ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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मंगलवार, 18 जून 2013

जल से पूर्ण कलश का दान करें...भीमसेनी एकादशी को..

भीमसेनी एकादशी को जल से पूर्ण कलश का दान करने से 24 एकादशी व्रत का फल प्राप्त होता है।

-ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे
 18/6/2013
 मित्रों, नमस्कार,
सर्वप्रथम चारधाम की यात्रा पर निकले सभी तीर्थयात्रियों के साथ अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए, भारी बारीश के कारण जिन लोगों की मैत हो गई है उनकी आत्मा को शांति मिले इन्हीं कामनाओं के साथ , इन सभी पूण्यात्माओं को समर्पित यह आलेख आपके सामने रख रहा हुँ, मुझे विश्वास है  कि इस लेख को जितने लोग पढ़ेंगे और इस महा व्रत को करेंगें उस संचित पूण्य का, दसवाँ हिस्सा उन आत्माओं को भी प्राप्त होगा इस दैवीय आपदा में 58 लोग अपनी जान ग गंवा चुके है, तो आईए....चर्चा करते हैं, इस महान पूण्यदायी महा व्रत के महिमा की।

भारतीय संस्कृति में व्रत पर्वों का अत्यधिक महत्त्व दिया गया है, उन्हीं व्रतों में से एक है एकादशी व्रत हालाकि  एकादशी व्रत हर माह में आती है परन्तु ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति हर माह में आने वाली एकादशी का किन्हीं कारणों वशात् नहीं कर पाता उस भक्त को  केवल भीमसेनी व्रत (पाण्डव द्वादशी अथवा निर्जला एकादशी) करने मात्र से पूरे वर्ष के 24 एकादशी व्रत का पूण्यलाभ मिल जाता है। जो काशीस्थ हृषिकेश पंचांग के अनुसार 19 जून 2013 बुधवार को  निर्जला एकादशी का व्रत होना है.कुछ पंचांगों के अनुसार 20 जून को भीमसेनी एकादशी बताई गयी है परन्तु शास्त्र सम्मत सभी संविधान सूत्रों पर 19 जून 2013 को ही यह व्रत करना बेहतर होगा। 20जून 2013 को प्रातःकाल 7 बजकर 28 मिनट के पूर्व स्वाती नक्षत्र में ब्राह्मण को दान कर गो-भोजन कराकर पारण करना उत्तम है..आईए जानते है क्या है इस व्रत की विधि, महिमा और क्यों लोग इसे करते हैं... ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को निर्जला एकादशी अथवा भीमसेनी एकादशी कहते हैं...इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन के अलावा जरा सा भी जल ग्रहण नहीं करना चाहिए... एकादशी के दिन सूर्योदय से लेकर द्वादशी के दिन सूर्योदय से पहले स्नान इत्यादि कर विप्रों को यथायोग्य दान देने और भोजन कराने के उपरान्त ही स्वयं भोजन करना चाहिए...एक एकादशी का व्रत रखने से समूची एकादशियों के व्रतों के फल की प्राप्ति सहज ही हो जाती है...
पूजा विधि :-
एकादशी के दिन सर्वप्रथम भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा करें...पश्चात् ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करे... इस दिन व्रत करने वालों को चाहिए कि वह एक कलश में जल भर कर व सफेद वस्त्र उस पर ढक्कर रखें और उस पर चीनी तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें...
इस एकादशी का व्रत करके यथा सामर्थ्य अन्न, जल, वस्त्र, आसन, जूता, छतरी, पंखी तथा फलादि का दान करना चाहिए...इस दिन विधिपूर्वक जल कलश का दान करने वालों को वर्ष भर की एकादशियों का फल प्राप्त होता है...इस एकादशी का व्रत करने से अन्य तेईस एकादशियों पर अन्न खाने का दोष छूट जाएगा तथा सम्पूर्ण एकादशियों के पुण्य का लाभ भी मिलेगा...
एवं य: कुरुते पूर्णा द्वादशीं पापनासिनीम् ।
सर्वपापविनिर्मुक्त: पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥
इस प्रकार जो इस पवित्र एकादशी का व्रत करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अविनाशी पद प्राप्त करता है... भक्ति भाव से कथा श्रवण करते हुए भगवान का कीर्तन करना चाहिए...
इसके अतिरिक्त इसका नाम भीमसेनी एकादशी क्यों पड़ा उसकी कथा आपको बताते है ---

भीमसेनी एकादशी व्रत कथा:
सभी जानते है की भीम को भूख कभी बर्दास्त नहीं होती थी...तो उन्होंने व्यासजी से पुछा की वो क्या करे जिससे वह भी पुण्य का भागी बन सके क्युकी भूख लगने के कारण वो कोई भी पूजा नहीं कर पाते थे...तब वेदव्यासजी कहने लगे: दोनों ही पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन न करे... द्वादशी के दिन स्नान आदि से पवित्र हो फूलों से भगवान केशव की पूजा करे...फिर नित्यकर्म समाप्त होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे...राजन्! जननाशौच और मरणाशौच में भी एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए...यह सुनकर भीमसेन बोले: परम बुद्धिमान पितामह! मेरी उत्तम बात सुनिये...राजा युधिष्ठिर, माताकुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि: ‘भीमसेन! तुम भी एकादशी को न खाया करो…’ किन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जायेगी...भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा : यदि तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और नरक को दूषित समझते हो तो दोनों पक्षों की एकादशीयों के दिन भोजन न करना...भीमसेन बोले : महाबुद्धिमान पितामह! मैं आपके सामने सच्ची बात कहता हूँ...एक बार भोजन करके भी मुझसे व्रत नहीं किया जा सकता, फिर उपवास करके तो मैं रह ही कैसे सकता हूँ? मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है...इसलिए महामुने! मैं वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ...जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो  जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये...मैं उस का यथोचितरुप से पालन करुँगा...

व्यासजी ने कहा: भीम! ज्येष्ठमास में सूर्य वृषराशि पर हो या मिथुनराशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशीहो , उसका यत्नपूर्वक निर्जलव्रत करो...केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है...एकादशी को सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है...तदनन्तर द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करे...इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करे...वर्षभर में जितनी एकादशीयाँ होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है...शंख, चक्र और गदाधारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि: ‘यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है...’
एकादशी व्रत करनेवाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंगवाले दण्डपाशधारी भयंकर यमदूत नहीं जाते...अंतकाल में पीताम्बरधारी, सौम्यस्वभाववाले, हाथ में सुदर्शन धारण करने वाले और मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आखिर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं...अत: निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न कर के उपवास और श्रीहरि का पूजन करो...स्त्री हो या पुरुष, यदि उसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब इस एकादशी व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाता है...जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है...उसे एक-एक प्रहर में कोटि-कोटि स्वर्णमुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता सुना गया है...मनुष्य निर्जला एकादशी के दिन स्नान, दान, जप, होम आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अक्षय होता है, यह भगवान श्रीकृष्ण का कथन है....निर्जला एकादशी को विधि पूर्वक उत्तम रीति से उपवास करके मानव वैष्णवपद को प्राप्त कर लेता है...जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप का भोजन करता है...इस लोक में वह चाण्डाल के समान है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है....
जो ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में एकादशी को उपवास करके दान करेंगे, वे परमपद को प्राप्त होंगे...जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है, वे ब्रह्म हत्यारे, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं...
कुन्तीनन्दन! ‘निर्जला एकादशी’ के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो: उस दिन जल में शयन करनेवाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु का दान करना चाहिए अथवा प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी धेनु का दान उचित है...पर्याप्त दक्षिणा और भाँति-भाँति के मिष्ठान्नों द्वारा यत्नपूर्वक ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए...ऐसा करने से ब्राह्मण अवश्य संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं...जिन्होंने शम, दम, और दान में प्रवृत हो श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस ‘निर्जलाएकादशी’ का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आनेवाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परमधाम में पहुँचा दिया है...निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दरआसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए...जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है...जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है....चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इस के श्रवण से भी प्राप्त होता है...पहले दन्तधावन करके यह नियम लेना चाहिए कि: ‘मैं भगवान केशव की प्रसन्न्ता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करुँगा...'द्वादशी को देवेश्वर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए...गन्ध, धूप, पुष्प और सुन्दर वस्त्र से विधिपूर्वक पूजन करके जल के घड़े के दान का संकल्प करते हुए निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करे:
देवदेव ह्रषीकेश संसारार्णवतारक ।
उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम्॥
‘संसार सागर से तारने वाले हे देव देवह्रषीकेश! इस जल के घड़े का दान करने से आप मुझे परमगति की प्राप्ति कराइये।’
भीमसेन! ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की जो शुभएकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए...उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए....ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है....तत्पश्चात् द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे...जो इस प्रकार पूर्णरुप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है...
यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया....तब से यह लोक मे‘पाण्डवद्वादशी’ के नाम से विख्यात हुई...!
ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, संपादक-ज्योतिष का सूर्य, राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई (छ.ग.) 9827198828

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