ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

छ.ग.मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह















छ.ग.मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह से मुलाकात करते हुए संसदीय सचिव विजय बघेल (ग्रृह, जेल एवं सहकारिता, छ.ग. शासन) एवं ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे और साथ में अन्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त  डॉ.सन्तोष राय (कामर्स गुरू),  प्रमोद चौबे (पत्रकार) , नागेन्द्र मिश्र ।
ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे ने मान. मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह जी से छ.ग. राज्य में अकादमिकल ज्योतिषाचार्य एंवं धर्म शास्त्रज्ञों को प्रोत्साहित करने हेतु शासन द्वारा संचालित सभी स्कूलों में संस्कृत विद्यालयों के आचार्यों के नियुक्ति को प्राथमिकता दी जाय का ज्ञापन सौंपा ।
ज्ञात हो कि संस्कृत केवल पौरोहित्य कर्म तक ही सिमीत नहीं बल्कि साईंटिफिक ढ़ंग से कार्य करने वाला विषय है जिसके द्वारा आम नागरिक जहां लाभन्वित होंगे वहीं यह विद्या प्रदेश के युवाओं को स्वावलम्बन बनायेगी ।

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

छत्तीसगढ़ राज्य सरकार संस्कृत के विषय में कितना गंभीर

छत्तीसगढ़ राज्य सरकार संस्कृत के विषय में कितना गंभीर
मित्रों कल मैं.. छत्तीसगढ़ विधान सभा के अध्यक्षीय दीर्घा में बैठा था । वहां महंत  जी ने संस्कृत पर अपनी मांग रखते हुए विधान सभा अध्यक्ष जी से कहा कि छत्तीसगढ़ में प्रत्येक जिलों में संस्कृत विद्यालय खोलने की बात कही जा रही है लेकिन इन संस्कृत विद्यालय के छात्र पढ़ कर निकलने के बाद करेंगे क्या...इन संस्कृत के छात्रों को बतौर प्रथमिकता के आधार पर प्रदेश के सभी स्कूल व कालेजों में संस्कृत विषय पढ़ने के लिए पो रहे नियुक्ति में इनको प्राथमिकता देना चाहिए..
लेकिन उनके इस मांग को सम्बंधित मंत्री ब्रृजमोहन अग्रवाल ने गम्भीरता से लिया लेकिन  पंचायत ग्राम विकास मंत्री रामविचार नेताम ने मजाक के तौर पर लेकर कोई तवज्जों नही दिया वहीं बाद मे पुर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने भी महंत श्यामसुन्दर दास जी का समर्थन किया।
ज्ञात हो कि विधान सभा परिसर में  साँची के स्थान पर देवभोग के नामाकरण के कार्यक्रम में मान.मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह ने कामधेनु विश्व विद्यालय खोले जाने का घोषणा भी कर दिये लेकिन संस्कृत विश्व विद्यालय के बारे मे तो दूर अभी -अभी कुछ दिन पूर्व संस्कृत शिक्षा बोर्ड के चेयर मेंन की नियुक्ति हुयी है इसके पहले सचिव डॉ.सुरेश शर्मा जी ही कार्य-भार देखते थे।
ऐसे मे सवाल यह उठता है कि राज्य सरकार संस्कृत के विषय में कितना गंभीर है।
सरकार द्वारा दूध, दही आदि को गो-पालन की संजीदगी दिखाते हुए राज्य में कामधेनु विश्वविद्यालय खोलना स्वागतेय है परन्तु संस्कृत के प्रति ऐसे ही कठोर कदम उठाए जाना बेहद आवश्यक है।

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

नव ग्रहों के आराध्य भगवान् गणेश-

नव ग्रहों के आराध्य भगवान् गणेश-
आपकी कुंडली में चाहे जो भी ग्रह अस्त हो या नीच का हो या फिर आप किसी ग्रह दशा से पीड़ित हों, भगवान गणेश के पूजन मात्र से नवग्रहों के अशुभ प्रभाव दूर हो जाते हैं। शास्त्रों में गणेश को ज्योतिष गुरू भी निरुपित किया गया है। गणेश उत्सव में, जब हर घर में गणपति विराजमान है, तो इससे बेहतर समय और क्या होगा अपने रूठे ग्रहों को मनाने का...नवग्रहों के आराध्यभगवान गणेशगणेश उत्सव के इस जयकारे भरे माहौल में अच्छा होगा यदि प्रथम  पूज्य भगवान गणेश और और उनकी पूजा से ग्रह को शुभ बनाने के बारे में चर्चा हो। ज्योतिष के तकरीबन सभी शास्त्रों में ग्रह पीड़ा दूर करने के लिए भगवान गणेश कि पूजा-अर्चना करने से समस्त ग्रहो के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं और शुभ फल प्राप्त होते हैं।ग्रह स्वामी गणेशभगवान गणेश सूर्य तेज के समान तेजस्वी हैं। गणेशजी का पूजन-अर्चन करने से सूर्य के प्रतिकूल प्रभाव का शमन होकर व्यक्ति के तेज-मान-सम्मान में वृद्धि होती हैं, उसका यश चारों आर बढ़ता है। भगवान गणेश चंद्र के समान शांति एवं शीतलता के प्रतीक हैं। गणेशजी का पूजन-अर्चन करने से चंद्र के प्रतिकूल प्रभाव का नाश होकर व्यक्ति को मानसिक शांति प्राप्त होती हैं। चंद्र माता का कारक ग्रह भी है इसलिए गणेशजी के पूजन से मातृसुख में वृद्धि होती हैं। भगवान गणेश मंगल के समान शक्तिशाली एवं बलशाली हैं। गणेशजी का पूजन-अर्चन करने से मंगल के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं और व्यक्ति के शक्ति-बल में वृद्धि होती हैं। गणेशजी के पूजन से ऋण मुक्ति भी शास्त्रों में लिखी है। गणेशजी बुद्धि और विवेक के अधिपति स्वामी ग्रह बुध के भी अधिपति देव हैं। गणेशजी का पूजन-अर्चन करने से बृहस्पति (गुरू) से संबंधित पीड़ा दूर होती हैं और व्यक्ति में आध्यात्मिक ज्ञान का विकास होता हैं।भौतिकता के स्वामीभगवान गणेश धन, ऐश्वर्य एवं संतान प्रदान करने वाले शुक्र  के भी अधिपति हैं। गणेशजी का पूजन करने से शुक्र  के अशुभ प्रभाव का शमन होता हैं और व्यक्ति को समस्त भौतिक सुख-साधनों के साथ उत्तम सौंदर्य भी प्राप्त होता है। भगवान गणेश शिव के पुत्र हैं और शिव शनि के गुरू, इसलिए गणेशजी के पूजन से शनि संबंधित पीड़ा भी दूर हो जाती है। भगवान गणेश हाथी के मुख और पुरुष शरीर युक्त होने से राहू व केतू के भी अधिपति देव हैं। गणेशजी का पूजन करने से राहू व केतू से संबंधित पीड़ा दूर होती हैं।
नवग्रह बनता हैगणेश पूजन में सबसे पहले नवग्रह बनाया जाता है, इसके पीछे भी यही कारण है कि श्रीगणेश नवग्रहों के स्वामी हैं। विघ्नहर्ता के स्मरण मात्र से नवग्रहों की शांति हो जाती है। बस पूर्ण श्रद्धा और विश्वास की जरूरत है। गणेश उत्सव के इस पावन मौके पर गणेश वंदना कर अपने जीवन को सुखमय बनाइए।चतुर्थी के चंद्रदर्शन काहल भी गणेशभाद्रपद मास के, शुक्ल पक्ष के, चंद्रमा के दर्शन करने वाले पर चोरी का कलंक लगता है। श्रीकृष्ण भी इससे प्रभावित हुए और उन पर कलंक लगा। लेकिन भूलवश चतुर्थी का चांद देख लें, तो उसका निदान भी विघ्नेश्वर के पास है। श्रीगणेश का बारह नामों से पूजन करने से इस कलंक से रक्षा हो जाती है।राहु की दशा से तारने वाले गणेशकिसी व्यक्ति की कुंडली में यदि बुध अथवा राहु की दशा/अन्तर्दशा से पीÞडा हो तो श्रीगणेशजी का पूजन उसके निदान हेतु बताया जाता है। ‘ॐ गं गणपतये नम:’ के जाप के साथ 108 दूर्वा तृण (दूर्वा घास) उनके चरणों में अर्पित करने से बुध और राहु की दशा/अंतर्दशा पीड़ा से शांति मिलती है। ये दोनों ही ग्रह व्यक्ति की कुंडली में यदि दुर्बल स्थिति में हों, तो घोर मानसिक पीड़ा देते हैं तथा बाधाएं उत्पन्न करते हैं।राहु की दशाराहु की दशा प्राय: व्यक्ति को घोर विभ्रम की अवस्था में डाल देती है। बुध की दशा/अंतर्दशा में विशेष रूप से यदि गुरू से संबंधित हो तो ‘लेखनी की त्रुटि’ के कारण मानसिक परेशानियां आती हैं। ऐसे में पुन:श्रीगणेशजी की पूजा ही बाधाओं से मुक्ति तथा शांति दिलाती है।

सोमवार, 5 सितंबर 2011

कालसर्प योग

कालसर्प योग
कालसर्प योग जातक में जीवटता, संघर्षशीलता एवं अन्याय के प्रति लड़ने के लिए अदम्य साहस का सृजन करता हैं । ऐसे जातक अपने ध्येय की सिद्धी के लिए अद्भुत संघर्षशक्ति पाकर उसका दोहन कर सफल होते हैं एवं लोकप्रियता प्राप्त करते हैंे । अध्यात्मिक महापुरूषों एवं राजनैतिज्ञों को यह योग अत्यंत रास आता हैं । राजयोग भी यह प्रदान करता हैं । जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में व्यवसाय, कला, साहित्य, क्रीड़ा, फिल्म, उद्योग, राजनीति एवं आध्यात्मक के चरमोत्कर्ष पर इस योग वाले जातक पहुचे हैं । प्रथम भाव से द्वादश भाव तक बनने वाले अनंत कालसर्प योग से शेष नाग कालसर्प योग तक जातकों में विश्व क्षितिज के श्रेष्टतम महामानव शामिल हैं ।
उल्लेखनीय हैं कि स्वतंत्र भारत का जन्म भी कालसर्प योग में 15 अगस्त 1947 को हुआ था । भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को भी कालसर्प योग था एवं नेहरू जी को शपथग्रहण का मुहूर्त निकालने वाले विश्व विख्यात ज्योतिषाचार्य पद्मभूषण पं. सूर्य नारायण व्यास को भी कालसर्प योग था । अतः कालसर्प योग से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं हैं विशेष रूप से कालसर्प योगधारी भारतवासी ज्योतिषीय सिद्धांतानुसार कि सामान योग वाले व्यक्तियों में सामंजस्य एवं मित्रता होती हैं एवं वे एक दूसरे के पूरक होते हैं देश के सर्वश्रेष्ठ नागरिक साबित होते हैं यह तालिका में अनेक उदाहरणों द्वारा सुस्पष्ट हैं ।
राहू क्रूर ग्रह हैं इसे शनि के तुल्य गुणों वाला माना गया हैं शनि के समान इस ग्रह में भी वास्तव में राहू एवं केतु कोई ग्रहीय पिंड न होकर छाया ग्रह हैं । हमें ज्ञात हैं कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा कर रही हैं एवं चन्द्रमा पृथ्वी की । पृथ्वी के परिभ्रमण वृत्त के दो बिन्दु परस्पर विपरीत दिशा में पड़ते हैं इन्ही काटबिन्दुओं (छायाओं) को राहू एवं केतु नाम दिया गया हैं । चूॅकि इस सौर मण्डलीय घटना का प्रभाव मानव जीवन पर पड़ता हैं इसलिए ज्योतिषीय गणना में इसे स्थान देकर कुण्डली में अन्य आध्यात्मिक, राजनैतिक चिंतन दीर्घ विचार, ऊॅचनीच सोचकर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति पाई जाती हैं । राहू मिथुन राशि में उच्च एवं धनु राशि में नीच का होता हैं । कन्या इसकी मित्र राशि हैं । केतु इसके विपरीत धनु में उच्च एवं मिथुन में नीच का होता हैं । केतु मंगल के गुणों वाला परन्तु अपेक्षाकृत सौम्य ग्रह हैं । शनि, बुध एवं शुक्र राहू के मित्र एवं सूर्य, चन्द्र, मंगल शत्रु तथा गुरूसम हैं । जबकि मंगल केतु का मित्र सूर्य, शनि, राहू शत्रु एवं चन्द्र, बुध, गुरू सम ग्रह हैं ।
कालसर्प योग युक्त जातक की कुण्डली में सभी ग्रह राहू एवं केतु के मध्य एक ही ओर स्थित होते हैं। माना जाता हैं कि कालसर्प योग में राहू सर्प का सिर एवं केतु पूॅछ वाला भाग हैं । सभी अन्य ग्रह राहू के मुख में गटकाये जाने के कारण इस योग को विपरीत परिणाम का सृजनकर्ता कहा जाता हैं । मान्यता हैं कि पिछले जन्म में नागहत्या के कारण यह योग निर्मित होता हैं एवं इसी लिए ऐसे जातकों को सर्पभय हमेशा बना रहता हैं साथ ही स्वप्न में सर्प के दर्शन होते रहेते हैं । गोचर में कालसर्पयोग आने पर लगभग 15 दिवस तक यह सतत बना रहता हैं ।
आवश्यक नहीं हैं कि कालसर्पयोग व पितृदोष की शांति त्रयम्बकेश्वर में ही करवायी जावे । इसकी शांति जहा भी पवित्र नदीं बहती हो उसका किनारा हो, प्रतिष्ठित शिव मन्दिर हो वहा पर की जा सकती हैं । कालसर्प की शान्ति हेतु लोग त्रयम्बकेश्वर जाते हैं लेकिन पूरे शिव पुराण में कहीं नहीं लिखा कि त्रयम्बकेश्वर में ही कालसर्पयोग व पितृदोष की शांति की जाती हैं । लोग भ्रम में हैं व एक भेड़ चाल सी बन गई हैं कि त्रयम्बकेश्वर जाना हैं । त्रयम्बकेश्वर में यजमानों को कर्मकाण्डी मन्दिर नहीं ले जाकर घर में ही पितृदोष व कालसर्प योग की शांति करवा देते हैं जिससे यजमानों को पूर्ण फल की प्राप्ति नहीं होती हैं । त्रयम्बकेश्वर द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से एक हैं वहा जाने से तो धर्म की प्राप्ति होती हैं न कि केवल कालसर्पयोग शांत होता हैं । ईश्वर में मनुष्य को दण्ड देने के लिए घातक योग बनाये हैं तो उसका उपचार भक्ति एवं मंत्रों के माध्यम से बताया भी हैं । उपचार से कालसर्प योग समाप्त तो नहीं होता हैं, और होने वाले कष्टों से पूर्ण मुक्ति भी नहीं मिलती हैं लेकिन 25 से 85 प्रतिशत तक राहत मिलने की सम्भावनाये रहती हैं ।

कालसर्प योग निवारण के अनेक उपाय हैं । इस योग की शांति विधि विधान के साथ योग्य विद्धान एवं अनुभवी ज्योतिषी, कुल गुरू या पुरोहित के परामर्श के अनुसार किसी कर्मकांडी ब्राह्मण से यथा योग्य समयानुसार करा लेने से दोष का निवारण हो जाता हैं । कुछ साधारण उपाय निम्न हैं:-
1. घर में वन तुलसी के पौधे लगाने से कालसर्प योग वालों को शान्ति प्राप्त होती हैं ।
2. प्रतिदिन ‘‘सर्प सूक्त‘‘ का पाठ भी कालसर्प योग में राहत देता हैं ।
3. विश्व प्रसिद्ध तिरूपति बाला जी के पास काल हस्ती शिव मंदिर में भी कालसर्प योग शान्ति कराई जाती हैं।
4. इलाहाबाद संगम पर व नासिक के पास त्रयंबकेश्वर में व केदारनाथ में भी शान्ति कराई जाती हैं ।
5. ऊँ नमः शिवाय मंत्र का प्रतिदिन एक माला जप करें । नाग पंचमी का वृत करें, नाग प्रतिमा की अंगुठी पहनें ।
7. कालसर्प योग यंत्र की प्राण प्रतिष्ठा करवाकर नित्य पूजन करें । घर एवं दुकान में मोर पंख लगाये ।
8. ताजी मूली का दान करें । मुठ्ठी भर कोयले के टुकड़े नदी या बहते हुए पानी में बहायें ।
9. महामृत्युंजय जप सवा लाख , राहू केतु के जप, अनुष्ठान आदि योग्य विद्धान से करवाने चाहिए ।
10. नारियल का फल बहते पानी में बहाना चाहिए । बहते पानी में मसूर की दाल डालनी चाहिए ।
11. पक्षियों को जौ के दाने खिलाने चाहिए ।
12. पितरों के मोक्ष का उपाय करें । श्राद्ध पक्ष में पितरों का श्राद्ध श्रृृद्धा पूर्वक करना चाहिए ।
कुलदेवता की पूजा अर्चना नित्य करनी चाहिए ।
13. शिव उपासना एवं रूद्र सूक्त से अभिमंत्रित जल से स्नान करने से यह योग शिथिल हो जाता हैं ।
14. सूर्य अथवा चन्द्र ग्रहण के दिन सात अनाज से तुला दान करें ।
15. 72000 राहु मंत्र ‘‘ऊँ रां राहवे नमः‘‘ का जप करने से काल सर्प योग शांत होता हैं ।
16. गेहू या उड़द के आटे की सर्प मूर्ति बनाकर एक साल तक पूजन करने और बाद में नदी में छोड़ देने तथा तत्पश्चात नाग बलि कराने से काल सर्प योग शान्त होता हैं ।
17. राहु एवं केतु के नित्य 108 बार जप करने से भी यह योग शिथिल होता हैं । राहु माता सरस्वती एवं
केतु श्री गणेश की पूजा से भी प्रसन्न होता हैं ।
18. हर पुष्य नक्षत्र को महादेव पर जल एवं दुग्ध चढाएं तथा रूद्र का जप एवं अभिषेक करें ।
19. हर सोमवार को दही से महादेव का ‘‘ऊँ हर-हर महादेव‘‘ कहते हुए अभिषेक करें ।
20. राहु-केतु की वस्तुओं का दान करें । राहु का रत्न गोमेद पहनें । चांदी का नाग बना कर उंगली में
धारण करें । शिव लिंग पर तांबे का सर्प अनुष्ठानपूर्वक चढ़ाऐ। पारद के शिवलिंग बनवाकर घर में प्राण प्रतिष्ठित करवाए ।

रविवार, 4 सितंबर 2011

कैसे करें प्रश्न विचार....?



कैसे करें प्रश्न विचार....?
ज्योतिष शास्त्र को प्रत्यक्ष शास्त्र कहा जाता है। ""प्रत्यक्षं ज्योतिषं शास्त्रं चन्द्रार्कौ यत्र साक्षिणों""। ज्योतिष की विविध शाखाऔंमें प्रश्न विज्ञान एक ऎसी शाखा है जिसकी सभी दैवज्ञों को सर्वदा सहायता लेनी प़डती है। जातक व प्रश्न ये दो ऎसे क्षेत्र हैं, जिनके बिना ज्योतिषी एक पग भी आगे नहीं बढ़ सकता।
प्रश्न दो प्रकार के होते हैं। पहला जब लोग अपनी परेशानी या उलझन मे प़डकर ज्योतिषी के पास अपनी चिंता अथवा परेशानी का समाधान करने आते हैं। जैसे- मेरे मुकदमें में क्या होगाक् अमुक बीमार है अच्छा हो जायेगाक् यात्रा में गया हुआ अभी तक नहीं लौटा उसका क्या हुआक् मैने परीक्षा दी है अथवा इन्टरव्यू दिया है रिजल्ट क्या रहेगाक् मेरे स्थान परिवर्तन का योग है अथवा नहींक्
इसके अलावा अनावश्यक प्रश्न भी होते हैं जो समय बर्बाद करने अथवा ज्योतिषी की परीक्षा लेने के निमित्त भी हो सकते हैं। जैसे बताओ मेरी मुटी में क्या हैक् मैने क्या खर्चा थाक् मेेरे मन में क्या हैक् इस तरह के प्रश्न में बहुत विचार कर उत्तर देने की आवश्यकता होती है।
यदि प्रश्न कर्ता की जन्म पत्रिका भी उपलब्ध हो तो उससे प्रश्न फल की पुष्टि की जा सकती है। जो योग देखकर बता दिया है कि इसका ऎसा फल होगा, परंतु इसके अतिरिक्त ग्रह और राशियों के विचार से उनके गुण धर्म, ग्रहों के शुभत्व-पापत्व, स्थान स्वामित्व, दृष्टि, मैत्री- उच्च-नीच-स्वक्षेत्र, मित्र या शत्रुक्षेत्र आदि कई प्रकार के विचारों के आधार पर फलादेश करना प़डता है। जैसे किसी न्यायाधीश के सम्मुख कोई अभियोग पेश होता है तो वह वादी प्रतिवादी एवं गवाहों आदि के सभी के आधार पर अपना फैसला देता है। इसी प्रकार ज्योतिषी को उपरोक्त ग्रह स्थितियों पर विचार कर एवं देश-काल, प्रश्न कर्ता की अवस्था, वंश-परिस्थिति आदि सब बातों को ध्यान में रख कर फल निर्णय करना होता है।
किसी विशेष प्रश्न के निर्णय के निमित कई प्रकार के योग होते हैं जिनका स्पष्टीकरण गणना की शुद्धता से होता है परंतु इसके अतिरिक्त प्रश्नकर्ता के मुख से निकले शब्द, उसके अंग-स्पर्श, शकुन आदि का भी प्रश्न फलादेश में विशेष महत्व है।
यदि किसी प्रश्न में लग्नेश लग्न तथा कार्य भाव को और कार्येश को देखता हो तो प्रश्न का शुभ फल प्राप्त होगा।
प्रश्न में जिस भाव से संबंधित प्रश्न हो वह कार्यभाव कहलाता है। यदि लग्नेश और कार्येश में इत्थशाल हो तो प्रश्न का शुभ फल प्राप्त होगा।
यदि लग्न को लग्नेश व शुभ ग्रह देखते हों तथा कार्यभाव को कार्येश और शुभग्रह देखते हों तो कार्य के संबंध में शुभ फल प्राप्त होगा और यदि इत्थशाल हो तो शुभ फल प्राप्त होगा।
यदि लग्न को लग्नेश व शुभ ग्रह देखते हों तथा कार्यभाव को कार्येश और शुभ ग्रह देखते हों तो कार्य के संबंध में शुभ फल प्राप्त होगा।
यदि लग्न में पाप ग्रह हों या पाप ग्रहों की दृष्टि लग्न पर प़डती हो तथा कार्य भाव में पाप ग्रह हो या पाप ग्रहों की दृष्टि प़डती हो तो कार्य की हानि होगी।
यदि लग्न और कार्यभाव पर पापग्रहों और शुभग्रहों का मिला-जुला असर हो तो कष्ट से या विशेष परिश्रम से कार्य लाभ होगा।
यदि लग्न को लग्नेश व चंद्रमा दोनों देखते हों तो प्र्रश्न का शुभ फल प्राप्त होगा।
यदि लग्न और लग्नेश बलवान हो तो प्रश्न का शुभफल प्राप्त होगा।
यदि लग्नेश और कार्येश में योगों की परिभाष्ाा का संबंध हो तो जिस ग्रह के संबंध से यह योग होता है उस ग्रह से इंगित व्यक्ति के कारण सफलता प्राप्त होती है।
प्रश्न के समय लग्न सम राशि या विषम राशि में हो और नवांश कौनसा होगा, प्रश्न किस संबंध में होगा
यह निम्न चार्ट से स्पष्ट होता है।

शुत्र के आक्रमण संबंधी प्रश्न हो तो-
1.   2 5, 6 भाव में पाप ग्रह सूर्य, मंगल या शनि हो तो शत्रु रास्ते से वापिस लोट जायेगा।
2.   यदि पाप ग्रह सूर्य, मंगल या शनि चतुर्थ भाव में हो तो समीप आया शत्रु हार मान कर चला जायेगा
3.   यदि चौथे भाव में मीन, वृश्चिक, कुंभ, कर्क राशियों के स्वामी हो तो शत्रु पराजित होगा।
4.   यदि चौथे भाव में 1,2,5 या 9 (मेष, वृष, सिंह या धनु राशि) में हो तो शत्रु हार मानकर भाग जायेगा। प्रश्न यदि रोगी के संबंध में हो तो
      निम्नानुसार गणना करते हैं।
षष्ठेश पाप ग्रह के लग्न में है तो रोगी की मृत्यु होगी अर्थात लग्नेश पाप ग्रह हो और षष्टेश वहां स्थित हो।

5.   यदि चतुर्थ और अष्टम स्थान तथा पाप ग्रहों के मध्य चंद्रमा की स्थिति हो तो मृत्यु अवश्य भावी है।
6.   यदि शुभ ग्रह बलवान होकर चंद्रमा को देखे तो रोगी आगे चलकर रोग मुक्त हो जायेगा।
7.   यदि चंद्रमा लग्न में और सूर्य सप्तम में हो तो रोगी की मृत्यु हो जायेगी।
8.   यदि लग्न में पाप ग्रह हो तो वैद्य की दवा से रोग बढे़।
9.   यदि लग्न में शुभ ग्रह हो तो वैद्य के वचन अमृत समान जाने।
10. यदि रोगी और वैद्य में, औषध और रोग में मित्रता हो तो रोग शान्ति हो। शुत्रता हो तो रोग बढ़ेगा।
11.  यदि लग्नेश बलवान हो, शुभ ग्रह केन्द्र अथवा अपनी उच्चाराशि या त्रिकोण में हो तो रोगी बच जाये।
12.  यदि एक भी बलवान शुभ ग्रह लग्न में हो तो वह रोगी की रक्षा करता है।
13.  यदि शुभ ग्रह नवम व तीसरे स्थान पर हो तो रोग नाश करते हैं।
उक्त संदर्भ में राहुल महाजन पुत्र स्व. प्रमोद महाजन के लिये दिनांक 03-06-06 को सांय 17.35 पर प्रश्न प्रछा गया कि राहुल महाजन बचेंगे कि नहीं। उस समय प्रश्न कुण्डली निम्न बनी-

उक्त कुण्डली में लग्न में गुरू हैं जो चिकित्सक का भाव है। अत: लग्न में सौम्य ग्रह है।
2 सप्तम भाव में सौम्य ग्रह शुक हैं जो रोग का भाव है।
2 शुक लग्न पर जो उनकी उच्चाराशि है तथा स्वगृह है पर दृष्टिपात कर रहे है।
2 बृहस्पति चिकित्सक भाव लग्न में बैठकर सप्तम भाव जो रोग का भाव है और उनकी मित्र राशि है, पर दृष्टिपात कर रहे है। अत: रोगी के बचने की पूरर्गü संभावना है। परंतु दशक भाव जो रोगी का भाव है, में क्रूर ग्रह शनि व मंगल स्थित हैं। अत: बचने के बाद भी शरीर में दुष्प्रभाव रहेंगे और संभवत: कोई ऎसा दुष्प्रभाव जो काफी समय तक परेशान करेगा। यह जग विदित है कि राहुल महाजन बच गये और अब स्वस्थ है।