ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

!!विशेष सूचना!!
नोट: इस ब्लाग में प्रकाशित कोई भी तथ्य, फोटो अथवा आलेख अथवा तोड़-मरोड़ कर कोई भी अंश हमारे बगैर अनुमति के प्रकाशित करना अथवा अपने नाम अथवा बेनामी तौर पर प्रकाशित करना दण्डनीय अपराध है। ऐसा पाये जाने पर कानूनी कार्यवाही करने को हमें बाध्य होना पड़ेगा। यदि कोई समाचार एजेन्सी, पत्र, पत्रिकाएं इस ब्लाग से कोई भी आलेख अपने समाचार पत्र में प्रकाशित करना चाहते हैं तो हमसे सम्पर्क कर अनुमती लेकर ही प्रकाशित करें।-ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे, सम्पादक ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका,-भिलाई, दुर्ग (छ.ग.) मोबा.नं.09827198828
!!सदस्यता हेतु !!
.''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका के 'वार्षिक' सदस्यता हेतु संपूर्ण पता एवं उपरोक्त खाते में 220 रूपये 'Jyotish ka surya' के खाते में Oriental Bank of Commerce A/c No.14351131000227 जमाकर हमें सूचित करें।

ज्योतिष एवं वास्तु परामर्श हेतु संपर्क 09827198828 (निःशुल्क संपर्क न करें)

आप सभी प्रिय साथियों का स्नेह है..

शनिवार, 27 अगस्त 2011

हिन्दुओ मे रत्न और मुश्लिमो मे नगिना

 हिन्दुओ मे रत्न और मुश्लिमो मे नगिना 
फिल्म उमराव जान के एक सीन में फारूख शेख रेखा के बालों में आहिस्ता-आहिस्ता उंगलियां फिरा रहे हैं. इस बेहद खूबसूरत और रोमांटिक सीन में रेखा की काली जुल्फों के साथ जिस चीज पर कैमरा फोकस कर रहा है वह फारूख शेख के हाथ की एक ऊंगली में जगमगा रहा नैशापुरी फिरोजा है. लखनऊ में शूटिंग के दौरान नवाब मीर जाफर अब्दुल्ला की उंगली से उतरवाकर फिल्म के निर्देशक मुजफ्पर अली ने यह अंगूठी खास तौर पर फारूख शेख को पहनाई थी। मुजफ्फर अली शिया मुसलमान है और कही नकहीं वह यह जरूर दिखाना चाहते थे कि शियाओं की एक पहचान फिरोजा रत्न भी है क्योंकि चौथे खलीफा हजरत अली और आठवें इमाम रजा फिरोजे की अंगूठी पहनते थे। ईरान स्थित नौशापुर का फिरोजा की अंगूठी पहनते थे। ईरान स्थित नौशापुर का फिरोजा सबसे बेहतरीन माना जाता है। इराक के जनफ में हजरत अली के रौजे और ईरान के मशद के नजफ में हजरत की कब्र से मस (छुआ) कर फिरोजा पहनना शियाओं में सवाब(पुण्य) माना जाता है. फिरोजे का इस्तेमाल सोने के जेवरों में भी हमेशा से खूब होता आया है. इसकी नीली चमक पीले सोने में खूब फबती है. इसे जवाहरात की श्रेणी में दूसरे नंबर पर रखा जाता है. इस पर न तो तेजाब का असर होता है. और न आग में पिघलता है. इसे पहनने से दिन के मर्ज मे फायदा होता है. तबीयत को राहत और ताजगी बख्शता है. आंखो की रोशनी बढ़ाता है. और गुर्दे की पथरी निकालता है। साफ और खुली फिजा मे इसका रंग और ज्यादा खिल जाता है.
फिरोजा ही नही, अकीक पहनना भी मुसलमानों में सवाब माना जाता है. मक्का में सगे असवद को बोसा(चूमना) देना हज और उमरे की जरूरी रस्म मानी जाती है. हजरत मूसा और हजरत ईसा से पहले हजरत इब्राहीम के जमाने में यह पत्थर आसमान से उतरा। इसी ने हजरत इब्राहीम की रास्ता दिखाया. जहां पर गिरा वहां पर मक्के की बुनियाद रखी गई।
हर रतेम की अपनी खासियत और पहचान है। यह काला पत्थर अकीक (पुखराज की तरह) की नस्ल का बताया जाता है. मुसलमानों के सारे फिरकों में अकीक को मुसलमानों में पवित्र और मजहबी नगीना इसलिए भी माना जाता है पैगंबर मोहम्मद साहब भी अकीक की अंगूठी पहनते थे। मन का अकीक सबसे महंगा और पवित्र माना जाता है. अकीक एकमात्र रत्न है जो धूप या अन्य किरणों को जज्ब कर जिस्म के अंदर पहुंचाता है. इसे पहनने से दिमाग को ताकत मिलती है. और नजर को भी बढ़ाता है.
रहस्यमयी नगीने नीलम को उर्दू में भी नीलम ही कहा जाता है. मुसलमानों में यह शनि का रत्न न होकर जिस्म और आंखों को ताकत, पेट के सिस्टम को ठीक कर तबीयत को नर्म करने वाला नगीना है। इसको पहनने से अच्छी आदतें पैदा होती है।
कमजोर आदमी भी अपने अंदर ताकत महसूस करता है. इसको पहनने वालेपर जादू का असर नही होता। प्लेटों ने भी नीलम की तारीफ की है।
हीरे के उर्दू में भी हीरा ही कहते हैं. मुसलमानों में हीरा भी उतना ही लोकप्रिय है जितना हिंदुओं या ईसाइयों में। यह अकेला रत्न है जिसकी कुछ हिंदू अभी भी पूजा करते हैं. पुखराज को उर्दू में भी पुखराज ही कहते हैं. असली पुखराज एकदम पारदर्शी होता है. यह जिस्म में गर्मी और ताकत को बढ़ाता है. इसको पहनने से कोढ़ तक ठीक हो जाता है. खून की खराबी में भी फायदा करता है. जहर को मारता है. और बवासीर में लाभकारी है।
इच्छाशक्ति को तेज करता है. और व्यपार की उलझनें दूर करता है. दया भाव पैदा करने के साथ ही परोपकारी और स्वाभिमानी भी बनाता है. हिंदुओं में इसे दाहिने हाथ की उंगली मे पहना जाता है. जबकि मुसलमानों में बाएं हाथ में। वाराणसी(काशी) में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय  के प्रो. डॉ. रामचन्द्र पाण्डेय एवं डॉ. चन्द्रमौली उपाध्याय कहते हैं कि पुखराज चूंकि बहुत महंगा होता है. इसलिए भी कुछ लोग अकीक पहनते हैं. लेकिन वह इस बात से इनकार करते हैं कि मुसलमानों में नगीनों का इस्तेमाल कम होता है. गोमेद को उर्दू में जरकंद कहते हैं. मुसलमानों में मान्यता है कि इसको पहनने से सामाजिक प्रतिष्ठïा में इजाफा होता है. और तरक्की भी होती है. यह पौरूष शक्ति भी बढ़ाता है और गहरी नींद सुलाता है. लकवाग्रस्त व्यक्ति को फायदा पहंचाता है. लहसुनिया को इंग्लिश में कैट्स आई और उर्दू में यशब कहते हैं. यहूदी इस नगीनें का इस्तेमाल सबसे ज्यादा करते हैं. इस्राइल में यह बहुत लोकप्रिय है. पुराने जमाने में इस गर्भ निरोधक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था. कहा जाता है कि दूध मे कुछ देर डालकर वह दूध पिलाने से औरत को गर्भ नही ठहरता। इस पर तेजाब का असर नही होता।
मोती को उर्दू में मरवारीद कहते हैं. इसका इस्तेमाल जितना पहनने में होता है उतना ही दवा बनाने में. यूनानी दवाओं में खमीरा मरवारीद काफी मशहूर हैं. इसको पहनने से ईमानदारी पैदा होती है. दिमाग ठंडा रखता है. खसरा और चेचक में बहुत लाभदायक माना जाता है. आंखों की रोशनी बढ़ाने में भी सहायक है. पन्ने को उर्दू में जमुर्रद कहते हैं. और तमाम हरे पत्थरों में इसे सबसे बेहतरीन बताया गया है. तोहफा-ए-आलमें शाही किताब में लिखा है कि पैगंबर मोहम्मद साहब ने किसी से फरमाया कि जमुर्रद की अंगूठी से तमाम मुश्किलात आसान हो जाती है. हजरत अली कहते थे कि जमुर्रद किसी नागहानी(संकट) का संकेत भी देता है।
लेकिन देवबंद फिके से ताल्लुक रखने वालेे मुसलमान इस तरह की बातों के सख्त खिलाफ है. उनका कहना है कि एक पत्थर की क्या बिसात है कि वह किसी का फायदा या नुकसान करेगा। जो कुछ करेगा अल्लाह करेगा. सीतापुर कीे एक मस्जिद के इमाम मौलाना नईम अंसारी इस तरह की बातों को शिर्क बताते हैं. कहते है कि जरूरी नही कि किताबों की हर बात सही ही हो। कौन सी किताब सही है या गलत यह भी देखने की जरूरत है. पन्ने को लेकर चाहें जितने  भ्रम हो लेकिन इसकी मांग हर जगह बराबर है. मुस्लिम औरते इसे खूब पहनती है. खासतौर पर इसका लॉकेट। मिलने जुलने की प्रवृत्ति पैदा करता है. दिल की बीमारी के अलावा मेदे में ठंडक पैदा कर पाचन क्रिया को सुदृढ़ करता है। पुराने जमाने में महारानियों की कमर में बांधा जाता था जिससे बच्चे की पैदाईश आसान हो जाती थी। किसी भी मुसीबत आने से पहले ही बुरी तरह से चिटक जाता है।
मूंगे को उर्दू में मरजान कहते हैं. कुरान शरीफ में इसके गुणों की चर्चा सूरे रहमान है. सारे रत्न पहाड़ों की खदानों से निकलते हैं. लेकिन मूंगा समुद्र की तलहटी के पत्थरों से चिपटी हुई एक प्रकार की वनस्पति है जो पत्थर के आसपास शरद के छत्ते की शक्ल की पैदा होती है. माना जाता है कि इसको पहनने से लकवा-फालिज नहीं होता। शरीर में कंपन की बीमारी नही होने देता। लिवर और पाचन क्रिया को सुदृढ़ करता है. दिल की धड़कन को काबू में रखने के अलावा गठिया में भी फायदा पहुंचाता है. इसको धारण करने वाले को आर्थिक तंगी से भी नही जूझना पड़ता। हकीम जालीनूस ने लिखा है कि कट जाने पर शरीर से खूून न रूक रहा हो तो मूंगे का पाउडर लगान से तत्काल रूक जाता है।
माणिक को अंग्रेजी में रूबी और उर्दू में याकूत कहते हैं. मशहूर इस्लामी स्कॉलर सैयद इब्राहीम सैफी ने लिखा है कि जब हजरत-आलम को जन्नत से निकाला गया तो सबसे पहले उनका पैर श्रीलंका के सेरेनद्वीप पर पड़ा। उनके कदम मुबारक के छूने से याकूत पैदा हुआ। माणिक के प्याले में शराब डालकर पानी से उसकी तेजी और नशा लगभग खत्म हो जाता है. कुछ मुस्लिम शाहंशाहों के बारे में कहा जाता है कि वह याकूत के प्याले में ही शराब पीते थे क्योंकि इस्लाम में शराब नही नशे को हराम करार दिया गया है. राजा और शाहंशाह इसी के बर्तनों में खाना भी खाते थे। क्योंकि माणिक के बर्तन में जहर का असर नही होता। कबूतर की आंख की पुतली में जो सुर्ख रंग होता है. उस रंग का माणिक सबसे बेहतरीन माना जाता है. शादियों में इसकी अंगूठी बेहतरीन तोहफा  माना जाता है. इसे धारण करने वाला किसी से भी ताल्लुकात बनाने में निपुण हो जाता है. दिमागी फिक्र और परेशानी भी दूर करता है. जिस्म में फुर्ती रहती है. मिर्गी, गठिया और प्लेग में फायदा पहुंचाता है. इसकी सबसे खास बात यह है कि यह प्यास की शिद्दत को कम करता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.