ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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गुरुवार, 14 जून 2018

चौबेजी कहिन:- राजा दशरथ रुपी 'जीव' को 'आत्म साक्षात्कार' करना चाहिए 'आत्महत्या' नहीं, निष्ठा और नैमेत्तिक 'आत्ममंथन' करना चाहिए 'आत्महत्या' नहीं, पढ़े-लिखे लोग ही अधिकांश आत्महत्याएं कर रहे हैं, कारण क्या है??

मित्रों नमस्कार 🙏 आज 'चौबेजी कहिन' में आत्महत्या विषय पर चर्चा करुंगा, आज सर्वहारा समाज में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति, चिन्ताजनक है यह जिस परिवार में होता है उस परिवार की सभी ख्वाहिशें शीशे की तरह चकनाचूर हो जाती हैं! छात्र-छात्राओं, बड़े-बूढे, अवसाद ग्रस्त बड़े ओहदे पर बैठे बड़े अधिकारी सहित अब तो इन्दौर के कथित आध्यात्मिक गुरु भैय्युजी महाराज ने भी आत्महत्या कर हम सबको चौंका दिया ! साथियों आत्महत्या करने के कई कारण हो सकते हैं, परन्तु आजतक जो हमने अनुभव किया है,जिन कारणों से वह व्यक्ति या महिला आत्महत्या करती है, आत्महत्या के बाद कभी उन समस्याओं का हल तो नहीं होता वरन् समस्याएं बढ़ती ही है, मुझे लगता है कि-आत्महत्या करने वाला व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों के प्रति गद्दार होता है, कायर होते हैं, फेमिली-मैनेजमेंट में विफल होते हैं या अपने अपराध को छुपाने के लिए 'अात्महत्या' जैसा महाअपराध कर बैठते हैं, क्योंकि ये अधिकतर आत्महत्या करने वाले पढ़े-लिखे लोग होते हैं ! जरा इन आंकड़ों पर ध्यान दें..

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014 में 1,31,666 लोगों ने आत्महत्या की। आत्महत्या करने वालों में 80% लोग साक्षर थे, जो देश की राष्ट्रीय साक्षरता दर 74% से अधिक है। 2015,2016,2017 में यह दर बढ़ती ही जा रही है! आपने अनुभव किया होगा कि अधिकांश धर्मपरिवर्तन भी पढ़े-लिखे लोग ही करते हैं, एकाध को छोड़ दें तो कानून के जानकार ही कानून का उलंघन करते हैं, उसी प्रकार क्षणिक आवेश में और क्षणभंगुर मान-सम्मान में अंधे लोगों द्वारा ही हिंसा की जाती है, ठीक उसी तरह अधिकांश आत्महत्याएं पढ़े-लिखे लोग ही करते हैं! यह जानते हुए कि- आत्महत्या करने के बाद 'अंधतमिस्त्र' नामक पीड़ादायक घोर नरक में 60 हजार वर्षों तक यम-यातनाएं सहनी पड़ती है, जैसा कि पराशर संहिता और गरुड़ पुराण में कहा गया है!  मैंने भिलाई में भी इसी प्रकार की परिवारों को उजड़ते देखा है आखिर ऐसा क्यों? यह स्थिति केवल भारत की नहीं वरन् भारतेतर देशों में भी 'आत्महत्या एक अभिशाप' बन चुका है कुछ प्रमाण प्रस्तुत कर रहा हूं आपको यह जानकर आश्चर्य होगा ! यूनान के महान दार्शनिक डायोजनीज़ अपने हाथों फाँसी लगा कर मरे थे। और हिटलर का नाम तो आपने सुना ही होगा वह अपनी पिस्तौल से गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी। अब आईए साहित्यकारों पर एक नज़र डालते हैं- ‘मृच्छकटिकम्’ के लेखक शूद्रक आग में जल मरे थे। ‘जानकी हरण’ महाकाव्य के रचनाकार सिंहल देश के राजा की मृत्यु का शोक न सह सके और और चिंता में जल मरे। चीनी साहित्यकार लाओत्से ने भी अपनी मौत स्वयं बुलायी थी। लैटिन कवि एम्पेदोक्लीज ने ज्वालामुखी में कूदकर आत्मघात किया था। इसी तरह 'सेल्फीयाना के शौकीन' सेल्फी पोज के चक्कर में कई सनकी बच्चे जानबूझकर मर जाते हैं उसे भी 'आत्महत्या' ही कहा जाता है, एक महासनकी 'लुकेषियस' ने अपने को चिरस्मरणीय बनाने के लिए ऐसा किया था। महाकवि चैटरसन ने दरिद्रता से पीछा छुड़ाने के लिए विषपान कर लिया था। गोर्की ने पेट में पिस्तौल चल कर उसने विदीर्ण कर डाला। आस्ट्रेलियाई साहित्यकार स्टीफेन ज्विग अपने आत्मघात का कारण बताते हुए भैय्युजी महाराज जैसे ही स्टीफेन ज्विग ने एक सुसाइड नोट छोड़ गया था जिसमें लिखा था “अब संघर्षों से टकराने की मेरी शक्ति चुक गई है। अशक्त जीवन का अन्त कर लेना मुझे अधिक अच्छा जँचा।” अर्थात् यह आत्महत्या की वजह अवसाद है जिसका कारण है नकली योगी, नकली ज्ञानीराम बनना है, हमें यदि इससे बचना है तो असली आध्यात्मिकता की ओर जाना होगा ! सर्वप्रथम मैं बड़ी जिम्मेदारी से कह सकता हूं कि गुरु, संत, यती और योगी कभी आत्महत्या नहीं कर सकता! मैंने स्वामी विवेकानंद जी के जीवन चरित्र को पढा वह बेहद कठिनाइयों भरा बाल्यकाल व्यतीत किए और विश्व के 'स्वामी विवेकानंद' बनकर आध्यात्मिक ज्ञान दिया, उसी प्रकार श्री विनायक दामोदर सावरकर जी की जीवनी पढ़ी विषम से विषम परिस्थितियों में भी वह 'स्वातंत्र्य वीर सावरकर' की उपाधि लेना स्वीकार किये ना की 'आत्महत्या' !  अवसाद ग्रस्त लोगों को ऐसे ऐसे कई विराट व्यक्तित्व हमारे भारतीय इतिहास के पन्नों में भरे पड़े हैं उनके जीवन चरित्र को हमें स्वयं और बच्चों को पढ़ाया जाना चाहिए ताकि वह कठिन परिस्थितियों में और मजबूत होकर उभरें ! अब आईए आपको एक गार्हस्थ्य 'योगी' राजा दशरथ के बारे में कुछ बताना चाहूंगा क्योंकि काल परिस्थिति वश कुछ लोगों को दो विवाह करने पड़ते हैं, और पारिवारिक कलह भी झेलने पड़ते हैं जिसका दुष्परिणाम भैय्युजी जैसी शख्सियत को आत्महत्या करके भुगतनी पड़ती है, मैं आज 'चौबेजी कहिन' में तीन पत्नियों के पति दशरथ जी के संदर्भ को रखना चाहता हूं! राजा दशरथ रुपी हम सामान्य 'जीव' की कहानी है उन्होंने देवासुर संग्राम में देवताओं की ओर से युद्ध करके देवताओं को विजयश्री प्राप्त कराया, लेकिन कैकेई के समक्ष हार गए लेकिन वह 'गृहस्थ योगी दशरथ' कभी नहीं हारा, आईए उस 'योगी' के योग की चर्चा करें!

योग का पथ कठिन साधना-पथ है. थोड़ी सी असावधानी भी साधक को उसके स्थान से, उसके प्राप्य और प्राप्ति से, भटका सकता है. उसके जीवन में उथल-पुथल मचा सकता है. त्रिगुणरुपी रानियों कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी के प्रति भाव असंतुलन राजा दशरथ को 'शासक दशरथ' के स्थान से च्युतकर 'शासित दशरथ' बना देता है। फलतः अब वृत्तियों द्वारा 'शासित दशरथ' की अभिलाषाएं, आकांक्षाये अधूरी रहतीं है, परिस्थितियाँ विपरीत हो जातीं हैं; शोक - पश्चाताप - दु:ख - अतिशय दु:ख, और अन्त में कष्टदायी मृत्यु. योगपथ में शिथिलता और सहस्रार तक की यात्रा पूरी न कर पाने के कारण 'तत्त्व साक्षात्कार' से भी वंचित होना पड़ता है, और वह 'काल को गले लगा कर पंखे पर झूल जाता है' जो 'आध्यात्मिक योगपथ पर स्वार्थांधता भरी काई से फिसल जाता है, अत: हर दशरथ रुपी 'जीव' को बड़ा ही साफगोई से 'आत्म साक्षात्कार' करना चाहिए आत्महत्या नहीं, आत्ममंथन करना चाहिए आत्महत्या नहीं!


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