ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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शनिवार, 2 जून 2018


3/6/2018

रविवारीय मंगल प्रभात 🚩🌺🚩 साथियों नमस्कार 🙏 आज 'चौबेजी कहिन' में चर्चा करुंगा 'नचिकेता का रोचक प्रसंग' । जिसे आज 'मस्ट इन्क्लूड इन संडे-स्टडी' में शामिल करें !  कठोपनिषद में 'मृत्यु' को 'आचार्य' कहा गया है, वहीं तैत्तिरीय उपनिषद् में मृत्यु को 'अतिथि' कहा गया है। आपने देखा होगा जब भी आपके घर में कोई अनुष्ठान यज्ञ होता है उसमे यज्ञाचार्य द्वारा चावल के चार अलग-अलग रंगों मे रंगा हुआ चावल के 'अक्षतपुंजो' से  'सर्वतोभद्र मंडल' का निर्माण किया जाता है शायद आपको पता नहीं की उस 'सर्वतोभद्र मंडल' में 'मृत्यु' का देवता के रूप में हर शुभ/मांगलिक कार्यों में पूजन किया जाता है, ऐसा क्यों ? तो आईए इस रहस्य को समझने का प्रयास करें ! सर्वप्रथम हमें 'नचिकेता’ को समझना होगा । इसके लिए हमें कठोपनिषद में प्रवेश करें 🙏



ॐ अशन् ह वै वाजश्रवस: सर्ववेदसं ददौ।
तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥१॥क.व.१!!

 वाजश्रवस्(उद्दालक) ने यज्ञ के फल की कामना रकते हुए (विश्वजित यज्ञ में) अपना सब धन दान दे दिया। उद्दालक का नचिकेता नाम से ख्यात एक पुत्र था।

तं ह कुमारं सन्तं दक्षिणासु नीयमानसु श्रद्धा आविवेश सोऽमन्यत ॥२॥ 

जिस समय दक्षिणा के लिए गौओं को ले जाया जा रहा था, तब छोटा बालक होते हुए भी उस नचिकेता में श्रद्धाभाव (ज्ञान-चेतना, सात्त्विक-भाव) उत्पन्न हो गया तथा उसने चिन्तन-मनन प्रारंभ कर दिया। 

'चौबेजी कहिन'के प्रिय पाठकों, हमें मनुष्य योनि बड़े सौभाग्य से प्राप्त हुआ है 'बडे भाग मानुष तन पावा'। हमें प्रकृति ने मनुष्य को चिन्तन मनन की शक्ति दी है, पशु को नहीं। मनन करने से ही वह मनुष्य होता है, अन्यथा मानव की आकृति में वह पशु ही होता है। चिन्तन के द्वारा ही मनुष्य ने ज्ञान-विज्ञान में प्रगति की है तथा चिन्तन के द्वारा ही मनुष्य उचित-अनुचित धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप आदि का निर्णय करता है। चिन्तन के द्वारा ही विवेक उत्पन्न होता है तथा वह स्मृति कल्पना आदि का सदुपयोग कर सकता है। चिन्तन को स्वस्थ दिशा देना श्रेष्ठ पुरुष का लक्षण होता है। एक ऐसे ही ऋषि-पुत्र 'नचिकेता' का उपाख्यान है! 

वैदक-साहित्य में आचार्य को 'मृत्यु' के महत्त्वपूर्ण पद से अलंकृत किया गया है।'आचार्यो मृत्यु:।'आचार्य मानो माता की भांति तीन दिन और तीन रात गर्भ में रखकर नवीन जन्म देता है। 'नचिकेता' का अर्थ 'न जाननेवाला, जिज्ञासु' है तथा यमराज 'यमाचार्य' है, मृत्यु के सदृश आंखे खोलनेवाले गुरु भी हैंं जिनका हम हर यज्ञ/मांगलिक कार्यों में पूजन व आराधना करते हैं!



अतिथिदेवो भव (तै० उप० १.११.२)
जहां नचिकेता को यमराज तीन वरदान देता है। कठोपनिषद् के उपाख्यान तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण के उपाख्यान में पर्याप्त समानता है। तैत्तिरीय ब्राह्मण के उपाख्यान में यमराज मृत्यु पर विजय के लिए कुछ यज्ञादि का उपाय कहता है, किन्तु कठोपनिषद् कर्मकाण्ड से ऊपर उठकर ब्रह्मज्ञान की महत्ता को प्रतिष्ठित करता है। उपनिषदों में कर्मकाण्ड को ज्ञान की अपेक्षा अत्यन्त निकृष्ट कहा गया है।
यद्यपि यम-नचिकेता-संवाद ऋग्वेद तथा तै० ब्राह्मण में भी एक कल्पित उपाख्यान के रुप में ही है, कठोपनिषद् के ऋषि ने इसे एक आलंकारिक शैली में प्रस्तुत करके इस काव्यात्मक सौंदर्य का रोचक पुट दे दिया है। कठोपनिषद् जैसे श्रेष्ठ ज्ञान-ग्रन्थ का समारंभ रोचक, हृदयग्राही एवं सुन्दर होना उसके अनुरुप् ही है। मृत्यु के यथार्थ को समझाने के लिए साक्षात् मृत्यु के देवता यमराज को यमाचार्य के रुप में प्रस्तुत करना कठोपनिषद् के प्रणेता का अनुपम नाटकीय कौशल है। यह कल्पनाशक्ति के प्रयाग का भव्य स्वरुप् है।


🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 सनातनधर्म की जय!! जय श्रीराम !! जयतु भारतीय संस्कृति!! वंदेमातरम्!! 🚩🌹🚩🌹🌺🌹🌺🌼

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