ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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शनिवार, 21 जनवरी 2012

क्या होता है धर्म और क्या अन्तर है धर्म और सम्प्रदाय में..?

क्या होता है धर्म और क्या अन्तर है धर्म और सम्प्रदाय में...?
धर्म “धृ” धातु से निष्पन्न है, जिसका सरल अर्थ “धारण करना है” अर्थात् जिनसे लोक, परलोक, स्वास्थ्य, समाज, आदि का धारण होता है, वे सभी धर्म के अन्तर्गत समाहित होते हैं। इसीलिये धर्म या धार्मिक मूल्यों के अन्तर्गत शिष्टाचार के मापदण्ड, नैतिक-नियम, लौकिक-नियम, शरीर के प्रति धर्म, समाज के प्रति धर्म, अन्य प्राणियों के प्रति धर्म यहाँ तक की पेड़-पौधे आदि वनस्पति जगत के प्रति भी धर्म के रूप में नियमों की वृहद व्याख्यायें मिलती हैं।
‘धर्म’ इस शब्द की आयु ऋग्वेद से लेकर आजतक लगभग चार हज़ार वर्षों की है। प्रथमतः ऋग्वेद में इसका दर्शन एक नवजात शिशु के समान होता है जो अस्तित्त्व में आने के लिये हाथ-पैर फैलाता जान पड़ता है। वहाँ यह ‘ऋत्’ के रूप में दृष्टिगत होता है जो सृष्टि के अखण्ड देशकालव्यापी नियमों हेतु प्रयुक्त हुआ।
वैदिक मन्त्रों का वर्गीकरण चार संहिताओं में करने वाले वेदव्यास के अनुसार प्रकृति के साथ-साथ व्यक्ति, राष्ट्र एवं लोक-परलोक सबको धारण करने का शाश्वत् नियम ‘धर्म’ है- धारणाद्धर्म इत्याहुधर्मों धारयते प्रजाः। /यतस्याद्धारण संयुक्तं स धर्म इति निश्चयः।।१
वैदिक ऋषियों से लेकर वेदव्यास जैसे महाभारतकार एवं चाणक्य जैसे कूटनीतिज्ञ भी मानव की उन्नति एवं समाज की सम्यक्गति का कारण धर्म को ही मानते हैं। धर्म२ शब्द ‘धृ’ धातु (ध×ा् धारणे) से बना है, जिसका तात्पर्य है धारण करना, आलम्बन देना, पालन करना। धर्म सम्पूर्ण जगत् को धारण करता है, सबका पालन-पोषण करता है और सबको अवलम्बन देता है इसलिये सम्पूर्ण जगत् एकमात्रा धर्म के ही बल पर सुस्थिर है। ‘धृ’ धातु से बने धर्म का अर्थ वृष भी है-‘वर्षति अभीष्टान् कामान् इति वृषः।’३ अर्थात् प्राणियों की सुख-शान्ति के लिए, उनके अभिलाषित पदार्थों की जो वृष्टि करे तो दूसरी ओर धर्म का नाम ‘पुण्य’ भी है-‘पुनाति इति पुण्यम्’ यानि जो प्राणियों के मन-बुद्धि-इन्द्रियों एवं कर्म को पवित्रा कर दे। मनु के अनुसार धर्म के दस लक्षण है-धृतिक्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिनिन्द्रिय निग्रहः।/धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्।।४

भारतीय मनीषियों की मान्यता रही है कि यह संसार नैतिक नियमों के अधीन है और जीवन मनुष्य को नैतिक चुनाव का ही अवसर प्रदान करता है। शायद इसीलिए उन्होंने धर्म अथवा नैतिकता को अर्थशास्त्र का मूल आधार घोषित किया था। किन्तु इसका यह मंतव्य कतई नहीं है कि वे मनुष्य के जीवन में अर्थ के महत्व को स्वीकार ही नहीं करते थे। वे जिस बात पर जोर देते थे वह यह है कि अर्थ (धन) का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान होते हुए भी यह जीवन का साधन है, साध्य नहीं। यह जीवन का एक भाग है, संपूर्ण जीवन नहीं। यह चार पुरुषार्थों में से केवल एक पुरुषार्थ है। अत: वे अर्थ के उचित समन्वय पर जोर देते थे। किन्तु यदि कभी अर्थशास्त्र के नियमों एवं धर्मशास्त्र के नियमों में विरोध उत्पन्न हो जाए तो नि:संकोच रूप से धर्मशास्त्र के नियमों को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। इस संबंध में कौटिल्य, यज्ञावल्क्य, नारद आदि ने स्पष्ट रूप से घोषणा की थी कि-"अर्थशास्त्रास्तु बलवद्धर्मशास्त्रामिति स्थिति:"- (कौटिल्य; नारद 39, याज्ञ 11.21)। यही कारण था कि भारतीय चिंतन में अर्थ को धर्म की तुलना में द्वितीय स्थान दिया गया था। चार पुरुषार्थों के क्रम में धर्म के बाद ही अर्थ का स्थान इस बात का प्रमाण है। महाभारत के शांतिपर्व में नकुल व सहदेव ने धन और धर्म के बीच बहुत ही सुन्दर समन्वय का प्रतिपादन करते हुए कहा है कि धर्मयुक्त धन और धनयुक्त धर्म ही संसार में अच्छे परिणाम ला सकता है। इस प्रकार भारतीय चिंतक एडम स्मिथ की तरह अर्थशास्त्र को केवल "धन का विज्ञान" स्वीकार नहीं करते। हिन्दू चिंतन के अनुसार अर्थशास्त्र को धर्मशास्त्र के नियमों व मर्यादाओं के प्रकाश में ही काम करना चाहिए। जब कभी भी इस नियम का उल्लंघन हुआ तब समाज को कष्ट उठाने पड़े।
यहां एक बात जो विशेष रूप से ध्यान देने की है वह यह है कि प्राचीन भारतीय मनीषियों ने अपने विचारों को व्यावहारिक रूप देने के लिए उस समय की सामाजिक संरचना में ऐसी संस्थाओं एवं व्यवस्थाओं का विकास किया जिनके माध्यम से नैतिक मूल्यों एवं सामाजिक आदर्शों के अनुरूप व्यवहार करना व्यक्ति की रोजमर्रा की दिनचर्या का अभिन्न अंग बन जाए। इस दृष्टि से हम चार पुरुषार्थों की कल्पना, वर्णाश्रम व्यवस्था, संयुक्त परिवार प्रणाली, शिक्षा की गुरुकुल प्रणाली, पंच महायज्ञ व अन्य विभिन्न प्रकार के यज्ञ, दान, दक्षिणा, इष्टापूर्त, सर्वव्यापक ब्राहृ की अवधारणा, पुनर्जन्म, कर्मफल, प्रकृति के प्रति जननी भाव, दया, परोपकार, परहित एवं त्याग जैसे गुणों को महत्व, स्नेह, सहयोग, शुचिता, सात्विकता, सहभागिता एवं सर्वकल्याण की भावना पर जोर आदि भारतीय जीवन की विषेषताओं को देख सकते हैं। इस प्रकार प्राचीन चिंतन हमें उन सामाजिक-नैतिक मूल्यों की याद दिलाता है जिनके आधार पर युगानुकूल नवीन सामाजिक-आर्थिक संरचना की जानी चाहिए। इसके अनुसार संग्रह की बजाय त्याग, स्वार्थ की बजाय सेवा, शोषण की बजाय पोषण, संघर्ष की बजाय सहयोग, घृणा की बजाय स्नेह, संपत्ति पर पूर्ण निजी या सरकारी स्वामित्व की बजाय ईश्वर स्वामित्व - इस नयी अर्थ रचना के आधार सूत्र हो सकते हैं।

धार्मिकता एवं सम्प्रदायिकता का अन्तर
 आईये सबसे गरमा- गरम विषय के सबसे जलते शब्द "धर्म को " उठाते हैं ।
पता नही हमारे महान देश भारतवर्ष के तथाकथित महान प्रबुद्ध लोग "धर्म" शब्द से
इतना डरते क्यों हैं ? मैं तो यही समझ पाया हूँ कि देश के अधिकांश "महान प्रबुद्ध " लोगों ने धर्म के बारे में अंगरेजी भाषा के "रिलीजन " के माध्यम से ही जाना ,है न की धर्म को धर्म के माध्यम से । यही कारण है कि वे धर्म को "सम्प्रदाय "के पर्यायवाची के रूप में ही जानते हैं ,जबकि सम्प्रदाय धर्म का एक उपपाद तो हो सकता है पर मुख्य धर्म रूप नही ।
"धर्म प्राकृतिक ,सनातन एवं शाश्वत तथा स्वप्रस्फुटित (या स्वस्फूर्त )होता है : : इसे कोई प्रतिपादित एवं संस्थापित नही करता है : जब कि सम्प्रदाय किसी द्वारा प्रतिपादित तथा संस्थापित किया जाता है "|
आखिर धर्म ही क्यों ?
संस्कृत व्याकरण के नियम "निरुक्ति " के अनुसार धर्म शब्द की व्युत्पत्ति " धृ " धातु से हुयी है ; निरुक्ति के अनुसार जिसका अर्थ है ' धारण करना" {मेरे अनुसार धारित या धारणीय है अथवा धारण करने योग्य होता है } क्यों कि पृथ्वी हमें धारण करती है और इसी कारण से इसे धरणी कहते हैं|
अतः स्पष्ट है ''धर्म का अर्थ भी धारण करना ही होगा ''
इसे इस प्रकार समझें " धृ + मम् = धर्म ''
धारण करना है तो '' हमें धर्म के रूप में क्या धारण करना है ?''

आप को धारण करना है '' अपने कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व ''
या'' फ़रायज़ और जिम्मेदारियां '' या'' ड्यूटी एंड रेसपोंसबिलटीज [[ लायेबिलटीज ]] ''
धार्मिक व्यक्ति सदैव एक अच्छा समाजिक नागरिक होता है क्यों कि वह धर्मभीरु होता है और एक धर्मभीरुव्यक्ति सदैव समाजिक व्यवस्था के प्रति भी भीरु अर्थात प्रतिबद्ध ही होगा परन्तु एक सम्प्रदायिक व्यक्तिरूढ़वादी होने के कारण केवल अपने सम्प्रदाय के प्रति ही प्रतिबद्ध होता है।" इसलिए मेरी दृष्टि में धार्मिक होना,सम्प्रदायिक होने की अपेक्षा एक अच्छी बात है . अभी तक मैं ने दो ही तथ्य कहे हैं :-- १ "धर्म प्राकृतिक होता ही ; जब कि सम्प्रदाय संस्थापित एवं प्रतिपादित होता है"। २ " सम्प्रदायिक होने की अपेक्षा धार्मिक होना ही उचित होगा "।
भारत के परिपेक्ष में संप्रदाय के आलावा एक शब्द ' पंथ ' भी प्रयोग में आता है |
"पंथ" शब्द का अर्थ पथ/ राह /रास्ता /दिशा " होता है ।''सम्प्रादाय एवं पंथ दोनों का भाव व उद्देश्य एक ही होता है,परन्तु '' पन्थ '' में मुझे सम्प्रदाय की अपेक्षा गतिशीलता अनुभव होती है | मैं शब्दों के हेरफेर से फ़िर से दोहरा रहा हूँ ,"धर्मों को कोई उत्पन्न नही करता ,वे प्राकृतिक हैं उनकी स्थापना स्वयं प्रकृति करती है ।" जबकि सम्प्रदाय के द्वारा हम में से ही कोई महामानव आगे आ कर , कुछ नियम निर्धारित करता है ,यहाँ तक कि पूजा पद्धति भी उस में आ जाती है | हर युग में कोई युगदृष्टा महा मानव पीर ,औलिया ,रब्बी ,मसीहा या ,पैगम्बर के रूप में सामने आता है अथवा दूसरे शब्दों में कहें तो प्रकृति द्वारा चुना जाता है ; जो देश क्षेत्र एवं युग-काल विशेष कि परिस्थियों की आवश्यकताओं के परिपेक्ष्य में मानव समाज के समुदायों को उन्ही के हित में आपसमें बांधे रखने के लिए एवं सामाजिक व्यवस्था को व्यवस्थित रखते हुए चलाने के लिए ; जीवन के हर व्यवहारिक क्षेत्र के प्रत्येक सन्दर्भों में समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए , समाज व एक दूसरों के प्रति कुछ उत्तर दायित्व एवं कर्तव्य निर्धारित करता है :उनके परिपालन के लिए कुछ नियम प्रतिपादित करता है और "समान रूप से एक दूसरे के प्रति 'प्रतिबद्धता 'के समान नियमों को स्वीकार करने एवं उनका परिपालन करने वाले समुदाय को ही एक '' सम्प्रदाय '' कह सकते हैं | सम्प्रदाय के निर्धारित नियम वा सिद्धान्त किसी ना किसी रूप में लिपिबद्ध या वचन-बध्द होते हैं,| देश - काल एवं समाज की , चाहे कैसी भी कितनी ही बाध्यकारी परिस्थितियाँ क्यों न हों उन नियमों में कोई भी परिवर्तन या संशोधन अमान्य होता है।
यहाँ पर ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि जो नियम देश युग-काल के सापेक्ष निर्धारित किए गए थे वे यदि परिस्थितयों युग -काल के बदलने के साथ साथ ,नई परिस्थितियों एवं युग -काल के परिपेक्ष्य में यदि संशोधित तथा परिवर्तित नही किए जाते तो वह रूढ़वादिता को जन्म देते हैं और " रूढ़वादिता के गर्भ से ही साम्प्रदायिकता जन्म लेती है!
ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे , भिलाई, दुर्ग (छ.ग.)09827198828

9 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
--
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी लगाई है!
सूचनार्थ!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
--
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी लगाई है!
सूचनार्थ!

sangita ने कहा…

आपकी पोस्ट ज्ञानवर्धक है | इस विषय में मेरा मानना है कि धर्म अब लोगों के अनुसरण का माध्यम न होकर मात्र दिखावा भर रहा गया है और कुछ सफ़ेद- पोश, इस के द्वारा भोले लोगों को अपना निशाना बना रहे हैं |

ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे ने कहा…

संगीता जी.... सर्वप्रथम आपको सहृदय धन्यवाद ..आज धर्म का जब भी नाम लिया जाता है एक दूसरे विरोधी राजनीतिक मौका परस्तों को केवल अपना वोटबैंक देखने लगते हैं..अभी अभी हाल में देखिए..श्री रूश्दी जी के साथ क्या हुआ ...इसी संदर्भ को ध्यान में रखते हुए मैने इस पोस्ट को प्रकाशित किया था..की कम से कम साहित्यकारों को तो इस पचड़े में मत डालो..

ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे ने कहा…

आद.ब्लॉगर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) जी आपको सादर प्रणाम ।।। आप तो हम लोगों के मार्गदर्शक हैं..आपने हमारे इस लेख को अपने ब्लाग चर्चा मंच पर जोड़ा इसके लिए आप सहित आपके सभी ब्लाग चर्चा मंच के सभी सदस्यों का आभार...

बेनामी ने कहा…

धर्म का अर्थ - सत्य, न्याय एवं नैतिकता (सदाचरण) ।
व्यक्तिगत धर्म- सत्य, न्याय एवं नैतिक दृष्टि से उत्तम कर्म करना, व्यक्तिगत धर्म है ।
सामाजिक धर्म- मानव समाज में सत्य, न्याय एवं नैतिकता की स्थापना के लिए कर्म करना, सामाजिक धर्म है । ईश्वर या स्थिरबुद्धि मनुष्य सामाजिक धर्म को पूर्ण रूप से निभाते है ।
धर्म संकट- सत्य और न्याय में विरोधाभास की स्थिति को धर्मसंकट कहा जाता है । उस स्थिति में मानव कल्याण व मानवीय मूल्यों की दृष्टि से सत्य और न्याय में से जो उत्तम हो, उसे चुना जाता है ।
धर्म को अपनाया नहीं जाता, धर्म का पालन किया जाता है । धर्म के विरुद्ध किया गया कर्म, अधर्म होता है ।
व्यक्ति के कत्र्तव्य पालन की दृष्टि से धर्म -
राजधर्म, राष्ट्रधर्म, मनुष्यधर्म, पितृधर्म, पुत्रधर्म, मातृधर्म, पुत्रीधर्म, भ्राताधर्म इत्यादि ।
धर्म सनातन है भगवान शिव से लेकर इस क्षण तक व अनन्त काल तक रहेगा ।
धर्म एवं ‘ईश्वर की उपासना द्वारा मोक्ष’ एक दूसरे आश्रित, परन्तु अलग-अलग विषय है । ज्ञान अनन्त है एवं श्रीमद् भगवद् गीता ज्ञान का सार है ।
राजतंत्र में धर्म का पालन राजतांत्रिक मूल्यों से, लोकतंत्र में धर्म का पालन लोकतांत्रिक मूल्यों से होता है ।
कृपया इस ज्ञान को सर्वत्र फैलावें । by- kpopsbjri

बेनामी ने कहा…

आप द्वारा लिखा लेख बहुत सुन्दर है । परन्तु सत्य, न्याय और नीति को धारण करके कर्म करना धर्म है । सत्य, न्याय और नीति में से किसी एक को धारण करना, धर्म का एक रूप या पंथ हो सकता है, परन्तु धर्म नहीं । धर्म संकट की स्थिति में सत्य और न्याय में से किसी एक को चुना जाता है ।

बेनामी ने कहा…

धर्म का अर्थ - सत्य, न्याय एवं नीति (सदाचरण) को धारण करके कर्म करना एवं इनकी स्थापना करना ।
व्यक्तिगत धर्म- सत्य, न्याय एवं नीति को धारण करके, उत्तम कर्म करना व्यक्तिगत धर्म है ।
असत्य, अन्याय एवं अनीति को धारण करके, कर्म करना अधर्म होता है ।
सामाजिक धर्म- मानव समाज में सत्य, न्याय एवं नैतिकता की स्थापना के लिए कर्म करना, सामाजिक धर्म है । ईश्वर या स्थिरबुद्धि मनुष्य सामाजिक धर्म को पूर्ण रूप से निभाते है । वर्तमान में न्यायपालिका भी यही कार्य करती है ।
धर्म को अपनाया नहीं जाता, धर्म का पालन किया जाता है । धर्म पालन में धैर्य, संयम, विवेक जैसे गुण आवश्यक है ।
धर्म संकट- सत्य और न्याय में विरोधाभास की स्थिति को धर्मसंकट कहा जाता है । उस स्थिति में मानव कल्याण व मानवीय मूल्यों की दृष्टि से सत्य और न्याय में से जो उत्तम हो, उसे चुना जाता है ।
व्यक्ति विशेष के कत्र्तव्य पालन की दृष्टि से धर्म -
राजधर्म, राष्ट्रधर्म, मनुष्यधर्म, पितृधर्म, पुत्रधर्म, मातृधर्म, पुत्रीधर्म, भ्राताधर्म इत्यादि ।
जीवन सनातन है परमात्मा शिव से लेकर इस क्षण तक व अनन्त काल तक रहेगा ।
धर्म एवं मोक्ष (ईश्वर की उपासना, दान, पुण्य, यज्ञ) एक दूसरे पर आश्रित, परन्तु अलग-अलग विषय है ।
धार्मिक ज्ञान अनन्त है एवं श्रीमद् भगवद् गीता ज्ञान का सार है ।
राजतंत्र में धर्म का पालन राजतांत्रिक मूल्यों से, लोकतंत्र में धर्म का पालन लोकतांत्रिक मूल्यों से होता है । by- kpopsbjri

बेनामी ने कहा…

धर्म- सत्य, न्याय एवं नीति को धारण करके उत्तम कर्म करना व्यक्तिगत धर्म है । धर्म के लिए कर्म करना, सामाजिक धर्म है । धर्म पालन में धैर्य, विवेक, क्षमा जैसे गुण आवश्यक है ।
शिव, विष्णु, जगदम्बा के अवतार एवं स्थिरबुद्धि मनुष्य सामाजिक धर्म को पूर्ण रूप से निभाते है । लोकतंत्र में न्यायपालिका भी धर्म के लिए कर्म करती है ।
धर्म संकट- सत्य और न्याय में विरोधाभास की स्थिति को धर्मसंकट कहा जाता है । उस परिस्थिति में मानव कल्याण व मानवीय मूल्यों की दृष्टि से सत्य और न्याय में से जो उत्तम हो, उसे चुना जाता है ।
अधर्म- असत्य, अन्याय एवं अनीति को धारण करके, कर्म करना अधर्म है । अधर्म के लिए कर्म करना भी अधर्म है ।
कत्र्तव्य पालन की दृष्टि से धर्म (किसी में सत्य प्रबल एवं किसी में न्याय प्रबल) -
राजधर्म, राष्ट्रधर्म, मंत्रीधर्म, मनुष्यधर्म, पितृधर्म, पुत्रधर्म, मातृधर्म, पुत्रीधर्म, भ्राताधर्म इत्यादि ।
जीवन सनातन है परमात्मा शिव से लेकर इस क्षण तक एवं परमात्मा शिव की इच्छा तक रहेगा ।
धर्म एवं मोक्ष (ईश्वर के किसी रूप की उपासना, दान, तप, भक्ति) एक दूसरे पर आश्रित, परन्तु अलग-अलग विषय है ।
धार्मिक ज्ञान अनन्त है एवं श्रीमद् भगवद् गीता ज्ञान का सार है ।
राजतंत्र में धर्म का पालन राजतांत्रिक मूल्यों से, लोकतंत्र में धर्म का पालन लोकतांत्रिक मूल्यों से होता है ।

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