ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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रविवार, 18 दिसंबर 2011

मांगलिक दोष में भ्रान्तियों का निवारण

मांगलिक दोष में भ्रान्तियों का निवारण :


विवाह के समय वर एवम कन्या की जन्म कुंडली मिलान करते हुए अष्टकूट के साथ -साथ मांगलिक दोष पर भी विचार किया जाता है । परन्तु खेद है कि अधिकांश ज्योतिषी इस महत्व पूर्ण विषय पर विचार करते हुए कुछ मुहूर्त ग्रंथों के अप्रमाणिक एवम तर्क हीन वाक्यों का आधार ले कर त्रुटि पूर्ण मिलान करते हैं तथा फलित शास्त्र के महत्व पूर्ण सूत्रों कि उपेक्षा करते हैं। ऐसा करते हुऐ ये ज्योतिष शास्त्र व समाज दोनों को हानि पहुंचाते हैं। इस प्रकार के त्रुटि पूर्ण विवाह सफल नहीं हो पाते।
ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे,09827198828,Bhilai,
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 क्या है मांगलिक दोष?:
जन्म कुंडली में 1,4,7,8,12 वें भाव: में यदि मंगल स्थित हो तो वर अथवा कन्या को मंगली कहा जाता है
तथा उसका विवाह मंगली वर /कन्या से करना शुभ समझा जाता है । मंगल ग्रह को ज्योतिष ग्रंथों में रक्त प्रिय एवम हिंसा व विवाद का कारक कहा गया है। सातवाँ भाव जीवन साथी एवम गृहस्थ सुख का है। इन भावों में स्थित मंगल अपनी दृष्टि या स्थिति से सप्तम भाव अर्थात गृहस्थ सुख को हानि पहुँचाता है । दैवज्ञॉ की एक
बड़ी संख्या जन्म कुंडली में उपरोक्त स्थानों पर मंगल को देख कर वर या कन्या को तत्काल मंगली घोषित
कर देती है फिऱ चाहे मंगल नीच राशि: में हो या उच्च में ,मित्र राशि: में हो या शत्रु में । मंगल दोष के परिहार को या तो अनदेखा किया जाता है या शास्त्रीय नियमों की अवहेलना करने वाले परिहार वाक्यों को लागू करके त्रुटि युक्त मिलान कर दिया जाता है ।
क्या कहते हैं ज्योतिष के शास्त्रीय मूलभूत नियम ?
फलित ज्योतिष के सर्वमान्य ग्रंथों के अनुसार जो ग्रह अपनी उच्च ,मूल त्रिकोण ,स्व ,मित्र राशि नवांश में स्थित ,वर्गोत्तम ,षड्बली ,शुभ ग्रहों से युक्त दृष्ट हो वह सदैव शुभकारक होता है । इसी प्रकार नीचस्थ ,अस्त ,शत्रु राशिस्थ ,पापयुक्त ,पाप दृष्ट ,षड्बल विहीन ग्रह अशुभ कारक होता है ।
  • नीचस्थो रिपु राशिस्थ खेटो भावविनाशक:।
  • मूल स्व तुंग मित्रस्थो भाव वृद्धि करो भवेत् ।। [जातक पारिजात]
  • नीचारिगो भाव विनाश कृत्खग:सम: समर्क्षे सखि भे त्रिकोण भे।
  • स्वोच्चे स्व भे भावय  प्रद: फल दु:स्थेस्व सत्सु विलोम : ।।  [ज्योतिस्तत्व]
पाप ग्रह भी यदि स्व , उच्च , मित्र राशि नवांश ,वर्गोत्तम ,शुभ युक्त , शुभ दृष्ट हों तो शुभ कारक होते हैं
देखिये :
स्वीय तुंग सखि सदभ संस्थित पामरोअपि यदि सत्फलम व्रजेत ।-भाव मंजरी
पाप ग्रहा बलयुता: शुभ वर्ग संस्था सौम्या भवन्ति शुभ वर्गग सोम्य दृष्टा:।। [जातका देश मार्ग ]
उपरोक्त सन्दर्भों से यह स्पष्ट है कि जन्म कुंडली के 1,4,7,8,12,वें भाव में स्थित मंगल यदि स्व ,उच्च मित्र आदि राशि नवांश का ,वर्गोत्तम, षड्बली हो तो मांगलिक दोष नहीं होगा जब कि अधिकाँश ज्योतिषी उस वर/कन्या को मांगलिक घोषित करके कितना अनर्थ करते हैं । प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों एवम फलित सूत्रों के अनुसार जन्म कुंडली के 1,4,7,8,12,वें भाव में स्थित मंगल भी निम्नलिखित परिस्तिथियों में दोष कारक नहीं होगा।
  • 1. यदि मंगल इन भावों में स्व ,उच्च ,मित्र राशि: नवांश का हो ।
  • 2. यदि मंगल इन भावों में वर्गोत्तम नवांश का हो ।
  • 3. यदि इन भावों में स्थित मंगल पर बलवान शुभ ग्रहों कि पूर्ण दृष्टि हो।
  • एक और गंभीर गलती जो प्राय: आजकल अल्प ज्ञानी ज्योतिषियों द्वारा की जा रही है वह है ,मांगलिक दोष का विचार भाव कुंडली से न करना। चलित कुंडली में संधि स्थान पर स्थित मंगल का भाव फल शून्य होगा । कभी -कभी भाव मध्य स्पष्ट एवम मंगल स्पष्ट का अंतर 15 अंश से अधिक होने पर मंगल अगले या पिछले भाव का फल करने के कारण दोष कारक नहीं रहता।
सप्तम भाव का स्वामी बलवान हो तथा अपने भाव को पूर्ण दृष्टि से देख रहा हो तो मांगलिक दोष का परिहार हो जाता है ।
क्या 28 वें वर्ष के बाद मांगलिक दोष नहीं रहता ?
यह दोष पूर्ण अवधारणा बहुत प्रचलित है। मंगल 28 वें वर्ष में अपना शुभाशुभ फल प्रदान करता है यह सत्य है किन्तु अपनी दशा, अन्तर्दशा ,प्रत्यंतर दशा या गोचर में कभी भी अपना अशुभ फल प्रगट कर सकता है ।अत: 28 वें वर्ष के बाद मांगलिक दोष की निवृति नहीं होती।
क्या शनि या राहु से युक्त मंगल होने पर मांगलिक दोष नहीं रहता ?
कुछ मुहूर्त ग्रंथों मैं ऐसे वाक्य मिलते हैं कि शनि या राहु से युक्त मंगल होने पर मांगलिक दोष नहीं रहता किन्तु ये वाक्य फलित ज्योतिष के शास्त्रीय नियमों के विरूद्व हैं । यह सर्वमान्य फलित ज्योतिष सिद्धांत है कि पाप ग्रह कि युति किसी ग्रह के पाप फल मैं वृद्धि करती है उसका दोष दूर नहीं करती । देखिये : नीचादी दु: स्थगे भूमि सुते बल विवर्जिते।
पाप युक्ते पाप दृष्टे सा दशा नेष्ट दायिका ।।  बृहत् पाराशर ]
नीच शत्रु गृहम प्राप्ता: शत्रु निम्नांश सूर्य गा: ।
वि वर्णा: पाप संबंधा दशां कुर्मुर शोभनाम ।। [सारावली]
बृहत् पाराशर के अनुसारविकल: पाप संयुत: अर्थात पापी ग्रह से युक्त ग्रह विकल अवस्था का होगा तथा दोष कारक होगा अत: स्पष्ट है की शनि या राहु की युति से मांगलिक दोष की निवृति नहीं अपितु वृद्धि होगी क्योंकि ये दोनों ग्रह पापी हैं और मंगल के अशुभ फल में वृद्धि करेंगे।
उपरोक्त तथ्यों से यही निष्कर्ष निकलता है कि मांगलिक दोष का निर्णय वर तथा कन्या कि जन्म कुंडलियों का सावधानी पूर्वक अनुशीलन करके करना चाहिए तथा जल्दबाजी से किसी परिणाम पर नहीं पहुंचना चाहिए। ऐसा करके ही हम समाज व ज्योतिष साहित्य कि सेवा कर सकते हैं।
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