ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

गीता रहस्य ........अवश्य पढें और मित्रों को पढायें...और पूण्य लाभ लें

गीता रहस्य ........अवश्य पढें और मित्रों को पढायें...और पूण्य लाभ लें

साथियों, 
गीता जयंती के पावन पवित्र अवसर पर आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं और बहुत बहुत बधाई......

आईये इस अवसर पर ज्ञान-लाभ लेने का प्रयास करें।  कई मित्रों यह भी पता नहीं है कि श्रीमद्भगवद गीता का प्रादुर्भाव कहां से हुआ था। तो बिना देर किये आपको बताना चाहूंगा की गीता का प्राकट्य श्री कृष्ण के द्वारा महाभारत के युद्ध के दौरान हरियाणा के कुरूक्षेत्र में स्थित सरोवर के तट पर "विराट दर्शन" देते हुये अर्जुन को गीता का उपदेश सुनाये थे। 
बड़ा सवाल ये उठता है जब केवल कृष्ण-अर्जुन संवाद है गीता तो यह हमारे मध्य कैसे पहुंची? आगे हम इसी पर चर्चा करेंगे ।  
- ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे , संपादक "ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, शांतिनगर, भिलाई

पौराणिक कथा के अनुसार जिस समय भगवान श्री कृष्ण कुरुक्षेत्र की रणभूमि में पार्थ (अर्जुन) को गीता के निष्काम कर्मयोग का उपदेश दे रहे थे उस समय धनुर्धारी अर्जुन के अलावा इस उपदेश को विश्व में चार और लोग सुन रहे थे जिसमें पवन पुत्र हनुमान, महर्षि व्यास के शिष्य

पौराणिक कथा के अनुसार जिस समय भगवान श्री कृष्ण कुरुक्षेत्र की रणभूमि में पार्थ (अर्जुन) को गीता के निष्काम कर्मयोग का उपदेश दे रहे थे उस समय धनुर्धारी अर्जुन के अलावा इस उपदेश को विश्व में चार और लोग सुन रहे थे जिसमें पवन पुत्र हनुमान, महर्षि व्यास के शिष्य तथा धृतराष्ट्र की राजसभा के सम्मानित सदस्य संजय और बर्बरीक शामिल थे। आपको बताते चलें बर्बरीक घटोत्कच और अहिलावती के पुत्र तथा भीम के पोते थे। जब महाभारत का युद्ध चल रहा था उस दौरान उन्हें भगवान श्री कृष्ण से वरदान प्राप्त था कि कौरवों और पाण्डवों के इस भयंकर युद्ध को देख सकते हैं।
जब गीता का उपदेश चल रहा उस दौरान पवन पुत्र हनुमान अर्जुन के रथ पर बैठे थे जबकि संजय, धृतराष्ट्र से गीता आख्यान कर रहे थे। धृतराष्ट्र ने पूरी गीता संजय के मुख से सुनी वह वही थी जो कृष्ण उस समय अर्जुन से कह रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण की मंशा थी कि धृतराष्ट्र को भी अपने कर्त्तव्य का ज्ञान हो और एक राजा के रूप में वो भारत को आने वाले विनाश से बचा लें। यही नहीं यही वह चार व्यक्ति थे जिन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को विश्वरूप के रूप में देखा।
दसवें अध्याय के सातवें श्लोक तक भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूति, योगशक्ति तथा उसे जानने के माहात्म्य का संक्षेप में वर्णन किया है। फिर ग्यारहवें श्लोक तक भक्तियोग तथा उसका फल बताया। अर्जुन ने भगवान की स्तुति करके दिव्य विभूतियों तथा योगशक्ति का विस्तृत वर्णन करने के लिए श्री कृष्ण से प्रार्थना की। अपनी दिव्य विभूतियों के बारे में बताने के बाद आखिर में श्री कृष्ण ने योगशक्ति का प्रभाव बताया और समस्त ब्रह्मांड को अपने एक अंश से धारण किया हुआ बताकर अध्याय समाप्त किया। यह सुनकर अर्जुन के मन में उस महान स्वरूप को प्रत्यक्ष देखने की इच्छा हुई. तब ग्यारहवें अध्याय के आरम्भ में भगवान श्री कृष्ण ने विश्वरूप के दर्शन के रूप में अपने को प्रत्यक्ष किया। इसी विराट स्वरूप में समस्त ब्रह्मांड को समाहित देख अर्जुन मोह मुक्त हुए तथा युद्ध के विरक्ति भाव से मुक्त होकर महाभारत युद्ध का निष्ठापूर्वक संचालन कर कौरवों पर विजय प्राप्त की।

-- ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे , संपादक "ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, शांतिनगर, भिलाई

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