ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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रविवार, 20 नवंबर 2011

सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म

सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म
मित्रों जीवन का सार तत्व कुछ इस प्रकार है जो एक जीवन को संवारने का प्रमुख माध्यम है क्योंकि जीव मिथ्या है पर आत्मा रूपी परम ब्रह्म अटल है सत्य है अविनाशी है ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ अर्थात् ब्रह्म सत्य और अनन्त ज्ञान-स्वरूप है । इस विश्वातीत रूप में वह उपाधियों से रहित होकर निर्गुण ब्रह्म या परब्रह्म कहलाता है । जब हम जगत् को सत्य मानकर ब्रह्म को सृष्टिकर्ता, पालक, संहारक, सर्वज्ञ आदि औपाधिक गुणों से संबोधित करते हैं तो वह सगुण ब्रह्म या ईश्वर कहलाता है । इसी विश्वगत रूप में वह उपास्य है । ब्रह्म के व्यक्त स्वरूप (माया या सृष्टि) में बीजावस्था को हिरण्यगर्भ (सूत्रात्मा) कहते हैं । आधार ब्रह्म के इस रूप का अर्थ है सकल सूक्ष्म विषयों की समष्टि । जब माया स्थूल रूप में अर्थात् दृश्यमान विषयों में अभिव्यक्त होती है तब आधार ब्रह्म वैश्वानर या विराट कहलाता है ।

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