ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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गुरुवार, 29 सितंबर 2016

नवरात्र में कैसे और किस मुहूर्त में करें कलश स्थापन, पूजन, और क्या है सम्पूर्ण पूजा विधान?-------

नवरात्र में कैसे और किस मुहूर्त में करें कलश स्थापन, पूजन, और क्या है सम्पूर्ण पूजा विधान?-------

Pandit Vinod Choubey, Astrologer

"कलौ चण्डी विनायकौ" इस कलिकाल में माँ शक्ति और भगवान गणेश दोनों की पूजा सप्रमाणिक लाभदायक व सौभाग्यदायक है। अत: आध्यात्मिक ९ अलग-अलग शक्तियो के जागृत करने के लिये नवदुर्गा/नवदेवियों का अनुष्ठान व अर्चन वन्दन करना चाहिये।
नवरात्रि के प्रत्येक दिन माँ भगवती के एक स्वरुप श्री शैलपुत्री, श्री ब्रह्मचारिणी, श्री चंद्रघंटा, श्री कुष्मांडा, श्री स्कंदमाता, श्री कात्यायनी, श्री कालरात्रि, श्री महागौरी, श्री सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। यह क्रम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को प्रातकाल शुरू होता है। प्रतिदिन जल्दी स्नान करके माँ भगवती का ध्यान तथा पूजन करना चाहिए। सर्वप्रथम कलश स्थापना की जातीहै।


घट स्थापना शुभ मुहूर्त 

(भिलाई) : 01 अक्टूबर 2016 सुबह 07:06से 09:15 (प्रातःकाल द्विस्वभाव लग्न मुहूर्त) के मध्य
अभिजित मुहूर्त- 11:36 to 12:24 तक विशेष शुभदायक है।

सुबह 09:30 से 11:00 बजे तक राहुकाल  इस दौरान कलश स्थापन वर्जित है।

देवी पुराण के अनुसार मां भगवती की पूजा-अर्चना करते समय सर्वप्रथम कलश / घट की स्थापना की जाती है। घट स्थापना करना अर्थात नवरात्रि की कालावधि में ब्रह्मांड में कार्यरत शक्ति तत्त्व का घट में आवाहन कर उसे कार्यरत करना । कार्यरत शक्ति तत्त्व के कारण वास्तु में विद्यमान कष्टदायक तरंगें समूल नष्ट हो जाती हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार कलश को सुख-समृद्धि, वैभव और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है। कलश के मुख में विष्णुजी का निवास, कंठ में रुद्र तथा मूल में ब्रह्मा स्थित हैं और कलश के मध्य में दैवीय मातृशक्तियां निवास करती हैं।
कामनाओं के अनुसार दुर्गा सप्तशती के अलग अलग मंत्रों से संपुटित पाठ करना चाहिये..
मंत्रों के बारे में विस्तृत जानकारी के लिये " ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, शांतिनगर, भिलाई " से Mob.no.9827198828 पर  संपर्क कर सकते हैं!

पूजा सामग्री:


१. जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र
२. जौ बोने के लिए शुद्ध साफ़ की हुई मिट्टी
३. पात्र में बोने के लिए जौ
४. घट स्थापना के लिए मिट्टी का कलश (“हैमो वा राजतस्ताम्रो मृण्मयो वापि ह्यव्रणः” अर्थात 'कलश' सोने, चांदी, तांबे या मिट्टी का छेद रहित और सुदृढ़ उत्तम माना गया है । वह मङ्गलकार्योंमें मङ्गलकारी होता है )
५. कलश में भरने के लिए शुद्ध जल, गंगाजल
६. मोली धागा, जनेऊ, चुनरी, चंदोवा
७. इत्र एवं माता के लिये सम्पूर्ण श्रृंगार सामग्री
८.  साबुत सुपारी
९. दूर्वा
१०. कलश में रखने के लिए कुछ सिक्के
११. पंचरत्न
१२. आम एवं पान के 5 पत्ते
१३. कलश ढकने के लिए ढक्कन
१४. ढक्कन में रखने के लिए बिना टूटे चावल
१५. पानी वाला नारियल
१६. नारियल पर लपेटने के लिए लाल कपडा
१७. फूल माला

संक्षिप्त पूजन विधि:

आईये अब दक्षिण मार्गी तरिके से माँ शक्ति की उपासना करने के बारे बताउंगा, जो आप लोगों के लिये निश्चित ही उपयोगी साबित होगा।
सबसे पहले जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र लें। इस पात्र में मिट्टी की एक परत बिछाएं। अब एक परत जौ की बिछाएं। इसके ऊपर फिर मिट्टी की एक परत बिछाएं। अब फिर एक परत जौ की बिछाएं। जौ के बीच चारों तरफ बिछाएं ताकि जौ कलश के नीचे न दबे। इसके ऊपर फिर मिट्टी की एक परत बिछाएं। अब कलश के कंठ पर मोली बाँध दें। कलश के ऊपर रोली से ॐ और स्वास्तिक लिखें। अब कलश में शुद्ध जल, गंगाजल कंठ तक भर दें। कलश में साबुत सुपारी, दूर्वा, फूल डालें। कलश में थोडा सा इत्र दाल दें। कलश में पंचरत्न डालें। कलश में कुछ सिक्के रख दें। कलश में अशोक या आम के पांच पत्ते रख दें। अब कलश का मुख ढक्कन से बंद कर दें। ढक्कन में चावल भर दें। श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार “पञ्चपल्लवसंयुक्तं वेदमन्त्रैः सुसंस्कृतम्। सुतीर्थजलसम्पूर्णं हेमरत्नैः समन्वितम्॥” अर्थात कलश पंचपल्लवयुक्त, वैदिक मन्त्रों से भली भाँति संस्कृत, उत्तम तीर्थ के जल से पूर्ण और सुवर्ण तथा पंचरत्न मई होना चाहिए।

नारियल पर लाल कपड़ा लपेट कर मोली लपेट दें। अब नारियल को कलश पर रखें। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है: “अधोमुखं शत्रु विवर्धनाय,
ऊर्ध्वस्य वस्त्रं बहुरोग वृध्यै।
प्राचीमुखं वित विनाशनाय,
तस्तमात् शुभं संमुख्यं नारीकेलं”।
अर्थात् नारियल का मुख नीचे की तरफ रखने से शत्रु में वृद्धि होती है।नारियल का मुख ऊपर की तरफ रखने से रोग बढ़ते हैं, जबकि पूर्व की तरफ नारियल का मुख रखने से धन का विनाश होता है। इसलिए नारियल की स्थापना सदैव इस प्रकार करनी चाहिए कि उसका मुख साधक की तरफ रहे। ध्यान रहे कि नारियल का मुख उस सिरे पर होता है, जिस तरफ से वह पेड़ की टहनी से जुड़ा होता है।
अब कलश को उठाकर जौ के पात्र में बीचो बीच रख दें। अब कलश में सभी देवी देवताओं का आवाहन करें। "हे सभी देवी देवता और माँ दुर्गा आप सभी नौ दिनों के लिए इस में पधारें।" अब दीपक जलाकर कलश का पूजन करें। धूपबत्ती कलश को दिखाएं। कलश को माला अर्पित करें। कलश को फल मिठाई अर्पित करें। कलश को इत्र समर्पित करें।
कलश स्थापना के बाद माँ दुर्गा की चौकी स्थापित की जाती है।
मंत्र: ऊँ अपाम्पतये वरूणाय नम: , कलसाधिष्ठीत देवेभ्यो नम:! इस मंत्र को बोलते हुये कलस को स्थापित करें।
नवरात्री के प्रथम दिन एक लकड़ी की चौकी की स्थापना करनी चाहिए। इसको गंगाजल से पवित्र करके इसके ऊपर सुन्दर लाल वस्त्र बिछाना चाहिए। इसको कलश के दायीं और रखना चाहिए। उसके बाद माँ भगवती की धातु की मूर्ति अथवा नवदुर्गा का फ्रेम किया हुआ फोटो स्थापित करना चाहिए।
पण्डित विनोद चौबे, शांतिनगर, भिलाई " जी बताते हैं कि कामना के अनुसार अलग- अलग प्रतिष्ठित सिद्ध व प्रमाणित यंत्र को स्थापित करना चाहिये,  साथ ही नवार्णमन्त्र युक्त यन्त्र को स्थापित करें। माँ दुर्गा को लाल चुनरी उड़ानी चाहिए। माँ दुर्गा से प्रार्थना करें "हे माँ दुर्गा आप नौ दिन के लिए इस चौकी में विराजिये।" उसके बाद सबसे पहले माँ को दीपक दिखाइए। उसके बाद धूप, फूलमाला, इत्र समर्पित करें। फल, मिठाई अर्पित करें।
(यदि आपको सिद्ध व प्रमाणित यंत्र चाहिये तो स्वयं के नाम, गोत्र तथा जन्म तिथि व अन्य विवरण " ज्योतिष का सूर्य" मासिक पत्रिका(तंत्र विभाग), शांतिनगर भिलाई मे संपर्क करें, उपरोक्त संस्थान में दुर्लभ शुभ मुहूर्तों में सिद्ध व प्राण प्रतिष्ठित मनोकामना पूरणी सभी प्रकार के यंत्र उपलब्ध है)
नवरात्रि में नौ दिन मां भगवती का व्रतोपवास रखने का तथा प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करने का विशेष महत्व है। हर एक मनोकामना पूरी हो जाती है। सभी कष्टों से छुटकारा दिलाता है।
इस बार की नवरात्रि १० दिवसीय है अत: सभी क्षेत्रों में लाभप्रद है, और सबके लिये सौभाग्यदायक भी।
नवरात्री के प्रथम दिन ही अखंड ज्योत जलाई जाती है जो नौ दिन तक जलती रहती है। दीपक के नीचे "चावल" रखने से माँ लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है तथा "सप्तधान्य" रखने से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते है

माता की पूजा "लाल रंग के कम्बल" और अन्य देवियों के पूजन व अनुष्ठान में भिन्न रंग के आसन होंगे, जैसे बगलामुखी में " पीले रंग का आसन " आसन पर बैठकर करना उत्तम माना गया है
नवरात्रि के प्रतिदिन माता रानी को फूलों का हार चढ़ाना चाहिए। प्रतिदिन घी का दीपक (माता के पूजन हेतु सोने, चाँदी, कांसे के दीपक का उपयोग उत्तम होता है) जलाकर माँ भगवती को मिष्ठान का भोग लगाना चाहिए। मान भगवती को इत्र/अत्तर विशेष प्रिय है।
नवरात्री के प्रतिदिन कंडे की धूनी जलाकर उसमें घी, हवन सामग्री, बताशा, लौंग का जोड़ा, पान, सुपारी, कपूर, गूगल, इलायची, किसमिस, कमलगट्टा जरूर अर्पित करना चाहिए।
लक्ष्मी प्राप्ति के लिए नवरात्र मैं पान मैं गुलाब की ७ पंखुरियां रखें तथा मां भगवती को अर्पित कर दें
मां दुर्गा को प्रतिदिन विशेष भोग लगाया जाता है। किस दिन किस चीज़ का भोग लगाना है ये हम विस्तार में आगे बताएँगे।
प्रतिदिन कन्याओं का विशेष पूजन किया जाता है।
श्रीमद्देवीभागवत पुराण के अनुसार “एकैकां पूजयेत् कन्यामेकवृद्ध्या तथैव च। द्विगुणं त्रिगुणं वापि प्रत्येकं नवकन्तु वा॥”
अर्थात नित्य ही एक कुमारी का पूजन करे अथवा प्रतिदिन एक-एक-कुमारी की संख्या के वृद्धिक्रम से पूजन करें अथवा प्रतिदिन दुगुने-तिगुने के वृद्धिक्रम से और या तो प्रत्येक दिन नौ कुमारी कन्याओं का पूजन करें।  किस दिन क्या सामग्री गिफ्ट देनी चाहिए ये भी आगे बताएँगे।

यदि कोई व्यक्ति नवरात्र पर्यन्त प्रतिदिन पूजा करने में असमर्थ है तो उसे अष्टमी तिथि को विशेष रूप अवश्य पूजा करनी चाहिए।  प्राचीन काल में दक्ष के यज्ञ का विध्वंश करने वाली महाभयानक भगवती भद्रकाली करोङों योगिनियों सहित अष्टमी तिथि को ही प्रकट हुई थीं।
प्रतिदिन कुछ मन्त्रों का पाठ भी करना चाहिए

-ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे,(रावण संहिता विशेषग्यएवं संपादक " ज्योतिष का सूर्य " मासिक पत्रिका, चलित दूरभाष क्रमांक -०९८२७१९८८२८ , शांतिनगर, भिलाई

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।।

ऊँ जयन्ती मङ्गलाकाली भद्रकाली कपालिनी ।दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ।।

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः          
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

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