों बच्चे छोटे थे, मुझे इस केस में उलझाने के बाद परिवार पूरी तरह टूट सा गया था, इसलिये सब कुछ ईश्वर के हाथ छोड़ कर हमने चुप्पी साधे रखी, लाख कष्ट व इल्जाम का दंश झेलते हुए अंतत: सत्य की जीत हुई। सुप्रीम कोर्ट से बरी होने के बाद मैंने परिवार की सारी जिम्मेदारियां सम्हाली। बच्चों की शादियां की, अपने बंद हो चुके उद्योग को दूसरे शहर से प्रारम्भ कर एक मुकाम हासिल करने के बाद मैं अपने खिलाफ हुए जुल्म और स्व. शंकर गुहा नियोगी के हत्यारों को सजा दिलाने कमर कस तैयार हूँ।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि अन्ना हजारे के आंदोलन में जिस प्रकार खर्च और फायनेंस करने की बातें सामने आईं थी वैसा मेरे साथ नहीं होगा, पूरे आंदोलन में मैं स्वयं खर्च करने सक्षम हूं। भिलाई के एसीसी में स्थित नियोगी चौराहे से वे जल्द जनआंदोलन शुरू करेंगे और उसी मंच से उन सारे लोगों को बेनकाब करेंगे जो कि नियोगी के वास्तविक हत्यारे थे। उन्होंने कहा कि अब न तो खुद को खोने का भय है और न ही परिवार के कमजोर होने की अड़चन। अब तो सीधी लड़ाई जनता के सहयोग से वे लड़ेंगे और नियोगी हत्याकांड की बंद फाईल फिर से खुलवा कर वास्तविक हत्यारों को सजा दिलवाना ही एकमात्र उनका मकसद है। लगातार दिल्ली में रूक कर स्वामी अग्निवेश व अन्ना हजारे तक वे अपनी गुहार लगा चुके हैं। उनका कहना है कि वहां से हरी झण्डी मिलते ही वे जनसहयोग के लिये भिलाई में अपील कर और लोगों को साथ जोड़ इसे एक आंदोलन का रूप देंगे।

00 पहल करेंगे तो अवश्य मुक्ति मोर्चा साथ देगा-बागड़ेछत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष भीमराव बागड़े ने बताया कि चंद्रकांत शाह द्वारा फिलहाल उनसे इस संबंध में कोई चर्चा नहीं हुई है। अगर वे पहल करते हैं और मुक्ति मोर्चा की जरूरत महसूस करेंगे तो हम सड़क की लड़ाई में इसलिये उनका साथ देंगे क्योंकि ये मामला हमारे नेता शंकर गुहा नियोगी की हत्या का है। श्री बागड़े ने कहा कि न्यायालय के फैसले से मुक्ति मोर्चा बुरी तरह आहत था, इसलिये केस री-ओपन करवाने के प्रयास मोर्चा ने किया था जो कि विफल रहा। श्री बागड़े कहते हैं कि मुक्ति मोर्चा हमेशा कहता रहा है कि नियोगी हत्याकांड में भाड़े के हत्यारे और कुछ मोहरों को ही पकड़ा गया था लेकिन हत्या की साजिश रचने वाले अभी भी खुले घूम रहे हैं। उन्होंने बताया कि मुक्ति मोर्चा चंद्रकांत शाह को हत्याकांड में फंसाया गया मोहरा ही मानता है, खुले तौर पर हम शुरू से कहते आ रहे हैं कि नियोगी हत्याकांड में कैलाश पति केडिया, मूलचंद शाह जैसे कुछ अन्य लोग सीधे तौर पर गुनहगार हैं लेकिन न तो पुलिस प्रशासन से हमारी सुनी और न ही सीबीआई। चंद्रकांत शाह की पहल का स्वागत करते हुए श्री बागड़े कहते हैं कि सचमुच जागरूकता जरूरी है, जनजागरण से ही नियोगी के वास्तविक हत्यारों को सजा हो सकती है। चंद्रकांत शाह से जब सवाल किया गया कि उन्होंने मुक्ति मोर्चा को आंदोलन में जोडऩे के लिये कोई पहल की है, तो उन्होंने बताया कि चूंकि मुक्ति मोर्चा के तीन से चार टूकड़े हो गये हैं इसलिये वे नहीं जानते कि किससे चर्चा की जाये। दिल्ली से लौटने के बाद वे जल्द मुक्ति मोर्चा के सभी गुटों से बात कर जनजागरण अभियान शुरू करेंगे।

00 फैसलों से असंतुष्ट ही रहा नियोगी परिवार..............निचली अदालतों से उच्चतम न्यायालय तक नियोगी हत्याकांड में कुल छ: आरोपी बनाये गये थे जिनमें से एक के बाद एक पांच आरोपियों को न्यायालय ने बरी कर दिया था। लगभग 14 से 15 वर्ष तक न्याय व्यवस्था की राह ताक रहे नियोगी के परिवार और उन्हें आदर्श मान समर्पित भाव से अलग-अलग संगठन चला रहे मुक्ति मोर्चा के नेता भी एक हद तक फैसले के बाद निराश ही दिखाई पड़े। 27 सितम्बर 1991 को शंकर गुहा नियोगी की गोली मार हत्या कर दी गई थी। बरसों तक लम्बा खिंचता गया यह मामला शांतिपूर्वक इंतजार के बाद भी नियोगी परिवार को ढाढस नहीं बंधा पाया।
स्व. नियोगी की पत्नी आशा ने फैसला आने के बाद ही कहा था कि अदालत के फैसले से उन्हें मायूसी ही मिली है क्योंकि असली कातिल छोड़ दिये गये। राजधानी से 130 किलोमीटर दूर दल्ली राजहरा इलाके में रहने वाली आशा नियोगी ने कहा था कि उन्हें इस बात की खुशी है कि भाड़े के हत्यारे पल्टन मल्लाह को उम्र कैद की सजा मिली लेकिन हत्या की साजिश रचने वाले लोग आज भी चैन की जिंदगी जी रहे हैं, यह बड़े ही दु:ख का विषय है। नियोगी का बेटा जीत गुहा और बेटी मुक्ति भी अदालत के फैसले से संतुष्ट नहीं थे। हालांकि जीत वर्तमान में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा की कमान सम्हालने की बजाय जन मुक्ति मोर्चा के प्रमुख हैं फिर भी नियोगी की हत्या करने व करवाने वालों के खिलाफ उनकी लड़ाई जारी है। छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा जो आज कई धड़ों में बंट गया है, उसके सभी धड़े चाहे वो जनक ठाकुर हों या फिर भीम राव बागड़े, सब लोग नियोगी के हत्यारों को कड़ी सजा दिलाने की चाहत रखते हैं। ऐसी स्थिति में चंद्रकांत का खुल कर सामने आना क्या इन लोगों के लिये सम्बल बनेगा, यह समय के गर्भ में छिपा जरूर है लेकिन इसे लेकर चर्चाओं का बाजार गरमाने लगा है।

00 नियोगी मरा नहीं करते, लड़ाई जारी है...............लेबर लीडर शंकर गुहा नियोगी आज भी उन सभी श्रमिकों के लिये देवता का ही रूप हैं जो कि उद्योगपतियों के शोषण के शिकार व अधिकार से वंचित मजदूरों के लिये बगावत की जंग छेडऩे आमादा रहते हैं। नियोगी को इस जहान से गये 20 वर्ष बीतने के बाद भी वे कहीं न कहीं इन श्रमिकों की श्रद्धा व विश्वास में समाए हुए से दिखाई देते हैं हालांकि छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा नियोगी के जाने के बाद तीन प्रमुख व अनेक उप हिस्सों में टूट गया है लेकिन नियोगी की शहादत के दिन उमड़ी मजदूरों की बेपनाह मौजूदगी ये एहसास करा जाती है कि इन्हें अपने मुखिया नहीं बल्कि देवता नियोगी के मोह ने खिंच रखा है। लगभग दो दशक से हजारों की भीड़ में शामिल मजदूर व किसान एक ऐसे व्यक्ति को श्रद्धांजलि देने आते हैं जो उनके लिये अब कोई करिश्मा नहीं कर सकता लेकिन उस करिश्मे की आस सब में अभी भी पहले की ही तरह दिखाई दे जाती है। लड़ाई अभी भी उन्हीं मुद्दों पर जारी है लेकिन नियोगी का विजयी स्वप्न बना छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा अब पल-पल में बिखर व सिमटता दिखाई देने लगा है। मुक्ति मोर्चा के कुछ धड़े तो अब राजनीतिक दलों से भी हाथ मिला साथ चल रहे हैं ऐसी मिलनसारिता नियोगी के समय कभी चर्चा में भी नहीं थी लेकिन समय के साथ कभी एकजुटता की मिसाल बना छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा अब विखंडित रूप में दिन-ब-दिन अपनी कमजोरी का उदाहरण स्वयं बनता जा रहा है।

00 कभी न खत्म होने वाली दास्तां थे नियोगी
श्रमिकों का शोषण तो हर सदी में होता रहा है। मुगल काल में श्रमिक गुलामी भरा जीवन जीता रहा, अंग्रेज शासन काल में फिरंगी भारतीय को मजदूर से अधिक कहीं नहीं समझते थे। मजदूरों पर अत्याचार का सिलसिला देश की आजादी के बाद भी खत्म नहीं हुआ। यूनियन बनती बिगड़ती रहीं लेकिन श्रमिकों के अधिकार की लड़ाई और उन पर जुल्म अत्याचार की प्रथा सदियों से चली आ रही है। छत्तीसगढ़ में शंकर गुहा नियोगी ने एक अमर क्रांति शुरू की थी मजदूरों को उनका वास्तविक हक दिलाने की। नियोगी की तर्क शक्ति व एकमात्र लक्ष्य की ओर बढऩे की अदा ने अच्छे-अच्छे उद्योगपतियों को नाकों चने चबवा दिया था। श्रमिकों के लिये कई कानून भी सरकार ने बनाये लेकिन राजनीति की शह पर पलती नौकरशाही और उद्योगपतियों की साजिश श्रमवीरों को उनके पसीने का हक दिलाने हमेशा आड़े आती रही। शोषक वर्ग की आंख का कांटा बन चुके नियोगी को हमेशा के लिये गहरी नींद में सुला दिया गया। मजदूरों का खून चूस चूस कर एयर कंडिशनर कमरों में बैठने वाले, लग्जरी गाडिय़ों में घूमने वाले मजदूरों को हेय दृष्टि से देखने वाले यह तक नहीं सोचते कि दुनिया में मजदूर न होते तो यह विश्व कैसा दिखता, कैसा लगता?
मजदूर, कालका, कुली, काला पत्थर, इंसाफ की आवाज जैसी कई फिल्मों में मजदूर वर्ग के साथ हो रहे शोषण को दिखाने के बाद भी न तो सरकारें जागीं और न ही शोषण करने वालों की अंतर्रात्मा.....। मजदूर की मजबूरी का फायदा उठाने वालों को सोचना चाहिए कि आखिर उसकी मेहनत और कारीगरी से ही हम एक अदद घर-मकान में रहने का सुख हासिल कर पाते हैं, छोटे से उद्योग से कुछ लोग कारपोरेट जगत में शुमार हो जाते हैं, उनकी सफलता के पीछे छिपे श्रम बल को भला कैसे भूलाया जा सकता है? उद्योगपतियों की सफलता में जिसका पसीना गिरा है, उसे कैसे नकार देते हैं लोग? क्यों ये भूल जाते हैं कि मजदूर का पसीना सूखने से पहले उसके श्रम का फल उसे अवश्य मिल जाना चाहिए। शंकर गुहा नियोगी ऐसी ही सोच रखने वाले श्रमिकों के नेता थे। उनकी हत्या करवाने या करने वाले सचमुच अगर सजा नहीं पा सकें हैं तो उन्हें सीखचों के पीछे धकेलना समाज का एक कर्तव्य भी है। अगर चंद्रकांत शाह के आरोपों में कोई बनावट या वैमनस्यता न छिपी हो तो सचमुच उन्हें नि:स्वार्थ भाव से यह लड़ाई लडऩी चाहिए। भले वे अकेले हैं लेकिन अगर सत्य मार्ग पर चल रहे हैं तो यकीनन कारवां जल्द बन जायेगा। अगर यह लड़ाई सार्थक हो गई तो आने वाली सदियों में नियोगी की दास्तां सचमुच कभी नहीं खत्म होगी बिल्कुल उनकी यादों की तरह।

- संतोष मिश्रा-
(पत्रकार)
4/4 सीजी हाऊसिंग बोर्ड कालोनी
औद्योगिक क्षेत्र, भिलाई-490026
(मो. 09329-117655)
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मंगलवार, 28 जून 2011

पाई की जगह लेगा ‘टाउ’! लेकिन वैदिक गणित और वैज्ञानिकों के दुनीया में क्या है इतिहास



पाई की जगह लेगा ‘टाउ’! लेकिन वैदिक गणित और वैज्ञानिकों के दुनीया में क्या है इतिहास
गणितीय ‘पाई’ के दिन पूरे हो गए लगते हैं। दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण संख्या की जगह गणितज्ञ अब उसके विकल्प ‘टाउ’ के प्रचार में लगे हैं।
डेली मेल की खबर में बताया गया कि गणितज्ञों का दावा है कि वृत्त की परिधि और व्यास के अनुपात के लिए होने वाला स्थिरांक गलत है और उसकी जगह टाउ का इस्तेमाल होना चाहिए। पाई का अंकीय मूल्य 3.14159265 होता है जो कि गलत नहीं है लेकिन वृत्त के गुणों के साथ इसे जोड़ना गलत है। उन्होंने इसके लिए टाउ सुझाया है जिसका मूल्य पाई का दोगुना यानी 6.28 है।
 पांच हजार अरब अंकों तक पाई का मान निकाला जा चुका है जो विदेश वैज्ञानिकों के लिए भारतीय गणितीय पद्धति का एक चुनौती पूर्ण फार्मूला था।
जापान के एक इंजीनियर ने पाई का पूर्ण मान निकालने की लगातार 90 दिनों तक जी तो़ड मेहनत की लेकिन पाई की गणना खत्म नहीं हुई। इस दौरान उसने दशमलव के बाद पांच हजार अरब अंकों तक पाई का मान निकाला। खाद्य प्रसंस्करण कंपनी में सिस्टम इंजीनियर के तौर पर काम कर रहे 55 वर्षीय शिगेरू कोंडो ने अपनी इस गणना से 2700 अरब अंकों तक पाई का मान निकालने के पिछले साल बनाए गए एक रिकॉर्ड को तो़ड दिया है। ज्यामिती में किसी वृत्त की परिधि की लंबाई और व्यास की लंबाई के अनुपात को पाई कहा जाता है। प्रत्येक वृत्त में यह अनुपात 3.141 होता है लेकिन दशमलव के बाद की पूरी संख्या का अब तक आंकलन नहीं किया जा सका है इसलिए इसे अनंत माना जाता है।
स्थानीय समाचार पत्र "डेली टेलीग्राफ" ने "क्योडो समाचार एजेंसी" के हवाले से कहा कि कोंडो को पचास खरब अंकों तक पाई के मान की गणना करने में 90 दिन और सात घंटे लगे। कोंडो ने इस गणना के लिए 11,550 पाउंड की लागत से खुद के बनाए कम्प्यूटर का इस्तेमाल किया इस कंप्यूटर की मेमोरी क्षमता उन्होंने 32 टेराबाइट तक बढ़ाई। कोंडो ने कहा कि उन्होंने इस प्रोजेक्ट पर काम के दौरान कम्प्यूटर की सुरक्षा की पूरी तैयारी कर रखी थी लेकिन एक बार उन्हें बाधा झेलनी प़डी जब उनकी बेटी के हेयर ड्रायर चालू करने पर बिजली आपूर्ति बंद हो गई और 10 मिनिट के पावर बैकअप के जरिए उन्हें प्रोजेक्ट सुरक्षित करना प़डा। कोंडो ने अब पाई का मान एक लाख अरब अंकों तक निकालने का लक्ष्य रखा है।
क्या शानदार संख्या है पाई
दसवीं तक गणित पढ़े हर किसी शख़्स ने कभी न कभी पाई का इस्तेमाल करते हुए वृत्तों का क्षेत्रफल इत्यादि निकालने का काम किया होगा. वही पाई आर स्क्वायर वाले फ़ॉर्मूले से. पाई यानी २२/७ एक विकट संख्या है. गणित, विज्ञान और अभियांत्रिकी के कई महत्वपूर्ण फ़ॉर्मूले इस पर आधारित हैं.
पाई को दशमलव में तब्दील करने पर गणित पढ़ाने वाले गुरुवर एक ग़ज़ब बात बताया करते थे.
π = २२/७ = ३.१४१५९२६५३५८९७९३२३८४६२६४३३.........
यह दशमलव अनन्त तक खींचा जा सकता है और इसके अंक किसी भी नियमित पैटर्न को फ़ॉलो नहीं करते.लेकिन अब इस फार्मूला के प्रतीक को नया रूप देना कितना कारगर रहेगा।
ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे महाराज, भिलाई (छ.ग.)

पाई की जगह लेगा ‘टाउ’! क्या है पाई का इतिहास



पाई की जगह लेगा ‘टाउ’! क्या है पाई का इतिहास
गणितीय ‘पाई’ के दिन पूरे हो गए लगते हैं। दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण संख्या की जगह गणितज्ञ अब उसके विकल्प ‘टाउ’ के प्रचार में लगे हैं।
डेली मेल की खबर में बताया गया कि गणितज्ञों का दावा है कि वृत्त की परिधि और व्यास के अनुपात के लिए होने वाला स्थिरांक गलत है और उसकी जगह टाउ का इस्तेमाल होना चाहिए।
द टाइम्स अखबार के मुताबिक, पाई का अंकीय मूल्य 3.14159265 होता है जोकि गलत नहीं है लेकिन वृत्त के गुणों के साथ इसे जोड़ना गलत है। उन्होंने इसके लिए टाउ सुझाया है जिसका मूल्य पाई का दोगुना यानी 6.28 है।
 पांच हजार अरब अंकों तक पाई का मान निकाला
लंदन। जापान के एक इंजीनियर ने पाई का पूर्ण मान निकालने की लगातार 90 दिनों तक जी तो़ड मेहनत की लेकिन पाई की गणना खत्म नहीं हुई। इस दौरान उसने दशमलव के बाद पांच हजार अरब अंकों तक पाई का मान निकाला। खाद्य प्रसंस्करण कंपनी में सिस्टम इंजीनियर के तौर पर काम कर रहे 55 वर्षीय शिगेरू कोंडो ने अपनी इस गणना से 2700 अरब अंकों तक पाई का मान निकालने के पिछले साल बनाए गए एक रिकॉर्ड को तो़ड दिया है। ज्यामिती में किसी वृत्त की परिधि की लंबाई और व्यास की लंबाई के अनुपात को पाई कहा जाता है। प्रत्येक वृत्त में यह अनुपात 3.141 होता है लेकिन दशमलव के बाद की पूरी संख्या का अब तक आंकलन नहीं किया जा सका है इसलिए इसे अनंत माना जाता है।

स्थानीय समाचार पत्र "डेली टेलीग्राफ" ने "क्योडो समाचार एजेंसी" के हवाले से कहा कि कोंडो को पचास खरब अंकों तक पाई के मान की गणना करने में 90 दिन और सात घंटे लगे। कोंडो ने इस गणना के लिए 11,550 पाउंड की लागत से खुद के बनाए कम्प्यूटर का इस्तेमाल किया इस कंप्यूटर की मेमोरी क्षमता उन्होंने 32 टेराबाइट तक बढ़ाई। कोंडो ने कहा कि उन्होंने इस प्रोजेक्ट पर काम के दौरान कम्प्यूटर की सुरक्षा की पूरी तैयारी कर रखी थी लेकिन एक बार उन्हें बाधा झेलनी प़डी जब उनकी बेटी के हेयर ड्रायर चालू करने पर बिजली आपूर्ति बंद हो गई और 10 मिनिट के पावर बैकअप के जरिए उन्हें प्रोजेक्ट सुरक्षित करना प़डा। कोंडो ने अब पाई का मान एक लाख अरब अंकों तक निकालने का लक्ष्य रखा है।
क्या शानदार संख्या है पाई
दसवीं तक गणित पढ़े हर किसी शख़्स ने कभी न कभी पाई का इस्तेमाल करते हुए वृत्तों का क्षेत्रफल इत्यादि निकालने का काम किया होगा. वही पाई आर स्क्वायर वाले फ़ॉर्मूले से. पाई यानी २२/७ एक विकट संख्या है. गणित, विज्ञान और अभियांत्रिकी के कई महत्वपूर्ण फ़ॉर्मूले इस पर आधारित हैं.

पाई को दशमलव में तब्दील करने पर गणित पढ़ाने वाले गुरुवर एक ग़ज़ब बात बताया करते थे.

π = २२/७ = ३.१४१५९२६५३५८९७९३२३८४६२६४३३.........

यह दशमलव अनन्त तक खींचा जा सकता है और इसके अंक किसी भी नियमित पैटर्न को फ़ॉलो नहीं करते.

क्या पाई कविता का विषय बनाया जा सकता है? हां, अगर शिम्बोर्स्का चाहें तो वे कुछ भी कर सकती हैं:

पाई

क्या शानदार संख्या है पाई:
तीन दशमलव एक चार एक.
आगे के सारे अंक भी शुरुआती हैं
पांच दो नौ क्योंकि कभी खत्म नहीं होना इस संख्या को
एक निगाह में नहीं समझ सकते इसे आप छः पांच तीन पांच
न गणना से आठ नौ
न कल्पना से सात नौ
न तर्कशास्त्र से तीन दो तीन आठ या तुलना से
चार छः या दुनिया की किसी भी चीज़ से
दो छः चार तीन

करीब चालीस फ़ीट के बाद दुनिया का सबसे बड़ा सांप
इस से हार मान लेता है.
इसी तरह किया करते हैं गाथाओं में आने वाले सांप -
अलबत्ता वे थोड़ा ज़्यादा देर तक ठहर पाते होंगे
पाई संख्या बनाने वाले अंकों का नृत्य
पृष्ठ के कोने पर पहुंच कर भी नहीं थमता
वह मेज़ से होता, हवा से गुज़रता हुआ
दीवार पर से, एक पत्ती, चिड़िया के घोंसले और बादलों से होता
सीधा आसमान में जा पहुंचता है
तमाम अतल स्वर्गों से गुज़र कर.
ओह, कितनी छोटी होती है पुच्छलतारे की पूंछ -
किसी चूहे या सूअर की पूंछ जितनी
कितनी कमज़ोर होती है एक तारे की किरण
जो शून्य में टकराते ही मुड़ जाती है!
जबकि यहां हमारे पास हैं - दो तीन पन्द्रह तीन सौ उन्नीस
मेरा फ़ोन नम्बर
तुम्हारी कमीज़ का साइज़
साल
उन्नीस सौ तिहत्तर और छ्ठी मंज़िल
लोगों की संख्या पैंसठ सैंट
कूल्हों की नाप, दो उंगलियां
एक गीत के बोल
एक कोड जिसमें हमें मिलते हैं "तुम्हारा स्वागत ओ फ़रिश्ते"
"चिड़िया तुम कभी नहीं थीं"
और इनकी बग़ल में "देवियो और सजानो, डरने की ज़रूरत नहीं"
और साथ ही "धरती और स्वर्ग दोनों ही गुज़र जाएंगे"
लेकिन पाई नहीं गुज़रेगी.
ना जी, कोई मतलब ही नहीं होता.
वह बनाए रखती है अपने उल्लेखनीय पांच को
अपने ख़ास आठ को
जो दूर रखता है आख़िरी सात को
कोहनी मारता
जारी रखता हुआ
एक अलसाई अनन्तता को.


यूँ तो इस अनुपात की आवश्यकता और इससे संबंधित शोध तो काफी पूर्व से होते आ रहे थे किन्तु इसके इस चिह्न (π) का प्रयोग सर्वप्रथम 1706 में विलियम जोन्स द्वारा किया गया, लेकिन इसे लोकप्रियता 1737 में स्विस गणितज्ञ लियोनार्ड यूलर द्वारा प्रयोग में लाना आरंभ करने के बाद मिली.
‘पाई दिवस’ का विचार सर्वप्रथम 1989 में लैरी शौ (Larry Shaw ) द्वारा प्रतिपादित किया गया.
2009 के पाई दिवस पर यू. एस. हाउस ऑफ रेप्रेजेंटेटिव्स ने इस तिथी को ‘राष्ट्रीय पाई दिवस’ के रूप में स्वीकार किया.
2010 में गूगल ने इस तिथी पर वृत्त और पाई के चिह्नों को प्रदर्शित करता एक डूडल अपने होम पेज पर प्रस्तुत कर इस आयोजन में अपनी स्वीकृति और भागीदारी भी सुनिश्चित कर दी.
इस तिथी के समीपवर्ती एक और तिथी है 22 जुलाई या 22/7 जो कि ‘पाई एप्रोक्सिमेशन दिवस’ के रूप में मनाया जाता है जो कि फ्रैक्शन पद्धति में पाई के मान के सदृश्य ही है.
गणित के रोचक तत्वों की श्रृंखला में ‘पाई मिनट’ को भी शामिल कर लिया जाता है जब 14 मार्च को 1:59:26 AM / PM पर पाई के सात दशमलवीय मान प्राप्त हो जाते हैं यानि 3.1415926.
समस्त विश्व में इस अवसर पर पाई के प्रयोग, महत्त्व आदि पर चर्चा - परिचर्चा का आयोजन करने की परंपरा स्थापित होती जा रही है. 
तो आइये हम भी के स्वागत करें गणित के इस महत्वपूर्ण और रोचक सहचर को समर्पित इस तिथी का.

[जबकि संयोग से आज प्रख्यात भौतिकविद और चिन्तक अलबर्ट आइंस्टाइन का जन्मदिवस (14 मार्च 1879 – 18 अप्रैल 1955) भी है. जिस परमाणु उर्जा के रचनात्मक उपयोग का उन्होंने स्वप्न देखा था, आज के परिदृश्य में उससे जुड़ी विनाशकारी संभावनाओं को देखते हुए उनकी मनःस्थिति की हम सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं. विज्ञान की उस महान विभूति को नमन.]
 
स्वागत पाई (π) दिवस का
आज मार्च 14 है, 3/14. अब आप सोच रहे होंगे कि इसमें भला ऐसी क्या खास बात है जो मैं इस तिथी  पर इतना जोर दे रहा हूँ. अजी बिलकुल खास है यह तारिख विशेषकर गणितप्रेमियों के लिए, क्योंकि आज की यह विशिष्ट तिथी प्रतिनिधित्व करती है गणित के एक विशेष चिह्न π (3.14) का. π जो कि अनुपात प्रदर्शित करता है वृत्त की परिधि और इसके व्यास का.

तेरह साल बाद बन रहा है तीन जुलाई २०११ को तीन महासंयोग--(रथयात्रा-विशेष)

तेरह साल बाद बन रहा है तीन जुलाई २०११ को तीन महासंयोग--(रथयात्रा-विशेष)ज्योतिषाचार्य पंविनोद चौबे महाराज, भिलाई, दुर्ग (छ.ग.)-09827198828


ज्योतिष के अनुसार आगामी तीन जुलाई को तीन  महासंयोग का दुर्लभ योग है। ज्योतिष और आध्यात्म दोनों दृष्टी से इस दिन तेरह साल बाद रवि पुष्य सर्वार्थ सिद्धि,गुप्त नवरात्र और जगदीश रथ यात्रा का महासंयोग होने जा रहा है। रवि पुष्य नक्षत्र जहां नए कार्य की शुरुआत व खरीद-फरोख्त के लिए सिद्धिदायक माना जाता है,वहीं शक्ति की साधना व उपासना के लिए गुप्त नवरात्र का विशेष महत्व के साथ ही साथ लौह, अयस्क और कोर्पोरेट जगत के शेयर खरिदी में ज्यादालाभ होगा क्योंकि आगामी 5 जुलाई को संबंधित क्षेत्र में बढ़ोत्तरी का योग है। दूसरी ओर आध्यात्मिक द-ष्टी से देखा जाय तो भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा दिवस पर भगवान जगन्नाथ के दर्शन का  पुण्यलाभ भी मिलेगा।  शुभकार्यों के लिए अत्यन्त शुभ समय इसलिए है क्योंकि तीन जुलाई को सूर्योदय से रात 10.26 बजे तक रवि पुष्य नक्षत्र रहेगा। यह स्वयं में सर्वार्थ सिद्धि योग है। इस दिन प्रतिपदा व अमावस की द्वितीया के दिन कोई भी शुभ कार्य बगैर मुहूर्त जाने किया जा सकता है, इसलिए इस तिथि को अबूझ मुहूर्त भी कहा जाता है । इस दिन चंद्रमा का बल अधिक रहता है। तंत्र साधनाओं की अगर बात की जाय तो यह सिद्धी-प्राप्ती के लिए भी अहम दिन होगा क्योंकि  एक दिन पूर्व शनिवार रात से गुप्त नवरात्र प्रारंभ होगी। अगले दिन द्वितीया पर सर्वार्थ सिद्धि योग के कारण इसका विशेष महत्व रहेगा। इसी दिन जगदीश रथ यात्रा दिवस भी है। तीन बड़े धार्मिक योग का संयोग 13 साल बाद बन रहा है। इससे पूर्व ऐसा योग 6 जुलाई 1997 में बना था।
 वर्ष में चार नवरात्री होते हैं। इनमें आश्विन में शारदीय व चैत्र में वासंतीक प्रकट नवरात्र मानी जाती हैं,जबकि माघ व आषाढ़ में होने वाली नवरात्र गुप्त नवरात्र कहलाती है। इस गुप्त नवरात्र का समापन ऐन्द्री पूजा एवं भड़ली नवमी पर होगा। रवि पुष्य के दिन से भड़ली नवमी के बीच शुभ कार्य व गृह उपयोगी वस्तुओं व स्वर्ण-चांदी खरीदना शुभ, समृद्धि कारक होता है। यदि वाहन, मकान, प्लाट, व्यावसायिक मशिने वगैर खरिदा जाय तो भी अत्यन्त शुभदायक होगा।-
अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें -09827198828

सोमवार, 27 जून 2011

बन्द पाश्चात्य संस्कृति का प्रहार भारतीय संस्कृति पर


शराब की बोतलों में बन्द पाश्चात्य संस्कृति का प्रहार भारतीय संस्कृति पर(सवाल है नारी जगत की अश्मिता का)- पं विनोद चौबे मित्रों आज कई दिनों से उत्तर प्रदेश में हो रहे स्त्रीयों पर अत्याचार और लड़कीयों द्वारा रेव पार्टीयों में शराब पीना सम्पूर्ण देश की संस्कृति को को हिला कर रख दिया है । आखिरकार भारत की संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति की पड़ती छाप  देश की संस्कृति को कहाँ तक ले जायेगी, क्या नारियों ने  अपना अस्तीत्व खो दिया है अथवा नारियों पर हो रहे जुल्म कहीं वासना पिपासु राक्षसों के द्वारा इन सम्मानित नारी जगत को कामुक, अश्लीलता के माला में पिरोकर अपनी हवस का शिकार तो नहीं बना रहे हैं। ऐसे तमाम प्रश्न मेरे मन में आज सुबह से ही हिलकोरे मार रहे हैं , लेकिन मैं बस इतना ही आप लोगों से कहना चाहूंगा कि --यदि बारिश से बचना हो तो छाता का सहारा लेना ही उचित होगा कुछ नारी दर्शन आपको शास्त्रों के माध्यम से आप तोगों के सामने रखने का प्रयास कर रहा हुं।
भारतवर्ष में सदा से स्त्रियों का समुचित मान रहा है। उन्हें पुरुषों की अपेक्षा अधिक पवित्र माना जाता रहा है। स्त्रियों को बहुधा ‘देवी’ संबोधन से संबोधित किया जाता है। नाम के पीछे उनकी जन्म-जात उपाधि ‘देवी’ प्रायः जुडी रहती है। शांति देवी, गंगादेवी, दया देवी आदि ‘देवी’ शब्द पर कन्याओं के नाम रखे जाते हैं। जैसे पुरुष बी.ए. शास्त्री, साहित्यरत्न आदि उपाधियाँ उत्तीर्ण करने पर अपने नाम के पीछे उस पदवी को लिखते हैं वैसे ही कन्याएँ अपने जन्मजात ईश्वर की प्रदत्त दैवी गुणों, दैवी विचारों, दिव्य विशेषताओं के कारण अलंकृत होती हैं।
देवताओं और महापुरुषों के साथ उनकी अर्धांगिनियों के नाम भी जुड़े हैं सीताराम, राधेश्याम, गौरीशंकर, लक्ष्मीनारायण, उमामहेश, मायाब्रह्म, सावित्री सत्यवान आदि नामों में नारी का पहला और नर का दूसरा स्थान है। पतिव्रता, दया, करुणा, सेवा, सहानुभूति, स्नेह, वात्सल्य, उदारता, भक्ति-भावना, आदि गुणों में नर की अपेक्षा नारी को सभी विचारवानों ने बढ़ा-चढ़ा माना है।
इसलिए धार्मिक, आध्यात्मिक और ईश्वर-प्राप्ति संबंधी कार्यों में नारी का सर्वत्र स्वागत किया गया है और उसे उनकी महानता के अनुकूल प्रतिष्ठा दी गई है। वेदों पर दृष्टिपात करने से स्पष्ट हो जाता है कि वेदों के मंत्रदृष्टा जिस प्रकार अनेक ऋषि हैं वैसे ही अनेक ऋषिकाएँ भी हैं। ईश्वरीय-ज्ञान वेद, महान आत्मा वाले व्यक्तियों पर प्रकट हुआ है और उनने उन मंत्रों को प्रकट किया। इस प्रकार जिन पर वेद प्रकट हुए उन मंत्रों को दृष्टाओं को ‘ऋषि’ कहते हैं। ऋषि केवल पुरुष ही नहीं हुए हैं, ऋषि अनेक नारियाँ भी हुई हैं। ईश्वर ने नारियों के अंतःकरण में उसी प्रकार वेद-ज्ञान प्रकाशित किया जैसे कि पुरुष के अंतःकरण में, क्योंकि प्रभु के लिए दोनों ही संतान समान हैं। महान् दयालु, न्यायकारी और निष्पक्ष प्रभु भला अपनी ही संतान में नर-नारी का पक्षपात करके अनुचित भेद-भाव कैसे कर सकते हैं ?
ऋग्वेद 10।85 के संपूर्ण मंत्रों की ऋषिकाएँ ‘‘सूर्या सावित्री’’ है। ऋषि का अर्थ निरुत्तर में इस प्रकार किया है ‘‘ऋषिदर्शनात् स्तोमान् ददर्शेति ऋषियो मन्त्र दृष्टारः।’’ अर्थात् मंत्रों का दृष्टा उनके रहस्यों को समझकर प्रचार करने वाला ऋषि होता है।
ऋग्वेद की ऋषिकाओं की सूची ब्रह्म देवता के 24 अध्याय में इस प्रकार है—
घोषा गोधा विश्ववारा अपालोपनिषन्नित्।
ब्रह्म जाया जहुर्नाम अगस्त्यस्य स्वसादिति।।84।।
इन्द्राणी चेन्द्र माता चा सरमा रोमशोर्वशी।
लोपामुद्रा च नद्यश्च यमी नारी च शाश्वती।।85।।
श्रीलछमीः सार्पराज्ञी वाकश्रद्धा मेधाचदक्षिण।
रात्रि सूर्या च सावित्री ब्रह्मवादिन्य ईरितः।।86।।
अर्थात्—घोषा, गोधा, विश्ववारा, अपाला, उपनिषद्, जुहू, आदिति, इन्द्राणी, सरमा, रोमशा, उर्वशी, लोपामुद्रा, यमी, शाश्वती, सूर्या, सावित्री आदि ब्रह्मवादिनी हैं।
ऋग्वेद के 10-134, 10-39, 19-40, 8-91, 10-5, 10-107, 10-109, 10-154, 10-159, 10-189, 5-28, 9-91 आदि सूक्तों की मंत्र दृष्टा यह ऋषिकाएँ हैं।
ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह यज्ञ करती और कराती थीं। वे यज्ञ-विद्या, ब्रह्म-विद्या में पारंगत थीं। कई नारियाँ तो इस संबंध में अपने पिता तथा पति का मार्ग दर्शन करती थीं।

शुभ-लाभ का वैदिक और साइंटिफिक लाभ

शुभ-लाभ का वैदिक और साइंटिफिक लाभ

अपने यहां भारत में ' शुभ-लाभ ' लिखने की परम्परा बहुत पुरानी है। व्यापारी अपनी दुकान और तिजोरी पर शुभ लाभ लिखते हैं। सामान्य गृहस्थ अपने प्रवेश द्वार पर शुभ लाभ लिखते हैं। इसके अलावा तमाम मंगलकार्यों , उत्सवों , पर्वों और त्यौहारों के शुभ अवसर पर भी इसका लेखन किया जाता है। कभी यह सोचा है कि ऐसा क्यों लिखा जाता है या इसे लिखने की परंपरा कैसे शुरू हुई होगी! आमतौर पर ' शुभ-लाभ ' के लेखन को आध्यात्मिक और आर्थिक समृद्धि के प्रतीक के रूप में जाना-पहचाना जाता है , क्योंकि पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक इसे लक्ष्मी यानी धन का शुभ चिन्ह माना जाता है।
व्याकरणकी दृष्टि से शुभ एक विशेषण है और लाभ वस्तुवाचक संज्ञा। इन दोनों के संयोग से बने इस शब्द मंत्र का आशय यह है कि लाभ का प्रतिफल शुभ अर्थात् कल्याणकारी ही होना चाहिए , तभी वह टिकाऊ होगा। लाभ हमारे सभी कार्यों का प्रेरणास्त्रोत है। हर आदमी चाहता है कि अपने श्रम के बदले वह ज्यादा से ज्यादा लाभ हासिल करे। परन्तु ज्यादातर मामलों में व्यक्ति यह भूल जाता है कि उसके लाभ प्राप्त करने की प्रक्रिया में दूसरों के ऊपर इसका क्या असर पड़ रहा होगा। वह प्रतिकूल भी तो हो सकता है। ऐसी ही स्थिति के लिए ' शुभ-लाभ ' का शुभ शब्द , लाभ पर एक लगाम की तरह है। यानी कर्ता के लिए यह एक चेतावनी है। यह चेतावनी शुभ कर्मों के लिए भी है। यानी जो कर्म करें , वह तो शुभ हो ही , उस कर्म से जो लाभ अर्जित करें , वह भी शुभ हो। भारतीय ऋषियों और वैज्ञानिकों ने इसे जीवन का कर्म सिद्धांत माना। इसलिए अपने देश में इस प्रतीक को हर वर्ग के लोग किसी न किसी रूप में अपनाते और धारण करते रहे हैं।
शुभ-लाभ की परम्परा यह स्पष्ट करती है कि लाभ शुभ भी हो सकता है , अशुभ भी। इसलिए हमें अपने और दूसरों के लिए हमेशा वही लाभ स्वीकार करने की आदत डालनी चाहिए , जो शुभ हो। मन , वाणी और कर्म में शुभता बनी रहे , इसकी तरफ हमेशा सजग बने रहने की जरूरत है। यह सजगता हमारे भीतर व्यक्तिवाची सोच या अहंकार के विस्तार को रोकती है। व्यक्तिवाची सोच अमूमन समाज के लिए फायदेमंद नहीं होती।
शुभ-लाभ का चिंतन समाजोन्मुखी है। इसका आशय यह है कि समाज में अच्छाई बढ़े और सबका विकास हो , इस रूप में भी इसे परम्परा में स्वीकार किया गया है। सत्य , न्याय , समता , शुचिता और सुख हमारे जीवन का अभिन्न अंग बनें , इस बात को अमल में लाने के लिए ही इसे शुभ-लाभ के रूप में व्यक्त किया गया। यह सामान्य प्रतीक नहीं है , बल्कि इसका हमारे जीवन मूल्यों से अत्यंत गहरा संबंध है। दुनिया के हर मत-मजहब , वर्ग , जाति और सम्प्रदाय द्वारा कुछ विशेष प्रतीकों के जरिए शुभ-लाभ लेखन की परम्परा है। उनमें धार्मिक-आध्यात्मिक रूप से कुछ भिन्नता हो सकती है , परन्तु उनमें भी व्यक्ति , परिवार , समाज और विश्व समाज के कल्याण की भावना ही शामिल होती है।
हिन्दू समाज में अनिष्ट यानी अमंगल से बचने और मंगल की कामना के साथ शुभ-लाभ लेखन की परम्परा आज भी बदस्तूर जारी है। हमारी जिन्दगी का हर कदम , कार्य और मंजिल सफलता में समाप्त हो , इसके लिए (हमारे लिए) शुभ और लाभ दोनों को एक-दूसरे का पूरक होना जरूरी माना गया है। असन्तुलित विकास हमारे व सारे समाज के लिए नुकसानदेह हो सकता है। लेकिन लाभ यानी विकास यदि संतुलित अर्थात् शुभ होगा तो समाज में शुभता यानी खुशहाली बढ़ती जाएगी।
पश्चिम की भौतिकवादी अंधी सोच ने लाभ को शुभ के साथ जोड़ कर देखने की मानवतावादी परम्परा के सामने एक चुनौती खड़ी कर दी है। शुभ-लाभ की परम्परा जो हमारी जीवन शैली का अभिन्न अंग थी , वह हर स्तर पर कमजोर हो रही है। लाभ और सिर्फ लाभ का पलड़ा भारी होता जा रहा है। हमारे अर्थशास्त्री भी सिर्फ लाभ का तर्क देते हैं। पूरे समाज या समुदाय के लाभ का , कल्याणकारी लाभ का , शुभ लाभ का महत्व भुलाया जा रहा है। आर्थिक लाभ सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। यानी शुभ और लाभ की पूरकता खत्म होती जा रही है। दूसरों की उन्नति में अपनी उन्नति समझने की हमारी प्रवृत्ति लगभग खत्म हो चुकी है। इसीलिए समाज टूट रहा है और बिखर रहा है। उस बिखराव को हम अपने अर्जित लाभ से पाट नहीं सकते। वह क्षति अपूरणीय है। इसीलिए जरूरी है कि हम इस असंतुलन और अविकास को समझें और शुभ-लाभ की संतुलित अवधारणा का ही वरण करें।

शुक्रवार, 24 जून 2011

नारियों पर जुल्म मतलब साफ है मायावती सरकार का यू.पी.से खात्मा

नारियों पर जुल्म मतलब साफ है मायावती सरकार का यू.पी.से खात्मा
 लगातार यू.पी.में अत्याचार के बाद अनाचार एक के बाद एक हो रहा है
और दर्जनो विधायको की संलिप्तता वह भी घिनौने कार्यों मे पाया जाना निश्चित रूप से पार्टी (बसपा) के लिए ग्रहण का काला साया नीले रंग को काला बनाकर सत्तासुख से वंचित होना तय है।
क्योंकि रावण भी इसी प्रकार आतंक मचायाऔर हश्र ''इक लखपुत सवालख नाती । ता रावन घर दीया न बाती'' ।।यत्र नार्य: तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: |
यत्र एता: तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्र अफला: क्रिया:

मनुस्मॄति जहां स्त्रीयोंको मान दिया जाता है तथा उनकी पूजा होती है वहां देवताओंका निवास रहता है |
परन्तू जहां स्त्रीयोंकी निंदा होती है तथा उनका सम्मान नही किया जाता वहां कोइ भी कार्य सफल नही होता |
मान लेते है मायावती अत्यन्त संवेदनशील और बुद्ध के बताए मार्ग पर चलने वाली हैं, तो महात्मा बुद्ध के इस संदेश ( धम्मम शरणं गच्छ ) से भटक कर अपराधीयों को बसपा की टिकट क्यों दीं है, क्या वाक्कयी में बसपा के टिकटार्थयों ने पैसे और गुंडई के बल पर बसपा की टिकट हाशिल किये हैं जो आज मायावती के गले की फांस बन गये हैं। क्या मुख्तार अंसारी जैसे विधायक से उनको सीख नही मिली, और यदि जान-बूझ कर ऐसे अपराधियों को विधायक का टिकट मायावती द्वारा दिया गया है तो निश्चत तौर पर सर्वप्रथम मायावती के उपर गुन्डों को संरक्षण देने के अपराध में वहां की जनता के द्वारा समूहबद्ध होकर मान.राज्यपाल से गिरफ्तार करने की मांग करनी चाहिए।
अन्यथा अब से भी मायावती जनता से क्षमा मांगकर अपनी गलती स्वीकार कर नीचे लिखे श्लोक का जीवन में अवगाहन करना चाहिए, जैसे की जंगलका एक शेर करता हैःःःःःःःः 
वनेऽपि सिंहा मॄगमांसभक्षिणो बुभुक्षिता नैव तॄणं चरन्ति |
एवं कुलीना व्यसनाभिभूता न नीचकर्माणि समाचरन्ति ।।
जंगल मे मांस खानेवाले शेर भूख लगने पर भी जिस तरह घास नही खाते, उस तरह उच्च कुल मे जन्मे हुए व्यक्ति (सुसंस्कारित व्यक्ति) संकट काल मे भी नीच काम नही करते |
ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे महाराज
ज्योतिष का सूर्य, हिन्दी मासिक पत्रिका , भिलाई (छ.ग.)

माला में १०८+१ सुमेरु सहित १०९ दाने (मनके) होने चाहिए (एक अध्ययन )



माला में १०८+१ सुमेरु सहित १०९  दाने (मनके) होने चाहिए (एक अध्ययन )

ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिणी।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव॥
ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृह्णामि दक्षिणे करे।
जपकाले च सिद्ध्यर्थं प्रसीद मम सिद्धये॥

अन्य धर्मों की तरह सनातन (हिन्दू) धर्म में भी जप के लिए माला का प्रयोग होता है। क्योंकि किसी भी जप में संख्या का बहुत महत्त्व होता है। निश्चित संख्या में जप करने के लिए माला का प्रयोग करते हैं। माला फेरने से एकाग्रता भी बनी रहती है। वैसे तो माला के अन्य बहुत से प्रयोग हैं, लेकिन मैं यहां जप संबंधी बातें बताना चाहता हूँ।

किसी देवी-देवता के मंत्र का जप करने के लिए एक निश्चित संख्या होती है। उस संख्या का १० प्रतिशत हवन, हवन का १० प्रतिशत तर्पण, तर्पण का १० प्रतिशत मार्जन, मार्जन की १० प्रतिशत संख्या में ब्राह्मण भोजन करना होता है। इन सभी संख्यों का निर्धारण बिना माना के संभव नहीं।

माला में १०८ (+१ सुमेरु) दाने (मनके) होने चाहिए। ५४, २७ या ३० (इत्यादि) मनको की माला से भी जप किया जाता है। साधना विशेष के लिए मनकों की संख्या का विचार है। दो मनकों के बीच डोरी में गांठ होना जरूर है, आमतौर से ढाई गांठ की माला अच्छी होती है। अर्थात् डोरी में मनके पिरोते समय साधक हर मनके के बाद ढाई गांठ लगाए। मनके पिरोते समय अपने इष्टदेव का जप करते रहना चाहिए। सफेद डोरी शान्ति, सिद्धि आदि शुभ कार्यों के लिए प्रयाग करनी चाहिए। लाल धागे से वशीकरण आदि तथा काले धागे से पिरोई गई माला द्वारा मारण कर्म किये जाते हैं।

माला पिरोते समय मुख और पुछ का ध्यान रखना चाहिए। मनके के माटे वाले सिरे को मुख तथा पतले किनारे को पुछ कहते हैं। माला पिरोते समय मनकों के मुख से मुख तथा पुछ से पुछ मिलाकर पिरोने चाहिए।

मनके किसी भी चीज (प्लास्टिक इत्यादि छोड़कर) के हों मगर खंडित नहीं होने चाहिए।

रुद्राक्ष की माला भगवान् शंकर को प्रिय है और इसे एज़ ए डिफ़ाल्ट सभी देवी देवताओं की पूजा आराधना प्रयोग किया जा सकता है। रुद्राक्ष पर जप करने से अनन्त गुना (अन्य सभी मालाओं की तुलना में बहुत अधिक) फल मिलता है। इसे धारण करना भी स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। जिस माला को धारण करते हैं उस पर जप नहीं करते लेकिन उसी जाति (किस्म) कि दूसरी माला पर जप कर सकते हैं।

जप करते समय माला गोमुखी या किसी वस्त्र से ढकी होनी चाहिए अन्यथा जप का फल चोरी हो जाता है। जप के बाद जप-स्थान की मिट्टी मस्तक पर लगा लेनी चाहिए अन्यथा जप का फल इन्द्र को चला जाता है।

प्रातःकाल जप के समय माला नाभी के समीप होनी चाहिए, दोपहर में हृदय और शाम को मस्तक के सामने।

जप में तर्जनी अंगुली का स्पर्श माला से नहीं होना चाहिए। इसलिए गोमुखी के बड़े छेद से हाथ अन्दर डाल कर छोटे छेद से तर्जनी को बाहर निकलकर जप करना चाहिए। अभिचार कर्म में तर्जनी का प्रयोग होता है।

जप में नाखून का स्पर्श वर्जित है
सुमेरु के अगले दाने से जप आरम्भ करे, माला को मध्यमा अंगुली के मघ्य पोर पर रख कर दानों को अंगूठे की सहायता से अपनी ओर गिराए। सुमेरु को नहीं लांघना चाहिए। यदि एक माला से अधिक जप करना हो तो, सुमेरु तक पहुंच कर अंतिम दाने को पकड़ कर, माला पलटी कर के, माला की उल्टी दिशा में, लेकिन पहले की तरह ही जप करना चाहिए।

देवता विषेश के लिए माला का चयन करना चाहिए-हाथी दांत की माला गणेशजी की साधना के लिए श्रेष्ठ मानी गई है।

लाल चंदन की माला गणेशजी व देवी साधना के लिए उत्तम है।

तुलसी की माला से वैष्णव मत की साधना होती है (विष्णु, राम व कृष्ण)।

मूंगे की माला से लक्ष्मी जी की आराधना होती है। पुष्टि कर्म के लिए भी मूंगे की माला श्रेष्ठ होती है।

मोती की माला वशीकरण के लिए श्रेष्ठ मानी गई है।

पुत्र जीवा की माला का प्रयोग संतान प्राप्ति के लिए करते हैं।

कमल गट्टे की माला की माला का प्रयोग अभिचार कर्म के लिए होता है।

कुश-मूल की माला का प्रयोग पाप-नाश व दोष-मुक्ति के लिये होता है।

हल्दी की माला से बगलामुखी की साधना होती है।

स्फटिक की माला शान्ति कर्म और ज्ञान प्राप्ति; माँ सरस्वती व भैरवी की आराधना के लिए श्रेष्ठ होती है।

चाँदी की माला राजसिक प्रयोजन तथा आपदा से मुक्ति में विशेष प्रभावकरी होती है।

छत्तीसगढ़ के सी एम के घर शाही शादी ..



छत्तीसगढ़ के सी एम के घर शाही शादी ..

चारों तरफ खुशियाँ ही खुशीयाँ ..

राजधानी में होगा नेताओं का जमावड़ा

 
 
रायपुर। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह की शाही शादी में देश के दिग्गज नेताओं का जमावड़ा होने वाला है। इसमें भाजपा और कांग्रेस के प्रमुख नेताओं से लेकर कई राज्यों के मुख्यमंत्री पहुंच रहे हैं।
नेताओं का शानदार स्वागत करने और उनकी आवभगत में किसी प्रकार की कमी न रहे, इसके लिए पुख्ता इंतजाम किए हैं। राज्य के मंत्रियों, सांसदों और विधायकों को अलग-अलग जिम्मेदारी दी गई है।
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से लेकर भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, हैदराबाद के राज्यपाल ईएसएल नरसिम्हन, केंद्रीय मंत्री शरद पवार, कांतिलाल भूरिया, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, मध्यप्रदेश के नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह, आदि ने रायपुर आने की सूचना दे दी है।
इनके अलावा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, शिव राज सिंह, प्रेमकुमार धूमल के स्वागत के लिए एक-एक मंत्री को जिम्मेदारी दी गई है।
उनके ठहरने से लेकर रिसेप्शन स्थल पर जाने आदि का प्रोग्राम पहले से तय कर दिया गया है।नेताओं के एक साथ आने से रायपुर माना विमानतल पर 25 जून को गहमागहमी रहेगी। संकेत हैं कि एक ही दिन में 15 से अधिक विमान उस दिन लैंड करेंगे।
इधर शादी के लिए होटल बेबीलॉन और रिसेप्शन के लिए साइंस कॉलेज मैदान सजकर तैयार है। बेबीलॉन के समारोह के लिए होटल गुलशन ओबेराय के प्रांगण में पार्किग की व्यवस्था की गई है। गुरुवार की शाम को होटल परिसर में मशहूर गायिका ईला अरुण का संगीत का कार्यक्रम रखा गया। इसमें राज्यपाल शेखरदत्त के अलावा राज्य सरकार के कई मंत्री शामिल हुए। कल शाम को 7 बजे सिब्बल पैलेस से बारात निकलेगी।
होटल बेबीलॉन के शादी समारोह में राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा के पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडू शामिल होंगे। 25 जून को साइंस कॉलेज मैदान में होने वाले रिसेप्शन के लिए करीब दो लाख वर्गफीट क्षेत्रफल में अलग-अलग पंडाल बनाए गए हैं।
नागपुर के कैटर्स रानी की कोठी और रायपुर के कैटर्स नीलम को भोजन तैयार करने का काम दिया गया है। रिसेप्शन में आने वाले लोगों को छत्तीसगढ़ी व्यंजनों के साथ देश के विभिन्न स्थानों की मिठाइयां और खास व्यंजन परोसे जाएंगे।
पार्किग स्थल से मेहमानों को बसों में ले जाया जाएगा
25 जून को रिसेप्शन के दौरान पार्किग की विशेष व्यवस्था की गई है। अति विशिष्ट और विशिष्ट व्यक्तियों की सुविधा की दृष्टि से क्रमश: लाल रंग और हरे रंग के वाहन पास आमंत्रण पत्र के साथ बांटे गए हैं। पास वाले वाहनों का प्रवेश आयुर्वेदिक कॉलेज गेट से होगा। लाल रंग वाले वाहनों का साइंस कॉलेज मैदान में होगा। बिना पास वाले वाहनों की पार्किग एनआईटी परिसर में होगी। वहां से मेहमानों को बसों में रिसेप्शन स्थल तक ले जाया जाएगा।

गुरुवार, 23 जून 2011

कब और क्यों होता है ज्योतिष के अनुसार अशुभ जन्म समय



कब और क्यों होता है ज्योतिष के अनुसार अशुभ जन्म समय
हम जैसा कर्म करते हैं उसी के अनुरूप हमें ईश्वर सुख दु:ख देता है। सुख दु:ख का निर्घारण ईश्वर कुण्डली में ग्रहों स्थिति के आधार पर करता है। जिस व्यक्ति का जन्म शुभ समय में होता है उसे जीवन में अच्छे फल मिलते हैं और जिनका अशुभ समय में उसे कटु फल मिलते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह शुभ समय क्या है और अशुभ समय किसे कहते हैं
अमावस्या में जन्म:
ज्योतिष शास्त्र में अमावस्या को दर्श के नाम से भी जाना जाता है। इस तिथि में जन्म माता पिता की आर्थिक स्थिति पर बुरा प्रभाव डालता है। जो व्यक्ति अमावस्या तिथि में जन्म लेते हैं उन्हें जीवन में आर्थिक तंगी का सामना करना होता है। इन्हें यश और मान सम्मान पाने के लिए काफी प्रयास करना होता है। अमावस्या तिथि में भी जिस व्यक्ति का जन्म पूर्ण चन्द्र रहित अमावस्या में होता है वह अधिक अशुभ माना जाता है। इस अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए घी का छाया पात्र दान करना चाहिए, रूद्राभिषेक और सूर्य एवं चन्द्र की शांति कराने से भी इस तिथि में जन्म के अशुभ प्रभाव को कम किया जा सकता है।
संक्रान्ति में जन्म: संक्रान्ति के समय भी संतान का जन्म अशुभ माना जाता है। इस समय जिस बालक का जन्म होता है उनके लिए शुभ स्थिति नहीं रहती है। संक्रान्ति के भी कई प्रकार होते हैं जैसे रविवार के संक्रान्ति को होरा कहते हैं, सोमवार को ध्वांक्षी, मंगलवार को महोदरी, बुधवार को मन्दा, गुरूवार को मन्दाकिनी, शुक्रवार को मिश्रा व शनिवार की संक्रान्ति राक्षसी कहलाती है। अलग अलग संक्रान्ति में जन्म का प्रभाव भी अलग होता है। जिस व्यक्ति का जन्म संक्रान्ति तिथि को हुआ है उन्हें ब्राह्मणों को गाय और स्वर्ण का दान देना चाहिए इससे अशुभ प्रभाव में कमी आती है। रूद्राभिषेक एवं छाया पात्र दान से भी संक्रान्ति काल में जन्म का अशुभ प्रभाव कम होता है।
भद्रा काल में जन्म
जिस व्यक्ति का जन्म भद्रा में होता है उनके जीवन में परेशानी और कठिनाईयां एक के बाद एक आती रहती है। जीवन में खुशहाली और परेशानी से बचने के लिए इस तिथि के जातक को सूर्य सूक्त, पुरूष सूक्त, रूद्राभिषेक करना चाहिए। पीपल वृक्ष की पूजा एवं शान्ति पाठ करने से भी इनकी स्थिति में सुधार होता है।
कृष्ण चतुर्दशी में जन्म
पराशर महोदय कृष्ण चतुर्दशी तिथि को छ: भागों में बांट कर उस काल में जन्म लेने वाले व्यक्ति के विषय में अलग अलग फल बताते हैं। इसके अनुसार प्रथम भाग में जन्म शुभ होता है परंतु दूसरे भाग में जन्म लेने पर पिता के लिए अशुभ होता है, तृतीय भाग में जन्म होने पर मां को अशुभता का परिणाम भुगतना होता है, चौथे भाग में जन्म होने पर मामा पर संकट आता है, पांचवें भाग में जन्म लेने पर वंश के लिए अशुभ होता है एवं छठे भाग में जन्म लेने पर धन एवं स्वयं के लिए अहितकारी होता है। कृष्ण चतुर्दशी में संतान जन्म होने पर अशु प्रभाव को कम करने के लिए माता पिता और जातक का अभिषेक करना चाहिए साथ ही ब्राह्मण भोजन एवं छाया पात्र दान देना चाहिए।
समान जन्म नक्षत्र
ज्योतिषशास्त्र के नियमानुसार अगर परिवार में पिता और पुत्र का, माता और पुत्री का अथवा दो भाई और दो बहनों का जन्म नक्षत्र एक होता है तब दोनो में जिनकी कुण्डली में ग्रहों की स्थिति कमज़ोर रहती है उन्हें जीवन में अत्यंत कष्ट का सामना करना होता है। इस स्थिति में नवग्रह पूजन, नक्षत्र देवता की पूजा, ब्राह्मणों को भोजन एवं दान देने से अशुभ प्रभाव में कमी आती है।
सूर्य और चन्द्र ग्रहण में जन्म सूर्य और चन्द्र ग्रहण को शास्त्रों में अशुभ समय कहा गया है। इस समय जिस व्यक्ति का जन्म होता है उन्हें शारीरिक और मानसिक कष्ट का सामना करना होता है। इन्हें अर्थिक परेशानियों का सामना करना होता है। सूर्य ग्रहण में जन्म लेने वाले के लिए मृत्यु की संभवना भी रहती है। इस दोष के निवारण के लिए नक्षत्र स्वामी की पूजा करनी चाहिए। सूर्य व चन्द्र ग्रहण में जन्म दोष की शांति के लिए सूर्य, चन्द्र और राहु की पूजा भी कल्यणकारी होती है।
सर्पशीर्ष के योग  में जन्म
अमावस्या तिथि में जब अनुराधा नक्षत्र का तृतीय व चतुर्थ चरण होता है तो सर्पशीर्ष कहलाता है। सार्पशीर्ष को अशुभ समय माना जाता है। इसमें कोई भी शुभ काम नहीं होता है। सार्पशीर्ष मे शिशु का जन्म दोष पूर्ण माना जाता है। जो शिशु इसमें जन्म लेता है उन्हें इस योग का अशुभ प्रभाव भोगना होता है। इस योग में शिशु का जन्म होने पर रूद्राभिषेक कराना चाहिए और ब्रह्मणों को भोजन एवं दान देना चाहिए इससे दोष के प्रभाव में कमी आती है।
गण्डान्त मूल नक्षत्रों के योग में जन्म गण्डान्त योग को संतान जन्म के लिए अशुभ समय कहा गया है। इस समय संतान जन्म लेती है तो गण्डान्त शान्ति कराने के बाद ही पिता को शिशु का मुख देखना चाहिए। पराशर महोदय के अनुसार तिथि गण्ड में बैल का दान, नक्षत्र गण्ड में गाय का दान और लग्न गण्ड में स्वर्ण का दान करने से दोष मिटता है। संतान का जन्म अगर गण्डान्त पूर्व में हुआ है तो पिता और शिशु का अभिषेक करने से और गण्डान्त के अतिम भाग में जन्म लेने पर माता एवं शिशु का अभिषेक कराने से दोष कटता है।
त्रिखला  दोष में जन्म जब तीन पुत्री के बाद पुत्र का जन्म होता है अथवा तीन पुत्र के बाद पुत्री का जन्म होता है तब त्रिखल दोष लगता है। इस दोष में माता पक्ष और पिता पक्ष दोनों को अशुभता का परिणाम भुगतना पड़ता है। इस दोष के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए माता पिता को दोष शांति का उपाय करना चाहिए।
सामान्य मूल में जन्म दोष
मूल नक्षत्र  में जन्म अत्यंत अशुभ माना जाता है। मूल के प्रथम चरण में पिता को दोष लगता है, दूसरे चरण में माता को, तीसरे चरण में धन और अर्थ का नुकसान होता है। इस नक्षत्र में जन्म लेने पर 1 वर्ष के अंदर पिता की, 2 वर्ष के अंदर माता की मृत्यु हो सकती है। 3 वर्ष के अंदर धन की हानि होती है। इस नक्षत्र में जन्म लेने पर 1वर्ष के अंदर जातक की भी मृत्यु की संभावना रहती है। इस अशुभ स्थित का उपाय यह है कि मास या वर्ष के भीतर जब भी मूल नक्षत्र  पड़े मूल शान्ति करा देनी चाहिए। अपवाद स्वरूप मूल का चौथ चरण जन्म लेने वाले व्यक्ति के स्वयं के लिए शुभ होता है।
अन्य दोष
ज्योतिषशास्त्र में इन दोषों के अलावा कई अन्य योग और हैं जिनमें जन्म होने पर अशुभ माना जाता है इनमें से कुछ हैं यमघण्ट योग, वैधृति या व्यतिपात योग एव दग्धादि योग हें। इन योगों में अगर जन्म होता है तो इसकी शांति अवश्य करानी चाहिए।
अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें-
ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे महाराजज्योतिष का सूर्य, हिन्दी मासिक पत्रिका , भिलाई, दुर्ग (छ.ग.)-09827198828

बुधवार, 22 जून 2011

सिद्धान्त ज्योतिष ने खगोल शास्त्र, विश्व के वैज्ञानिकों को एस्ट्रोनामी के रूप में प्रदान किया है।

सिद्धान्त ज्योतिष ने खगोल शास्त्र, विश्व के वैज्ञानिकों को एस्ट्रोनामी के रूप में प्रदान किया है।

सर्वप्रथम श्रद्धेय भाई अवध राम पान्डेय जी मेरा इस प्रकार का प्रश्न करने का मतलब यह था की ज्योतिष केवल आज जन्म कुन्डली के निर्माण एवं  जातक फल-कथन तक ही सिमित रह गया है और कुछ लोग उसी को ज्योतिष मान चुके हैं, लेकिन सिद्धान्त ज्योतिष के तरफ कोई ज्योतिषी अपना ध्यान आकर्षित नही करता क्योंकि टी.वी. चैनलों से लेकर समाचार पत्रों में दर्जनों ज्योतिषीयों की लम्बी फेहरिश्त है  जिनमें प्रायः कुछ ऐसे ज्योतिषी हैं जो रेलवे बुक-स्टॉलों में लगे अप्रमाणित ग्रन्थों को पढ़कर अपना व्यवसाय, जैसे रत्न, भाग्यशाली यंत्रों को बेचने के अलावा उनको ज्योतिष की मूलभूत ज्ञान के प्रचार प्रसार या  अपने अध्ययन कठोरता लाने की तनिक भी कोशिश नहीं करते।
 ऐसे मार्केटींग में माहीर कथित ज्योतिषीयों के कार्ड, और लालकिताब जैसे अप्रमाणित ज्योतिष को ही भाई राजेन्द्र अग्रवाल जी शायद इसी को ज्योतिष मानते हैं , ऐसे लोंगों की संख्या काफी है ।
मैं पिछले वर्ष दिल्ली में आयोजित एक सम्मेलन में गया था। उसमें इसी सन्दर्भ पर अपने शोध पत्र की बातें आप सभी मित्रों को बताना चाहता हुँ--
वैज्ञानिक की माने या ज्योतिष की : इंग्लैंड की प्रतिष्ठित संस्था रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी 1922 में ही विज्ञान कांग्रेस में घोषणा कर चुकी है कि राशि 12 नहीं 13 है। यानी सूर्य और अन्य ग्रह 13 राशि मंडल (तारा मंडल) से होकर गुजरता है। इस तेरहवें तारा मंडल को वैज्ञानिकों ने नाम दिया है- ओफियुकस अर्थात यह एक यूनानी देवता नाम है। उक्त अधिवेशन में वैज्ञानिकों ने यह हवाला देते हुए कहा कि- ज्योतिष शास्त्र की कुछ गणितीय समस्याएँ थी जिस कारण से 13वीं राशि को शामिल नहीं किया गया। पहली समस्या यह कि 13 का पूर्ण भाग नहीं हो सकता। कुंडली को 13 खानों में बाँटना मुश्किल था। ग्रहों को 30 डिग्री से कम का ज्यादा गति को आधार बनाने पर भारतीय-ज्योतिष गणना में दिक्कतें होतीं पर
360 डिग्री को 12 हिस्सों में बाँटना आसान हैं। विषम संख्‍या से कई तरह कि विषमताएँ पैदा होती है शायद इसिलिए 13वीं राशि को नजरअंदाज किया गया। दूसरी ओर पाश्चात्य जगत में 13 का अंक अशुभ माना जाता है लेकिन भारतीय  परम्परागत ज्योतिष के तटस्थता बनाये रखने के कारण पाश्चात्य ज्योतिष भी 12 पर अड़ा रहा। अर्थात भारतीय-ज्योतिष विषय पुरे विश्व में अपना लोहा मनवा चुका है इससे तो यही साबित होता है।
हालाँकि वैज्ञानिकों की माने तो राशियाँ तो 88 होना चाहिए। दरअसल वैज्ञानिकों ने हमारी आकाशगंगा को 88 तारा मंडलों में विभक्त किया है। तारामंडल अर्थात कुछ या ज्यादा तारों का एक समूह। इन तारा मंडलों में से ज्योतिष अनुसार 12 और वैज्ञानिकों अनुसार 13-14 तारा मंडलों में सूर्य और सौर्य परिवार के अन्य ग्रह भ्रमण करते हैं जिस वक्त चंद्र वृश्चिक तारा मंडल या राशि में भ्रमण कर रहा है उस काल में यदि किसी का जन्म हुआ है तो उसकी राशि वृश्चिक मानी जाएगी। तारा मंडल दरअसल मील के पत्थरों की तरह है जिससे आकाश गंगा के विस्तार क्षेत्र का पता चलता है। ऐसी कई आकाश गंगाएँ है।
जरूरी नहीं की ग्रह सिर्फ 12 से 13 राशियों में ही भ्रमण करते रहते हैं। कुछ ग्रह सैकड़ों सालों में तो कुछ थोड़े ही सालों में बारह राशियों को छोड़कर 88 में से किसी भी राशि में कुछ काल के लिए भ्रमण करने लगते हैं, तब ऐसे में शुभ और अशुभ विचारों के बारे में क्या सोचना चाहिए यह तय नहीं है।
मित्रों स्वार्थ परायणता को छोड़कर इस भारती प्रच्य-विद्याओं पर एक धरोहर समझ कर शोध करना चाहिए क्योंकि मैने जो बाते की हैं वह सिद्धान्त ज्योतिष की बातें की हैं जो थोड़ा कठिन तो पर यही सिद्धान्त ज्योतिष ने खगोल शास्त्र, विश्व के वैज्ञानिकों को एस्ट्रोनामी के रूप में प्रदान किया है।
ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे महाराज
सम्पादक, ज्योतिष का सूर्य (हीन्दी मासिक पत्रिका)
भिलाई, दुर्ग (छ.ग.)-09827198828

अश्वमेध यज्ञ से कम नहीं शिवरात्रि व्रत

 

अश्वमेध यज्ञ से कम नहीं शिवरात्रि व्रत

ज्योतिषाचार्य पंडित राजेश पाण्डेय, भिलाई (छ.ग.)-०९९२६१९००६९
महाशिवरात्रि का पर्व एक मार्च की सायं सात बजकर 52 मिनट पर त्रयोदशी लगने पर आरंभ हो रहा है और अगले दिन बुधवार अर्थात दो मार्च की रात्रि नौ बजकर 47 मिनट तक रहेगा। यह जानकारी सुबाथू के वरिष्ठ लेखक व ज्योतिषाचार्य मदन गुप्ता ने दी। उन्होंने कहा कि मान्यता है कि बुधवार को यह व्रत रखने से अश्वमेध यज्ञ के तुल्य फल प्राप्त होता है। इस दिन काले तिलों सहित स्नान करके व व्रत रखके रात्रि में भगवान शिव की विधिवत आराधना करना कल्याणकारी माना जाता है। दूसरे दिन अर्थात चौदस के दिन ब्राह्मणों एवं दानादि के बाद स्वयं भोजन किया जाता है। भारतीय जीवन में ऐसे लोक पर्व वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में भले ही धूमिल हो रहे हों, परंतु इनका वैज्ञानिक पक्ष आस्था के आगे उजागर नहीं हो पाता। भारतीय आस्था में चाहे सूर्य ग्रहण हो या कंुभ का पर्व, दोनों ही समान महत्त्व रखते हैं। ज्योतिषाचार्य श्री गुप्ता ने कहा कि  शिवरात्रि एक ऐसा महत्त्वपूर्ण पर्व है, जो देश के हर कोने में मनाया जाता है। मान्यता है कि सृष्टि के आरंभ में इसी दिन मध्य रात्रि भगवान शंकर का रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय शिव तांडव करते हुए ब्राह्मंड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं, इसलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि भी कहा जाता है। काल के काल और देवों के देव महादेव के इस व्रत का विशेष महत्त्व है। एक मतानुसार इस दिन को शिव विवाह के रूप में भी मनाया जाता है। ईशान संहिता के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को अर्द्धरात्रि के समय करोड़ों सूर्य के तेज के समान ज्योर्तिलिंग का प्रादुर्भाव हुआ था। ज्योतिषाचार्य मदन गुप्ता ने कहा कि व्रत परंपरा के अनुसार प्रातः काल स्नान से निवृत्त होकर एक वेदी पर, कलश की स्थापना कर गौरी शंकर की मूर्ति या चित्र रखें। कलश को जल से भरकर रोली, मौली, अक्षत, पान सुपारी, लौंग, इलायची, चंदन, दूध, दही, घी, शहद कमलगट्टा, धतूरा, बिल्व पत्र, कनेर आदि अर्पित करें और शिव की आरती पढ़ें। रात्रि जागरण में शिव की चार आरती का विधान आवश्यक माना गया है। इस अवसर पर शिवपुराण का पाठ भी कल्याणकारी कहा जाता है।

मंगलवार, 21 जून 2011

धोखा पर धोखा... और.. धोखा तो होना ही था



धोखा पर धोखा... और.. धोखा तो होना ही था


लोकपाल समिति गठन के प्रारूप को लेकर पहले अन्ना हजारे ने अनशन किया। अनशन का जो परिणाम आया सभी के सामने है। इस गठन पर सरकार द्वारा जो तुष्टिकरण की नीति अपनाई जा रही है, येनकेन प्रकारेण टालने की पृष्ठिभूमि बनाई जा रही है। सभी भलिभांति परिचित हैं। इस दिशा में अन्ना हजारे को भी बदनाम कर सारा का सारा प्रकरण मिटा देने की चेष्टा जारी है। लोकपाल समिति का गठन देश में बढ़ते भ्रष्टाचार पर नियंत्रण कर स्वस्थ प्रशासन देने की दिशा में उठाया गया एक सराहनीय कदम है पर यह किसे नागवार हो। जो लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हो तथा जिसके कारोबार इसी पर आधारित हो, लोकपाल समिति के दायरे में बंधकर अपना सब कुछ क्यों गवाना चाहेंगे? इस तरह के लोग आज देश में पक्ष-विपक्ष से लेकर सत्ता के इर्द गिर्द हर जगह छाये है जिनके पांव भ्रष्टाचार रूपी दलदल में बुरी तरह से उलझे हुए है। इस तरह के लोग कभी नहीं चाहेंगे कि देश से भ्रष्टाचार रुपी कल्पवृक्ष ओझिल हो जाय जिसकी छाया में सपरिवार दुनियां के सारे सुख का आनन्द ही केवल नहीं ले रहे है बल्कि कई पीढि़यों तक अनवरत इस तरह के सुख बटोरने का मन में लालसा लिये हर अनैतिक कार्य करने के लिये सदैव तत्पर रहते है।
जिन्होंने सारे कर्म कर बड़ी मेहनत से धन बटोरकर दस से भी अधिक पीढि़यों तक के लिये स्विस बैंक में जमा कर रखा है, वे कैसे अपने इस धन को राष्ट्रीय सम्पति घोषित करने देंगे। जो भ्रष्टाचार के माध्यम से धन बटोरने हेतु संसद के गलियारे तक पहुंचे है, सत्ता तक हथियाएंं है वे कैसे भ्रष्टाचार को मिटने देंगे। इस तरह के लोगों से काला धन की वापसी, स्विस बैंक में जमा धन राशि को राष्ट्रीय सम्पति घोषित करने एवं भ्रष्टाचार मिटाने की बात करना बेईमानी होगी। इस तरह के मुद्दे इनके लिये गले की हड्डी है जिसे निकालने के लिये हर तरह के कदम उठा सकते है। जैसा कि दिल्ली के रामलीला मैदान में गत दिनों घटा। बाबा रामदेव ने भी तो यही गुनाह कर दिया जो इस तरह के लोगों से काला धन की वापसी, स्विस बैंक में जमा धन राशि को राष्ट्रीय सम्पति घोषित करने एवं भ्रष्टाचार मिटाने की बात कर डाली। वे भूल गये कि जो इस तरह के कार्य में लिप्त है, उनकी बात कैसे मानेंगे। वे भूल गये कि देश को आजादी दिलाने वाले तो शहीद हो गये उनकी जगह सुविधाभोगी लोगों ने ले रखी है।
देश में स्वतंत्रता का अधिकार है। अपनी बात रखने का अधिकार है। विरोध जताने का अधिकार है। पर बाबा रामदेव को नहीं मालूम कि उन्हें अपनी बात रखने, विरोध जताने की इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। जहां आधी रात को उनके अनशन में भाग लेने देश विभिन्न भागों से आये सोये बच्चों एवं महिलाओं पर पुलिस द्वारा बर्बरता पूर्ण कार्यवाही होगी। आज जहां पूरा देश इस तरह के कार्य की ङ्क्षनदा कर रहा, जालियांवाला  बाग  जैसी घटना की पुनर्रावृति बता रहा है वहीं कुछ चंद लोगों द्वारा इस तरह के कार्य को अपने अपने तरीके से सही ठहराने की भी प्रवृति जारी है। बाबा रामदेव, अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी आंदोलन ङ्क्षचगारी का रूप ले चुका है जिसे धीरे धीरे जनसमर्थन पूरे देश में मिलता जा रहा है। इस तरह के बदलते परिवेश से देश में अशांति फैलने के ज्यादा आसार बन रहे है। आज देश में मंहगाई बढ़ती जा रही हैं। बेरोजगारी पांव पसार रही है। भ्रष्टाचार अपने चरम सीमा पर है। पर केन्द्र सरकार कान में तेल डाल कर कुंभकरणी नींद सो रही है या सब कुछ जानकर अनजान बनने की चेष्टा का रही है। ऐसा लगता है कि अभी हाल में हुए चुनाव में जो उसे जनमत मिला उसे देखकर बौराय गई है। जिससे अपने सारे लोकहित के कार्य को भूल चुकी है।कहे इस मद में आकर अपने सिपहलसारों की राय से आपातकाल की घोषणा न कर बैठे इसमें कतई संदेह नहीं। यदि इस तरह के हालात उभरते है जहां जनआवाज येनकेन प्रकारेण दबाई जाने की चेष्टा की जाय तो अशोभनीय एवं नुकासनदेय स्थिति होगी।
आज राजनीति में जिस तरह के लोगों का वजूद बढ़ता जा रहा किसी से छिपा नहीं है। जहां देश सेवा मात्र दिखावा रह गया है। अपने आप को जनता का सेवक कहे जाने वाले जनप्रतिनिधि राजनेता से भी आगे निकल चुके है। मकान मोह, धन मोह, सत्ता मोह एवं विभिन्न प्रकार के मोहों से ग्रसित ये नेता लोकतंत्र के जनप्रतिनिधि हैं। जिनका परिवेश जनसेवक की ओर परिलक्षित होकर आज जिस स्वरूप को उजागर कर रहा है, सभी के सामने है। जिन्हें किसी भी प्रकार का वेतन नहीं, प्रत्यक्ष रूप से जिनके पास जनसेवक कार्य के रूप में कोई आय स्रोत नहीं, फिर भी चंद दिनों में ही अपार संपदा के स्वामी नजर आने लगते हैं। कार बंगला, बैंक बैलेंस आदि की कोई सीमा नहीं, आखिर यह सब जनप्रतिनिधि बनते ही कैसे संभव हो जाता है, जबकि देश का वेतनभोगी/श्रमिक श्रम करते-करते पूरी ङ्क्षजदगी बिता देता, फिर भी उसके सपने कभी पूरे नहीं हो पाते। लोकतंत्र की इस मायावी नगरी में कौन सी जादू की छड़ी इन जनप्रतिनिधियों के हाथ लग जाते हैं, जिससे ये सामान्य ङ्क्षजदगी से ऊपर उठकर राजा बाबू बन जाते हैं। जिनके कारनामे असामाजिक एवं देश अहित में होते हुए भी अनुग्रहणीय बनते जा रहे हैं। इस तरह के लोगों के बीच देश के दो महान संत अन्ना हजारे एवं बाबा रामदेव भ्रष्टाचार के खिलाफ जन आंदोलन का शंखनाद कर चुके है। इस तरह के ओदोलन को लेकर जो अभी हाल में दिल्ली में घटना घटी कोई नई बात नहीं थी ऐसा जो होना ही था। देश में जब जब इस तरह के आंदोलन हुए है उसे कुचलने के हर संभव प्रयास सदा किये गये है
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.