ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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शुक्रवार, 24 जून 2011

माला में १०८+१ सुमेरु सहित १०९ दाने (मनके) होने चाहिए (एक अध्ययन )



माला में १०८+१ सुमेरु सहित १०९  दाने (मनके) होने चाहिए (एक अध्ययन )

ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिणी।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव॥
ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृह्णामि दक्षिणे करे।
जपकाले च सिद्ध्यर्थं प्रसीद मम सिद्धये॥

अन्य धर्मों की तरह सनातन (हिन्दू) धर्म में भी जप के लिए माला का प्रयोग होता है। क्योंकि किसी भी जप में संख्या का बहुत महत्त्व होता है। निश्चित संख्या में जप करने के लिए माला का प्रयोग करते हैं। माला फेरने से एकाग्रता भी बनी रहती है। वैसे तो माला के अन्य बहुत से प्रयोग हैं, लेकिन मैं यहां जप संबंधी बातें बताना चाहता हूँ।

किसी देवी-देवता के मंत्र का जप करने के लिए एक निश्चित संख्या होती है। उस संख्या का १० प्रतिशत हवन, हवन का १० प्रतिशत तर्पण, तर्पण का १० प्रतिशत मार्जन, मार्जन की १० प्रतिशत संख्या में ब्राह्मण भोजन करना होता है। इन सभी संख्यों का निर्धारण बिना माना के संभव नहीं।

माला में १०८ (+१ सुमेरु) दाने (मनके) होने चाहिए। ५४, २७ या ३० (इत्यादि) मनको की माला से भी जप किया जाता है। साधना विशेष के लिए मनकों की संख्या का विचार है। दो मनकों के बीच डोरी में गांठ होना जरूर है, आमतौर से ढाई गांठ की माला अच्छी होती है। अर्थात् डोरी में मनके पिरोते समय साधक हर मनके के बाद ढाई गांठ लगाए। मनके पिरोते समय अपने इष्टदेव का जप करते रहना चाहिए। सफेद डोरी शान्ति, सिद्धि आदि शुभ कार्यों के लिए प्रयाग करनी चाहिए। लाल धागे से वशीकरण आदि तथा काले धागे से पिरोई गई माला द्वारा मारण कर्म किये जाते हैं।

माला पिरोते समय मुख और पुछ का ध्यान रखना चाहिए। मनके के माटे वाले सिरे को मुख तथा पतले किनारे को पुछ कहते हैं। माला पिरोते समय मनकों के मुख से मुख तथा पुछ से पुछ मिलाकर पिरोने चाहिए।

मनके किसी भी चीज (प्लास्टिक इत्यादि छोड़कर) के हों मगर खंडित नहीं होने चाहिए।

रुद्राक्ष की माला भगवान् शंकर को प्रिय है और इसे एज़ ए डिफ़ाल्ट सभी देवी देवताओं की पूजा आराधना प्रयोग किया जा सकता है। रुद्राक्ष पर जप करने से अनन्त गुना (अन्य सभी मालाओं की तुलना में बहुत अधिक) फल मिलता है। इसे धारण करना भी स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। जिस माला को धारण करते हैं उस पर जप नहीं करते लेकिन उसी जाति (किस्म) कि दूसरी माला पर जप कर सकते हैं।

जप करते समय माला गोमुखी या किसी वस्त्र से ढकी होनी चाहिए अन्यथा जप का फल चोरी हो जाता है। जप के बाद जप-स्थान की मिट्टी मस्तक पर लगा लेनी चाहिए अन्यथा जप का फल इन्द्र को चला जाता है।

प्रातःकाल जप के समय माला नाभी के समीप होनी चाहिए, दोपहर में हृदय और शाम को मस्तक के सामने।

जप में तर्जनी अंगुली का स्पर्श माला से नहीं होना चाहिए। इसलिए गोमुखी के बड़े छेद से हाथ अन्दर डाल कर छोटे छेद से तर्जनी को बाहर निकलकर जप करना चाहिए। अभिचार कर्म में तर्जनी का प्रयोग होता है।

जप में नाखून का स्पर्श वर्जित है
सुमेरु के अगले दाने से जप आरम्भ करे, माला को मध्यमा अंगुली के मघ्य पोर पर रख कर दानों को अंगूठे की सहायता से अपनी ओर गिराए। सुमेरु को नहीं लांघना चाहिए। यदि एक माला से अधिक जप करना हो तो, सुमेरु तक पहुंच कर अंतिम दाने को पकड़ कर, माला पलटी कर के, माला की उल्टी दिशा में, लेकिन पहले की तरह ही जप करना चाहिए।

देवता विषेश के लिए माला का चयन करना चाहिए-हाथी दांत की माला गणेशजी की साधना के लिए श्रेष्ठ मानी गई है।

लाल चंदन की माला गणेशजी व देवी साधना के लिए उत्तम है।

तुलसी की माला से वैष्णव मत की साधना होती है (विष्णु, राम व कृष्ण)।

मूंगे की माला से लक्ष्मी जी की आराधना होती है। पुष्टि कर्म के लिए भी मूंगे की माला श्रेष्ठ होती है।

मोती की माला वशीकरण के लिए श्रेष्ठ मानी गई है।

पुत्र जीवा की माला का प्रयोग संतान प्राप्ति के लिए करते हैं।

कमल गट्टे की माला की माला का प्रयोग अभिचार कर्म के लिए होता है।

कुश-मूल की माला का प्रयोग पाप-नाश व दोष-मुक्ति के लिये होता है।

हल्दी की माला से बगलामुखी की साधना होती है।

स्फटिक की माला शान्ति कर्म और ज्ञान प्राप्ति; माँ सरस्वती व भैरवी की आराधना के लिए श्रेष्ठ होती है।

चाँदी की माला राजसिक प्रयोजन तथा आपदा से मुक्ति में विशेष प्रभावकरी होती है।

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