ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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मंगलवार, 21 जून 2011

धोखा पर धोखा... और.. धोखा तो होना ही था



धोखा पर धोखा... और.. धोखा तो होना ही था


लोकपाल समिति गठन के प्रारूप को लेकर पहले अन्ना हजारे ने अनशन किया। अनशन का जो परिणाम आया सभी के सामने है। इस गठन पर सरकार द्वारा जो तुष्टिकरण की नीति अपनाई जा रही है, येनकेन प्रकारेण टालने की पृष्ठिभूमि बनाई जा रही है। सभी भलिभांति परिचित हैं। इस दिशा में अन्ना हजारे को भी बदनाम कर सारा का सारा प्रकरण मिटा देने की चेष्टा जारी है। लोकपाल समिति का गठन देश में बढ़ते भ्रष्टाचार पर नियंत्रण कर स्वस्थ प्रशासन देने की दिशा में उठाया गया एक सराहनीय कदम है पर यह किसे नागवार हो। जो लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हो तथा जिसके कारोबार इसी पर आधारित हो, लोकपाल समिति के दायरे में बंधकर अपना सब कुछ क्यों गवाना चाहेंगे? इस तरह के लोग आज देश में पक्ष-विपक्ष से लेकर सत्ता के इर्द गिर्द हर जगह छाये है जिनके पांव भ्रष्टाचार रूपी दलदल में बुरी तरह से उलझे हुए है। इस तरह के लोग कभी नहीं चाहेंगे कि देश से भ्रष्टाचार रुपी कल्पवृक्ष ओझिल हो जाय जिसकी छाया में सपरिवार दुनियां के सारे सुख का आनन्द ही केवल नहीं ले रहे है बल्कि कई पीढि़यों तक अनवरत इस तरह के सुख बटोरने का मन में लालसा लिये हर अनैतिक कार्य करने के लिये सदैव तत्पर रहते है।
जिन्होंने सारे कर्म कर बड़ी मेहनत से धन बटोरकर दस से भी अधिक पीढि़यों तक के लिये स्विस बैंक में जमा कर रखा है, वे कैसे अपने इस धन को राष्ट्रीय सम्पति घोषित करने देंगे। जो भ्रष्टाचार के माध्यम से धन बटोरने हेतु संसद के गलियारे तक पहुंचे है, सत्ता तक हथियाएंं है वे कैसे भ्रष्टाचार को मिटने देंगे। इस तरह के लोगों से काला धन की वापसी, स्विस बैंक में जमा धन राशि को राष्ट्रीय सम्पति घोषित करने एवं भ्रष्टाचार मिटाने की बात करना बेईमानी होगी। इस तरह के मुद्दे इनके लिये गले की हड्डी है जिसे निकालने के लिये हर तरह के कदम उठा सकते है। जैसा कि दिल्ली के रामलीला मैदान में गत दिनों घटा। बाबा रामदेव ने भी तो यही गुनाह कर दिया जो इस तरह के लोगों से काला धन की वापसी, स्विस बैंक में जमा धन राशि को राष्ट्रीय सम्पति घोषित करने एवं भ्रष्टाचार मिटाने की बात कर डाली। वे भूल गये कि जो इस तरह के कार्य में लिप्त है, उनकी बात कैसे मानेंगे। वे भूल गये कि देश को आजादी दिलाने वाले तो शहीद हो गये उनकी जगह सुविधाभोगी लोगों ने ले रखी है।
देश में स्वतंत्रता का अधिकार है। अपनी बात रखने का अधिकार है। विरोध जताने का अधिकार है। पर बाबा रामदेव को नहीं मालूम कि उन्हें अपनी बात रखने, विरोध जताने की इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। जहां आधी रात को उनके अनशन में भाग लेने देश विभिन्न भागों से आये सोये बच्चों एवं महिलाओं पर पुलिस द्वारा बर्बरता पूर्ण कार्यवाही होगी। आज जहां पूरा देश इस तरह के कार्य की ङ्क्षनदा कर रहा, जालियांवाला  बाग  जैसी घटना की पुनर्रावृति बता रहा है वहीं कुछ चंद लोगों द्वारा इस तरह के कार्य को अपने अपने तरीके से सही ठहराने की भी प्रवृति जारी है। बाबा रामदेव, अन्ना हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी आंदोलन ङ्क्षचगारी का रूप ले चुका है जिसे धीरे धीरे जनसमर्थन पूरे देश में मिलता जा रहा है। इस तरह के बदलते परिवेश से देश में अशांति फैलने के ज्यादा आसार बन रहे है। आज देश में मंहगाई बढ़ती जा रही हैं। बेरोजगारी पांव पसार रही है। भ्रष्टाचार अपने चरम सीमा पर है। पर केन्द्र सरकार कान में तेल डाल कर कुंभकरणी नींद सो रही है या सब कुछ जानकर अनजान बनने की चेष्टा का रही है। ऐसा लगता है कि अभी हाल में हुए चुनाव में जो उसे जनमत मिला उसे देखकर बौराय गई है। जिससे अपने सारे लोकहित के कार्य को भूल चुकी है।कहे इस मद में आकर अपने सिपहलसारों की राय से आपातकाल की घोषणा न कर बैठे इसमें कतई संदेह नहीं। यदि इस तरह के हालात उभरते है जहां जनआवाज येनकेन प्रकारेण दबाई जाने की चेष्टा की जाय तो अशोभनीय एवं नुकासनदेय स्थिति होगी।
आज राजनीति में जिस तरह के लोगों का वजूद बढ़ता जा रहा किसी से छिपा नहीं है। जहां देश सेवा मात्र दिखावा रह गया है। अपने आप को जनता का सेवक कहे जाने वाले जनप्रतिनिधि राजनेता से भी आगे निकल चुके है। मकान मोह, धन मोह, सत्ता मोह एवं विभिन्न प्रकार के मोहों से ग्रसित ये नेता लोकतंत्र के जनप्रतिनिधि हैं। जिनका परिवेश जनसेवक की ओर परिलक्षित होकर आज जिस स्वरूप को उजागर कर रहा है, सभी के सामने है। जिन्हें किसी भी प्रकार का वेतन नहीं, प्रत्यक्ष रूप से जिनके पास जनसेवक कार्य के रूप में कोई आय स्रोत नहीं, फिर भी चंद दिनों में ही अपार संपदा के स्वामी नजर आने लगते हैं। कार बंगला, बैंक बैलेंस आदि की कोई सीमा नहीं, आखिर यह सब जनप्रतिनिधि बनते ही कैसे संभव हो जाता है, जबकि देश का वेतनभोगी/श्रमिक श्रम करते-करते पूरी ङ्क्षजदगी बिता देता, फिर भी उसके सपने कभी पूरे नहीं हो पाते। लोकतंत्र की इस मायावी नगरी में कौन सी जादू की छड़ी इन जनप्रतिनिधियों के हाथ लग जाते हैं, जिससे ये सामान्य ङ्क्षजदगी से ऊपर उठकर राजा बाबू बन जाते हैं। जिनके कारनामे असामाजिक एवं देश अहित में होते हुए भी अनुग्रहणीय बनते जा रहे हैं। इस तरह के लोगों के बीच देश के दो महान संत अन्ना हजारे एवं बाबा रामदेव भ्रष्टाचार के खिलाफ जन आंदोलन का शंखनाद कर चुके है। इस तरह के ओदोलन को लेकर जो अभी हाल में दिल्ली में घटना घटी कोई नई बात नहीं थी ऐसा जो होना ही था। देश में जब जब इस तरह के आंदोलन हुए है उसे कुचलने के हर संभव प्रयास सदा किये गये है

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