ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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रविवार, 27 नवंबर 2011

तानाशाह शासक के चक्रव्यूह में किरण बेदी

तानाशाह शासक के चक्रव्यूह में किरण बेदी
 मित्रों आज मुझे बहुत कष्ट तब हुआ जब सुबह अखबार के पन्नों में किरण बेदी के उपर एफआईआर जर्ज की बात लगभग सभी समाचार पत्रों का प्रमुख समाचार था। मेरी भी निगाह उस हेड लाईन पर गयी मैने पढ़ा भी लेकिन आज के इस छद्म राजनीतिक परीवेश को कोशा भी की आज देश कहां जा रहा है सरकार के नीतियों के खिलाफ जो भी आवाज उठायेगा उसको कुचल दिया जायेगा यही नारा बुलंद करने वाली यू.पी.ए.-2 का शासन काल साबित करने जा रहा है , केवल यही नहीं बल्कि मुश्लिम राष्ट्रों में अक्सर देखे जाने वाला तानशाही शासन अपने भारत के इतिहास में इस सरकार द्वारा तब किया गया जब 4 जून 2011 को रामलीला मैदान में आधी रात को बाबा रामदेव के समर्थकों एवं स्वयं बाबा रामदेव को पुलिस वालों नें इस तरह खदेड़ा जैसे कोई बहुत बड़े अपराधी को देश से निकाला गया हो अथवा उस पर सैन्य कार्वाही किया गया हो। ठिक उसी तरह अन्ना हजारे को भी उसी तिहाड़ में भेजा गया ए राजा कलमाड़ी थे।
तो मित्रों क्या यह सरकार की तानाशाही रवैया नहीं वहीं  दुसरी तरफ  यही सरकार सेक्स से सियासती खेल खेलने वाले मंत्री मदेरणा राजस्थान के भंवरी के भंवर में फंसे महिपाल को बचाने का पुरजोर मेहनत कर रही है . और जो केवल भ्रष्टाचार की खिलाफ आवाज उठाने वाली टीम अन्ना की अहम सदस्या किरण बेदी का कुशुर बस इतना ही है , आप लोग ये बताईये की देश में कौन सा ऐसा एन जी ओ. है जो सही काम करता है और तो और सरकार के नुमाइंदे उसी एनजीओ को काम देती है जिससे उनको कमीशन मिल सके ऐसे में यदि किरण बेदी ने घपला कर ही लिया तो राजा के तो ठीक ही है..
 मानव मात्र को कष्ट देना, उसे अपमानित और प्रताड़ित करने का विचार ईश्वरीय सृजन के विरूद्ध है, इसीलिए सच्चा संत या ईश्वर भक्त इसे कभी स्वीकार नहीं करता । वास्तविकता तो यही है कि संसार को ईश्वरभक्ति से शून्य अहंवादी, प्रमादी लोगों ने ही बार-बार हिंसा और रक्तपात की ओर धकेला है।

शायद यही कारण है कि भक्ति आंदोलन से जुड़े तमाम संत सम्राटों की चाकरी और राजनीतिक प्रभुता, धन-ऐश्वर्य से अपने को दूर रखते हैं। कहीं-कहीं तो वे धन-प्रभुता और ऐश्वर्य प्रदर्शन के अनुचित स्वरुप को देखकर दुःखी और ठगे से महसूस भी करते हैं। भक्त कुंभनदास को सम्राट अकबर द्वारा प्रदत्त राजकीय वैभव बेकार लगने लगता है और गोस्वामी तुलसीदास अकबर की मंसबदारी से स्वयं को दूर ही रखते हैं। इन भक्तों ने राजमहलों की शोभा बनने की बजाए अपने झौपड़े को अधिक आनन्ददायक माना और साधारण समाज जीवन को भी सम्राट की बजाए रामजी को राजा मानकर अपने जीवनयापन का निर्देश दिया। सम्राट अकबर को प्रस्ताव को ठुकराते हुए तुलसीदास ने कहा-

हम चाकर रघुवीर के…, अब तुलसी का होहिंगे नर के मंसबदार।

भक्त कुंभनदास ने तो एक कदम आगे जाकर अकबर के दरबार में ही घोषणा की-

जिनके मुख देखत अघ लागत तिनको करन पड़ी परनाम, आवत जात पनहिया टूटी, बिसर गयो हरि नाम। संतन सो कहां सीकरी सो काम।

यानी जिन्हें देखने पर भी पाप लगता है, उन्हें प्रणाम करना पड़ रहा है। सम्राट की सीकरी से संतों का आखिर क्या काम है, इनके कारण तो भगवान का नाम लेना भी विस्मृत हो जा रहा है। और अंत में भक्त कुंभनदास दरबार में यह कहने की हिम्मत भी करते हैं कि- आज पाछे मोकों कबहूं बुलाइयो मति सम्राट। यानी हे सम्राट, अब फिर कभी इस भक्त को अपने दरबार में बुलावा मत भेजना।

जब बड़े-बड़े प्रतापी राजाओं की हिम्मत टूट चली थी, तब ये संत कैसा साहस प्रकट कर रहे थे, सहज समझ आ सकता है। यह कोई आसान काम नहीं था जो हिंदुस्थान के संत कर रहे थे। इन संतों ने विदेशी मुगलों के राज्य को कभी अपनी मान्यता और सम्मति नहीं दी और इसके समानांतर जब हिंदू राजा केवल नामशेष रह गए, राजा राम को लोकजीवन का सम्राट घोषित कर दिया।

कैसा विस्मित और दिल को दहलाने वाला दृश्य रहा होगा जब गुरु अर्जुनदेव ने जहांगीर को सामने झुकने से इनकार कर दिया। भयानक कष्टों और शारीरिक पीड़ा भोगने के बावजूद मृत्यु के समय उनके मुख से गुरुवाणी ही गुंजती रही और अंत में भी यही निकला- तेरा किया मीठा लागे। जहांगीर के लिए इससे बढ़कर शर्म की क्या बात हो सकती थी कि उसके अत्याचारों को भी एक संत ‘मीठे कार्य’ बता रहा था। गुरु तेगबहादुर महाराज भी इसी प्रकार कंठ से जपुजी साहिब का कीर्तन करते हुए बलिदान हुए।

यह भक्ति की ताकत थी जिसने भारतीय समाज को बड़े से बड़ा बलिदान करने की ओर उन्मुख किया। यह भक्ति थी जिसने भारतीय समाज को यह भी प्रेरणा दी कि अत्याचारियों से स्वराज्य छीनकर पुनः भारतभूमि को अपने सपनों का स्वर्ग बनाएं। यही कारण है कि एक ओर उत्तर में गुरु गोविंद सिंह महाराज कहते हैं-

अगम सूर वीरा उठहिं सिंह योद्धा,

पकड़ तुरकगण कऊं करै वै निरोधा।

वहीं दूसरी ओर दक्षिण में विद्यारण्य स्वामी और मध्य भारत में समर्थ स्वामी रामदास जैसे संत विदेशी सल्तनत का जुआ उतार कर समाज को उठ खड़े होने का आह्वान देते हैं।

परकीय दासता के कालखण्ड में भक्ति पराक्रम के विरुद्ध कायरता या गृहस्थी और संसार के झंझटों से मुक्त होकर स्वयं को सुखी रखने का साधन नहीं थी। संतों की साधना स्वयं में एक कठिन कार्य था, उसमें भी समाज को विदेशी दासता से मुक्ति की शुभ घड़ी के आगमन तक धैर्य रखने के लिए आश्वस्त करने का काम तो और कठिन था। इसलिए भक्ति के कार्य में कायरों के लिए तो कोई जगह नहीं थी। तभी तो कबीर दास उस कालखण्ड में भक्ति को बलिदान का दूसरा नाम देते हुए कहते हैं-

भगति देहुली राम की, नहिं कायर का काम।

सीस उतारै हाथि करि, सो ले हरिनाम।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

श्री रामचरित मानस का सर्वांग सुन्दर सोपान सुंदरकांड...नाम सुंदरकांड क्यों रखा गया

श्री हनुमान जी

रामचरित मानस का सर्वांग सुन्दर सोपान सुंदरकांड...नाम सुंदरकांड क्यों रखा गया

ज्योतिषाचार्य  पं.विनोद चौबे, मोबा.नं.09827198828, भिलाई दुर्ग (छ.ग.)
 मित्रों , कल मैं भगवान परशुराम जी के जन्म स्थान के बारे में कुछ अंशों को आप सुधी पाठकों के सामने रखा था आज शनिवार है मेरे मन में आया कि कलियुग के जीवंत देवता श्री हनुमान जी के बारे में चर्चा किया जाय और वह भी परम भक्त पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी के शब्दों में अर्थात श्री रामचरित मानस का सर्वांग सुन्दर सोपान सुंदरकांड जिसमें सुंदर शब्द का 9 स्थानों पर प्रयोग किया गया है, और जो लोग सफलता अर्जित करना चाहते हैं, वे अपनी सफलता को सौंदर्य से जरूर जोड़ें। जीवन की सुंदरता का अर्थ है सफलता के साथ शांति। हनुमानजी की सफलता के लिए सुंदरकांड को याद किया जाता है। श्रीरामचरितमानस के इस पांचवें सोपान को लेकर लोग चर्चा करते हैं कि इसका नाम सुंदरकांड क्यों रखा गया, जबकि मानस के अन्य कांडों के नाम व्यक्ति या स्थितियों के नाम पर रखे गए हैं। बाललीला का बालकांड, अयोध्या की घटनाओं का अयोध्याकांड, जंगल के जीवन का अरण्यकांड, किष्किंधा राज्य के कारण किष्किंधाकांड, लंका के युद्ध की चर्चा लंका कांड में और जीवन के प्रश्नों का उत्तर फिलॉसफी के साथ उत्तरकांड में दिया गया है। फिर अचानक सुंदरकांड का नाम सुंदर क्यों रखा गया? दरअसल, लंका त्रिकुटाचल पर्वत पर बसी हुई थी। तीन पर्वत थे- पहला सुबैल, जहां के मैदान में युद्ध हुआ था। दूसरा, नील पर्वत, जहां राक्षसों के महल बसे हुए थे और तीसरे पर्वत का नाम है सुंदर पर्वत, जहां अशोक वाटिका निर्मित थी और यहीं हनुमानजी को पहली बार सीताजी के दर्शन हुए थे। इसलिए इसका नाम सुंदरकांड है।  सुंदरकांड पढ़कर उनके भक्त जान जाते हैं कि जगत का वैभव और जगदीश का ऐश्वर्य एक साथ कैसे प्राप्त होता है। इसी दृष्टि से हमें भी अपनी सफलता की यात्रा को जब भी जरूरत पड़े और अवसर मिले, सुंदरकांड से गुजारते रहना चाहिए।
 

!!अथ सुन्दरकाण्ड!! 

अथ तुलसीदास कृत रामचरितमानस सुन्दरकाण्ड ..
श्रीगणेशाय नमः
श्रीजानकीवल्लभोविजयते
श्रीरामचरितमानस
पञ्चम सोपान
सुन्दरकाण्ड

श्लोक
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदांतवेद्यं विभुम् .
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम् .. १ ..

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा .
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च .. २ ..

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् .
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि .. ३ ..

जामवंत के बचन सुहाए . सुनि हनुमंत हृदय अति भाए ..
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई . सहि दुख कंद मूल फल खाई .. १ ..
जब लगि आवौं सीतहि देखी . होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी ..
यह कह नाइ सबन्हि कहुँ माथा . चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा .. २ ..
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर . कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर ..
बार बार रघुबीर सँभारी . तरकेउ पवनतनय बल भारी .. ३ ..
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता . चलेउ सो गा पाताल तुरंता ..
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना . एही भाँति चलेउ हनुमाना .. ४ ..
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी . तैं मैनाक होहि श्रमहारी .. ५ ..

दोहा
हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम .
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम .. १ ..

जात पवनसुत देवन्ह देखा . जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा ..
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता . पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता .. १ ..
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा . सुनत बचन कह पवनकुमारा ..
राम काजु करि फिरि मैं आवौं . सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं .. २ ..
तब तव बदन पैठिहउँ आई . सत्य कहउँ मोहि जान दे माई ..
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना . ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना .. ३ ..
जोजन भरि तिहिं बदनु पसारा . कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ..
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ . तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ .. ४ ..
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा . तासु दून कपि रूप देखावा ..
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा . अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा .. ५ ..
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा . मागा बिदा ताहि सिरु नावा ..
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा . बुधि बल मरमु तोर मैं पावा .. ६ ..

दोहा
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान .
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान .. २ ..

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई .. करि माया नभु के खग गहई ..
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं . जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं .. १ ..
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई . एहि बिधि सदा गगनचर खाई ..
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा . तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा .. २ ..
ताहि मारि मारुतसुत बीरा . बारिधि पार गयउ मतिधीरा ..
तहाँ जाइ देखी बन सोभा . गुंजत चंचरीक मधु लोभा .. ३ ..
नाना तरु फल फूल सुहाए . खग मृग बृंद देखि मन भाए ..
सैल बिसाल देखि एक आगें . ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें .. ४ ..
उमा न कछु कपि कै अधिकाई .. प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ..
गिरि पर चढ़ि लंका तेहि देखी . कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी .. ५ ..
अति उतंग जलनिधि चहु पासा . कनक कोटि कर परम प्रकासा .. ६ ..

छंद
कनक कोटि बिचित्र मणि कृत सुंदरायतना घना .
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहुबिधि बना ..
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै .
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै .. १ ..
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं .
नर नाग सुर गंधर्व कन्या रूप मुनि मन मोहहीं ..
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं .
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं .. २ ..
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं .
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं ..
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही .
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही .. ३ ..

दोहा
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार .
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार .. ३ ..

मसक समान रूप कपि धरी . लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ..
नाम लंकिनी एक निसिचरी . सो कह चलेसि मोहि निंदरी .. १ ..
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा . मोर अहार जहाँ लगि चोरा ..
मुठिका एक महा कपि हनी . रुधिर बमत धरनीं डनमनी .. २ ..
पुनि संभारि उठी सो लंका . जोरि पानि कर बिनय ससंका ..
जब रावनहि ब्रह्म कर दीन्हा . चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा .. ३..
बिकल होसि तैं कपि कें मारे . तब जानेसु निसिचर संघारे ..
तात मोर अति पुन्य बहूता . देखेउँ नयन राम कर दूता .. ४ ..

दोहा
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग .
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग .. ४ ..

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा . हृदयँ राखि कोसलपुर राजा ..
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई . गोपद सिंधु अनल सितलाई .. १ ..
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही . राम कृपा करि चितवा जाही ..
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना . पैठा नगर सुमिरि भगवाना .. २ ..
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा . देखे जहँ तहँ अगनित जोधा ..
गयउ दसानान मंदिर माहीं . अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं .. ३ ..
सयन किएँ देखा कपि तेही . मंदिर महुँ न दीखि बैदेही ..
भवन एक पुनि दीख सुहावा . हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा .. ४ ..

दोहा
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ .
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ .. ५ ..

लंका निसिचर निकर निवासा . इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ..
मन महुँ तरक करैं कपि लागा . तेहीं समय बिभीषनु जागा .. १ ..
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा . हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा ..
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी . साधु ते होइ न कारज हानी .. २ ..
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए . सुनत बिभीषन उठि तहँ आए ..
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई . बिप्र कहहु निज कथा बुझाई .. ३ ..
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई . मोरें हृदय प्रीति अति होई ..
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी . आयहु मोहि करन बड़भागी .. ४ ..

दोहा
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम .
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम .. ६ ..

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी . जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी ..
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा . करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा .. १ ..
तामस तनु कछु साधन नाहीं . प्रीति न पद सरोज मन माहीं ..
अब मोहि भा भरोस हनुमंता . बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता .. २ ..
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा . तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा ..
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती . करहिं सदा सेवक पर प्रीती .. ३ ..
कहहु कवन मैं परम कुलीना . कपि चंचल सबहीं बिधि हीना ..
प्रात लेइ जो नाम हमारा . तेहि दिन ताहि न मिले अहारा .. ४ ..

दोहा
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर .
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर .. ७ ..

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी . फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी ..
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा . पावा अनिर्बाच्य विश्रामा .. १ ..
पुनि सब कथा बिभीषन कही . जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही ..
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता . देखी चलेउँ जानकी माता .. २ ..
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई . चलेउ पवनसुत बिदा कराई ..
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ . बन असोक सीता रह जहवाँ .. ३ ..
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा . बैठेहिं बीति जात निसि जामा ..
कृस तनु सीस जटा एक बेनी . जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी .. ४ ..

दोहा
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन .
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन .. ८ ..

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई . करइ बिचार करौं का भाई ..
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा . संग नारि बहु किएँ बनावा .. १ ..
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा . साम दान भय भेद देखावा ..
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी . मंदोदरी आदि सब रानी .. २ ..
तव अनुचरीं करेउँ पन मोरा . एक बार बिलोकु मम ओरा ..
तृन धरि ओट कहति बैदेही . सुमिरि अवधपति परम सनेही .. ३ ..
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा . कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा ..
अस मन समुझु कहति जानकी . खल सुधि नहिं रघुबीर बान की .. ४ ..
सठ सूनें हरि आनेहि मोही . अधम निलज्ज लाज नहिं तोही .. ५ ..

दोहा
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान .
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन .. ९ ..

सीता तैं मम कृत अपमाना . कटिहउँ तब सिर कठिन कृपाना ..
नाहिं त सपदि मानु मम बानी . सुमुखि होति न त जीवन हानी .. १ ..
स्याम सरोज दाम सम सुंदर . प्रभु भुज करि कर सम दसकंदर ..
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा . सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा .. २ ..
चंद्रहास हरु मम परितापं . रघुपति बिरह अनल संजातं ..
सीतल निसित बहसि बर धारा . कह सीता हरु मम दुख भारा .. ३ ..
सुनत बचन पुनि मारन धावा . मयतनयाँ कहि नीति बुझावा ..
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई . सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई .. ४ ..
मास दिवस महुँ कहा न माना . तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना .. ५ ..

दोहा
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद .
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद .. १० ..

त्रिजटा नाम राच्छसी एका . राम चरन रति निपुन बिबेका ..
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना . सीतहि सेइ करहु हित अपना .. १ ..
सपनें बानर लंका जारी . जातुधान सेना सब मारी ..
खर आरूढ़ नगन दससीसा . मुंडित सिर खंडित भुज बीसा .. २ ..
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई . लंका मनहुँ बिभीषन पाई ..
नगर फिरी रघुबीर दोहाई . तब प्रभु सीता बोलि पठाई .. ३ ..
यह सपना मैं कहउँ पुकारी . होइहि सत्य गएँ दिन चारी ..
तासु बचन सुनि ते सब डरीं . जनकसुता के चरनन्हि परीं .. ४ ..

दोहा
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच .
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच .. ११ ..

त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी . मातु बिपति संगिनि तैं मोरी ..
तजौं देह करु बेगि उपाई . दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई .. १ ..
आनि काठ रचु चिता बनाई . मातु अनल पुनि देहु लगाई ..
सत्य करहि मम प्रीति सयानी . सुनै को श्रवन सूल सम बानी .. २ ..
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि . प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि ..
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी . अस कहि सो निज भवन सिधारी .. ३ ..
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला . मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला ..
देखिअत प्रगट गगन अंगारा . अवनि न आवत एकउ तारा .. ४ ..
पावकमय ससि स्रवत न आगी . मानहुँ मोहि जानि हतभागी ..
सुनहि बिनय मम बिटप असोका . सत्य नाम करु हरु मम सोका .. ५ ..
नूतन किसलय अनल समाना . देहि अगिनि जनि करहि निदाना ..
देखि परम बिरहाकुल सीता . सो छन कपिहि कलप सम बीता .. ६ ..

दोहा
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब .
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ .. १२ ..

तब देखी मुद्रिका मनोहर . राम नाम अंकित अति सुंदर ..
चकित चितव मुदरी पहिचानी . हरष विषाद हृदयँ अकुलानी .. १ ..
जीति को सकइ अजय रघुराई . माया तें असि रचि नहिं जाई ..
सीता मन बिचार कर नाना . मधुर बचन बोलेउ हनुमाना .. २ ..
रामचंद्र गुन बरनैं लागा . सुनतहिं सीता कर दुख भागा ..
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई . आदिहु तें सब कथा सुनाई .. ३ ..
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई . कही सो प्रगट होति किन भाई ..
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ . फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ .. ४ ..
राम दूत मैं मातु जानकी . सत्य सपथ करुनानिधान की ..
यह मुद्रिका मातु मैं आनी . दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी .. ५ ..
नर बानरहि संग कहु कैसें . कही कथा भई संगति जैसें .. ६ ..

दोहा
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास .
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास .. १३ ..

हरिजन हानि प्रीति अति गाढ़ी . सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी ..
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना . भयहु तात मो कहुँ जलजाना .. १ ..
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी . अनुज सहित सुख भवन खरारी ..
कोमलचित कृपाल रघुराई . कपि केहि हेतु धरी निठुराई .. २ ..
सहज बानि सेवक सुख दायक . कबहुँक सुरति करत रघुनायक ..
कबहुँ नयन मम सीतल ताता . होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता .. ३ ..
बचनु न आव नयन भरे बारी . अहह नाथ हौं निपट बिसारी ..
देखि परम बिरहाकुल सीता . बोला कपि मृदु बचन बिनीता .. ४ ..
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता . तव दुख दुखी सुकृपा निकेता ..
जनि जननी मानहु जियँ ऊना . तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना .. ५ ..

दोहा
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर .
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर .. १४ ..

कहेउ राम बियोग तव सीता . मो कहुँ सकल भए बिपरीता ..
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू . कालनिसा सम निसि ससि भानू .. १ ..
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा . बारिद तपत तेल जनु बरिसा ..
जे हित रहे करत तेइ पीरा . उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा .. २ ..
कहेहू तें कछु दुख घटि होई . काहि कहौं यह जान न कोई ..
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा . जानत प्रिया एकु मनु मोरा .. ३ ..
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं . जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं ..
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही . मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही .. ४ ..
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता . सुमिरु राम सेवक सुखदाता ..
उर आनहु रघुपति प्रभुताई . सुनि मम बचन तजहु कदराई .. ५ ..

दोहा
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु .
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु .. १५ ..

जौं रघुबीर होति सुधि पाई . करते नहिं बिलंबु रघुराई ..
राम बान रबि उएँ जानकी . तम बरूथ कहँ जातुधान की .. १ ..
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई . प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई ..
कछुक दिवस जननी धरु धीरा . कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा .. २ ..
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं . तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं ..
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना . जातुधान अति भट बलवाना .. ३ ..
मोरें हृदय परम संदेहा . सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा ..
कनक भूधराकार सरीरा . समर भयंकर अतिबल बीरा .. ४ ..
सीता मन भरोस तब भयऊ . पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ .. ५ ..

दोहा
सुनु मात साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल .
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल .. १६ ..

मन संतोष सुनत कपि बानी . भगति प्रताप तेज बल सानी ..
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना . होहु तात बल सील निधाना .. १ ..
अजर अमर गुननिधि सुत होहू . करहुँ बहुत रघुनायक छोहू ..
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना . निर्भर प्रेम मगन हनुमाना .. २ ..
बार बार नाएसि पद सीसा . बोला बचन जोरि कर कीसा ..
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता . आसिष तव अमोघ बिख्याता .. ३ ..
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा . लागि देखि सुंदर फल रूखा ..
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी . परम सुभट रजनीचर भारी .. ४ ..
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं . जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं .. ५ ..

दोहा
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु .
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु .. १७ ..

चलेउ नाइ सिर पैठेउ बागा . फल खाएसि तरु तौरैं लागा ..
रहे तहां बहु भट रखवारे . कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे .. १ ..
नाथ एक आवा कपि भारी . तेहिं असोक बाटिका उजारी ..
खाएसि फल अरु बिटप उपारे . रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे .. २ ..
सुनि रावन पठए भट नाना . तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना ..
सब रजनीचर कपि संघारे . गए पुकारत कछु अधमारे .. ३ ..
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा . चला संग लै सुभट अपारा ..
आवत देखि बिटप गहि तर्जा . ताहि निपाति महाधुनि गर्जा .. ४ ..

दोहा
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि .
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि .. १८ ..

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना . पठएसि मेघनाद बलवाना ..
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही . देखिअ कपिहि कहाँ कर आही .. १ ..
चला इंद्रजित अतुलित जोधा . बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा ..
कपि देखा दारुन भट आवा . कटकटाइ गर्जा अरु धावा .. २ ..
अति बिसाल तरु एक उपारा . बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा ..
रहे महाभट ताके संगा . गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा .. ३ ..
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा . भिरे जुगल मानहुँ गजराजा ..
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई . ताहि एक छन मुरुछा आई .. ४ ..
उठि बहोरि कीन्हसि बहु माया . जीति न जाइ प्रभंजन जाया .. ५ ..

दोहा
ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार .
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार .. १९ ..

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा . परतिहुँ बार कटकु संघारा ..
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयउ . नागपास बांधेसि लै गयउ .. १ ..
जासु नाम जपि सुनहु भवानी . भव बंधन काटहिं नर ग्यानी ..
तासु दूत कि बंध तरु आवा . प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा .. २ ..
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए . कौतुक लागि सभाँ सब आए ..
दसमुख सभा दीखि कपि जाई . कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई .. ३ ..
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता . भृकुटि बिलोकत सकल सभीता ..
देखि प्रताप न कपि मन संका . जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका .. ४ ..

दोहा
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद .
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद .. २० ..

कह लंकेस कवन तैं कीसा . केहि कें बल घालेहि बन खीसा ..
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही . देखउँ अति असंक सठ तोही .. १ ..
मारे निसिचर केहिं अपराधा . कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा ..
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया . पाइ जासु बल बिरचित माया .. २ ..
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा . पालत सृजत हरत दससीसा ..
जा बल सीस धरत सहसानन . अंडकोस समेत गिरि कानन .. ३ ..
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता . तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता ..
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा . तेहि समेत नृप दल मद गंजा .. ४ ..
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली . बधे सकल अतुलित बलसाली .. ५ ..

दोहा
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि .
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि .. २१ ..

जानेउ मैं तुम्हारि प्रभुताई . सहसबाहु सन परी लराई ..
समर बालि सन करि जसु पावा . सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा .. १ ..
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा . कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा ..
सब कें देह परम प्रिय स्वामी . मारहिं मोहि कुमारग गामी .. २ ..
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे . तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे ..
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा . कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा .. ३ ..
बिनती करउँ जोरि कर रावन . सुनहु मान तजि मोर सिखावन ..
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी . भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी .. ४ ..
जाकें डर अति काल डेराई . जो सुर असुर चराचर खाई ..
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै . मोरे कहें जानकी दीजै .. ५ ..

दोहा
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि .
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि .. २२ ..

राम चरन पंकज उर धरहू . लंकाँ अचल राज तुम्ह करहू ..
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका . तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका .. १ ..
राम नाम बिनु गिरा न सोहा . देखु बिचारि त्यागि मद मोहा ..
बसन हीन नहिं सोह सुरारी . सब भूषन भूषित बर नारी .. २ ..
राम बिमुख संपति प्रभुताई . जाइ रही पाई बिनु पाई ..
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं . बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं .. ३ ..
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी . बिमुख राम त्राता नहिं कोपी ..
संकर सहस बिष्नु अज तोही . सकहिं न राखि राम कर द्रोही .. ४ ..

दोहा
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान .
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान .. २३ ..

जदपि कही कपि अति हित बानी . भगति बिबेक बिरति नय सानी ..
बोला बिहसि महा अभिमानी . मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी .. १ ..
मृत्यु निकट आई खल तोही . लागेसि अधम सिखावन मोही ..
उलटा होइहि कह हनुमाना . मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना .. २ ..
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना . बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना ..
सुनत निसाचर मारन धाए . सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए .. ३ ..
नाइ सीस करि बिनय बहूता . नीति बिरोधा न मारिअ दूता ..
आन दंड कछु करिअ गोसाँई . सबहीं कहा मंत्र भल भाई .. ४ ..
सुनत बिहसि बोला दसकंधर . अंग भंग करि पठइअ बंदर .. ५ ..

दोहा
कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ .
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ .. २४ ..

पूँछ हीन बानर तहँ जाइहि . तब सठ निज नाथहि लइ आइहि ..
जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई . देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई .. १ ..
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना . भइ सहाय सारद मैं जाना ..
जातुधान सुनि रावन बचना . लागे रचें मूढ़ सोइ रचना .. २ ..
रहा न नगर बसन घृत तेला . बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला ..
कौतुक कहँ आए पुरबासी . मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी .. ३ ..
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी . नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी ..
पावक जरत देखि हनुमंता . भयउ परम लघुरूप तुरंता .. ४ ..
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं . भइँ सभीत निसाचर नारीं .. ५ ..

दोहा
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास .
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास .. २५ ..

देह बिसाल परम हरुआई . मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई ..
जरइ नगर भा लोग बिहाला . झपट लपट बहु कोटि कराला .. १ ..
तात मातु हा सुनिअ पुकारा . एहिं अवसर को हमहि उबारा ..
हम जो कहा यह कपि नहिं होई . बानर रूप धरें सुर कोई .. २ ..
साधु अवग्या कर फलु ऐसा . जरइ नगर अनाथ कर जैसा ..
जारा नगर निमिष एक माहीं . एक बिभीषन कर गृह नाहीं .. ३ ..
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा . जरा न सो तेहि कारन गिरिजा ..
उलटि पलटि लंका सब जारी . कूदि परा पुनि सिंधु मझारी .. ४ ..

दोहा
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि .
जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि .. २६ ..

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा . जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा ..
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ . हरष समेत पवनसुत लयऊ .. १ ..
कहेहु तात अस मोर प्रनामा . सब प्रकार प्रभु पूरनकामा ..
दीन दयाल बिरिदु सँभारी . हरहु नाथ मम संकट भारी .. २ ..
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु . बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु ..
मास दिवस महुँ नाथ न आवा . तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा .. ३ ..
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना . तुम्हहू तात कहत अब जाना ..
तोहि देखि सीतलि भइ छाती . पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती .. ४ ..

दोहा
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह .
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह .. २७ ..

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी . गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी ..
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा . सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा .. १ ..
हरषे सब बिलोकि हनुमाना . नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना ..
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा . कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा .. २ ..
मिले सकल अति भए सुखारी . तलफत मीन पाव जिमि बारी ..
चले हरषि रघुनायक पासा . पूँछत कहत नवल इतिहासा .. ३ ..
तब मधुबन भीतर सब आए . अंगद संमत मधु फल खाए ..
रखवारे जब बरजन लागे मुष्टि प्रहार हनत सब भागे .. ४ ..

दोहा
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज .
सुन सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज .. २८ ..

जौं न होति सीता सुधि पाई . मधुबन के फल सकहिं कि खाई ..
एहि बिधि मन बिचार कर राजा . आइ गए कपि सहित समाजा .. १ ..
आइ सबन्हि नावा पद सीसा . मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा ..
पूँछी कुसल कुसल पद देखी . राम कृपाँ भा काजु बिसेषी .. २ ..
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना . राखे सकल कपिन्ह के प्राना ..
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ . कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ .. ३ ..
राम कपिन्ह जब आवत देखा . किएँ काजु मन हरष बिसेषा ..
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई . परे सकल कपि चरनन्हि जाई .. ४ ..

दोहा
प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज .
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज .. २९..

जामवंत कह सुनु रघुराया . जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया ..
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर . सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर .. १ ..
सोइ बिजई बिनई गुन सागर . तासु सुजसु त्रैलोक उजागर ..
प्रभु कीं कृपा भयउ सब काजू . जन्म हमार सुफल भा आजू .. २ ..
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी . सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी ..
पवनतनय के चरित सुहाए . जामवंत रघुपतिहि सुनाए .. ३ ..
सुनत कृपानिधि मन अति भाए . पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए ..
कहहु तात केहि भाँति जानकी . रहति करति रच्छा स्वप्रान की .. ४ ..

दोहा
नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट .
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट .. ३० ..

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही . रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही ..
नाथ जुगल लोचन भरि बारी . बचन कहे कछु जनककुमारी .. १ ..
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना . दीन बंधु प्रनतारति हरना ..
मन क्रम बचन चरन अनुरागी . केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी .. २..
अवगुन एक मोर मैं माना . बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना ..
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा . निसरत प्रान करहिं हठि बाधा .. ३ ..
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा . स्वास जरइ छन माहिं सरीरा ..
नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी . जरैं न पाव देह बिरहागी .. ४ ..
सीता कै अति बिपति बिसाला . बिनहिं कहें भलि दीनदयाला .. ५ ..

दोहा
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति .
बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति .. ३१ ..

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना . भरि आए जल राजिव नयना ..
बचन कायँ मन मम गति जाही . सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही .. १ ..
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई . जब तव सुमिरन भजन न होई ..
केतिक बात प्रभु जातुधान की . रिपुहि जीति आनिबी जानकी .. २ ..
सुनु कपि तोहि समान उपकारी . नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी ..
प्रति उपकार करौं का तोरा . सनमुख होइ न सकत मन मोरा .. ३ ..
सुनु सत तोहि उरिन मैं नाहीं . देखेउँ करि बिचार मन माहीं ..
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता . लोचन नीर पुलक अति गाता .. ४ ..

दोहा
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत .
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत .. ३२ ..

बार बार प्रभु चहइ उठावा . प्रेम मगन तेहि उठब न भावा ..
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा . सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा .. १ ..
सावधान मन करि पुनि संकर . लागे कहन कथा अति सुंदर ..
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा . कर गहि परम निकट बैठावा .. २ ..
कहु कपि रावन पालित लंका . केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका ..
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना . बोला बचन बिगत हनुमाना .. ३ ..
साखामृग कै बड़ि मनुसाई . साखा तें साखा पर जाई ..
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा . निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा .. ४ ..
सो सब तव प्रताप रघुराई . नाथ न कछू मोरि प्रभुताई .. ५ ..

दोहा
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल .
तव प्रभावँ वड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल .. ३३ ..

नाथ भगति अति सुखदायनी . देहु कृपा करि अनपायनी ..
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी . एवमस्तु तब कहेउ भवानी .. १ ..
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना . ताहि भजनु तजि भाव न आना ..
यह संबाद जासु उर आवा . रघुपति चरन भगति सोइ पावा .. २ ..
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपि बृंदा . जय जय जय कृपाल सुखकंदा ..
तब रघुपति कपिपतिहिं बोलावा . कहा चलैं कर करहु बनावा .. ३ ..
अब बिलंबु केहि कारन कीजे . तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे ..
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी . नभ तें भवन चले सुर हरषी .. ४ ..

दोहा
कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ .
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ .. ३४ ..

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा . गर्जहिं भालु महाबल कीसा ..
देखी राम सकल कपि सेना . चितइ कृपा करि राजिव नैना .. १ ..
राम कृपा बल पाइ कपिंदा . भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा ..
हरषि राम तब कीन्ह पयाना . सगुन भए सुंदर सुभ नाना .. २ ..
जासु सकल मंगलमय कीती . तासु पयान सगुन यह नीती ..
प्रभु पयान जाना बैदेहीं . फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं .. ३ ..
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई . असगुन भयउ रावनहि सोई ..
चला कटकु को बरनैं पारा . गर्जहिं बानर भालु अपारा .. ४ ..
नख आयुध गिरि पादपधारी . चले गगन महि इच्छाचारी ..
केहरिनाद भालु कपि करहीं . डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं .. ५ ..

छंद
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे .
मन हरष सब गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे ..
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं .
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं .. १ ..
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई .
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई ..
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी .
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी .. २ ..

दोहा
एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर .
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर .. ३५ ..

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका . जब तें जारि गयउ कपि लंका ..
निज निज गृह सब करहिं बिचारा . नहिं निसिचर कुल केर उबारा .. १ ..
जासु दूत बल बरनि न जाई . तेहि आएँ पुर कवन भलाई ..
दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी . मंदोदरी अधिक अकुलानी .. २ ..
रहसि जोरि कर पति पग लागी . बोली बचन नीति रस पागी ..
कंत करष हरि सन परिहरहू . मोर कहा अति हित हियँ धरहू .. ३ ..
समुझत जासु दूत कइ करनी . स्रवहिं गर्भ रजनीचर धरनी ..
तासु नारि निज सचिव बोलाई . पठवहु कंत जो चहहु भलाई .. ४ ..
तव कुल कमल बिपिन दुखदायई . सीता सीत निसा सम आई ..
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें . हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें .. ५ ..

दोहा
राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक .
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक .. ३६ ..

श्रवन सुनि सठ ता करि बानी . बिहसा जगत बिदित अभिमानी ..
सभय सुभाउ नारि कर साचा . मंगल महुँ भय मन अति काचा .. १ ..
जों आवइ मर्कट कटकाई . जिअहिं बिचारे निसिचर खाई ..
कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा . तासु नारि सभीत बड़ि हासा .. २ ..
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई . चलेउ सभाँ ममता अधिकाई ..
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता . भयउ कंत पर बिधि बिपरीता .. ३ ..
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई . सिंधु पार सेना सब आई ..
बूझेसि सचिव उचित मत कहेहू . ते सब हँसे मष्ट करि रहेहू .. ४ ..
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं . नर बानर केहि लेखे माहीं .. ५ ..

दोहा
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस .
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास .. ३७ ..

सोइ रावन कहुँ बनी सहाई . अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई ..
अवसर जानि बिभीषनु आवा . भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा .. १ ..
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन . बोला बचन पाइ अनुसासन ..
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता . मति अनुरूप कहउँ हित ताता .. २ ..
जो आपन चाहै कल्याना . सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना ..
सो परनारि लिलार गोसाई . तजउ चउथि के चंद कि नाई .. ३ ..
चौदह भुवन एक पति होई . भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई ..
गुन सागर नागर नर जोऊ . अलप लोभ भल कहइ न कोऊ .. ४ ..

दोहा
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ .
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत .. ३८ ..

तात राम नहिं नर भूपाला . भुवनेस्वर कालहु कर काला ..
ब्रह्म अनामय अज भगवंता . ब्यापक अजित अनादि अनंता .. १ ..
गो द्विज धेनु देव हितकारी . कृपा सिंधु मानुष तनुधारी ..
जन रंजन भंजन खल ब्राता . बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता .. २ ..
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा . प्रनतारति भंजन रघुनाथा ..
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही . भजहु राम बिनु हेतु सनेही .. ३ ..
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा . बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा ..
जासु नाम त्रय ताप नसावन . सोई प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन .. ४ ..

दोहा
बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस .
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस .. ३९ क ..
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात .
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात .. ३९ ख ..

माल्यवंत अति सचिव सयाना . तासु बचन सुनि अति सुख माना ..
तात अनुज तव नीति बिभूषन . सो उर धरहु जो कहत बिभीषन .. १ ..
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ . दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ ..
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी . कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी .. २ ..
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं . नाथ पुरान निगम अस कहहीं ..
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना . जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना .. ३ ..
तव उर कुमति बसी बिपरीता . हित अनहित मानहु रिपु प्रीता ..
कालराति निसिचर कुल केरी . तेहि सीता पर प्रीति घनेरी .. ४ ..

दोहा
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार .
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार .. ४० ..

बुध पुरान श्रुति संमत बानी . कही बिभीषन नीति बखानी ..
सुनत दसानन उठा रिसाई . खल तोहि निकट मृत्य अब आई .. १ ..
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा . रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा ..
कहसि न खल अस को जग माहीं . भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं .. २ ..
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती . सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती ..
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा . अनुज गहे पद बारहिं बारा .. ३ ..
उमा संत कइ इहइ बड़ाई . मंद करत जो करइ भलाई ..
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा . रामु भजें हित नाथ तुम्हारा .. ४ ..
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ . सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ .. ५ ..

दोहा
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि .
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि .. ४१ ..

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं . आयूहीन भए सब तबहीं ..
साधु अवग्या तुरत भवानी . कर कल्यान अखिल कै हानी .. १ ..
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा . भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा ..
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं . करत मनोरथ बहु मन माहीं .. २ ..
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता . अरुन मृदुल सेवक सुखदाता ..
जे पद पसरि तरी रिषिनारी . दंड़क कानन पावनकारी .. ३ ..
जे पद जनकसुताँ उर लाए . कपट कुरंग संग धर धाए ..
हर उर सर सरोज पद जेई . अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई .. ४ ..

दोहा
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ .
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ .. ४२ ..

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा . आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा ..
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा . जान कोउ रिपु दूत बिसेषा .. १ ..
ताहि राखि कपीस पहिं आए . समाचार सब ताहि सुनाए ..
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई . आवा मिलन दसानन भाई .. २ ..
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा . कहइ कपीस सुनहु नरनाहा ..
जानि न जाइ निसाचर माया . कामरूप केहि कारन आया .. ३ ..
भेद हमार लेन सठ आवा . राखिअ बाँधि मोहि अस भावा ..
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी . मम पन सरनागत भयहारी .. ४ ..
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना . सरनागत बच्छल भगवाना .. ५ ..

दोहा
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि .
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि .. ४३ ..

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू . आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू ..
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं . जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं .. १ ..
पापवंत कर सहज सुभाऊ . भजहु मोर तेहि भाव न काऊ ..
जौं पै दुष्टहृदय सोइ होई . मोरें सनमुख आव कि सोई .. २ ..
निर्मल मन जन सो मोहि पावा . मोहि कपट छल छिद्र न भावा ..
भेद लेन पठवा दससीसा . तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा .. ३ ..
जग महुँ सखा निसाचर जेते . लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते ..
जो सभीत आवा सरनाईं . राखिहउँ ताहि प्रान की नाईं .. ४ ..

दोहा
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत .
जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत .. ४४ ..

सादर तेहि आगें करि बानर . चले जहाँ रघुपति करुनाकर ..
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता . नयनानंद दान के दाता .. १ ..
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी . रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी ..
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन . स्यामल गात प्रनत भय मोचन .. २ ..
सिंघ कंध आयत उर सोहा . आनन अमित मदन मन मोहा ..
नयन नीर पुलकित अति गाता . मन धरि धीर कही मृदु बाता .. ३ ..
नाथ दसानन कर मैं भ्राता . निसिचर बंस जनम सुरत्राता ..
सहज पापप्रिय तामस देहा . जथा उलूकहि तम पर नेहा .. ४ ..

दोहा
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर .
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर .. ४५ ..

अस कहि करत दंडवत देखा . तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा ..
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा . भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा .. १ ..
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी . बोले बचन भगत भय हारी ..
कहु लंकेस सहित परिवारा . कुसल कुठाहर बास तुम्हारा .. २ ..
खल मंडलीं बसहु दिन राती . सखा धरम निबहइ केहि भाँती ..
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती . अति नय निपुन न भाव अनीती .. ३ ..
बरु भल बास नरक कर ताता . दुष्ट संग जनि देइ बिधाता ..
अब पद देखि कुसल रघुराया . जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया .. ४ ..

दोहा
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम .
जब लगि भजन न राम कहुँ सोक धाम तजि काम .. ४६ ..

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना . लोभ मोह मच्छर मद माना ..
जब लगि उर न बसत रघुनाथा . धरें चाप सायक कटि भाथा .. १ ..
ममता तरुन तमी अँधिआरी . राग द्वेष उलूक सुखकारी ..
तब लगि बसति जीव मन माहीं . जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं .. २ ..
अब मैं कुसल मिटे भय भारे . देखि राम पद कमल तुम्हारे ..
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला . ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला .. ३ ..
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ . सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ ..
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा . तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा .. ४ ..

दोहा
अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज .
देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज .. ४७ ..

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ . जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ ..
जौं नर होइ चराचर द्रोही . आवौ सभय सरन तकि मोही .. १ ..
तजि मद मोह कपट छल नाना . करउँ सद्य तेहि साधु समाना ..
जननी जनक बंधु सुत दारा . तनु धनु भवन सुहृद परिवारा .. २ ..
सब कै ममता ताग बटोरी . मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ..
समदरसी इच्छा कछु नाहीं . हरष सोक भय नहिं मन माहीं .. ३ ..
अस सज्जन मम उर बस कैसें . लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें ..
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें . धरउँ देह नहिं आन निहोरें .. ४ ..

दोहा
सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम .
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम .. ४८ ..

सुन लंकेस सकल गुन तोरें . तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें ..
राम बचन सुनि बानर जूथा . सकल कहहिं जय कृपा बरूथा .. १ ..
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी . नहिं अघात श्रवनामृत जानी ..
पद अंबुज गहि बारहिं बारा . हृदयँ समात न प्रेमु अपारा .. २ ..
सुनहु देव सचराचर स्वामी . प्रनतपाल उर अंतरजामी ..
उर कछु प्रथम बासना रही . प्रभु पद प्रीति सरित सो बही .. ३ ..
अब कृपाल निज भगति पावनी . देहु सदा सिव मन भावनी ..
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा . मागा तुरत सिंधु कर नीरा .. ४ ..
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं . मोर दरसु अमोघ जग माहीं ..
अस कहि राम तिलक तेहि सारा . सुमन वृष्टि नभ भई अपारा .. ५ ..

दोहा
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड .
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड .. ४९ क ..
जो संपति सिव रावनहि दीन्ह दिएँ दस माथ .
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ .. ४९ ख ..

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना . ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना ..
निज जन जानि ताहि अपनावा . प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा .. १ ..
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी . सर्बरूप सब रहित उदासी ..
बोले बचन नीति प्रतिपालक . कारन मनुज दनुज कुल घालक .. २ ..
सुनु कपीस लंकापति बीरा . केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा ..
संकुल मकर उरग झष जाती . अति अगाध दुस्तर सब भाँती .. ३ ..
कह लंकेस सुनहु रघुनायक . कोटि सिंधु सोषक तव सायक ..
जद्यपि तदपि नीति असि गाई . बिनय करिअ सागर सन जाई .. ४ ..

दोहा
प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि .
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि .. ५० ..

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई . करिअ दैव जौं होइ सहाई ..
मंत्र न यह लछिमन मन भावा . राम बचन सुनि अति दुख पावा .. १ ..
नाथ दैव कर कवन भरोसा . सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा ..
कादर मन कहुँ एक अधारा . दैव दैव आलसी पुकारा .. २ ..
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा . ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा ..
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई . सिंधि समीप गए रघुराई .. ३ ..
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई . बैठे पुनि तट दर्भ डसाई ..
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए . पाछें रावन दूत पठाए .. ४ ..

दोहा
सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह .
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह .. ५१ ..

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ . अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ ..
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने . सकल बाँधि कपीस पहिं आने .. १ ..
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर . अंग भंग करि पठवहु निसिचर ..
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए . बाँधि कटक चहु पास फिराए .. २ ..
बहु प्रकार मारन कपि लागे . दीन पुकारत तदपि न त्यागे ..
जो हमार हर नासा काना . तेहि कोसलाधीस कै आना .. ३ ..
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए . दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए ..
रावन कर दीजहु यह पाती . लछिमन बचन बाचु कुलघाती .. ४ ..

दोहा
कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार .
सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार .. ५२ ..

तुरत नाइ लछिमन पद माथा . चले दूत बरनत गुन गाता ..
कहत राम जसु लंकाँ आए . रावन चरन सीस तिन्ह नाए .. १ ..
बिहसि दसानन पूँछी बाता . कहसि न सुक आपनि कुसलाता ..
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी . जाहि मृत्यु आई अति नेरी .. २ ..
करत राज लंका सठ त्यागी . होइहि जव कर कीट अभागी ..
पुनि कहु भालु कीस कटकाई . कठिन काल प्रेरित चलि आई .. ३ ..
जिन्ह के जीवन कर रखवारा . भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा ..
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी . जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी .. ४ ..

दोहा
की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर .
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर .. ५३ ..

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें . मानहु कहा क्रोध तजि तैसें ..
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा . जातहिं राम तिलक तेहि सारा .. १ ..
रावन दूत हमहि सुनि काना . कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना ..
श्रवन नासिका काटैं लागे . राम सपथ दीन्हें हम त्यागे .. २ ..
पूँछिहु नाथ राम कटकाई . बदन कोटि सत बरनि न जाई ..
नाना बरन भालु कपि धारी . बिकटानन बिसाल भयकारी .. ३ ..
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा . सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा ..
अमित नाम भट कठिन कराला . अमित नाग बल बिपुल बिसाला .. ४ ..

दोहा
द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि .
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि .. ५४ ..

ए कपि सब सुग्रीव समाना . इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना ..
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं . तृन समान त्रैलोकहि गनहीं .. १ ..
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर . पदुम अठारह जूथप बंदर ..
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं . जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं .. २ ..
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा . आयसु पै न देहिं रघुनाथा ..
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला . पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला .. ३ ..
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा . ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा ..
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका . मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका .. ४ ..

दोहा
सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम .
रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम .. ५५ ..

राम तेज बल बुधि बिपुलाई . सेष सहस सत सकहिं न गाई ..
सक सर एक सोषि सत सागर . तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर .. १ ..
तासु बचन सुनि सागर पाहीं . मागत पंथ कृपा मन माहीं ..
सुनत बचन बिहसा दससीसा . जौं असि मति सहाय कृत कीसा .. २ ..
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई . सागर सन ठानी मचलाई ..
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई . रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई .. ३ ..
सचिव सभीत बिभीषन जाकें . बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें ..
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी . समय बिचार पत्रिका काढ़ी .. ४ ..
रामानुज दीन्ही यह पाती . नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती ..
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन . सचिव बोलि सठ लाग बचावन .. ५ ..

दोहा
बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस .
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस .. ५६ क ..
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग .
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग .. ५६ ख ..

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई . कहत दसानन सबहि सुनाई ..
भूमि परा कर गहत अकासा . लघु तापस कर बाग बिलासा .. १ ..
कह सुक नाथ सत्य सब बानी . समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी ..
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा . नाथ राम सन तजहु बिरोधा .. २ ..
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ . जद्यपि अखिल लोक कर राऊ ..
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही . उर अपराध न एकउ धरही .. ३ ..
जनकसुता रघुनाथहि दीजे . एतना कहा मोर प्रभु कीजे ..
जब तेहि कहा देन बैदेही . चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही .. ४ ..
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ . कृपासिंधु रघुनायक जहाँ ..
करि प्रनामु निज कथा सुनाई . राम कृपाँ आपनि गति पाई .. ५ ..
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी . राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी ..
बंदि राम पद बारहिं बारा . मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा .. ६ ..

दोहा
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति .
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति .. ५७ ..

लछिमन बान सरासन आनू . सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू ..
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती . सहज कृपन सन सुंदर नीती .. १ ..
ममता रत सन ग्यान कहानी . अति लोभी सन बिरति बखानी ..
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा . ऊसर बीज बएँ फल जथा .. २ ..
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा . यह मत लछिमन के मन भावा ..
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला . उठी उदधि उर अंतर ज्वाला .. ३ ..
मकर उरग झष गन अकुलाने . जरत जंतु जलनिधि जब जाने ..
कनक थार भरि मनि गन नाना . बिप्र रूप आयउ तजि माना .. ४ ..

काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच .
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच .. ५८ ..

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे . छमहु नाथ सब अवगुन मेरे ..
गगन समीर अनल जल धरनी . इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी .. १ ..
तव प्रेरित मायाँ उपजाए . सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए ..
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई . सो तेहि भाँति रहें सुख लहई .. २ ..
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही . मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही ..
ढोल गँवार सूद्र पसु नारी . सकल ताड़ना के अधिकारी .. ३ ..
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई . उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई ..
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई . करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई .. ४ ..

दोहा
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ .
जेहि बिधि उतरैं कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ .. ५९ ..

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई . लरिकाईं रिषि आसिष पाई .
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे . तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे .. १ ..
मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई . करिहउँ बल अनुमान सहाई ..
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ . जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ .. २ ..
एहिं सर मम उत्तर तट बासी . हतहु नाथ खल नर अघ रासी ..
सुनि कृपाल सागर मन पीरा . तुरतहिं हरी राम रन धीरा .. ३ ..
देखि राम बल पौरुष भारी . हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी ..
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा . चरन बंदि पाथोधि सिधावा .. ४ ..

छंद
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ .
यह चरित कलि मल हर जथामति दास तुलसी गाउअऊ ..
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना .
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना ..

दोहा
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान .
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान .. ६० ..

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने
पञ्चमः सोपानः समाप्तः .

ज्योतिषाचार्य  पं.विनोद चौबे, मोबा.नं.09827198828, भिलाई दुर्ग (छ.ग.)

जलालाबाद में भगवान परशुराम की जन्मस्थली

जलालाबाद में भगवान परशुराम की जन्मस्थली
उत्तरप्रदेश के शाहजहाँपुर जनपद से लगभग 30 किमी दूर शाहजहाँपुर- फर्रूखाबाद रोड़ पर तहसील जलालाबाद में भगवान परशुराम की जन्मस्थली बताई जाती है। इस स्थान को हजारों वर्षों से लोग खेड़ा परशुरामपुरी कहते आए हैं। मुगलकाल में रूहेला सरदार नजीब खाँ के पुत्र रहमत खॉ ने इसका नाम बदलकर अपने मझले पुत्र जलालुद्दीन के नाम पर जलालाबाद कर दिया था। किन्तु अनेक स्थानों पर अभी भी परशुरामपुरी लिखा हुआ है। लोगों की दृढ़ धारणा है कि परशुराम यहीं पर जन्मे थे। स्थानीय कांग्रेसी सांसद एवं वर्तमान में केन्द्रीय राज्यमंत्री जितिन प्रसाद ने बाकायदा केन्द्रीय पर्यटन मंत्री को पत्र लिखकर इस मंदिर को पर्यटन स्थल घोषित
parshuram करने की माँग की है। स्थानीय लोगों की राज्य सरकार से माँग है कि परशुराम जन्मस्थली के इस परशुराम मंदिर को पर्यटन स्थल घोषित कर इसका विकास किया जाए। इधर उत्तर प्रदेश की राजनीति में भगवान परशुराम महत्वपूर्ण हो चले हैं। परशुराम ब्राह्मणों के स्वाभिमान और गौरव के प्रतीक बन गए हैं। सोशल इंजीनियरिंग के चलते सत्ता हथियाने के लिए ब्राह्मणों का सहयोग पाने के लिए सभी दल उनको लुभा रहे हैं। ब्राह्मणों ने भी इधर तेजी से भगवान परशुराम को भगवान का दर्जा दे उनकी पूजा-आराधना शुरू कर दी है और इसी के चलते वे अपने आराध्य देव भगवान परशुराम की जन्मस्थली जलालाबाद में स्थित परशुराम के मंदिर का जीर्णोद्धार कर विशाल मंदिर बनाने का संकल्प ले रहे हैं। इसी बहाने ब्राह्मणों ने अपने समाज को एक रखने की ठानी है। गत एक फरवरी को ब्राह्मण समाज एकता संघर्ष समिति के द्वारा भगवान परशुराम की जन्मस्थली के जलालाबाद में स्थित परशुराम मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए भूमि पूजन व शिलादान का आयोजन किया गया। इस आयोजन में नैमिष व्यास पीठाधीश्वर जगदाचार्य श्री स्वामी उपेन्द्रानन्द सरस्वती जी महाराज तथा ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य श्रीमद् स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती जी महाराज पधारे।
जिस स्थान पर आज परशुरामपुरी स्थित है त्रेतायुग में वह क्षेत्र कान्यकुन्ज राज्य में था। रूहेला सरदार नजीब खॉ के पुत्र हाफिज खाँ ने इस क्षेत्र में एक किला बनवाया था। आज उसी किले के अवशेष पर तहसील का भवन बना हुआ है। उसने अपने मझले पुत्र जलालुद्दीन का विवाह वहाँ आकर बस जाने वाले अफगान कबीले में किया था और यह इलाका अपनी पुत्रवधू को मेहर मे दिया था तभी से इस नगर का नाम परशुरामपुरी से बदलकर जलालाबाद रखा गया था।
परशुरामपुरी जलालाबाद में भगवान परशुराम का अति प्राचीन मंदिर है। मंदिर के मध्य में शिवलिंग है। सामने भगवान परशुराम की प्राचीन मूर्ति है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि भगवान परशुराम के हाथों से यहाँ शिवलिंग की स्थापना की गई थी जिस पर बाद में भक्तों ने मंदिर का निर्माण कराया होगा।


D
परशुरामपुरी में मंदिर लगभग 20 फुट ऊँचे स्थान पर बना है। मंदिर की ऊँचाई इसकी अति प्राचीनता का प्रमाण है। यवनों के द्वारा परशुराम मंदिर अनेक बार तोड़ा गया तथा परशुराम के भक्तों द्वारा पुनः उसका जीर्णोद्धार कराया गया। जीर्णोद्धार के समय मलबे के नीचे से परशुराम से संबंधित अनेक प्राचीन वस्तुएँ उपलब्ध हुईं। एक बार मंदिर के मलबे के नीचे से लगभग 8 फीट ऊँचा और ढाई फीट फलक का परशु निकला था। प्राचीन परशु अब नहीं है किन्तु उसी आकार का परशु मंदिर पर लगा है जो आज भी मंदिर द्वार के दाईं ओर लगा है।
कहा जाता है कि सतयुग के अन्त में परशुराम जी का अवतरण यही हुआ है बैसाख शुक्ल पक्ष अक्षय तृतीया बुधवार रोहिणी नक्षत्र सायंकाल तुला लग्न में परशुराम का इसी क्षेत्र में जन्म हुआ था। उनके बाबा ऋचीक मुनि की तपःस्थली यही थी, पिता जमदग्नि का जन्म भी यहीं होना बताया जाता है। जमदग्नि के नाना राजा गाधि का राज्य भी यही था उनका किला आज भी प्रसिद्ध है। परशुराम की माता रेणुका दक्षिण देश की राजकुमारी थीं।
आज भी परशुराम मंदिर के पश्चिमी भाग में दाक्षायणी या ढकियाइन का मन्दिर है जो रेणुका के रहने का स्थान बताया जाता है। परशुराम अपने पिता के लिए रामगंगा लाए थे उसका अंश आज भी जिगदिनी नाम की झील जमदग्नि का स्मरण दिलाती है।
त्रेतायुग में आतंकी राजाओं का परशुराम ने विनाश किया था और तपस्वी ऋषि-मुनियों की सुरक्षा की तथा ताल खुदवाए। परशुराम द्वारा खोदे गए ताल प्रायः धनुषाकार हैं तथा रामताल के नाम से प्रसिद्ध है। परशुराम मंदिर के सम्मुख आज भी रामताल है।
जनश्रुति और प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि भगवान परशुराम की जन्मभूमि यही रही होगी। यहाँ से पश्चिम दिशा में कटका-कटकिया आज भी कंटकपुरी की याद दिलाते हैं। जहाँ परशुराम ने सहस्रबाहु की सेना और उनके पुत्रों को अपने फरसे से काटा था। उसमें हयहयवंशी आतंकी क्षत्रिय पश्चिमी जंगलों में निवास करते थे।
ब्राह्मणों को कष्ट पहुँचाने वाले दस्यु रूप में रहते थे। परशुराम ने उन्हें नष्ट कर उनके स्थानों को खंडहर बना दिया जो आज भी खंडहर के नाम से प्रसिद्ध है। जनश्रुति के अनुसार खंडहर वाउनी कहलाती है। इसके अलावा दिउरा, जमुनिया, उबरिया आदि स्थान भी परशुरामजी से संबंधित बताए जाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि सभी पीठों के शंकराचार्य इस मंदिर पर आ चुके है। करपात्री जी महाराज अपने पर्यटन स्थलों में इसे प्रधानता देते थे।
परशुराम के मंदिर में सभी श्रद्धालुओं की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। नगर के नव विवाहित वर-वधू सर्वप्रथम इसी मंदिर में आशीर्वाद लेने आते हैं। दूर-दूर से मुण्डन, अन्नप्राशन, करधनी धारण आदि संस्कार कराने मंदिर पर ही लोग आते है। वर्तमान में इस मंदिर के महंत सत्यदेव पाण्डेय है जिनके कार्यकाल में मंदिर का विकास हुआ नये भवन बने, नवदुर्गा की स्थापना और चौबीस अवतारों की प्रतिष्ठा की गई।
भारतीय वांगमय में उसके रचयिताओं ने अपने तथा अपने ग्रंथों के ऐतिहासिक नायकों की जन्मतिथि और जन्मस्थान का कोई स्पष्ट और विस्तार से उल्लेख नहीं किया है। ऋषि मुनियों के जन्मस्थान और निवास स्थान स्थित दूसरी है। बहुत कम ऋषि मुनि ऐसे थे जिनकी एक या दो पीढियाँ किसी निश्चित स्थान पर निवास करती थी। अधिकांश ऋषि मुनि मानव कल्याण के लिए उपदेश प्रचार के लिए जगह-जगह भ्रमण करते थे और आवश्यकतानुसार आश्रम बनाकर निवास करते थे। इसीलिए वाल्मीकि, विश्वामित्र, अगस्त आदि ऋषियों के आश्रम देश के भिन्न-भिन्न स्थानों में पाए जाते हैं।
भगवान परशुराम के पूर्वज भार्गव ऋषिगण भृगु, शुक्राचार्य, च्यवन, दधीचि, मार्कण्डेय आदि भ्रमणशील थे। छठे अवतार परशुराम के पिता जमदग्नि के आश्रम देश के कोने-कोने में मिलते हैं। महर्षि जमदग्नि और परशुराम के अनेक प्रमुख स्थानों को भगवान परशुराम के जन्मस्थान से जोड़ा जाता है।
भगवान परशुराम के जन्मस्थान को लेकर कई स्थानों पर दावा किया जाता है। जिनमें उत्तर प्रदेश के जनपद गाजीपुर में जमनिया, जनपद मेरठ के पुरा महादेव परशुरामेश्वर, वाराणसी जनपद के भार्गवपुर व जलालाबाद शाहजहाँपुर, राजस्थान के जनपद चित्तौड़ स्थित मातृकुंडिया, हिमाचल प्रदेश के जनपद ददाहु के रेणुका तीर्थ तथा मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर स्थित जानापाव को परशुराम जन्मस्थली होने का दावा किया जाता है।
फिलहाल उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण शाहजहाँपुर जनपद के जलालाबाद स्थित परशुराम मंदिर को ही भगवान परशुराम का जन्मस्थली घोषित करने के लिए सामाजिक व राजनीतिक प्रयास कर रहे हैं।

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

भारतीय धर्मशास्त्रों में दण्ड का प्रावधान हैः

भारतीय धर्मशास्त्रों में दण्ड का प्रावधान हैः
ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे , ०९८२७१९८८२८, भिलाई
                                                                                                               ''अमेरीका पूर्व राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुस से लेकर आज भारत में भी वी वी आई पी लोगों पर जुते चप्पल और घूंसे के अलावा सरेआम कृपाण निकालकर हरवींदर जैसे लोगों के द्वारा भारत के केन्द्रीय कृषी मंत्री शरद पवार हमला करना एक तरह से पूर्व की हुयी घटनाओं में इस कृत्य को अंजाम देने वाले  को दण्डीत न किया जाना भी महत्त्वपूर्ण कारण है, इससे इस प्रकार के  कु-कृत्य करने वालों पर नरमी से बढ़ावा ही मिलता है। मित्रों भारतीय दण्ड संहिता अपने आप में पूर्णतया सक्षम है बसर्ते वी.वी.आई.पी. नेताओं नें जो इन्हें माफ करने शिगुफा छोड़ा तो भा.द.सं. भी वहां बेबस हो जाती है एक तो अपने भारत के दण्ड संहिता को कई देशों का नकल कर बनाया गया वहीं भारतीय धर्मशास्त्रों के संविधान सूत्रों को दरकिनार किया गया जिससे भारतीय लोगों के मनोमष्तिष्क में स्वाभाविक तौर पर कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान नहीं हो पाया नहीं तो ऐसी घटनाएं सद्यः नहीं होता धर्मशास्त्रों के संविधान सूत्रों को यदि विधी कालेजों में प्रमुखता से छात्रों को पढ़ाया गया होता अथवा इन सूत्रों को लोगों तक पहुंचाने का सरकार पहल करती तो शायद मर्यादा वाले इस देश के नौजवान इस प्रकार के कृत्य नहीं करते क्योंकि उनको संविधान सूत्रों के सम्यक संदर्भित ज्ञान होता और परीपक्वता भी सहज मिल जाता  तो दोस्तों आईए आज इसी संदर्भ में शास्त्र- सम्मत चर्चा करेंगे''
   महाभारत के आदिपर्व के ‘आस्तीक’ प्रकरण में पढ़ने को मिले हैं । उक्त प्रकरण अर्जुन के प्रपौत्र, अभिमन्यु के पौत्र, एवं परीक्षित् के पुत्र राजा जनमेजय के सर्पयज्ञ को ऋषि आस्तीक द्वारा निष्प्रभावी किये जाने से संबद्ध है । मैं संबंधित कथा का उल्लेख नहीं कर रहा हूं । केवल इतना बता दूं कि एक बार जंगल में वन्य जन्तुओं का शिकार करते हुए थके-हारे राजा परीक्षित् ने मौनव्रत के साथ तप में तल्लीन ऋषि शमीक के कंधों पर उनसे प्रत्युत्तर न पा सकने से क्रुद्ध होकर मृत सर्प डाल दिया था । घटना से क्षुब्ध ऋषिपुत्र शृंगी ने राजा परीक्षित् को शाप दे डाला था कि तक्षक नाग के डसने से उसकी मृत्यु होवे । बाद में ऋषि शमीक ने पुत्र शृंगी को समझाते हुए परीक्षित् की बतौर राजा के प्रशंसा की और शासन के लिए राजा के होने और उसके दण्ड के अधिकार से सज्जित रहने की महत्ता की बात की । उसी संदर्भ में कहे गए वचनों में से मैंने अधोलिखित तीन श्लोक चुने हैं (महाभारत, आदिपर्व, अध्याय 41):

अराजके जनपदे दोषा जायन्ते वै सदा ।
उद्वृत्तं सततं लोकं राजा दण्डेन शास्ति वै ॥२७॥

(अराजके जनपदे सदा वै दोषाः जायन्ते, राजा सततम् उद्वृत्तम् लोकम् दण्डेन वै शास्ति ।)
जिस प्रदेश में समुचित राजकीय व्यवस्था का अभाव हो वहां प्रजा में दोष या अपराध की प्रवृत्ति घर कर जाती है । उच्छृंखल या उद्धत जनसमूह को राजा ही दण्ड के प्रयोग द्वारा निरंतर अनुशासित रखता है ।

आज के युग में राजा की जगह चुने गये शासकों ने ले ली है । किंतु अपराध रोकने और अपराधियों को दण्डित करने का उनका कर्तव्य यथावत् है । दुर्भाग्य से आज हमारे देश में अपराधी को सजा देने का कार्य त्वरित एवं निर्णायक तरीके से नहीं हो रहा है ।

दण्डात् प्रतिभयं भूयः शान्तिरुत्पद्यते तदा ।
नोद्विग्नश्चरते धर्मं नोद्विग्नश्चरते क्रियाम् ॥२८॥
(दण्डात् भूयः प्रतिभयम्, तदा शान्तिः उत्पद्यते, उद्विग्नः धर्मम् न चरते, उद्विग्नः क्रियाम् न चरते ।)

दण्ड यानी सजा की व्यवस्था अधिकांशतः भय पैदा करता है और तब शान्ति स्थापित होती है । उद्विग्न या बेचैन व्यक्ति धर्माचरण नहीं करता है, और न ही ऐसा व्यक्ति अपने कर्तव्य का निर्वाह कर पाता है ।

जब दण्डित होने का भय समाज में रहता है तब लोगों में अपराध करने का साहस सामान्यतः नहीं होता है । समाज में सुरक्षा और निश्चिंतता की भावना व्याप्त रहती है । लोग उचित-अनुचित के विवेक के साथ अपने कर्तव्य का निर्वाह कर पाते हैं ।

राज्ञा प्रतिष्ठितो धर्मो धर्मात् स्वर्गः प्रतिष्ठितः ।
राज्ञो यज्ञक्रियाः सर्वा यज्ञात् देवाः प्रतिष्ठिताः ॥२९॥
(राज्ञा धर्मः प्रतिष्ठितः, धर्मात् स्वर्गः प्रतिष्ठितः, राज्ञः सर्वाः यज्ञक्रियाः, यज्ञात् देवाः प्रतिष्ठिताः ।)

राजा के द्वारा धर्म प्रतिष्ठित होता हैं और धर्म के माध्यम से स्वर्ग की प्राप्ति होती है । राजा के द्वारा ही सभी यज्ञकर्म संपन्न होते हैं और यज्ञों से ही देवतागण प्रतिष्ठित होते हैं ।

प्रथम दो श्लोकों की बातें इसी भौतिक संसार के संदर्भ में महत्त्व रखती हैं । तीसरे श्लोक में दण्ड के समुचित प्रयोग की महत्ता परलोक एवं दैवी शक्तियों के संदर्भ में कही गयी है । भारतीय दर्शन के अनुसार स्वर्ग एवं नरक जैसे परलोकों का अस्तित्व है और मनुष्य के ऐहिक कर्म ही उसके परलोक का निर्धारण करते हैं । अमूर्त दैवी शक्तियों के अस्तित्व का भी भारतीय दर्शन में स्थान है । मनुष्य के कर्म उनके प्रसाद या रोष का आधार होते हैं । चूंकि राजा लोगों को दण्ड के माध्यम से सत्कर्म में लगाए रहता है, अतः स्वर्गलोक के लिए वही परोक्षतः सहायक बनता है । सामान्यतः यज्ञ का अर्थ देवताओं को प्रसन्न करने के लिए प्रज्वलित अग्नि में डाली जाने वाली घृतादि की आहुति के कर्मकाण्ड से लिया जाता है । किंतु यज्ञ का अर्थ अधिक व्यापक भी माना जाता है । विविध प्रयोजनों के लिए किए जाने वाले कर्मों को भी यज्ञ में ही शामिल किया जाता है ।

उक्त बातों का तात्पर्य यह है कि समाज पर शासन करने का दायित्व जिन पर हो उनका कर्तव्य है कि वे अनुचित कार्यों में लिप्त लोगों को दण्डित करें और ऐसा करके आम जन को सुरक्षा का भरोसा दें । और तदनुसार दण्ड की प्रक्रियओं में दण्डाधिकारी गणों का सापेक्ष सहयोग भी देना चाहिए। -ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे , ०९८२७१९८८२८, भिलाई

ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा:

ज्योतिष शास्त्र के वैज्ञानिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा:
पंडित दयानंद शास्त्री ''ज्योतिष का सूर्य'' के स्थाई स्तंभकार लेखक






बहुत से वैज्ञानिक इस आधार पर इसे विज्ञान मानने से इनकार करते हैं कि भौतिक विज्ञान में सिद्धान्तजों एवं नियमों के आधार पर जब किसी चीज का परीक्षण किया जाता है तब एक बार जो परिणाम मिलता है वहीं परिणाम दूसरी बार परीक्षण करने पर भी प्राप्त होता है, परन्तु ज्योतिष शास्त्र में ऐसा नहीं होता है। ज्योतिष गणना में जो परिणाम एक बार आता है दूसरे ज्योतिष शास्त्री जब उसी सिद्धान्त पर फलादेश करते हैं तो फलादेश अलग आता है।
ज्योतिष शास्त्र बहुत ही गूढ और जटिल विज्ञान है इसलिए इसके सिद्धांतो एवं नियमों का पालन बहुत ही सावधानी से करना होता है। इसमें असावधानी होने पर ही इस प्रकार की सिथति पैदा हो सकता है। दूसरी तरफ ज्योतिष शास्त्र के बहुत से नियम कालान्तर में गुम हो गये हैं जिसके कारण भी भविष्य कथन में कुछ परेशानी और अन्तर हो सकता है अगर उपलब्ध नियमों एवं सिद्धान्तों को सूक्ष्मता से देखकर भविष्य कथन किया जाय तो परिणाम में अन्तर आना सम्भव नहीं है। दूसरी और भविष्य कथन का रूप अलग हो सकता है यह सम्भव है परन्तु परिणाम में समानता से इनकार नहीं किया जा सकता। अत: जो अनिशिचत फलादेश की बात कह कर ज्योतिष शास्त्र को विज्ञान मानने से इनकार करते हैं उन्हें सही नहीं कहा जा सकता।
निष्कर्ष के तौर पर देखें तो ज्योतिष शास्त्र विज्ञान कहलाने का अधिकार रखता है यह उस कसौटी पर खड़ा उतरता है जहाँ से किसी भी शास्त्र विषय को विज्ञान की संख्या प्राप्त होती है। इसे अंधविश्वास या भ्रम कहने वाले अगर साफ मन से इस विषय का अध्ययन करें तो वे इसे विज्ञान मानने से इनकार नहीं कर सकते।
पिछली दो शताब्दियों में किसी भी वस्तु, विषय या सिध्दांतों को भौतिकतावादी आधुनिक विज्ञान के कसौटी पर परखने का एक ऐसा सिलसिला प्रारंभ हुआ जिसने अनेकानेक आधारहीन अंधविश्वासों की धज्जियां उड़ाने के म में कुछ अति महत्वपूर्ण विषयों व आस्थाओं को भी संदेह
के कटघरे में खड़ा कर दिया। उसे लोग विज्ञान की नयी रोशनी कहकर संबोधित करने लगे। उसमें संसार की हर वस्तु व विषय का नये तरीके से आकलन व मूल्यांकन किया जाने लगा। उस मूल्यांकन में ज्योतिष को संभवत : सबसे अधिक तिरस्कृत व उपेक्षित विषय साबित करने की चेष्टा की गयी है। यही वजह है कि अपने आपको अत्याधुनिक व वैज्ञानिक विचारों का पोषक दिखाने के फैशन में अधिकांश लोग इस गूढ़ विद्या को मूर्खता व अंधविश्वास का पर्याय भी समझने लगे।
लेकिन यह भी एक तथ्य है कि ज्योतिष एक ऐसा विषय है जिससे प्राचीन कोई और विषय नहीं। इतिहास गवाह है कि ऐसा कोई भी समय नहीं था जब ज्योतिष का अस्तित्व नहीं था। आधुनिक विज्ञान के कसौटी पर भी इस बात की पुष्टि हो जाती है। क्योंकि ईसा से भी 25 हजार वर्ष पूर्व की कुछ ऐसी अस्थियां मिली हैं जिन पर सूर्यादि ग्रहों के ज्योतिषीय चिह्नों का अंकन पाया गया है।
प्रसन्नता की बात है कि आज जैसे -जैसे आधुनिक विज्ञान का विकास हो रहा है, उसकी पिछली धारणाओं का नयी धारणाओं से अपने आप खंडन होता जा रहा है। फलस्वरूप आज नौबत यहां तक आ पहुंची है कि वैज्ञानिकों का भी एक बड़ा वर्ग ज्योतिष को विज्ञान का दर्जा दिये जाने का पक्षधर बनता जा रहा है।
अध्यातिमक क्षेत्र मनिदर गुरूद्वारा इत्यादि से जुड़े हुए अधिकतर सन्त ज्योतिष विधाा के प्रति नकारात्मक दृषिटकोण रखते हैं। आश्चर्य तो इस बात से होता है कि उन सन्त महापुरूषों वेद-पुराणों में पूर्ण आस्था एवं विश्वास होता है परन्तु वेदों के नेत्र माने जाने वाले ज्योतिष का अपनी बुद्धि के अनुसार खण्डन करते हैं इसके पीछे कौन सा कारण है। यह विचारणीय एवं खोज का विषय है कि लेखक का अपने जीवन में ऐसे कर्इ सन्तों से सामना हुआ है जिनका कहना है कि कुछ भी है सब परमात्मा है ज्योतिष बकवास है तथा इस मनत्र का जप करो सब ठीक हो जायेगा।
समाज में एक लोकोकित बहुत प्रचलित है कि नीम, हकीम खतरा ए जान संसार में जड़-चेतन जो कुछ भी है उसका अपना एक अर्थ तथा प्रभाव है लेकिन उसका लाभ किस प्रकार से लिया जा सकता है। इसे कोर्इ विरला ही जान पाता है परमात्मा का स्थान जीवन में सर्वोच्च है। इसमें शक करने का कोइ कारण नहीं परन्तु जो एक बात हम भूल जाते हैं वो यह है कि परमात्मा हम सबका स्वामी है, सेवक नहीं सांसार में जो कुछ भी घटित होता है वह परमात्मा की इच्छा से होता है।
लेकिन परमात्मा अपनी इच्छा विशेष सेवकों को उत्पन्न करके उनके माध्यम से पूरी करता है। गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि मनुष्य को केवल कर्म करने का अधिकार है फल देने का अधिकार केवल परमात्मा के हाथों में है। ज्योतिष शास्त्र एक ऐसा दर्पण है जिसमें मनुष्य अपने कर्मों के फल को देख सकता है तथा परमात्मा की इच्छा से नवग्रहों के माध्यम से मनुष्य अपने कर्मों का अच्छा या बुरा फल भोगता है।
यह सत्य है जब तक ज्योतिष और ग्रहों के तथाकथित असर साबित नहीं हो जाते, कम से कम तब तक तो ज्योतिष विद्या एक “अप्रायोगिक-विश्वास” ही है, लेकिन सिर्फ़ यही आधार ज्योतिष को विज्ञान नहीं होना सिद्ध नहीं करता, कुछ और भी आधार हैं जिन पर विचार किया जाना आवश्यक है जिससे यह साबित किया जा सके कि ज्योतिष विज्ञान नहीं है, बल्कि कोरे अनुमान, ऊटपटाँग कल्पनायें और खोखला अंधविश्वास है । वैज्ञानिक ज्योतिष को विज्ञान का दर्जा देने से कतराते है |
क्या सत्ता में बैठा शासक वर्ग ज्योतिष को विज्ञान समझता है ? बिलकुल नहीं समझता है, अगर शासक वर्ग इसे विज्ञान समझता, तो इस क्षेत्र में कार्य करनेवालों के लिए कभी-कभी किसी प्रतियोगिता, अधिकृत संगोष्ठियों आदि का आयोजन होता और ज्योतिष क्षेत्र के विद्वानों को पुरस्कारों से सम्मानित कर प्रोत्साहित किया जाता। दुर्भाग्य की बात है कि आज तक ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। यदि पत्रकारिता के क्षेत्र में देखा जाए, तो लगभग सभी पत्रिकाएँ यदा-कदा ज्योतिष से संबंधित लेख, साक्षात्कार,भविष्यवाणियॉ आदि निकालती ही रहती है, लेकिन जब आज तक इसकी वैज्ञानिकता के बारे में कोई निष्कर्ष ही नहीं निकाला जा सका और जनता को कोई संदेश ही नहीं मिल पाया, तो ऐसे ज्योतिष से संबंधित लेख, साक्षात्कार,भविष्यवाणियॉ आदि का क्या औचित्य है ? इस तरह मूल तथ्य की परिचर्चा के अभाव में फलित ज्योतिष को जाने-अनजाने काफी नुकसान हुआ है ।
ज्योतिष के सन्दर्भ में कारण और निवारण का सिद्धान्त अपना कर भौतिक जगत की श्रेणी मे ज्योतिष को तभी रखा जा सकता है,जब उसे पूरी तरह से समझ लिया जाये |
ज्योतिष विधा की सत्यता इस बात से प्रमाणित हो जाती है कि मनुष्य की लाख इच्छा करने के बावजूद उसके जीवन में अप्रत्याशित रूप से अविश्वसनीय घटनायें घटित होती हैं। यदि हम सिद्धातों की बात करें तो किसी भी कार्य का परिणाम नियम के अनुरूप होना चाहिये परन्तु हमारी सोच एवं सिद्धान्तों के विपरीत होने वाली आश्चर्यजनक घटनायें ही ज्योतिष के असितत्व को सिद्ध करने के लिए काफी हैं। प्रत्येक मनुष्य का कुछ न कुछ सपना होता है और वह अपने सपने को यथार्थ में बदलने के लिए युकित एवं शकित का पूर्ण उपयोग करता है। इसके बावजूद स्तब्ध कर देने वाला परिणाम सामने आता है। आखिर क्यों क्योंकि हमारे असितत्व से अलग हम पर नियंत्रण करने वाली शकितयाँ ग्रहों एवं देवों, देवी-देवताओं के रूप में सृष्ट में मौजूद हैं एवं परमात्मा के संकल्पों को पूर्ण करने का उत्तरदायित्व इन्हीं शकितयों के जिम्मे होता है।
जिज्ञासा की दृषिट से एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरकर सामने आता है कि ज्योतिष और अध्यात्मक में घनिष्ठ या निकटवर्ती सम्बन्ध होने के बावजूद भी एक दूसरे से भिन्न परिणाम क्यों हैं। इसका कारण यह है कि ज्योतिष के माध्यम से हम अपने इस लोक को सुधार कर सकते हैं अर्थात जीवन में सुख-समृद्धि की प्रापित और कष्टों से निवृत्ति पा सकते हैं, जबकि अध्यात्म से परलोक सुधरता है तथा परमात्मा की कृपा एवं मुकित की प्रापित होती है। वेदों में विशेषकर कर्मकाण्ड के अन्तर्गत सकाम फल प्रापित के लिए बहुत से मन्त्र दिये गये हैं जो कि यज्ञ के दौरान आहुति में प्रयुक्त किये जाते हैं। इस सबसे यह सिद्ध होता है कि ज्योतिष शास्त्र बकवास नहीं यथार्थ है।
वास्तव में ज्योतिष विद्या न केवल विज्ञान है अपितु विज्ञानों का भी विज्ञान है। यह एक ऐसा शास्त्र है जिसे वेदों का नेत्र भी कहा गया है। वेद के छहों अंगों में ज्योतिष को नेत्र का सर्वोच्च स्थान देते हुए भारत के प्राचीन मनीषियों ने सनातन काल से इस विद्या को ज्ञान-विज्ञान , धर्म व अध्यात्म आदि विषयों में सर्वोत्कृष्ट स्थान देते हुए इसके महत्व को विशेष रूप से रेखांकित किया है। ऋग्वेद में पंचानवे हजार वर्ष पहले जो ग्रह -नक्षत्रों की स्थिति थी, उसका उल्लेख किया गया है, जिसका जिक्र करते हुए लोकमान्य तिलक ने यह अनुमान व्यक्त किया था कि हमारे वेद निश्चित रूप से पंचानवे हजार वर्ष से भी अधिक प्राचीन हैं।
सचमुच ज्योतिष कोई नवीन विज्ञान नहीं है जिसे विकसित होना है। यह एक अति प्राचीन विज्ञान है जो कभी अपने चरम उत्कर्ष पर पहुंच चुका था। कालक्रम से जिस अति प्राचीन भारतीय सभ्यता में इस विज्ञान का चरम विकास हुआ था, वह विनष्ट हो गयी। अत : इस विज्ञान की समस्त कड़ियां यकायक इधर-उधर बिखर गयीं। थोड़ी-बहुत कड़ियां जो यत्र-तत्र बिखरी रह गयीं , उन्हीं के आधार पर वर्तमान ज्योतिष विज्ञान का ताना -बाना बुना गया है और उनके गणितीय सूत्रों की सहायता से की गयी गणनाएं आज भी पूर्णत: सही सिध्द होती हैं। उपलब्ध ज्योतिष शास्त्रों में ज्योतिषीय गणित -सूत्रों के आधार पर जो फलादेश निकाले जाते हैं वे भी आश्चर्य जनक रूप से सच साबित होते हैं।
भारतीय ज्योतिष का प्राचीनतम इतिहास (खगोलीय विद्या) के रूप सुदूर भूतकाल के गर्भ मे छिपा है,केवल ऋग्वेद आदि प्राचीन ग्रन्थों में स्फ़ुट वाक्याशों से ही आभास मिलता है,कि उसमे ज्योतिष का ज्ञान कितना रहा होगा। निश्चित रूप से ऋग्वेद ही हमारा प्राचीन ग्रन्थ है,बेवर मेक्समूलर जैकीबो लुडविंग ह्विटनी विंटर निट्ज थीवो एवं तिलक ने रचना एवं खगोलीय वर्णनो के आधार पर ऋग्वेद के रचना का काल ४००० ई. पूर्व स्वीकार किया है। चूंकि ऋग्वेद या उससे सम्बन्धित ग्रन्थ ज्योतिष ग्रन्थ नही है,इसलिये उसमे आने वाले ज्योतिष सम्बन्धित लेख बहुधा अनिश्चित से है,परन्तु मनु ने जैसा कहा है कि “भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात्प्रसिद्धयति”। इससे स्पष्ट है कि वेद त्रिकाल सूत्रधर है,और इसके मंत्र द्रष्टा ऋषि भी भी त्रिकालदर्शी थे ।
ज्योतिष शास्त्र एक बहुत ही वृहद ज्ञान है। इसे सीखना आसान नहीं है। ज्योतिष शास्त्र को सीखने से पहले इस शास्त्र को समझना आवश्यक है। सामान्य भाषा में कहें तो ज्योतिष माने वह विद्या या शास्त्र जिसके द्वारा आकाश स्थित ग्रहों, नक्षत्रों आदि की गति, परिमाप, दूरी इत्या‍दि का निश्चय किया जाता है।
ज्योतिष शास्त्र की व्युत्पत्ति ‘ज्योतिषां सूर्यादि ग्रहाणां बोधकं शास्त्रम्‌’ की गई है। हमें यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि ज्योतिष भाग्य या किस्मत बताने का कोई खेल-तमाशा नहीं है। यह विशुद्ध रूप से एक विज्ञान है। ज्योतिष शास्त्र वेद का अंग है। ज्योतिष शब्द की उत्पत्ति ‘द्युत दीप्तों’ धातु से हुई है। इसका अर्थ, अग्नि, प्रकाश व नक्षत्र होता है। शब्द कल्पद्रुम के अनुसार ज्योतिर्मय सूर्यादि ग्रहों की गति, ग्रहण इत्यादि को लेकर लिखे गए वेदांग शास्त्र का नाम ही ज्योतिष है।
छः प्रकार के वेदांगों में ज्योतिष मयूर की शिखा व नाग की मणि के समान सर्वोपरी महत्व को धारण करते हुए मूर्धन्य स्थान को प्राप्त होता है। सायणाचार्य ने ऋग्वेद भाष्य भूमिका में लिखा है कि ज्योतिष का मुख्य प्रयोजन अनुष्ठेय यज्ञ के उचित काल का संशोधन करना है। यदि ज्योतिष न हो तो मुहूर्त, तिथि, नक्षत्र, ऋतु, अयन आदि सब विषय उलट-पुलट हो जाएँ।
ज्योतिष शास्त्र के द्वारा मनुष्य आकाशीय-चमत्कारों से परिचित होता है। फलतः वह जनसाधारण को सूर्योदय, सूर्यास्त, चन्द्र-सूर्य ग्रहण, ग्रहों की स्थिति, ग्रहों की युति, ग्रह युद्ध, चन्द्र श्रृगान्नति, ऋतु परिवर्तन, अयन एवं मौसम के बारे में सही-सही व महत्वपूर्ण जानकारी दे सकता है। इसलिए ज्योतिष विद्या का बड़ा महत्व है ।
महर्षि वशिष्ठ का कहना है कि प्रत्येक ब्राह्मण को निष्कारण पुण्यदायी इस रहस्यमय विद्या का भली-भाँति अध्ययन करना चाहिए क्योंकि इसके ज्ञान से धर्म-अर्थ-मोक्ष और अग्रगण्य यश की प्राप्ति होती है। एक अन्य ऋषि के अनुसार ज्योतिष के दुर्गम्य भाग्यचक्र को पहचान पाना बहुत कठिन है परन्तु जो जान लेते हैं, वे इस लोक से सुख-सम्पन्नता व प्रसिद्धि को प्राप्त करते हैं तथा मृत्यु के उपरान्त स्वर्ग-लोक को शोभित करते है |
ग्रह नक्षत्रों के परिज्ञान से काल का उद्बोधन करने वाला शास्त्र ज्योतिष शास्त्र ही है। प्रन्तु उस उद्बोधन के साथ आकाशीय चमत्कार को देखने के लिये गणित ज्योतिष के तीन भेद किये गये हैं:-
१.सिद्धान्त गणित–
जिस गणित के द्वारा कल्प से लेकर आधुनैक काल तक के किसी भी इष्ट दिन के खगोलीय स्थितिवश गत वर्ष मास दिन आदि सौर सावन चान्द्रभान को ज्ञात कर सौर सावन अहर्गण बनाकर मध्यमादि ग्रह स्पष्टान्त कर्म किये जाते है,उसे सिद्धान्त गणित कहा जाता है।
२. तंत्र गणित–
जिस तंत्र द्वारा वर्तमान युगादि वर्षों को जानकर अभीष्ट दिन तक अहर्गण या दिन समूहों के ज्ञान के मध्यमादि ग्रह गत्यादि चमत्कार देखा जाता है,उसे तंत्र गणित कहा जाता है।
३. करण गणित
वर्तमान शक के बीच में अभीष्ट दिनों को जानकर अर्थात किसी दिन वेध यंत्रों के द्वारा ग्रह स्थिति देख कर और स्थूल रूप से यह ग्रह स्थिति गणित से कब होगी,ऐसा विचार कर तथा ग्रहों के स्पष्ट वश सूर्य ग्रहण आदि का विचार जिस गणित से होता है,उसे करण गणित कहते हैं ।तंत्र तथा करण ग्रन्थों का निर्माण वेदों से हजारों वर्षों के उपरान्त हुआ,अत: इस पर विचार न करके वेदों में सिद्धान्त गणित सम्बन्धी बीजों का अन्वेषण आवश्यक होगा। वेदों में सूर्य के आकर्षण बल पर आकाश में नक्षत्रों की स्थिति का वर्णण मिलता है ।
संपूर्ण भारतीय ज्योतिषशास्त्र को मूलतः तीन भागों में बाँटा जा सकता है—
(१) सिद्धान्त ज्योतिष:-
काल गणना की एक विशेष सूक्ष्म माप त्रुटि से लेकर प्रलय के अन्त तक कालों का आकलन, उनका मान, उनका भेद, उनका चार (चलन), आकाश में उनकी गति आदि क्रम से द्विविध प्रकार की गणित से उनके प्रश्न तथा उत्तर जिसमें निहित है। पृथ्वी और आकाश के मध्य स्थित ग्रहों का जिसमें कथन और उनको जानने, वैध करने का यन्त्र आदि वस्तुओं का जिसमें गणित निहित हो, उस प्रबन्ध को विद्वानों ने सिद्धान्त रूप से अभिहित किया है।
सिद्धान्त ज्योतिष के प्रमुख ग्रन्थों के नाम:–सिद्धान्त ग्रन्थों में सूर्य सिद्धान्त, वशिष्ठ सिद्धान्त, ब्रह्म सिद्धान्त, रोमक सिद्धान्त, पौलिश सिद्धान्त, ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त, पितामह सिद्धान्त आदि प्रसिद्ध सिद्धान्त ग्रन्थ हैं ।
सिद्धान्त ज्योतिष के प्रमुख आचार्यों के नाम:–
जिन्होंने ज्योतिष शास्त्र को चलाया ऐसे ज्योतिष शास्त्र के 18 प्रवर्तक आचार्य माने जाते हैं। ये हैं- ब्रह्मा, आचार्य, वशिष्ठ, अत्रि, मनु, पौलस्य,रोमक, मरीचि, अंगिरा, व्यास, नारद, शौनक, भृगु, च्यवन, यवन, गर्ग, कश्यप और पाराशर |
(२) संहिता ज्योतिष:–
ग्रहों की चाल, वर्ष के लक्षण, तिथि, वार, नक्षत्र, योग, कण, मुहूर्त, ग्रह-गोचर भ्रमण, चन्द्र ताराबल, सभी प्रकार के लग्नों का निदान, कर्णच्छेद, यज्ञोपवीत, विवाह इत्यादि संस्कारों का निर्णय तथा पशु-पक्षी चेष्टा ज्ञान, शकुन विचार, रत्न विद्या, अंग विद्या, आकार लक्षण, पक्षी व मनुष्य की असामान्य चेष्टाओं का चिन्तन संहिता विभाग का विषय है।
संहिता ज्योतिष के प्रमुख ग्रन्थों के नाम:-
संहिता ग्रन्थों में वृहत्संहिता, कालक संहिता, नारद संहिता, गर्ग संहिता, भृगु संहिता, अरुण संहिता, रावण संहिता, लिंग संहिता, वाराही संहिता, मुहूर्त चिन्तामण इत्यादि प्रमुख संहिता ग्रन्थ हैं।
संहिता ज्योतिष के प्रमुख आचार्यों के नाम:-
मुहूर्त गणपति, विवाह मार्तण्ड, वर्ष प्रबोध, शीघ्रबोध, गंगाचार्य, नारद, महर्षि भृगु, रावण, वराहमिहिराचार्य सत्य-संहिताकार रहे हैं ।
(३) होरा शास्त्र:-
राशि, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, चलित, द्वादशभाव, षोडश वर्ग, ग्रहों के दिग्बल, काल बल, चेष्टा बल, ग्रहों के धातु, द्रव्य, कारकत्व, योगायोग, अष्टवर्ग, दृष्टिबल, आयु योग, विवाह योग, नाम संयोग, अनिष्ट योग, स्त्रियों के जन्मफल, उनकी मृत्यु नष्टगर्भ का लक्षण प्रश्न एवं ज्योतिष के फलित विषय पर जहाँ विकसित नियम स्थापित किए जाते हैं, वह होरा शास्त्र कहलाता है ।
होरा शास्त्र के प्रमुख ग्रन्थों के नाम:-
सबसे प्रसिद्ध ग्रन्थ वृहद पाराशर होरा शास्त्र मानसागरी, सारावली, वृहत्जातक, जातकाभरण, चमत्कार चिन्तामणि, ज्योतिष कल्पद्रुम, जातकालंकार, जातकतत्व होरा शास्त्र इत्यादि हैं।
होरा शास्त्र के प्रमुख आचार्यों के नाम:-पुराने आचार्यों में पाराशर, मानसागर, कल्याणवर्मा, दुष्टिराज, रामदैवज्ञ, गणेश, नीपति आदि हैं |
इन तीन स्कन्धों वाला उत्तम भारतीय ज्योतिषशास्त्र ही वेदों का पवित्र नेत्र कहा गया है ।
क्या ज्योतिष नक्षत्र विज्ञान हें..????
विज्ञान उसे कहते हैं जिनका प्रयोगशाला में परीक्षण किया जा सके और उसके प्रभाव का अध्ययन सम्भव हो। ज्योतिष शास्त्र के आलोचक इस आधार पर भी इसे विज्ञान मानने से इनकार करते हैं कि ज्योतिष शास्त्र के सिद्धान्तों और नियमों का भौतिक प्रयोगशाला में परीक्षण नहीं किया जा सकता है। यही सत्य है कि ज्योतिष विज्ञान का भौतिक प्रयोगशाला में परीक्षण नहीं होता परन्तु इस विज्ञान में भी कारण और प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखार्इ देता है। इस विज्ञान के प्रयोग में गुरूत्वाकर्षण को कारण माना जाता है व शरीर को वस्तु जिसके ऊपर अंतरिक्षीय तत्वों के प्रभाव का पौराणिक नियम एवं सिद्धान्त के आधार पर विश्लेषण किया जाता है। इस आधार पर भौतिक विज्ञान के नियमों को मानने वाले ज्योतिष शास्त्र को विज्ञान कह सकते हैं।
ज्योतिष शास्त्र यूँ तो एक प्रकार का विज्ञान है फिर भी आधुनिक वैज्ञानिक दृषिट रखने वाले बहुत से व्यकित इसे अंधविश्वास और वहम मानते हैं इस विज्ञान के प्रति आलोचनात्मक दृषिट रखने वालों में ऐसे लोग मुख्य रूप से है जिनके लिए ज्योतिष शास्त्र पढ़ पाना और समझना कठिन होता है। बहुत से आलोचक ज्योतिष के सिद्धान्तों की हंसी उड़ाते हैं कि यह कैसे सम्भव है कि किसी के भविष्य को आप देख रकते हैं। आलोचनात्मक दृषिट रखने वाले लोग ज्योतिष विज्ञान को कोरी कल्पना और ठगी मानते हैं।
ज्योतिष विज्ञान की आलोचना करने वाले भले ही अपने अपने तर्क दें परन्तु यह भी गौर करने वाली बात है कि ऐसा कौन सा विज्ञान और सिद्धान्त है जो आलोचनाओं से बचा हुआ है। आलोचना ही सिद्धान्तों एवं विज्ञान को बल प्रदान करता है आवश्यकता यह है कि आलोचनात्मक दृषिट रखने वालों को इस विज्ञान के प्रति मन साफ करना चाहिए और खुले मन से इसका अध्ययन करना चाहिए। इससे वे समझ पायेंगे कि ज्योतिष किस प्रकार विकसित और रहस्यों से भरा विज्ञान है, यह विज्ञान पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण बल के आधार पर कार्य करता है।
सिद्धान्तों नियमों प्रयोगों समालोचनाओं एवं प्रेक्षण के आधार पर जो ज्ञान प्राप्त किया जाता है, वह विज्ञान है ज्योतिषशास्त्र इन सभी कसौटियों पर खड़ा उतरता है जिसेस इस विज्ञान कहा जा सकता है।विज्ञान की परिभाषा के अनुसार ‘सिद्धांतों, नियमों, प्रयोगों, समालोचनाओं एवं प्रेक्षण के आधार पर जो ज्ञान प्राप्त किया जाता है वह विज्ञान है’ | अब हमें यह विचार करना है कि क्या ज्योतिषशास्त्र इन सभी कसौटियों पर खड़ा उतरता है जिससे इसे विज्ञान कहा जा सकता है |
इसके लिए आइये कुछ तथ्यों पर विश्लेषण करते है —-
(१) समस्त ब्रह्मांड की अति सूक्षम हलचल का प्रभाव भी पृथ्वी पर पडता है,सूर्य और चन्द्र का प्रत्यक्ष प्रभाव हम आसानी से देख और समझ सकते है,सूर्य के प्रभाव से ऊर्जा और चन्द्रमा के प्रभाव से समुद में ज्वार-भाटा को भी समझ और देख सकते है,जिसमे अष्ट्मी के लघु ज्वार और पूर्णमासी के दिन बृहद ज्वार का आना इसी प्रभाव का कारण है,पानी पर चन्द्रमा का प्रभाव अत्याधिक पडता है,मनुष्य के अन्दर भी पानी की मात्रा अधिक होने के कारण चन्द्रमा का प्रभाव मानव मस्तिष्क पर भी पडता है,पूर्णमासी के दिन होने वाले अपराधों में बढोत्तरी को आसानी से समझा जा सकता है,जो पागल होते है उनके असर भी इसी तिथि को अधिक बढते है,आत्महत्या वाले कारण भी इसी तिथि को अधिक होते है,इस दिन स्त्रियों में मानसिक तनाव भी अधिक दिखाई देता है,इस दिन आपरेशन करने पर खून अधिक बहता है,शुक्ल पक्ष मे वनस्पतियां अधिक बढती है,सूर्योदय के बाद वन्स्पतियों और प्राणियों में स्फ़ूर्ति का प्रभाव अधिक बढ जाता है,आयुर्वेद भी चन्द्रमा का विज्ञान है जिसके अन्तर्गत वनस्पति जगत का सम्पूर्ण मिश्रण है,कहा भी जाता है कि “संसार का प्रत्येक अक्षर एक मंत्र है,प्रत्येक वनस्पति एक औषधि है,और प्रत्येक मनुष्य एक अपना गुण रखता है,आवश्यकता पहिचानने वाले की होती है”,’ग्रहाधीन जगत सर्वम”,विज्ञान की मान्यता है कि सूर्य एक जलता हुआ आग का गोला है,जिससेसभी ग्रह पैदा हुए है,गायत्री मन्त्र मे सूर्य को सविता या परमात्मा माना गया है,रूस के वैज्ञानिक “चीजेविस्की” ने सन १९२० में अन्वेषण किया था,कि हर ११ साल में सूर्य में विस्फ़ोट होता है,जिसकी क्षमता १००० अणुबम के बराबर होती है,इस विस्फ़ोट के समय पृथ्वी पर उथल-पुथल,लडाई झगडे,मारकाट होती है,युद्ध भी इसी समय मे होते है,पुरुषों का खून पतला हो जाता है,पेडों के तनों में पडने वाले वलय बडे होते है,श्वास रोग सितम्बर से नबम्बर तक बढ जाता है,मासिक धर्म के आरम्भ में १४,१५,या १६ दिन गर्भाधान की अधिक सम्भावना होती है |
(२) विज्ञान की परिभाषा के अनुसार विज्ञान उसे कहते हैं जिनका प्रयोगशाला में परीक्षण किया जा सके और उसके प्रभाव का अध्ययन संभव हो | ज्योतिषशास्त्र के आलोचक इस आधार पर भी इसे विज्ञान मानने से इंकार करते हैं कि ज्योतिषशास्त्र के सिद्धान्तों एवं नियमों का भौतिक प्रयोगशाला में परीक्षण नहीं किया जा सकता है | यह सही है कि ज्योतिष विज्ञान का भौतिक प्रयोगशाला मे परीक्षण नहीं होता, परंतु इस विज्ञान में भी कारण और प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते है | इस विज्ञान के प्रयोग में गुरूत्वाकर्षण को कारण माना जाता है व शरीर को वस्तु जिसके उपर अंतरिक्षीय तत्वों के प्रभाव का पौराणिक नियमों एवं सिद्धांतों के आधार पर विश्लेषण किया जाता हैं | इस आधार पर भौतिक विज्ञान के नियमों को मानने वाले ज्योतिषशास्त्र को विज्ञान कह सकते हैं |
(३) विभिन्न ग्रहों की एक खास अवधि में निश्चित भूमिका को देखते हुए ही ‘गत्यात्‍मक दशा पद्धति की नींव रखी गयी। अपने दशाकाल में सभी ग्रह अपने गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति के अनुसार ही फल दिया करते हैं। उपरोक्त दोनो वैज्ञानिक आधार प्राप्त हो जाने के बाद भविष्यवाणी करना काफी सरल होता चला गया। ‘ गत्यात्मक दशा पद्धति ’ में नए-नए अनुभव जुडत़े चले गए और शीघ्र ही ऐसा समय आया ,जब किसी व्यक्ति की मात्र जन्मतिथि और जन्मसमय की जानकारी से उसके पूरे जीवन के सुख-दुख और स्तर के उतार-चढ़ाव का लेखाचित्र खींच पाना संभव हो गया। धनात्मक और ऋणात्मक समय की जानकारी के लिए ग्रहों की सापेक्षिक शक्ति का आकलण सहयोगी सिद्ध हुआ ।
(४) ज्योतिषियों के एक वर्ग की मान्यता है कि ज्योतिष और जड़ी-बूटियों की मदद से ब्लड कैंसर और अन्य गंभीर रोगों का भी इलाज संभव है। जातक की पत्रिका में यदि चंद्र और मंगल कमजोर स्थिति में हों और शनि रोग, मृत्यु या व्यय के घर में बैठे हैं तो व्यक्ति को ब्लड कैंसर की पूरी-पूरी आशंका रहती है । कुंडली में कमजोर चंद्र सफ़ेद रक्त कण को कम करता है तथा मंगल के कमजोर होने की स्थिति में व्यक्ति के शरीर में लाल रक्त कण कम होते हैं ।
(५) अधिकांश वैज्ञानिक इस आधार पर इसे विज्ञान मानने से इंकार करते हैं कि भौतिक विज्ञान में सिद्धांतों एवं नियमों के आधार पर जब किसी चीज का परीक्षण किया जाता है तब एक बार जो परिणाम मिलता है वही परिणाम दूसरी बार परीक्षण करने पर भी प्राप्त होता है, परंतु ज्योतिषशास्त्र में ऐसा नहीं होता है | जब कि ज्योतिष गणना में जो परिणाम एक बार आता है दूसरे ज्योतिषशास्त्री जब उसी सिद्धांत पर फलादेश करते हैं तो फलादेश अलग आता है | यदि ज्योतिषशास्त्र के उपलब्ध नियमों एवं सिद्धांतों को सूक्ष्मता से देखकर भविष्य कथन किया जाय तो परिणाम में अंतर आना संभव नहीं है, अत: जो अनिश्चित फलादेश की बात कह कर ज्योतिषशास्त्र को विज्ञान मानने से इंकार करते हैं उन्हें सही नहीं कहा जा सकता |
(६) अरबों-खरबों रुपये के खर्च पर पलनें वाला विज्ञान अभी तक यह भी नहीं जानता कि मंगल लाल क्यों दिखता है, शनि चित्र-विचित्र रंगों से युक्त क्यों है, बृहस्पति पीला क्यों दिखता है आदि और इनका पृथ्वी और पृथ्वी पर रहनें वालों पर क्या कोई प्रभाव पड़ता है ? वह भी तब जब वह इसी सौरमण्डल के सदस्य हैं जिसमें हमारी पृथ्वी है। अनेकानेक प्रश्न हैं जिन्हें विज्ञान जानने का प्रयास कर रहा है और यह प्रयास जारी रहनें भी चाहिये | परन्तु ज्योतिषशास्त्र में आधुनिक वैज्ञानिक साधनों के अभाव में हजारों वर्ष पूर्व इन सभी प्रश्नों का समुचित उत्तर दे दिया गया था |
(७) वर्तमान समय में जो पंचांग बन रहे हैं, वह लगभग सभी लहरी एफेमरी जो नाटिकल एल्मनॅक पर आधारित है । कम्प्यूटर प्रोग्राम में भी डाटाबेस यही एफेमेरी/अल्म है अतः समान चूक वहाँ भी हो गयी है। ज्योतिष गणना में ग्रह आकाश में सदैव एक निश्चित गति से चलते हैं यह ज्योतिष गणना का मुख्य आधार है। अन्तरिक्ष में, सौर धब्बो के अधिक बनने/ कम बननें या किसी केतु (कामेट) के संचरण या अन्य किसी अभिनव खगोलीय घटना वश ग्रहों की गति, भ्रमण स्थिति आदि पर विचलनकारी प्रभाव पड़्ते हैं, उनका आँकलन तभी संभव है जब प्राचीन ज्योतिष गणना पद्धति के अनुसार दृग ज्योतिषीय आधार पर पंचांग निर्मित हों और कम्प्यूटर प्रोग्राम में भी डाटाबेस यही प्राचीन ज्योतिष गणना पद्धति के अनुसार प्रोग्रामिंग की जाये।
(८) वर्तमान विज्ञान ने एक चमत्कारी बात का पता लगाया है कि शनि के दोनों ध्रुवों पर नीली रौशनी चमकती है । अभी हाल ही में आधुनिक और शक्तिशाली हबल टेलिस्कोप से नासा को भेजी गई तस्वीरों ने आश्चर्यजनक और हैरानी में डालने वाला खुलासा किया है | इन तस्वीरों से यह ज्ञात हुआ है कि शनिवार के दिन शनि के दोनों ध्रुवों पर नीली चमकदार रौशनी आश्चर्यजनक तरीके से बढ़ जाती है | यह रौशनी बिल्कुल वैसी ही है, जैसी कि हमारी पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के आकाश में दिखाई देती है । शनिवार की ये रौशनी कई गुना तेज़ क्यों हो जाती है इस बारे में विज्ञान अभी तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया है । यह तो स्पष्ट है कि विज्ञान के पास शनि की नीली रौशनी का कोई जवाब नहीं है, लेकिन ज्योतिषशास्त्र के पास है | हज़ारों साल से ही ज्योतिषशास्त्र ने शनि का रंग काला और नीला बताया है । शनि का प्रकोप शांत करने वाला रत्न नीलम है और शनि में दिखने वाली नीली रौशनी भी कुछ कुछ वैसी ही दिखती है। ज्योतिष में शनिवार के दिन का स्वामी भगवान शनि को ही माना जाता है | ज्योतिषशास्त्र मानता है कि शनिवार का स्वामी होने के कारण शनिवार को शनि देव की शक्ति का प्रभाव काफी ज्यादा रहता है । विज्ञान के क्षेत्र में इन तथ्यों को स्वीकार नहीं किया जाता है लेकिन इनका कोई समुचित उत्तर भी नहीं है |
(९) वैज्ञानिकों तक मंगल की धरती से पहुंची जानकारी कहती है कि मंगल की सतह लाल है | मंगल की सतह से मंगल का आकाश भी लाल ही दिखता है | ज्योतिषशास्त्र ने हज़ारों साल पहले कैसे मंगल का रंग लाल मान लिया । ज्योतिषशास्त्र में ये सिद्धांत लिख दिया कि लाल रंग के कपड़े के दान से मंगल ग्रह की शांति होती है और कैसे लाल रंग के मूंगे को मंगल का रत्न मान लिया गया । जब ज्योतिषशास्त्र ने ये नियम बनाए गए थे, तब मंगल ग्रह की कोई भी तस्वीर मौजूद नहीं थी । अब मंगल ग्रह की मिट्टी की जांच कर रहे वैज्ञानिक मानते हैं कि मंगल की ज़मीन में सोना और तांबा जैसी धातुओं की मात्रा हो सकती है और ज्योतिष के मुताबिक तांबा या सोने में ही मंगल के रत्न मूंगे को धारण किया जाता है । सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि बिना मंगल को समझे कोई कैसे उसे लाल रंग से जोड़ सकता है । ज्योतिषशास्त्र ने मंगल को हमेशा से एक गर्म और उग्र ग्रह माना है जो जोश हिंसा और युद्ध का कारक है और अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों को अब जाकर ये जानकारी मिली है कि मंगल की सतह पर तापमान बहुत ज्यादा रहता है और साथ ही साथ मंगल के वातावरण में समय-समय पर भयानक तूफान उठते रहते हैं । अब हज़ारों साल पहले ज्योतिषशास्त्र के सिद्धांत लिखने वालों के पास ये जानकारियां ज्योतिषशास्त्र के वैज्ञानिक-दृष्टिकोण को ही पुष्ट करता है ।
ज्योतिष को विज्ञान कहने के लिये इतने सब कारण क्या पर्याप्त नही है ? इतने विश्लेषण के पश्चात् मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि ज्योतिषशास्त्र निश्चित रूप से विज्ञान कहलाने का अधिकार रखता है यह उस कसौटी पर खड़ा उतरता है जहां से किसी भी शास्त्र विषय को विज्ञान की संज्ञा प्राप्त होती है | ज्योतिषशास्त्र को अंधविश्वास या भ्रम कहने वाले अगर साफ मन से इस विषय का अध्ययन करें तो वे इसे विज्ञान मानने से इंकार नहीं कर सकते हैं | मुझे यह कहने में तनिक संकोच नहीं है कि ज्योतिषशास्त्र कभी एक निश्चित सिद्धांतों पर आधारित विज्ञान रहा था जिसकी रचना करने वालों के पास आकाशगंगा को समझने का कोई न कोई सशक्त माध्यम अवश्य था और अब तो बॉम्बे हाईकोर्ट भी ज्योतिष को विज्ञान होने की मान्यता दे चुका है । दुनिया भर के वैज्ञानिक भले ही ज्योषित को विज्ञान मानने से इनकार करते हों, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि ज्योतिष एक विज्ञान है। अदालत ने ज्योतिषशास्त्र को विज्ञान के रूप में दी गई मान्यता रद्द करने के लिए दायर जनहित याचिका खारिज कर दी। जनहित मंच नामक गैर सरकारी संगठन की इस याचिका में फर्जी ज्योतिषियों, तांत्रिकों और वास्तुशास्त्री पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी ।
बॉम्बे हाईकोर्ट की पीठ ने कहा कि जहां तक ज्योतिष शास्त्र से जुड़े आग्रह का सवाल है तो सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस मुद्दे पर विचार कर चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने भीज्योतिष को विज्ञान बताया है। शीर्ष अदालत ने वर्ष २००४ ईस्वी में विश्वविद्यालयों को निर्देश भी दिया था कि वे ज्योतिष विज्ञान को अपने पाठ्यक्रम में शामिल करने पर विचार करें । पीठ ने इस संबंध में केंद्र सरकार की ओर से दाखिल शपथ पत्र का भी हवाला दिया ।
सरकार ने शपथ पत्र में कहा है कि ज्योतिषशास्त्र चार हजार साल पुराना विश्वसनीय विज्ञान है और यह दवा व जादुई उपचार अधिनियम (आपत्तिजनक विज्ञापन) सन १९५४ ईस्वी के तहत नहीं आता । इसमें कहा गया है कि इस कानून के दायरे में ज्योतिष शास्त्र और संबंधित विज्ञान नहीं आते हैं । ज्योतिष शास्त्र जैसे समय की कसौटी पर परखे गए विज्ञान पर प्रतिबंध का विचार अनुचित व अन्यायपूर्ण है । यह याचिका जनहित मंच के संयोजक भगवानजी रैयानी और उनके सहयोगी दत्ताराम ने दायर की थी ।
पेस इंटर एस्ट्रोमेडिकल एसोसिएशन गुजरात की अध्यक्ष एवं भारतीय प्राच्य ज्योतिष शोध संस्थान की गुजरात प्रभारी श्रीमती सोनी ने ज्योतिष से जुड़े प्रश्न ‘ज्योतिष विज्ञान है, गणित है अथवा ढकोसला है ?’ के प्रत्युत्तर में उन्होंने कहा कि “ज्योतिष ढकोसला नहीं है, यह विज्ञानसम्मत शास्त्र है। इसका उद्‍देश्य जनता के बीच व्याप्त अंधविश्वास को दूर करना है तथा भविष्य की गतिविधियों से परिचित कराना है। ज्यो‍‍तिष विज्ञान से भी पुराना विषय है। वर्तमान में भारत में ही नहीं, दुनिया के अन्य देशों में भी ज्योतिष को मान्यता मिली हुई है ।”
अत: यह कहा जा सकता है कि वर्तमान विज्ञान की नई शोध और खोजें ज्योतिष के पूर्व धारणाओं को पुष्ट करने हेतु सबूत इकट्ठे कर रही हैं और एक दिन ज्योतिष फिर से अपनी पुरानी गरिमा को अवश्य प्राप्त कर सकेगा । ज्योतिष समय का विज्ञान है, इसमें तिथि, वार, नक्षत्र, योग और कर्म इन पांच चीजों का अध्ययन कर भविष्य में होने वाली घटनाओं की जानकारी दी जाती है। यह किसी जाति या धर्म को नहीं मानता। वेद भगवान भी ज्योतिष के बिना नहीं चलते। वेद के छः अंग हैं, जिसमें छठा अंग ज्योतिष है। हमने पूर्व जन्म में क्या किया और वर्तमान में क्या कर रहे हैं, इसके आधार पर भविष्य में क्या परिणाम हो सकते हैं, इसकी जानकारी दी ‘जाती है ।
निष्कर्ष के तौर देखें तो ज्योतिषशास्त्र विज्ञान कहलाने का अधिकार रखता है यह उस कसौटी पर खड़ा उतरता है जहां से किसी भी शास्त्र विषय को विज्ञान की संज्ञा प्राप्त होती है. इसे अंधविश्वास या भ्रम कहने वाले अगर साफ मन से इस विषय का अध्ययन करें तो वे इसे विज्ञान मानने से इंकार नहीं कर सकते.
साभार : “विनायक वास्तु टाईम्स”