ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

!!विशेष सूचना!!
नोट: इस ब्लाग में प्रकाशित कोई भी तथ्य, फोटो अथवा आलेख अथवा तोड़-मरोड़ कर कोई भी अंश हमारे बगैर अनुमति के प्रकाशित करना अथवा अपने नाम अथवा बेनामी तौर पर प्रकाशित करना दण्डनीय अपराध है। ऐसा पाये जाने पर कानूनी कार्यवाही करने को हमें बाध्य होना पड़ेगा। यदि कोई समाचार एजेन्सी, पत्र, पत्रिकाएं इस ब्लाग से कोई भी आलेख अपने समाचार पत्र में प्रकाशित करना चाहते हैं तो हमसे सम्पर्क कर अनुमती लेकर ही प्रकाशित करें।-ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे, सम्पादक ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका,-भिलाई, दुर्ग (छ.ग.) मोबा.नं.09827198828
!!सदस्यता हेतु !!
.''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका के 'वार्षिक' सदस्यता हेतु संपूर्ण पता एवं उपरोक्त खाते में 220 रूपये 'Jyotish ka surya' के खाते में Oriental Bank of Commerce A/c No.14351131000227 जमाकर हमें सूचित करें।

ज्योतिष एवं वास्तु परामर्श हेतु संपर्क 09827198828 (निःशुल्क संपर्क न करें)

आप सभी प्रिय साथियों का स्नेह है..

गुरुवार, 17 नवंबर 2011

'' क्या है उपनिषद शब्द का अर्थ? 1.माण्डूक्योपनिषद् 2.छान्दोग्योपनिषद


माण्डूक्योपनिषद्


मित्रों मै आज उपनिषदों के बारे में चर्चा करूंगा
'' क्या  है उपनिषद शब्द का अर्थ? वेद का अर्थ है अनुभूति या ज्ञान यानी वैदिक मंत्रों में देवताओं की अनुभूति के आधार पर कल्पना है और फिर उन देवताओं की स्तुतियों में विराट वैदिक साहित्य की रचना की गई।''
रामायण यानी राम का अयन यानी घर। अर्थात् रामायण में है राम की कथा। महाभारत उस युद्ध का विराट महाकाव्य है जिससे भारत के सभी राजा महाराजा शामिल हुए तो भारत के एक महायुद्ध के अर्थ में उसका नाम पड़ा महाभारत। ब्राह्मण ग्रन्थ इसलिए वैसे कहलाए क्योंकि उनमें ब्रह्म अर्थात वेद के मंत्रों की व्याख्या यज्ञों के सन्दर्भ में की गई। अरण्य में लिखे जाने के कारण एक खास साहित्य का नाम पड़ गया आरण्यक साहित्य। तो उपनिषद?
क्या है इस शब्द का अर्थ? बड़ा ही मजेदार है। इसमें तीन शब्द हैं उप, नि और षद। ‘उप’ का अर्थ है नजदीक, आसपास। जैसे राष्ट्रपति उसके एकदम नजदीक उपराष्ट्रपति। ‘नि’ का अर्थ संस्कृत में होता है अच्छी तरह से। ‘षद’ का वास्तविक शब्द है सद जो सन्धि के नियमों के कारण षद हो गया है। अर्थ है बैठना। तो उपनिषद का अर्थ है अच्छी तरह से आसपास बैठना। तो क्या किसी साहित्य का ऐसा नाम भी हो सकता है? हां क्यों नहीं हो सकता? और चूंकि ऐसा है तो इसलिए उसमें भारत की एक खास विचार परम्परा की शक्ल छिपी पड़ी है। कल्पना करिए कि एक आश्रम है। वहां एक पेड़ के नीचे या खुले में एक आचार्य बैठे हैं और उनके आसपास उनके चार-पांच या दस बारह या बीस-पच्चीस शिष्य बैठे हैं। इस आसपास बैठेने का कोई मकसद तो होगा। मकसद था सृष्टि के बारे में सोचना, जीवन के बारे में सोचना, आत्मा और परमात्मा पर विचार विमर्श करना। बन्धन और मोक्ष के बारे में एक-दूसरे के साथ विचारों का आदान-प्रदान करना।
आसपास बैठकर विचारों के इस अच्छी तरह के मन्थन का नाम पड़ गया उपनिषद। और उस उपनिषद में से जो साहित्य निकला उसका नाम पड़ गया उपनिषद साहित्य। एक शब्द आजकल चलता है- सेमिनार। जिसका हिन्दी रूपान्तरण हमने कर दिया हैं संगोष्ठी। जो अर्थ सेमिनार या संगोष्ठी का है ठीक वही अर्थ उपनिषद का है। आप चाहें तो सेमिनार का रूपान्तरण उपनिषद भी कर सकते हैं। यह बात अलग है कि पिछले जमाने में एक सी उपनिषदों यानी एक सी सेमिनारों में दर्शन का ही विवेचन होता रहा इसलिए उपनिषद साहित्य में बस दर्शन ही दर्शन मिलता है। तो पिछले जमाने में यानी कब? हमारा मतलब है कि कब लिखी गई थीं उपनिषदें? दो तरह से जांच करके इस सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश करनी चाहिए।
कुल 180 मानी जाने वाली उपनिषदों में से एक उपनिषद का नाम है मैत्रायणी उपनिषद। उसमें एक जगह अपने वक्त की एक खास ज्योतिष संबंधी स्थिति की तस्वीर खींची गई है। ज्योतिष के विद्वान कहते हैं कि यह स्थिति 2000 ईसा पूर्व के आसपास की है।  मैत्रायणी उपनिषद पुरानी उपनिषदों में नहीं मानी जाती। अगर उसका समय 2000 ईसा पूर्व माना जा रहा है यानी आज से चार हजार साल पहले का माना जा रहा है तो जाहिर है कि प्राचीनतम उपनिषद का समय उससे चार-पांच सौ साल पहले का माना जा सकता है। संयोगवश यह वही समय है यानी 2500 ईसा पूर्व यानी आज से करीब साढ़े चार हजार साल पूर्व जब सिन्धु घाटी के किनारे (और देश में बाकी जगहों पर भी) हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे अति समृद्ध और सुविधा सम्पन्न शहर बसे हुए थे, जब ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना हो रही थी और जब महाभारत का युद्ध हुए करीब पांच सौ साल बीत चुके थे।
दूसरी तरह से जांच करने पर भी हम इसी समय के करीब पहुंच जाते हैं। कैसे? ऐसे कि महाभारत के महाविनाश के बाद देश में विचारों का जो नया उन्मेष पैदा हुआ संसार और शरीर के प्रति विरक्ति का जो भाव बना और आत्मा की अमरता पर जैसी उत्कट भावाभिव्यक्ति होने लगी उसे देखते हुए उपनिषदों की ऊपरी समय सीमा वही जाकर बनती है जो ब्राह्मण ग्रन्थों के रचनाकाल की है। यानी 2500 ई.पू.। हां, उसमें एक अनुमान सहज ही हो सकता है कि चूंकि देश में यज्ञों के प्रति उत्साह लगातार क्षीण हो रहा था और अध्यात्मविद्या का प्रभाव लगातर फैल रहा था इसलिए जहां ब्राह्मणों और आरण्यकों की रचना पांच-सात सौ सालों में हो चुकी होगी वहां उपनिषदों की रचना लगातार करीब एक हजार साल तक चलती रही होगी। जैसे हर कोई चाहता है कि उसके वंश का, कुनबे का या कौम का कोई पुराना संदर्भ निकल आए ताकि वह अपने को खूब प्रामाणिक साबित कर सके वैसी ही इच्छा संसार को असार मानने के बावजूद उपनिषदकारों को भी हो गई हो तो क्या हैरानी? आखिर थे तो वे भी आपके और हमारे जैसे मनुष्य।
तो जो 108 उपनिषदें मानी जाती हैं उनमें से दो सबसे पुरानी और सबसे ज्यादा मशहूर उपनिषदें कभी उपनिषद के रूप में लिखी ही नहीं गई और उन्हें उपनिषद का दर्जा दे दिया गया। वे हैं ईशोपनिषद और बृहदारण्यकोपनिषद। ये दोनों लिखी नहीं गईं, इसका अर्थ यह है कि ये दोनों किसी दूसरी किताबों का हिस्सा हैं और चूंकि उनमें उसी दर्शन का मन्थन किया गया है जो उपनिषदों का प्रिय विषय है इसलिए उन्हें उनकी मूल किताबों में से निकाल कर स्वतंत्र उपनिषद का दर्जा दे दिया गया। जिसे हम ईशोपनिषद कहते हैं वह वास्तव में यजुर्वेद का चालीसवां यानी आखिरी अध्याय है और जिसे हम बृहदारण्यकोपनिषद कहते हैं वह असलियत में शतपथ ब्राह्मण का आखिरी अध्याय है। जैसे गीता महाभारत के भीष्मपर्व में होने के बावजूद एक स्वतंत्र पुस्तक का रूतबा हासिल कर चुकी है वैसी ही स्थिति ईशोपनिषद और बृहदारण्यकोपनिषद की भी बन गई है।
बृहदारण्यकोपनिषद का तो कुछ ऐसा आकर्षण बना कि पहले आरण्यककारों ने इसे आरण्यक कहना चाहा तो फिर अन्तत: उपनिषदकार इसे अपने कैम्प में खींच ले गए। इन दोनों अतिमहत्वपूर्ण उपनिषदों के अलावा ग्यारह और उपनिषदों को खूब महत्वपूर्ण जगह उपनिषद साहित्य में मिली। उनके नाम जान लेने में कोई हर्ज नहीं। ये हैं केन, कठ, प्रश्न, मण्डूक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, कौषीतकी, श्वेताश्वतर और मैत्रायणी। सवाल है कि 108 उपनिषदों में से इन तेरह उपनिषदों को ही क्यों इतना महत्वपूर्ण मान लिया गया? जवाब में कई कारण गिनाए जा सकते हैं। पहला और सबसे बड़ा कारण तो यही है कि अपने जिस अध्यात्म संबंधी विषयवस्तु के कारण उपनिषदों के हमारे देश में खास इज्जत मिली इन तेरह उपनिषदों में इस अध्यात्म का बहुत ही शानदार विवेचन मिलता है। एक बार जब उपनिषदों का स्थान देश में ऊंचा हो गया तो फिर कई तरह के सम्प्रदायों ने अपने-अपने सम्प्रदाय और उसके इष्टदेव की प्रमुखता स्थापित करने के लिए उपनिषदों की अध्यात्म शैली का सहारा लिया।
पर इन तेरह उपनिषदों में ऐसा कुछ नहीं है और ब्रह्म, आत्मा, जगत बन्धन और मोक्ष पर ही बहस इनमें है। कुछ लोग श्वेताश्वतर को इस सन्दर्भ में इतना महत्व नहीं देते और उसे शैव सम्प्रदाय का उपनिषद मानना चाहते हैं जो एक हद तक ही ठीक है। पर फिर भी उसमें प्राय करके वैसा ही अध्यात्म चिंतन है जैसा शेष बारह उपनिषदों में है। इन तेरह उपनिषदों के अतिमहत्वपूर्ण  होने का एक कारण यह भी माना जाता है कि ये शायद सर्वाधिक प्राचीन उपनिषदें हैं। जाहिर है कि जिस दार्शनिकता के लिए उपनिषदें विख्यात है वह विषय उनमें सर्वश्रेष्ठ तरीके से मिल जाता है और उन्हें की देखा देखी सम्प्रदाय संबंधी उपनिषदों की रचना उनसे बाद में ही की गई होगी। शायद इन तेरह उपनिषदों के इसी महत्व को देखते हुए आदि शंकराचार्य ने इन्हीं में से दस उपनिषदों पर अपना भाष्य लिखा और जिन शेष तीन यानी कौषीतकी, श्वेताश्वतर और मैत्रायणी पर वे भाष्य नहीं लिख सके, उन्हें  उन्होंने अपने शेष भाष्यों में उद्धृत किया है। श्वेताश्वतर पर वैसे तो एक शंकर व्याख्या मिलती है पर वह आदि शंकराचार्य की न होकर उनके किसी उत्तराधिकारी की मानी जाती है। शंकर जैसे मौलिक और प्रामाणिक दार्शनिक द्वारा इस तरह महत्व मिल जाने पर इन तेरह उपनिषदों का महत्व मानो और भी पुख्ता हो गया।
देश का विराट दार्शनिक चिंतन इन उपनिषदों में हमारे यहां पनपे नौ दार्शनिक स्कूलों में सुरक्षित है। इन नौ सम्प्रदायों में वेदों को महत्व न देने के कारण तीन अतिप्राचीन सम्प्रदायों चार्वाक, जैन, बौद्ध को नास्तिक सम्प्रदाय माना जाता है। नास्तिको वेदानिन्दक यानी नास्तिक वह है जो वेद की निन्दा करता है। तो वेदों में श्रद्धा रखने के कारण बाकी छह अपेक्षाकृत कम प्राचीन सम्प्रदायों न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त को आस्तिक सम्प्रदाय माना जाता है। दो खास हिस्सों में बंटे होने के बावजूद सभी नौ दार्शनिक स्कूलों या सम्प्रदायों का बराबर का महत्व इस देश में रहा है। इन सभी नौ के नौ सम्प्रदायों के बीज वेदों और उपनिषदों में हैं और वहीं से इनका विकास हुआ। उनमे से सर्वप्रथम ''माण्डूक्योपनिषद् '' को आपके सामने रखने जा रहा हूँ मै यहाँ बताना चाहूँगा की यह संकलन बमुश्किल हो पाया है मैंने श्री सूर्यकान्त बाली के लेख को और श्री देवेश मिश्र जी का भी आभारी हूँ क्योंकि इन्हीं दोनों विद्वानों का सहयोग प्रमुख रूप से लिया है जो सन्कल कर आप लोगों को प्रस्तुत है-  
1
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम् .
ओम् इति एतत् अक्षरम् इदम् सर्वम्.
तस्योपव्याख्यानम् .
तस्य उपव्याख्यानम्.
भूतं भवद्
भूतम् भवत्
भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव .
भविष्यत् इति सर्वम् ओङ्कारः एव.
यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्य्
यत् च अन्यत् त्रिकालातीतम् तत् अपि
ओङ्कार एव .
ओङ्कारः एव.
2
सर्वं ह्येतद्ब्रह्म .
सर्वम् हि एतत् ब्रह्म.
अयमात्मा ब्रह्म .
अयम् आत्मा ब्रह्म.
सो ऽयमात्मा चतुष्पात् .
सः अयम् आत्मा चतुष्पात्.
3
जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्
जागरितस्थानः बहिःप्रज्ञः सप्ताङ्गः एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुक्
वैश्वानरः प्रथमः पादः .
वैश्वानरः प्रथमः पादः.
4
स्वप्नस्थानो ऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्
स्वप्नस्थानः अन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्गः एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्
तैजसो द्वितीयः पादः .
तैजसः द्वितीयः पादः.
5
यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् .
यत्र सुप्तः न कञ्चन कामम् कामयते न कञ्चन स्वप्नम् पश्यति तत् सुषुप्तम्.
सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्य्
सुषुप्तस्थानः एकीभूतः प्रज्ञानघनः एव आनन्दमयः हि
आनन्दभुक्चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः .
आनन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञः तृतीयः पादः.
6
एष सर्वेश्वरः .
एषः सर्वेश्वरः.
एष सर्वज्ञः .
एषः सर्वज्ञः.
एषो ऽन्तर्यामी .
एषः अन्तर्यामी.
एष योनिः सर्वस्य .
एषः योनिः सर्वस्य.
प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् .
प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्.
7
नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् .
न अन्तःप्रज्ञम् न बहिःप्रज्ञम् न उभयतःप्रज्ञम् न प्रज्ञानघनम् न प्रज्ञम् न अप्रज्ञम्.
अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यम्
अदृष्टम् अव्यवहार्यम् अग्राह्यम् अलक्षणम् अचिन्त्यम्
अव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं
अव्यपदेश्यम् एकात्मप्रत्ययसारम् प्रपञ्चोपशमम् शान्तम् शिवम् अद्वैतम्
चतुर्थं मन्यन्ते .
चतुर्थम् मन्यन्ते.
स आत्मा .
सः आत्मा.
स विज्ञेयः .
सः विज्ञेयः.
8
सो ऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारः .
सः अयम् आत्मा अध्यक्षरम् ओङ्कारः.
अधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा
अधिमात्रम् पादाः मात्राः मात्राः च पादाः
अकार उकारो मकार इति .
अकारः उकारः मकारः इति.
9
जागरितस्थानो वैश्वानरो ऽकारः प्रथमा मात्राप्तेरादिमत्त्वाद्वा .
जागरितस्थानः वैश्वानरः अकारः प्रथमा मात्रा आप्तेर् आदिमत्त्वात् वा.
आप्नोति ह वै सर्वान्कामानादिश्च भवति .
आप्नोति ह वै सर्वान् कामान् आदिः च भवति.
10
स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षादुभयत्वाद्व .
स्वप्नस्थानः तैजसः उकारः द्वितीया मात्रा उत्कर्षात् उभयत्वात् व.
उत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिम् .
उत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिम्.
समानश्च भवति .
समानः च भवति.
नास्याब्रह्मवित्
न अस्य अब्रह्मवित्
कुले भवति य एवं वेद .
कुले भवति यः एवम् वेद.
11
सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा .
सुषुप्तस्थानः प्राज्ञः मकारः तृतीया मात्रा मितेः अपीतेः वा.
मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद .
मिनोति ह वै इदम् सर्वम् अपीतिः च भवति यः एवम् वेद.
{मिति: मिनोति; अपीति: मिनातिDeussen}
12
अमात्रश्चतुर्थो ऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवो ऽद्वैतः .
अमात्रः चतुर्थः अव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवः अद्वैतः.
एवमोङ्कार आत्मैव .
एवम् ओङ्कारः आत्मा एव.
संविशत्यात्मनात्मानं य एवं वेद .
संविशति आत्मना आत्मानम् यः एवम् वेद.
 छान्दोग्योपनिषद 
1.1
ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत ।
ओम् इत्य्+ एतद्+ अ-क्षरम् उद्गीथम् उपासीत ।
ओमिति ह्युद्गायति ।
ओम् इति ह्य्+ उद्गायति ।
तस्योपव्याख्यानम् ।।१०१.१।
तस्य+ उपव्याख्यानम् ॥१०१.१।
एषां भूतानां पृथिवी रसः ।
एषां+ भूतानां+ पृथिवी रसः ।
पृथिव्या आपो रसः ।
पृथिव्या+ आपो+ रसः ।
अपामोषधयो रसः ।
अपाम् ओषधयो+ रसः ।
ओषधीनां पुरुषो रसः ।
ओषधीनां+ पुरुषो+ रसः ।
पुरुषस्य वाग्रसः ।
पुरुषस्य वाग्+ रसः ।
वाच ऋग्रसः ।
वाच+ ऋग्+ रसः ।
ऋचः साम रसः ।
ऋचः साम रसः ।
साम्न उद्गीथो रसः ॥१०१.२।
साम्न+ उद्गीथो+ रसः ॥१०१.२।
स एष रसानां रसतमः परमः परार्ध्यो &ष्टमो यदुद्गीथः ॥१०१.३।
स एष+ रसानां+ रसतमः परमः पर-अर्ध्यो+ + अष्टमो+ यद्+ उद्गीथः ॥१०१.३।
कतमा कतमर्क्कतमत्कतमत्साम कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति ॥१०१.४।
कतमा कतमा+ ऋक् कतमत् कतमत् साम कतमः कतम+ उद्गीथ+ इति विमृष्टं+ भवति ॥१०१.४।
वागेवर्क् ।
वाग्+ एव+ ऋक् ।
प्राणः साम ।
प्राणः साम ।
ओमित्येतदक्षरमुद्गीथः ।
ओम् इत्य्+ एतद्+ अ-क्षरम् उद्गीथः ।
तद्वाऐ एतन्मिथुनं यद्वाक्च प्राणश्चर्क्च साम च ॥१०१.५।
तद्+ वाऐ+ एतन्+ मिथुनं+ यद्+ वाक् च प्राणश्+ च+ ऋक् च साम च ॥१०१.५।
तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे संसृज्यते ।
तद्+ एतन्+ मिथुनम् ओम् इत्य्+ एतस्मिन्न्+ अ-क्षरे संसृज्यते ।
यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्यो ऽन्यस्य कामम् ।।१०१.६।
यदा वै मिथुनौ समागच्छत+ आपयतो+ वै ताव्+ अन्यो-अन्यस्य कामम् ॥१०१.६।
आपयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥१०१.७।
आपयिता ह वै कामानां+ भवति य+ एतद्+ एवं+ विद्वान् अ-क्षरम् उद्गीथम् उपास्ते ॥१०१.७।
तद्वा एतदनुज्ञाक्षरम् ।
तद्+ वा+ एतद्+ अनुज्ञा+ अ-क्षरम् ।
यद्धि किंचानुजानात्योमित्येव तदाह ।
यद्+ + धि किं-च+ अनुजानात्य्+ ओम् इत्य्+ एव तद्+ आह ।
एषो एव समृद्धिर्यदनुज्ञा ।
एषा+ उ एव समृद्धिर्+ यद्+ अनुज्ञा ।
समर्धयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥१०१.८।
समर्धयिता ह वै कामानां+ भवति य+ एतद्+ एवं+ विद्वान् अ-क्षरम् उद्गीथम् उपास्ते ॥१०१.८।
तेनेयं त्रयी विद्या वर्तते ।
तेन+ इयं+ त्रयी विद्या वर्तते ।
ओमित्याश्रावयति ।
ओम् इत्य्+ आश्रावयति ।
ओमिति शंसति ।
ओम् इति शंसति ।
ओमित्युद्गायति ।
ओम् इत्य्+ उद्गायति ।
एतस्यैव अक्षरस्यापचित्यै महिम्ना रसेन ॥१०१.९।
एतस्य+ एव अ-क्षरस्य+ अपचित्यै महिम्ना रसेन ॥१०१.९।
तेनोभौ कुरुतः {।}यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद ।
तेन+ उभौ कुरुतः {।} यश्+ च+ एतद्+ एवं+ वेद यश्+ च न वेद ।
नाना तु विद्या चाविद्या च ।
नाना तु विद्या च+ अ-विद्या च ।
यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति ॥१०१.१०।
यद्+ एव विद्यया करोति श्रद्धया+ उपनिषदा तद्+ एव वीर्यवत्तरं+ भवति+ इति खल्व्+ एतस्य+ एव+ अ-क्षरस्य+ उपव्याख्यानं+ भवति ॥१०१.१०।
1.2
देवासुरा ह वै यत्र संयेतिरे {।}उभये प्राजापत्यास्तद्ध देवा उद्गीथमाजह्रुरनेनैनानभिभविष्याम इति ॥१०२.१।
देव-असुरा+ ह वै यत्र संयेतिरे {।} उभये प्राजापत्यास् तद्+ + ध देवा+ उद्गीथम् आजह्रुर्+ अनेन+ एनान् अभिभविष्याम+ इति ॥१०२.१।
ते ह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासां चक्रिरे ।
ते ह नासिक्यं+ प्राणम् उद्गीथम् उपासां+ चक्रिरे ।
तं ह असुराः पाप्मना विविधुः ।
तं+ ह असुराः पाप्मना विविधुः ।
तस्मात्तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च ।
तस्मात् तेन+ उभयं+ जिघ्रति सु-रभि च दुर्-गन्धि च ।
पाप्मना ह्येष विद्धः ॥१०२.२।
पाप्मना ह्य्+ एष+ विद्धः ॥१०२.२।
अथ ह वाचमुद्गीथमुपासां चक्रिरे ।
अथ ह वाचम् उद्गीथम् उपासां+ चक्रिरे ।
तां हासुराः पाप्मना विविधुः ।
तां+ ह+ असुराः पाप्मना विविधुः ।
तस्मात् (तयोभयं S तेनोभयं )वदति सत्यं चानृतं च ।
तस्मात् (तया+ उभयं+ S तेन+ उभयं+ ) वदति सत्यं+ च+ अन्-ऋतं+ च ।
पाप्मना ह्येषा विद्धा ॥१०२.३।
पाप्मना ह्य्+ एषा विद्धा ॥१०२.३।
अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासां चक्रिरे ।
अथ ह चक्षुर्+ उद्गीथम् उपासां+ चक्रिरे ।
तद्धासुराः पाप्मना विविधुः ।
तद्+ + ध+ असुराः पाप्मना विविधुः ।
तस्मात्तेन उभयं पश्यति दर्शनीयं चादर्शनीयं च ।
तस्मात् तेन+ उभयं+ पश्यति दर्शनीयं+ च+ अ-दर्शनीयं+ च ।
पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ।।१०२.४।
पाप्मना ह्य्+ एतद्+ विद्धम् ॥१०२.४।
अथ ह श्रोत्रमुद्गीथमुपासां चक्रिरे ।
अथ ह श्रोत्रम् उद्गीथम् उपासां+ चक्रिरे ।
तद्धासुराः पाप्मना विविधुः ।
तद्+ + ध+ असुराः पाप्मना विविधुः ।
तस्मात्तेनोभयं शृणोति श्रवणीयं चाश्रवणीयं च ।
तस्मात् तेन+ उभयं+ शृणोति श्रवणीयं+ च+ अ-श्रवणीयं+ च ।
पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ।।१०२.५।
पाप्मना ह्य्+ एतद्+ विद्धम् ॥१०२.५।
अथ ह मन उद्गीथमुपासां चक्रिरे ।
अथ ह मन+ उद्गीथम् उपासां+ चक्रिरे ।
तद्धासुराः पाप्मना विविधुः ।
तद्+ + ध+ असुराः पाप्मना विविधुः ।
तस्मात्तेनोभयं संकल्पयते संकल्पनीयं च ।
तस्मात् तेन+ उभयं+ संकल्पयते संकल्पनीयं+ च ।
पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ।।१०२.६।
पाप्मना ह्य्+ एतद्+ विद्धम् ॥१०२.६।
अथ ह य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासां चक्रिरे ।
अथ ह य+ एव+ अयं+ मुख्यः प्राणस्+ तम् उद्गीथम् उपासां+ चक्रिरे ।
तं हासुरा ऋत्वा विदध्वंसुर्यथाश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसेतैवम् ।।१०२.७।
तं+ ह+ असुरा+ ऋत्वा विदध्वंसुर्+ यथा+ अश्मानम् आखणम् ऋत्वा विध्वंसेत+ एवम् ॥१०२.७।
यथाश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसत एवं हैव स विध्वंसते य एवंविदि पापं कामयते यश्चैनमभिदासति ।
यथा+ अश्मानम् आखणम् ऋत्वा विध्वंसतए+ एवं+ ह+ एव स+ विध्वंसते य+ एवं-विदि पापं+ कामयते यश्+ च+ एनम् अभिदासति ।
स एषो &श्माखणः ॥१०२.८।
स+ एषो+ + अश्मा+ आखणः ॥१०२.८।
नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजानाति ।
न+ एव+ एतेन सु+ रभि न दुर्+ गन्धि विजानाति ।
अपहतपाप्मा ह्येषः ।
अपहत-पाप्मा ह्य्+ एषः ।
तेन यदश्नाति यत्पिबति तेनेतरान्प्राणानवति ।
तेन यद्+ अश्नाति यत् पिबति तेन+ इतरान् प्राणान् अवति ।
एतमु एवान्ततो (अवित्त्वोत्क्रामति S अवित्त्वोत्क्रामन्ति )।
एतम् उ एव+ अन्ततो+ (+ अ-वित्त्वा+ उत्क्रामति S + अ-वित्त्वा+ उत्क्रामन्ति ) ।
व्याददाति एवान्तत इति ॥१०२.९।
व्याददाति एव+ अन्तत+ इति ॥१०२.९।
तं हाङ्गिरा उद्गीथमुपासां चक्रे ।
तं+ ह+ अङ्गिरा+ उद्गीथम् उपासां+ चक्रे ।
एतमु एव अङ्गिरसं मन्यन्ते अङ्गानां यद्रसः ॥१०२.१०।
एतम् उ एव + अङ्गिरसं+ मन्यन्ते + अङ्गानां+ यद्+ रसः ॥१०२.१०।
तेन {S nimmt dieses "तेन " zum vorhergehenden Abschnitt.} तं ह बृहस्पतिरुद्गीथमुपासां चक्रे ।
तेन {S nimmt dieses "तेन" zum vorhergehenden Abschnitt.} तं+ ह बृहस्-पतिर्+ उद्गीथम् उपासां+ चक्रे ।
एतमु एव बृहस्पतिं मन्यन्ते ।
एतम् उ एव बृहस्पतिं+ मन्यन्ते ।
वाग्घि बृहती तस्या एषपतिः ॥१०२.११।
वाग्+ + घि बृहती तस्या+ एष+ पतिः ॥१०२.११।
तेन {S nimmt dieses "tena" zum vorhergehenden Abschnitt. }तं हायास्य उद्गीथमुपासां चक्रे ।
तेन {S nimmt dieses "tena" zum vorhergehenden Abschnitt. } तं+ ह+ अयास्य+ उद्गीथम् उपासां+ चक्रे ।
एतमु एवायास्यं मन्यन्ते ।
एतम् उ एव+ आयास्यं+ मन्यन्ते ।
आस्याद्यदयते ॥१०२.१२।
आस्याद्+ यद्+ अयते ॥१०२.१२।
तेन {S nimmt dieses "tena" zum vorhergehenden Abschnitt. }तं ह बको दाल्भ्यो विदां चकार ।
तेन {S nimmt dieses "tena" zum vorhergehenden Abschnitt. } तं+ ह बको+ दाल्भ्यो+ विदां+ चकार ।
स ह नैमिशीयानामुद्गाता बभूव ।
स+ ह नैमिशीयानाम् उद्गाता बभूव ।
स ह स्मैभ्यः कामानागायति ॥१०२.१३।
स+ ह स्म+ एभ्यः कामान् आगायति ॥१०२.१३।
आगाता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ।
आगाता ह वै कामानां+ भवति य+ एतद्+ एवं+ विद्वान् अ-क्षरम् उद्गीथम् उपास्ते ।
इत्यध्यात्मम् ।।१०२.१४।
इत्य्+ अध्य्-आत्मम् ॥१०२.१४।
1.3
अथाधि (दैवम् S देवतम् )।
अथ+ अधि-(दैवम् S देवतम् ) ।
य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीत ।
य एव+ असौ तपति तम् उद्गीथम् उपासीत ।
उद्यन्वाऐ एष प्रजाभ्य उद्गायति ।
उद्यन् वाऐ+ एष+ प्रजाभ्य+ उद्गायति ।
उद्यंस्तमो भयमपहन्ति ।
उद्यंस्+ तमो+ भयम् अपहन्ति ।
अपहन्ता ह वै भयस्य तमसो भवति य एवं वेद ॥१०३.१।
अपहन्ता ह वै भयस्य तमसो+ भवति य+ एवं+ वेद ॥१०३.१।
समान उ एवायं चासौ च ।
समान+ उ एव+ अयं+ च+ असौ च ।
उष्णो &यमुष्णो &सौ ।
उष्णो+ + अयम् उष्णो+ + असौ ।
स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति प्रत्यास्वर इत्यमुम् ।
स्वर+ इति+ इमम् आचक्षते स्वर+ इति प्रत्यास्वर+ इत्य्+ अमुम् ।
तस्माद्वाऐ एतमिमममुं च उद्गीथमुपासीत ॥१०३.२।
तस्माद्+ वाऐ+ एतम् इमम् अमुं+ च उद्गीथम् उपासीत ॥१०३.२।
अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत ।
अथ खलु व्यानम् एव+ उद्गीथम् उपासीत ।
यद्वै प्राणिति स प्राणः ।
यद्+ वै प्राणिति स+ प्राणः ।
यदपानिति सो &पानः ।
यद्+ अपानिति सो+ + अपानः ।
अथ यः प्राणापानयोः संधिः स व्यानः ।
अथ यः प्राण-अपानयोः संधिः स+ व्यानः ।
यो व्यानः सा वाक् ।
यो+ व्यानः सा वाक् ।
तस्मादप्राणन्ननपानन्वाचमभिव्याहरति ॥१०३.३।
तस्माद्+ अ-प्राणन्न्+ अन्-अपानन् वाचम् अभिव्याहरति ॥१०३.३।
या वाक्सर्क् ।
या वाक् सा+ ऋक् ।
तस्मादप्राणन्ननपानन्नृचमभ्व्याहरति ।
तस्माद्+ अ-प्राणन्न्+ अन्-अपानन्न्+ ऋचम् अभ्व्याहरति ।
यर्क्तत्साम ।
या+ ऋक् तत् साम ।
तस्मादप्राणन्ननपानन्साम गायति ।
तस्माद्+ अ-प्राणन्न्+ अन्-अपानन् साम गायति ।
यत्साम स उद्गीथः ।
यत् साम स+ उद्गीथः ।
तस्मादप्रानन्ननपानन्नुद्गायति ॥१०३.४।
तस्माद्+ अ-प्रानन्न्+ अन्-अपानन्न्+ उद्गायति ॥१०३.४।
अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथाग्नेर्मन्थनमाजेः सरणं दृढस्य धनुष आयमनमप्राणन्ननपानंस्तानि करोति ।
अतो+ यान्य्+ अन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथा+ अग्नेर्+ मन्थनम् आजेः सरणं+ दृढस्य धनुष+ आयमनम् अ-प्राणन्न्+ अन्-अपानंस्+ तानि करोति ।
एतस्य हेतोर्व्यानमेवोद्गीथमुपासीत ॥१०३.५।
एतस्य हेतोर्+ व्यानम् एव+ उद्गीथम् उपासीत ॥१०३.५।
अथ खलूद्गीथाक्षराण्युपासीत उद् _गी थ इति ।
अथ खलु+ उद्गीथ-अ-क्षराण्य्+ उपासीत उद्_ गी थ इति ।
प्राण एवोत् ।
प्राण+ एव+ उत् ।
प्राणेन ह्युत्तिष्ठति ।
प्राणेन ह्य्+ उत्तिष्ठति ।
वग्गीः ।
वग्+ गीः ।
वाचो ह गिर इत्याचक्षते ।
वाचो+ ह गिर+ इत्य्+ आचक्षते ।
अन्नं थम् ।
अन्नं+ थम् ।
अन्ने हीदं सर्वं स्थितम् ।।१०३.६।
अन्ने हि+ इदं+ सर्वं+ स्थितम् ॥१०३.६।
द्यौरेवोत् ।
द्यौर्+ एव+ उत् ।
अन्तरिक्षं गीः ।
अन्तरिक्षं+ गीः ।
पृथिवी थम् ।
पृथिवी थम् ।
आदित्य एवोत् ।
आदित्य+ एव+ उत् ।
वायुर्गीः ।
वायुर्+ गीः ।
अग्निस्थम् ।
अग्निस्+ थम् ।
सामवेद एवोत् ।
साम-वेद+ एव+ उत् ।
यजुर्वेदो गीः ।
यजुर्-वेदो+ गीः ।
ऋग्वेदस्थम् ।
ऋग्-वेदस्+ थम् ।
दुग्धे अस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहः ।
दुग्धे + अस्मै वाग्+ दोहं+ यो+ वाचो+ दोहः ।
अन्नवानन्नादो भवति ।
अन्नवान् अन्न-अदो+ भवति ।
य एतान्येवं विद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्त उद् _गी थ इति ॥१०३.७।
य+ एतान्य्+ एवं+ विद्वान् उद्गीथ-अ-क्षराण्य्+ उपास्तए+ उद्_ गी थ इति ॥१०३.७।
अथ खल्वाशीः समृद्धिः ।
अथ खल्व्+ आशीः समृद्धिः ।
उपसरणानीत्युपासीत ।
उपसरणानि+ इत्य्+ उपासीत ।
येन साम्ना स्तोष्यन्स्यात्तत्सामोपधावेत् ।।१०३.८।
येन साम्ना स्तोष्यन् स्यात् तत् साम+ उपधावेत् ॥१०३.८।
यस्यामृचि तामृचं ,यदार्षेयं तमृषिं ,यां देवतामभिष्टोष्यन्स्यात्तां देवतामुपधावेत् ।।१०३.९।
यस्याम् ऋचि ताम् ऋचं+ , यद्+ आर्षेयं+ तम् ऋषिं+ , यां+ देवताम् अभिष्टोष्यन् स्यात् तां+ देवताम् उपधावेत् ॥१०३.९।
येन च्छन्दसा स्तोष्यन्स्यात्तच्छन्द उपधावेत् ।
येन + च्छन्दसा स्तोष्यन् स्यात् तच्+ छन्द+ उपधावेत् ।
येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात्तं स्तोममुपधावेत् ।।१०३.१०।
येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात् तं+ स्तोमम् उपधावेत् ॥१०३.१०।
यां दिशमभिष्टोष्यन्स्यात्तां दिशमुपधावेत् ।।१०३.११।
यां+ दिशम् अभिष्टोष्यन् स्यात् तां+ दिशम् उपधावेत् ॥१०३.११।
आत्मानमन्तत उपसृत्य स्तुवीत कामं ध्यायन्नप्रमत्तः ।
आत्मानम् अन्तत+ उपसृत्य स्तुवीत कामं+ ध्यायन्न्+ अ-प्रमत्तः ।
अभ्याशो ह यदस्मै स कामः स्मृध्येत यत्कामः स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥१०३.१२।
अभ्याशो+ ह यद्+ अस्मै स+ कामः स्मृध्येत यत्-कामः स्तुवीत+ इति यत्-कामः स्तुवीत+ इति ॥१०३.१२।
1.4
ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत ।
ओम् इत्य्+ एतद्+ अ-क्षरम् उद्गीथम् उपासीत ।
ओमिति ह्युद्गायति ।
ओम् इति ह्य्+ उद्गायति ।
तस्योपव्याख्यानम् ।।१०४.१।
तस्य+ उपव्याख्यानम् ॥१०४.१।
देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशन् ।
देवा+ वै मृत्योर्+ बिभ्यतस्+ त्रयीं+ विद्यां+ प्राविशन् ।
ते छन्दोभिरच्छादयन् ।
ते छन्दोभिर्+ अच्छादयन् ।
यदेभिरच्छादयंस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् ।।१०४.२।
यद्+ एभिर्+ अच्छादयंस्+ तच्+ छन्दसां+ छन्दस्त्वम् ॥१०४.२।
तानु तत्र मृत्युर्यथा मत्स्यमुदके परिपश्येदेवं पर्यपश्यदृचि साम्नि यजुषि ।
तान् उ तत्र मृत्युर्+ यथा मत्स्यम् उदके परिपश्येद्+ एवं+ पर्यपश्यद्+ ऋचि साम्नि यजुषि ।
ते नु (वित्त्वोर्ध्वा S विदित्वोर्ध्वा )ऋचः साम्नो यजुषः स्वरमेव प्राविशन् ।।१०४.३।
ते नु (वित्त्वा+ उर्ध्वा+ S विदित्वा+ ऊर्ध्वा+ ) ऋचः साम्नो+ यजुषः स्वरम् एव प्राविशन् ॥१०४.३।
यदा वाऐ ऋचम् (आप्नोत्य् S समाप्नोति )ओमित्येवातिस्वरति एवं सामैवं यजुः ।
यदा वाऐ+ ऋचम् (आप्नोत्य्+ S समाप्नोति ) ओम् इत्य्+ एव+ अतिस्वरति एवं+ साम+ एवं+ यजुः ।
एष उ स्वरो यदेतदक्षरमेतदमृतमभयम् ।
एष+ उ स्वरो+ यद्+ एतद्+ अ-क्षरम् एतद्+ अ-मृतम् अ-भयम् ।
तत्प्रविश्य देवा अमृता अभवन् ।।१०४.४।
तत् प्रविश्य देवा+ अ-मृता+ अभवन् ॥१०४.४।
स य एतदेवं विद्वानक्षरं प्रणौत्येतदेवाक्षरं स्वरममृतमभयं प्रविशति ।
स+ य+ एतद्+ एवं+ विद्वान् अ-क्षरं+ प्रणौत्य्+ एतद्+ एव+ अ-क्षरं+ स्वरम् अ-मृतम् अ-भयं+ प्रविशति ।
तत्प्रविश्य यदमृता देवास्तदमृतो भवति ॥१०४.५।
तत् प्रविश्य यद्+ अ-मृता देवास्+ तद्+ अ-मृतो+ भवति ॥१०४.५।
1.5
अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इति ।
अथ खलु य+ उद्गीथः स+ प्रणवो+ यः प्रणवः स+ उद्गीथ+ इति ।
असौ वाऐ आदित्य उद्गीथ एष प्रणवः ।
असौ वाऐ+ आदित्य+ उद्गीथ+ एष+ प्रणवः ।
ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥१०५.१।
ओम् इति ह्य्+ एष+ स्वरन्न्+ एति ॥१०५.१।
एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेको &सीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच ।
एतम् उ एव+ अहम् अभ्यगासिषं+ तस्मान्+ मम त्वम् एको+ + असि+ इति ह कौषीतकिः पुत्रम् उवाच ।
रश्मींस्त्वं (पर्यावर्तयात् S पर्यावर्तयतात् )।
रश्मींस्+ त्वं+ (पर्यावर्तयात् S पर्यावर्तयतात् ) ।
बहवो वै ते भविष्यन्ति ।
बहवो+ वै ते भविष्यन्ति ।
इत्यधि (दैवतम् S देवतम् )॥१०५.२।
इत्य्+ अधि-(दैवतम् S देवतम् ) ॥१०५.२।
अथाध्यात्मम् ।
अथ+ अध्य्-आत्मम् ।
य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासित ।
य+ एव+ अयं+ मुख्यः प्राणस्+ तम् उद्गीथम् उपासित ।
ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥१०५.३।
ओम् इति ह्य्+ एष+ स्वरन्न्+ एति ॥१०५.३।
एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेको असीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच ।
एतम् उ एव+ अहम् अभ्यगासिषं+ तस्मान्+ मम त्वम् एको+ असि+ इति ह कौषीतकिः पुत्रम् उवाच ।
(प्राणांस् S प्राणं )त्वं भूमानमभिगायताद्बहवो वै ( मे S ते )भविष्यन्तीति ॥१०५.४।
(प्राणांस्+ S प्राणं+ ) त्वं+ भूमानम् अभिगायताद्+ बहवो+ वै ( मे S ते ) भविष्यन्ति+ इति ॥१०५.४।
अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इति ।
अथ खलु य+ उद्गीथः स+ प्रणवो+ यः प्रणवः स+ उद्गीथ+ इति ।
होतृषदनाद्ध एवापि दुरुद्गीथम् (अनुसमाहरतीत्यनुसमाहरतीति S अनुसमाहरति अनुसमाहरति )॥१०५.५।
होतृ-षदनाद्+ + ध एव+ अपि दुर्-उद्गीथम् (अनुसमाहरति+ इत्य्+ अनुसमाहरति+ इति S अनुसमाहरति अनुसमाहरति ) ॥१०५.५।
1.6
इयमेवर्क् ।
इयम् एव+ ऋक् ।
अग्निः साम ।
अग्निः साम ।
तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम ।
तद्+ एतद्+ एतस्याम् ऋच्य्+ अध्यूढं+ साम ।
तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते ।
तस्माद्+ ऋच्य्+ अध्यूढं+ साम गीयते ।
इयमेव सा ।
इयम् एव सा ।
अग्निरमः ।
अग्निर्+ अमः ।
तत्साम ॥१०६.१।
तत् साम ॥१०६.१।
अन्तरिक्षमेवर्क् ।
अन्तरिक्षम् एव+ ऋक् ।
वायुः साम ।
वायुः साम ।
तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम ।
तद्+ एतद्+ एतस्याम् ऋच्य्+ अध्यूढं+ साम ।
तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते ।
तस्माद्+ ऋच्य्+ अध्यूढं+ साम गीयते ।
अन्तरिक्षमेव सा ।
अन्तरिक्षम् एव सा ।
वायुरमः ।
वायुर्+ अमः ।
तत्साम ॥१०६.२।
तत् साम ॥१०६.२।
द्यौरेवर्क् ।
द्यौर्+ एव+ ऋक् ।
आदित्यः साम ।
आदित्यः साम ।
तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम ।
तद्+ एतद्+ एतस्याम् ऋच्य्+ अध्यूढं+ साम ।
तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते ।
तस्माद्+ ऋच्य्+ अध्यूढं+ साम गीयते ।
द्यौरेव सा ।
द्यौर्+ एव सा ।
आदित्यो &मः ।
आदित्यो+ + अमः ।
तत्साम ॥१०६.३।
तत् साम ॥१०६.३।
नक्षत्रान्येवर्क् ।
नक्षत्रान्य्+ एव+ ऋक् ।
चन्द्रमाः साम ।
चन्द्र-माः साम ।
तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम ।
तद्+ एतद्+ एतस्याम् ऋच्य्+ अध्यूढं+ साम ।
तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते ।
तस्माद्+ ऋच्य्+ अध्यूढं+ साम गीयते ।
नक्षत्राण्येव सा ।
नक्षत्राण्य्+ एव सा ।
चन्द्रमा अमः ।
चन्द्र-मा+ अमः ।
तत्साम ॥१०६.४।
तत् साम ॥१०६.४।
अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैवर्क् ।
अथ यद्+ एतद्+ आदित्यस्य शुक्लं+ भाः सा+ एव+ ऋक् ।
अथ यन्नीलं परःकृष्णं तत्साम ।
अथ यन्+ नीलं+ परः-कृष्णं+ तत् साम ।
तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम ।
तद्+ एतद्+ एतस्याम् ऋच्य्+ अध्यूढं+ साम ।
तस्मदृच्यध्यूढं साम गीयते ॥१०६.५।
तस्मद्+ ऋच्य्+ अध्यूढं+ साम गीयते ॥१०६.५।
अथ यदेवैतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव सा ।
अथ यद्+ एव+ एतद्+ आदित्यस्य शुक्लं+ भाः सा+ एव सा ।
अथ यन्नीलं परःकृष्णं तदमः ।
अथ यन्+ नीलं+ परः-कृष्णं+ तद्+ अमः ।
तत्साम ।
तत् साम ।
अथ य एषो अन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आ (प्रणखात् S प्रनखात् )सर्व एव सुवर्नः ॥१०६.६।
अथ य+ एषो+ अन्तर्-आदित्ये हिरण्मयः पुरुषो+ दृश्यते हिरण्य-श्मश्रुर्+ हिरण्य-केश+ आ (प्रणखात् S प्रनखात् ) सर्व+ एव सु-वर्नः ॥१०६.६।
तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी ।
तस्य यथा कप्यासं+ पुण्डरीकम् एवम् अक्षिणी ।
तस्योदिति नाम ।
तस्य+ उद्+ इति नाम ।
स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः ।
स+ एष+ सर्वेभ्यः पाप्मभ्य+ उदितः ।
उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद ॥१०६.७।
उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो+ य+ एवं+ वेद ॥१०६.७।
तस्यर्क्च साम च गेष्णौ ।
तस्य+ ऋक् च साम च गेष्णौ ।
तस्मादुद्गीथः ।
तस्माद्+ उद्गीथः ।
तस्मात्त्वेव उद्गाता ।
तस्मात् त्व्+ एव उद्गाता ।
एतस्य हि गाता ।
एतस्य हि गाता ।
स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्ट देवकामानां च ।
स+ एष+ ये च+ अमुष्मात् पराञ्चो+ लोकास्+ तेषां+ च+ ईष्टए+ देव-कामानां+ च ।
इत्यधि (दैवतम् S देवतम् )॥१०६.८।
इत्य्+ अधि-(दैवतम् S देवतम् ) ॥१०६.८।
1.7
अथाध्यात्मम् ।
अथ+ अध्य्-आत्मम् ।
वागेवर्क् ।
वाग्+ एव+ ऋक् ।
प्राणः साम ।
प्राणः साम ।
तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम ।
तद्+ एतद्+ एतस्याम् ऋच्य्+ अध्यूढं+ साम ।
तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते ।
तस्माद्+ ऋच्य्+ अध्यूढं+ साम गीयते ।
वागेव सा ।
वाग्+ एव सा ।
प्राणो &मः ।
प्राणो+ + अमः ।
तत्साम ॥१०७.१।
तत् साम ॥१०७.१।
चक्षुरेवर्क् ।
चक्षुर्+ एव+ ऋक् ।
आत्मा साम ।
आत्मा साम ।
तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम ।
तद्+ एतद्+ एतस्याम् ऋच्य्+ अध्यूढं+ साम ।
तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते ।
तस्माद्+ ऋच्य्+ अध्यूढं+ साम गीयते ।
चक्षुरेव सा ।
चक्षुर्+ एव सा ।
आत्मामः ।
आत्मा+ अमः ।
तत्साम ॥१०७.२।
तत् साम ॥१०७.२।
श्रोत्रमेवर्क् ।
श्रोत्रम् एव+ ऋक् ।
मनः सआम ।
मनः सआम ।
तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम ।
तद्+ एतद्+ एतस्याम् ऋच्य्+ अध्यूढं+ साम ।
तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते ।
तस्माद्+ ऋच्य्+ अध्यूढं+ साम गीयते ।
श्रोत्रमेव सा ।
श्रोत्रम् एव सा ।
मनो &मः ।
मनो+ + अमः ।
तत्साम ॥१०७.३।
तत् साम ॥१०७.३।
अथ यदेतदक्ष्नः शुक्लं भाः सैवर्क् ।
अथ यद्+ एतद्+ अक्ष्नः शुक्लं+ भाः सा+ एव+ ऋक् ।
अथ यन्नीलं परःकृष्णं तत्साम ।
अथ यन्+ नीलं+ परः-कृष्णं+ तत् साम ।
तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम ।
तद्+ एतद्+ एतस्याम् ऋच्य्+ अध्यूढं+ साम ।
तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते ।
तस्माद्+ ऋच्य्+ अध्यूढं+ साम गीयते ।
अथ यदेवैतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैव सा ।
अथ यद्+ एव+ एतद्+ अक्ष्णः शुक्लं+ भाः सा+ एव सा ।
अथ यन्नीलं परःकृष्णं तदमः ।
अथ यन्+ नीलं+ परः-कृष्णं+ तद्+ अमः ।
तत्साम ॥१०७.४।
तत् साम ॥१०७.४।
अथ य एषो (अन्तरक्षिणि S अन्तरक्षणि )पुरुषो दृश्यते सैवर्क् ।
अथ य+ एषो+ (+ अन्तर्+ अक्षिणि S + अन्तर्-अक्षणि ) पुरुषो+ दृश्यते सा+ एव+ ऋक् ।
तत्साम ।
तत् साम ।
तदुक्थम् ।
तद्+ उक्थम् ।
तद्यजुः ।
तद्+ यजुः ।
तद्ब्रह्म ।
तद्+ ब्रह्म ।
तस्य एतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपम् ।
तस्य एतस्य तद्+ एव रूपं+ यद्+ अमुष्य रूपम् ।
यावमुष्य गेष्णौ तौ तौ गोष्णौ ।
याव्+ अमुष्य गेष्णौ तौ तौ गोष्णौ ।
यन्नाम तन्नाम ॥१०७.५।
यन्+ नाम तन्+ नाम ॥१०७.५।
स एष ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां (चेति S च )।
स+ एष+ ये च+ एतस्माद्+ अर्वाञ्चो+ लोकास्+ तेषां+ च+ ईष्टे मनुष्य-कामानां+ (च+ इति S च ) ।
तद्य इमे वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति ।
तद्+ यए+ इमे वीणायां+ गायन्त्य्+ एतं+ ते गायन्ति ।
तस्मात्ते धनसनयः ॥१०७.६।
तस्मात् ते धन-सनयः ॥१०७.६।
अथ य एतदेवं विद्वान्साम गायत्युभौ स गायति ।
अथ य+ एतद्+ एवं+ विद्वान् साम गायत्य्+ उभौ स+ गायति ।
सो &मुनैव (( S स एष S ))ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति देवकामांश्च ॥१०७.७।
सो+ + अमुना+ एव (( S स+ एष+ S ))ये च+ अमुष्मात् पराञ्चो+ लोकास्+ तांश्+ च+ आप्नोति देव-कामांश्+ च ॥१०७.७।
अथानेनैव ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति मनुष्यकामांश्च ।
अथ+ अनेन+ एव ये च+ एतस्माद्+ अर्वाञ्चो+ लोकास्+ तांश्+ च+ आप्नोति मनुष्य-कामांश्+ च ।
तस्मादु हैवंविदुद्गाता ब्रूयात् ।।१०७.८।
तस्माद्+ उ ह+ एवं-विद्+ उद्गाता ब्रूयात् ॥१०७.८।
कं ते काममागायानीति ।
कं+ ते कामम् आगायानि+ इति ।
एष ह्येव कामागानस्येष्टे य एवं विद्वान्साम गायति साम गायति ॥१०७.९।
एष+ ह्य्+ एव काम-आगानस्य+ ईष्टे य+ एवं+ विद्वान् साम गायति साम गायति ॥१०७.९।
1.8
त्रयो होद्गीथे कुशला बभूवुः शिलकः शालावत्यश्चैकितायनो दाल्भ्यः प्रवाहणो जैवलिरिति ।
त्रयो+ ह+ उद्गीथे कुशला+ बभूवुः शिलकः शालावत्यश्+ चैकितायनो+ दाल्भ्यः प्रवाहणो+ जैवलिर्+ इति ।
ते होचुरुद्गीथे वै कुशलाः स्मो हन्तोद्गीथे कथां (वदाम इति S वदामेति )॥१०८.१।
ते ह+ ऊचुर्+ उद्गीथे वै कुशलाः स्मो+ हन्त+ उद्गीथे कथां+ (वदाम+ इति S वदाम+ इति ) ॥१०८.१।
तथेति ह समुपविविशुः ।
तथा+ इति ह समुपविविशुः ।
स ह प्रावहणो जैवलिरुवाच ।
स+ ह प्रावहणो+ जैवलिर्+ उवाच ।
भगवन्तावग्रे वदताम् ।
भगवन्ताव्+ अग्रे वदताम् ।
भ्रामणयोर्वदतोर्वाचं श्रोष्यामीति ॥१०८.२।
भ्रामणयोर्+ वदतोर्+ वाचं+ श्रोष्यामि+ इति ॥१०८.२।
स ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच हन्त त्वा पृच्छानीति ।
स+ ह शिलकः शालावत्यश्+ चैकितायनं+ दाल्भ्यम् उवाच हन्त त्वा पृच्छानि+ इति ।
पृच्छेति होवाच ॥१०८.३।
पृच्छ+ इति ह+ उवाच ॥१०८.३।
का साम्नो गतिरिति ।
का साम्नो+ गतिर्+ इति ।
स्वर इति होवाच ।
स्वर+ इति ह+ उवाच ।
स्वरस्य का गतिरिति ।
स्वरस्य का गतिर्+ इति ।
प्राण इति होवाच ।
प्राण+ इति ह+ उवाच ।
अन्नस्य का गतिरिति ।
अन्नस्य का गतिर्+ इति ।
अन्नमिति होवाच ।
अन्नम् इति ह+ उवाच ।
अन्नस्य का गतिरिति ।
अन्नस्य का गतिर्+ इति ।
आप इति होवाच ॥१०८.४।
आप+ इति ह+ उवाच ॥१०८.४।
अपां का गतिरिति ।
अपां+ का गतिर्+ इति ।
असौ लोक इति होवाच ।
असौ लोक+ इति ह+ उवाच ।
अमुष्य लोकस्य का गतिरिति ।
अमुष्य लोकस्य का गतिर्+ इति ।
न स्वर्गं लोकम् (अतिनयेद् S अति नयेद् )इति होवाच ।
न स्वर्गं+ लोकम् (अतिनयेद्+ S अति नयेद्+ ) इति ह+ उवाच ।
स्वर्गं वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः ।
स्वर्गं+ वयं+ लोकं+ साम+ अभिसंस्थापयामः ।
स्वर्गसंस्तावं हि सामेति ॥१०८.५।
स्वर्ग-संस्तावं+ हि साम+ इति ॥१०८.५।
तं ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य साम ।
तं+ ह शिलकः शालावत्यश्+ चैकितायनं+ दाल्भ्यम् उवाच+ अ-प्रतिष्ठितं+ वै किल ते दाल्भ्य साम ।
यस् (त्वेतर्हि S त्वैतर्हि )ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति ॥१०८.६।
यस्+ (त्व्+ एतर्हि S त्वा+ एतर्हि ) ब्रूयान्+ मूर्धा ते विपतिष्यति+ इति मूर्धा ते विपतेद्+ इति ॥१०८.६।
हन्ताहमेतद् (भगवतो S भगवत्तो )वेदानीति ।
हन्त+ अहम् एतद्+ (भगवतो+ S भगवत्तो+ ) वेदानि+ इति ।
विद्धीति होवाच ।
विद्धि+ इति ह+ उवाच ।
अमुष्य लोकस्य का गतिरिति ।
अमुष्य लोकस्य का गतिर्+ इति ।
अयं लोक इति होवाच ।
अयं+ लोक+ इति ह+ उवाच ।
अस्य लोकस्य का गतिरिति ।
अस्य लोकस्य का गतिर्+ इति ।
न प्रतिष्ठां लोकम् (अतिनयेद् S अति नयेद् )इति होवाच ।
न प्रतिष्ठां+ लोकम् (अतिनयेद्+ S अति नयेद्+ ) इति ह+ उवाच ।
प्रतिष्ठां वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः ।
प्रतिष्ठां+ वयं+ लोकं+ साम+ अभिसंस्थापयामः ।
प्रतिष्ठासंस्तावं हि सामेति ॥१०८.७।
प्रतिष्ठा-संस्तावं+ हि साम+ इति ॥१०८.७।
तं ह प्रवाहणो जैवलिरुवाच ।
तं+ ह प्रवाहणो+ जैवलिर्+ उवाच ।
अन्तवद्वै किल ते शालावत्य साम ।
अन्तवद्+ वै किल ते शालावत्य साम ।
यस् (त्वेतर्हि S त्वैतर्हि )ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति ।
यस्+ (त्व्+ एतर्हि S त्वा+ एतर्हि ) ब्रूयान्+ मूर्धा ते विपतिष्यति+ इति मूर्धा ते विपतेद्+ इति ।
हन्ताहमेतद् (भगवतो S भगवत्तो )वेदानीति ।
हन्त+ अहम् एतद्+ (भगवतो+ S भगवत्तो+ ) वेदानि+ इति ।
विद्धीति होवाच ॥१०८.८।
विद्धि+ इति ह+ उवाच ॥१०८.८।
1.9
अस्य लोकस्य का गतिरिति ।
अस्य लोकस्य का गतिर्+ इति ।
आकाश इति होवाच ।
आकाश+ इति ह+ उवाच ।
सर्वाणि ह वाऐ इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते ।
सर्वाणि ह वाऐ+ इमानि भूतान्य्+ आकाशाद्+ एव समुत्पद्यन्ते ।
आकाशं प्रत्यस्तं यन्ति ।
आकाशं+ प्रत्य्+ अस्तं+ यन्ति ।
आकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायान् ।
आकाशो+ ह्य्+ एव+ एभ्यो+ ज्यायान् ।
आकाशः परायणम् ।।१०९.१।
आकाशः पर-अयणम् ॥१०९.१।
स एष परोवरीयानुद्गीथः ।
स+ एष+ परो-वरीयान् उद्गीथः ।
स एषो &नन्तः ।
स+ एषो+ + अन्-अन्तः ।
परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वान्परोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते ॥१०९.२।
परो-वरीयो+ ह+ अस्य भवति परो-वरीयसो+ ह लोकाञ्+ जयति य+ एतद्+ एवं+ विद्वान् परो-वरीयांसम् उद्गीथम् उपास्ते ॥१०९.२।
तं हैतमतिधन्वा शौनक उदरशाण्डिल्यायोक्त्वोवाच ।
तं+ ह+ एतम् अति-धन्वा शौनक+ उदर-शाण्डिल्याय+ उक्त्वा+ उवाच ।
यावत्त एनं प्रजायामुद्गीथं वेदिष्यन्ते परोवरीयो (हैभ्यस् S ह्येभ्यस् )तावदस्मिंल्लोके जीवनं भविष्यति ॥१०९.३।
यावत् तए+ एनं+ प्रजायाम् उद्गीथं+ वेदिष्यन्ते परो-वरीयो+ (ह+ एभ्यस्+ S ह्य्+ एभ्यस्+ ) तावद्+ अस्मिंल्+ लोके जीवनं+ भविष्यति ॥१०९.३।
तथामुष्मिंल्लोके लोक इति ।
तथा+ अमुष्मिंल्+ लोके लोक+ इति ।
स य एतम् (एव S एवं )विद्वानुपास्ते परोवरीय एव ( हास्यामुष्मिंल् S हास्य अस्मिंल् )लोके जीवनं भवति तथामुष्मिंल्लोके लोक इति लोके लोक इति ॥१०९.४।
स+ य+ एतम् (एव S एवं+ ) विद्वान् उपास्ते परो-वरीय+ एव ( ह+ अस्य+ अमुष्मिंल्+ S ह+ अस्य अस्मिंल्+ ) लोके जीवनं+ भवति तथा+ अमुष्मिंल्+ लोके लोक+ इति लोके लोक इति ॥१०९.४।
1.10
मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या सह जाययोषस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास ॥११०.१।
मटची-हतेषु कुरुष्व्+ आटिक्या सह जायया+ उषस्तिर्+ ह चाक्रायण+ इभ्य-ग्रामे प्रद्राणक+ उवास ॥११०.१।
स हेभ्यं कुल्माषान्खादन्तं बिभिक्षे ।
स+ ह+ इभ्यं+ कुल्माषान् खादन्तं+ बिभिक्षे ।
तं होवाच ।
तं+ ह+ उवाच ।
नेतो &न्ये विद्यन्ते यच् (चये S च ये )म इम उपनिहिता इति ॥११०.२।
न+ इतो+ + अन्ये विद्यन्ते यच्+ (चये S च ये ) मए+ इमए+ उपनिहिता+ इति ॥११०.२।
एतेषां मे देहीति होवाच ।
एतेषां+ मे देहि+ इति ह+ उवाच ।
तानस्मै प्रददौ ।
तान् अस्मै प्रददौ ।
हन्तानुपानमिति ।
हन्त+ अनुपानम् इति ।
उच्छिष्टं वै मे पीतं स्यादिति होवाच ॥११०.३।
उच्छिष्टं+ वै मे पीतं+ स्याद्+ इति ह+ उवाच ॥११०.३।
न स्विदेते अप्युच्छिष्टा इति ।
न स्विद् एते + अप्य्+ उच्छिष्टा+ इति ।
न वाऐ अजीविष्यमिमानखादन्निति होवाच ।
न वाऐ+ अजीविष्यम् इमान् अ-खादन्न्+ इति ह+ उवाच ।
कामो म उदपानमिति ॥११०.४।
कामो+ मए+ उद-पानम् इति ॥११०.४।
स ह खादित्वातिशेषाञ्जायायाऐ आजहार ।
स+ ह खादित्वा+ अति-शेषाञ्+ जायायाऐ+ आजहार ।
साग्र एव सुभिक्षा बभूव ।
सा+ अग्रए+ एव सु-भिक्षा बभूव ।
तान्प्रतिगृह्य निदधौ ॥११०.५।
तान् प्रतिगृह्य निदधौ ॥११०.५।
स ह प्रातः संजिहान उवाच ।
स+ ह प्रातः संजिहान+ उवाच ।
यद्बतान्नस्य लभेमहि लभेमहि धनमात्राम् ।
यद्+ बत+ अन्नस्य लभेमहि लभेमहि धन-मात्राम् ।
राजासौ यक्ष्यते ।
राजा+ असौ यक्ष्यते ।
स मा सर्वैरार्त्विज्यैर्वृणीतेति ॥११०.६।
स+ मा सर्वैर्+ आर्त्विज्यैर्+ वृणीत+ इति ॥११०.६।
तं जायोवाच ।
तं+ जाया+ उवाच ।
हन्त पत इम एव कुल्माषा इति ।
हन्त पतए+ इमए+ एव कुल्माषा+ इति ।
तान्खादित्वामुं यज्ञं विततमेयाय ॥११०.७।
तान् खादित्वा+ अमुं+ यज्ञं+ विततम् एयाय ॥११०.७।
तत्रोद्गातॄनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोपविवेश ।
तत्र+ उद्गातॄन् आस्तावे स्तोष्यमाणान् उपोपविवेश ।
स ह प्रस्तोतरमुवाच ॥११०.८।
स+ ह प्रस्तोतरम् उवाच ॥११०.८।
प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ॥११०.९।
प्रस्तोतर्+ या देवता प्रस्तावम् अन्वायत्ता तां+ चेद्+ अ-विद्वान् प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यति+ इति ॥११०.९।
एवमेवोद्गातारमुवाच ।
एवम् एव+ उद्गातारम् उवाच ।
उद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ।।११०.१०।एवमेव प्रतिहर्तारमुवाच ।
उद्गातर्+ या देवता+ उद्गीथम् अन्वायत्ता तां+ चेद्+ अ-विद्वान् उद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यति+ इति ॥११०.१०। एवम् एव प्रतिहर्तारम् उवाच ।
प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ।
प्रतिहर्तर्+ या देवता प्रतिहारम् अन्वायत्ता तां+ चेद्+ अ-विद्वान् प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यति+ इति ।
ते ह समारतास्तूष्णीमासां चक्रिरे ॥११०.११।
ते ह समारतास्+ तूष्णीम् आसां+ चक्रिरे ॥११०.११।
1.11
अथ हैनं यजमान उवाच ।
अथ ह+ एनं+ यजमान+ उवाच ।
भगवन्तं वाऐ अहं विविदिषाणीति ।
भगवन्तं+ वाऐ+ अहं+ विविदिषाणि+ इति ।
उषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच ॥१११.१।
उषस्तिर्+ अस्मि चाक्रायण+ इति ह+ उवाच ॥१११.१।
स होवाच ।
स+ ह+ उवाच ।
भगवन्तं वाऐ अहमेभिः सर्वैरार्त्विज्यैः पर्यैषिषम् ।
भगवन्तं+ वाऐ+ अहम् एभिः सर्वैर्+ आर्त्विज्यैः पर्यैषिषम् ।
भगवतो वाऐ अहमवित्त्यान्यानवृषि ॥१११.२।
भगवतो+ वाऐ+ अहम् अ-वित्त्या+ अन्यान् अवृषि ॥१११.२।
भगवांस्त्वेव मे सर्वैरार्त्विज्यैरिति ।
भगवांस्+ त्व्+ एव मे सर्वैर्+ आर्त्विज्यैर्+ इति ।
तथेति ।
तथा+ इति ।
अथ तर्ह्येत एव समतिसृष्टाः स्तुवताम् ।
अथ तर्ह्य्+ एतए+ एव समतिसृष्टाः स्तुवताम् ।
यावत्त्वेभ्यो धनं दद्यास्तावन्मम दद्या इति ।
यावत् त्व्+ एभ्यो+ धनं+ दद्यास्+ तावन्+ मम दद्या+ इति ।
तथेति ह यजमान उवाच ॥१११.३।
तथा+ इति ह यजमान+ उवाच ॥१११.३।
अथ हैनं प्रस्तोतोपससाद ।
अथ ह+ एनं+ प्रस्तोता+ उपससाद ।
प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् ।
प्रस्तोतर्+ या देवता प्रस्तावम् अन्वायत्ता तां+ चेद्+ अ-विद्वान् प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यति+ इति मा भगवान् अवोचत् ।
कतमा सा देवतेति ॥१११.४।
कतमा सा देवता+ इति ॥१११.४।
प्राण इति होवाच ।
प्राण+ इति ह+ उवाच ।
सर्वाणि ह वाऐ इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति ।
सर्वाणि ह वाऐ+ इमानि भूतानि प्राणम् एव+ अभिसंविशन्ति ।
प्राणमभ्युज्जिहते ।
प्राणम् अभ्युज्जिहते ।
सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता ।
सा+ एषा देवता प्रस्तावम् अन्वायत्ता ।
तां चेदविद्वान्प्रास्तोष्यो मूर्धा ते विपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥१११.५।
तां+ चेद्+ अ-विद्वान् प्रास्तोष्यो+ मूर्धा ते विपतिष्यत् तथा+ उक्तस्य मया+ इति ॥१११.५।
अथ हैनमुद्गातोपससाद ।
अथ ह+ एनम् उद्गाता+ उपससाद ।
उद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् ।
उद्गातर्+ या देवता+ उद्गीथम् अन्वायत्ता तां+ चेद्+ अ-विद्वान् उद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यति+ इति मा भगवान् अवोचत् ।
कतमा सा देवता इति ॥१११.६।
कतमा सा देवता+ इति ॥१११.६।
आदित्य इति होवाच ।
आदित्य+ इति ह+ उवाच ।
सर्वाणि ह वाऐ इमानि भूतान्यादित्यमुच्चैः सन्तं गायन्ति ।
सर्वाणि ह वाऐ+ इमानि भूतान्य्+ आदित्यम् उच्चैः सन्तं+ गायन्ति ।
सैषा देवतोद्गीथमन्वायत्ता ।
सा+ एषा देवता+ उद्गीथम् अन्वायत्ता ।
तां चेदविद्वानुदगास्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥१११.७।
तां+ चेद्+ अ-विद्वान् उदगास्यो+ मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथा+ उक्तस्य मया+ इति ॥१११.७।
अथ हैनं प्रतिहर्तोपससाद ।
अथ ह+ एनं+ प्रतिहर्ता+ उपससाद ।
प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् ।
प्रतिहर्तर्+ या देवता प्रतिहारम् अन्वायत्ता तां+ चेद्+ अ-विद्वान् प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यति+ इति मा भगवान् अवोचत् ।
कतमा सा देवतेति ॥१११.८।
कतमा सा देवता+ इति ॥१११.८।
अन्नमिति होवाच ।
अन्नम् इति ह+ उवाच ।
सर्वाणि ह वाऐ इमानि भूतन्यन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति ।
सर्वाणि ह वाऐ+ इमानि भूतन्य्+ अन्नम् एव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति ।
सैषा देवता प्रतिहारमन्वायत्ता ।
सा+ एषा देवता प्रतिहारम् अन्वायत्ता ।
तां चेदविद्वान्प्रत्यहरिष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति तथोक्तस्य मयेति ॥१११.९।
तां+ चेद्+ अ-विद्वान् प्रत्यहरिष्यो+ मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथा+ उक्तस्य मया+ इति तथा+ उक्तस्य मया+ इति ॥१११.९।
8.1
अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरो &स्मिन्नन्तराकासः ।
अथ यद्+ इदम् अस्मिन् ब्रह्म-पुरे दहरं+ पुण्डरीकं+ वेश्म दहरो+ + अस्मिन्न्+ अन्तर्-आकासः ।
तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥८०१.१।
तस्मिन् यद्+ अन्तस्+ तद्+ अन्वेष्टव्यं+ तद्+ वाव विजिज्ञासितव्यम् इति ॥८०१.१।
तं चेद्ब्रूयुर्यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरो अस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ।
तं+ चेद्+ ब्रूयुर्+ यद्+ इदम् अस्मिन् ब्रह्म-पुरे दहरं+ पुण्डरीकं+ वेश्म दहरो + अस्मिन्न्+ अन्तर्-आकाशः किं+ तद्+ अत्र विद्यते यद्+ अन्वेष्टव्यं+ यद्+ वाव विजिज्ञासितव्यम् इति ।
स ब्रूयात् ।।८०१.२।
स+ ब्रूयात् ॥८०१.२।
यावान्वाऐ अयमाकाशस्तावानेषो &न्तर्हृदय आकाशः ।
यावान् वाऐ+ अयम् आकाशस्+ तावान् एषो+ + अन्तर्-हृदयए+ आकाशः ।
उभे अस्मिन्द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते ।
उभे अस्मिन् द्यावा-पृथिवी अन्तर् एव समाहिते ।
उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि ।
उभाव्+ अग्निश्+ च वायुश्+ च सूर्या-चन्द्रमसाव्+ उभौ विद्युन्+ नक्षत्राणि ।
यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन्समाहितमिति ॥८०१.३।
यच्+ च+ अस्य+ इह+ अस्ति यच्+ च न+ अस्ति सर्वं+ तद्+ अस्मिन् समाहितम् इति ॥८०१.३।
तं चेद्ब्रूयुरस्मिंश्चेदं ब्रह्मपुरे सर्वं समाहितं सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामा यदेनज्जरा वाप्नोति प्रध्वंसते वा किं ततो &तिशिष्यत इति ॥८०१.४।
तं+ चेद्+ ब्रूयुर्+ अस्मिंश्+ च+ इदं+ ब्रह्म-पुरे सर्वं+ समाहितं+ सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामा+ यद्+ एनज्+ जरा वा+ आप्नोति प्रध्वंसते वा किं+ ततो+ + अतिशिष्यतए+ इति ॥८०१.४।
स ब्रूयात् ।
स+ ब्रूयात् ।
नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यते ।
न+ अस्य जरया+ एतज्+ जीर्यति न वधेन+ अस्य हन्यते ।
एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन्कामाः समाहिताः ।
एतत् सत्यं+ ब्रह्म-पुरम् अस्मिन् कामाः समाहिताः ।
एष आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सो &पिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः ।
एष+ आत्मा+ अपहत-पाप्मा वि-जरो+ वि-मृत्युर्+ वि-शोको+ वि-जिघत्सो+ + अ-पिपासः सत्य-कामः सत्य-संकल्पः ।
यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनम् ।
यथा ह्य्+ एव+ इह प्रजा+ अन्वाविशन्ति यथा+ अनुशासनम् ।
यं यमन्तमभिकामा भवन्ति यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति ॥८०१.५।
यं+ यम् अन्तम् अभिकामा+ भवन्ति यं+ जन-पदं+ यं+ क्षेत्र-भागं+ तं+ तम् एव+ उपजीवन्ति ॥८०१.५।
तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते ।
तद्+ यथा+ इह कर्म-जितो+ लोकः क्षीयतए+ एवम् एव+ अमुत्र पुण्य-जितो+ लोकः क्षीयते ।
तद्य इहात्मानमननुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान्कामांस्तेषां सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति ।
तद्+ यए+ इह+ आत्मानम् अन्-अनुविद्य व्रजन्त्य्+ एतांश्+ च सत्यान् कामांस्+ तेषां+ सर्वेषु लोकेष्व्+ अ-काम-चारो+ भवति ।
अथ य इहात्मानमनिवुद्य व्रजन्त्येतंश्च सत्यान्कामांस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥८०१.६।
अथ यए+ इह+ आत्मानम् अनिवुद्य व्रजन्त्य्+ एतंश्+ च सत्यान् कामांस्+ तेषां+ सर्वेषु लोकेषु काम-चारो+ भवति ॥८०१.६।
8.2
स यदि पितृलोककामो भवति ।
स+ यदि पितृ-लोक-कामो+ भवति ।
संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति ।
संकल्पाद्+ एव+ अस्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति ।
तेन पितृलोकेन संपन्नो महीयते ॥८०२.१।
तेन पितृ-लोकेन संपन्नो+ महीयते ॥८०२.१।
अथ यदि मातृलोककामो भवति ।
अथ यदि मातृ-लोक-कामो+ भवति ।
संकल्पादेवास्य मातरः समुत्तिष्ठन्ति ।
संकल्पाद्+ एव+ अस्य मातरः समुत्तिष्ठन्ति ।
तेन मातृलोकेन संपन्नो महीयते ॥८०२.२।
तेन मातृ-लोकेन संपन्नो+ महीयते ॥८०२.२।
अथ यदि भ्रातृलोककामो भवति ।
अथ यदि भ्रातृ-लोक-कामो+ भवति ।
संकल्पादेवास्य भ्रातरः समुत्तिष्ठन्ति ।
संकल्पाद्+ एव+ अस्य भ्रातरः समुत्तिष्ठन्ति ।
तेन भ्रातृलोकेन संपन्नो महीयते ॥८०२.३।
तेन भ्रातृ-लोकेन संपन्नो+ महीयते ॥८०२.३।
अथ यदि स्वसृलोककामो भवति ।
अथ यदि स्वसृ-लोक-कामो भवति ।
संकल्पादेवास्य स्वसारः समुत्तिष्ठन्ति ।
संकल्पाद्+ एव+ अस्य स्वसारः समुत्तिष्ठन्ति ।
तेन स्वसृलोकेन संपन्नो महीयते ॥८०२.४।
तेन स्वसृ-लोकेन संपन्नो+ महीयते ॥८०२.४।
अथ यदि सखिलोककामो भवति ।
अथ यदि सखि-लोक-कामो+ भवति ।
संकल्पादेवास्य सखायः समुत्तिष्ठन्ति ।
संकल्पाद्+ एव+ अस्य सखायः समुत्तिष्ठन्ति ।
तेन सखिलोकेन संपन्नो महीयते ॥८०२.५।
तेन सखि-लोकेन संपन्नो+ महीयते ॥८०२.५।
अथ यदि गन्धमाल्यलोककामो भवति ।
अथ यदि गन्ध-माल्य-लोक-कामो भवति ।
संकल्पादेवास्य गन्धमाल्ये समुत्तिष्ठतः ।
संकल्पाद्+ एव+ अस्य गन्ध-माल्ये समुत्तिष्ठतः ।
तेन गन्धमाल्यलोकेन संपन्नो महीयते ॥८०२.६।
तेन गन्ध-माल्य-लोकेन संपन्नो+ महीयते ॥८०२.६।
अथ यद्यन्नपानलोककामो भवति ।
अथ यद्य्+ अन्न-पान-लोक-कामो भवति ।
संकल्पादेवास्यान्नपाने समुत्तिष्ठतः ।
संकल्पाद्+ एव+ अस्य+ अन्न-पाने समुत्तिष्ठतः ।
तेनान्नपानलोकेन संपन्नो महीयते ॥८०२.७।
तेन+ अन्न-पान-लोकेन संपन्नो+ महीयते ॥८०२.७।
अथ यदि गीतवादितलोककामो भवति ।
अथ यदि गीत-वादित-लोक-कामो भवति ।
संकल्पादेवास्य गीतवादिते समुत्तिष्ठतः ।
संकल्पाद्+ एव+ अस्य गीत-वादिते समुत्तिष्ठतः ।
तेन गीतवादितलोकेन संपन्नो महीयते ॥८०२.८।
तेन गीत-वादित-लोकेन संपन्नो+ महीयते ॥८०२.८।
अथ यदि स्त्रीलोककामो भवति ।
अथ यदि स्त्री-लोक-कामो+ भवति ।
संकल्पादेवास्य स्त्रियः समुत्तिष्ठन्ति ।
संकल्पाद्+ एव+ अस्य स्त्रियः समुत्तिष्ठन्ति ।
तेन स्त्रीलोकेन संपन्नो महीयते ॥८०२.९।
तेन स्त्री-लोकेन संपन्नो+ महीयते ॥८०२.९।
यं यमन्तमभिकामो भवति ।
यं+ यम् अन्तम् अभिकामो भवति ।
यं कामं कामयते ।
यं+ कामं+ कामयते ।
सो &स्य संकल्पादेव समुत्तिष्ठति ।
सो+ + अस्य संकल्पाद्+ एव समुत्तिष्ठति ।
तेन संपन्नो महीयते ॥८०२.१०।
तेन संपन्नो महीयते ॥८०२.१०।
8.3
त इमे सत्याः कामा अनृतापिधानाः ।
तए+ इमे सत्याः कामा+ अन्-ऋत-अपिधानाः ।
तेषां सत्यानां सतामनृतमपिधानम् ।
तेषां+ सत्यानां+ सताम् अन्-ऋतम् अपिधानम् ।
यो यो ह्यस्येतः प्रैति न तमिह दर्शनाय लभते ॥८०३.१।
यो+ यो+ ह्य्+ अस्य+ इतः प्रैति न तम् इह दर्शनाय लभते ॥८०३.१।
अथ ये चास्येह जीवा ये च प्रेता यच्चान्यदिच्छन्न लभते सर्वं तदत्र गत्वा विन्दते ।
अथ ये च+ अस्य+ इह जीवा+ ये च प्रेता+ यच्+ च+ अन्यद्+ इच्छन् न लभते सर्वं+ तद्+ अत्र गत्वा विन्दते ।
अत्र ह्यस्यैते सत्याः कामा अनृतापिधानाः ।
अत्र ह्य्+ अस्य+ एते सत्याः कामा+ अन्-ऋत-अपिधानाः ।
तद्यथापि हिरण्यनिधिं निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि सञ्चरन्तो न विन्देयुः ।
तद्+ यथा+ अपि हिरण्य-निधिं+ निहितम् अ-क्षेत्र-ज्ञा+ उपर्य्+ उपरि सञ्चरन्तो+ न विन्देयुः ।
एवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ॥८०३.२।
एवम् एव+ इमाः सर्वाः प्रजा+ अहर्+ अहर्+ गच्छन्त्य+ एतं+ ब्रह्म-लोकं+ न विन्दन्त्य्+ अन्-ऋतेन हि प्रत्यूढाः ॥८०३.२।
स वाऐ एष आत्मा हृदि ।
स+ वाऐ+ एष+ आत्मा हृदि ।
तस्यैतदेव निरुक्तं हृद्ययमिति तस्माद्धृदयम् ।
तस्य+ एतद्+ एव निरुक्तं+ हृद्य्+ अयम् इति तस्माद्+ + धृद्+ अयम् ।
अहरहर्वाऐ एवंवित्स्वर्गं लोकमेति ॥८०३.३।
अहर्+ अहर्+ वाऐ+ एवं-वित्+ स्वर्गं+ लोकम् एति ॥८०३.३।
अथ य एष संप्रसादो &स्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेनाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाच ।
अथ य+ एष+ संप्रसादो+ + अस्माच्+ + छरीरात् समुत्थाय परं+ ज्योतिर्+ उपसंपद्य स्वेन रूपेन+ अभिनिष्पद्यतए+ एष+ आत्मा+ इति ह+ उवाच ।
एतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति ।
एतद्+ अ-मृतम् अ-भयम् एतद्+ ब्रह्म+ इति ।
तस्य ह वाऐ एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यमिति ॥८०३.४।
तस्य ह वाऐ+ एतस्य ब्रह्मणो+ नाम सत्यम् इति ॥८०३.४।
तानि ह वाऐ एतानि त्रीण्यक्षराणि सतीयमिति ।
तानि ह वाऐ+ एतानि त्रीण्य्+ अ-क्षराणि सतीयम् इति ।
तद्यत्सत्तदमृतम् ।
तद्+ यत् सत् तद्+ अ-मृतम् ।
अथ यत्ति तन्मर्त्यम् ।
अथ यत् ति तन्+ मर्त्यम् ।
अथ यद्यं तेनोभे यच्छति ।
अथ यद्+ यं+ तेन+ उभे यच्छति ।
यदनेनोभे यच्छति तस्माद्यम् ।
यद्+ अनेन+ उभे यच्छति तस्माद्+ यम् ।
अहरहर्वाऐ एवंवित्स्वर्गं लोकमेति ॥८०३.५।
अहर्+ अहर्+ वाऐ+ एवं-वित्+ स्वर्गं+ लोकम् एति ॥८०३.५।
8.4
अथ य आत्मा स सेतुर्धृतिरेषां लोकानामसंभेदाय ।
अथ य+ आत्मा स+ सेतुर्+ धृतिर्+ एषां+ लोकानाम् अ-संभेदाय ।
नैतं सेतुमहोरात्रे तरतो न जरा न मृत्युर्न शोको न सुकृतम् ।
न+ एतं+ सेतुम् अहो-रात्रे तरतो+ न जरा न मृत्युर्+ न शोको+ न सु-कृतम् ।
सर्वे पाप्मानो &तो निवर्तन्ते ।
सर्वे पाप्मानो+ + अतो+ निवर्तन्ते ।
अपहतपाप्मा ह्येष ब्रह्मलोकः ॥८०४.१।
अपहत-पाप्मा ह्य्+ एष+ ब्रह्म-लोकः ॥८०४.१।
तस्माद्वा एतं सेतुं तीर्त्वा अन्धः सन्ननन्धो भवति ।
तस्माद्+ वा एतं+ सेतुं+ तीर्त्वा + अन्धः सन्न्+ अन्-अन्धो+ भवति ।
विद्धः सन्नविद्धो भवति ।
विद्धः सन्न्+ अविद्धो+ भवति ।
उपतापी सन्ननुपतापी भवति ।
उपतापी सन्न्+ अन्-उपतापी भवति ।
तस्माद्वा एतं सेतुं तीर्त्वा अपि नक्तमहरेवाभिनिष्पद्यते ।
तस्माद्+ वा एतं+ सेतुं+ तीर्त्वा + अपि नक्तम् अहर्+ एव+ अभिनिष्पद्यते ।
सकृद्विभातो ह्येवैष ब्रह्मलोकः ॥८०४.२।
सकृद्+ विभातो+ ह्य्+ एव+ एष+ ब्रह्म-लोकः ॥८०४.२।
तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकः ।
तद्+ यए+ एव+ एतं+ ब्रह्म-लोकं+ ब्रह्म-चर्येण+ अनुविन्दन्ति तेषाम् एव+ एष+ ब्रह्म-लोकः ।
तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥८०४.३।
तेषां+ सर्वेषु लोकेषु काम-चारो+ भवति ॥८०४.३।
8.5
अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत् ।
अथ यद्+ यज्ञ+ इत्य्+ आचक्षते ब्रह्म-चर्यम् एव तत् ।
ब्रह्मचर्येण ह्येव यो ज्ञाता तं विन्दते ।
ब्रह्म-चर्येण ह्य्+ एव यो+ ज्ञाता तं+ विन्दते ।
अथ यदिष्टमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत् ।
अथ यद्+ इष्टम् इत्य्+ आचक्षते ब्रह्म-चर्यम् एव तत् ।
ब्रह्मचर्येण ह्येवेष्ट्वात्मानमनुविन्दते ॥८०५.१।
ब्रह्म-चर्येण ह्य्+ एव+ इष्ट्वा+ आत्मानम् अनुविन्दते ॥८०५.१।
अथ यत्सत्त्रायणमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत् ।
अथ यत् सत्-त्रायणम् इत्य्+ आचक्षते ब्रह्म-चर्यम् एव तत् ।
ब्रह्मचर्येण ह्येव सत आत्मनस्त्राणं विन्दते ।
ब्रह्म-चर्येण ह्य्+ एव सत+ आत्मनस्+ त्राणं+ विन्दते ।
अथ यन्मौनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत् ।
अथ यन्+ मौनम् इत्य्+ आचक्षते ब्रह्म-चर्यम् एव तत् ।
ब्रह्मचर्येण ह्येवात्मानमनुविद्य मनुते ॥८०५.२।
ब्रह्म-चर्येण ह्य्+ एव+ आत्मानम् अनुविद्य मनुते ॥८०५.२।
अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत् ।
अथ यद्+ अन्-आशक-अयनम् इत्य्+ आचक्षते ब्रह्म-चर्यम् एव तत् ।
एष ह्यात्मा न नश्यति यं ब्रह्मचर्येणानुविन्दते ।
एष+ ह्य्+ आत्मा न नश्यति यं+ ब्रह्म-चर्येण+ अनुविन्दते ।
अथ यदरण्यायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत् ।
अथ यद्+ अरण्य-अयनम् इत्य्+ आचक्षते ब्रह्म-चर्यम् एव तत् ।
ततरश्च ह वै ण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके तृतीयस्यामितो दिवि ।
तत्+ अरश्+ च ह वै ण्यश्+ च+ अर्णवौ ब्रह्म-लोके तृतीयस्याम् इतो+ दिवि ।
तदैरंमदीयं सरः ।
तद्+ ऐरं-मदीयं+ सरः ।
तदश्वत्थः सोमसवनः ।
तद्- अश्वत्थः सोम-सवनः ।
तदपराजिता पूर्ब्रह्मणः प्रभुविमितं हिरण्मयम् ।।८०५.३।
तद्+ अ-पराजिता पूर्+ ब्रह्मणः प्रभु-विमितं+ हिरण्-मयम् ॥८०५.३।
तद्य एवैतावरं च ण्यं चार्णवौ ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकः ।
तद्+ यए+ एव+ एतौ+ अरं+ च ण्यं+ च+ अर्णवौ ब्रह्म-लोके ब्रह्म-चर्येण+ अनुविन्दन्ति तेषाम् एव+ एष+ ब्रह्म-लोकः ।
तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥८०५.४।
तेषां+ सर्वेषु लोकेषु काम-चारो+ भवति ॥८०५.४।
page23
8.11
तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः संप्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मेति होवाच ।
तद्+ यत्र+ एतत् सुप्तः समस्तः संप्रसन्नः स्वप्नं+ न विजानाति+ एष+ आत्मा+ इति ह+ उवाच ।
एतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति ।
एतद्+ अ-मृतम् अ-भयम् एतद्+ ब्रह्म+ इति ।
स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज ।
स+ ह शान्त-हृदयः प्रवव्राज ।
स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श ।
स+ ह+ अ-प्राप्य+ एव देवान् एतद्+ भयं+ ददर्श ।
नाह खल्वयमेवं संप्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति ।
न+ अह खल्व्+ अयम् एवं+ सं-प्रत्य्+ आत्मानं+ जानात्य्+ अयम् अहम् अस्मि+ इति ।
नो एवेमानि भूतानि ।
न+ उ एव+ इमानि भूतानि ।
विनाशमेवापीतो भवति ।
विनाशम् एव+ अपीतो+ भवति ।
नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥८११.१।
न+ अहम् अत्र भोग्यं+ पश्यामि+ इति ॥८११.१।
स समित्पाणिः पुनरेयाय ।
स+ समित्-पाणिः पुनर्+ एयाय ।
तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः किमिच्छन्पुनरागम इति ।
तं+ ह प्रजा-पतिर्+ उवाच मघवन् यच्+ + छान्त-हृदयः प्राव्राजीः किम् इच्छन् पुनर्+ आगम+ इति ।
स होवाच नाह खल्वयं भगव एवं संप्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति ।
स+ ह+ उवाच न+ अह खल्व्+ अयं+ भगव+ एवं+ सं-प्रत्य्+ आत्मानं+ जानात्य्+ अयम् अहम् अस्मि+ इति ।
नो एवेमानि भूतानि ।
नो+ एव+ इमानि भूतानि ।
विनाशमेवापीतो भवति ।
विनाशम् एव+ अपीतो+ भवति ।
नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥८११.२।
न+ अहम् अत्र भोग्यं+ पश्यामि+ इति ॥८११.२।
एवमेवैष मघवन्निति होवाच ।
एवम् एव+ एष+ मघवन्न्+ इति ह+ उवाच ।
एतं त्वेव ते भूयो &नुव्याख्यास्यामि ।
एतं+ त्व्+ एव ते भूयो+ + अनुव्याख्यास्यामि ।
नो एवान्यत्रैतस्मात् ।
न+ उ एव+ अन्यत्र+ एतस्मात् ।
वसापराणि पञ्च वर्षाणीति ।
वस+ अपराणि पञ्च वर्षाणि+ इति ।
स हापराणि पञ्च वर्षाण्युवास ।
स+ ह+ अपराणि पञ्च वर्षाणि+ उवास ।
तान्येकशतं संपेदुः ।
तान्य्+ एक-शतं+ संपेदुः ।
एतत्तद्यदाहुः ।
एतत् तद्+ यद्+ आहुः ।
एकशतं ह वै वर्षाणि मघवान्प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमुवास ।
एक-शतं+ ह वै वर्षाणि मघवान् प्रजापतौ ब्रह्म-चर्यम् उवास ।
तस्मै होवाच ॥८११.३।
तस्मै ह+ उवाच ॥८११.३।
8.12
मघवन्मर्त्यं वा इदं शरीरमात्तं मृत्युना ।
मघवन् मर्त्यं+ वा इदं+ शरीरम् आत्तं+ मृत्युना ।
तदस्यामृतस्याशरीरस्यात्मनो &धिष्ठानम् ।
तद्+ अस्य+ अ-मृतस्य+ अ-शरीरस्य+ आत्मनो+ + अधिष्ठानम् ।
आत्तो वै सशरीरः प्रियाप्रियाभ्याम् ।
आत्तो+ वै स-शरीरः प्रिय-अ-प्रियाभ्याम् ।
न वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति ।
न वै स-शरीरस्य सतः प्रिय-अ-प्रिययोर्+ अपहतिर्+ अस्ति ।
अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ॥८१२.१।
अ-शरीरं+ वाव सन्तं+ न प्रिय-अ-प्रिये स्पृशतः ॥८१२.१।
अशरीरो वायुः ।
अ-शरीरो+ वायुः ।
अभ्रं विद्युत्स्तनयित्नुरशरीराण्येतानि ।
अभ्रं+ विद्युत् स्तनयित्नुर्+ अ-शरीराण्य्+ एतानि ।
तद्यथैतान्यमुष्मादाकाशात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यन्ते ॥८१२.२।
तद्+ यथा+ एतान्य्+ अमुष्माद्+ आकाशात् समुत्थाय परं+ ज्योतिर्+ उपसंपद्य स्वेन रूपेण+ अभिनिष्पद्यन्ते ॥८१२.२।
एवमेवैष संप्रसादो &स्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ।
एवम् एव+ एष+ संप्रसादो+ + अस्माच्+ + छरीरात् समुत्थाय परं+ ज्योतिर्+ उपसंपद्य स्वेन रूपेण+ अभिनिष्पद्यते ।
स उत्तमपुरुषः ।
स+ उत्तम-पुरुषः ।
स तत्र पर्येति जक्षत्क्रीडन्रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वा नोपजनं स्मरन्निदं शरीरम् ।
स+ तत्र पर्येति जक्षत् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्+ वा यानैर्+ वा ज्ञातिभिर्+ वा न+ उपजनं+ स्मरन्न्+ इदं+ शरीरम् ।
स यथा प्रयोग्य आचरणे युक्त एवमेवायमस्मिञ्छरीरे प्राणो युक्तः ॥८१२.३।
स+ यथा प्रयोग्य+ आचरणे युक्त+ एवम् एव+ अयम् अस्मिञ्+ + छरीरे प्राणो+ युक्तः ॥८१२.३।
अथ यत्रैतदाकाशमनुविषण्णं चक्षुः स चाक्षुषः पुरुषो दर्शनाय चक्षुः ।
अथ यत्र+ एतद् आकाशम् अनुविषण्णं+ चक्षुः स+ चाक्षुषः पुरुषो+ दर्शनाय चक्षुः ।
अथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा गन्धाय घ्राणम् ।
अथ यो+ वेद+ इदं+ जिघ्राणि+ इति स+ आत्मा गन्धाय घ्राणम् ।
अथ यो वेदेदमभिव्याहराणीति स आत्मा अभिव्याहाराय वाक् ।
अथ यो+ वेद+ इदम् अभिव्याहराणि+ इति स+ आत्मा + अभिव्याहाराय वाक् ।
अथ यो वेदेदं शृण्वानीति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम् ।।८१२.४।
अथ यो+ वेद+ इदं+ शृण्वानि+ इति स+ आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम् ॥८१२.४।
अथ यो वेदेदं मन्वानीति स आत्मा ।
अथ यो+ वेद+ इदं+ मन्वानि+ इति स+ आत्मा ।
मनो &स्य दैवं चक्षुः ।
मनो+ + अस्य दैवं+ चक्षुः ।
स वाऐ एष एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान्कामान्पश्यन्रमते य एते ब्रह्मलोके ॥८१२.५।
स+ वाऐ+ एष+ एतेन दैवेन चक्षुषा मनसा+ एतान् कामान् पश्यन् रमते यए+ एते ब्रह्म-लोके ॥८१२.५।
तं वाऐ एतं देवा आत्मानमुपासते ।
तं+ वाऐ+ एतं+ देवा+ आत्मानम् उपासते ।
तस्मात्तेषां सर्वे च लोका आत्ताः सर्वे च कामाः ।
तस्मात् तेषां+ सर्वे च लोका+ आत्ताः सर्वे च कामाः ।
स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानाति ।
स+ सर्वांश्+ च लोकान् आप्नोति सर्वांश्+ च कामान् यस्+ तम् आत्मानम् अनुविद्य विजानाति ।
इति ह प्र्जापतिरुवाच प्रजापतिरुवाच ॥८१२.६।
इति ह प्र्जा-पतिर्+ उवाच प्रजा-पतिर्+ उवाच ॥८१२.६।
8.13
{8,13-15 mit Senart verglichen}श्यामाच्छबलं प्रपद्ये ।
{8,13-15 mit Senart verglichen}श्यामाच्+ + छबलं+ प्रपद्ये ।
शबलाच्छ्यामं प्रपद्ये ।
शबलाच्+ + छ्यामं+ प्रपद्ये ।
अश्व इव रोमाणि विधूय पापं चन्द्र इव राहोर्मुखात्प्रमुच्य धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभिसंभवामीत्यभिसंभवामीति ॥८१३.१।
अश्व+ इव रोमाणि विधूय पापं+ चन्द्र+ इव राहोर्+ मुखात् प्रमुच्य धूत्वा शरीरम् अ-कृतं+ कृत-आत्मा ब्रह्म-लोकम् अभिसंभवामि+ इत्य्+ अभिसंभवामि+ इति ॥८१३.१।
8.14
आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ।
आकाशो+ वै नाम नाम-रूपयोर्+ निर्वहिता ।
ते यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृतं स आत्मा ।
ते यद्-अन्तरा+ तद्+ ब्रह्म तद्+ अ-मृतं+ स+ आत्मा ।
प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशो &हं भवामि ब्राह्मणानां यशो राज्ञाम्यशो विशाम् ।
प्रजा-पतेः सभां+ वेश्म प्रपद्ये यशो+ + अहं+ भवामि ब्राह्मणानां+ यशो+ राज्ञाम् यशो+ विशाम् ।
यशो &हमनुप्रापत्सि ।
यशो+ + अहम् अनुप्रापत्सि ।
स हाहं यशसां यशः ।
स+ ह+ अहं+ यशसां+ यशः ।
श्येतमदत्कमदत्कं श्येतं लिन्दु माभिगां लिन्दु मा अभिगाम् ।।८१४.१।
श्येतम् अ-दत्कम् अ-दत्कं+ श्येतं+ लिन्दु मा+ अभिगां+ लिन्दु मा + अभिगाम् ॥८१४.१।
8.15
तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यः ।
तद्+ + ध+ एतद्+ ब्रह्मा प्रजा-पतय+ उवाच प्रजा-पतिर्+ मनवे मनुः प्रजाभ्यः ।
आचार्यकुलाद्वेदमधीत्य यथाविधानं गुरोः (कर्मातिशेषेणाभिसमावृत्य S कर्म कृत्वा {अतिशेषेण }अभिसमावृत्य )कुटुम्बे ( S स्थित्वा )शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो धर्मिकान्विदधदात्मनि सर्वेन्द्रियाणि संप्रतिष्ठाप्याहिंसन्सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः ।
आचार्य-कुलाद्+ वेदम् अधीत्य यथा-विधानं+ गुरोः (कर्म+ अति-शेषेण+ अभिसमावृत्य S कर्म कृत्वा {अति-शेषेण} अभिसमावृत्य ) कुटुम्बे ( S स्थित्वा ) शुचौ देशे स्व-अध्यायम् अधीयानो+ धर्मिकान् विदधद्+ आत्मनि सर्व-इन्द्रियाणि संप्रतिष्ठाप्य+ अ-हिंसन् सर्व-भूतान्य्+ अन्यत्र तीर्थेभ्यः ।
स खल्वेवं वर्तयन्यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसंपद्यते ।
स+ खल्व्+ एवं+ वर्तयन् यावद्+ आयुषं+ ब्रह्म-लोकम् अभिसंपद्यते ।
न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते ॥८१५.१।
न च पुनर्+ आवर्तते न च पुनर्+ आवर्तते ॥८१५.१।

5 टिप्‍पणियां:

Dr.Madhusudan ने कहा…

Aapane ek bahut aavashyak vishay chunakar sanatan dharm ki bahut badi sewa ki hai.
sanskrut Shbdonka sandhi vichchhed bhi bahut upayukt hai.
samay lekar padhanaa padega.
bahut bahut dhanyavad.
samayaabhav ke kaaran aaj pura nahin padh paayaa.
DHANYAVAD.

ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे ने कहा…

श्री एम जवाहरी जी आपको सहृदय धन्यवाद ..इसलिए की आप जैसे महान व्यक्तित्व ने हमें प्रोत्साहित किया हमें पता है कि आप भारतीय संस्कृत की खोज मिशन भारत के अलावा अन्य देशों में बोले जाने वाली भाषाओं में संस्कृत की खोज कर रहें हैं जो काफी सराहनीय है....

Umesh ने कहा…

Pandit jee Ram Ram,
Vedaant vishayak gyaan ki vastav mein bahut aavashyakta hai . Ek kramwaar vishaya bhaav sahit prastut ho sake to ati uttam rahega

Umesh ने कहा…

A.P.jee kyaa aapki approval ke baad hi comment visible hota hai, mera to chhota saa mantavya matra tha

बेनामी ने कहा…

उमेश जी दरअसल मुझे अप्रुव्हल के बारे में बहुत ज्यादा ज्ञान नहीं हैं यदि आप इसे हटाने का तरीका बताएं तो इसको हटा सकता हुं...कृपया मेरा सहयोग करें,,मैं चाहता हुं कि अपने प्रबुद्ध पाठकों को कष्ट न हो वे भी अपनी राय आसानी से दें सकें..

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.