ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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मंगलवार, 11 जुलाई 2017

"शारदा देश'' यानी ''कश्मीर'' को  ''आतंक की आग में ढकेल दिया....इन सत्ता के भूखे भेड़ियों ने''


आजादी के बाद से ही देश के ''गद्दारों'' ने जिसे ''शारदा देश'' कहा जाता था उस ''कश्मीर'' से कश्मीरी पण्डितों को खदेड़वा दिया और सेक्युलरिज्म का माला जपते -जपते तुष्टिकरण से सत्ता हथियाने के फेर में  कश्मीर को  ''आतंक की आग में ढकेल दिया....इन सत्ता के भूखे भेड़ियों ने''

अमरनाथ के यात्रियों पर हुये हमले में मारे गये शिव-भक्तों के परिजनों को टेलीविज़न पर रोते बिलखते देख हमारी धर्मपत्नी श्रीमती रम्भा चौबे ने नम आंखों और रूंधे कण्ठ से मुझसे प्रश्न किया कि - कश्मीर में केवल आतंकी ही रहते हैं क्या..? और इसके पूर्व क्या कश्मीर का इतिहास आतंक ही रहा है क्या.? सुबह जब टेलीविज़न खोलो बस एक ही समाचार आता है 'जम्मू एण्ड कश्मीर' में यहां आतंकी हमला हुआ...., वहां आतंकी हमला .हुआ... और अब तो हद हो गई अमरनाथ बाबा बर्फानी के भक्तों पर भी हमले होने लगे हैं....?     

 मित्रों, यह प्रश्न एक सामान्य भारतीय नागरीक का है, यानी 'जम्मू एण्ड कश्मीर' के असल इतिहास को कथित सेक्युलरिज्म ने ऐसा रौंदा और  तुष्टिकरण की घिनौनी राजनीति ने ऐसा नफ़रत का जहर घोला की कश्मीर आतंक का गढ बन चुका है...  

 तब मुझे आचार्य अभिनव गुप्त जी का स्मरण आया और मैंने....अपनी धर्मपत्नी श्रीमती रम्भा चौबे जी को विस्तृत व समसामयिक तथा प्रागतैहासिक 'शारदा देश'' यानी 'कश्मीर' की यात्रा कराने चल पड़ा...   कश्मीर जिसे ज्ञान-भूमि यानी  ''शारदा देश'' के नाम से जाना जाता था जो 'कन्नौज प्रांत' से 'कश्मीर' तक अमन चैन व सनातन व संस्कृति की उर्वरा भूमि रही आज उस उर्वरा भूमि को " भारतीय स्वतंत्रता के लिये आजाद, भगत, राजगुरू, सुखदेव तथा रामप्रसाद बिस्मिल सहित असंख्य नवयुवकों ने अपने प्राण की आहूति दी उनका स्मरण तो भारत के इन गद्दारों ने करना तक मुनासीब नहीं समझा और गाहे-बेगाहे इनका स्मरण किया भी तो नाम मात्र का.. क्योंकि स्वतंत्र भारत के गलियों से लेकर उच्च संस्थानों तक अधिकतर संस्थानों का  नामकरण अपने 'नाम' किया...खैर यह तो उनके 'भग्न- मानसिकता' का परिचायक है  इन 'गद्दारों' ने भारतीय इतिहास के साथ ऐसा खिलवाड़ किया की 'अकबर' को महान बताया और 'महाराणा प्रताप' के शौर्य को म्यूट कर दिया गया, 

वैसे ही अचानक ना जाने क्या हुआ की 'आजाद हिन्द फौज के संस्थापक श्री सुबाष चन्द्र बोस जी' का विमान क्रेस होने की अपुष्ट खबर आई ..जो आज भी 'राज़' बना हुआ है.??

.वैसे ही 'जम्मू एण्ड कश्मीर' का मुद्दा ऐसा विवादित किया गया की वहां आजादी के बाद अब तक असंख्य भारतीय सैनिक शहीद हुये और आज भी वह स्थिति बनी हुई है...और जब कोई 'रक्तबीज राक्षस लश्कर का आतंकी मारा जाता है तो वही देश के गद्दार नेता धर्म की राजनीति, तुष्टिकरण की राजनीति पर आमादा हो जाते हैं और मीडिया भी प्रायोजित ढंग से बड़ी कव्हरेज दिखाती है ...अरे  सत्ता के भूखे गद्दारों ने उसे 'कश्मीर ' का पवित्र ज्ञान-भूमि को...  रक्त-रंजित इतिहास के रुप में उलट-पुलट कर रखने का कुत्सित प्रयास किया..

 नफ़रत भरी कथित सेक्यूलरिज्म के पैरोकारों को घड़ियाली आंसू बहाने की बजाय .. अमरनाथ यात्रा के श्रद्धालुओं पर लश्कर आतंकी 'अबु स्माईल ' नामक 'रक्तबीज' राक्षस ने कायराना हमला किया इससे ज्यादा ध्यान उसको छुपाकर रखने वाले गद्दारों की भूमिका अहम है उनका पक्ष लेना बंद करें और  जिसकी वजह से 'अबु स्माईल' वहां तक पहुंचा ! पहले उनका सख्ती से विरोध कर उन्हे करें...!

  क्योंकि...  भारतीय सत्ता पर बने रहने की हर कोशीश करने वाले देश के गद्दारों ने कभी '' कन्नौज से कश्मीर के पवित्र ज्ञान-भूमि 'शारदा देश' के  सनातनी-इतिहास के पन्नों को पलट कर देखने की ख़ीदमत नहीं की ... क्योंकि उनके सत्ता-प्राप्ति में रोड़ा बन जाता...और भारत की वैश्विक मंच पर कश्मीर जिसे आध्यात्मिक पवित्र भूमि 'शारदा देश' कहा जाता था उसे ''आतंकी साये के प्रदेश के रुप में बदनाम किया जाना लक्ष्य था! तभी तो वहां से ज्ञान-तपस्वी, मां शारदा के वरद पुत्र कश्मीरी पण्डितो को खदेड़ा गया और आज ''मोदी सरकार के कुशल नेतृत्व पर उंगली उठा रहे हैं''

खैर, आईये कश्मीर का आध्यात्मिक पवित्र ज्ञान-भूमि के तपस्वी आचार्य अभिनव गुप्त जी चर्चा करते हैं.(ध्यानपूर्वक श्रीमती रम्भा चौबे जी सुनती हुईं गंभीर मुद्रा में) 

 ..आप श्री अभिनव गुप्त जी को वगैर समझे कश्मीर को नहीं समझ पायेंगे.......तो आईये 950 ईसा पूर्व कश्मीर के पवित्र ज्ञान-भूमि पर जन्मे महान दार्शनिक शेषावतारी श्री अभिनव गुप्त जी के जीवन चरित्र के माध्यम से आपको 'कश्मीर' की यात्रा कराता हुं.

मुझे आदरणीय श्री जवाहर लाल कौल जी के एक लेख 'श्रद्धादीप समर्पण'  लेख ने बहुत प्रभावित किया उसके कुछ अंश को उन्हीं के शब्दों में रखना चाहुंगा... भारत की ज्ञान-परंपरा में आचार्य अभिनवगुप्त एवं कश्मीर की स्थिति को एक ‘संगम-तीर्थ’ के रुपक से बताया जा सकता है। जैसे कश्मीर (शारदा देश) संपूर्ण भारत का ‘सर्वज्ञ पीठ’ है, वैसे ही आचार्य अभिनव गुप्त संपूर्ण भारतवर्ष की सभी ज्ञान-विधाओं एवं साधनों की परंपराओं के सर्वोपरि समादृत आचार्य हैं। कश्मीर केवल शैवदर्शन की ही नहीं, अपितु बौद्ध, मीमांसक, नैयायिक, सिद्ध, तांत्रिक, सूफी आदि परंपराओं का भी संगम रहा है। आचार्य अभिनवगुप्त भी अद्वैत आगम एवं प्रत्यभिज्ञा –दर्शन के प्रतिनिधि आचार्य तो हैं ही, साथ ही उनमें एक से अधिक ज्ञान-विधाओं का भी समाहार है। भारतीय ज्ञान दर्शन में यदि कहीं कोई ग्रंथि है, कोई पूर्व पक्ष और सिद्धांत पक्ष का निष्कर्ष विहीन वाद चला आ रहा है और यदि किसी ऐसे विषय पर आचार्य अभिनवगुप्त ने अपना मत प्रस्तुत किया हो तो वह ‘वाद’ स्वीकार करने योग्य निर्णय को प्राप्त कर लेता है। उदाहरण के लिए साहित्य में उनकी भरतमुनिकृत रस-सूत्र की व्याख्या देखी जा सकती है जिसे ‘अभिव्यक्तिवाद’ के नाम से जाना जाता है। भारतीय ज्ञान एवं साधना की अनेक धाराएं अभिनवगुप्तपादाचार्य के विराट् व्यक्तित्व में आ मिलती है और एक सशक्त धारा के रुप में आगे चल पड़ती है।

       आचार्य अभिनवगुप्त के पूर्वज अत्रिगुप्त (8वीं शताब्दी) कन्नौज प्रांत के निवासी थे। यह समय राजा यशोवर्मन का था। अभिनवगुप्त कई शास्त्रों के विद्वान थे और शैवशासन पर उनका विशेष अधिकार था। कश्मीर नरेश ललितादित्य ने 740 ई. जब कान्यकुब्ज प्रदेश को जीतकर काश्मीर के अंतर्गत मिला लिया तो उन्होंने अत्रिगुप्त से कश्मीर में चलकर निवास की प्रार्थना की। वितस्ता (झेलम) के तट पर भगवान शितांशुमौलि (शिव) के मंदिर के सम्मुख एक विशाल भवन अत्रिगुप्त के लिये निर्मित कराया गया। इसी यशस्वी कुल में अभिनवगुप्त का जन्म लगभग 200 वर्ष बाद (950 ई.) हुआ। उनके पिता का नाम नरसिंहगुप्त तथा माता का नाम विमला था।

     भगवान् पतञ्जलि की तरह आचार्य अभिनवगुप्त भी शेषावतार कहे जाते हैं। शेषनाग ज्ञान-संस्कृति के रक्षक हैं। अभिनवगुप्त के टीकाकार आचार्य जयरथ ने उन्हें ‘योगिनीभू’ कहा है। इस रुप में तो वे स्वयं ही शिव के अवतार के रुप में प्रतिष्ठित हैं। आचार्य अभिनवगुप्त के ज्ञान की प्रामाणिकता इस संदर्भ में है कि उन्होंने अपने काल के मूर्धन्य आचार्यों-गुरूओं से ज्ञान की कई विधाओं में शिक्षा-दीक्षा ली थी। उनके पितृवर श्री नरसिंहगुप्त उनके व्याकरण के गुरू थे। इसी प्रकार लक्ष्मणगुप्त प्रत्यभिज्ञाशास्त्र के तथा शंभुनाथ (जालंधर पीठ) उनके कौल-संप्रदाय –साधना के गुरू थे। उन्होंने अपने ग्रंथों में अपने नौ गुरूओं का सादर उल्लेख किया है। भारतवर्ष के किसी एक आचार्य में विविध ज्ञान विधाओं का समाहार मिलना दुर्लभ है। यही स्थिति शारदा क्षेत्र काश्मीर की भी है। इस अकेले क्षेत्र से जितने आचार्य हुए हैं उतने देश के किसी अन्य क्षेत्र से नहीं हुए| जैसी गौरवशाली आचार्य अभिनवगुप्त की गुरु परम्परा रही है वैसी ही उनकी शिष्य परंपरा भी है| उनके प्रमुख शिष्यों में क्षेमराज , क्षेमेन्द्र एवं मधुराजयोगी हैं| यही परंपरा सुभटदत्त (12वीं शताब्ती) जयरथ, शोभाकर-गुप्त महेश्वरानन्द (12वीं शताब्दी), भास्कर कंठ (18वीं शताब्दी) प्रभृति आचार्यों से होती हुई स्वामी लक्ष्मण जू तक आती है |

      दुर्भाग्यवश यह विशद एवं अमूल्य ज्ञान राशि इतिहास के घटनाक्रमों में धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई | यह केवल कश्मीर के घटनाक्रमों के कारण नहीं हुआ | चौदहवीं शताब्दी के अद्वैत वेदान्त के आचार्य सायण -माधव (माधवाचार्य) ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ 'सर्वदर्शन सङ्ग्रह' में सोलह दार्शनिक परम्पराओं का विनिवेचन शांकर-वेदांत की दृष्टि से किया है| आधुनिक विश्वविद्यालयी पद्धति केवल षड्दर्शन तक ही भारतीय दर्शन का विस्तार मानती है और इन्हे ही आस्तिक दर्शन और नास्तिक दर्शन के द्वन्द्व-युद्ध के रूप में प्रस्तुत करती है|आगमोक्त दार्शनिक परम्पराएँ जिनमें शैव, शाक्त, पंचरात्र आदि हैं, वे कही विस्मृत होते चले गए| आज कश्मीर में कुछ एक कश्मीरी  पंडित परिवारों को छोड़ दें, तो अभिनवगुप्त के नाम से भी लोग अपरिचित हैं| भारत को छोड़ पूरे विश्व में अभिनवगुप्त और काश्मीर दर्शन का अध्यापन आधुनिक काल में होता रहा है लेकिन कश्मीर विश्वविद्यालय में, उनके अपने वास-स्थान में उनकी अपनी उपलब्धियों को संजोनेवाला कोई नहीं है। काश्मीरी आचार्यों के अवदान के बिना भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन अपूर्ण और भ्रामक सिद्ध होगा। ऐसे कश्मीर और उनकी ज्ञान परंपरा के प्रति अज्ञान और उदासीनता कहीं से भी श्रेयस्कर नहीं है।...

 आज कश्मीर को उसकी असल 'कश्मीरी़यत की पूर्व संस्कृति पर छोड़कर वहां से धारा ३७० हटा लिया जाय और कश्मीरी पण्डितों को घर-वापसी करा दिया जाय तो'' तो पुन: कश्मीर 'शारदा देश' हो जायेगा और वह ' आध्यात्मिक पवित्र ज्ञान-भूमि की उन्नत सनातन संस्कृति की कृषि भूमि बन जायेगी'

-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक 'ज्योतिष का सूर्य' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, शांतिनगर, भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ)

दूरभाष क्रमांक -09827198828

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