ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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शनिवार, 31 दिसंबर 2011

नववर्ष 2012 की हार्दिक शुभकामनाएं..

देश के सभी सुधी पाठकों को ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका परीवार के तरफ से आंग्ल नववर्ष 2012 की हार्दिक शुभकामनाएं.. 

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

राजनीतिक लहलहाती फसल में अन्ना पौधा मुरझा गया...


राजनीतिक लहलहाती फसल में अन्ना पौधा मुरझा गया...

राजनीतिक लहलहाती फसल में अन्ना पौधा मुरझा गया।
लेकिन धूल से धूसरीत इस तूफान को, ओस नहीं कह सकते,
जब लगी थी लंका में आग तो रावणी मूंछ पर ताव आ गया।
लेकिन हश्र हुआ वही, जो विभीषण बयां नहीं कर सकते।।

अन्ना की आंधी में पानी है आग नहीं ,
जनता के महंगाई झाग से निकलेगी आग।
अब विषैली वाणी, देश सुन सकता नहीं,
राह बहुत कठिन राहुल अब से भी जाग।।

मैं आग हुं अन्ना नहीं, चुनाव का चंदा नहीं,
वोट की ओट में शहीदी-चितओं की राजनीति।
गर शर्म से बेशर्म लोकशाही शर्माती नहीं,
महंगे भ्रष्ट के चोट से, हो ग्रस्त-त्रस्त-अनीति।।

मत चुको राजतिलक से पारंपरीक युवराज,
मनीष की मचल चाल, दिग्गी का ढ़ाल।
मत चलो मदमस्त चाल, जनता का  है आगाज़,
जो आज है कल नहीं रहेगा, नहीं गलेगी तेरी दाल।।

चाहें जो हो रंग लाल, काला, हरा हो या पीला,
केसरीया का सशक्त रंग भगवा ही रहेगा।
होली के रंग में, भारत के अंग अंग में,
अल्हड़ का हो रंग हरा, काला भगवा ही रहेगा।।

-ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे , भिलाई दिनांक 28-12-2011

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

अंधविश्वास के खिलाफ बगराना है अंजोर

अंधविश्वास के खिलाफ बगराना है अंजोर
रायपुर। छत्तीसगढ़ में तंत्र-मंत्र, टोना-टोटके नाम से बड़े पैमाने पर ठगी की घटनाएं हो रही है। हाल ही में 20 नाखून वाले कछुए की आड़ में लूट का मामला उजागर हुआ है। अंधविश्वास के खिलाफ जनजागरण के लिए अनु फिल्मस क्रिएशन्स के बैनर तले छत्तीसगढ़ी डिजीटल फिल्म अंजोर का निर्माण किया जा रहा है। फिल्म का निर्माण सबसे कम उम्र की फिल्म निर्मात्री अनुराधा प्रसाद द्वारा किया ...जा रहा है। इसका निर्देशन अब तक 36 डाक्यूमेंट्री फिल्म का निर्माण करने वाले तपेश जैन है। सत्य घटनाओं पर आधारित इस विषय प्रधान फिल्म में अनुराधा प्रसाद, बाबी राजपूत, सुधाकर सिंह, गजहंस ठाकुर अश्वनी बंजारे, प्रिय वर्षा, विजय धनकर, राजीव शर्मा, माखन महिलांगे, पीआर देवांगन, निशांत देशपांडे, अरूण यादव, धन्नू यादव आदि अभिनय कर रहे हैं। फिल्म में छत्तीसगढ़ में टोनही प्रताडऩा की घटनाओं को रोकने के लिए भी संदेश दिया गया है।
छत्तीसगढ़ के हाना, कविता और यहां के परिवेश को सम्मिलित कर फिल्म को मनोरंजक अंदाज में प्रस्तुत करने का प्रयास है। गीत संगीत कर्णप्रिय हैं और यहां की लोक संस्कृति भी इसमें सम्मिलित होगी। यह जानकारी अनुराधा प्रसाद ने दी।

मुख्यमंत्री की छवि धूमिल करने की साजिश का एक बड़ा खुलासा


मुख्यमंत्री की छवि धूमिल करने की साजिश का एक बड़ा खुलासा



करोड़ों के विज्ञापनों की मांग पूरी नहीं होने पर टी.व्ही. चैनल में डॉ. रमन के खिलाफ प्रसारित हुए मनगढंत समाचार 
रायपुर 19 दिसम्बर 2011/ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की छवि धूमिल करने की साजिश का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। डॉ. रमन सिंह पर मध्यप्रदेश में खदानों के कथित आवंटन में अपने कथित रिश्तेदारों को लाभ पहुंचाये जाने के निराधार आरोप इसलिए लगे, क्योंकि उन्होंने एक निजी टेलीविजन समाचार चैनल द्वारा लगातार की जा रही करोड़ों रूपए के सरकारी विज्ञापन दिए जाने की मांग पूरी नहीं की।
यह मामला आज नई दिल्ली के अंग्रेजी दैनिक ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में उजागर हुआ है, जिसे छत्तीसगढ़ के मीडिया जगत और राजनीतिक हल्कों में आश्चर्य से देखा जा रहा है। इतना ही नहीं बल्कि राज्य का प्रबुध्द वर्ग इसे भारतीय मीडिया में तेजी से फैल रही पेड न्यूज की बीमारी और ब्लैकमेलिंग का एक विकृत नमूना मान रहा है। इसके साथ ही इस प्रकार के कथित निजी टेलीविजन समाचार चैनलों की विश्वसनीयता को लेकर भी प्रबुध्द वर्ग में तरह-तरह के सवाल उठने लगे हैं। इस अंग्रेजी दैनिक के अनुसार संबंधित टी.वी समाचार चैनल ने राज्य सरकार से पेड न्यूज के लिए दो करोड रूपए की मांग रखी। चैनल के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने मुख्यमंत्री को समय-समय पर भेजे गए पत्रों में दबाव डालने के लहजे में इलेक्ट्रानिक मीडिया को दिए जाने वाले विज्ञापनों के बजट में सौ प्रतिशत वृध्दि की मांग करते हुए यह भी शर्त रखी की राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी को पद से हटाया जाए। चैनल के सी.ई.ओ. ने यह भी चेतावनी दी कि मांग पूरी नहीं होने पर उनका चैनल राज्य शासन के विज्ञापनों को वह जगह नहीं देगा। इतना ही नहीं बल्कि मार्च के महीने में मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र में चैनल के सी.ई.ओ. ने लिखा है कि वित्तीय वर्ष 2010-11 में जनसम्पर्क विभाग ने इस टी.वी. समाचार चैनल को लगभग दो करोड रूपए के विज्ञापन जारी किए है, जबकि चैनल का सालाना बजट 20 करोड़ रूपए का है। इन परिस्थितियों में राज्य सरकार की नितियों और योजनाओं को चैनल में जगह नहीं मिल पा रही है। चैनल के सी.ई.ओ. ने पत्र में अपने पत्र में यह भी दावा किया कि उनका समाचार चैनल राज्य का नम्बर वन चैनल है, इसलिए उन्हें राज्य के सर्वाधिक प्रसारित एक दैनिक अखबार के सालाना सरकारी विज्ञापनों के बराबर विज्ञापन मिलना चाहिए। चैनल के सी.ई.ओ. ने मई के महीने में तीन करोड़ रूपए के सालाना पैकेज की मांग रखी। उन्होंने जुलाई माह में भी मुख्यमंत्री को एक और चिट्ठी भेजी, जिसमें उन्होंने लिखा कि उन्हें हर महीने चालीस लाख रूपए या नहीं तो सालाना तीन करोड़ रूपए का विज्ञापन पैकेज मिलना चाहिए, लेकिन अभी तक केवल 15 लाख रूपए ही मिले हैं।
यह भी बताया गया है कि चैनल के सी.ई.ओ. ने सितम्बर माह में भेजे गए एक पत्र में मुख्यमंत्री को लिखा कि छत्तीसगढ़ सरकार के विज्ञापनों के बजट का 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा प्रिंट मीडिया को चला जाता है। उन्होंने सरकार पर दबाव डालने के लहजे में इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए 20 करोड़ रूपए का बजट प्रावधान अनुपूरक बजट में करने की भी मांग की। इस चैनल को राज्य सरकार ने वर्ष 2008-09 में 98 लाख रूपए के विज्ञापन दिए थे, जबकि एक वर्ष के भीतर यह राशि लगभग दोगुनी कर दी गई। इसके बावजूद चैनल द्वारा लगातार विज्ञापनों की राशि बढ़ाने की मांग की जाती रही। चैनल की ओर से 18 सितम्बर को मुख्यमंत्री को एक और पत्र भेजा गया। इसमें भी उन पर दबाव डालने के लहजे में यह लिखा गया कि अगर इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए 20 करोड़ रूपए का अलग बजट नहीं रखा गया तो चैनल द्वारा राज्य सरकार का कोई भी सरकारी विज्ञापन प्रसारित नहीं किया जाएगा। जानकार सूत्रों का कहना है कि इस टी.वी. समाचार चैनल की सरकारी विज्ञापनों की लगातार बढ़ती भूख शांत नहीं कर पाने के कारण उसने राज्य के मुख्यमंत्री के खिलाफ निराधार और मनगढंत समाचार प्रसारित किए। न्यूज चैनल ने जनसम्पर्क विभाग के वरिष्ठतम अधिकारी पर चैनल की मार्केटिंग टीम के साथ दर्ुव्यवहार करने का मनगढंत आरोप भी लगा दिया। यह भी उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इस टेलीविजन समाचार चैनल द्वारा मध्यप्रदेश के कथित खदान आवंटन मामले में उन पर व्यक्तिगत रूप से लगाए गए अनर्गल आरोपों से क्षुब्ध होकर चैनल के खिलाफ एक करोड़ रूपए की मानहानि का कानूनी नोटिस भी भिजवाया है। इधर नई दिल्ली के अंग्रेजी दैनिक में आज इस मामले में सम्पूर्ण तथ्यों के साथ विस्तृत समाचार प्रकाशित होने पर छत्तीसगढ़ के प्रबुध्द वर्ग में कथित निजी टेलीविजन समाचार चैनलों की विश्वसनीयता को लेकर तरह-तरह के सवाल भी उठने लगे हैं।(प्रवक्ता डोट कॉम से साभार )
समाचार का लिंक :-
http://www.indianexpress.com/story-print/889118/

अरे ये मत भूलो, अब हम सभी हैं अन्ना हजारे...


.अरे ये मत भूलो, अब हम सभी हैं अन्ना हजारे...

भारत देश का यही तहरीर है शहीदी के बाद करते हैं इबादत ।
अमरता की ये गाथा अजीब है फिर भी देते हैं हंस कर शहादत।।

श्री गांधी, सावरकर, बोस, चन्द्रशेखर पर आरोप लगाये जाते हैं।
 इन अमर सपूतों के मूर्तियों पर अब माला-फूल चढ़ाएं जाते हैं।।

खुश नसीब रालेगन के अन्ना की अंगड़ाई ने आरटीआई लाई है।
जिसने सराहा अब वही हुए बेगाना,और .. अब ठानी लड़ाई है।।

अंजाम चाहे जो हो अन्ना की अंगड़ाई नही, सीधी लड़ाई है।
चाहें जो लगा लो आरोप मुझे, भ्रष्टाचार मिटाने की कसम खाई है।।

देश की दशा देख, बाल, बृद्ध और तरूणों में तरूणाई आई है।
तिलक लगाकर दे आशीष, जाओ बेटा माँ भारती ने पुकारा है।।

बलिवेदी पर शीश दे सोने की चिड़ीया भारत को बचाना है।
अल्हड़ अठखेलियों के इस घमासान को मज़ा चखाना है।।

काश़ गर भगत, बिस्मील, राजगुरू, सुखदेव को याद करते।
जातिवाद, धर्मवाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद न पलते।।

भारत माँ  के लिए जिसने दिया जीवन उन्हें,
उन ममतामयी माताओं के थे आँचल के फूल।
थे किसी के लाल वे,न था स्व का मलाल उन्हें,
क्या पता था, कलमाड़ी राजा जायेंगे भूल।।

अस भा संसारा भ्रष्ट आचारा, एमआरडीए मैदान में अन्ना बेचारा।
अमानुषी के दिग्विजयी कुटील कपिल के चुभन कांटों न ललकारा।।

मलाई रबड़ी छान रहे, एसी की बुलंद आवाज़,
लल्लू हंसी के लाल फौव्वारे, ताई जी के दुलारे।
क्या यही हो रहा भारत निर्माण का आगाज़,
अरे ये मत भूलो, अब हम सभी हैं अन्ना हजारे।।




-ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे,
(यह कविता उस समय की है जब अन्ना हजारे मुंबई के एमआरडीए मैदान  27-12-2011 से तिन दिवसीय अनशन पर बैठे थे।अपनी 4 मांगों को लेकर, क्योंकि आज ही संसद में सरकारी लोकपाल बील पर चर्चा भी हो रही थी।)

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

मानस में संस्कृति की आकृति भी उकेरे हैं गोस्वामी तुलसीदास जी...

मानस में संस्कृति की आकृति भी उकेरे हैं गोस्वामी तुलसीदास जी...

भारत की विविधवर्णा संस्कृति के अमर गायक तुलसी की अमर कृति 'श्री रामचरित मानस' को लोक ग्रन्थ की संज्ञा अनायास मिल गयी। तुलसी के राम लोक-नायक हैं। तभी तो मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। लेकिन विष्णु के वर्णित अवतार 'राम' के प्रति श्रद्धा ने रामचरित मानस को लोगों के सम्मान का पात्र बनाया। यह एक धर्म ग्रन्थ हो गया। तुलसी के जीवन के करील अनुभव ने नीति के तत्व से इसे विभूषित किया। विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर नीत...िगत दोहे और चौपाइयां प्रमाण में प्रस्तुत होने लगीं। काव्य-शास्त्रियों ने 'यमक-श्लेष-अनुप्रास-उपमा-उपमेय' पर विचार किया। कुछेक साहित्यालोचकों की दृष्टि 'सुघर प्रकृति चित्रण' पर भी गयी। किन्तु जिस संस्कार में इस ग्रन्थ का
तुलसी की 'रामचरित मानस' का एक-एक शब्द संस्कृति का एक-एक अध्याय है। 'धरती सौं कागद और लेखनी सौं वनराई' करके भी भी इसकी पर्याप्त विवेचना नहीं की जा सकती। फिर भी आईये देखते हैं, "रामचरित मानस में लोक-संस्कृति की झलक।"
गोस्वामीजी रामचरित मानस का श्रीगणेश ही करते हैं आंचलिक कहावत 'अपने दही को खट्टा कौन कहता है' से। 'निज कवित्त केहि लाग न नीका। सरस होऊ अथवा अति फीका॥'
-- बालकाण्ड | दोहा-7| चौपाई-6
रामचरित मानस में लोक-संस्कृति की 'जंह-तंह छवि' सुवर्णित है। प्रश्न यह है कि शुरू कहाँ से करें ? मेरी क्षुद्र-मति आकर ठहरती है, 'शिव-सती संवाद' पर।
सती के पिता दक्ष प्रजापति महायज्ञ कर रहे हैं। सभी देव, नर, नाग, किन्नर आमंत्रित हैं, सिवाए महादेव के। सती अपने पति से पिता-गृह जाने की दिक् करती है। महादेव सती से कहते हैं, "तुम्हारा प्रस्ताव कोई बुरा नहीं है। मुझे पसंद भी है। लेकिन ससुराल से निमंत्रण नहीं आना तो अनुचित है। तुम्हारे पिता ने अपनी सभी बेटियों को बुलाया और मुझ से बैरवश तुम्हे भी बिसरा दिया। अनामंत्रित हम वहाँ कैसे जाएँ ?
'कहेहुँ नीक मोरे मन भावा। यह अनुचित नहि नेवत पठावा॥
दच्छ सकल निज सुता बोलाईं। हमरे बैर तुम्हाउन बिसराईं॥'
बालकाण्ड | दोहा-61| चौपाई - 1

ग्रहों का स्वास्थ्य से सम्बन्ध :

ग्रहों का स्वास्थ्य से सम्बन्ध :
मित्रो आज मई ग्रहों के द्वारा स्वस्थ्य के चर्चा करेंगे ! ग्रह नक्षत्रों का असर समाज, प्रकृति, पशु, पक्षी तक देखा जा सकता है ! जहाँ आप के जन्मांक में यदि स्थिति बेहतर होने से आपको बेहतर फल प्राप्त होते हैं वही आप की ग्रह स्थिति आपको बलवान बना सकती है और रोग ग्रस्त भी बना सकती है ! मृत्यु तुल्य कष्ट भी दे सकती है  अर्थात कहा जा सकता है कि आपके जन्मंश में षष्ट, षष्ठेश, लग्न, लग्नेश के आधार पे आपका स्वास्थ्य निर्भर करता है, यदि आपकी कुंडली में लग्न उत्तम है !लग्नेश केंद्र त्रिकोणगत है तो आपका स्वास्थ्य बेहतर रहेगा, षष्टेश की स्थिति से भी आप के रोगों का आकलन किया जा सकता है
! यह निहायत व्यवहारिक बात है कि षष्ठ स्थान का स्वामी यदि पाप ग्रह हो लग्न या अष्टम भाव में हो तो शरीर में फोड़ा, फुंसी आदि अधिक होते हैं! आपके शरीर के अंगों पर क्रमश: अपने अपने अंगों पर ग्रहों का अधिकार होता है ! व्यावहारिक पहलू यह है कि जो भी ग्रह कमजोर स्थिति में होगा उसी अंग को पीड़ा किसी न किसी रूप में पहुंचेगी ! भाव के आधार पे आकलन करने पर रोग के सम्बन्ध में स्थिति पूर्णत: स्पष्ट हो जाती है !
भाव                      राशि                 राशिश              प्रतिनिधित्व अंग और रोग
प्रथम                     मेष                   मंगल                 ललाट, सिर, दिमाग
द्वितीय                    वृष                   शुक्र                  दांत, जबान, मुह, कान, दाहिनी आँख
तृतीय                     मिथुन                बुध               कन्धा, गला, उंगलियाँ
चतुर्थ                     कर्क                   चन्द्र                   फेफड़े, छाती, मानसिक रोग
पंचम                     सिंह                   सूर्य                    पेट सम्बन्धी, आतों सम्बन्धी रोग, हृदय सम्बन्धी रोग
षष्ठ                       कन्या                   बुध                    हर्निया, अपेंडिक्स, पेट सम्बन्धी रोग
सप्तम                     तुला                   शुक्र                     गुप्त रोग, अंडकोष सम्बन्धी रोग, मूत्र सम्बन्धी रोग
अष्टम                     वृश्चिक                मंगल                  पीठ से कमर तक का भाग सम्बन्धी रोग
नवम                      धनु                    गुरु                      कमर से घुटनों के मध्य भाग सम्बन्धी रोग
दशम                      मकर                  शनि                    घुटना सम्बन्धी रोग, गठिया बाई, आदि
एकादश                   कुम्भ                  शनि                  घुटनों से पैर तक के मध्य का भाग एवं रोग
द्वादश                     मीन                    गुरु     पैर का तलवा, पैर की उंगलियाँ, पैर सम्बन्धी रोग, एवं बाई आंख सम्बन्धी रोग

भावों व ग्रहों की स्थिति का आकलन किया जाये तो मनुष्य के स्वाभाविक रोगों का आकलन किया जा सकता है :-
   1. सूर्य यदि कमजोर है तो हृदय रोग, आतों के रोग हो सकते हैं
!   2. चन्द्र  यदि कमजोर है तो सीने के रोग, टी0बी0, शीत विकार, ज्वर अनिद्रा, मानसिक रोग कि वृद्धि होगी !   3. मंगल रक्त विकार, तीव्र ज्वर, चेचक आकस्मिक दुर्घटना, घाव चोट, चोट, ब्लड प्रेशर, आदि रोगों का जन्मदाता होता है !   4. बुध एलर्जी कंधा गला हाथ कि उँगलियों पर किसी न किसी रोग का प्रकोप हो सकता है!   5. गुरु चर्बी कमर से जांघ तक, कफ एवं जिगर सम्बन्धी रोग हो सकते हैं !   6. शुक्र बाँझपन लिकोरिया, मूत्राशय सम्बन्धी रोग, नेत्र रोग मुख रोग, गुप्त रोगों कि उत्पत्ति करता है !   7. शनि वायुविकार, गैस, कफ जन्य रोग, घुटनों में दर्द, वातशूल, श्वंश रोग, शूल रोग, पाँव सम्बन्धी रोगों का जन्म दाता है !कारण:-  लग्न लग्नेश, षष्ठ, षष्ठेश, अष्टम, अष्टमेश, आदि पर अशुभ प्रभाव हो और अशुभ भाव में हो तो इसी दशा में ग्रह अपने अधिकार क्षेत्र के शारीरिक अंगों को प्रभावित करते हैं ! यह भी कह सकते हैं कि ग्रह सम्बन्धी रोगों की अधिकता मनुष्य को प्रभावित करती है !
नोटः हमारे किसी भी लेख को कापी करना दण्डनीय अपराध है ऐसा करने पर उचित कार्यवायी करने को मजबूर हो जाऊंगा। समाचार पत्र पत्रिकाएं हमसे अनुमती लेकर प्रकाशित कर सकते हैं...!.
  ग्रह दोष निवारण:-
   1. सूर्य - यदि सूर्य अरिष्ट हो तो माणिक  धारण करे
! सूर्य मंत्र जप दान आदि करे !   2. चन्द्र- मोती धारण करे ! चन्द्र मंत्र का जाप करे व दान करे !   3. मंगल - मूंगा धारण करे ! मंगल स्त्रोत का पाठ करे ! लाल वस्तुओं का दान करे !   4. बुध- पन्ना धारण करे ! भगवन विष्णु की उपासना, गाय को हरा चारा, हरे वस्त्र, हरी सब्जियां दान करना !   5. ब्रहस्पति- पुखराज धारण करना ! पीला अन्न पीला वस्त्र दान करना, और ब्रहस्पतिवार का व्रत आदि करे !   6. शुक्र- हीरा धारण करे, दुर्गाशाप्त्स्हती का पाठ करे ! शुक्रवार का व्रत करे, कन्या पूजन कन्या भोज आदि करे 7
   7. शनि- नीलम धारण करे, शनि ग्रह का दान करे
! शनिवार का व्रत करे  व शनि मंत्र का जप करे !निष्कर्ष-
ग्रह चाहे अनुकूल स्थिति में हो या प्रतिकूल प्रत्येक दशा में मनुष्य को प्रभावित करते हैं यदि अनुकूल है तो अच्छा फल और प्रतिकूल हैं तो अनिष्ट करी स्थिति के जन्मदाता बन सकते हैं
! अर्थात यह कहा जा सकता है कि अनुकूल ग्रह को ज्यादा अनुकूल स्थिति देना तथा प्रतिकूल ग्रहों को बेहतर स्थिति में लाकर मनुष्य अनिष्ट समय को कट सकता है ! ग्रह हर हल में अपना फल करते हैं ! पूजन, उपचार आदि से उनका प्रभाव  कम या बढाया जा सकता है !
नोटः हमारे किसी भी लेख को कापी करना दण्डनीय अपराध है ऐसा करने पर उचित कार्यवायी करने को मजबूर हो जाऊंगा। समाचार पत्र पत्रिकाएं हमसे अनुमती लेकर प्रकाशित कर सकते हैं...!.

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

अनंग माँ भारती चिखती और चिल्लाती है।

अनंग माँ भारती चिखती और चिल्लाती है।
वोट के खेल में नेता चीर हरण को आतुर हैं।।अनंग माँ भारती..

दुःशासन बना है दुष्ट शासन,
नतमस्तक है भिष्म मोहन,
युधिष्ठिरों को कह भगवा आतंक,
फसल लहलहा रही लाल आतंक,
दुष्ट नीति की अठखेलियों में जनता  पीस जाती है।
असुरों से शोक-संतप्त हो,  आज द्रौपदी पुकारती है।।अनंग माँ भारती..

 कौन्तेय कह चिखती कश्मीर की वादियाँ।
हमारे मांग की सिंदुर यह है रंग केसरीया ।
लाखों सपूत शहीद हुए,और हुयीं बरबादियां।
जिसने हंस हंस कर,खेलीं हैं खून की होलीयां।।

अंधे धृतराष्ट्र, मोहना से रो रो त्राहिमाम पुकारती है।
शिवाजी, गांधी, चन्द्रशेखर, बिस्मील को बुलाती है।।अनंग माँ भारती..


ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे 09827198828

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

हिन्दूओं के अलावा मुश्लिमों के भी हैं आराध्य शनिदेव

हिन्दूओं के अलावा मुश्लिमों के भी हैं आराध्य शनिदेव
ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे 09827198828, भिलाई
पुराणों में जहां शनि को सूर्यपूत्र, छायात्मज, नील, असित तथा मन्दगति आदि अनेकानेक नामों से सम्बोधित किया गया है. ज्योतिष शास्त्रीय ग्रन्थों में क्रूर तथा मन्द रूप में वर्णित किया गया  है. उसे मकर राशि एवं पुष्य नक्षत्र का स्वामी भी कहा गया है. परन्तु जैसा कि पौराणिक साहित्य के अध्ययन से ज्ञान होता है. शनि दयालु, सौम्य, कृष्णभक्त व शिवशिष्य के रूप में भी जाने तथा माने जाते हैं. जनकल्याण की दृष्टि से भी शनि के माध्यम से अनेक कार्य पौराणिक ग्रन्थों में वर्णित है. महाराज दशरथ ने उन्हें स्वतराज स्त्रोत्र से प्रसन्न कर रोहिणी सकट भेदन करने से रोका था।
यद्यपि पौराणिक वांगमय में शनि देव को मृत्युलोक का प्रत्यक्ष दण्डाधिकारी माना गया है. तथापित प्राय: वे उन्ही लोगों को दण्डित करते है  जो पाप या दुष्कर्म में संलग्न रहते हैं. जो लोग अच्छे कर्म करते हैं. जो लोग सत्कर्म करते है जो लोग सत्कर्म में लगे रहते हैं. उन्हें साढ़े साती में भी लाभ- ही-लाभ है. शनि कोप से बचने के लिये भी पश्चाताप और प्रायश्चित विधान में दान-पुण्य, दीन दु:खियों तथा अपंगो की सेवा और सहायता आदि की चर्चा है,ऐसा करने पर शनि की साढ़ेसाती भी अपनी मारक दशा से प्रभावित को मुक्त कर सकती है. धर्मात्मा तथा पुण्यात्मा को उससे कत्तई डरने की आवश्यकता नहीं है।
भविष्य पुराण में वर्णित 25 श्लोकों के शनैश्चरस्तव राज स्तोत्र में धर्मराज युधिष्ठिर ने शनि की अनेक विशेषताओं का वर्णन है. शनि की अनेक धनात्मक विशेषताओं को व्यक्त करने वाले श्लोक भी इसमें सम्मिलित है. जहां उन्हें घोर, भयद, दुर्निरीक्ष्यो, विभीषण: कालदृष्टि, कराली, क्रूरमर्मविधाताओं तथा यम जैसे घातक रूपों में चित्रित किया गया है. वही उन्हें ग्रहराज, राज्येश, राज्यदायक, धनप्रद, ग्रहेश्वर, सर्वरोगहर, स्थिरासन तथा कामद: जैसे सुखद सम्बोधनों से भी सम्बोधित किया गया है. देवर्षि नारद ने इस स्तोत्र का फल बताते हुए कहा है-
रक्षामेतां पठेन्नित्यं सौरेनभिबलैर्युताम्।
सुखी पुत्री चिरायुश्च स भवेन्नात्र संशय:।।
विष्णुर्हरा गणपति: कुमारो काम ईश्वर:।
कर्ता हर्ता पालयिता राज्येशो राज्यदायक:।।
तुष्टो रुष्ट: कामरूप: कामदो रविनन्दन:।
ग्रहपीडाहर: शान्तो नक्षत्रेशो ग्रहेश्वर:।।
इसी प्रकार ब्रह्मण्डपुराण के महाराजदशरथकृत शनैश्चर स्तोत्र शनिदेव  की अनेक विशेषताओं का उल्लेख है । शनि के दस प्रचलित नामों के साथ स्तुति की गयी है. शनैेश्चरकृत पीड़ा विनिर्मुक्ति इस स्तुति का फल है. ब्राह्मण्डपुराण में ही ब्रह्मा नारद संवाद में शनि पर व्यापक विवरण प्राप्त होता है.उन्हें चतुर्भुज, प्रसन्न, वरद:, प्रशान्त:, वैवस्वत:, भास्कर, स्निग्धकष्ट , महाभुज, शुभप्रद, ग्रहपति, पिप्पल तथा सुर्यनन्द आदि नामों से स्मरण किया गया है. कुछ लोगों की ऐसी भी मान्यता है कि कुछ पुराणों की रचना 1500 ई. के आसपास हुई। यवनों अथवा मुसलमानों का भी उनमें उल्लेख मिलता है. अकबर के संरक्षक तथा महान भारत विद्या प्रेमी अब्दुर्रहीम-खाने -खानान् (अर्थात कवि रहीम) का स्मरण भी इस अवसर पर आ जाता है. ग्रह नक्षत्रों पर उनके ग्रन्थ खेटकोतुकम का अवलोकन इस सन्दर्भ में कुछ जानकारी अवश्य देता है. वे लिखते हैं.
यदा मुश्तरी केन्द्रखाने त्रिकोणे यदा वक्तखाने रिपौआफताब:।
अतरिद्वलग्ने नरो वख्तपूर्णस्तदा दीनदाराह्यथवा बादशाह:।।
अर्थात-जिसके जन्मकाल में बृहस्पति केन्द्र में अथवा त्रिकोण में और सूर्य छठे घर में और बुध लग्न मे, हो तो वह मनु ष्य अपने समय का महान व्यक्ति या राजा बनेगा। करीब 12 श्लोकों में उन्होंने शनिफलम भी लिखा है. एक और उदाहरण : -
बख्तबुलन्द: श्रीमान शीरीसखुनश्च मानवो यदि वै।
जुहली बख्तमकाने बेतालश्च हि कृपालुरपि भवति।।
और अन्त में प्रणाम करना चाहिए शनिदेव को, भगवान वेदव्यास रचित नवग्रहस्तोत्रं के इस श्लोक से
नीलाञ्जन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।।
-ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे 09827198828, भिलाई

                  

ब्रह्म हत्या से भी घोर पाप है भ्रूण-हत्या


ब्रह्म हत्या से भी घोर पाप है भ्रूण-हत्या

तू पूजा,तू अर्चना ,तू श्रद्धा , तू है वंदनीया ,तू है सबकी सृजन।
हे नारी तू नारायणी, वैभवी तू, धनलक्ष्मी मैं करूं कन्या पूजन।
संतति सुषमा के बाग में तना, विटप, तरू और हम हैं चंदन।
हों दृढ़ प्रतिज्ञ यह अलख जगायेंगे,
पुष्पीत, फलित सुषमा नहीं मिटायेंगे,
अब हरगिज़ नही होगा माँ भारती का चीखता कोंख-क्रंदन।
तू पूजा,तू अर्चना ,तू श्रद्धा , तू है वंदनीया ,तू है सबकी सृजन।।

मित्रों,
शास्त्रों में कहा गया है कि जिसने भी गर्भपात किया या करवाया है, उसको देखने से, बात करने से, स्पर्श करने से आदमी पाप का भागी बनता है। और जो गर्भपात करता है, करवाता है उसको कितना पाप लगता होगा इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। कहते है कि उसको कई कल्पों तक रौरव, कुम्भीपाक आदि नरकों में सडऩा पड़ता है। शास्त्रों के अनुसार गर्भपात एक ब्रह्महत्या है। लोगो में बढती पुत्र- लालसा और खतरनाक गति से लगातार घटता स्त्री, पुरूष अनुपात आज पूरे देश के समाजशास्त्रियों, जनसंख्या विशेषज्ञों , योजनाकारों तथा सामाजिक चिंतकों के लिए चिंता का विषय बन गया है। जहाँ एक हजार पुरूषों में इतनी ही मातृशक्ति की आवश्यकता पड़ती है, वही अब कन्या - भ्रूण हत्या एवं जन्म के बाद बालिकाओं की हत्या ने स्थिति को विकट बना दिया है। हालाकि धर्म शास्त्रों में गर्भपात करना बहुत बड़ा कुकर्म और पाप है। इस संदर्भ में पराशर स्मृति के चौथे अध्याय में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि-ब्रह्म हत्या से जो पाप लगता है, उससे दुगुना पाप गर्भपात से लगता है। इसका कोई प्रायश्चित नहीं है। ऐसे में हम एक के बाद एक घोर पाप को क्यों अंजाम देते हैं..? इस घृणित कार्य को करने बाद हम तरह-तरह के संकटों के आगोस में फंस जाते हैं और पूजा, यज्ञादि करने के बावजूद हमें इन संकटों से मुक्ति नहीं मिलती, और अपने आराध्य देव को दोषी मानते हैं कि- मैं इतना पूजा, यज्ञ और दान करता हुं, लेकिन भगवान हमारी सुनते ही नहीं। आपका ईश्वर कैसे सुने क्योंकि आपने भ्रूण-हत्या जैसा घोर पाप किया है। प्रस्तुत है पराशर स्मृति के चौथे अध्याय का 20/21वाँ श्लोक-
''यत्पापं ब्रह्महत्यायां द्विगुणं गर्भपातने ।
प्रायश्चित्तं न तस्या: स्यात्तस्यास्त्यागो विधीयते । । 4.20 । ।
न कार्यं आवसथ्येन नाग्निहोत्रेण वा पुन: ।
स भवेत्कर्मचाण्डालो यस्तु धर्मपराङ्मुख: । । 4.21 । ।ÓÓ

जबकि,देवी स्वरूप, निस्वार्थ भाव से अपनी सुख-सुविधाओं का बलिदान करने वाली माँ अजन्मे शिशु को मारने की स्वीकृति कैसे दे सकती है? क्या उस बच्ची को जीने का अधिकार नहीं है? बेचारी उस बच्ची ने कौन-सा अपराध किया है? यह कृत्य मानवीय दृष्टि से भी उचित नहीं है। प्रत्येक प्राणी जीना चाहता है। जीने के अधिकार से किसी को वंचित करना पाप है। संसार के किसी भी धर्म में भ्रूण-हत्या को गलत बताया गया है। जैन-दर्शन में भी पंचेन्द्रिय की हत्या करना नरक की गति पाने का कारण माना गया है। आश्चर्य है कि धार्मिक कहलाने वाला समाज, चींटी की हत्या से कांपने वाला समाज आँख मूंद कर कैसे भ्रूण-हत्या करवाता है! यह मानव-जाति को कलंकित करने वाला अपराध है। अमेरिका में सन् 1954  में एक सम्मेलन हुआ, जिसमें डॉ. निथनसन ने एक अल्ट्रासाउंड फि ल्म (साईलेंट क्रीन) दिखाई। कन्या भ्रूण की मूक चीख बड़ी भयावह थी। उसमें बताया गया कि 10-12  सप्ताह की कन्या-धड़कन जब 120  की गति में चलती है, तब बड़ी चुस्त होती है। पर जैसे ही पहला औजार गर्भाशय की दीवार को छूता है तो बच्ची डर से कांपने लगती है और अपने आप में सिकुडऩे लगती है। औजार के स्पर्श करने से पहले ही उसे पता लग जाता है कि हमला होने वाला है। वह अपने बचाव के लिए प्रयत्न करती है। औजार का पहला हमला कमर व पैर के ऊपर होता है। गाजर-मूली की भांति उसे काट दिया जाता है। कन्या तड़पने लगती है। फि र जब संडासी के द्वारा उसकी खोपड़ी को तोड़ा जाता है तो एक मूक चीख के साथ उसका प्राणान्त हो जाता है। यह दृश्य हृदय को दहला देता है।
इस निर्मम कृत्य से बचाकर माँ के ममतामयी आँचल के पल्लु में पुष्पित और पल्लवित होने दें, ताकि संस्कारी और सुयोग्य कन्याओं के सुरभित गुणों से परिवार भी सुरभित बनेगा, जो समाज व राष्ट्र के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।

- ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, संपादक 'ज्योतिष का सूर्य' मासिक पत्रिका शांतिनगर भिलाई-09827198828



//प्रमाणीकरण//
नोट: मैं,ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे  प्रमाणित करता हुं कि यह आलेख मेरा है, इस आलेख को कापी करना दण्डनीय अपराध है, भिलाई बचाओ आंदोलन के अध्यक्ष वृजमोहन सिंह अथवा वशिष्ठ नारायण मिश्रा के अलावा अन्य किसी समाचार पत्र/पत्रिकाओं अथवा संबंधित अभियानों द्वारा प्रकाशित पुस्तकों में प्रकाशित करने की अनुमती नहीं है, भिलाई बचाओ आंदोलन को प्रकाशित करने का अधिकार होगा।


                                                                                लेखक:
                                                                       (हस्ताक्षर व दिनांक)

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

कालसर्पयोग के कारण एवं निवारण


कालसर्पयोग के कारण एवं निवारण 
नागों का अस्तित्व ब्रम्हा द्वारा रचित सृष्टि में आरंभ से है. पृथ्वी को शेषनाग पर धारण करवाया गया है. हमारे पालनहार भगवान विष्णु शेष शैय्या पर विराजमान होकर सृष्टि का पालन कर रहे हैं. आशुतोष भगवान शिव नागों को गले में डालकर नागेन्द्रहार कहलाएं. समुद्र मंथन के लिए नागराज वासुकी को देवताओं और असुरों ने रस्सी बनाया था. वेदों में भी कई सर्पो का उल्लेख मिलता है. अग्रिपुराण में 80 प्रकार के नागकुलों का वर्णन है. जिसमे वासुकी, तक्षक, पदम, महापदम प्रसिद्ध सर्प है. नागों का पृथक का अस्तित्व देवी देवताओं के साथ वर्णित है. जैन, बौद्ध देवताओं के सिर पर भी शेष छत्र होता है.
 कल्याण वर्मा ने सारावली में सर्पयोग की विषद व्याख्या की है. कामरत्न के अध्याय 14 के श्लोक 41 में राहु को काल कहा गया है. कि शनि सूर्य राहु ये तीनो जन्म समय में लग्र से सातवें हो तो जातक सर्पदंश से पीडि़त होता है. धार्मिक ग्रंथों में सर्प में मुख में राहु का आधिपत्य तथा पूंछ में केतु काआधिपत्य है.
''ज्योतिषीय दृषि में राहू का जन्म नक्षत्र भरणी तथा केतु का जन्म नक्षत्र अश्लेषा है. राहु के जन्म नक्षत्र भरणी के देवता यम अर्थात काल है. तथा अश्लेषा केतु का नक्षत्र है, जिसका स्वामी सर्प है. इन्ही राहु केतु के नक्षत्र स्वामी को कालसर्प योग का निर्माण होता है. और इसतरह की कुंडलियों में जो परिणाम दृष्टिïगोचर होते हैं. वह लगभग एक समान होते हैं.''-
ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे
  • जब सातों ग्रह पक्ष में होते हुए भी जातक को उचित फल प्राप्त न हो , अथक प्रयास के बावजूद हर कार्य में बाधा उत्पन्न हो, ऋणग्रस्तता हो, झूठे मुकदमे में झूठा आरोप हो, पारिवारिक संकट हो, संतान से पीड़ा हो या संतान न हो, जातक अपनी संपदा का उपयोग न कर पा रहे हैं. अचानक होने वाली घटनाएं घटित हो तो अनायास ही ध्यान जाता है कि कहीं राहु केतु के मध्य होकर कालसर्प योग तो नही बन रहा. तब मानना होता है कि यह भी एक केमद्रुम योग जैसा दुर्योग है. ज्योतिषीय मत से राहु को कालपुरुष का दुख माना गया है.

कब अनिष्टकारी होता है कालसर्प योग
: -

  • राहु शत्रुता रखता है सूर्य, चन्द्र, गुरु व मंगल से अत:
  • राहु गुरु के साथ बैठकर चांडाल योग बनाएं. तब कालसर्प योग अनिष्टï फल देता है
  • राहु, चन्द्र के साथ बैठकर ग्रहण योग बनाएं तो कालसर्प अनिष्टï करता है.
  • राहु मंगल के साथ बैठकर अंगारक योग बनाएं तो कालसर्प वाला जातक अभावग्रस्त होकर पलायन करता है.
शांति के उपाय : -
दक्षिणामुखी शिवलिंग पर चांदी का नाग, स्वर्ण एवं शीशे का नाग बनाकर अभिषेक कराया जाता है. संकटनाशक एक  काल को भी जीतने वाले महामृत्युंजय महाकाल शिवलिंग पर नाग की पूजा की जाती है.
पांच फन वाला चांदी का नाग लेकर शिवलिंग पर अभिषेक करवाकर घर में ही उसकी स्थापना करें व कालसर्प योग वाले जातक नियमित दीपक, अगरबत्ती लगाकर पूजा अर्चना करें.
महामृत्युंजय एवं अमोघ शिव कवच का पाठ करे।
भोलेनाथ की भक्ति करें, इसलिए कि वे ही महाकाल है. वे सदा गले में नाग लपेटे रहते हैं.
विभिन्न योग एवं निदान : -
जब जन्म कुंडली मे सारे ग्रह राहु से केतु के मध्य आ जाते हैं. तब कालसर्प योग का निर्माण होता है. इसकी शांति का श्रेष्ठï समय श्रावण कृष्ण पक्ष की पंचमी (नाग पंचमी अथवा अधिक मास के दुर्लभ संयोगों में भी शांति कराना बेहतर रहेगा) है. कुल 288 प्रकार के कालसर्प होते हैं. लेकिन मुख्य रूप से बारह प्रकार के कालसर्प योग होते हैं.
ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे
1. तक्षक लक्षण कालसर्पयोग
उपाय : राहु की वस्तुएं बहते जल में बुधवार को बहाएं।
कांसे के बर्तन में चांदी का टुकड़ा घर में पवित्र स्थान में रखें.
2. कर्कोटक कालसर्प योग : -
उपाय : ऊँ नम: शिवाय लिखा बेलपत्र शिवलिंग पर चढ़ाए.
43 दिन तक तांबे के खोटे सिक्के जल में बहाएं।
3. शंखनाद कालसर्प योग : -
उपाय :  गृह के मुख्य द्वार पर चांदी का स्वास्तिक लगाएं.
हल्दी का तिलक करें.
4. पातक कालसर्प योग : -
उपाय :  भगवान शिव पर चांदी के सर्पो का जोड़ चढ़ाएं
मसूर की दाल बहते जल में प्रवाहित करें।
5. विषाक्त कालसर्प योग : -
उपाय :  भगवान शंकर का अभिषेक पंचामृत से करें.
चांदी के बर्तन में पानी या दूध पीएं.
6. शेषनाग कालसर्पयोग : -
उपाय : नाग की आकृति वाली चांदी की अंगूठी बनवाकर मध्यमा उंगली में धारण करें.
घर में काला कुत्ता पालें.
7. अनंत कालसर्पयोग : -
उपाय :  बहते पानी में नारियल बहाएं तथा पंचमी व्रत करें।
गेहूं, गुड़ और कासे को मंदिर में दान करें.
8. कुलिक कालसर्प योग : -
उपाय :  चांदी के नाग की अंगूठी कनिष्ठिका  में पहने
चांदी की ठोस गोली हमेशा अपनी जेब में रखें.
9. वासुकि कालसर्पयोग : -
उपाय :  नित्य महामृत्युंजयमंत्र का जाप करें.
पक्षियों को दाना डालें
गुड़ वाले जल से सूर्य को अध्र्य दें.
10 शंखपाल कालसर्प योग : -
उपाय :  शिवलिंग पर चांदी का सर्प चढ़ाएं,
धनिये को बहते जल में बहाएं
चांदी धारण करें
11. पद्म कालसर्प योग : -
उपाय :  शयन कक्ष में मोर पंख रखें
ताम्बे का सिक्का जेब में रखें.
साबुत मूंग पानी में बहाएं
12. महापद्म कालसर्प योग : -
उपाय :  राहु यंत्र की पूजा करें
बहते जल में नारियल को बहाएं
            ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे,०९८२७१९८८२८, भिलाई,दुर्ग,(छ.ग.)

खतरे में भारत की संस्कृति


मित्रों सुप्रभात ,
खतरे में भारत की संस्कृति
श्रीमद्भगवद् गीता पर राक्षसों की नज़र पड़ गयी है इनको श्री हनुमान की गदा से भगाना होगा। जिस गीता के समक्ष पूरे विश्व को नतमस्तक होने पर विवश कर दिये वे इस देश के सपूत स्वामी विवेकानंद जी को अंतर्मन से उनको शत शत नमन। संयुक्त राष्ट्र संघ भवन न्यूयार्क में पहली बार भारत के तात्कालिन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी जिन्होंने पूरे विश्व का हिन्दी के प्रति ध्यान आकर्षित कराया था , इन्होंने पहली बार हिन्ही में भाषण दिया था। ऐसे महान पुरूष को बारंबार प्रणाम लेकिन आज उसी भारत के एक ऐसे प्रधानमंत्री हैं मनमोहन सिंह जी जिनके रूस दौरे के दो दिन बाद बोलता है कि मैं गीता को पर रोक लगाउंगा.मित्रों आज हम  किस हाल में आ खड़े हो गए हैं  और ऐसे में भारतीय संस्कृति का रक्षा कैसे कर पायेंगे यदि बात करते हैं संस्कृति का तो देश के गृहमंत्री पी चिदंबरम बोलते हैं कि यह भगवा आतंक है । आज परिणाम आप सभी के सामने है रूस ने जो लहज़ा अख्तियार किया है।
यदि बात की जाय भगवा की तो भगवा वस्त्र पहन कर भारत के एक युवा संत स्वामी विवेकानंद जी ने ही शिकागो धर्मसम्मेलन में गीता  गीता का ध्वज फहराये थे । यदि मान लेते हैं तथाकथित कुछ बहुरूपीये भगवाधारी निन्दनीय कार्यों में लिप्त हैं तो क्या इसका मतलब भगवा रंग ही काला हो गया है। यदि मंत्रीमंडल के दो-चार मंत्री घोटालों में संलिप्त हैं तो क्या पूरा मंत्रीमंडल ही भ्रष्ट है, इस सवाल का उत्तर मैं आप लोगों पर ही छोड़ देता हुं। हां, इतना जरूर है अगर घर में (अपने देश में )  गीता, गंगा, गायत्री, संत और तीर्थों का सम्मान करते तो मजाल था कि रूस जैसे देश कभी इस प्रकार का घटिया कदम उठा पाते। खैर आज जो भी हो रहा है इससे तो यही एहसास हो रहा है कि भारतीय संस्कृति खतरे में है और जिस देश की संस्कृति खतरे में होती है उस देश के विकास पर सीधा प्रभाव पड़ता है अंततः शासक के प्रति लोगों की आस्था खत्म हो जाती है।
रूस द्वारा गीता पर  रोक लगाये जाने कस विरोध में ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे ने भी आपने समर्थकों के साथ आपना विरोध जताया ''दैनिक नवभारत'' में प्रकाशित एक रिपोर्ट
ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे , 09827198828, भिलाई

अंकों के मायाजाल में आपका क्या हो लकी व्यवसाय

जिनका जन्म 1, 10, 19, 28 तारीख को हुआ है. उनका मूलांक एक होता है. एक अंक सूर्य का प्रतिनिधित्व करता है. एक अंक से प्रभावित व्यक्ति किसी के नियंत्रण में काम करना पसंद नही करते हैं. आजीविका की दृष्टि से आपके लिए दवा. ऊन, धान्य, सोना, मोती आदि का व्यापार अनुकूल रहेगा तथा इन क्षेत्रों में आप विशेष सफल होंगे।
जिनका जन्म 2,1, 20,23 तारीख हो हुआ है. उनका मूलांक 2 होता है. अंक 2 का स्वामी चंद्रमा है. मूलांक दो वाले कोमल तथा बहुत ही सुंदर होते हैं. ये विनम्र, कल्पनाशील और भावुक होते हैं. आजीविका की दृष्टि से आपके लिए मोती, कृषि, बच्चों के खिलौने, फैंसी स्टोर, रेडिमेड स्टोर आदि का व्यापार विशेष सफलतादायक होगा.
जिनका जन्म 3,12, 21,30 तारीख को हुआ है. उनका मूलांक 3 होता है. अंक 3 का प्रतिनिधि ग्रह बृहस्पति है. तीन अंक वाले जातक निश्चित रूप से महत्वाकांक्षी तथा अनुशासनप्रिय होते हैं. अध्यापन वृत्ति तथा स्टेशनरी आदि के व्यापार से आजीविका प्राप्त होती है. 3 मूलांक के व्यक्ति अधिकांशत: सरकारी संस्थाओं में उच्च पदासीन देखे जाते हैं.
जिन व्यक्तियों का जन्म 4,13,22,31 तारीख को होता है. उनका मूलांक 4 होता है. भारतीय पद्धति के अनुसार इसका स्वामी ग्रह राहु हैं. इस अंक वाले व्यक्ति सात्विक हृदय एवं उदार प्रवृत्ति के होते हैं. ये स्पष्टवादी होते हैं. जीवन में प्राय: विरोधियों का सामना करना पड़ता है. आजीविका की दृष्टि से आपके लिए रेलवे, वायुयान, खान, तकनीक, कार्य, पुरातत्व, ज्योतिष आदि कार्य अनूकूल रहेंगे।
नोटः हमारे किसी भी लेख को कापी करना दण्डनीय अपराध है ऐसा करने पर उचित कार्यवायी करने को मजबूर हो जाऊंगा। समाचार पत्र पत्रिकाएं हमसे अनुमती लेकर प्रकाशित कर सकते हैं...!.ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे,09827198828,Bhilai,
जिनका जन्म 5,14,23 तारीख को होता है. उनका मूलांक 5 होता है. अंक 5 का अधिष्ठाता बुध ग्रह है. पांच अंक वाले जातक वाक्पटु, व्यापारिक मानसिक वाले, पुष्ट शरीर व ठिगने कद के होते हैं. आजीविका की दृष्टि से आपके लिए लकड़ी का कारखाना, फर्नीचर, ज्योतिष, वैद्यक आदि कार्य सफलतादायक होंगे.
जिनका जन्म 6,15,24 तारीख को होता है उनका मूलांक 6 होता है. अंक 6 का स्वामी शुक्र है. इस अंक वाले लोगों में आकर्षण शक्ति विशेष होती है. ये लोकप्रिय होते हैं. आजीविका की दृष्टि से आपके लिए चौपायों के खरीदने-बेचने का कार्य, गुड़, चावल, किराना का व्यापार अथवा फैंसी स्टोर के व्यापार में सफलता प्राप्त होती है.
जिन व्यक्तियों का जन्म 7,16,25 तारीख को होता है. उनका मूलांक 7 होता है. 7 अंक से प्रभावित जातक उग्र स्वभाव के. भौतिकतावादी, प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी होते हैं. 7 अंक का अधिष्ठाता नेपच्यून(वरूण) ग्रह है. आजीविका की दृष्टि से आप दवा, घास, स्वर्ण, सेना में कार्य सफलतादायक होगा.
जिन व्यक्तियों का जन्म 8,17,26 तारीख को होता है. उनका मूलांक 8 होता है. 8 अंक से प्रभावित जातक स्वभाव से हर बात की गहराई में जाने वाले होते हैं. ऐसे व्यक्ति जीवनकाल में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं. अंक 8 का स्वामी शनि है. आजीविका की दृष्टि से आप लोहे का व्यापार, तिल, तेल, ऊन आदि के व्यापार में विशेष प्रगति पा सकते हैं.
जिन व्यक्तियों का जन्म 9,18,27 तारीख हो होता है. उनका मूलांक 9 होता है. 9 अंक का स्वामी मंगल है. 9 अंक से प्रभावित जातक तेजस्वी व उग्र स्वभाव के होते हैं. आजीविका की दृष्टि से आप तांबा व पीतल के बर्तनों की दुकान एवं कोयला आदि के व्यापार में, सेना, पुलिस आदि क्षेत्रों में शीघ्र सफलता प्राप्त कर सकते हैं.
नोटः हमारे किसी भी लेख को कापी करना दण्डनीय अपराध है ऐसा करने पर उचित कार्यवायी करने को मजबूर हो जाऊंगा। समाचार पत्र पत्रिकाएं हमसे अनुमती लेकर प्रकाशित कर सकते हैं...!.ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे,09827198828,Bhilai,
         

ज्योतिष के नाम पर धोखा:

ज्योतिष के नाम पर धोखा:
मित्रों, आज ज्योतिष शास्त्रज्ञ की कमी है, साथ ही कथित ज्योतिषीयों की बाढ़ है। सूर्यसिद्धांत और गोलाध्याय का दर्शन तक नहीं किया वे पंचांगकार बन बैठे हैं। परीणाम सामने है तिथीयों, उत्सवादिक पर्वों को लेकर जनमानस में द्विवीधा का माहौल होता है। यदि कोई सिद्धांत(गणित) भ्रमवश उन पंचांगकार महोदय से गलती हो भी जाती है तो वर्चस्व की लड़ाई में अपने दस-बीस चाटुकार साथियों को लेकर देश का सर्वोच्च ज्योतिष मठाधीश बनने की जूगत में लगकर अपने आपको ज्योतिष पुरोधा साबित करने का कठिन यत्न करते है। यहां तक की 10 -20 हजार रूपयों में खरीदे गये गोल्ड मेडल भी उनको गोल्डमेडलिस्ट के श्रेणी में तो आ ही जाते हैं। ऐसे में लोगों का ज्योतिष के प्रति अरूची होना लाज़मी है । मैं कल अपने ब्लाग में ज्योतिष के प्रमुख दो भाग होना बताया तो एक सज्जन को नागवार गुजरा । मै समझ गया कि अब इस संदर्भ में महाशय से बात करना अपना दीदा खोना जैसा है । मित्रों वेद के छः अंगो में से एक ज्योतिष को वेद का नेत्र कहा गया है (ज्योतिषां चत्क्षुः) और ज्योतिष के दो भाग अर्थात दो नेत्र एक गणित और दुसरा फलित , इन दोनों भाग के कई प्रभाग हैं। जैसे इसके क्रमिक विकास के क्रम को देखा जाय तो स्कंध त्रय होरा, सिद्धांत और तिसरा है संहिता, यदि और आगे का कर्म देखें तो यह स्कंधपंच हो होरा, सिद्धांत, संहिता के अलावा प्रश्न और शकुन आदि अंग हैं,जो आगामी कई ऋषियों ने अपने-अपने तरीके से शोधकर एक आमजन मानस को एक महत्त्वपूर्ण शास्त्र ज्योतिष के रूपमें लोगों को समर्पित किया।
मेरा अभिप्राय है की ज्योतिष का प्रभाव वैदिक काल से ही रहा है. वैदिक युग में मानव ने ज्योतिष सहित प्रत्येक ज्ञान को आम जन की भलाई के लिए ही प्रयोग किया.कुछ आसुरी प्रवृत्ति के लोगो ने इस ज्ञान का दुरुपयोग किया तो वे राक्षस कहलाये. स्वभावश सभी मनुष्य सुख-शान्ति एवं आनन्द प्राप्त करना चाहते हैं. इन सबकी प्राप्ति को सुलभ बनाने हेतु ही परमात्मा ने हमें ज्ञान के रूप में सर्वोत्तम उपहार दिया है. जीवन में तीन चीजें होती है : -
(1) साध्य : - मनुष्य जो इच्छा करता है या जीवन में जो भी प्राप्त करना चाहतै है. जहाँ पहुंचना चाहता है उसे साध्य कहते हैं.
(2) साधना : जिस माध्यम/तरीके से मनुष्य अपने साध्य की प्राप्ति करता है. वह साधना कहलाती है.
(3) साधन : - साधना में सहयोग/सहायता करने के लिए जिन-जिन वस्तुओं/उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है. वे साधन के रूप में जाने जाते हैं.
साधन साधाना की पूर्णता के लिए होते हैं. अत: महत्ता साधना की होती है. साधन की नही, साधना की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए कठोर तप(परिश्रम) करना पड़ता है. तप के द्वारा ही साधन में ऊर्जा दी जाती है. (चार्ज किया जाता है) तभी साधन सहायक के रूप में कार्य करने योग्य हो पाता है. वैदिक काल में एक तो साधन प्राकृतिक रूप से ऊर्जावान होते थे. दूसरे मनुष्य अपने तपबल की शक्ति से उन्हें जाग्रत कर देता था।
वैदिक काल की भांति ही वर्तमान युग में ज्योतिष की महत्ता बरकरार है. बल्कि यही कहा जाये कि आज के समय ज्योतिषअधिक प्रासंगिक है. तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.संसार पर सदा से ही चतुर व्यक्तियों ने राज किया है चूंकि ज्योतिष आज बिकता है तो ऐसे अनाधिकृत व्यक्तियों (श्रद्धाविहीन) ने इसका व्यावसायिक दोहन शुरु कर दिया है. जिनका ज्योतिष शास्त्र में तनिक भी विश्वास नही. इस सन्दर्भ में यहां बहुत से उदाहरण दिये जा सकते हैं. परन्तु समयाभाव में ऐसा सम्भव नही इसलिए एकमात्र उदाहरण देकर ही हम इसे भली भांति स्पष्ट कर सकते हैं.
आजकल आप टीवी. के भिन्न-भिन्न चैनलों पर ज्योतिष सम्बन्धी सामग्री(साधनों) की बिक्री के बारे मे देख व सन सकते हैं कि इस विशे, यन्त्र या माला को खरीदने अथवा धारण करने से आपको विशेष लाभ होगा. तथा इस विशेष वस्तु को अपने पास रखने से आपको कष्टों से मुक्ति मिलेगी. जैसा कि मै पहले ही कह चुका हू कि साधन में शक्ति साधना के तप बल की होती है. मन्त्रों में शक्ति होती है. इस बात पर सन्देह करने का कोई कारण नही परन्तु यहां पर विचार करने योग्य प्रश्न यह है कि जो विद्वान किसी धातु के यन्त्र (ताम्बा इत्यादि) को सिद्ध करने का दावा करते हैं क्या वे तपस्वी, श्रद्धावान, ज्ञानी एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण है या फिर केवल अर्थ लाभ के लिए सरल एवं पीडि़त व्यक्तियों की भावनाओं का शोषण करते हैं. किसी विषय का ज्ञान होना एक अलग बात है और उस ज्ञान को सत्यता की कसौटी पर परखना दूसरी बात है. साधना में ज्ञान के साथ-साथ क्रिया पर जोर दिया जाता है. साधना में एक और बात तो महत्वपूर्ण होती है. वह है तन,मन एवं बुद्धि की पवित्रता जोकि स्वयं को कष्ट देकर हो (तप द्वारा) प्राप्त की जा सकती है.
यहां एक अन्य प्रश्न भी सामने आता है कि क्या ? इन सब परिस्थितियों के लिए पाखण्डी या ठग ज्योतिषी के साथ-साथ हम सब बराबर के जिम्मेदार नही है. कोई भी मनुष्य दुखो का सामना अपने कर्मो या लापरवाही के कारण करता है. कर्तव्यपरायणता एवं न्यायोचित व्यवहार करने तथा दुर्गुणों से दूर रहने पर अधिकतर समस्याओं से बचा जा सकता है.यदि अनजाने में किसी से कोई पाप हो जाता है तो उसका प्रायश्चित भी उसी को करना पड़ेगा. भ्रष्टाचार की सम्भावना मनुष्य द्वारा बनाए गए प्रशासन में ही हो सकती है. परमात्मा के विधान में नही कि कोई व्यक्ति मात्र धन खर्च करके (अहांकारपूर्ण) अपने पापों से मुक्ति पा सकता है. दान देने से लाभ होता है. यह शास्त्रोक्त भी है व सत्य भी है. परन्तु यदि कोई व्यक्ति अहंकार से युक्त होकर धन के बल पर बिना ग्लानि के महसूस किये यदि यह समझता है कि वह अपने पापों से मुक्ति पा लेगा तो मुंगेरीलाल की भांति स्वप्न ही देख रहा होगा।
उपरोक्त प्रश्नों का सही समाधान यही है कि कष्टों के आने पर व्यक्ति को किसी योग्य ज्योतिषी के पास जाकर सही समाधान के बारे में जानना चाहिये तथा स्वयं कष्ट सहन करके शास्त्रोक्त विधि से विनम्रता पूर्वक साधना करनी चाहिये तभी मुसीबतों से छुटकारा संभव है. क्योंकि स्वयं के मरने पर ही व्यक्ति स्वर्गवासी कहलाता है. अत: हमें टी.वी. चैनलों पर दिखलाये जाने वाले झूठ व भ्रामक प्रचार से बचना चाहिये अन्यथा कुछ व्यवसायी एवं धोखेबाज ज्योतिषियों के कारण ज्योतिष विधा पर ऑच आ सकती है. तथा लोगों का विश्वास इस पर से उठ सकता है.  
नोटः हमारे किसी भी लेख को कापी करना दण्डनीय अपराध है ऐसा करने पर उचित कार्यवायी करने को मजबूर हो जाऊंगा। समाचार पत्र पत्रिकाएं हमसे अनुमती लेकर प्रकाशित कर सकते हैं...!.ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे,09827198828,Bhilai,

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

हाथ की रेखाओं में छुपा है भूत भविष्य और वर्तमानः


    हाथ की रेखाओं में छुपा है भूत भविष्य और वर्तमानः
-ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, (ज्योतिष का सूर्य, मासिक पत्रिका के संपादक) संपर्क-09827198828, भिलाई
ज्योतिष एक विज्ञान है जिसके माध्यम से जीवन में घटने वाली सभी घटनाओं पर प्रकाश डालने का काम करता है।ज्योतिष के मुख्य दो भाग है, प्रथम  गणित और दुसरा फलित । फलित और गणित दोनों में अनुनाश्रय संबंध है ठिक उसी प्रकार जैसे भाषा और व्याकरण, किंतु ज्योतिष में एक और भी प्रभाग है जिसको हस्त में बने चिन्हों एवं पर्वों को अलग अलग राशियों में विभाजित कर उससे भी भूत भविष्य और वर्तमान का आकलन किया जाता है आगे चलकर हस्तरेखा सम्राट सर्वश्री किरो जी ने एक नया रूप दिया जो हस्तसामुद्रिक शास्त्र के रूप में काफी प्रचलित हुआ मैं ऐसा मानता हुं कि हस्त सामुद्रिक शास्त्र तो पहले से था ही पर किरो जी ने इसको अत्यनेत रोचकता पुर्वक आमजनमानस के बीच रखा जो आज एक चुनौती भरा सत्य सिद्ध प्रमाण युक्त भविष्य कथन का सोपान बन गया । इस शास्त्र के माध्यम से अनेकों की गयी भविष्यवाणियां लगभग पूर्णतया सत्य होती हैं।
मैं आज आप लोगों को उसी हस्त सामुद्रिक शास्त्र के बारे में रोचक जानकारियां प्रस्तुत करने जा रहा हुं। ज्योतिषी मानते हैं कि हस्तरेखा-विज्ञान से किसी भी व्यक्ति के भूत, भविष्य, वर्तमान और उसकी प्रकृति के बारे में जाना जा सकता है। भारत ही नहीं, पाश्चात्य देशों में भी पामिस्ट्रीका प्रचलन है।
ज्योतिष और हस्तरेखा-विज्ञान में मूलभूत अंतर यह है कि ज्योतिष में कुंडली के आधार पर व्यक्ति के बारे में बताया जाता है और दूसरे में हस्त रेखाओं के आधार पर। यह संभव नहीं है कि किन्हीं दो व्यक्तियों के हाथ की रेखाएं समान हों। ज्योतिष में समय के हेर-फेर से किसी व्यक्ति की कुंडली गलत भी बन सकती है, लेकिन हाथ की रेखाएं तो सामने होती हैं। इसलिए आकलन गलत होने का प्रश्न ही नहीं उठता। कर्म से तय होती है भाग्य रेखा पश्चिमी ज्योतिषी कीरो ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया है। फ्रांस के सेंट फ्रांसिसका भी इस क्षेत्र में अमूल्य योगदान है। उन्होंने हाथों के चित्रों के सहारे भविष्य बताने की इस कला को पूरी तरह समझाया है।
हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार, प्रमुख रेखाएं हैं- जीवनरेखा,मस्तिष्क रेखा, हृदय रेखा और भाग्य रेखा। छोटी रेखाओं में आती हैं विद्या रेखा, विवाह या प्रणय रेखा, संतान रेखा, यात्रा रेखा, चिंता रेखा आदि।
हस्तरेखाविद दाहिनी और बाईदोनों हथेलियों को देखते हैं। बाई हथेली यह स्पष्ट करती है कि हम अपने भाग्य में क्या लेकर आए हैं और दाई से यह पता चलता है कि अपने कर्मो से हमने अब तक क्या कुछ प्राप्त किया है।
इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि महत्व केवल रेखाओं का नहीं, व्यक्ति के कर्म का भी है। यदि वह अकर्मण्य है, तो जो कुछ उसके हाथ में लिखा है, वह उसे पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं कर सकता। यदि वह कर्मठ है, तो हाथ में जितना कुछ नहीं लिखा है, उससे भी अधिक प्राप्त कर सकता है। इस संबंध में एक पाश्चात्य चिंतक का उद्धरण उपयोगी है-यदि हम ईश्वर को साथ लेकर अपने कर्म के प्रति पूर्ण मनोयोग से समर्पित हो जाएं, तो हम अपने भाग्य की रेखाओं को भी बदल सकते हैं। निश्चित ही कर्म के आधार पर हाथ की रेखाएं बनती और बिगडती हैं। यदि किसी के हाथ में विद्या रेखा नहीं है और वह कठोर कर्म के आधार पर विद्या प्राप्त कर लेता है, तो विद्या रेखा उसके दाहिने हाथ में उग आएगी। फल का निर्धारण हस्तरेखा-विज्ञान को लेकर कई महत्त्वपूर्ण बातें उल्लेखनीय हैं। किसी भी रेखा का स्वरूप उसके फल को निर्धारित करता है। यदि किसी रेखा पर क्रॉसका चिह्न है या वह कहीं पर कटी हुई है या उस पर कहीं टापू बना हुआ है, तो यह सब उस रेखा के विरुद्ध जाते हैं। उदाहरण के लिए जीवन रेखा पर यदि ऐसा कोई चिह्न होगा, तो वह घोर बीमारी का सूचक होगा। यदि जीवन रेखा और मस्तिष्करेखाअपने उद्गम स्थान पर एक साथ नहीं मिलती हैं, तो वह व्यक्ति क्रांतिकारी स्वभाव का होता है। ऐसे लोग ही समाज के बंधनों को तोडकर कुछ भी कर लेते हैं। यदि हाथों की उंगलियों के बीच अंतर [फांक] है, तो ऐसा व्यक्ति फिजूलखर्च होता है।
महत्त्वपूर्ण बातें आपको जानने के लिए जरूरी है
  • यदि हथेलियां गहरी हों, तो व्यक्ति धनी होता है। किसी व्यक्ति की भाग्य-रेखा चंद्रस्थान(हथेली के नीचे बाईं तरफ) से निकलती है, तो वह निश्चित ही लेखक, कवि, संगीतकार या अन्य किसी कला में पारंगत होता है। यदि किसी व्यक्ति का अंगूठा हथेली के साथ नब्बे या उससे अधिक डिग्री का कोण बनाता है, तो वह व्यक्ति अपना निर्णय स्वयं लेता है और किसी के परामर्श पर नहीं जाता है। इसके विपरीत जिसका अंगूठा झुका रहता है, वह अपना निर्णय कभी भी स्वयं नहीं ले सकता है।
  • यदि किसी व्यक्ति के अंगूठेमें तीन के बदले चार चिह्न होते हैं, तो उसे बाहरी संपत्ति प्राप्त होती है। जिसके अंगूठेका ऊपरी भाग बडा होता है, वह निश्चित ही महत्वाकांक्षी होता है। तिल का महत्व काले तिल का महत्व हस्तविज्ञानमें बहुत है। यदि यह किसी ग्रह के स्थान पर है, तो शुभ है। यदि किसी रेखा पर है, तो उसे बर्बाद कर देता है। इस सम्बंध में मैं एक निजी अनुभव प्रस्तुत करता हूं। हस्तरेखा शास्त्री होने के नाते मुझे एक बार ग्यारह वर्ष के एक बालक का हाथ देखने का अवसर मिला, जो पागल था। मैंने उसकी मस्तिष्क रेखा को अच्छी तरह देखा। न तो उस पर क्रॉसथा, न आइलैंड,न वह टूटी थी, न कहीं से टेढी। पागल होने का एक और कारण होता है वह है मस्तिष्क रेखा का चंद्रमा के स्थान की ओर मुडना। ऐसा भी नहीं था।
  • मैं आपको सत्य घटना बताउंगा क्योंकि एक बार मे पास एक कि एक विक्षिप्त  आया और , जब मैंने उनका हस्त रेखा देखा तो मैं पाया कि - इसके तो हाथ में पागलपन का कोई चिह्न नहीं था। तभी मेरा ध्यान उसके एक तिल पर गया, जो उसकी मस्तिष्क रेखा के मध्य में था और ठीक उसी के सामने जीवन रेखा पर भी। निश्चित था कि इन दो तिलों के कारण वह आजीवन पागल रहेगा।

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

राजनीति में अव्वल होते हैं कर्क लग्र वाले:

राजनीति में अव्वल होते हैं कर्क लग्र वाले:

  • '' बारह राशियों में कर्क राशि चतुर्थ क्रम की राशि है. इसका स्वामी चन्द्रमा है. यह चर संज्ञक स्त्रीलिंग राशि है और जल तत्व प्रधान है. जमाने की हवा देखकर कार्य करना इस राशि वालो का स्वभाव रहता है. इस राशि के अंतर्गत पुनर्वसु नक्षत्र का चौथा चरण, पुष्य के चारो चरण एïवं आश्लेषा नक्षत्र के चारो चरण आते हैं. लग्र यदि शरीर है, तो चन्द्रमा उसका प्राण । ग्रह परिषद में सूर्य को राजा का स्थान प्राप्त है  तो चन्द्रमा को रानी का. अत: कर्क लग्र में जन्मे जातक धनी, सम्मानित, श्रेष्ठï, विदेश में वास करने वाले होते हैं. ये जातक राजनीति में निपुण होते हैं. कर्क लग्र मे चन्द्र, मंगल एवं गुरु कारक ग्रह है. ये तीनों ग्रह राजनीति का प्रतिनिधित्व करते ह . कर्क लग्र का द्वितीयश सूर्य होता है. जो राजकृपा कारक रहता है. मंगल पराक्रम का प्रतिनिधि है. बिना पराक्रम के राजनीति नही हो सकती है. मंगल सूर्य का दृष्टि संबंध या मंगल सूर्य का राशि परिवर्तन व्यक्ति को राजनीति में निपुण एवं सफल बनाता है.यदि यह योग कर्क लग्र मे हो तो प्रबल राजयोग देता है. कर्क लग्र में चन्द्र, शुक्र, शनि और मंगल केन्द्रेश है.चन्द्रमा लग्रेश एवं त्रिकोणेश है. कर्क लग्र के लिए मंगल प्रबल कारक है, क्यों कि वह पंचम भाव (त्रिकोण) एवं दशम भाव (केन्द्र) का स्वामी होता है. केन्द्रेश-त्रिकोणेश संयोग सत्ता सुख देता है. यदि यह संयोग केन्द्र या त्रिकोण में बन जाए तो सोने पर सुहागे का काम करता है केन्द्रेश-त्रिकोणेश का राशि परिवर्तन भी प्रबल राजयोग देता है. यदि कर्क लग्र के साथ गजकेसरी राजयोग भी जुड़ जाए अथवा सूर्य से गुरु केन्द्र में आ जाए, तो श्रेष्ठ राजोग बनता है. मंगल, सूर्य, शनि, और राहु से बनने वाले राजयोग प्रबल होते हैं. क्योंकि सूर्य-चन्द्र राजा है. मंगल नेता है गुरु शुक्र दोनो मंत्री है. शनि दूत है और राहु-केतु सेना का प्रतिनिधित्व करते हैं. चन्द्रमा प्रगति का प्रबल कारक ग्रह होता है. तृतीय भाव स्थित चन्द्रमा या शुक्र परस्पर देखते हों अथवा शुक्र से चन्द्र तीसरा या चन्द्र से शुक्र तीसरा हो, तो जातक धन-वाहन से युक्त होता है.''

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

प्रबंध, प्रशासन एवं संपन्नता के देव-शनि:


प्रबंध, प्रशासन एवं संपन्नता के देव-शनि:
ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे,09827198828,Bhilai,
नोटः हमारे किसी भी लेख को कापी करना दण्डनीय अपराध है ऐसा करने पर उचित कार्यवायी करने को मजबूर हो जाऊंगा। समाचार पत्र पत्रिकाएं हमसे अनुमती लेकर प्रकाशित कर सकते हैं...!.
नवग्रहों में शनि ग्रह के नाम से ही सभी भयभीत रहते हैं. शनि सूर्य के पुत्र है. सूर्य के प्रचंड तेज के कारण इनका शरीर काला हो गया इसलिए शनिदेव क्रूरता, कुरुपता, तामसी प्रवृति के लिए विख्यात है. इ्रनका कश्यप गोत्र है. शनि देव का वाहन गिद्ध नामक पक्षी है. जो अपनी तीक्ष्ण एïवं दूरदृष्टïी के लिए विख्यात है. शनि बारह राशियों में मकर एवं कुभ राशि के स्वामी एवं तुला राशि में 20 अंश तक परम उच्च एवं मेष राशि में 20 अंश तक नीच माने जाते हैं. शनि की बुध एवं शुक्र ग्रह से मित्रता, गुरु से समभाव तथा सूर्य, चन्द्र, मंगल से शत्रुता है। शनि वक्री तथा चन्द्र की युति होने पर अधिक बली होता है.

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

मित्रों सुप्रभात,
चार वेदों के बारे में सक्षिप्त जानकारी मैं आप सभी को देना चाहूंगा, जो काफी अहम है>
ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे .09827198828, भिलाई

ऋग्वेद 

ऋग्वेद देवताओं की स्तुति से सम्बंधित रचनाओं का संग्रह है।

यह 10 मंडलों में विभक्त है। इसमे 2 से 7 तक के मंडल प्राचीनतम माने जाते हैं। प्रथम एवं दशम मंडल बाद में जोड़े गए हैं। इसमें 1028 सूक्त हैं।
इसकी भाषा पद्यात्मक है।
ऋग्वेद में 33 देवी-देवतों का उल्लेख मिलता है।
प्रसिद्ध गायत्री मंत्र जो सूर्य से सम्बंधित देवी सावित्री को संबोधित है, ऋग्वेद में सर्वप्रथम प्राप्त होता है।
' असतो मा सद् गमय ' वाक्य ऋग्वेद से लिया गया है।
ऋग्वेद की रचना संभवतः पंजाब में हुई थी।
ऋग्वेद में मंत्र रचियताओं में स्त्रियों के नाम भी मिलते हैं, जिनमें प्रमुख हैं- लोपामुद्रा, घोषा, शाची, पौलोमी एवं काक्षावृती आदि
इसके उपवेद का नाम आयुर्वेद् है।
इसके पुरोहित क नाम होत्री है।
 
''यजुर्वेद'' की उपयोगिता एक नजर में-
आज बात करते हैं यजुर्वेद की , यजुर्वेद शब्द का तात्पर्य ''यजन'' से है अर्थात याचना करना अथवा प्रार्थना करना, स्तुती करना । जिस वेद में ईश्वरार्चना करने के तौर तरीके एवं सलीके(विधी) बताए गयें हों उस वेद को यजुर्वेद कहा जाता है।
यजुर्वेद की उपयोगिता एक नजर में-
 यजु का अर्थ होता है यज्ञ। यजुर्वेद वेद में यज्ञ की विधियों का वर्णन किया गया है। इसमे मंत्रों का संकलन आनुष्ठानिक यज्ञ के समय सस्तर पाठ करने के उद्देश्य से किया गया है। इसमे मंत्रों के साथ साथ धार्मिक अनुष्ठानों का भी विवरण है जिसे मंत्रोच्चारण के साथ संपादित किए जाने का विधान सुझाया गया है। यजुर्वेद की भाषा पद्यात्मक एवं गद्यात्मक दोनों है। यजुर्वेद की दो शाखाएं हैं- कृष्ण यजुर्वेद तथा शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद की चार शाखाएं हैं- मैत्रायणी संहिता, काठक संहिता, कपिन्थल तथा संहिता। शुक्ल यजुर्वेद की दो शाखाएं हैं- मध्यान्दीन तथा कण्व संहिता। यह 40 अध्याय में विभाजित है। इसी ग्रन्थ में पहली बार राजसूय तथा वाजपेय जैसे दो राजकीय समारोह का उल्लेख है।

सामवेद

सामवेद की रचना ऋग्वेद में दिए गए मंत्रों को गाने योग्य बनाने हेतु की गयी थी।
इसमे 1810 छंद हैं जिनमें 75 को छोड़कर शेष सभी ऋग्वेद में उल्लेखित हैं।
सामवेद तीन शाखाओं में विभक्त है- कौथुम, राणायनीय और जैमनीय।
सामवेद को भारत की प्रथम संगीतात्मक पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है।
  • अथर्ववेद

    अथर्ववेद की रचना अथर्वा ऋषि ने की थी।
इसमें प्राक्-ऐतिहासिक युग की मूलभूत मान्यताओं, परम्पराओं तथा अंधविश्वासों का चित्रण है।अथर्ववेद 20 अध्यायों में संगठित है। इसमें 731 सूक्त एवं 6000 के लगभग मंत्र हैं।
इसमें रोग तथा उसके निवारण के साधन के रूप में जादू, टोनों आदि की जानकारी दी गयी है।
अथर्ववेद की दो शाखाएं हैं- शौनक और पिप्लाद।
इसे अनार्यों की कृति माना जाता है।

समाहित है वेदों में दुनिया के अनेको ज्ञान-विज्ञान :

समाहित है वेदों में दुनिया के अनेको ज्ञान-विज्ञान :
आज जहा एक तरफ वेदों से लोगों का ध्यान बाँट कर अश्लीलता भरी कु-संस्कृति का भ्रामक माया जाल बुना जा रहा है वही वेदों की अहमियत कुछ इस प्रकार है -
  भारतीय संस्कृति की अनादि पर परा के प्रतीक वेद सर्वांग जीवनपद्घति और संस्कार निर्माण के महास्रोत हैं जिनका अवगाहन समष्टि और व्यष्टि तक में महापरिवर्तन ला सकता है। वैदिक ज्ञान-विज्ञान के बारे में आज बहुसं य जनता की सोच क्षीण होती जा रही है जबकि भारतीय संस्कृति के इस महान ज्ञान भण्डार का लाभ लिया जाकर भारतवर्ष को पुनः विश्व गुरु की पदवी पर आरूढ किया जा सकता है। वेद अपौरुषेय व अनन्त राशि हैं। उनको पूर्ण कोई भी पढ नहीं सकता। इसकी पूर्णता का ज्ञान ब्रह्मा भी नहीं कर सकते। द्वापर के अंत में नारायण स्वयं व्यास के रूप में अवतीर्ण हुए। उन्होंने मानवों की आयु अल्प जानकर वेद के 4 विभाग किये। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद तथा 4 शिष्यों को एक-एक वेद का ज्ञान कराया। ऋग्वेद पैलकों को, यजुर्वेद वैश पायन को, सामवेद जैमुनि को तथा अथर्ववेद सुमन्तु को,--ये चारों शिष्य व्यास के पास वेदा यासार्थ रहे। पूर्व में भरद्वाज मुनि ब्रह्मा के पास जिनकी आयु ब्रह्मा कल्पत्रय पर्यन्त थी वे भी ब्रह्मा से पूर्णवेद का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सके।--अतः मनुष्य वेद को पूर्ण कर ही नहीं सकता। ऋग्वेद विषय में व्यास ने पैलकों को शाखाओं का वर्णन बताया। व्यास ने पैलको ऋग् के विषय में ध्यान आकृति आदि ऋक के बारे में बताया। ऋग् वेद का उपवेद आयुर्वेद है ब्रह्मा देवता गोत्र अभि तथा गायत्री छन्द रक्तवर्ण पद्म पत्र समनेत्र विभक्त कंठ व भेद चर्चा, श्रावक, चर्चक, श्रवणीयपार, श्रमपार, जय रथक्रम, दंडक्रम आदि पारायण विधि है शाखा 1 आश्वलायनी, 2 सां यायनि, 3 शाकला, 4 बाष्कला, 5 मांडुकेयी। इस प्रकार व्यास महर्षि ने पैलको समझाया आठ विकृतियों के साथ एक शाखा का भी पूर्ण पठन करना ही कठिन है। इस प्रकार अथर्व का भी शास्त्रों में बहु विस्तार है। साम की सात शाखा मु य आशुरायणी, वार्तान्त वेद वासुरायणी, प्रांजली, प्राचीन योगी, ज्ञानयोगी, राणायणी, इस प्रकार वेद राशि अनन्त विस्तारपूर्वक है। पूर्व में वेद पाठी ब्राह्मण परिश्रम पूर्वक वेद पाठ करते थे जिससे राजा भी उनको बुलाकर स मान करते थे। इस युग में रूद्र पाठ भी शुद्घ नहीं पढकर कई लोग वेदी पाठी होने का दंभ भरते हैं तथा कर्मकांड में मंत्रों का उच्चारण भी शुद्घ नहीं करते। शास्त्रों में कहा है कि देवाधीनं जगत सर्वम् मन्त्राधीनस्तुदेवता, ते मंत्रा ब्राह्मणाधीना। इस प्रकार ब्राह्मणों को भूमि पर प्रत्यक्ष देवता रूप में मान्यता थी। आज स्वार्थवश वेद को भूलकर दूसरी भाषा तरफ लक्ष्य संधान किया जा रहा है अतः वेद पाठी ब्राह्मण दुर्लभ हो गये हैं। बांसवाडा में नागर समाज में वैदिक विद्वानों का साम्राज्य रहा है। इनमें चारों वेदों के ज्ञाता थे। अतः उन्हें चारों तरफ से सन्मान मिलता था। वेद रक्षा यत्नतापूर्वक करना ही , ब्राह्मण का सच्चा धर्म है। पदार्थो के वास्तविक स्वरूप का निर्णय करने के लिए शास्त्रों को ही प्रबल प्रमाण माना जाता है अपना बुद्घि बल नहीं क्योंकि मानवों का बुद्घिबल व्यवस्थित नहीं होता। विशेषकर वेदो के विषय में शास्त्र दृष्टि से ही विचार होना चाहिये क्योंकि वेदों में अलौकिक विषय प्रतिपादित हैं, जहाँ मानव का बुद्घिबल कुण्ठित हो जाता है। अतएव मीमांसकों व वेदान्तियों ने वेदों का अपौरुषेय सिद्घ किया है अर्थात वेद किसी पुरुष के द्वारा नहीं रचे गये हैं। यद्यपि आज का मानव यह मानने को तैयार नहीं है कि वाक्य हों और वे किसी पुरुष के द्वारा रचित न हों। भारत की विविध भाषाओं में जितने साहित्य उपलब्ध हैं उनमें कोई भी ऐसा नहीं है जो पुरुष के द्वारा न रचा गया हो। ऐसी स्थिति में वेद मात्र क्यों कर अपौरुषेय होगा। यद्यपि यह शंका अपने आप में ठीक ही है किन्तु इस सन्दर्भ में यह भी विचार करना चाहिये कि उपलब्ध साहित्य में क्या कोई ऐसा ग्रन्थ विद्यमान है जिसके रचयिता का स्मरण नहीं होता हो। एक पक्षीय विचार नहीं करना चाहिये। संसार में लाखों करोडों लोग विद्यमान हैं। अगणित का स्मरण भी किया जाता है। पाणिनी की परिभाषाओं को हम पढते हैं परंतु उनको हम भूलते नहीं। कालिदास के ग्रन्थ का अध्ययन करते हैं परन्तु उन्हें याद न रखें ऐसा नहीं हो सकता। किरातार्जुन पढते समय भारवी कवि की स्मृति हो आती है।--रामायणादि पढें पर वाल्मिकी व तुलसीदास जी की याद न आए, ऐसा नहीं हो सकता। इसी तरह से अध्ययन-अध्यापन की पर परा में विद्यमान वेदों के पढने वालों में आज तक किसी ने नहीं कहा कि इनका रचयिता अमुक है। इससे सिद्घ होता है कि इनके कर्त्ता का स्मरण नहीं होता, अतः ये अपौरुषेय हैं।द्यपि संभव है कि कतिपय लोगों को ग्रन्थ के रचयिता की सत्ता का स्मरण नहीं किन्तु सभी के लिए ऐसा नहीं कहा जा स यकता। उसमें भी जो ग्रन्थ पठन-पाठन की पर परा में प्रचलित है, उनके कर्त्ता का स्मरण किसी को न हो यह कदापि संभव नहीं। केवल वेद ही इसके अपवाद हैं। इसी लिए वेदों को अपौरुषेय माना गया है। अन्यों के धार्मिक ग्रंथों को भी वेदों की तरह अपौरुषेय सिद्घ करने की कुछ लोग चेष्टा करते हैं किन्तु साथ ही ग्रन्थों के निर्माता का भी स्मरण करते हैं। इनमें काल की गणना स्पष्टतः ज्ञात होती है किन्तु वेदों के विषय में अनुमान का आश्रय लेना पडेगा । अनुमान में हेतु का परीक्षण आवश्यक होता है। जो हेतु (कारण) कहीं पर भी अभिचरित व बाधित न होता हो। वहीं साध्य को सिद्घ कर सकता है। साध्य जिसे सिद्घ करना है, का भी परीक्षण आवश्यक है। परीक्षण से निष्कर्ष निकलता है कि वेद अपौरुषेय--है जबकि अन्य में पौरुषेयता देखी गई है जैसे रामायण महाभारत आदि। वेदो में भी वाक्यता विद्यमान है अतः वेद अपौरुषेय है। यद्यपि यह सत्य है। किन्तु तर्क समुचित नहीं है क्योंकि रामायण, महाभारत की वाक्यता के साथ ही उनके कर्त्ता का भी स्मरण होता है। वेदों में वाक्यता तो है किन्तु कर्त्ता का स्मरण नहीं होता। अतः वाक्यता को हेतु मानकर वेदों को पौरुषेय सिद्घ करना कठिन है। ऐसे में साध्य पौरुषेयता का परीक्षण करना चाहिये। पौरुषेयता का क्या अर्थ है। व्यास, वाल्मीकि कालिदास आदि के ग्रन्थों मे जो पद्यों की जो विलक्षणता पायी जाती है वह उन्हीं की है तत्सद्रश अनुपूर्वियों की अपेक्षा न करते हुए उन्होंने अपने-अपने ग्रन्थ प्रणयन किये हैं। अर्थात सत्यं सत्यं पुनः सत्यं उद्रव्य भुजमुच्यते। वेदशास्त्रात्परंनास्ति देवं केशवात्परं तपस्वाध्यायरिते.....। वेदों में दुनिया का तमाम ज्ञान-विज्ञान समाहित है वहीं वास्तविक वेदज्ञों का जीवन स पूर्ण आध्यात्मिक होने के साथ ही लौकिक एवं पारलौकिक वैभव से परिपूर्ण रहता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि वेदों के संरक्षण के साथ ही इसमें निहित ज्ञानराशि के बारे में वर्तमान पीढी को अवगत कराया जाए और इसके महत्व का सहज, सरल एवं सुबोधग य रीति से प्रतिपादन किया जाए। वैदिक पर पराओं के संरक्षण तथा वैदिक विज्ञान के प्रचार-प्रसार आज की युगीन आवश्यकता है। भावी पीढियों तक इस अमूल्य धरोहर को संवहित करने का दायित्व वेद विद्वानों के कंधों पर है। वेद और ज्योतिष के पारस्परिक अन्तर्स बंधों को समझें तो इनमें स्पष्ट किया गया कि इनका परस्पर गहन समन्वय है। ज्योतिष को वेद के चक्षु कहा गया है। वेदों के पठन-पाठन में उदात्त एवं अनुदात्त स्वरों, आरोह-अवरोह, उच्चारण माधुर्य और लयात्मकता के प्रभाव पर सर्वाधिक ध्यान दिया जाना जरूरी है। अर्थ के साथ वेद गान व पठन ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। स्पष्ट उच्चारण से ही वेदपाठ की सार्थकता है। इसके लिए स्वरों की अभिव्यक्ति की दृष्टि से हस्त चलाने की जरूरत नहीं है लेकिन स्वरों के अनुरूप ऋचाओं का पठन जरूरी है। इसके साथ ही वेदों के प्रति अगाध श्रद्घा एवं आस्था के साथ इनके पठन से आशातीत प्रभाव देखा जा सकता है। जिससे सत्य का उद्घाटन होकर अलौकिक एवं शाश्वत आनन्द और ज्ञान की प्राप्ति होती है वही वेद है। वेद-वेदांग एवं इनके पारस्परिक संबंधों को समझने के लिए इस के छह अंगों शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरूपण, छन्द एवं ज्योतिष आदि पर विस्तृत अध्ययन-मनन की जरूरत है। आयुर्वेद को अथर्ववेद का उप वेद माना गया है। आज वेद और आयुर्वेद के संबंधों पर गहन अनुसंधान की आवश्यकता है। वैदिक संस्कृति और वैदिक ज्ञान-विज्ञान के रहस्यों को आत्मसात कर इसके अनुरूप जीवनयापन से व्यक्ति, समाज और परिवार को उच्चतम शिखरों का संस्पर्श कराया जा सकता है।

वक्री भाग्येश बनाता है, मुकद्दर का सिकन्दर

वक्री भाग्येश बनाता है, मुकद्दर का सिकन्दर
-पं विनोद चौबे (ज्योतिषाचार्य)
भाग्य, किस्मत, मुकद्दर, ये सभी समानअर्थी शब्द हैं। भाग्य शब्द भगवान से निकला हुआ है। पहले भाग्यशाली व्यक्ति को भगवान अथवा भाग्यवान कहा जाता था। भागवान का अर्थ है जिस पर भगवान की कृपा है। यही भागवान कालान्तर में भाग्यवान में परिवर्तित हो गया अर्थात् भाग्य वाला व्यक्ति भाग्यवान माना गया । भाग्य अर्थात् ईश्वर की कृपा को प्राप्त करने के लिये हम भारतवासी व्रत, पूजा, प्रार्थना आदि अनेक विधियां अपनाते हैं। गीता में श्रीकृष्ण ने पूर्वजन्मों के कर्मो के प्रतिफल को ही इस जन्म का भाग्य कहा है।   जन्मकुण्डली के बारह भावों में नवम भाव को भाग्य स्थान का नाम दिया गया है। यदि किसी जातक का नवम भाव, उसका स्वामी बली हो तो वह श्रेष्ठ भाग्य का प्रतिफल उस भाव के स्वामी की दशा-अन्तर्दशा में भोगता है। वक्री ग्रह को विशेष बली माना गया है। यदि कुण्डली के नवम भाव का स्वामी वक्री हो तो वह जातक तेजी से उन्नती कर जीवन में सफलता की ऊँचाइयों को स्पर्श करता है। ऐसे जातक को हम बोलचाल की भाषा में कहते हैं- मुकद्दर का सिकन्दर। इस कथन को और स्पष्ट करने के लिये दस विशिष्ट व्यक्तियों की जन्मकुण्डलियों का अध्ययन करेंगे, जो इस प्रकार हैं-

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

'होतृ ऋषियों' द्वारा किया जाता हैं ऋग्वेद के मंत्रों का उच्चारण

मित्रों मै कल  फेसबुक पर एक सज्जन के द्वारा भेजा गया पोस्ट पढ़ रहा था उन्होंने वेद के बेरे में बहूत बेढंगा टिप्पड़ी किया था ! मुझे ऐसा लगा की वह इस मामले में अबोध बालक है आज आप लोगों के सामने कुछ वेद के अर्वाचीन ऋग्वेद के बारे में चर्चा करूंगा!!
ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे,09827198828,Bhilai,
नोटः हमारे किसी भी लेख को कापी करना दण्डनीय अपराध है ऐसा करने पर उचित कार्यवायी करने को मजबूर हो जाऊंगा। समाचार पत्र पत्रिकाएं हमसे अनुमती लेकर प्रकाशित कर सकते हैं....
 
भारत के सबसे प्राचीन ग्रन्थों को वैदिक ग्रन्थ के नाम से जाना जाता है। इसकी रचना किसने तथा कब की जैसे प्रश्नों का उत्तर पर्याप्त विवादस्पद है। आखिर क्या है, इन ग्रन्थों में जो भारतीय संसकृति के शब्द कोश की तरह प्रयोग किया जाता है। क्या खास है इन धार्मिक ग्रन्थों में जो, हजारों वर्ष के बाद भी अपना महत्व बनाए हुए हैं। ऋग्वेद सनातन धर्म अथवा हिन्दू धर्म का प्रमुख स्रोत है। इसमें 1028 सूक्त हैं, जिनमें देवताओं की स्तुति की गयी है ,स्तुति का अर्थ देवताओं के बखान के रुप में लिया जाना चाहिए, इसमें देवताओं का यज्ञ में आह्वान करने के लिये मन्त्र लिखे गए हैं, यही सर्वप्रथम वेद है। ऋग्वेद को दुनिया के सभी इतिहासकार हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार की सबसे पहली रचना मानते हैं ।
मित्रो यहाँ आपको बताना एक दिलचस्प जरूरी बात बताना चाहूँगा
ऋग्वेद भारत की ही नहीं सम्पूर्ण विश्व की प्राचीनतम रचना है। इसकी तिथि 1500 से 1000 ई.पू. मानी जाती है। सम्भवतः इसकी रचना सप्त-सैंधव प्रदेश में हुयी थी। ऋग्वेद और ईरानी ग्रन्थ जेंद अवेस्ता (Zenda Avasta) में समानता पाई जाती है। ऋग्वेद के अधिकांश भाग में देवताओं की स्तुतिपरक ऋचाएं हैं, यद्यपि उनमें ठोस ऐतिहासिक सामग्री बहुत कम मिलती है, फिर भी इसके कुछ मन्त्र ठोस ऐतिहासिक सामग्री उपलब्ध करते हैं। जैसे एक स्थान ‘दाशराज्ञ युद्ध‘ जो भरत कबीले के राजा सुदास एवं पुरू कबीले के मध्य हुआ था, का वर्णन किया गया है। भरत जन के नेता सुदास के मुख्य पुरोहित वसिष्ठ थे, जब कि इनके विरोधी दस जनों (आर्य और अनार्य) के संघ के पुरोहित विश्वामित्र थे। दस जनों के संघ में- पांच जनो के अतिरिक्त- अलिन, पक्थ, भलनसु, शिव तथ विज्ञाषिन के राजा सम्मिलित थे। भरत जन का राजवंश त्रित्सुजन मालूम पड़ता है, जिसके प्रतिनिधि देवदास एवं सुदास थे। भरत जन के नेता सुदास ने रावी (परुष्णी) नदी के तट पर उस राजाओं के संघ को पराजित कर ऋग्वैदिक भारत के चक्रवर्ती शासक के पद पर अधिष्ठित हुए। ऋग्वेद में, यदु, द्रुह्यु, तुर्वश, पुरू और अनु पांच जनों का वर्णन मिलता है।

ऋग्वेद के मंत्रों का उच्चारण यज्ञों के अवसर पर 'होतृ ऋषियों' द्वारा किया जाता था। ऋग्वेद की अनेक संहिताओं में 'संप्रति संहिता' ही उपलब्ध है। संहिता का अर्थ संकलन होता है। ऋग्वेद की पांच शाखायें हैं-

   1. शाकल,
   2. वाष्कल,
   3. आश्वलायन,
   4. शांखायन
   5. मांडूकायन।

ऋग्वेद के कुल मंत्रों की संख्या लगभग 10600 है। बाद में जोड़ गये दशम मंडल, जिसे ‘पुरुषसूक्त‘ के नाम से जाना जाता है, में सर्वप्रथम शूद्रों का उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त नासदीय सूक्त (सृष्टि विषयक जानकारी, निर्गुण ब्रह्म की जानकारी), विवाह सूक्त (ऋषि दीर्घमाह द्वारा रचित), नदि सूक्त (वर्णित सबसे अन्तिम नदी गोमल), देवी सूक्त आदि का वर्णन इसी मण्डल में है। इसी सूक्त में दर्शन की अद्वैत धारा के प्रस्फुटन का भी आभास होता है। सोम का उल्लेख नवें मण्डल में है। 'मैं कवि हूं, मेरे पिता वैद्य हैं, माता अन्नी पीसनें वाली है। यह कथन इसी मण्डल में है। लोकप्रिय 'गायत्री मंत्र' (सावित्री) का उल्लेख भी ऋग्वेद के 7वें मण्डल में किया गया है। इस मण्डल के रचयिता वसिष्ठ थे। यह मण्डल वरुण देवता को समर्पित है। 

अंधश्रद्धा-बलि..आखिर क्यों नहीं करते सच का सामना..?


अंधश्रद्धा-बलि..........
आखिर क्यों नहीं करते सच का सामना..? 

आने वाली सदी के लिए हमारे देश की शिक्षा प्रणाली :

आने वाली सदी के लिए हमारे देश की  शिक्षा प्रणाली :
शिक्षा प्रत्येक समाज के चिंतन की सर्वोच्च प्राथमिकता है। समाज के सृजन और पालक के रूप में उसका संबंध भूत, वर्तमान और भविष्य के साथ त्रिआयामी है। हम गतिशील समाज के अंग हैं और परिवर्तन को नकार नहीं सकते, यह एक स्वाभाुिवक और नैतिक प्रक्रिया हो गई है जिसके अंतर्गत हम केवल यह कह सकते हैं कि आगामी कल आज से सर्वथा भिन्न होगा तथा कल तक जो भी समाज केलिए सार्थक व उपयोगी था, आवश्यक नहीं कि आज भी वैसा ही हो। इस दृष्टिकोण से शिक्षा विकासात्मक प्रक्रिया है। इसके समयबद्ध नियोजन से ही शिक्षा की गुणात्मक और परिमाणात्मक स्वरूपों में सही तालमेल बिठाया जा सकेगा।
शिक्षा क्या है सभी जानते हैं परंतु इसके केवल औपचारिकत अर्थ को समझ लेना काफी नहीं। सुकरात ने जीवन का मुख्य उददेश्य ज्ञान प्राप्त करना बताया, प्लेटो ने अच्छी आदतों के विकास को शिक्षा माना है जबकि अरस्तु ने चित्त की प्रसन्नता को शिक्षा का उद्देश्य माना है, बल्कि उन्होंने तो कहा कि बच्चा अपने अनुभव के आधार पर ही शिक्षा ग्रहण करता है। डान ड्यूई ने कहा कि शिक्षा का अर्थ है व्यक्ति में अंतर्निहित उन सभी योग्यताओं का विकास करना जिनसे वह अपने चारों ओर के परिवेश को अपने अनुसार मोड़ सके तथा अपनी योग्यताओं को चहुँदिशा विकसित कर सके। महात्मा गांधी, टैगोर, विवेकानंद सभी चिंतकों ने जीवन के सर्वांगीण विकास को शिक्षा मान अपनी व्याख्या की।
00 मानव जीवन को बदलने की संजीवनी...................
अत: शिक्षा अर्थात् मानव जीवन को बदलने वाली संजीवनी, जो मानव को समाज की मुख्य धारा से जोडऩे की ताकत देती है, यूं कहें कि यह एक ऐसा अस्त्र है जो हमारे जीवन से अज्ञानतारूपी अंधकार का नाश कर दिमाग को जागृत करता है। एक समय था जब शिक्षा के केन्द्र गुरूकुल हुआ करते थे, जहां रह कर बच्चा ज्ञान प्राप्त कर जीवन के लिए तैयार होता था। ऐसा नहीं कि हर बच्चा गुरू के आश्रम में प्रवेश पा जाये। गुरू द्वारा ली गई परीक्षा में पास होने पर ही वह उनसे विद्या ग्रहण करने का अधिकारी होता था। यह परीक्षा होती थी विद्यार्थी जीवन के लिए आवश्यक गुण जैसे त्याग, सहनशीलता, संयम, आत्म नियंत्रण, लगन की। इनमें सफल होने पर ही वह गुरू द्वारा प्रदत्त धर्म, लोक व्यवहार, शास्त्र व शास्त्रगत व्यवहार तथा प्रकृति के स्वरूप की सीख दक्षता हासिल कर जीवन के अगले पड़ाव की ओर उन्मुख होता था। संस्कार द्वारा गुरूकुल में प्रवेश और संस्कार द्वारा ही दीक्षित कहलाता था। कहने का तात्पर्य है कि विधिवत् शिक्षा सीधे न हासिल कर मानसिक व शारीरिक सक्षमता के बाद ही शिक्षित होता था। वह वास्तव में विद्या अर्जन थी जो उसे विधिवत ज्ञान के साथ जीवन के लिए आवश्यक गुणों से परिपूर्ण बनाती थी। वह विद्यार्थी कहलाता था परंतु आज वह शिक्षार्थी कहलाता है क्योंकि शिक्षा का अर्थ और लक्ष्य समय के साथ बदलते चले गया।  
00 कथनी और करनी के बीच अंतर की कहानी...................
वर्तमान युग है उदारीकरण, वैश्वीकरण एवं निजीकरण का। इन त्रिप्रक्रियाओं ने सारी व्यवस्था को न केवल प्रभावित किया है बल्कि तमाम परिभाषाओं को बदल दिया है। हम जानते हैं कि विकास के आधारों में शिक्षा एक बहुत आवश्यक तत्व है, इसी पर सम्पूर्ण सामाजिक विकास टिका हुआ है। जनसंख्या का शिक्षित होना ही विकास को पोषित करता है, क्योंकि किसी भी देश की शिक्षा की स्थिति का सीधा संबंध उस देश की राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना से होता है। अत: शिक्षा एक ऐसा साधन है जो समय-सापेक्ष, देश-सापेक्ष और प्रगति-सापेक्ष है। हर युग में शिक्षा के मायने अलग-अलग रहे। यही नहीं आज तो हर देश में इसका अर्त अलग है। भारत में शिक्षा की कहानी-कथनी और करनी, कामना और कर्म, प्रयास और परिणामों के बीच अंतर की कहानी है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के अनुच्छेद 1.9 में लिखा है कि-शिक्षा इस समय भारत में चौराहे पर खड़ी है। न नैतिक विस्तार और न ही सुधार की वर्तमान गति और प्रकृति स्थिति के अपेक्षाओं के अनुरूप है। यह जान कर आश्चर्य होता है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र व दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश के पास शिक्षा की स्थिति विचारणीय है। ऐसा कोई शिक्षण संस्थान नहीं है जिसकी गिनती विश्व स्तर पर आंकी जा सके। यहीं पर शिक्षा में गुणवत्ता और परिमाण का अंतर स्पष्ट दिखाई देता है।
00 समिति व सिफारिश से दो राहे पर खड़ी शिक्षा..................
प्राचीन काल की शिक्षा पद्धति जितनी बुनियादी थी, आज की आधुनिक शिक्षा प्रणाली विभिन्नताओं को सिमेटे हुए है। कितने सरकारी प्रयास हुए और हो रहे हैं, समितियों या सिफारिशों ने शिक्षा के उद्देश्य को कहीं दोराहे पे ला खड़ा कर दिया है जिससे आम आदमी का नैतिक चरित्र व राष्ट्रीय चरित्र एक दूसरे से बिल्कुल अलग दिखता है। आजादी के बाद से शिक्षा में गुणवत्ता सुधार के लिए बने पंद्रह से ज्यादा कमीशन और समितियां। हजारों पेज के प्रतिवेदन, जिनका केन्द्रीय बिन्दु था सुधार कैसे हो? दिल्ली विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान के पूर्व प्रोफेसर रमाकांत अग्निहोत्री के अनुसार-भारत की शिक्षा प्रणाली में ऐसा लचीलापन और जीवन की विविधता नहीं है, जड़ता है। जोजिस पटरी पर आ गया, जीवन पर्यन्त वहीं रहेगा।
दरअसल विकास के लिए लगने वाली अनिवार्य सीढ़ी में शिक्षा एक ऐसा तत्व है जिसमें हमारा देश कई गुना पिछड़ा हुआ है। विदेशों में शिक्षा में क्रांतिकारी परिवर्तनों के कारण भारतीय विद्वताका मूल्यांकन कम आंका जाता है। विकास के तमाम दावों के बावजूद हम क्यों फिसड्डी और नकलची हैं? हमारी शिक्षा व्यवस्था मूल उद्देश्यों से क्यों अलग है, इसका लक्ष्य वास्तव में क्या होना चाहिये, जैसे यक्ष प्रश्नों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। आंकड़े कुछ कहते हैं, विकास प्रक्रियाएं शिक्षा के क्षेत्र में जमीनी तौर पर अपना वर्चस्व नहीं कायम कर पायीं।
00 दिन ब दिन पनपता रहा निजी स्कूलों का कारोबार..................
कुछ कारणों पर विचार करें, हमारी शिक्षा व्यवस्था परीक्षा केन्द्रित व नौकरी केन्द्रित है, कमीशन पर कमीशन बिठाने के बाद भी इस व्यवस्था को हम अपने राष्ट्र के अनुकूल नहीं बना पाये। राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियां समीचीन हैं :-
शिक्षे! तुम्हारा नाश हो, तुम नौकरी के हित में बनीं।।
किन्तु आज तो नौकरी पाने के उद्देश्य में भी हमारी शिक्षा सहायक नहीं हो रही। शहर की बात न भी करें तो गांव में शिक्षा व्यवस्था कितनी बदहाल है, उससे निजी स्कूलों की अवधारणा का कारोबार पनपा अर्थात सरकारी तंत्र के बजाय निजी तंत्र में फैली। अवलोकन से एक बात और सामने आयी कि निम्न-मध्यम वर्गीय तथा श्रमिक वर्ग के बच्चे शालाओं का सामना करने के लिए यथेष्ट रूप से तैयार नहीं होते क्योंकि शालाओं से मिलने वाला अनुभव उनके घर के अनुभवों से बिल्कुल विपरीत होता था। इसीलिए उन्हें शाला से कम से कम अर्हताओं के साथ निकाला जाता है। वे कम से कम वांछनीय नौकरियां पाते हैं और श्रमिक वर्गीय ही बने रहते हैं। टालकॉट पारसन्स (समाजशास्त्री) ने अपने अध्ययन में पाया कि इसी शालेयकरण की प्रक्रिया के कारण कुछ छात्रों की पहचान शैक्षणिक असफलता के रूप में की गई। विल्सन व ब्रायन ने अपने अध्ययन में पाया कि विद्यार्थियों ने महसूस किया कि जो विषय वे पढ़ते हैं, श्रमिक बाजार में भविष्य के साथ, उसका कोई संबंध नहीं है। वहीं दूसरी ओर मध्यम वर्गीय और उच्च वर्गीय छात्र अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को बनाये रखते हुए थोड़ी सी मेहनत से सफलता प्राप्त कर लेते हैं।
00 विषमता से दूर सामाजिक सरोकार से जोडऩा जरूरी.................
अत: यह स्पष्ट है कि शिक्षा तबी अपने आयामों को छू पायेगी जब वह इन विषमताओं से परे हो, सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हो। व्यक्तिगत स्वार्थ से बाहर जाकर राष्ट्रीय हित से जुड़े, वरना राष्ट्रीय विकास के हमारे सभी स्वप्न आकाश कुसुम की तरह रहेंगे। कहने को हमारे देश में लोकतंत्र है, किन्तु हमारी शैक्षिक विचारधाराएं निरूत्तर व्यक्तिपरक होती जा रही हैं। नई सोच, नई बातों का होना लाजिमी है परंतु ऐसा न हो कि हमारी परम्पराओं की जड़ें खोखली होती जायें।
भारत में शिक्षा का भावी रूप भले ही पेचीदा हो, राष्ट्रीय चेतना व सांस्कृतिक प्रसार में नकारात्मक होती जा रही है किन्तु यही अवसर है आत्मावलोकन और दिशा परिवर्तन का। अपने शैक्षिक पिरामिड की बुनियाद को सुदृढ़ बना ही हम अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल होंगे। शिक्षा के सभी स्तरों प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा पर सुदृढ़ नियोजन, समय-समय पर पुनरावलोकन व विश्लेषण, राष्ट्रीय शिक्षा नीति का समाज व परम्पराओं से संबंध, मूल्य शिक्षा, परीक्षा में परिवर्तन, शिक्षकों की स्थिति व आवश्यकता का विश्लेषण आदि ऐसे कई तत्वों पर पुनर्चर्चा करें तो शिक्षा समाज से जुड़ेगी। शिक्षा, शिक्षार्थी और अभिभावक का त्रिकोण सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था को प्रदूषित होने से बचा पायेगा।
(डॉ. सुचित्रा शर्मा)
सहायक प्राध्यापक, शासकीय महाविद्यालय वैशाली नगर

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

प्याऊ खोलने का क्या है..शास्त्रीय महत्त्व..?

प्याऊ खोलने का क्या है..शास्त्रीय महत्त्व..?

ग्रीष्मे चैव बसन्ते च
पानीये य: प्रयच्छति।

ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे,09827198828,Bhilai,
नोटः हमारे किसी भी लेख को कापी करना दण्डनीय अपराध है ऐसा करने पर उचित कार्यवायी करने को मजबूर हो जाऊंगा। समाचार पत्र पत्रिकाएं हमसे अनुमती लेकर प्रकाशित कर सकते हैं....
भविष्योत्तर पुराण के इस वचन के अनुसार ग्रीष्म ऋतु में और बसन्त ऋतु में जो पानी पिलाने की व्यवस्था करता है, उसके पुण्य का हजारों जिएं भी वर्णन नही कर सकती हैं। गर्मी बढ़ते ही सभी को चाहे वह पशु पक्षी अथवा वृक्ष ही क्यों न हो, उन्हें पानी की आवश्यकता भी बढऩे लगती है।
प्राय: देखा जाता है कि जगह-जगह पर लोगों की प्यास बुझाने के लिए इस विषय पर भारतीय संस्कृति के आधरभूत शास्त्र क्या कहते हैं यह जानना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। प्याऊ द्वारा प्यास बुझाने की प्रक्रिया को भारतीय संस्कृति प्रपा दान कहती है। अमरकोष में प्रपा का अर्थ  पानी यशाली का अर्थ पानी के घर से है। जहां पानी की अधिकारिक व्यवस्था हो, उसे प्रपा कहा जाता है। भविष्योत्तर पुराण मे लिखा गया है कि फाल्गुन मास के बीत जाने पर चैत्र महोत्सव से ग्राम या नगर के बीच में रास्ते में या वृक्ष के नीचे अर्थात छाये  में पानी पिलाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। समथ्र्यवान व्यक्ति को चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ इन चार महीनों में जल पिलाने की व्यवस्था अवश्य करनी चाहिए।
यदि कम धन वाला व्यक्ति है, तो उसे तीन पक्ष अर्थात बैशाख शुक्ल पक्ष, ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष व ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष मे अवश्य जल पिलाने की व्यवस्था करनी चाहिए। ऐसा करने से प्यासा व्यक्ति सन्तुष्ट होता है ओर इस फल के लोगों के भागी प्याऊ कर्म में संलग्र लोग होते हैं।
त्रयाणामपि लोकानामुद्रक जीवनं स्मृतमं।
पवित्रममृतं यस्मातद्देर्य पुण्य मिच्छता।।

स्कन्द पुराण के इस वचन के अनुसार तीनों लोकों में जल को जीवन, पवित्र और अमृत माना गया है इसलिए पुण्य की कामना वाले लोगों को जल पिलाने की व्यवस्था करनी चाहिए। शास्त्रों मे प्रत्येक मौसम के अनुरूप दान का अत्यन्त महत्व बतलाया गया है जिससे गरीब से गरीब व्यक्ति भी सुख पूर्वक रह सके तथा सामाजिक विकास में सभी की भागेदारी हो सके। सर्दी के मौसम में कंबल का दान,लकड़ी और अग्नि की व्यवस्था, वर्षा ऋतु में छतरी का दान, या किसी गरीब व्यक्ति के घर को आच्छादित कराना या घर बनवाकर देना तथा ग्रीष्म ऋतृ में जल देना, गरीब व्यक्तियों को घड़े का दान करना, सतू का दान करना , अत्यन्त श्रेयस्कर बताया गया है। गरूण पुराण तो यहां तक कहता है कि किसी को जल पिलाने के लिए अगर जल खरीदना भी पड़े, तो भी उसकी यथा शीघ्र जल पिलाना चाहिए। गर्मी के मौसम में पानी पिलाने की व्यवस्था केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं बल्कि पशु, पक्षियों इत्यादि सभी के लिए करने का प्रयास करना चाहिए। शास्त्र तो कहते हैं कि पेड़ पौघों को भी समुचित पानी देना चाहिए। गर्मी पौधे सूखते हैं वहां संक्रामक रोगों की अभिवृद्ध होती है। वैसे लोगों को जो  पानी में मिलावट करते हैं कुंए या तालाब पाटकर अपना पर या चौपाल बना लेते हैं, पानी की अनावश्यक बहते देख उसे सुरक्षित रखने का उचित प्रतिकार नहीं करते, नदी या तालाब में दूषित जल छोड़कर उसे गन्दा करते हैं, किसी प्रपा (प्याऊ) दान करने वाले मनुष्य को पानी पिलाने में बाधा उत्पत्र करते  हैं। ग्रीष्म में छाया में खड़े पशु, पक्षी एवं मानव को हटा देते हैं, पानी न देना पड़े इसके लिए असत्य बोलते हैं, इन सभी को शास्त्र पापी की उपमा देते हैं। तथा इनके कुल या खानदान में जल दोष से सम्बंधित रोगों की अभिवृद्धि होती है।
बसन्त ग्रीष्मर्यार्मध्ये य: पानीयं प्रयच्छति।
पले पले सुवर्णस्य फल माप्रोति मानव:।।

अर्थात बसन्त और ग्रीष्म यानी गर्मी के चार महीनों में घड़े के दान, वस्त्र का दान तथा पीने योग्य जल का जो दान करता है, उनको सुवर्ण  (सोना) दान का फल प्राप्त होता है। प्यास से व्याकुल व्यक्ति जिस क्षेत्र से होकर गुजरता है। उस क्षेत्र का पुण्य क्षीण हो जाता हैं इसलिए पुण्य की रक्षा हेतु भी प्याऊ की व्यवस्था करनी  चाहिए। बहुत से शास्त्रों में जल पिलाने वाले को गोदान का फल प्राप्त करने का अधिकारी माना गया है। गर्मी के दिनों में मन्दिरों में भी लोग जल की व्यवस्था करते हैं।
भविष्योत्तर पुराण के अनुसार
यावद् विन्दूनि लिंगस्य पतितानि न संशय:
स बसेच्छाडरे लोकं तावत् कोट्यो ।
ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे,09827198828,Bhilai,
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रविवार, 11 दिसंबर 2011

रोगों का निवारण रत्नों से:

कुण्डली विवेचन एवं प्रमाणित रत्नों के लिए संपर्क करें.09827198828

रोगों का निवारण रत्नों से:
ज्योतिष शास्त्र भविष्य दर्शन की आध्यात्मिक विद्या है। भारतवर्ष में चिकित्साशास्त्र (आयुर्वेद) का ज्योतिष से बहुत गहरा संबंध है। जन्मकुण्डली व्यक्ति के जन्म के समय ब्रह्माण्ड में स्थित ग्रह नक्षत्रों का मानचित्र होती है, जिसका अध्ययन कर जन्म के समय ही यह बताया जा सकता है कि अमुक व्यक्ति को उसके जीवन में कौन-कौन से रोग होंगे। चिकित्सा शास्त्र व्यक्ति को रोग होने के पश्चात रोग के प्रकार का आभास देता है। आयुर्वेद शास्त्र में अनिष्ट ग्रहों का विचार कर रोग का उपचार विभिन्न रत्नों का उपयोग और रत्नों की भस्म का प्रयोग कर किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार रोगों की उत्पत्ति अनिष्ट ग्रहों के प्रभाव से एवं पूर्वजन्म के अवांछित संचित कर्मो के प्रभाव से बताई गई है। अनिष्ट ग्रहों के निवारण के लिए पूजा, पाठ, मंत्र जाप, यंत्र धारण, विभिन्न प्रकार के दान एवं रत्न धारण आदि साधन ज्योतिष शास्त्र में उल्लेखित है।

ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे,09827198828,Bhilai,
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ग्रहों के अनिष्ट प्रभाव दूर करने के लिये रत्न धारण करने की परिपाटी निरर्थक नहीं है। इसके पीछे विज्ञान का रहस्य छिपा है और पूजा विधान भी विज्ञान सम्मत है। ध्वनि तरंगों का प्रभाव और उनका वैज्ञानिक उपयोग अब हमारे लिये रहस्यमय नहीं है। इस पर पर्याप्त शोध किया जा चुका है और किया जा रहा है। आज के भौतिक और औद्योगिक युग में तरह-तरह के रोगों का विकास हुआ है। रक्तचाप, डायबिटीज, कैंसर, ह्वदय रोग, एलर्जी, अस्थमा, माईग्रेन आदि औद्योगिक युक की देन है। इसके अतिरिक्त भी कई बीमारियां हैं, जिनकी न तो चिकित्सा शास्त्रियों को जानकारी है और न उनका उपचार ही सम्भव हो सका है। ज्योतिष शास्त्र में बारह राशियां और नवग्रह अपनी प्रकृति एवं गुणों के आधार पर व्यक्ति के अंगों और बीमारियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
जन्मकुण्डली में छठा भाव बीमारी और अष्टम भाव मृत्यु और उसके कारणों पर प्रकाश डालते हैं। बीमारी पर उपचारार्थ व्यय भी करना होता है, उसका विचार जन्मकुण्डली के द्वादश भाव से किया जाता है। इन भावों में स्थित ग्रह और इन भावों पर दृष्टि डालने वाले ग्रह व्यक्ति को अपनी महादशा, अंतर्दशा और गोचर में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं। अनुभव पर आधारित जन्मकुण्डली में स्थित ग्रहों से उत्पन्न होने वाले रोगों का वर्णन किया जा रहा है। इन बीमारियों का कुण्डली से अध्ययन करके पूर्वानुमान लगाकर अनुकूल रत्न धारण करने, ग्रहशांति कराने एवं मंत्र आदि का जाप करने से बचा जा सकता है। ग्रह स्थिति से निर्मित होने वाले रोग एवं रत्नों द्वारा उनका उपचार इस लेख में दर्शाये जा रहे हैं।
    ब्लड प्रेशर :
चिकित्सा विज्ञान में रक्तचाप होने के अनेकों कारण बताये गये हैं। चिंता, अधिक मोटापा, क्षमता से अधिक श्रम, डायबिटीज आदि। जन्मकुण्डली में शनि और मंगल की युति हों अथवा एक-दूसरे की परस्पर दृष्टि हो तथा छठे, आठवें और बारहवें भाव में चन्द्र का स्थित होकर पापग्रहों से दृष्ट होना रक्तचाप के योग देता है। चिंता और श्रम के कारण होने पर सफेद मोती, डायबिटीज और मोटापे के कारण होने पर पुखराज एवं शनि की साढ़े साती में रक्तचाप प्रारम्भ होने के कारण काला अ$कीक रत्न अंगूठी में धारण करने से लाभ होता है। उच्च रक्तचाप की स्थिति में बी.पी. स्टोन बायें हाथ की मध्य अंगुली में धारण करने से लाभ होता है। पूर्णमासी के दिन व्रत करें अैर बिना नमक का भोजन करने से भी बहुत लाभ होता है।
    हृदय रोग :
    जन्मकुण्डली के चतुर्थ, पंचम और छठे भावों में पापग्रह स्थित हों और उन पर शुभ ग्रहों की दृष्टि नहीं हो तो ह्वदय शूल की शिकायत होती है। कुम्भ राशि स्थित सूर्य पंचम भाव में और छठे भाव में अथवा इन भावों में केतु स्थित हो और चन्द्रमा पापग्रहों से देखा जाता हो तो ह्वदय संबंधी रोग होते हैं। सूर्य यदि कारण बनें तो माणिक, चन्द्र का कारण हो तो मोती और अन्य ग्रह कारक हों तो उनसे संबंधित रत्न धारण करना चाहिये।
    डायबिटीज :
यह रोग वंशानुगत, अधिक बैठने वाले व्यक्तियों को, चिंतन करने वाले व्यक्तियों को और अनियमित खानपान वाले व्यक्तियों को होता है। जन्मकुण्डली के अनुसार यह रोग चन्द्रमा के पापग्रहों के साथ युति होने पर, शुक्र ग्रह की गुरू के साथ या सूर्य के साथ युति होने पर अथवा शुक्र ग्रह पापग्रहों से प्रभावित होने पर होता है। बेजड़ (जौ-चने) की रोटी, करेले का उपयोग, विजयसार की लकड़ी के प्रयोग, जामुन के प्रयोग, पैदल परिक्रमा, योगासन से इस रोग पर नियंत्रण किया जा सकता है। सफेद मूंगे, एक्यूमेरिन रत्न अंगूठी में धारण करने से लाभ होता है।
    बवासीर :
सप्तम स्थान में स्थित मंगल लग्न में स्थित शनि से दृष्ट हो तो पाईल्स होती है। सप्तम भाव में धनु का मंगल स्थित हो तो भी पाईल्स की शिकायत होती है। इसके अतिरिक्त पंचम,सप्तम या अष्टम भाव में पापग्रह स्थित हों तो कब्ज और पाईल्स की शिकायत होती है। किडनी स्टोन, महामरियम, मूंगा, मोती आदि में से जो भी ग्रह जिम्मेदार हों, उसका रत्न धारण करने से लाभ होता है। माईग्रेन जन्मकुण्डली में शनि-चन्द्र की युति हो और उस पर मंगल की दृष्टि हो तो माईग्रेन की शिकायत होती है। इसके अतिरिक्त द्वादश भाव में केतु शत्रु नवांश का स्थित हो अथवा पंचम स्थान में शत्रु राशि के ग्रह स्थित हों तो माईग्रेन की शिकायत होती है। अधिकतर इस रोग का प्रारम्भ शनि की साढ़े साती में होता है। "काला अकीक" रत्न दायें हाथ की बड़ी अंगूठी में धारण करने से लाभ होता है।
    अस्थमा :
जन्मकुण्डली में बुध ग्रह मंगल के साथ स्थित हो या मंगल से दृष्ट हो, चन्द्रमा शनि के साथ बहुत कम दूरी पर स्थित हो अथवा अष्टम स्थान में वृश्चिक-मेष राशि का या नवांश का राहु स्थित हो तो व्यक्ति में एलर्जी के कारण अस्थमा की शिकायत होती है। ऐसी स्थिति में पन्ना रत्न, सफेद मूंगा अथवा गोमेद रत्न धारणण् करने से लाभ होता है।
    स्त्री रोग :
महिलाओं की जन्मकुण्डली में चन्द्रमा जब भी पापग्रहों के साथ अर्थात शनि, राहु, केतु एवं मंगल के साथ स्थित होगा तो मानसिक अशांति के साथ मासिक धर्म की अनियमितता पैदा करता है। ?सी स्थिति में चन्द्रमा के साथ जो ग्रह स्थित हो उसका रत्न धारण करने से स्वास्थ्य लाभ होता है। शनि-चन्द्र एक साथ हों तो काला अ$कीक दायें हाथ में धारण करने से लाभ होगा। अष्टम स्थान में मेष या वृश्चिक राशि का राहु स्थित हों और नवांश स्थिति भी उनकी अच्छी न हो तो रक्त स्त्राव अधिक होता है। गोमेद धारण करना ?सी स्थिति में बहुत लाभकारी होगा।
    दुर्घटना योग :
अष्टम भाव में मंगल, राहु, केतु, शनि शत्रु राशि के स्थित हों और नवांश में भी उनकी स्थिति अच्छी नहीं हो और किसी शुभग्रहों की दृष्टि उन पर नहीं हो तो दुर्घटनाएं गम्भीर होती है। अत: अष्टम भाव स्थित पापग्रह से संबंधित रत्न धारण किया जावें तो अवश्य लाभ होता है।
    अन्य सभी रोगों में रत्नों का प्रयोग :
अष्टम भाव पीठ दर्द और कमर दर्द का कारण भी दर्शाता है। छठे भाव और अष्टम भाव में स्थित पापग्रह नेत्र की बीमारियां दर्शाता है। द्वितीय और द्वादश भाव में स्थित ग्रह भी अनेक प्रकार के रोगों का संकेत देते हैं। अत: सम्पूर्ण रूप से रोग का विचार करते समय जन्मकुण्डली में छठे, आठवें एवं द्वादश भाव के साथ-साथ द्वितीय भाव की विवेचना करना चाहिये। इसके अतिरिक्त यदि व्यक्ति रोगी हो और जिस अंग पर रोग हो तो कुण्डली में उसी अंग का प्रतिनिधित्व करने वाले भाव का अध्ययन अच्छी तरह करना चाहिये। तत्पश्चात रोग जिस ग्रह के प्रभाव स्वरूप हुआ है, उससे संबंधित रत्न धारण करना चाहिए, अवश्य लाभ होगा।
रत्नों में दैवीय शक्ति होती है और चमत्कार करने की क्षमता भी, किन्तु गलत रत्न धारण करने से लाभ के बजाय हानि भी हो जाती है। रत्न का चुनाव पूर्ण सावधानी और अनुभव से करना चाहिये और रत्न की शुद्धता प्रामाणिक होनी चाहिए, तब ही लाभकारी होंगे। अत: रत्न चयन अच्छे अनुभवी ज्योतिषी के परामर्श से करना हितकारी होगा।

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