ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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बुधवार, 24 अगस्त 2011

न हन्यते..

                                न हन्यते..
Hrishikesh tripathi
''जहाँ एक ओर धड़ाधड़ कंक्रीट के जंगलों का निर्माण हो रहा, वहीं दूसरी ओर आज भी गरीबी का ब्रांड अंबेस्डर बना किसान आसमान की ओर ताक अस्फुट एवं आर्त स्वर में कह रहा है ...
''गरज बरस प्यासी धरती को फिर पानी दे मौला।''

प्रागैतिहासिक काल से लेकर आधुनिक काल तक के मनुष्य की इस अनादि एवं अनन्त यात्रा में निश्चय ही भ्रष्टाचार शब्द निहित रहा होगा। किंतु अवश्य ही इसका प्रारूप आज के प्रारूप से भिन्न रहा होगा। महाभारत, कुरान, बाईबिल, एवं गुरू ग्रंथ साहिब सहित अन्य कई धर्मग्रंथों में भी भ्रष्टाचार के विरूद्ध प्रतिद्वंद्विता स्पष्ट परिलक्षित होती है। इन लड़ाइयों में मर्यादा को महत्व दिया गया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के 64 वसंत देखने के बाद 65 वें वर्ष में प्रवेश करने वाले प्रत्येक भारतीय के अंत: करण से शायद यही आवाज निकल रही है।
भ्रष्टमद:, भ्रष्टमिदं, भ्रष्टात्, भ्रष्टमुदच्यते,
भ्रष्टस्य, भ्रष्टमादाय, भ्रष्टमेवावशिष्यते।

सुधि पाठकों के समक्ष यह श्लोक व्याख्यायित करना शायद उनकी प्रतिभा एवं बौद्धिक स्तर का मजाक उड़ाना होगा।
सभी प्रकार के तंत्रों यथा प्रजातंत्र एवं वादों यथा सामंतवाद का अनुसरण करने के पश्चात् 15 अगस्त 1947 में स्वतंत्र भारत को 26 जनवरी 19५० के दिन संपूर्ण विश्व के संविधानों एवं नियमावलियों को समेट, सारतत्व निकाल उसे एक सूत्र में पिरोया और उसे भारत का संविधान नाम से लिपिबद्ध कर दिया।
सर्वप्रथम अब्राहम लिंकन द्वारा प्रजातंत्र को परिभाषित करते शब्द कि प्रजातंतत्र जनता का जनता के लिए एवं जनता द्वारा चलायी जाने वाली सरकार है के समानान्तर विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के संचालकों ने एक नई परिभाषा अथक प्रयत्नों के पश्चात दी है, कि प्रजातंत्र भ्रष्टों का भ्रष्टों के लिए एवं भ्रष्टों द्वारा चलायी जाने वाली सरकार है। दूसरे शब्दों में प्रजातंत्र एवं लोकतंत्र का एक और पर्यायवाची शब्द बना भ्रष्टतंत्र।
1947 से अब तक के  इस विकासशील भारत वर्ष की उपलब्धियों पर एक नजर डालने का प्रयास किया भी जाए तो अनायास नजरें उन तथ्यों पर चली जाती हैं, जिन्होने इस सोने की चिडिय़ा को गर्त में धकेला क्योंकि यह प्रकृति का नियम है कि बुरी चीजों पर ही नजर जल्द जाती है, और मूल्यवान वस्तुओं से आम जन-मानस भटक जाता है। वैसे कई ऐसी उपलब्धियाँ हमारी अवश्य हैं जिन्हें गिनाकर हम अपनी पीठ थपथपाकर गौरवान्वित महसूस करते हैं।
दूध की नदियों वाले देश में पानी के लाले हैं,और विदेशी निवेशकों के द्वारा पानी की बोतले बेंची जा रहीं हैं। जहां पहले पानी के पौसर, तालाब, कूप आदि जन-सेवा के लिए नि:शुल्क संचालित किया जाता रहा है। किन्तु आज सोने की चिडिय़ा वाले देश में किसान आत्महत्या कर रहे हैं, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास से देश का इंफ्रास्ट्रक्चर (आंतरिक ढांचा) मजबूत हो रहा है, और वहीं मँहगाई के मार से आम आदमी की कमर टूट रही है। ''तेते पाँव पसारिए, जेती लांबी सौर'' को भूलकर मेजबानी तो कर रहे लेकिन अतिथियों की शयन पट्टिका टूटी जा रही । जहाँ एक ओर धड़ाधड़ कंक्रीट के जंगलों का निर्माण हो रहा, वहीं दूसरी ओर आज भी गरीबी का ब्रांड अंबेस्डर बना किसान आसमान की ओर ताक रहा है। ''गरज बरस प्यासी धरती को फिर पानी दे मौला, अस्फुट एवं आर्त स्वर में कह रहा है।''
भ्रष्टाचार से सराबोर यह तंत्र पूँजीवाद के बढ़ते साए में मानवीय मूल्यों को रौंदता हुआ किस विकास की राह में अग्रसर है, यह जानते - बूझते हुए भी अबूझ बन गया है। इसी मौके के लिए शायद लिखा गया- ''विनाश काले विपरीत बुद्धि।''

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