ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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रविवार, 14 अक्तूबर 2012

आयु: पुत्रान्यश: स्वर्ग कीर्ति पुष्टि बलं .........1

Pandit Vinod Choubey (jyotishacharya)

पितृ अमावस्या के पावन पर्व पर सभी देश वासियों को हार्दिक शुभकामनाएँ.....।

आयु: पुत्रान्यश: स्वर्ग कीर्ति पुष्टि बलं .........1

पितृ को पिण्डदान करने वाला हर व्यक्ति दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, लक्ष्मी, पशु, सुख साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है। यही नहीं पितृ की कृपा से ही उसे सब प्रकार की समृद्धि, सौभाग्य, राज्य तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। आश्विन मास के पितृ पक्ष में पितृ को आस लगी रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्डदान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे।

आयु: पुत्रान्यश: स्वर्ग कीर्ति पुष्टि बलं यिम्पशून्सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात्पितृपूजनात्।
यही आशा लेकर वे पितृलोक से पृथ्वी लोक पर आते हैं। अतएव प्रत्येक हिंदू गृहस्थ का धर्म है कि वह पितृपक्ष में अपने पितृ के लिए श्राद्ध एवं तर्पण करें तथा अपनी श्रद्धानुसार पितृ के निमित्त दान करें। वैसे तो हर माह आने वाली अमावस्या पितृ की पुण्यतिथि है। लेकिन आश्विन की अमावस्या पितृ के लिए परम फलदायी है। इस अमावस्या को ही पितृविजर्सनी अमावस्या अथवा महालया कहते हैं। जो व्यक्ति पितृपक्ष के पंद्रह दिनों तक श्राद्ध तर्पण आदि नहीं कहते हैं, वह लोग अमावस्या को ही अपने पितृ के निमित्त श्राद्धादि सम्पन्न करते हैं।

जिन पितृ की तिथि याद नहीं हो, उनके निमित्त श्राद्ध तर्पण, दान आदि इसी अमावस्या को किया जाता है। अमावस्या के दिन सभी पितृ का विसर्जन होता है। अमावस्या के दिन पितृ अपने पुत्रादि के द्वार पर पिण्डदान एवं श्राद्धादि की आशा में जाते हैं। यदि वहां उन्हें पिण्डदान या तिलाज्जलि आदि नहीं मिलती है तो वे शाप देकर चले जाते हैं। अत: श्राद्ध का परित्याग नहीं करना चाहिए। पितृपक्ष पितृ के लिए पर्व का समय है। अत: इस पक्ष में श्राद्ध किया जाता है जिसकी पूर्ति अमावस्या को विसर्जन तर्पण से होती है।

पितृ पक्ष के दिनों में लोग अपने पितरों की संतुष्टि के लिए संयमपूर्वक विधि-विधान से पितृ यज्ञ करते हैं, लेकिन कार्य की अतिव्यस्तता के कारण यदि कोई श्राद्ध करने से वंचित रह जाता है तो उसे पितृ विसर्जनी अमावस्या को प्रात: स्नान करने के बाद गायत्री मंत्र जपते हुए सूर्य को जल चढाने के बाद घर में बने भोजन में से पंचबलि जिसमें सर्वप्रथम गाय के लिए, फिर कुत्ते के लिए, फिर कौए के लिए, फिर देवादि बलि एवं उसके बाद चीटियों के लिए भोजन का अंश देकर श्रद्धापूर्वक पितरों से सभी प्रकार का मंगल होने की प्रार्थना कर भोजन कर लेने से श्राद्ध कमोंü की पूर्ति का फल अवश्य ही मिलता है तथा वह व्यक्ति धन, समस्त सुख आदि की प्राप्ति कर मोक्ष को प्राप्त होता है।

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