ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

!!विशेष सूचना!!
नोट: इस ब्लाग में प्रकाशित कोई भी तथ्य, फोटो अथवा आलेख अथवा तोड़-मरोड़ कर कोई भी अंश हमारे बगैर अनुमति के प्रकाशित करना अथवा अपने नाम अथवा बेनामी तौर पर प्रकाशित करना दण्डनीय अपराध है। ऐसा पाये जाने पर कानूनी कार्यवाही करने को हमें बाध्य होना पड़ेगा। यदि कोई समाचार एजेन्सी, पत्र, पत्रिकाएं इस ब्लाग से कोई भी आलेख अपने समाचार पत्र में प्रकाशित करना चाहते हैं तो हमसे सम्पर्क कर अनुमती लेकर ही प्रकाशित करें।-ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे, सम्पादक ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका,-भिलाई, दुर्ग (छ.ग.) मोबा.नं.09827198828
!!सदस्यता हेतु !!
.''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका के 'वार्षिक' सदस्यता हेतु संपूर्ण पता एवं उपरोक्त खाते में 220 रूपये 'Jyotish ka surya' के खाते में Oriental Bank of Commerce A/c No.14351131000227 जमाकर हमें सूचित करें।

ज्योतिष एवं वास्तु परामर्श हेतु संपर्क 09827198828 (निःशुल्क संपर्क न करें)

आप सभी प्रिय साथियों का स्नेह है..

मंगलवार, 30 मई 2017

आप 'हिन्दुत्व' को समझने के लिये इस लेख को जरूर पढें........

Pandit Vinod Choubey

आप 'हिन्दुत्व' को समझने के लिये इस लेख को जरूर पढें........

प्रात: वंदन के साथ सुप्रभात *अन्तर्नाद* (व्हाट्सएप्प ग्रुप)  मंच साथियों आईये हिन्दु शब्द की व्याख्या को समझें..हर हिंदू को इसका ज्ञान होना नितांत आवश्यक है..........
हमारे शिष्य मनोज जी ( निवासी शांतिनगर,भिलाई ) ने प्रश्न किया कि - आदरणीय पण्डित जी ये बतायें की हिंदु शब्द का सिंधु शब्द से क्या संबंध है..? और हिंदुत्व की संस्कृति यानी हिंदु विचारधारा वाले सनातन धर्म को फॉलो करने वाले लोगों की जीवन यापन सभ्यता सबसे प्राचीन क्यों मानी जाती है...?
वैदिक शब्द 'हिंदु' सिंधु से बना है.....
रमेश जी, जब मैं वाराणसी के कमच्छा स्थित 'रणवीर संस्कृत महाविद्यालय' में प्रवेशिका द्वितीय वर्ष का छात्र था तो उस समय व्याकरण के गुरुजी आदरणीय श्री शेषनाथ मिश्र जी हुआ करते थे उन्होंने इसकी व्याख्या कुछ इप्रकार की - वैदिक शब्द 'हिंदु' सिंधु से बना है। संस्कृत मे प्रत्येक शब्द की उत्पत्ति के पीछे एकविज्ञान है, जिसे शब्द व्युत्पत्ति कहते हैं। जैसे-"पत्नात त्रायते सा पत्नी" वैदिक व्याकरण मे शब्दउत्पत्ति का आधार ध्वनि विज्ञान (नादविज्ञान) है, ध्वनि उत्पत्ति, उद्गम, आवृत्ति, ऊर्जाआदि के आधार पर ध्वनि परिवर्तन से समानार्थी वनए शब्दों की उत्पत्ति होती है, जैसे सरित(नदी)शब्द की उत्पत्ति हरित शब्द से हुई है। "हरितो नरह्यॉ"( अथर्ववेद 20.30.4) की व्याख्या मे निघंटु मेस्पष्ट है "सरितों हरितो भवन्ति"॥ वैदिक व्याकरणके संदर्भ में निघंटु का निर्देश (नियम) है कि "स" कईस्थानों पर "ह" ध्वनि में परिवर्तित हो जाता है। इसप्रकार अन्य स्थानों मे भी "स" को "ह" व "ह" को"स" लिखा गया है। . सरस्वती को हरस्वती- "तंममर्तुदुच्छुना हरस्वती" (ऋग. 2।23।6), श्री कोह्री- "ह्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ" आदि-आदि॥इसी प्रकार हिन्दू शब्द वैदिक सिंधु शब्द कीउत्पत्ति है क्योंकि सिंधु शब्द से हिंदुओं का सम्बोधनविदेशी आरंभ नहीं है जैसा कि इतिहास मे बताने काप्रयास होता है वरन वैदिक सम्बोधन है। "नेतासिंधूनाम" (ऋग 7.5.2), "सिन्धोर्गभोसिविद्दुताम् पुष्पम्"(अथर्व 19.44.5) फारसी मे हिन्दूशब्द का अर्थ काफिर चोर कालान्तर में किया गयाहै, ऐसा नहीं कि हिन्दू फारसी का मूल शब्द इसीभाव में है। फारसी में "स" के स्थान पर "ह" प्रचलन मेंआ गया, संभवतः संस्कृत व्याकरण के उपरोक्त नियमने फारसी में नियमित स्थान बना लिया होगा!


'हिन्दू' शब्द का अन्य भाषाविज्ञानियों ने अनर्थ किया......

रमेशजी, यदि इसी संदर्भ को आज के आधुनिक भाषा विज्ञानियों की मानें तो...भाषाविज्ञान जानने वाले लोग जानते हैं कि"इंडो-यूरोपियन"परिवार की सभी भाषाओं कीउत्पत्ति संस्कृत से ही मानी जाती है अथवा संस्कृतके किसी पूर्व प्रारूप से! वास्तव में फारसी में हिन्दूका भ्रष्ट अर्थ घृणा के आधार पर काफी बाद मेंकिया गया जो वैमनस्यता वश इस प्रकार किये गये अवर्थ से 'हिंदुत्व' पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा वरन यह तकरीबन ५ से ६ हजार वर्ष से पुरानी "हिंदू- संस्कृति" होने का गौरव भी प्राप्त हुआ जिसे कईयों बार मिटाने के बहुत प्रयास हुये किन्तु  सभी को विफलता ही हाथ लगी..!
इस विषय पर जब और गहन अध्ययन करने की तिव्र इच्छा हुई तो मैं इसके लिये 'काशी हिंदू विश्वविद्यालय'  के ग्रंथालय में  गया तो वहां भारतीय संस्कृत साहित्य के सभी विषयों को स्पर्श करने वाले श्री माधवाचार्य जी का एक ग्रंथ मिला जिसमें आर्य धर्मेतर लेखकों द्वारा 'हिदुत्व' पर किये गये वैचारिक व लेखनी प्रहार के बारे में विशद वर्णन मिला इस ग्रंथ में हिन्दुत्व  या सनातनी कई सिद्धांतो का अपने ढंग से अर्थ का अनर्थ कर अपने फॉलोवरों के समक्ष रखा गया.......यहूदियों के लिए कुरान में कईजगह काफिर, दोज़ख़ी जैसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं।फारसी मे हिन्दू शब्द का ऐसा ही अर्थ "गयास-उल-लुगत" शब्दकोश के रचनाकार मौलाना गयासुद्दीनकी देन है। इसी तरह राम और देव जैसे संस्कृत शब्दोंका अन्य शब्दकोशों मे एकदम उल्टा अर्थ लिखा है।राम का अर्थ कई स्थानों पर चोर भी किया गयाहै। क्या हमारे लिए राम के अर्थ बदल जाएंगे?

चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तान्त मे.....

हिन्दूशब्द मुसलमानों की अपमानपूर्ण देन है कहना नितांतअनभिज्ञता है, यह शब्द मुसलमान धर्म के आने से बहुतपहले से ही सम्मानपूर्ण तरीके से हमारे लिए प्रयोग होता रहा है। मुसलमानों से काफी समय पूर्व भारत आने वाले चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तान्त मे भारत के लिए हिंदुस्थान शब्द प्रयोगकिया है। प्राचीन शब्दकोशों जैसे रामकोश,मेदिनीकोश, अद्भुतकोष, शब्दकल्पद्रुम मे भी हिन्दूशब्द प्राप्त होता है,- "हिन्दुहिन्दूश्चहिंदव:" (मेदिनी कोश) प्राचीन ग्रन्थ बृहस्पति आगममें हिन्दू शब्द को व्यापक अर्थ में हिमालय व इन्दुसागर (हिन्द महासागर) के परिक्षेत्र से परिभाषितकिया गया है- 
हिमालयात् समारंभ्य 

यावत् इन्दुसरोवरम्। 
तद्देव निर्मितम् देशम् 
हिंदुस्थानम् प्रचक्षते॥
अर्थात, उत्तर में हिमालय से आरम्भ कर के दक्षिण में इन्दु सागर (हिन्द महासागर) तक का जो क्षेत्र है उसदेव निर्मित देश को हिंदुस्थान कहते हैं। . वास्तव में आर्य शब्द हिन्दू जाति का विशेषण है (जिसका अर्थश्रेष्ठ होता है) और वेदों पुराणों में इसी अर्थ मे प्रयुक्त हुआ है, हिन्दू वीरों वीरांगनाओं ने भी स्वयंको आर्य-पुत्र या आर्य-पत्नी कह के संबोधित कियाहै आर्य नहीं। क्योंकि स्वयं के लिए विशेषण या सम्मान सूचक शब्द का प्रयोग भारतीय परंपरा नहीं रही है।

हिन्दू शब्द ही अधिक समीचीन व संगत है। इससे भीअधिक महत्वपूर्ण है कि आज आर्य या हिन्दू शब्द की बहस के अनौचित्य को समझना क्योंकि आज हमें पढ़ाया जाने वाला मैकाले सोच का भ्रष्ट इतिहास भारतीय गौरव को शर्मसार करने के लिए प्रयासरत है॥ इस संकीर्ण प्रयास के प्रतिरोध में आज यह लेखसमर्पित है। आज हिन्दू शब्द ही सम्पूर्ण विश्व में हमारी पहचान है, हमारे ज्ञान गौरव प्राचीनताऔर हमारी अमर संस्कृति की पहचान है...,

 "अतः गर्व है की हम हिन्दू हैं" 

(इस लेख का आधार भारतीय धर्मग्रन्थ व स्व. माधवाचार्य जी की पुस्तक '' क्यों '' द्वारा प्रदत्त जानकारी पर आधारीत है तथा जैसा की हमने अध्ययन किया गुरुमुख से.... उसी को शब्दशः रमेश जी को बताया )
-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक - ' ज्योतिष का सूर्य ' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, हाऊस नं. १२९९, सड़क- २६, कोहका मेन रोड, शांतिनगर, भिलाई, जिला- दुर्ग (छ.ग.)
मोबाईल.नं.9827198828
Email.Id - jyotishkasurya@gmail.Com

Pandit Vinod Choubey

कोई टिप्पणी नहीं:

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.