ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

महालक्ष्मी-पूजनम् (संपूर्ण पूजा विधान) 26/10/2011

महालक्ष्मी-पूजनम्  (संपूर्ण पूजा विधान)
सभी प्रकार के अनुष्ठानों में लक्ष्मी का अनुष्ठान अत्यंत कठिन माना जाता है । संयोग से दिपावली में योग्य अनुष्ठानी ब्रह्मणों की  की भी अनुपलब्धता रहती है ऐसे में आपके मन में यह विचार आता है कि यदि महालक्ष्मी पूजन की संपूर्ण विधी हमें ज्ञात रहता तो मैं स्वतः इस अनुष्ठान को संपन्न करा लेता ....लेकिन आपको संपूर्ण पूजा पद्धति की विधीवत जानकारी के वगैर पूजन करनें में भय का होना लाज़मी है किन्तु कहा जाता है ..माँ कभी कुमाता नहीं होती ठीक उसी प्रकार जैसे तोतली भाषा में बोलने वाले बच्चे को उसके कथनानुसार दुध पिलाने को आतुर हो उठती है ..तो मित्रों आप लोग माँ से डरें न बल्कि अपने ज्ञान के अनुसार उनका पत्रं, पुष्पं जो भी उपलब्ध हो अथवा टुटे-फुटे शब्दों में भी उनकी आराधना कर सकते हैं..
किन्तु इस बार हम आपको अपने यथा ज्ञान के अनुसार संकलित महा लक्ष्मी-पूजन विधान (संपूर्ण ) मैं आपके समक्ष रख रहा हुं। इस महा लक्ष्मी पूजन से संबंधित अधिक जानकारी के लिए आप हमसे फोन पर भी निःशुल्क परामर्श ले सकते हैं..ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे मोबा.नं.09827198828

श्री लक्ष्मीपूजन एवं उसका अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व
         
विक्रम संवत अनुसार कार्तिक अमावस्याका दिन दीपावलीका एक महत्त्वपूर्ण दिन है ।

दीपावलीके कालमें आनेवाली अमावस्याका महत्त्व
सामान्यत: अमावस्याको अशुभ मानते हैं; परंतु दीपावली कालकी अमावस्या शरदपूर्णिमा अर्थात कोजागिरी पूर्णिमाके समान ही कल्याणकारी एवं समृद्धिदर्शक है ।
इस दिन करनेयोग्य धार्मिक विधियां हैं..
१. श्री लक्ष्मीपूजन
२. अलक्ष्मी नि:सारण
दीपावलीके इस दिन धन-संपत्तिकी अधिष्ठात्रि देवी श्री महालक्ष्मीका पूजन करनेका विधान है । दीपवालीकी अमावस्याको अर्धरात्रिके समय श्री लक्ष्मी का आगमन सद्गृहस्थोंके घर होता है । घरको पूर्णत: स्वच्छ, शुद्ध और सुशोभित कर दीपावली मनानेसे देवी श्री लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और वहां स्थायी रूपसे निवास करती हैं । इसीलिए इस दिन श्री लक्ष्मीजीका पूजन करते हैं और दीप जलाते हैं । यथा संभव श्री लक्ष्मीपूजनकी विधि सपत्निक करते हैं ।

यह अमावस्या प्रदोषकालसे आधी रात्रितक हो, तो श्रेष्ठ होती है । आधी रात्रितक न हो, तो प्रदोषव्यापिनी तिथि लेनी चाहिए । दीपावलीके दिन श्री लक्ष्मीपूजनके लिए विशेष सिद्धता की जाती है ।

पूजाके आरंभमें आचमन किया जाता है । (मंत्र) उपरांत प्राणायाम ......... एवं देशकालकथन किया जाता है । तदुपरांत लक्ष्मीपूजन एवं उसके अंतर्गत आनेवाले अन्य विधियोंके लिए संकल्प किया जाता है । (मंत्र)

पूजनके आरंभमें, आचमन, प्राणायाम इत्यादि धार्मिक कृतियां करनेसे पूजककी सात्त्विकता बढ़ती है । इससे पूजकको देवतापूजनसे प्राप्त चैतन्यका आध्यात्मिक स्तरपर अधिक लाभ होता है । श्री लक्ष्मीपूजनका प्रथम चरण है,

श्री महागणपतिपूजन -

संकल्पके उपरांत श्रीमहागणपतिपूजनके लिए ताम्रपात्रमें रखे नारियलमें श्रीमहागणपतिका आवाहन किया जाता है । आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, कर्पासवस्त्र, चंदन, पुष्प एवं दुर्वा, हलदी, कुमकुम, धूप, दीप, नैवेद्य आदि उपचार अर्पित कर पूजन किया जाता है ।

श्री गणपति दिशाओंके स्वामी हैं । इसलिए प्रथम श्री महागणपति पूजन करनेसे सर्व दिशाएं खुल जाती हैं । परिणामस्वरूप सर्व देवतातत्त्वोंकी तरंगोंको बिना किसी अवरोध पूजनविधिके स्थानपर आना सुलभ होता है । श्री महागणपति पूजनके उपरांत कलश, शंख, घंटा, दीप इन पूजाके उपकरणोंका पूजन किया जाता है । तत्पश्र्चात जल प्रोक्षण कर पूजासामग्री की शुद्धि की जाती है ।

वरुण तथा अन्य देवताओंका आवाहन और पूजन

चौपाएपर अखंड चावलका पुंज बनाकर उसपर जलसे भरा कलश रखते हैं । कलशमें भरे जलमें चंदन, आम्रपल्लव, सुपारी एवं सिक्के रखे जाते हैं ।   कलशको वस्त्र अर्पित किया जाता है । तदुपरांत कलशपर अखंड चावलसे भरा पूर्णपात्र रखा जाता है । इस पूर्णपात्रमें रखे चावलपर कुमकुमसे अष्टदल कमल बनाया होता है । कलशको अक्षत समर्पित कर उसमें वरुण देवताका आवाहन किया जाता है । चंदन, हलदी, कुमकुम, अक्षत एवं पुष्प अर्पित कर वरुणदेवताका पूजन किया जाता है ।

अष्टदल कमलके कारण उस स्थानपर शक्तिके स्पंदनोंका निर्माण होता है । ये शक्तिके स्पंदन सर्व दिशाओंमें प्रक्षेपित होते हैं । इस प्रकार पूर्णपात्रमें बना अष्टदल कमल यंत्रके समान कार्य करता है । पूर्णपात्रमें बनाए अष्टदल कमलपर सर्व देवताओंकी स्थापना करते हैं । कलशमें श्री वरुणदेवताका आवाहन कर उनका पूजन करते हैं । तदुपरांत पूर्णपात्रमें बनाए अष्टदल कमलपर आवाहन किए गए देवता तत्त्वोंका पूजन करते हैं ।

कलशमें वरुणदेवताका आवाहन करनेका महत्त्व

वरुण जलके देवता हैं । वरुणदेवता आपतत्त्वका नियमन करते हैं और कर्मकांडके विधि करते समय आवश्यकताके अनुसार ईश्वरीय तत्त्व साकार होनेमें सहायता करते हैं । आपतत्त्वके माध्यमसे आवश्यक ईश्वरीय तत्त्व व्यक्तिमें एवं विधिके स्थानपर कार्यरत होता है । यही कारण है कि, हिंदु धर्मने विविध देवताओंके पूजन हेतु की जानेवाली विभिन्न प्रकारकी विधियोंमें वरुणदेवताका आवाहन करनेका विधान बताया है ।

कलशमें वरुण देवताका आवाहन कर पूजन करनेके उपरांत चावलसे भरे पूर्णपात्र पर अक्षत अर्पित कर सर्व देवताओंका आवाहन किया जाता है। चंदन, पुष्प एवं तुलसीपत्र, हलदी, कुमकुम, धुप, दीप आदि उपचार अर्पित कर सर्व देवताओंका पूजन किया जाता है ।

श्रीलक्ष्मी तथा कुबेर का आवाहन एवं पूजन

सर्व देवताओंके पूजनके उपरांत कलशपर रखे पूर्णपात्रमें श्रीलक्ष्मीकी मूर्ति रखी जाती है । उसके निकट द्रव्यनिधि रखा जाता है । उपरांत अक्षत अर्पित कर ध्यानमंत्र बोलते हुए, मूर्तिमें श्रीलक्ष्मी तथा द्रव्यनिधि पर कुबेर का आवाहन किया जाता है । अक्षत अर्पित देवताओंको आसन दिया जाता है । उपरांत श्री लक्ष्मीकी मूर्ति एवं द्रव्यनिधि स्वरूप कुबेर को अभिषेक करने हेतु ताम्रपात्रमें रखा जाता है । अब श्रीलक्ष्मी एवं कुबेर को आचमनीसे जल छोडकर पाद्य एवं अर्घ्य दिया जाता है ।

तत्पश्र्चात दूध, दही, घी, मधु एवं शर्करासे अर्थात पंचामृत स्नान का उपचार दिया जाता है । गंधोदक एवं उष्णोदक स्नान का उपचार दिया जाता है । चंदन व पुष्प अर्पित किया जाता है । श्री लक्ष्मी व कुबेरको अभिषेक किया जाता है । उपरांत वस्त्र, गंध, पुष्प, हलदी, कुमकुम, कंकणादि सौभाग्यालंकार, पुष्पमाला अर्पित की जाती हैं । श्री लक्ष्मीके प्रत्येक अंगका उच्चारण कर अक्षत अर्पित की जाती है । इसे अंगपूजा कहते हैं ।

श्री लक्ष्मीकी पत्रपूजा की जाती है । इसमें सोलह विभिन्न वृक्षोंके पत्र अर्पित किए जाते हैं । पत्रपूजाके उपरांत धूप, दीप आदि उपचार समर्पित किए जाते हैं ।  श्रीलक्ष्मी व कुबेरको नैवेद्य चढ़ाया जाता है । अंतमें देवीकी आरती उतारकर, मंत्रपुष्पांजली अर्पित की जाती है । कुछ स्थानोंपर देवीको धनिया एवं लाई अर्पण करनेकी प्रथा है ।

कुछ स्थानोंपर भित्तिपर विभिन्न रंगोंद्वारा श्रीगणेश-लक्ष्मीजीके चित्र बनाकर उनका पूजन करते हैं । तो कुछ स्थानोंपर श्रीगणेश-लक्ष्मीजीकी मूर्तियां तथा कुछ स्थानोंपर चांदीके सिक्केपर श्री लक्ष्मीजीका चित्र बनाकर उनका पूजन करते हैं ।

श्री लक्ष्मीपूजनमें अष्टदल कमलपर स्थापित विविध देवता तत्त्वोंके पूजनके उपरांत श्री लक्ष्मीजीकी मूर्तिका अभिषेक करनेका कारण

किसी भी देवता पूजनमें देवताका आवाहन करनेसे देवताका निर्गुण तत्त्व कार्यरत होता है और पूजास्थानपर आकृष्ट होता है । देवताकी मूर्ति देवताका सगुण रूप है । इस सगुण रूपको भावसहित और संभव हो, तो मंत्रसहित अभिषेक करनेसे मूर्तिमें देवताका सगुणतत्त्व कार्यरत होता है । इससे मूर्तिमें संबंधित देवताका निर्गुण तत्त्व आकृष्ट होनेमें सहायता होती है । अभिषेकद्वारा जागृत मूर्तिको उसके स्थानपर रखनेसे उस स्थानका स्पर्श मूर्तिको होता रहता है । इससे आवाहन किए गए देवतातत्त्व मूर्तिमें निरंतर संचारित होते रहते हैं । इस प्रकार देवतातत्त्वसे संचारित मूर्तिद्वारा देवतातत्त्वकी तरंगें प्रक्षेपित होने लगती हैं । जिनका लाभ पूजकके साथही वहां उपस्थित अन्य व्यक्तियोंको भी मिलता है । साथही पूजास्थानके आसपासका वातावरण भी देवतातत्त्वकी तरंगोंसे संचारित होता है । यही कारण है कि, श्री लक्ष्मीपूजनमें अष्टदल कमलपर स्थापित विविध देवता तत्त्वोंके पूजनके उपरांत श्री लक्ष्मीजीकी मूर्तिका अभिषेक करते हैं ।

श्री लक्ष्मी एवं कुबेरको नैवेद्य निवेदित करते हैं । श्री लक्ष्मीको धनिया एवं चावलकी खीलें अर्पण करते है ।

श्री लक्ष्मीदेवीके नैवेद्यमें समाविष्ट घटक

श्री लक्ष्मीपूजनमें देवीको अर्पित करने हेतु बनाए नैवेद्यमें लौंग, इलायची, दूध एवं शक्कर, इन घटकोंका समावेश होता है । कुछ लोग संभव हो, तो इन घटकोंको मिलाकर बनाए खोएका उपयोग नैवेद्यके रूपमें करते हैं । इन घटकोंमेंसे प्रत्येक घटकका कार्य भिन्न होता है ।
१. लौंग तमोगुणका नाश करती है ।
२. इलायची रजोगुणका नाश करती है । 
३. दूध एवं शक्कर सत्त्वगुणमें वृद्धि करते हैं ।
यही कारण है कि, इन घटकोंको 'त्रिगुणावतार' कहते हैं । ये घटक व्यक्तिमें त्रिगुणोंकी मात्राको आवश्यकतानुसार अल्पाधिक करनेका महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं ।
कुछ स्थानोंपर लक्ष्मीपूजनके लिए धनिया, बताशे, चावलकी खीलें, गुड तथा लौंग, इलायची, दूध एवं शक्कर इत्यादिसे बनाए खोएका उपयोग भी नैवेद्यके रूपमें करते हैं । इनमेंसे धनिया `धन' वाचक शब्द है, तो चावलकी `खीलें' समृद्धिका । मुट्ठीभर धान भूंजनेपर उससे अंजुलीभर खीलें बनती हैं । लक्ष्मीकी अर्थात धनकी समृद्धि होने हेतु श्री लक्ष्मीजीको खीलें चढाते हैं ।

श्री लक्ष्मीके पूजन हेतु उपयोगमें लाई जानेवाली सामग्रीसे प्राप्त लाभ

१. बताशेसे सात्त्विकताका २५ प्रतिशत लाभ मिलता है ।
२. धानद्वारा शक्तिकी तरंगोंका २० प्रतिशत
३. चावलकी खीलोंसे चैतन्यकी तरंगोंका २५ प्रतिशत  
४. गूडसे आनंदकी तरंगोंका १५ प्रतिशत
५. धनियासे शांतिकी तरंगोंका १५ प्रतिशत लाभ मिलता है ।
इनका कुल योग होता है १०० प्रतिशत ।
इस सारिणीसे श्री लक्ष्मीपूजनके समय उपयोगमें लाई जानेवाली सामग्रीका महत्त्व स्पष्ट होता है । ये सामग्री देवीको निवेदित करनेके उपरांत प्रसादके रूपमें सगेसंबंधियोंमें बांटते हैं ।

पूजनके अंतिम चरणमें देवीकी आरती उतारकर, मंत्रपुष्पांजली अर्पित करते हैं । श्रद्धापूर्वक नमस्कार कर पूजनके समय हुई गलतियोंके लिए देवीकी क्षमा याचना करते हैं ।
दीपावलीके दिन श्री लक्ष्मीपूजन करनेसे सूक्ष्म स्तरपर होनेवाली प्रक्रिया
प्रथम पूजा
श्रीसूक्त के १६ मन्त्र मॉं लक्ष्मी को विशेष प्रसन्न करने वाले माने गए हैं । यह सूक्त ‘ श्री ’ अर्थात लक्ष्मी प्रदान करने वाला है । इसी कारण इसे श्रीसूक्त कहते हैं । वेदोक्त होने के कारण यह अत्यधिक प्रभावशाली भी है । प्रत्येक धार्मिक कार्य में , हवनादि के अन्त में इन १६ सूक्तों से मॉं लक्ष्मी के प्रसन्नार्थ आहूतियॉं अवश्य लगाई जाती हैं । इसके १६ सूक्तों से मॉं लक्ष्मी की षोडशोपचार पूजा की जाती है । दीपावली पर पुराणोक्त , वेदोक्त अथवा पारम्परिक रुप से तो प्रतिवर्ष ही आप पूजन करते हैं । इस वर्ष इन विशिष्ट सूक्तों से मॉं लक्ष्मी को प्रसन्न कीजिए ।
लक्ष्मी पूजन हेतु सामग्री रोली , मौली , पान , सुपारी , अक्षत ( साबुत चावल ), धूप , घी का दीपक , तेल का दीपक , खील , बतासे , श्रीयंत्र , शंख ( दक्षिणावर्ती हो , तो उत्तम ), घंटी , घिसा हुआ चन्दन , जलपात्र , कलश , पाना ( लक्ष्मी , गणेश एवं सरस्वती का संयुक्त चित्र ), दूध , दही , शहद , शर्करा , घृत , गंगाजल , सिन्दूर , नैवेद्य , इत्र , यज्ञोपवीत , श्वेतार्क के पुष्प , कमल का पुष्प , वस्त्र , कुंकुम , पुष्पमाला , ऋतुफल , कर्पूर , नारियल , इलायची , दूर्वा , एकाक्षी नारियल , चॉंदी का वर्क इत्यादि ।
पूजन विधि सर्वप्रथम लक्ष्मी -गणेश के पाने ( चित्र ), श्रीयन्त्र आदि को जल से पवित्र करके लाल वस्त्र से आच्छादित चौकी पर स्थापित करें । लाल कम्बल या ऊन के आसन को बिछाकर पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख बैठें । पूजन सामग्री निम्नलिखित प्रकार से रखें :
बायीं ओर : १ . जल से भरा हुआ पात्र , २ . घंटी , ३ . धूपदान , ४ . तेल का दीपक ।
दायीं ओर : १ . घृत का दीपक , २ . जल से भरा शंख ( दक्षिणावर्ती शंख हो , तो उत्तम ) ।
सामने : १ . घिसा हुआ चन्दन , २ . रोली , ३ . मौली , ४ . पुष्प , ५ . अक्षत आदि ।
भगवान के सामने : चौकी पर नैवेद्य ।
सर्वप्रथम निम्नलिखित मन्त्र से अपने ऊपर तथा पूजन सामग्री के ऊपर जल छिडकें :
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।
यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥
अब चौकी के दायीं ओर घी का दीपक प्रज्वलित करें ।
स्वस्तिवाचन इसके पश्चात दाहिने हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर निम्न मन्त्रों से स्वस्तिवाचन करें :
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्तिनो बृहस्पतिर्दधातु ॥
पयः पृथिव्यां पय ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो धाः ।
पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम ।
विष्णो रराटमसि विष्णोः श्नप्त्रेस्थो विष्णोः स्यूरसि विष्णोर्ध्रुवोऽसि वैष्णवमसि विष्णवे त्वा ॥
अग्निर्देवताव्वातोदेवतासूर्य्योदेवता चन्द्रमा देवताव्वसवो देवता रुद्रोदेवता आदित्यादेवता मरुतोदेवता विश्वेदेवा देवता बृहस्पतिः देवतेन्द्रोदेवताव्वरुणोदेवता ॥
द्यौः शान्तिरन्तिरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः ।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ।
यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु ।
शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः । सुशान्तिर्भवतु ॥
ॐ शांतिः शांतिः सुशांतिर्भवतु । सर्वारिष्ट -शांतिर्भवतु ॥
अब हाथ में लिए हुए अक्षत -पुष्य सामने चौकी पर चढा दें ।
गणपति आदि देवताओं का स्मरण स्वस्तिवाचन के पश्चात निम्नलिखित मन्त्र के साथ भगवान गणेश का हाथ में पुष्प -अक्षत आदि लेकर स्मरण करना चाहिए तत्पश्चात उन्हें चौकी पर चढा दें :
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ॥
अब निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुए सम्बन्धित देवताओं का का स्मरण करें :
श्रीमन्महागणाधिपतये नमः । लक्ष्मी -नारायणाभ्यां नमः ।
उमामहेश्वराभ्यां नमः । वाणी -हिरण्यगर्भाभ्यां नमः ।
शची -पुरन्दराभ्यां नमः । मातृपितृचरणकमलेभ्यो नमः ।
इष्टदेवताभ्यो नमः । कुलदेवताभ्यो नमः ।
ग्राम देवताभ्यो नमः । वास्तुदेवताभ्यो नमः ।
स्थानदेवताभ्यो नमः । सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः ।
सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः । सिद्धिबुद्धि सहिताय श्रीमन्महागणाधिपतये नमः ।
विभिन्न देवताओं के स्मरण के पश्चात निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए गणपति , सूर्य , ब्रह्मा , विष्णु , महेश , सरस्वती इत्यादि को प्रणाम करना चाहिए ।
विनायकं गुरुं भानुं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान ।
सरस्वतीं प्रणम्यादौ सर्वकार्यार्थ सिद्धये ॥
हाथ में लिए हुए अक्षत और पुष्पों को चौकी पर समर्पित कर दें ।

गणपति स्थापना अब एक सुपारी लेकर उस पर मौली लपेटकर चौकी पर थोडे से चावल रखकर सुपारी को उस पर रख दें । तदुपरान्त भगवान गणेश का आवाहन करें :
ॐ गणानां त्वा गणपति हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे निधीनां त्वा निधिपति हवामहे वसो मम ।
आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सिद्धिबुद्धिसहिताय गणपतये नमः , गणपतिमावाहयामि , स्थापयामि , पूजयामि च ।
आवाहन के पश्चात निम्नलिखित मन्त्र की सहायता से गणेशजी की प्रतिष्ठा करें और उन्हें आसन दें :
अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च ।
अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन ॥
गजाननं ! सुप्रतिष्ठिते वरदे भवेताम ॥
प्रतिष्ठापूर्वकम आसनार्थे अक्षतान समर्पयामि । गजाननाभ्यां नमः ।
पुनः अक्षत लेकर गणेशजी के दाहिनी ओर माता अम्बिका का आवाहन करें :
ॐ अम्बे अम्बिकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन ।
ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम ।
हेमाद्रितनयां देवीं वरदां शमरप्रियाम ।
लम्बोदरस्य जननीं गौरीमावाहयाम्यहम ॥
ॐ भूभुर्वःस्वः गौर्ये नमः , गौरीमावाहयामि , स्थापयामि , पूजयामि च ।
अक्षत चौकी पर छोड दें । अब पुनः अक्षत लेकर माता अम्बिका की प्रतिष्ठा करें :
अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च ।
अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन ॥
अम्बिके सुप्रतिष्ठिते वरदे भवेताम ।
प्रतिष्ठापूर्वकम आसनार्थे अक्षतान समर्पयामि गणेशाम्बिकाभ्यां नमः । ऐसा कहते हुए आसन पर अक्षत समर्पित करें ।
संकल्प उपर्युक्त प्रक्रिया के पश्चात दाहिने हाथ में अक्षत , पुष्प , दूर्वा , सुपारी , जल एवं दक्षिणा ( सिक्का ) लेकर निम्नलिखित प्रकार से संकल्प करें :
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्रि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे ... नगरे /ग्रामे /क्षेत्रे २०६७ वैक्रमाब्दे शोभननाम संवत्सरे कार्तिक मासे कृष्णपक्षे अमावस्यायां तिथौ शुक्रवासरे प्रदोषकाले /सायंकाले /रात्रिकाले स्थिरलग्ने शुभ मुहूर्ते ... गोत्र उत्पन्नः ... शर्मा /वर्मा /गुप्तः अहं श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त फलवाप्तिकामनया ज्ञाताज्ञातकायिक वाचिक मानसिक सकल पाप निवृत्तिपूर्वकं मम सर्वापच्छान्तिपूर्वक दीर्घायुष्यबल पुष्टिनैरुज्यादि सकलशुभफल प्राप्तर्थं गज तुरंग -रथराज्यैश्वर्यादि सकल सम्पदाम उत्तरोत्तराभि -वृदध्यर्थं विपुल धनधान्य -प्राप्त्यर्थे , मम सपुत्रस्य सबांधवस्य अखिलकुटुम्ब -सहितस्य समस्त भय व्याधि जरा पीडा मृत्यु परिहारेण , आयुरारोग्यैश्वर्याभि -वृद्धयर्थं परमंत्र परतंत्र परयंत्र परकृत्याप्रयोग छेदनार्थं गृहे सुखशांति प्राप्तर्थं मम जन्मकुण्डल्यां , गोचरकुण्डल्यां , दशाविंशोत्तरी कृत सर्वकुयोग निवारणार्थं मम जन्मराशेः अखिल कुटुम्बस्य वा जन्मराशेः सकाशाद्ये केचिद्विरुद्ध चतुर्थाष्टम द्वादश स्थान स्थित क्रूर ग्रहास्तैः सूचितं सूचयिष्यमाणं च यत्सर्वारिष्ट तद्विनाशाय नवम एकादश स्थान स्थित ग्रहाणां शुभफलप्राप्त्यर्थं आदित्यादि नवग्रहानुकूलता सिद्धयर्थं दैहिक दैविक भौतिक तापत्रय शमनार्थम धर्मार्थकाम मोक्ष फलवाप्त्यर्थं श्रीमहालक्ष्मीपूजनं कुबेरादीनां च पूजनं करिष्ये । तदड्रत्वेन प्रथमं गणपत्यादिपूजनं च करिष्ये । उक्त संकल्प वाक्य पढकर जलाक्षतादि गणेशजी के समीप छोड दें । इसके पश्चात गणेशजी का पूजन करें ।
गणेशाम्बिका पूजन हाथ में अक्षत लेकर निम्न मन्त्र से गणेशाम्बिका का ध्यान करें :
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम ।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपमजम ॥
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम ॥
श्रीगणेशाम्बिकाभ्यां नमः कहकर हाथ में लिए हुए अक्षतों को भगवान गणेश एवं माता गौरी को समर्पित करें ।
अब गणेशजी का पूजन निम्न प्रकार से करें :
तीन बार जल के छींटें दें और बोलें : पाद्यं , अर्घ्यं , आचमनीयं समर्पयामि ।
सर्वाड्रेस्नानं समर्पयामि । जल के छींटे दें ।
सर्वाड्रे पंचामृतस्नानं समर्पयामि । पंचामृत से स्नान कराए ।
पंचामृतस्नानान्ते सर्वाड्रे शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । शुद्ध जल से स्नान कराए ।
सुवासितम इत्रं समर्पयामि । इत्र चढाए ।
वस्त्रं समर्पयामि । वस्त्र अथवा मौली चढाए ।
यज्ञोपवीतं समर्पयामि । यज्ञोपवीत चढाए ।
आचमनीयं जलं समर्पयामि । जल के छींटे दें ।
गन्धं समर्पयामि । रोली अथवा लाल चन्दन चढाए ।
अक्षतान समर्पयामि । चावल चढाए ।
पुष्पाणि समर्पयामि । पुष्प चढाए ।
मंदारपुष्पाणि समर्पयामि । सफेद आक के फूल चढाए ।
शमीपत्राणि समर्पयामि । शमीपत्र चढाए ।
दूर्वांकुरान समर्पयामि । दूर्वा चढाए ।
सिंदूरं समर्पयामि । सिन्दूर चढाए ।
धूपम आघ्रापयामि । धूप करें ।
दीपकं दर्शयामि । दीपक दिखाए ।
नैवेद्यं समर्पयामि । प्रसाद चढाए ।
आचमनीयं जलं समर्पयामि । जल के छींटे दें ।
ताम्बूलं समर्पयामि । पान , सुपारी , इलायची आदि चढाए ।
नारिकेलफलं समर्पयामि । नारियल चढाए ।
ऋतुफलं समर्पयामि । ऋतुफल चढाए ।
दक्षिणां समर्पयामि । नकदी चढाए ।
कर्पूरनीराजनं समर्पयामि । कर्पूर से आरती करें ।
नमस्कारं समर्पयामि । नमस्कार करें ।
गणेश जी से प्रार्थना पूजन के उपरान्त हाथ जोडकर इस प्रकार पार्थना करें :
विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय ,
लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय ।
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय ,
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते ॥
भक्तार्तिनाशनपराय गणेश्वराय ,
सर्वेश्वराय शुभदाय सुरेश्वराय ।
विद्याधरायं विकटाय च वामनाय ,
भक्तप्रसन्नवरदाय नमो नमस्ते ॥
नमस्ते ब्रह्मरुपाय विष्णुरुपाय ते नमः ।
नमस्ते रुद्ररुपाय करिरुपाय ते नमः ॥
विश्वस्वरुपरुपाय नमस्ते ब्रह्मचारिणे ।
लम्बोदरं नमस्तुभ्यं सततं मोदकप्रिय ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
त्वां विघ्नशत्रुदलनेति च सुन्दरेति
भक्तप्रियेति सुखदेति फलप्रदेति ।
विद्याप्रदेत्यघहरेति च ये स्तुवन्ति
तैभ्यो गणेश वरदो भव नित्यमेव ॥
अब हाथ में पुष्प लेकर निम्नलिखित मन्त्र को उच्चारित करते हुए समस्त पूजनकर्म भगवान गणेश को अर्पित कर दें :
गणेशपूजने कर्म यन्न्यूनमधिकं कृतम ।
तेन सर्वेण सर्वात्मा प्रसन्नोऽस्तु सदा मम ॥
अनया पूजया सिद्धिबुद्धिसहितो ।
महागणपतिः प्रीयतां न मम ॥
शंख स्थापन एवं पूजन
उक्त पूजन के पश्चात चौकी पर दायीं ओर दक्षिणावर्ती शंख को थोडे से अक्षत डालकर स्थापित करना चाहिए । शंख का चन्दन अथवा रोली से पूजन करें । अक्षत चढाए तथा अन्त में पुष्प चढाए और निम्नलिखित मन्त्र की सहायता से प्रार्थना करें :
त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे ।
निर्मितः सर्वदेवैश्च पाञजन्य ! नमोऽस्तु ते ॥

तृतीय पूजा
कलश स्थापन एवं पूजन चौकी के पास ईशानकोण ( उत्तर -पूर्व ) में धान्य ( जौ -गेहु ) के ऊपर कलश स्थापित करें । अब हाथ में अक्षत एवं पुष्प लेकर कलश के ऊपर चारों वेद एवं अन्य देवी -देवताओं का निम्नलिखित मन्त्रों के द्वारा आवाहन करें :
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः ।
मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः ॥
कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा ।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः ॥
अडैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः ।
अत्र गायत्री सावित्री शान्तिः पुष्टिकरी तथा ॥
सर्वे समुद्राः सरितस्तीर्थानि जलदा नदाः ।
आयान्तु देवपूजार्थं दुरितक्षयकारकाः ॥
गडे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति ।
नर्मदे सिन्धुकावेरि जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु ॥
उक्त आवाहन के पश्चात गन्ध , अक्षत , पुष्प आदि से कलश एवं उसमें स्थापित देवों का पूजन करें । तदुपरान्त सभी देवों को नमस्कार करें ।
कलश स्थापन एवं पूजन के उपरान्त नवग्रह एवं षोडशमातृका का पूजन यदि सम्भव हो सके , तो मण्डल बनाकर करें , अन्यथा नवग्रह एवं षोडशमातृका को चौकी पर स्थान देते हुए मानसिक पूजन कर लेना चाहिए ।
नवग्रह पूजन दोनों हाथ जोडकर निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें और सूर्यादि नवग्रह देवताओं का ध्यान करें :
ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी
भूमिसुतो बुधश्च ।
गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः सर्वे ग्रहाः शान्तिकरा भवन्तु ॥
सूर्यः शौर्यमथेन्दुरुच्चपदवीं सन्मडलं मडलः
सदुद्धिं च बुधो गुरुश्च गुरुतां शुक्रः सुखं शं शनिः ।
राहुर्बाहुबलं करोतु सततं केतुः कुलस्योन्नतिं
नित्यं प्रीतिकरा भवन्तु मम ते सर्वेऽनुकूला ग्रहाः ॥
अपने हाथ में एक पुष्प लेकर उस पर कुंकुम लगाए और ‘ सूर्यादि नवग्रहदेवताभ्यो नमः ’ कहते हूए सूर्य -चन्द्रमा आदि नवग्रहों एक निमित्त सामने चौकी पर चढा दें ।
अब सूर्य आदि ग्रहों को ‘ दीपकं दर्शयामि ’ कहते हुए दीपक दिखाए और अपने हाथ धो लें । इसके पश्चात उन्हें नैवेद्य अर्पित करें । इसके पश्चात आचमन हेतु जल भी अर्पित करें ।
पंचलोकपाल पूजन दोनों हाथ जोडकर निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें और ब्रह्मादि पंचलोकपाल देवताओं का ध्यान करें :
ॐ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन आवः ।
स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च विवः ॥
अपने हाथ में एक पुष्प लेकर उस पर कुंकुम लगाए और ‘ ब्रह्मादि पंचलोकपाल देवताभ्यो नमः ’ कहते हुए ब्रह्मा आदि पंचलोकपालों के निमित्त सामने चौकी पर चढा दें ।
अब ब्रह्मा आदि पंचलोकपालों को ‘ दीपकं दर्शयामि ’ कहते हुए दीपक दिखाए और अपने हाथ धो लें । इसके पश्चात उन्हें नैवेद्य अर्पित करें । इसके पश्चात आचमन हेतु जल भी अर्पित करें ।


 
 
महालक्ष्मी पूजन
उक्त समस्त प्रक्रिया के पश्चात प्रधान पूजा में भगवती महालक्ष्मी का पूजन करना चाहिए । पूजा में अपने सम्मुख महालक्ष्मी का बडा चित्र अथवा लक्ष्मी -गणेश का पाना लगाना चाहिए । पूजन से पूर्व नवीन चित्र और श्रीयन्त्र तथा द्रव्यलक्ष्मी ( स्वर्ण अथवा चॉंदी के सिक्के ) आदि की निम्नलिखित मन्त्र से अक्षत छोडकर प्रतिष्ठा कर लेनी चाहिए :
अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च ।
अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन ॥
ध्यान
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्त्रजाम ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥
ॐ महालक्ष्मै नमः । ध्यानार्थे पुष्पं समर्पयामि ॥
ध्यान हेतु मॉं लक्ष्मी को कमल अथवा गुलाब का पुष्प अर्पित करें ।
आवाहन
ॐ तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनगामिनीम ।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्चं पुरुषानहम ॥
ॐ कमलायै नमः । कमलाम आवाहयामि , आवाहनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि ॥
मॉं लक्ष्मी का पूजन करने हेतु आवाहन करें और ऐसी भावना रखें कि मॉ लक्ष्मी साक्षात पूजन हेतु आपके सम्मुख आकर बैठी हों । आवाहन हेतु सामने चौकी पर पुष्प अर्पित करें ।
आसन
ॐ अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम ।
श्रियं देवीमुप ह्रये श्रीर्मादेवी जुषताम ॥
ॐ रमायै नमः । आसनं समर्पयामि ॥
आसनार्थे पुष्पं समर्पयामि ॥
आसन हेतु सामने चौकी पर पुष्प अर्पित करें ।
पाद्य
ॐ कां सोमिस्तां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम ।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप ह्रये श्रियम ॥
ॐ इन्दिरायै नमः । इन्दिरां पादयोः पाद्यं समर्पयामि ॥
मॉ लक्ष्मी को चन्दन आदि मिश्रित जल से पाद्य हेतु जल चढाए ।
अर्घ्य
ॐ चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम ।
तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥
ॐ समुद्रतनयायै नमः । समुद्रतनयां हस्तयोरर्घ्यं समर्पयामि ॥
मॉं लक्ष्मी को सुगन्धित जल से अर्घ्य प्रदान करें ।
आचमन एवं पंचामृत
आदि से स्नान
ॐ आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥
ॐ भृगुतनयायै नमः ॥ भृगुतनयाम आचमनीयं जलं समर्पयामि । स्नानीयं जलं समर्पयामी । पंचामृत स्नानं समर्पयामी ।
मॉं लक्ष्मी को आचमन हेतु जल चढाए एवं क्रमशः शुद्ध जल और पंचामृत से स्नान करवाए ।
वस्त्र
ॐ उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेस्मिन कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥
ॐ पद्मायै नमः ॥ पद्मां वस्त्रं समर्पयामी । उपवस्त्रं समर्पयामी ॥
मॉं लक्ष्मी को वस्त्र और उपवस्त्र चढाए ।
आभूषण
ॐ क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठालक्ष्मीं नाशयाम्यहम ।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात ॥
ॐ कीर्त्यै नमः ॥ नानाविधानि कुण्डलकटकादीनि आभूषणानि समर्पयामि ॥
मॉं लक्ष्मी को विभिन्न प्रकार के आभूषण अथवा तन्निमित्त अक्षत -पुष्प अर्पित करें ।
गन्धाक्षत , सिन्दूर एवं इत्र
ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम ।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप ह्रये श्रियम ॥
ॐ आर्द्रायै नमः । आर्द्रां गन्धं समर्पयामी ।
गन्धान्ते अक्षतान समर्पयामी ।
सिन्दूरं समर्पयामी ।
सुगन्धिद्रव्यं समर्पयामी ।
मॉं लक्ष्मी को क्रमशः गन्ध , अक्षत सिन्दूर एवं इत्र अर्पण करें ।
पुष्प एवं पुष्पमाला
ॐ मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।
पशूनां रुपमत्रस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥
ॐ अनपगामिन्यै नमः । अनपगामिनीं पुष्पमालां समर्पयामि ॥
मॉं लक्ष्मी को लाल रंग के पुष्प अर्पित करें ।
धूप
ॐ कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम ।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम ॥
ॐ महालक्ष्मै नमः । धूपम आघ्रापयामि ।
गुग्गुल आदि की सुगन्धित धूप जलाकर मॉं लक्ष्मी की ओर धूप प्रसारित करें ।
दीप
ॐ आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे ।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥
ॐ श्रियै नमः । श्रियं दीपकं दर्शयामि ॥
चार बत्तियों वाला एक दीपक प्रज्वलित करें । मॉं लक्ष्मी को यह दीपक दिखाए ।
नैवेद्य
ॐ आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिडलां पद्ममालिनीम ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥
ॐ अश्वपूर्वायै नमः । अश्वपूर्वां नैवेद्यं निवेदयामि । मध्ये पानीयम , उत्तरापोऽशनार्थं हस्तप्रक्षालनार्थं मुखप्रक्षालनार्थं च जलं समर्पयामि । ऋतुफलं समर्पयामि । आचमनीयं जलं समर्पयामि ।
मॉं लक्ष्मी को क्रमशः नैवेद्य , आचमन , ऋतुफल तथा आचमन अर्पित करें ।
ताम्बूल
ॐ आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम ।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥
ॐ गन्धद्वारायै नमः । गन्धद्वारां मुखवासार्थं ताम्बूलवीटिकां समर्पयामि ॥
मॉं लक्ष्मी को मुखशुद्धि हेतु ताम्बूल अर्पित करें ।
दक्षिणा
ॐ तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम ।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान विन्देयं पुरुषानहम ॥
ॐ हिरण्यवर्णायै नमः । हिरण्यवर्णां पूजा साफल्यार्थं दक्षिणां समर्पयामि ॥
किए गये पूजन कर्म की पूर्ण सफलता के लिए मॉं लक्ष्मी को यथाशक्ति दक्षिणा अर्पित करें ।
अंग पूजन अब निम्नलिखित मन्त्रों का पाठ करते हुए मॉं लक्ष्मी के निमित्त अंग पूजा करें । प्रत्येक मन्त्र को पढकर कुछ गन्धाक्षत -पुष्प सामने मण्डल पर चढाए ।
ॐ चपलायै नमः , पादौ पूजयामि ।
ॐ चञलायै नमः , जानुनी पूजयामि ।
ॐ कमलायै नमः , कटिं पूजयामि ।
ॐ कात्यायन्यै नमः , नाभिं पूजयामि ।
ॐ जगन्मात्रे नमः , जठरं पूजयामि ।
ॐ विश्ववल्लभायै नमः , वक्षःस्थलं पूजयामि ।
ॐ कमलवासिन्यै नमः , हस्तौ पूजयामि ।
ॐ पद्माननायै नमः , मुखं पूजयामि ।
ॐ कमलपत्राक्ष्यै नमः , नेत्रत्रयं पूजयामि ।
ॐ श्रियै नमः , शिरः पूजयामि ।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः , सर्वाडं पूजयामि ।

अष्टसिद्धि पूजन अंगपूजन के पश्चात अष्टसिद्धियों का पूजन करें । पूजन में निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुए गन्धाक्षत -पुष्प सामने मण्डल पर चढाए :
ॐ अणिम्ने नमः , ॐ महिम्ने नमः , ॐ गरिम्णे नमः , ॐ लघिम्ने नमः , ॐ प्राप्त्यै नमः , ॐ प्राकाम्यै नमः , ॐ ईशितायै नमः , ॐ वशितायै नमः ॥
अष्टलक्ष्मी पूजन
अष्टसिद्धियों के पूजन के पश्चात मॉं लक्ष्मी के अष्ट स्वरुपों का पूजन करना चाहिए । निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुए अष्टलक्ष्मियों के पूजन के लिए गन्धाक्षत -पुष्प सामने मण्डल पर चढाए :
ॐ आद्यलक्ष्म्यै नमः
ॐ विद्यालक्ष्म्यै नमः
ॐ सौभाग्यलक्ष्म्यै नमः
ॐ अमृतलक्ष्म्यै नमः
ॐ कामलक्ष्म्यै नमः
ॐ सत्यलक्ष्म्यै नमः
ॐ भोगलक्ष्म्यै नमः
ॐ योगलक्ष्म्यै नमः ।
आरती , पुष्पाज्जलि और प्रदक्षिणा
निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए जलपात्र लेकर आरती करें । आरती के पश्चात पुष्पांजलि एवं प्रदक्षिणा करें :
कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम ।
आरार्तिकमहं कुर्वे पश्य मे वरदो भव ॥
नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद्भवानि च ।
पुष्पाज्जलिर्मया दत्ता गृहाण परमेश्वरि ॥
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च ।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणा पदे पदे ।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः । प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान समर्पयामि ॥
आरती तथा समर्पण
अब घर के सभी लोग एकत्र होकर मॉं लक्ष्मी की आरती करें । आरती के लिए एक थाली में रोली से स्वस्तिक बनाए । उस पर कुछ अक्षत और पुष्प डालकर गौघृत का चतुर्मुख दीपक स्थापित करें और मॉं लक्ष्मी की शंख , घंटी , डमरु आदि के साथ आरती करें । दीपक के पश्चात क्रमशः कर्पूर , धूप , जलशंख एवं वस्त्र की सहायता से आरती करें ।
जय लक्ष्मी माता , ( मैया ) जय लक्ष्मी माता ।
तुमको निशिदिन सेवत हर विष्णु धाता ॥ ॐ ॥
उमा रमा ब्रह्माणी , तुम ही जग माता ।
सूर्य चन्द्रमा ध्यावत , नारद ऋषि गाता ॥ ॐ ॥
दुर्गा रुप निरंजिनि , सुख सम्पति दाता ।
जो कोई तुमको ध्यावत , ऋधि सिधि धन पाता ॥ ॐ ॥
तुम पाताल निवासिनी , तुम ही शुभदाता ।
कर्म प्रभाव प्रकाशिनी , भवनिधि की त्राता ॥ ॐ ॥
जिस घर तुम रहती तह सब सदुण आता ।
सब सम्भव हो जाता , मन नहिं घबराता ॥ ॐ ॥
तुम बिन यज्ञ न होते , वस्त्र न हो पाता ।
खान पान का वैभव सब तुमसे आता ॥ ॐ ॥
शुभ गुण मन्दिर सुन्दर क्षीरोदधि जाता ।
रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहीं पाता ॥ ॐ ॥
महालक्ष्मी जी की आरती , जो कोई नर गाता ।
उर आनन्द समाता , पाप उतर जाता ॥ ॐ ॥
समर्पण : निम्नलिखित का उच्चारण करते हुए महालक्ष्मी के समक्ष पूजन कर्म को समर्पित करें और इस निमित्त जल अर्पित करें : कृतेनानेन पूजनेन भगवती महालक्ष्मीदेवी प्रीयताम न मम ॥
अब मॉं लक्ष्मी के समक्ष दण्डवत प्रणाम करें तथा अनजानें में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा मॉंगते हुए , देवी से सुख -समृद्धि , आरोग्य तथा वैभव की कामना करें ।
दीपावली पर सरस्वती पूजन करने का भी विधान है । इसके लिए लक्ष्मी पूजन करने के पश्चात निम्नलिखित मन्त्रों से मॉं सरस्वती का भी पूजन करना चाहिए । सर्वप्रथम निम्नलिखित मन्त्र से मॉं सरस्वती का ध्यान करें :
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता ,
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता ,
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥
हाथ में लिए हुए अक्षतों को मॉं सरस्वती के चित्र के समक्ष चढा दें ।
अब मॉं सरस्वती का पूजन निम्नलिखित प्रकार से करें :
तीन बार जल के छींटे दें और बोलें : पाद्यं , अर्घ्यं , आचमनीयं ।
सर्वाडेस्नानं समर्पयामि । मॉं सरस्वती पर जल के छींटे दें ।
सर्वाडें पंचामृत स्नानं समर्पयामि । मॉं सरस्वती को पंचामृत से स्नान कराए ।
पंचामृतस्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि । शुद्ध जल से स्नान कराए ।
सुवासितम इत्रं समर्पयामि । मॉं सरस्वती पर इत्र चढाए ।
वस्त्रं समर्पयामि । मॉं सरस्वती पर मौली चढाए ।
आभूषणं समर्पयामि । मॉं सरस्वती पर आभूषण चढाए ।
गन्धं समर्पयामि । मॉं सरस्वती पर रोली अथवा लाल चन्दन चढाए ।
अक्षतान समर्पयामि । मॉं सरस्वती पर चावल चढाए ।
कुंकुमं समर्पयामि । मॉं सरस्वती पर कुंकुम चढाए ।
धूपम आघ्रापयामि । मॉं सरस्वती पर धूप करें ।
दीपकं दर्शयामि । मॉं सरस्वती को दीपक दिखाए ।
नैवेद्यं निवेदयामि । मॉं सरस्वती को प्रसाद चढाए ।
दीपावली पर सरस्वती पूजन आचमनं समर्पयामि । मॉं सरस्वती पर जल के छींटे दें ।
ताम्बूलं समर्पयामि । मॉं सरस्वती पर पान , सुपारी , इलायची आदि चढाए ।
ऋतुफलं समर्पयामि । मॉं सरस्वती पर ऋतुफल चढाए ।
दक्षिणां समर्पयामि । मॉं सरस्वती की कर्पूर जलाकर आरती करें ।
नमस्कारं समर्पयामि । मॉं सरस्वती को नमस्कार करें ।
सरस्वती महाभागे देवि कमललोचने ।
विद्यारुपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोऽस्तुते ।
दीपावली पर कुबेर पूजन
दीपावली एवं धनत्रयोदशी पर महालक्ष्मी के पूजन के साथ -साथ धनाध्यक्ष कुबेर का पूजन भी किया जाता है । इनके पूजन से घर में स्थायी सम्पत्ति में वृद्धि होती है और धन का अभाव दूर होता है । इनका पूजन इस प्रकार करें ।
सर्वप्रथम निम्नलिखित मन्त्र के साथ इनका आवाहन करें :
आवाहयामि देव त्वामिहायामि कृपां कुरु ।
कोशं वर्द्धय नित्यं त्वं परिरक्ष सुरेश्वर ॥
अब हाथ में अक्षत लेकर निम्नलिखित मंत्र से कुबेरजी का ध्यान करें :
मनुजवाह्यविमानवरस्थितं ,
गरुडरत्ननिभं निधिनायकम ।
शिवसखं मुकुटादिविभूषितं ,
वरगदे दधतं भज तुन्दिलम ॥
हाथ में लिए हुए अक्षतों को कुबेरयंत्र , चित्र या विग्रह के समक्ष चढा दें ।
अब कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह का पूजन निम्नलिखित प्रकार से करें :
तीन बार जल के छींटे दें और बोलें : पाद्यं , अर्घ्य , आचमनीयं समर्पयामि ।
ॐ वैश्रवणाय नमः , स्नानार्थें जलं समर्पयामि । कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर जल के छींटे दें ।
ॐ वैश्रवणाय नमः , पंचामृतस्नानार्थे पंचामृतं समर्पयामि । कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह को पंचामृत स्नान कराए ।
ॐ वैश्रवणाय नमः , सुवासितम इत्रं समर्पयामि । कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर इत्र चढाए ।
ॐ वैश्रवणाय नमः , वस्त्रं समर्पयामि । कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर मौली चढाए ।
ॐ वैश्रवणाय नमः , गन्धं समर्पयामि । कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर रोली अथवा लाल चन्दन चढाए ।
ॐ वैश्रवणाय नमः , अक्षतान समर्पयामि । कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर चावल चढाए ।
ॐ वैश्रवणाय नमः , पुष्पं समर्पयामि । कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर पुष्प चढाए ।
ॐ वैश्रवणाय नमः , धूपम आघ्रापयामि । कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर धूप करें ।
ॐ वैश्रवणाय नमः , दीपकं दर्शयामि । कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह को दीपक दिखाए ।
ॐ वैश्रवणाय नमः , नैवेद्यं समर्पयामि । कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर प्रसाद चढाए ।
आचमनं समर्पयामि । कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर जल के छींटे दें ।
ॐ वैश्रवणाय नमः , ऋतुफलं समर्पयामि । कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर ऋतुफल चढाए ।
ॐ वैश्रवणाय नमः , ताम्बूलं समर्पयामि । कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर पान , सुपारी , इलायची आदि चढाए ।
ॐ वैश्रवणाय नमः , दक्षिणां समर्पयामि । कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर नकदी चढाए ।
ॐ वैश्रवणाय नमः , कर्पूरनीराजनं समर्पयामि । कर्पूर जलाकर आरती करें ।
ॐ वैश्रवणाय नमः , नमस्कारं समर्पयामि । नमस्कार करें ।
अंत में इस मंत्र से हाथ जोडकर प्रार्थना करें :
धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च ।
भगवन त्वत्प्रसादेन धनधान्यादिसम्पदः ॥
कुबेर पूजन के साथ यदि तिजोरी की भी पूजा की जाए , तो साधक को दोगुना लाभ मिलता है ।
व्यापारीवर्ग के लिए दीपावली का दिन बही -खाता , तुला आदि के पूजन का दिवस भी होता है । सर्वप्रथम व्यापारिक प्रतिष्ठान के मुख्यद्वार के दोनों ओर दीवार पर ‘ शुभ -लाभ ’ और ‘ स्वस्तिक ’ एवं ‘ ॐ ’ सिन्दूर से अंकित करें । तदुपरान्त इन शुभ चिह्नों की रोली , पुष्प आदि से ‘ ॐ ’ देहलीविनायकाय नमः ’ कहते हुए पूजन करें । अब क्रमशः दवात , बहीखाता , तुला आदि का पूजन करना चाहिए ।
दवात पूजन : दवात को महाकाली का रुप माना गया है । सर्वप्रथम नई स्याहीयुक्त दवात को शुद्ध जल के छींटे देकर पवित्र कर लें , तदुपरान्त उसके मुख पर मौली बॉंध दे । दवात को चौकी पर थोडे से पुष्प और अक्षत डालकर स्थापित कर दें । दवात का रोली -पुष्प आदि से महाकाली के मन्त्र ‘ ॐ श्रीमहाकाल्यै नमः ’ के साथ पूजन करें । अन्त में इस प्रकार प्रार्थना करें :
कालिके ! त्वं जगन्मातर्मसिरुपेण वर्तसे ।
उत्पन्ना त्वं च लोकानां व्यवहारप्रसिद्धये ॥
लेखनी का पूजन : दीपावली के दिन नयी लेखनी अथवा पेन को शुद्ध जल से धोकर तथा उस पर मौली बॉंधकर लक्ष्मीपूजन की चौकी पर कुछ अक्षत एवं पुष्प डालकर स्थापित कर देना चाहिए । तदुपरान्त रोली पुष्प आदि से ‘ ॐ लेखनीस्थायै देव्यै नमः ’ मन्त्र बोलते हुए पूजन करें । तदुपरान्त निम्नलिखित मन्त्र से हाथ जोडकर प्रार्थना करें :
शास्त्राणां व्यवहाराणां विद्यानामाप्नुयाद्यतः ।
अतस्त्वां पूजयिष्यामि मम हस्ते स्थिरा भव ।
दीपावली पर
बहीखाता -तुला पूजन
दीपावली के दिन व्यापारी वर्ग नए बहीखातों का शुभारम्भ करते हैं । नए बहीखाते लेकर उन्हें शुद्ध जल के छींटे देकर पवित्र कर लें । तदुपरान्त उन्हें लाल वस्त्र बिछाकर तथा उस पर अक्षत एवं पुष्प डालकर स्थापित करें । तदुपरान्त प्रथम पृष्ठ पर स्वस्तिक का चिह्न चंदन अथवा रोली से बनाए ।
अब बहीखाते का रोली , पुष्प आदि से ‘ ॐ श्रीसरस्वत्यै नमः ’ मन्त्र की सहायता से पूजन करें ।
तुला का पूजन : सर्वप्रथम तुला को शुद्ध कर लेना चाहिए । तदुपरान्त उस पर रोली से स्वस्तिक का चिह्न बनाए । तुला पर मौली आदि बॉंध दें तथा ‘ ॐ तुलाधिष्ठातृदेवतायै नमः ’ कहते हुए रोली , पुष्प आदि से तुला का पूजन करें ।
 
 

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