ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

संत समाज की छवि को धूमील करती संतों की वहशियाना हरक़त

संत समाज की छवि को धूमील करती संतों की वहशियाना हरक़त

स्वामी अग्निवेश का नया दांव स्‍वामी,तपस्वी को ज्ञान किसी निर्जन वन में स्थित बोधिवृक्ष अथवा गुरू के सानिध्य में  तप करने से आती है ये तो ठहरे स्वामी जी ..ओ भी अग्निवेश इनको ज्ञान व भान हुआ है बीग बास यानी हिजड़ों के बीच में मिला यह ज्ञान कितना देर तक टिकाउ होगा , अभी अभी  अन्‍ना के पैर पकड़ माफी मांगने को तैयार हैं क्या वे इस बार अन्ना को हाथी के जगह कुछ और कहेंगे अथवा केन्द्र सरकार के दलाल के रूप में अन्ना से चिपके रहेंगे..और मित्रों क्या अग्निवेश को अन्ना टीम में शामिल करना चाहिए....
खैर यह तो अन्ना और उनके सिपहसलार साथी ही बता पायेंगे कि वे क्या करेंगे मैं बात कर रहा था संतों के बीग बास प्रेम की जिन्हें ज्ञान वासना के मंदिर में मिलता है आईए विचार करें आखिर संत से सियासत और बीग बास तक क्या यही धर्म हैं संतों की यदि नहीं तो इनको संत विशेषण क्यों..
मित्रों सवाल यह भी उठता है कि क्या यह संतों की परंपरा रही है आज तक कोई भी संत इस प्रकार के वासना मंदिर अर्थात बीगबास में प्रवेश किया है आपका उत्तर होगा नहीं ..तो क्या ऐसे संत स्वामी अग्निवेश को संत की संज्ञा देनी चाहिए ।
वास्तवीक में अपने देश भारत संतों की भूमि रही है ऐसे ऐसे संत हुए जो पूरे विश्व को अपने प्रतिभा के बल पर अपने पैरों के सामने झुककर उन विदेशी नरभक्षियों असुरों को भी नतमस्तक होने के लिए  मजबूर किये जैसे  आदि शंकरराचार्य , स्वामी विवेकानंद, संत गोस्वामी तुलसी दास, तुकाराम , सूरदास, संत कबीर दास जी सहित हजारों ऐसे संत हुए जिन्होंने अपनी संत परंपरा का निर्वाह करते हुए समाज में व्याप्त बुराई. का सफाया भी किये ।
वहीं आज के इस परिदृश्य में मिडिया मे हर हमेशा छाये हुए संतों को उपरोक्त दिव्य संतों के श्रेणी में रखना चाहिए । श्रेणी की तो बात छोड़िए वेदों में प्राप्त प्रमाणों के आधार पर  इनका उद्बोधन भी संत के रूप में नहीं करना चाहिए।
दरअसल भारतीय संतों का लक्षण हमारे वेदों में जो बताया गया वह इस प्रकार है।
यजुर्वेद अध्याय 19 मन्त्रा 25

सन्धिछेदः- अर्द्ध ऋचैः उक्थानाम् रूपम् पदैः आप्नोति निविदः।
प्रणवैः शस्त्राणाम् रूपम् पयसा सोमः आप्यते।(25)

अनुवादः- जो सन्त (अर्द्ध ऋचैः) वेदों के अर्द्ध वाक्यों अर्थात् सांकेतिक शब्दों को पूर्ण करके (निविदः) आपूत्र्ति करता है (पदैः) श्लोक के चैथे भागों को अर्थात् आंशिक वाक्यों को (उक्थानम्) स्तोत्रों के (रूपम्) रूप में (आप्नोति) प्राप्त करता है अर्थात् आंशिक विवरण को पूर्ण रूप से समझता और समझाता है (शस्त्राणाम्) जैसे शस्त्रों को चलाना जानने वाला उन्हें (रूपम्) पूर्ण रूप से प्रयोग करता है ऐसे पूर्ण सन्त (प्रणवैः) औंकारों अर्थात् ओम्-तत्-सत् मन्त्रों को पूर्ण रूप से समझ व समझा कर (पयसा) दध-पानी छानता है अर्थात् पानी रहित दूध जैसा तत्व ज्ञान प्रदान करता है जिससे (सोमः) अमर पुरूष अर्थात् अविनाशी परमात्मा को (आप्यते) प्राप्त करता है। वह पूर्ण सन्त वेद को जानने वाला कहा जाता है। भावार्थः- तत्वदर्शी सन्त वह होता है जो वेदों के सांकेतिक शब्दों को पूर्ण विस्तार से वर्णन करता है जिससे पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति होती है वह वेद के जानने वाला कहा जाता है।

यजुर्वेद अध्याय 19 मन्त्रा 26

सन्धिछेद:- अश्विभ्याम् प्रातः सवनम् इन्द्रेण ऐन्द्रम् माध्यन्दिनम् वैश्वदैवम् सरस्वत्या तृतीयम् आप्तम् सवनम् (26)

अनुवाद:- वह पूर्ण सन्त तीन समय की साधना बताता है। (अश्विभ्याम्) सूर्य के उदय-अस्त से बने एक दिन के आधार से (इन्द्रेण) प्रथम श्रेष्ठता से सर्व देवों के मालिक पूर्ण परमात्मा की (प्रातः सवनम्) पूजा तो प्रातः काल करने को कहता है जो (ऐन्द्रम्) पूर्ण परमात्मा के लिए होती है। दूसरी (माध्यन्दिनम्) दिन के मध्य में करने को कहता है जो (वैश्वदैवम्) सर्व देवताओं के सत्कार के सम्बधित (सरस्वत्या) अमृतवाणी द्वारा साधना करने को कहता है तथा (तृतीयम्) तीसरी (सवनम्) पूजा शाम को (आप्तम्) प्राप्त करता है अर्थात् जो तीनों समय की साधना भिन्न-2 करने को कहता है वह जगत् का उपकारक सन्त है।
भावार्थः- जिस पूर्ण सन्त के विषय में मन्त्रा 25 में कहा है वह दिन में 3 तीन बार (प्रातः दिन के मध्य-तथा शाम को) साधना करने को कहता है। सुबह तो पूर्ण परमात्मा की पूजा मध्यान को सर्व देवताओं को सत्कार के लिए तथा शाम को संध्या आरती आदि को अमृत वाणी के द्वारा करने को कहता है वह सर्व संसार का उपकार करने वाला होता है।

यजुर्वेद अध्याय 19 मन्त्रा 30

सन्धिछेदः- व्रतेन दीक्षाम् आप्नोति दीक्षया आप्नोति दक्षिणाम्।
दक्षिणा श्रद्धाम् आप्नोति श्रद्धया सत्यम् आप्यते (30)

अनुवादः- (व्रतेन) दुव्र्यसनों का व्रत रखने से अर्थात् भांग, शराब, मांस तथा तम्बाखु आदि के सेवन से संयम रखने वाला साधक (दीक्षाम्) पूर्ण सन्त से दीक्षा को (आप्नोति) प्राप्त होता है अर्थात् वह पूर्ण सन्त का शिष्य बनता है (दीक्षया) पूर्ण सन्त दीक्षित शिष्य से (दक्षिणाम्) दान को (आप्नोति) प्राप्त होता है अर्थात् सन्त उसी से दक्षिणा लेता है जो उस से नाम ले लेता है। इसी प्रकार विधिवत् (दक्षिणा) गुरूदेव द्वारा बताए अनुसार जो दान-दक्षिणा से धर्म करता है उस से (श्रद्धाम्) श्रद्धा को (आप्नोति) प्राप्त होता है (श्रद्धया) श्रद्धा से भक्ति करने से (सत्यम्) सदा रहने वाले सुख व परमात्मा अर्थात् अविनाशी परमात्मा को (आप्यते) प्राप्त होता है।
भावार्थ:- पूर्ण सन्त उसी व्यक्ति को शिष्य बनाता है जो सदाचारी रहे। अभक्ष्य पदार्थों का सेवन व नशीली वस्तुओं का सेवन न करने का आश्वासन देता है। पूर्ण सन्त उसी से दान ग्रहण करता है जो उसका शिष्य बन जाता है फिर गुरू देव से दीक्षा प्राप्त करके फिर दान दक्षिणा करता है उस से श्रद्धा बढ़ती है। श्रद्धा से सत्य भक्ति करने से अविनाशी परमात्मा की प्राप्ति होती है अर्थात् पूर्ण मोक्ष होता है। पूर्ण संत भिक्षा व चंदा मांगता नहीं फिरेगा।
उपरोक्त संत लक्षण जो मैने प्रस्तुत किया है क्या इन लक्षणों की परीकल्पना बाबा रामदेव, स्वामी अग्निवेश, सहित सुर्खियों में छाये रहने वाले सैकड़ों संतो में देखी जा सकती है । यदि नहीं तो इनकों काहे का संत कहा जाता है जो कि संत शब्द एक पवित्र शब्द है जो लोगों को अच्छाई की राह दिखाकर वासना से मुक्त करने का अथक प्रयत्न करते हैं। जरूरत है ऐसे संतों को अपना मार्ग बदलने की।
ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे , संपादक , ज्योतिष का सूर्य, हिन्दी मासिक पत्रिका, भिलाई, मोबा.नं.09827198828

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