ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

शिवलिंग की वैज्ञानिकता.......

शिवलिंग की वैज्ञानिकता.......

"" भारत सरकार के नुक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है""

आदि काल से ही मनुष्य शिवलिंग की पूजा करते आ रहे हैं और इस संदर्भ में अलग-अलग मान्यताएं और कथाएं भी प्रचलित हैं। भारतीय सभ्यता के प्राचीन अभिलेखों एवं स्रोतों से भी ज्ञात होता है हड़प्पा और मोहनजोदाड़ो की खुदाई से पत्थर के बने कई लिंग और योनि मिले हैं। एक मूर्ति ऐसी मिली है जिसके गर्भ से पौधा निकलते हुए दिखाया गया है।  शिवलिंग के तीन हिस्से होते हैं। लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और ऊपर प्रणवाख्य महादेव स्थित हैं। यह प्रमाण है कि आरंभिक सभ्यता के लोग प्रकृति-पूजक थे। वह मानते थे कि संसार की उत्पत्ति शिवलिंग से हुई थी इसी से शिवलिंग पूजा की परंपरा चल पड़ी।  शिवलिंग की पूजा भारत और श्रीलंका तक ही सीमित नहीं थी। बल्कि यूरोपीय देशों से ले कर प्राचीन मेसोपोटामिया तक भी होती थी । अब इस शिवलिंग की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि पर आप लोगों का ध्यानाकर्षण कराना चाहुंगा। 

"शिवलिंग का वैज्ञानिक रहस्य.."  साईंटीस्ट का रिसर्च........

मैं यहां साफ करना चाहूंगा कि मैं ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, भिलाई से हुं ना कि कोई साईंटीस्ट। किन्तु एक साईंटिस्ट से मुलाकात हमारे कार्यालय में हुई और चर्चा चल पड़ी "शिवलिंग की वैज्ञानिक सत्यता" विषय पर उन्होंने बताया कि- 

शिवलिंग की वैज्ञानिकता .... भारत का रेडियोएक्टिविटीमैप उठा लें, तब हैरान हो जायेगें ! भारत सरकार के नुक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है।.. शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्यूक्लियर रिएक्टर्स ही हैं, तभी तो उन पर जल चढ़ाया जाता है ताकि वो शांत रहे महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे किए बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, गुड़हल, आदि सभी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले है । क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है इसीलिए तो जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता। भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिवलिंग की तरह ही है।. शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिलकर औषधि का रूप ले लेता है। तभी तो हमारे पूर्वज हम लोगों से कहते थे कि महादेव शिवशंकर अगर नराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी। .ध्यान दें, कि हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है। जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है, वो तो चिर सनातन है। विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें।

मित्रों, इसी संदर्भ में आपको बताते चलुं की शिवलिंग की कभी भी पूरी परिक्रमा नहीं की जाती है हमेशा आधी परिक्रमा की जाती है।  स्वामी विवेकानंद ने अन्नत ब्रह्म के प्रतीक के रूप में शिवलिंग को वर्णित किया था। इनके अलावां विश्व के तमाम दार्शनिकों ने "शिव सत्ता" को सहर्ष स्वीकार किया।


-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- "ज्योतिष का सूर्य" राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, सड़क- 26, कोहका मेन रोड, शांतिनगर, भिलाई, जिला-दुर्ग (छ.ग.) 490023
mobile no. 9827198828

 (कृपया उपरोक्त आलेख को वगैर अनुमति कहीं अन्यत्र प्रकाशित ना करें, और अनधिकृत तौर पर कहीं अन्यत्र तोड़-मरोड़कर कॉपी-पेस्ट करते हुये पाये जाने पर "ज्योतिष का सूर्य" द्वारा दाण्डिक कार्यवाही की जायेगी)

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

महाशिवरात्रि व्रत, एवं माहात्म्य और ज्योतिष के अनुसार अभिषेक द्रव्य..एवं चार प्रहर में कैसे करें शिव-पूजन.. (24 फरवरी - 2017)


श्री महाशिवरात्रि व्रत, एवं माहात्म्य और ज्योतिष के अनुसार अभिषेक द्रव्य..एवं चार प्रहर में कैसे करें शिव-पूजन.. (24 फरवरी - 2017)



साथियों, 
हमारे धर्म ग्रंथों में चार रात्रियों का वर्णन मिलता है " कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारूणा"  उन्हीं चार रात्रियों में से एक रात्रि है, महाशिवरात्रि जो हिंदू धर्म में एक प्रमुख त्योहार के रूप में मनाय जाता हैं !महाशिवरात्रि को महारात्रि के नाम से भी जान जाता हैं। हिंदू संस्कृति में भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिये सबसे पवित्र दिन माना जाता हैं।



-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- "ज्योतिष का सूर्य" राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, शांतिनगर, भिलाई, मोबाईल नं. 9827198828

देवों के देव भगवान भोले नाथ के भक्तों के लिये श्री महाशिवरात्रि का व्रत विशेष महत्व रखता हैं। यह पर्व फाल्गुन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन मनाया जाता है। वर्ष 2017 में यह शुभ उपवास, 24 फरवरी - शुक्रवार के दिन का रहेगा। इस दिन का व्रत रखने से भगवान भोले नाथ शीघ्र प्रसन्न हों, उपवासक की मनोकामना पूरी करते हैं। इस व्रत को सभी स्त्री-पुरुष, बच्चे, युवा, वृद्धों के द्वारा किया जा सकता हैं।


24 फरवरी - 2017 के दिन विधिपूर्वक व्रत रखने पर तथा शिवपूजन,रुद्राभिषेक, शिवरात्रि कथा, शिव स्तोत्रों का पाठ व "उँ नम: शिवाय" का पाठ करते हुए रात्रि जागरण करने से अश्वमेघ यज्ञ के समान फल प्राप्त होता हैं। व्रत के दूसरे दिन  यथाशक्ति वस्त्र-क्षीर सहित भोजन, दक्षिणादि प्रदान करके संतुष्ट किया जाता हैं।

*चार प्रहर पूजन अभिषेक  विधान*

प्रथम प्रहर- सायं 6:00 से रात्रि 9:00तक

द्वितीय प्रहर- रात्रि 9:00 से रात्रि 12:00 तक

तृतीय प्रहर- रात्रि 12:00 से रात्रि 3:00 तक

चतुर्थ प्रहर- रात्रि 3:00 से प्रातः 6:00 बजे तक

*शिवरात्री व्रत की महिमा*

इस व्रत के विषय में यह मान्यता है कि इस व्रत को जो जन करता है, उसे सभी भोगों की प्राप्ति के बाद, मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत सभी पापों का क्षय करने वाला है, व इस व्रत को लगातार 14 वर्षो तक करने के बाद विधि-विधान के अनुसार इसका उद्धापन कर देना चाहिए.

*महाशिवरात्री व्रत का संकल्प*

व्रत का संकल्प सम्वत, नाम, मास, पक्ष, तिथि-नक्षत्र, अपने नाम व गोत्रादि का उच्चारण करते हुए करना चाहिए। महाशिवरात्री के व्रत का संकल्प करने के लिये हाथ में जल, चावल, पुष्प आदि सामग्री लेकर शिवलिंग पर छोड दी जाती है।

*महाशिवरात्री व्रत की सामग्री*

उपवास की पूजन सामग्री में जिन वस्तुओं को प्रयोग किया जाता हैं, उसमें पंचामृत (गंगाजल, दुध, दही, घी, शहद), सुगंधित,चावल, रोली, कलावा, जनेऊ, फूल, शुद्ध वस्त्र, बिल्व पत्र,धतूरा, समीपत्र, आक पुष्प, दूर्वा, धूप, दीप, नैवेध, चंदन का लेप, ऋतुफल,नारियल और अभिषेक के लिए दूध आदि।

*महाशिवरात्री व्रत की विधि*

महाशिवरात्री व्रत को रखने वालों को उपवास के पूरे दिन, भगवान भोले नाथ का ध्यान करना चाहिए। प्रात: स्नान करने के बाद भस्म का तिलक कर रुद्राक्ष की माला धारण की जाती है। इसके ईशान कोण दिशा की ओर मुख कर शिव का पूजन धूप, पुष्पादि व अन्य पूजन सामग्री से पूजन करना चाहिए।

इस व्रत में चारों पहर में पूजन किया जाता है। प्रत्येक पहर की पूजा में "उँ नम: शिवाय" व " शिवाय नम:" का जाप करते रहना चाहिए। अगर शिव मंदिर में यह जाप करना संभव न हों, तो घर की पूर्व दिशा में, किसी शान्त स्थान पर जाकर इस मंत्र का जाप किया जा सकता हैं। चारों पहर में किये जाने वाले इन मंत्र जापों से विशेष पुन्य प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त उपावस की अवधि में रुद्राभिषेक करने से भगवान शंकर अत्यन्त प्रसन्न होते है।

*शिव अभिषेक विधि*

महाशिव रात्रि के दिन शिव अभिषेक करने के लिये सबसे पहले एक मिट्टी का बर्तन लेकर उसमें पानी भरकर, पानी में बेलपत्र, आक धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर शिवलिंग को अर्पित किये जाते है। व्रत के दिन शिवपुराण का पाठ सुनना चाहिए और मन में असात्विक विचारों को आने से रोकना चाहिए। शिवरात्रि के अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेलपत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है।

*पूजन करने का विधि-विधान*

महाशिवरात्री के दिन शिवभक्त का जमावडा शिव मंदिरों में विशेष रुप से देखने को मिलता है। भगवान भोले नाथ अत्यधिक प्रसन्न होते है, जब उनका पूजन बेल- पत्र आदि चढाते हुए किया जाता है। व्रत करने और पूजन के साथ जब रात्रि जागरण भी किया जाये, तो यह व्रत और अधिक शुभ फल देता है। इस दिन भगवान शिव की शादी हुई थी, इसलिये रात्रि में शिव की बारात निकाली जाती है। सभी वर्गों के लोग इस व्रत को कर पुन्य प्राप्त कर सकते हैं।



*महाशिवरात्रि व्रत कथा*

एक बार. 'एक गाँव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया।

अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए।

एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ. शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना। ' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई।

शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था  उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी. इस समय मुझे मत मार।

शिकारी हँसा और बोला, 'सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ. मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे।

उत्तर में मृगी ने फिर कहा, 'जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के आभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला,' हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े, मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा।

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।

उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।

देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की. तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।

महाशिवरात्रि पर असाध्य रोगों का ज्योतिषीय निदान

महाशिवरात्रि को हिंदू धर्म में एक प्रमुख त्योहार के रूप में मनाय जाता हैं। महाशिवरात्रि को कालरात्रि के नाम से भी जान जाता हैं। हिंदू संस्कृति में महाशिवरात्रि भगवान शंकर का सबसे पवित्र दिन माना जाता हैं।



महाशिवरात्रि पर रुद्राभिषेक का बहुत महत्त्व माना गया है और इस पर्व पर रुद्राभिषेक करने से सभी रोग और दोष समाप्त हो जाते हैं। 
  ज्योतिष शास्त्र में भगवान शिव को सुख देने का आधार माना गया है. इसीलिए शिवरात्रि पर. अनेक प्रकार के अनुष्ठान कर
मनोनुकूल फल प्राप्ति के लिए   शिवजी की पूजा इस प्रकार करें-   
1 गुड़ के जल से अभिषेक करें । मीठी रोटी का भोग चढ़ाएं। लाल चंदन व कनेर की फूल से पूजा करें। भूमि, भवन आदि अचल संपत्ति प्राप्त होगी।
2 दही से अभिषेक करें। शक्कर, चावल, सफेद चंदन व सफेद फूल से पूजा करें । परिवार में सुख-शांति आएगी।
3 गन्ने के रस से भगवान का अभिषेक करें। मूंग, दूब और कुशा से पूजा करें। धन लाभ होगा।
4घी से अभिषेक कर चावल, कच्चा दूध, सफेद आक व शंखपुष्पी से शिवलिंग की पूजा करें। व्यक्तित्व विकास होगा। चिंता का नाश होगा।

5 गुड़ के जल से अभिषेक कर गुड़ व चावल से बनी खीर का भोग लगाएं। मंदार के फूल से पूजा करें। आत्मसुख मिलेगा। बिगड़े काम बन जाएंगे
6 गन्ने के रस से शिवलिंग का अभिषेक करें। भगवान शंकर को भांग, दूब व पान अर्पित करें। रोजगार के अवसर मिलेंगे।

7  सुगंधित तेल या इत्र से भगवान का अभिषेक कर दही, शहद व श्रीखंड का भोग लगाएं। सफेद फूल से शिवजी की पूजा करें।  कार्य में आ रही बाधाएं दूर होंगी।

8  पंचामृत से अभिषेक करें। मावे की मिठाई का भोग लगाएं। लाल फूल से भगवान की पूजा करें। धन लाभ होगा।
9  हल्दी युक्त दूध से अभिषेक कर बेसन की मिठाई का भोग लगाएं। पीले फूल से शिवजी की पूजा करें। रोगों से मुक्ति मिलेगी।
10  नारियल पानी से अभिषेक कर उड़द से बनी मिठाई का भोग लगाएं। गेंदे के फूल चढ़ाएं।  विवाह के लिए रिश्ते आएंगे।
11  तिल के तेल से अभिषेक कर मिठाई का भोग लगाएं । शमी के फूल से शिवजी की पूजा करें।  प्रतियोगी परीक्षा में सफलता मिलेगी।

12  केसरयुक्त दूध से शिवजी का अभिषेक कर दही-चावल का भोग लगाएं। पीली सरसों और नागकेसर से पूजा करें।  परिवार में प्रेम बढ़ेगा।

भगवान शिव आरोग्य के देवता हैं। वे सभी बीमारियों से मुक्ति दिलाते हैं। यदि आप किसी बीमारी से ग्रसित हैं और काफी इलाज करवाने के बाद भी आपका रोग ठीक नहीं हो रहा हैं तो शिवरात्रि के दिन पूजा अभिषेक जरूर करे |  शीघ्र ही शिवजी की कृपा से आपका रोग दूर हो जाएगा।
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-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- "ज्योतिष का सूर्य" राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, शांतिनगर, भिलाई, मोबाईल नं. 9827198828

बुधवार, 11 जनवरी 2017

कब ? और कैसे ? मनायें मकर संक्रांति......

कब ? और कैसे ? मनायें मकर संक्रांति......

साथियों, नमस्कार सर्वप्रथम आप सभी देश वासियों को मकर संक्रांति के पावन अवसर पर ढेर सारी शुभकामनाएं । "संक्रमणति इति संक्रांति" अर्थात् एक राशि से दूसरी राशि पर सूर्य के राशि प्रवेश को ही  "संक्रांति" कहते हैं।

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

हिन्दु, हिन्दुत्व और इष्टदेव की साधना तथा प्राच्य ज्योतिष.....

हिन्दु, हिन्दुत्व और इष्टदेव की साधना तथा प्राच्य ज्योतिष.....


"ज्योतिष के सरलीकरण का मतलब ये नहीं प्राच्य ज्योतिष के श्लोकबद्ध सिद्धांत-सूत्रों को तोड़-मरोड़ कर रखा जाय...यह बर्दाश्त नहीं ..."

साथियों,
पारम्परिक ज्योतिषियों को छोड़ जहां आजकल के कुछ मुठ्ठी भर कथित ज्योतिषीयों द्वारा ज्योतिष को अपने अपने ढंग से अलग-अलग फलकथनाध्यायों में पॉकेट-बुक्स के माध्यम से जिस ज्योतिष के रूप-स्वरूप तथा भ्रान्तिपूर्ण योगायोगों को परिभाषित किया जा रहा है, उससे में थकित, चकित और हतप्रभ हुं। कि आखिर ये लोग ज्योतिष को और कितना नुकसान पहुंचायेंगे, हालाकि यह शास्वत शास्त्र है, जिसको कोई आंच नहीं आ सकता। हां, आम जनमानस भ्रमित हो अवश्य जाता है, जिससे इस विधा से लोगों अनास्था बढ़ने के आसार पुख्ता होने लगते हैं। 
इस लेख मे मैं अपने जीवन से जड़ी एक घटना का भी जिक्र करूंगा मैं अपने जन्म स्थान यूपी के जनपद देवरिया में स्थित मौना गढ़वां से वाराणसी की यात्रा में था। बीच में एक स्टेशन पड़ता है मऊ जं., वहां एक एक बंधु सवार हुये। चर्चा चल पड़ी उन्होंने कहा कि फलित ज्योतिष से जुड़े कई अलग-अलग ग्रंथों का अध्ययन किया लेकिन हर ग्रंथों मे फलकथन भिन्न मिला ऐसे में जातक को किस प्रकार से सटीक फलकथन कर संतुष्ट किया जाय ? मित्रों यह बात तो सही है भृगु संहिता, वृहदज्जातकम्, जातकपारिजात, षटपंचासिका (कुंजी), पराशर संहिता सहित तमाम ग्रंथों में द्वादश भाव तथा भावस्थ ग्रहों के फल कथन में ना केवल भिन्नता है बल्कि कई योगों को लेकर मत मतांतर भी हैं। मैने उनसे कहा कि बंधुवर, अभीतक पिछले १६ या १७ वर्षों के अध्ययन में पाया कि-  ज्योतिष तो त्रिस्कन्ध है यानी इसके तीन प्रमुख स्तम्भ हैं – गणित (होरा), संहिता और फलित | केवल फलित पढ़ कर, मुझे नहीं लगता कि मैं ज्योतिष का ज्ञान ले सकता हूँ | ज्योतिष का तो अर्थ ही ज्योति पिंडो का अध्ययन है, केवल कुंडली बांचने से मैं ज्योतिषी नहीं बन सकता | मेरा मानना है कि यही कारण है की बहुत से ज्योतिषियों की भविष्यवाणी ६०% सही और ४०% गलत या प्रायः गलत होती हैं |
ज्योतिष की वगैर पारंगतता और ईष्टदेव की कृपा एवं फलकथन में पराश्रयी कभी सटीक दैवज्ञ नहीं बन सकता। हमारी चर्चा अब मुकाम की ओर बढ रही थी, इधर ट्रेन भी वाराणसी जंक्शन पहुंचने वाली थी। मैने उनसे कहा कि जिस प्रकार हर महाभारत का अध्ययन करने वाला "टेस्ट-ट्यूब-बेबी" का आविष्कारक नहीं बन सकता।
प्रसंगवश मुझे उस वैज्ञानिक की बात याद आ रही है जिसने "टेस्ट-ट्यूब-बेबी" की खोज की थी। उन्होंने अपने जीवन काल के ४दशक का समय इस शोध में व्यतीत किया तदुपरान्त सफलता मिलने के बाद उनसे प्रेस रिपोर्टर ने पूछा कि - आपने इस विषय पर रिसर्च किस पद्धति या बुक से किया ? तो उन्होंने तपाक से जबाब दिया कि - भारतीय धर्मग्रंथों में एक ग्रंथ है जिसका नाम है 'महाभारत' । मैने 'महाभारत' के आदिपर्व में धृतराष्ट्र की पत्नि गांधारी द्वारा महर्षि व्यास के बताये अनुसार वीर्य संग्रह के १०० टुकड़े कर अलग अलग पात्रों में रखा गया और किसी भी वस्तु के १०० टुकड़े किये जायेंगे तो वह १०१ हो ही जायेंगे, और परिणाम १०० कौरव तथा उनकी १ बहन का जन्म हुआ" इसी कथा को मैंने बार-बार पढा और उस पर ४० वर्षों तक लगातार अध्ययन किया तब जाकर यह सफलता मिली मैं इस उपलब्धि को महाभारत को समर्पित करता हुं। 
उन्होंने आगे कहा कि मैंने ज्ञान-समुद्र महाभारत का ४० वर्षों तक लगातार गोता लगाया तब जाकर मैं मात्र एक मोती चुन पाया हुं।
कहने का मतलब यह था कि, आज जिस प्रकार के ज्योतिष के सरलीकरण के प्रतिस्पर्द्धा में वैदिक गणीतिय ढांचे को तहस-नहस किया जा रहा है वह ना केवल चिन्तनीय बल्कि निन्दनीय भी है।

सीधे कुंडली पढना, जल्दी से जल्दी फलित बांचना, बस यही ज्योतिष का अर्थ रह गया है |

वादी व्याकरणं विनैव विदुषां 
धृष्टः प्रविष्टः सभां
जल्पन्नल्पमतिः स्म्यात्पटुवटुभङ्ग्वक्रोक्तिभिः |
ह्रीणः सन्नुपहासमेति गणको गोलानभिग्यस्तथा
ज्योतिर्वित्सदसि प्रगल्भगणकप्रश्नप्रपन्चोक्तिभिः ||

अर्थात – जिस प्रकार तार्किक व्याकरण ज्ञान के बिना पंडितों की सभा में लज्जा और अपमान को प्राप्त होता है, उसी प्रकार गोलविषयक गणित के ज्ञान के अभाव में ज्योतिषी ज्योतिर्विदो की सभा में गोलगणित के प्रश्नो के सम्यक् उत्तर न दे सकने के कारण लज्जा और अपमान को प्राप्त होता है |

आज भारतेतर देशों में ज्योतिष के प्राच्य सिद्धांत-सूत्रों के संस्कृत श्लोकों से छेड़-छाड़ नहीं किया जाता, वरन एक-एक संदर्भों पर विशेष पारखी नजर से शोध किया जाता है। और प्राप्त परिणामों के संदर्भ-सूत्रों को नयी तकनीकि से जोड़कर उसका टेक्नीकल वेश (आधार) बनाकर एक के बाद एक नयी नयी खोज कर आसमां से भी ऊपर खगोल की गहराईयों तक अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे हैं। वहीं भारत के हम रहवासियों ने ज्योतिष का संदर्भ ही बदल डाला है। जो विद्वद् समाज को एक जूट हो लगाम लगाने की आवश्यकता है।

-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक -"ज्योतिष का सूर्य" राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, हाऊस नं. - 1299, सड़क- 26, शांतिनगर, भिलाई, जिला- दुर्ग, छत्तीसगढ़-490023
Mod.no.-9827198828

गुरुवार, 5 जनवरी 2017

शिक्षा मे क्षेत्र / विषय चयन करने में ज्योतिष उपयोगी हो सकता है....

शिक्षा मे क्षेत्र / विषय चयन करने में ज्योतिष उपयोगी हो सकता है....


शिक्षा के क्षेत्र में ज्योतिष की उपयोगिता अत्यंन्त महत्वपूर्ण है । किस विद्यार्थी के लिए क्या विषय उपयुक्त होगा यह जानकारी देने वाला एक मात्र ज्योतिष शास्र है। कौन सा कौन सा जातक किस किस विषय में पारंगत हो सकता है, यह ज्योतिष से ज्ञात किया जा सकता है । जैसे विद्या प्राप्ति के लिए प्रबल योगकारक ग्रह सूर्य हो तो उच्च शिक्षा का योग बनता है । यदि विद्या स्थान मे
सूर्य - कुम्भ, मिथुन व तुला राशि में हो तो कानुन से संबधित विषयो (फौजदारी ) में सफलता प्राप्त होती है । यदि यही सूर्य धनुं एवं मेष राशि मे हो तो भाषा विषय (आर्टस) में अधिक सफलता प्राप्त होती है। सामान्य रूप से सूर्य भाषा व कानूनी मे सफलता देता है ।

हालॉकि उपरोक्त ज्योतिष सिद्धांत के संविधान सूत्रों से अलग मेरा स्वयं का मन्तव्य है कि कल हमारे भिलाई स्थित ज्योतिष कार्यालय मे 5 जनवरी 2017 को एक अद्भुत कुंडली देखने को मिली जिसमें तृतीयस्थ सूर्य उच्च के हैं , पंचमेश बुध भी साथ है, इसका मतलब इस जातक को आईटी सेक्टर में होना चाहिये, लेकिन इससे अलग वे "राजभाषा विभाग, भारत सरकार में उच्चपद पर" पदस्थ हैं, मैं हतप्रभ था। उनसे मैंने कहा कि आपको परमाणु उर्जा यानी रासायनिक मामलों के अनुसंधान कर्ता होना चाहिये लेकिन ठिक विलग आपका क्षेत्र कैसे है। तो मित्रों इस उलफेर का कारण यह था कि पंचम भावस्थ मंगल और वृहस्पति जातक को परमाणु वैज्ञानिक की जगह "भाषा वैज्ञानिक" बना दिया। अब आईये अन्य ग्रहों के विषयगत ग्रहयोगों को समझने का प्रयास करते हैं।

चन्द्र मन का कारक ग्रह है । यदि चन्द्र कर्क का प्रथम स्थान मे हो तो शास्त्रीय विषयो में अधिक सफलता देता है ।

मंगल सामान्य रूप से ईन्जीनियरिंग से संबंघित विषय डोक्टरी, तथा आई.ए.एस इत्यादि सफलता देता है ।

बुध वाणिज्य, अकाउन्टिंग, शिक्षा, सी.ए.एवं सी.एस. इत्यादी मे सफलता देता है ।

गुरु पंचम मगत हो तो मानव शास्त्र तथा अर्थशास्त्र में अधिक सफलता देता है । यदि यह वृष, कन्या व मकर राशि मे हो तो जिओलॉजी, बायोलॉजी तथा कृषि विज्ञान में सफलता देता है । साथ में मगंल बुध इत्यादी ग्रहो का भी बल प्राप्त हो तो डॉक्टरी क्षेत्र मे सफलता प्राप्त होती है ।

शुक्र मनोरंजन तथा कलाकारिता सम्बन्धित विषयो जैसे नाट्यकला, फिल्म म्युजिक तथा कविता-कथा इत्यादी मे सफलता है।

शनि स्वभाव से ही मन्द गति का है । अतः विद्या स्थान में हो तो विद्या प्राप्ति में विलम्ब करता है । विशेष रूप से मेष, वृश्चिक, कर्क एवं सिंह राशि में हो तो । इसके अतिरिक्त योगकारक हो तो - रसायणशास्त्र, यन्त्रविद्या, तन्त्रादि गूढ विद्या देता है ।

राहु एवं केतु शनि की तरह ही विद्या मे रुकावट व विलम्ब करते है । परंन्तु गूढ विद्या, भूगर्भशास्त्र, यन्त्र - तन्त्र शास्त्र तथा लेखन कला में निपुण बनाता है । पेन्टींग, फोटोग्राफी, चित्रकला, इत्यादी में भी सफलता देता है। अतः ज्योतिष शास्त्र से समय में ही विषय चयन इत्यादी में सहायता प्राप्त हो सकती है ।

-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, रावण संहिता विशेषज्ञ एवं संपादक-"ज्योतिष का सूर्य " राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, हाउस नं. - 1299, सड़क-26, शांतिनगर, भिलाई, जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ़