मित्रों, आप सभीको नूतन हिन्दू नववर्ष 2071 (प्लवंग) सम्वत् की हार्दिक शुभकामनाएँ....माँ शक्ति आपको पूरे वर्ष खुशियाँ देती रहें....ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै -
राजा एवं मंत्री चन्द्र और वित्तमंत्री मंगल
विक्रम संवत 2070 'पराभव' 30 मार्च को समाप्त होगा। नववर्ष 30 और 31 मार्च की रात 12.14 बजे लगेगा। गुरु सप्तम भाव में रहेगा। मीन लग्न और मीन राशि में नवसंवत्सर का प्रवेश हो रहा है। व्यापारी और किसानों को जून के बाद शुभ समाचार मिलेंगे। शुक्र कुंभ राशि और सूर्य रेवती नक्षत्र में प्रवेश करेगा। इसके चलते महंगाई बढ़ने से जनता में असंतोष के योग बन रहे हैं। चंद्र के राजा और मंत्री होने से शासक वर्ग नैतिकता पूर्ण कार्य करेगा। सुरक्षा के क्षेत्र में मजबूती आएगी। धान्येश मंगल होने से महंगाई बढ़ सकती है। मेघेश सूर्य हैं, इसलिए इस वर्ष वर्षा में कुछ कमी रहेगी।
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ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे , Bhilai |
भारतीय संस्कृति में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा वर्ष प्रतिपदा
कहलाती है। इसी दिन से ही नव वर्ष का शुभारम्भ माना जाता है। इसे हिंदू नव
संवत्सर या नव संवत या विक्रम सम्वत भी कहते हैं। इस बार 31 मार्च 2014
से विक्रम संवत 2071 का आरम्भ हो रहा है। इस नवसंवत्सर का नाम 'प्लवंग'
होगा। भारतीय कालगणना के अनुसार 31 मार्च, 2014 को सृष्टि की 1 अरब 95 करोड़
58 लाख 85 हजार 115 वीं जयंती मनाई जायेगी। ऐसी मान्यता है कि जगत की
सृष्टि की घड़ी (समय) यही है। इस दिन भगवान ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना
हुई तथा युगों में प्रथम सत्ययुग का प्रारंभ हुआ।
‘चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमे अहनि।
शुक्ल पक्षे समग्रेतु तदा सूर्योदये सति।।‘
अर्थात ब्रह्मा पुराण के अनुसार ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना चैत्र मास के
प्रथम दिन, प्रथम सूर्योदय होने पर की। इस तथ्य की पुष्टि सुप्रसिद्ध
भास्कराचार्य रचित ग्रंथ ‘सिद्धांत शिरोमणि‘ से भी होती है, जिसके श्लोक
में उल्लेख है कि लंका नगर में सूर्योदय के क्षण के साथ ही, चैत्र मास,
शुक्ल पक्ष के प्रथम दिवस से मास, वर्ष तथा युग आरंभ हुए। अतः नव वर्ष का
प्रारंभ इसी दिन से होता है, और इस समय से ही नए विक्रम संवत्सर का भी आरंभ
होता है, जब सूर्य भूमध्य रेखा को पार कर उत्तरायण होते हैं। इस समय से
ऋतु परिवर्तन होनी शुरू हो जाती है। वातावरण समशीतोष्ण होने लगता है। ठंडक
के कारण जो जड़-चेतन सभी सुप्तावस्था में पड़े होते हैं, वे सब जाग उठते हैं,
गतिमान हो जाते हैं। पत्तियों, पुष्पों को नई ऊर्जा मिलती है। समस्त
पेड़-पौधे, पल्लव रंग-विरंगे फूलों के साथ खिल उठते हैं। ऋतुओं के एक पूरे
चक्र को संवत्सर कहते हैं।
संवत्सर, सृष्टि के प्रारंभ होने के दिवस के अतिरिक्त, अन्य पावन तिथियों,
गौरवपूर्ण राष्ट्रीय, सांस्कृतिक घटनाओं के साथ भी जुड़ा है। रामचन्द्र का
राज्यारोहण, धर्मराज युधिष्ठिर का जन्म, आर्य समाज की स्थापना तथा शक्ति की
देवी माँ दुर्गा की आराधना का पर्व 'चैत्र नवरात्र' का शुभारम्भ भी इसे
दिन से जुड़ा हुआ है। इसी दिन से मां दुर्गा की उपासना, आराधना, पूजा भी
प्रारंभ होती है। यह वह दिन है, जब भगवान राम ने रावण को संहार कर, जन-जन
की दैहिक-दैविक-भौतिक, सभी प्रकार के तापों से मुक्त कर, आदर्श रामराज्य की
स्थापना की। सम्राट विक्रमादित्य ने अपने अभूतपूर्व पराक्रम द्वारा शकों
को पराजित कर, उन्हें भगाया, और इस दिन उनका गौरवशाली राज्याभिषेक किया
गया।
भारतीय इतिहास में विख्यात सम्राट विक्रमादित्य ने विक्रम संवत का प्रवर्तन
किया था। उनकी न्यायप्रियता के किस्से भारतीय परिवेश का हिस्सा बन चुके
हैं। विक्रमादित्य का राज्य उत्तर में तक्षशिला जिसे वर्तमान में पेशावर
(पाकिस्तान) के नामसे जाना जाता हैं, से लेकर नर्मदा नदी के तट तक था।
विक्रम संवत को सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को पराजित करने की खुशी में 57
ईसा पूर्व शुरू किया था। राजा विक्रमादित्य ने यह सफलता मालवा के
निवासियों के साथ मिलकर गठित जनसमूह और सेना के बल पर हासिल की थी।
विक्रमादित्य की इस विजय के बाद जब राज्यारोहण हुआ तब उन्होंने प्रजा के
तमाम ऋणों को माफ करने का ऐलान किया तथा नए भारतीय कैलेंडर को जारी किया,
जिसे विक्रम संवत नाम दिया गया। इतिहास के मुताबिक, अवंती (वर्तमान उज्जैन)
के राजा विक्रमादित्य ने इसी तिथि से कालगणना के लिए ‘विक्रम संवत्’ का
प्रारंभ किया था, जो आज भी हिंदू कालगणना के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण माना
जाता है। कहा जाता है कि विक्रमसंवत्, विक्रमादित्य प्रथम के नाम पर
प्रारंभ होता है जिसके राज्य में न तो कोई चोर था और न ही कोई अपराधी या
भिखारी था। ज्योतिष की मानें तो प्रत्येक संवत् का एक विशेष नाम होता है।
विभिन्न ग्रह इस संवत् के राजा, मंत्री और स्वामी होते हैं।
ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- ''ज्योतिष का सूर्य'' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई
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