ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

मैं उत्तर प्रदेश हुँ... संपादकीय



 
''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका.
 का 31 सवें अंक (फरवरी-2012) का आवरण पृष्ठ है।
 

 गंगा-जमुनी संस्कृति का उद्गम स्थल रहा उत्तर प्रदेश आज अपनी पहचान के संकट से गुजर रहा है। धर्म व जाति आधारित राजनीति का बोलबाला है और विकास के रथ का पहिया टूटकर किंचड़ जा फंसा है महाभारत के कर्ण ने अकिंचन बन सहायता की गुहार भले न की हो लेकिन आज उत्तर प्रदेश अपने करूण स्वर से जरूर पुकारने को मजबूर है, क्योंकि  मराठी मानुष की आवाज उठा पहले बालासाहब ठाकरे और अब राज ठाकरे जैसे नेताओं ने तो घोर अपमान किया ही जिसे राजनीतिक वोट भुनाने के लिए राहुल गांधी ने तो भिखारी शब्द का प्रयोग कर उत्तर प्रदेश के बेबसी को जगजाहिर कर दिया। लंबे अरसे बाद पूर्ण बहुमत से बसपा ने सरकार बनाने में सफल भी रही, किन्तु उनके पार्टी के विधायक व मंत्रीयों के द्वारा लड़की और महिलाओं पर अनाचार जैसे सामाजिक अभिशप्त घिनौने कार्यों से पिछले पांच वर्षों तक उत्तर प्रदेश सुर्खियों में रहा। ऐसे में उत्तर प्रदेश की दर्द भरी यह कराहें भरना ला•ामी है।
राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जो दिल्ली की सत्ता को बहुत रास आता है। 2012 के विधानसभा चुनावों को 2014 में होने वाले लोकसभा के आम चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। वैसे तो हर राज्य के चुनावी नतीजे अहम होते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है, जो दीर्घकाल से देश की राजनीतिक दशा व दिशा को तय करता आ रहा है। लेकिन 18 मंडल, 75 जनपद, 312 तहसील, 80 लोकसभा, 30 राज्यसभा के साथ 403 सदस्यीय विधानसभा और 20 करोड़ की आबादी वाले इस विशालकाय प्रदेश में विकास कहीं पीछे छूट गया है और जाने-अनजाने में यह सूबा धर्म व जाति आधारित राजनीति की प्रयोगशाला बन गया है। हम यहां सिर्फ यूपी की बात करेंगे। क्या चल रहा है यूपी की राजनीति में? लेकिन इससे पहले प्रदेश की जातीय समीकरण को सुलझा लेते हैं।
यूपी के बारे में एक कहावत बहुत प्रचलित है कि यहां के मतदाता अपना वोट नेता को नहीं, जाति को देते हैं। हर बार की तरह इस बार भी मतदाता वोट तो जाति को देंगे लेकिन जीतेगी राजनीति ही। जाति के इसी समीकरण को अपने-अपने पक्ष में करने के लिए तमाम राजनीतिक दल और प्रत्याशी अपने लुभावने वादों से मतदाताओं को फांसने में जुट गए हैं, लेकिन संयोगवश किसी राजनीतिक दल के पास न तो कोई मुद्दा है न कोई एजेंडा। ऐसे में मतदाताओं के पास एकमात्र विकल्प जाति का होता है और जिस दल का जातीय समीकरण मजबूत होगा, राजनीति उसे सत्ता सुख का ताज पहनाएगी। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जिस पार्टी को 30 प्रतिशत वोट मिलेंगे, उसकी जीत तय है। जहां तक जातीय समीकरण की बात है तो प्रदेश में 16 प्रतिशत वोट अगड़ी जाति के हैं। इनमें 8 प्रतिशत ब्राह्मण, 5 प्रतिशत ठाकुर और 3 प्रतिशत अन्य हैं। 35 प्रतिशत पिछड़ी जातियों में 13 प्रतिशत यादव, 12 प्रतिशत कुर्मी और 10 प्रतिशत अन्य हैं। इसके अलावा 25 प्रतिशत दलित, 18 प्रतिशत मुस्लिम, 5 प्रतिशत जाट और एक फीसदी अन्य हैं। पिछले चुनाव में मायावती सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के तहत 25 प्रतिशत दलित, 8 प्रतिशत ब्राह्मण और 18 प्रतिशत मुस्लिम वोटों को जोडऩे में काफी हद तक सफल रहीं थी और यूपी में बसपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार का यही राज था।
लेकिन जमीनी हकीकत इस बात की गवाह है माया राज में बलात्कार और भ्रष्टाचार ये दोनों भूत ने माया को लगभग दर्जनों से अधिक मंत्री व विधायकों को पार्टी से निकाल बाहर  करना पड़ा। इस परीदृश्य को आप यह कह सकते हैं जिस प्रकार दावे-प्रतिदावे कर उ.प्र. के पिछले चुनाव में 25 से 30 प्रतिशत वोट पाकर अपने बलबुते पर सरकार बनाने में कामयाब तो रहीं, पर जनता अपने आपको ठगा सा एहसास कर रही है, क्योंकि जमीनी हकीकत विकास के नाम पर लगभग जीरो है।
 आप इसे सीधे -साधे शब्दों में ठगी कह सकते हैं। वो ठगी जो यहां की जनता से बार-बार की जाती है। जातिवाद के जहर से पैदा हुई राजनैतिक अराजकता और भ्रष्टाचार के मौजूदा माहौल ने यूपी को विध्वंश के कगार पर ला खड़ा किया है। फिर भी चुनाव के मध्य एक हिली हुई बुनियाद पर नयी इमारत खड़ा करने का दावा किया जा रहा है? क्या यह बेमानी नहीं है तो और क्या है? कांग्रेस का यूपी विजन और भाजपा का घोषणापत्र मुंगेरीलाल के वो सपने हैं, जिन्हें देखने से भी यूपी की जनता अब डरती है।
एक ऐसे वक्त में जब यूपी की जनता को पूर्व की सरकारों ने या तो मुफ्तखोरी या फिर भुखमरी की आदत डलवा रखी हो, प्रदेश के आर्थिक साम्राज्य पर पोंटी चड्ढा जैसे माफियाओं का कब्ज़ा हो, नए पूंजी निवेश की सम्भावना खत्म हो चुकी हो, प्रदेश के तमाम निगमों पर ताला लग चूका हो, बिजली के मांग और आपूर्ति के बीच अंतर सारी हदें तोड़ रहा हो, सरकारी विभागों में आधी आबादी सेवानिवृति के कगार पर हो, वहीं आधे पदों पर बरसों से कोई भर्ती सिर्फ  इसलिए नहीं हो कि काम के बदले देने के लिए पैसा न हो, शिक्षकों से लेकर मालियों तक की तनख्वाह देने में सरकार के पसीने छूट रहे हों, क्या भाजपा और कांग्रेस द्वारा दिखाए जा रहे सपनों को सहजता से स्वीकार कर एक यूपी की जनता सुनहरे कल की कल्पना करनी चाहिए? शायद नहीं! ये मुश्किल होगा। आज यूपी पर लगभग 2 लाख करोड़ रुपयों का कर्ज है। सालाना प्रति व्यक्ति आय लगभग 26 हजार रूपए है जो देश के औसतन प्रति व्यक्ति आय 54,835 की आधी है। आज देश के कुल घाटे के 13 फीसदी के लिए केवल यूपी जिम्मेदार है। ऐसे में कैसा विजन कैसा राम-राज्य?
दरअसल आज यूपी जिस हालात में है उसके लिए कांग्रेस ,भाजपा उतनी ही जिम्मेदार हैं जितनी मुलायम की सपा और मायावती की बसपा। कांग्रेस पाने विजन और भाजपा अपने घोषणापत्र में सिर्फ सब्जबाग दिखाती है, दरअसल यूपी की जनता की जरूरतें अलग हैं, उसकी व्यथा अलग है। दोनों ही पार्टियां जनता की दुखती रग के ठिकाने को पहचान पाने और फिर उसे सहलाने में पूरी तरह से असफल रही हैं।
कांग्रेस द्वारा अपने विजन में अगले पांच सालों में उत्तर प्रदेश में 20 लाख नौकरियां देनेका वादा किया गया है, वहीं भाजपा इतने ही समय में एक करोड़ नौकरियां देने का वादा कर रही है। ये कैसे संभव है जब प्रदेश के सिंचाई से लेकर बिजली विभाग तक में खाली लाखों  पदों को सिर्फ  इसलिए नहीं भरा जा सका क्योंकि उनके पास अपने कामगारों को देने को पैसा ही नहीं है।
उत्तर प्रदेश के बिजली विभाग में लगभग सवा लाख -पद खाली हैं, सिंचाई, स्वास्थ्य और लोक निर्माण विभाग में भी तृतीय श्रेणी के पदों पर लंबे अरसे से भर्तियाँ नहीं हुई है, इसकी वजह धन की अनुपलब्धता और विभागों की बेहद जीर्ण-शीर्ण होती जा रही आर्थिक स्थिति है। वो कांग्रेस ही थी जिसके कार्यकाल में उत्तर प्रदेश के आधा दर्जन से अधिक निगम या तो बंद हो गए या बीमार घोषित कर दिए गए, वहीं भाजपा ने सत्ता संभालने के बाद यहाँ के उद्योगों को निजीकरण के जाल में ऐसा उलझाया कि वो आज तक नहीं उबरे हैं। सपा ने फिर बसपा ने प्रदेश में पिछले 10 सालों में लगभग 2 लाख  प्राथमिक  शिक्षकों की नियुक्ति तो कर ली, लेकिन उन्हें तनख्वाह देने में सरकार के पसीने छूट रहे हैं, कई -कई सालों से काम कर रहे शिक्षकों को अभी भी साल -साल भर पर आधा तिहाई वेतन मिल रहा है, वो भी भारी घुस देकर।
कांग्रेस ने अपने  विजन में सभी ग्रामीण परिवारों में एक -एक मोबाइल फोन देने का वादा किया है , वही भाजपा किसानों के एक लाख तक के कर्जे को माफ करने का वायदा किया गया है, कांग्रेस ने पहले ही पचास हजार तक के कर्ज को माफ करने की बात कही है। कांग्रेस द्वारा किसानों को उन्नत बीज  और बाजार उपलब्ध कराने की भी बात कही गयी है। यूपी का दुर्भाग्य है कि यहाँ के किसान राजनीति के दुश्चक्र से पैदा हुए आर्थिक दमन के आगे समर्पण कर चुके हैं, ज्यादातर सीमांत कृषकों ने या तो दूसरे रोजगार अपना लिए हैं या फिर खेती के नए और अवैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर सब कुछ गँवा दिया है, गंगा और यमुना एक्प्रेस वे किसानों के लिए दैत्य साबित हुए हैं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने वक्त की आवाज को और सरकार के मंसूबों को समझ लिया है, उन्हें लगता है कि खेती किसानी से बेहतर है कि अपनी जमीन उद्योगपतिओं को बेंच दी जाए। कर्ज की माफी की जहाँ तक बात है सरकारे बदलती गयी फसलों के समर्थन मूल्य बैलगाड़ी की तरह ही रहे, ऐसे में कर्ज को माफ कर किसानों के हालात में सुधार करना नामुमकिन है ,जहाँ तक मोबाइल फोन देने का सवाल है, इससे किसानों का कोई भला नहीं होने वाला है। भाजपा ने गरीबी की रेखा से नीचे वालों को दो रूपए किलो की डर से 35 किलो गेंहू देने का वायदा किया है, ये आश्चर्यजनक किन्तु सच है कि यूपी में किसी गरीब के लिए बीपीएल कार्ड बनवाना बेटी की शादी से ज्यादा कठिन हैं।
भाजपा और कांग्रेस दोनों ने प्रदेश को बिजली कटौती से मुक्त करने का भरोसा दिलाया है, कांग्रेस गाँव -गाँव चौबीसों घंटे बिजली देने का वायदा कर रही हैं,ये हास्यास्पद है। प्रदेश में 7500 मेगावाट बिजली की जरुरत है यहाँ के बिजलीघर लाख कोशिशों के बावजूद बमुश्किल 2700-2800 मेगावाट बिजली पैदा कर पाते हैं केंद्रीय पूल की बिजली को मिला दने तो भी लगभग 3,000 मेगावाट बिजली की कमी प्रदेश को हमेशा बनी रहती है। यूपी में हर साल बिजली की मांग लगभग 500 मेगावाट बढ़ जाती है ,पर 1980 के बाद से प्रदेश मे साव्र्जनिक्क्षेत्र का कोई भी नया बिजलीघर नहीं बना ,निजी क्षेत्र मे नए बिजलीघरों के करार तो किये गए लेकिन वो भी कागजों पर ही बिजली पैदा कर रहे हैं।
भाजपा गरीब छात्रों को लैपटॉप और टैबलेट मुफ्त बांटेगी। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में गरीब छात्रों को 12 वीं कक्षा तक सभी पुस्तकें, चार जोड़ी यूनिफार्म, बैग, जूते आदि मुफ्त देने का वादा भी किया है।वहीँ कांग्रेस भी अपने विजन में सभी छात्रों को कंप्यूटर शिक्षा देने का दंभ भर रही है। लेकिन सच्चाई ये है कि अभी प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा का ही आधार स्तंभ मजबूत नहीं हो पाया है, सबसे पहली जरुरत शत-प्रतिशत साक्षरता को तय करने की होनी चाहिए ,आज प्रदेश में माध्यमिक विद्यालयों का अभाव है। आज भी यहाँ के छात्रों को लंबी दूरी तय करकेविद्यालय जाना पड़ता है। शिक्षा विभाग प्रदेश के सर्वाधिक भ्रष्ट विभागों में शुमार हैं, शिक्षक बाबुओं के चंगुल में इस कदर फंसे पड़े हैं कि उनके पास छात्रों के लिए समय ही कम है । सच ये है प्रदेश में वायदों से ज्यादा जरुरत माहौल बदलने की है, और इसके लिए चाहे भाजपा हो चाहे कांग्रेस या फिर कोई और दल, गहरे आत्मबल की जरुरत होगी, जो कि अब तक नहीं दिखा।

     संपादकीय :
 '' मैं उत्तर प्रदेश हुँ। मैने देश को बाल्मीकि, संत तुलसीदास, कबीरदास, सूरदास, प्रेमचंद, निराला, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रा नंदन पंत, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, रामचंद्र शुक्ल, महाबीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त जैसे रचनाकारों को पैदा कियाऔर जिस सूबे की राजनीति ने देश को सर्वाधिक आठ प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर और अटल बिहारी वाजपेयी के रूप में दिए  हैं। मेरा रूतबा भी काफी मायने रखता है क्योंकि मैं देश का सबसे बड़ा प्रदेश हुँ। मेरी साख पर जातिवाद व सम्प्रदायवाद  इन दोनों ने बट्टा लगा दिया है। अभी मैं मात्र एक जातिवाद और समाजवाद का प्रयोगशाल बनकर रह गया हुँ। कोई भी आता है तो सबसे पहले जातीय समीकरण का ही प्रयोग करता है। बाहर किसी प्रदेश में जाता हुं तो मुझे दुतकारा जाता है क्योंकि मैं सबसे बड़ा प्रदेश होने के बावजूद भी क्षेत्रीय पार्टीयों के त्रिकोंणीय या फिर चतुष्कोंणीय चुनाव परीणाम के कारण मेरा वर्चस्व केन्द्र सरकार में टुकड़ों में बंट जाता है जो हमारे शक्ति को क्षीण करता जा रहा है। ''
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सम्पादक,' ज्योतिष का सूर्य ' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका

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