ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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गुरुवार, 22 जून 2017

वेद और वैदिक वांङमय का संक्षिप्त परिचय अवश्य पढें.....

वेद और वैदिक वांङमय का संक्षिप्त परिचय अवश्य पढें.....

"अन्तर्नाद" व्हाट्सएप ग्रुप के साथियों आज हम युग ऋषि वरेण्य श्रीराम शर्मा आचार्य जी के उद्धरणों को आपके समक्ष रखना चाहता हुं......सम्भवत: आप लोगों को रुचिकर अवश्य लगेगा..........
  ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद का पूर्व मों एक ही स्वरुप था 'वेद' यानी
ऋग्वेद ही आर्षवेद है! ऋक् जिसका अर्थ है-प्रार्थना अथवा स्तुति, यजुः का तात्पर्य है यज्ञ-यज्ञादि का विधान, साम-शान्ति अथवा मंगल स्थापित करने वाला गान है और अथर्व में धर्म दर्शन के अतिरिक्त लोक-जीवन के सामान्यक्रम में काम आने वाली ढेरों-उपयोगी सामग्री भरी पड़ी है।

भाष्यकार महीधर के अनुसार-प्रत्येक ‘वेद’ से जो वांग्मय विकसित हुआ, अध्ययन की सुविधा के लिए उसे पुनः चार भागों में वर्गीकृत किया गया (1) संहिता (2) ब्राह्मण (3) आरण्यक और (4) उपनिषद्। संहिता में वैदिक स्तुतियाँ संग्रहित हैं। ब्राह्मण में मंत्रों की व्याख्या और उनके समर्थन में प्रवचन दिए हुए हैं, आरण्यक में वानप्रस्थियों के लिए उपयोगी आरण्यगान और विधि-विधान है। उपनिषदों में दार्शनिक व्याख्याओं का प्रस्तुतीकरण है। कालक्रम के प्रवाह में इस वर्गीकरण का लोप हो जाने के कारण इनमें से प्रत्येक को स्वतन्त्र मान लिया गया और आज स्थिति यह है कि ‘वेद’ शब्द सिर्फ संहिता के अर्थों में प्रयुक्त होता है।

जबकि वर्गीकरण-का तात्पर्य अस्तित्व का बिखराव नहीं उसका सुव्यवस्थित उपयोग है। जिसके क्रम में वैदिक अध्ययन कई शाखाओं में विकसित हुआ। ऋग्वेद की पाँच शाखाएँ थीं शाकल वाष्कल, आश्वलायन, शाँखायन और माँडूक्य। इनमें अब शाकल शाखा ही उपलब्ध है। शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन और कात्य दो शाखाएँ। कृष्ण यजुर्वे की उपलब्ध शाखाएँ इस समय चार हैं तैत्तिरीय, मैत्रायणी, काठक, और कठ। सामवेद की दो शाखाएँ हैं कौथुमी और राणायनीय। अथर्ववेद की उपलब्ध शाखाओं के नाम पैप्पलाद तथा शोनक हैं।

संहिताओं के विवेचन क्रम में अध्ययन करने पर ऋग्वेद संहिता में दस मंडलों का पता लगता है। जिनमें 85 अनुवाद और अनुवाक समूह में 1028 सूक्त हैं। सूक्तों के बहुत से भेद किए गए हैं यथा-महासूक्त क्षुद्र, सूक्त, ऋषिसूक्त, छन्दसूक्त, और देवतासूक्त। वेदज्ञ मनीषियों के अनुसार ऋग्वेद के मंत्रों की संख्या 10,402 से 10,628 तक है। यजुर्वेद के दो भाग है-शुक्ल और कृष्ण इनमें कृष्ण यजुर्वेद संहिता को तैत्तिरीय संहिता भी कहते हैं।

मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार इसको 109 शाखाएँ थीं, जिनमें मात्र 12 शाखाएँ और 14 उपशाखाएँ ही उपलब्ध हैं। इस संहिता में कुल सात अष्टक हैं 700 अनुवादों वाले इस ग्रन्थ में अश्वमेध, अग्निहोम, राजसूय अतिरात्र आदि यज्ञों का वर्ण है। इसमें 18000 मंत्र मिलते हैं। शुक्ल यजुर्वेद की संहिता के माध्यन्दिनी भी कहते हैं। इसमें 40 अध्याय 290 अनुवाक और अनेक काण्ड हैं। यहाँ दर्शपौर्णभास, वाजपेय आदि यज्ञों का वर्णन है।

सामवेद के पूर्व और उत्तर दो भाग हैं। पूर्व संहिता को छन्द, आर्चिक और सप्त साम नामों से भी अभिहित किया गया है। इसके छः प्रपाठक हैं। सामवेद की उत्तर संहिता को उत्तरार्धिक या आरण्यगान भी कहा गया है। अथर्ववेद की मंत्र संख्या 12,300 हैं। जिसका अति न्यून अंश आजकल प्राप्त है। इसकी नौ शाखाएँ पैप्पल, दान्त, प्रदान्त स्नात, रौत, ब्रह्मदत्त शौनक, दैवीदर्शनी और चरण विद्या में से केवल शौनक शाखा ही आज रह पाई है। इसमें 20 काण्ड हैं।

संहिताओं के पश्चात ब्राह्मणों का स्थान आता है । इनके विषय को चार भागों में बाँटा गया है। विधिश्माग, अर्थवादभाग, उपनिषदभाग और आख्यानभाग। विधिभाग में यज्ञों के विधान का वर्णन है। इसमें अर्थमीमाँसा और शब्दों की निष्पत्ति भी बतायी गयी है। अर्थवाद में यज्ञों में महात्म्य को समझाने के लिए प्ररोचनात्मक विषयों का वर्णन है। ब्राह्मणों के उपनिषद् भाग में ब्राह्मण के विषय में विचार किया गया है। आख्यान भाग में प्राचीन ऋषिवंशों, आचार्य वंशों और राजवंशों की कथाएँ वर्णित हैं।

प्रत्येक वैदिक संहिता के अलग-अलग ब्राह्मण ग्रन्थ हैं। ऋग्वेद के दो ब्राह्मण हैं ऐतरेय और कौषीतकि। यजुर्वेद के भी दो ब्राह्मण है कृष्ण यजुर्वेद का तैत्तिरीय ब्राह्मण और शुक्ल यजुर्वेद का शतपथ ब्राह्मण। सामवेद की कौथुमीय शाखा के ब्राह्मण ग्रन्थ चालीस अध्यायों में विभक्त हैं। इसकी जैमिनीय शाखा के दो ब्राह्मण ग्रन्थ हैं जैमिनीय ब्राह्मण और जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण। इन्हें क्रमशः आर्षेय और छान्दोग्य ब्राह्मण भी कहते हैं। अथर्ववेद की भी शाखाएँ हैं किन्तु एक ही ब्राह्मण उपलब्ध है गोपथब्राह्मण।

आरण्यकों की विषय वस्तु सायणाचार्य के शब्दों में लोकसेवी वानप्रस्थों की प्रशिक्षण सामग्री है। मुख्य आरण्यक ग्रन्थों के क्रम में ऋग्वेद में ऐतरेय और कौषीतकि आरण्यक मिलते हैं। यजुर्वेद में कृष्ण यजुर्वेद का एक आरण्यक है तैत्तिरीय आरण्यक। जिसके दस काण्डों में आरणीय विधि का प्रतिपादन हुआ है बृहदारण्यशुक्ल यजुर्वेद का है। सामवेद में सिर्फ छान्दोग्य आरण्यक मिलता है। जो छः प्रपाठकों में विभाजित है।

‘वेद’ का चरमोत्कर्ष उपनिषदों में मिलता है। अन्तिम भाग होने के कारण इसे ‘वेदान्त’ की संज्ञा भी प्राप्त है। उपनिषदों ने ही स्वयं इस शब्द की व्याख्या सूचित की है “यदा वै बली भवति अथ उत्थाता भवति, उत्तिष्ठन परिचरिता भवति, परिचरन, उपसत्ता भवति, उपसीदन द्रष्ट भवति, श्रोता भवति, मन्ता भवति, बोद्धा भवति, कर्ता भवति, विज्ञाता भवति (छान्दोग्य 7/8/1) जब मनुष्य बलवान होता है तब वह उठकर खड़ा होता है। उठकर खड़ा होने पर गुरु की सेवा करता है। फिर वह गुरु के पास (उप) जाकर बैठता है। (सद) पास जाकर बैठने पर वह गुरु का जीवन ध्यान से देखता है। उसका व्याख्यान सुनता है उसे मनन करता है, समझ लेता है और उसके अनुसार आचरण करता है। उसमें उसे विज्ञान यानि अपरोक्ष अनुभूति का लाभ होता है ‘उप’ ‘नि’ ये दो उपसर्ग और ‘सद’ धातु से बने इस शब्द की इस व्याख्या में ‘नि’ अर्थात् निष्ठ से की व्याख्या छूट गई है जिसका उल्लेख एक दूसरी जगह हुआ है। “ब्रह्मचारी आचार्यकुलवासी अत्यन्तम् आत्मानम् आचार्यकुले अवसादयन्” (छान्दोग्य 2/23/1) ब्रह्मचर्यपूर्वक गुरु के पास रहकर (उप) गुरु सेवा में अपने आपको विशेष रूप से (नि) खपाने वाला (सद) जो रहस्यभूत विद्या प्राप्त करता है वह है उपनिषद् ।

इन दोनों पर्यायों के इकट्ठा करके देखें तो (1) आत्मबल (2) उत्थान (3) ब्रह्मचर्य (4) गुरु सेवा में शरीर को खपा देना (5) गुरु (हृदय) सान्निध्य (6) जीवन निरीक्षण (7) श्रवण (8) मनन (9) अवबोधन (10) आचरण (11) अनुभूति-इतना सारा भाव-इस छोटे शब्द में निहित है। इनकी संख्या कितनी है? इस संदर्भ में भिन्न-भिन्न स्थानों पर अलग-अलग विवरण प्राप्त होते हैं। मुक्तिकोपनिषद् में 108 उपनिषदों की सूची है। उपनिषद्वाक्य महाकोश में 223 उपनिषद् ग्रन्थों को नामोल्लेख हुआ है। इनकी वेदों से अभिन्नता और प्राचीनता को दृष्टि में रखकर विचार करें 108 उपनिषदों की सूची ही सार्थक लगती है। अन्य के सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है कि मध्ययुग में विभिन्न सम्प्रदायों ने अपनी प्राचीनता सिद्ध करने के लिए इनकी रचना की गई इन 108 उपनिषदों में भी अपनी विशेष गहनता के कारण ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, बृहदारण्यक और श्वेताश्वेतर कुछ अधिक ही महत्वपूर्ण हैं।
-''ज्योतिष का सूर्य '' राष्ट्रीय
मासिक पत्रिका, भिलाई

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