ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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रविवार, 13 नवंबर 2011

भीख मांगते बच्चे, और मासूमीयत खोते बचपन का बाल दिवस



(बाल दिवस पर विशेष)
भीख मांगते बच्चे, और मासूमीयत खोते बचपन का बाल दिवस
-ज्योतिषाचार्य पं विनोद चौबे , संपादक ''ज्योतिष का सूर्य'' हिन्दी मासिक पत्रिका भिलाई

मित्रों  आज बाल दिवस पर आप सभी को ढ़ेर सारी शुभकामनाएं।।।।।।हमें गर्व होता है कि हमारे देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के जन्म दिवस को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि नेहरू बच्चों को बहुत प्यार करते थे। ज्ञात हो कि  छत्तीसगढ़ में (संयुक्त म.प्र.) में बी.एस.पी.  जैसे बड़ा उद्योग लगवाने में अहम भूमिका रही है जो छत्तीसगढ़ का नाम विश्व पटल पर स्पात के क्षेत्र में अपनी मपत्त्वपूर्ण स्थान बनाये हुए है। ऐसे दिव्य पुरूष को शत शत नमन...
 बच्चों के प्रति नेहरू के लगाव को देखते हुए भारत सरकार ने नेहरू के जन्म दिवस यानी 14 नवंबर को बाल दिवस के रूप में घोषित  किया, जबकि अंतर्राष्ट्रीय बाल दिवस 20 नवंबर को  मनाया जाता है। पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे.अब्दुल कलाम के भी कार्यक्रमों में बच्चे जरूर शामिल हुआ करते थे अतएव उनका भी बच्चों से अच्छा खाशा लगाव था। अश्वेत अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनकी पत्नि मिशेल ओबामा ने भी बच्चों के प्रति अपना प्रेम जाहिर करते हुए विशेष तौर पर बच्चों से मिलने कार्यक्रम जरूर शामिल रहता है खैर आईए अपने देश भारत के बाल दिवस की बात करें
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (कांग्रेस पार्टी) के प्रथम पंक्ति के नेताओं में शुमार नेहरू बच्चों की सुरक्षा को लेकर काफी चिंतित थे और विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम वे समाज में उनकी सुरक्षा के प्रति लोगों को जागरुक करते थे। पूर्व प्रधानमंत्री ने बच्चों की सामाजिक सुरक्षा के लिए कड़े कानूनों का प्रावधान करते हुए इसकी आधारशीला रखी। इसके बावजूद बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकी। समय के साथ कानून निरर्थक साबित होने लगे, क्योंकि बाद की सत्ता के संचालकों ने कानून को अमल में लाया ही नहीं। वर्तमान यूपीए सरकार भी नेहरू के सपनों को साकार करने में विफल साबित हो रही है। नेहरू को प्रधानमंत्री का ताज सौंपने वाली अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (कांग्रेस पार्टी) खुद नेहरू की भावनाओं का कद्र करने में विफल है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे अधिक समय तक राज करने वाली कांग्रेस पार्टी के दौरान बच्चों के उत्पीड़न और शोषण के खिलाफ कई ऐसी घटनाएं घटी हैं, जो नेहरू के आदर्शों के प्रति कांग्रेस पार्टी की वफादारी पर प्रश्न खड़ा होता है। नेहरू के अजीज देश के भावी कर्णधारों (बच्चों) की गैर-कानूनी ढंग से तस्करी हो रही है, जो मीडिया रिपोर्टों में कई बार उजागर हो चुका है। खेलने और खाने की उम्र में वे राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों के किनारे अपने परिवार का पेट भरने के लिए करतब दिखाते हैं और भीख मांगते हैं। आम आदमी की रहनुमाई करने का दावा करने वाले जनप्रतिनिधि अपनी लक्जरी गाड़ियों से फर्राटा भरते हुए वहां से रोज गुजरते हैं, लेकिन कोई भी उनकी रहनुमाई करने के लिए आगे नहीं आता है। ना ही, सत्ता में काबिज तथाकथित जनप्रतिनिधि उनके पुनर्वास एवं सामाजिक सुरक्षा के बारे में सोचते है। कूड़े के ढेर में अपना बचपन खोते बच्चों को भी देखा जा सकता है, जो अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए रईसजादों की गंदगी को साफ करते हैं अथवा उनके कूड़े के ढेर को उठाकर समाज को साफ सूथरा रखने की कोशिश करते हैं। सामाजिक सुरक्षा और जागरुकता के अभाव में नशाखोरी के चंगुल में फंसे बचपन को भी देखा जा सकता है, जो अपने नशे की मांग को पूरा करने के लिए आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने में भी पीछे नहीं हटते। विकसित भारत की तस्वीर पेश करने वाले महानगरों, छोटे शहरों और कस्बों के ढाबों और चाय की दुकानों में घुंटते बचपन को भी देखा जा सकता है, जो पश्चिमी संस्कृति में ढल चुके युवाओं और तथाकथित बुद्धिजीवियों की गालियों औरउत्पीड़न सहते है। सुबह ८ बजे आप घर से किसी रईसजादों के मुहल्लें में चले जाईए दर्जनों घर ऐसे मिलेंगे जहां ये मासूम बच्चे रईसों की गाड़ियां धोते हुए मिल जायेंगे।                                                                                         
भारतीय लोकतंत्र में अपने मूलाधिकार से वंचित बचपन पर बीमारी, भूखमरी, कुपोषण और हिंसा की मार भी पड़ती रहती है। इसके बाद सत्ता के गलियारों में नेहरू के अजीजों की आवाज सुनी नहीं जाती है। देश के पिछड़े एवं आदिवासी इलाकों में देश के भावी कर्णधारों की सामाजिक सुरक्षा देश की आजादी के छह दशक बाद भी सुनिश्चित नहीं हुई है। आए दिन देश के विभिन्न इलाकों में यह देखने को मिलता है। करीब पांच वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश के आदिवासी बहुल जनपद सोनभद्र में कुपोषण एवं भुखमरी से करीब डेढ़ दर्जन बच्चों ने दम तोड़ दिया था। आदिवासी बहुल घसिया बस्ती में घटी इस घटना ने देश-विदेश के समाजसेवियों एवं मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का ध्यान खिंचा था। इसके बाद भी खसिया बस्ती में निवास करने वाले लोगों (बच्चों समेत) की समस्याएं कम नहीं हुई। यहा के अधिकतर बच्चे आज भी कुपोषण की जद में हैं। घसिया बस्ती निवासी कतवारू ने बीते दिनों नेहरू परिवार के युवराज और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी को मिर्जापुर के अहरौरा में कांग्रेस की जनसभा के दौरान तीर-धनुष भेंट करने के साथ ही विंध्य क्षेत्र के आदिवासियों की समस्याओं को उनके सामने रखा था। इसके बाद भी घसिया बस्ती की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। बीते साल सोनभद्र में ही करीब दो दर्जन से ज्यादा बच्चों ने प्रदूषित पानी पीकर दम तोड़ दिया था। एशिया के सबसे बड़े गोबिंद बल्लभ पंत जलाशय (रिहंद डैम) के समीप बसे मकरीबारी और लभरी गांव में घटी इस घटना ने लोगों को दहशत में डाल दिया है। इसके बाद भी वे जलाशय के जहरीले एवं प्रदूषित पानी को पीने पर मजबूर हैं, जो भविष्य में एक बड़ी घटना की संभावना को बरकरार रखे हुए है। गौरतलब है कि सोनभद्र का अधिकांश इलाका फ्लोरोसिस के चपेट में हैं, जो देश के कर्णधारों को पंगु बना रहा है। यह स्थिति सिर्फ सोनभद्र की ही नहीं है। यह स्थिति मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, उड़ीसा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र आदि राज्यों के आदिवासी एवं पिछड़े इलाकों की भी है।
छत्तीसगढ़ में बीते दिनों ही करीब सात दर्जन बच्चे हैंडपंप से निकलने वाले प्रदूषित जल को पीने से बीमार पड़ गए थे। कुछ विकलांगता की चपेट में आ गए। महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में कुपोषण एवं भुखमरी से हर साल सैकड़ों बच्चे काल के गाल में समाते हैं। मीडिया रिपोर्टों में यह उजागर भी हो चुका है। राष्ट्रीय राजधानी से सटे नोएडा में घटी निठारी कांड की घटना ने पूरे देश में ही तहलका मचा दिया था, जिसमें आज तक बच्चों के मरने की निश्चित संख्या का पता नहीं चल पाया है।
हर बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराकर आत्मनिर्भर बनाने का केंद्र सरकार का दावा  भी झूठा ही साबित हो रहा है। देश की आजादी के छह दशक बाद भी करोड़ों बच्चे स्कूलों में दाखिला नहीं ले पाते हैं। जो दाखिला लेते भी हैं, उनमें से करीब 50 फीसदी प्राथमिक शिक्षा के बाद स्कूल छोड़ देते हैं। स्कूलों में पंजीकृत बच्चों के स्कूल छोड़ने की स्थिति पर राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटील भी चिंता जाहिर कर चुकी हैं। इसके बाद भी नेहरू के अजीजों की शिक्षा व्यवस्था पटरी पर आती दिखाई नहीं देती है।
पूरे देश में आज बड़े ही धूमधाम से बाल दिवस मनाया जाएगा। स्कूलों और सरकारी विभागों के कार्यालयों में विविध कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाएगा। सत्ताधारी राजनीतिक पार्टियों के नुमाइंदों समेत विपक्षी पार्टियों के लोग देश के भावी कर्णधारों की सामाजिक सुरक्षा एवं विकास की बड़ी-बड़ी बातें करेंगे। विज्ञापन और होर्डिंग्स का बाजार होगा। या यूं कहें कि वे सभी बातें होंगी जो लोक लुभावन तो होंगी लेकिन वास्तविक धरातल पर खरा नहीं उतरेंगी। बस नहीं होंगी तो नेहरू के सपनों को साकार करने की जमीनी कवायद की पहल। हर बार की तरह इस बार भी 14 नवंबर का दिन बाल दिवस के रूप में मना लिया जाएगा। फिर खत्म हो जाएगी देश के कर्णधारों की सामाजिक सुरक्षा के लिए किया गया वादा। इसी के साथ हम भी एक आशा को जीवित रखेंगे कि कभी तो सुबह होगी, जब देश के भावी कर्णधारों के लिए देखा गया नेहरू का सपना साकार होगा।
लेखक-ज्योतिषाचार्य पं विनोद चौबे , संपादक ''ज्योतिष का सूर्य'' हिन्दी मासिक पत्रिका भिलाई , 09827198828

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