ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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सोमवार, 4 मार्च 2013

ऊंटों के विवाह में, गधे गीत गाते हैं....??

ऊंटों के विवाह में, गधे गीत गाते हैं....??

मित्रों, सुप्रभातम्...आज के सन्दर्भ-चिन्तन में मैं बस इतना कहना चाहूँगा कि- आप जिस रंग के ग्लास लगे चश्मे से संसार को देखेंगे, वैसा ही आपको संसार दिखेगा, अर्थात् देश की राजनीतिक हालात अथवा उस पार्टी के कार्यकर्ताओं को उसी निगाह से हर व्यक्ति को देखने व समझने की नासमझी करते हैं..हालॉकि हर कोई उनके जैसा नहीं होता। विशेष तौर पर बात जब भारतीय संस्कृति और भाईचारे की होती हो और उसको लेकर राजनीति होने लगे तो हमारे जैसे लोग भला क्या तर्क दे पायेंगे...इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है..
उष्ट्राणां विवाहेषु , गीतं गायन्ति गर्दभाः । परस्परं प्रशंसन्ति , अहो रूपं अहो ध्वनिः ।।

ऊंटों के विवाह में, गधे गीत गाते हैं । एक दूसरे की बढाई करते हैं, वाह क्या सुंदरता है, वाह क्या गाना है ॥

क्या विद्योत्तमा की जरुरत है मनमोहन सरकार को.....???


ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे

क्या विद्योत्तमा की जरुरत है मनमोहन सरकार को.....???

तकरीबन डेढ़ लाख वर्ष पूर्व प्रभु श्रीराम जी द्वारा प्रदत्त उपहार सुनामी से बचाने वाला अमोघ अस्त्र ''रामसेतु''....उस पर भी श्री मनमोहन सरकार की वक्र दृष्टि....से कालिदास जी के उस वाकये को याद दिलाती है...जिस समय जिस डाल पर बैठे थे उसी डाल को काट रहे थे।, अन्ततः उन्हें साजिश के तहत विद्योत्तमा के समक्ष प्रस्तुत किया गया और वे ही एक दिन संस्कृत साहित्य के प्रख्यात कवि कालिदास हुए.....लेकिन विद्योत्तमा कहाँ से लायेंगे मनमोहन जी...यह यक्ष प्रश्न है..? और नहीं मिली विद्योत्तमा तो भारत को सुनामी के आगोश में डूबो देने का जख्म सदा सदा के लिये भारतीयों को देकर चले जायेंगे.....। -ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे

'शिवधाम' बना छत्तीसगढ़ प्रदेश

10 मार्च महाशिवरात्रि पर विशेष....

'शिवधाम' बना छत्तीसगढ़ प्रदेश

० राजनांदगांव में 108 फीट ऊंचा शिवलिंग श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र


Dr.S.K.Mishra
छत्तीसगढ़ प्रदेश एक ओर जहां वनाच्छादित क्षेत्र होने से सुंदर एवं प्राकृतिक वातावरण के साथ विशेष महत्व रखता है, वहीं दूसरी ओर धार्मिक आस्था भी प्रदेश के नागरिकों में कूट-कूटकर भरी हुई है। पूरा प्रदेश विशेष रूप से शिवभक्ति से ओतप्रोत दिखाई पड़ता है। कलचुरी राजाओं की रियासत भी शिवभक्ति से भरी पड़ी है। भोरमदेव में स्थापित सैकड़ों शिवलिंग इस बात को पुष्ट करते देखे जा सकते है। कल्याणकर्ता आदि देव भगवान शंकर की पूजा अर्चना भी बड़ी सहज होने से भक्तों की संख्या सबसे ज्यादा है। यह कहना भी गलत न होगा कि छत्तीसगढ़ ही नहीं वरन पूरे देश में भगवान शंकर ही भक्तजनों के आदि देव बने हुये है। राजाओं के शासनकाल से लेकर अब तक बसे-बसाये जाने वाले छोटे-बड़े कस्बों से लेकर शहरों तक के विकास में रिहायशी तालाबों और नदी तटों पर भगवान शिव के मंदिरों की स्थापना ने भी इस बात का प्रमाण दिया है कि अखिल हिन्दुस्तान पुरातन काल से शिव भक्ति में लीन रहा है। बड़ा ही साधारण और सरल मात्र छह अक्षरों का महामंत्र 'ऊँ नम: शिवायÓ ने अनादिकाल से शिव आराधकों को जो विश्वास और शक्ति प्रदान की है, वह आज भी निरंतर जारी है और आने वाले समय में भी धर्म और संस्कृति को ताकत देता रहेगा। भगवान शिव के सबसे शक्तिशाली मंत्र के रूप में शिव आराधकों द्वारा निम्न मंत्र का जाप किया जाना चाहिये।
ऊँ वंदे देव उमापतिं सुरगुरूं, वंदे जगत्कारणं।
वंदे पन्नभूषणं मृगधरं, वंदे पशुनाम पतिं।।
वंदे सूर्य शशांक, वह्विनयनं, वंदे मुकुंदप्रियमं।
वंदे भक्त जनाश्रयं च वरदं, वंदे शिवम शंकरं।।
विशाल शिव प्रतिमा के दर्शन कर अभिभूत हो रहे शिवभक्त
राजनांदगांव नगर में रायपुर से नागपुर मार्ग राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 6 पर पुलिस प्रशिक्षण संस्था के सामने बनाये गये बर्फानी धाम में मां पाताल भैरवी मंदिर के साथ ही विशालकाय शिवलिंग मिलों दूरी से लोगों को दर्शन लाभ दे रहा है। इसी मंदिर के ऊपरी हिस्से में 13 फीट ऊंची भगवान शंकर की भव्य प्रतिमा शिव भक्तों को सुख और शांति प्रदान कर रही है। काले पत्थर और लोहे से बनाई गई कल्याणकर्ता भगवान भोलेनाथ की उक्त प्रतिमा में भोले भंडारी द्वारा धारित त्रिशुल की सुंदरता भी आकर्षण को अलग ही रूप प्रदान कर रही है। प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु इस इकलौते मंदिर में आदिदेव की उपासना और दर्शन के लिये पहुंच रहे है। भगवान शंकर की इस विशाल प्रतिमा के समक्ष ही द्वादश ज्योतिर्लिंग सोमनाथ से लेकर श्री शैल के मल्लिकार्जुन, उज्जैन के महाकाल, ओंकार के परमेश्वर, हिमाचल के केदार, डाकिनी के भीमशंकर, काशी के विश्वेश्वर, गौतमी तट के त्रयंवकंम, चिताभूमि के वैद्यनाथ, दारूका वन के नागेश्वर, सेतुवन के रामेश्वरम और शिवालय में स्थित घुसमेश्वर ज्योतिर्लिंग के सामने शीश झुकाते श्रद्धालु सीधे शिवधाम का आनंद उठाते प्रतीत होते है। भगवान शिव का सौम्य रूप हाथों में डमरू और त्रिशुल के साथ बड़ा ही सुख शांति देने वाला अवसर प्रदान कर रहा है। 108 फीट की विशाल शिवलिंग और 13 फीट ऊंची भगवान शिव की अद्भुत प्रतिमा पूरे अंचल में ख्याति प्राप्त कर चुकी है। शिवलिंग और जलहरि के आकार में बना विराट मंदिर सभी धर्मावलंबियों को आकर्षित कर रहा है। मंदिर के ऊपरी हिस्से में 6 अप्रैल 2008 से 14 अप्रैल 2008 तक विशेष सहस्त्र चंडी महायज्ञ के साथ भगवान शिव और द्वादश ज्योतिर्लिंग की स्थापना की गई है।
डीपाडीह के महेशपुर में है दसवीं शताब्दी का शिव-मंदिर
अंबिकापुर जिले के अंतर्गत आने वाले डीपाडीह के पास महेशपुर एक ऐसा स्थान है जहां दसवीं शताब्दी का प्रचीनतम और विशाल शिव मंदिर स्थापित है, कहा जाता है कि डीपाडीह के लगभग 6 किमी के दायरे में प्राचीन भव्य मंदिरों के अवशेष टीलों के रूप में आज भी विद्यमान है। इसी क्षेत्र में उत्खनन के बाद 6 प्रमुख और 74 लघु मंदिर होने की जानकारी मिली। इनमें से अधिकांश शिव मंदिर है। सामंत राजा के नाम से पुजित स्थल में पशुधर शिवजी की विशालकाय चतुर्भुजी प्रतिमा, कार्तिकेय, नंदी एवं अन्य देवी-देवताओं के साथ स्थापित है। सामंत सरना का मुख्य शिव मंदिर आकार में बड़ा तथा भव्य है। गर्भगृह में चौकोर पीठ पर 7 फीट ऊंचा शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के टीलों की सफाई में कार्तिकेय, शिव-गौरी, उमा-महेश्वर की प्रतिमाएं पाई गई है। शिव तथा पार्वती के शिरो भाग पर बहुत ही आकर्षक केश सज्जा श्रद्धालुओं को यहां खींच लाती है। एक अनोखी प्रतिमा में शिवजी का एक पैर फरसे पर रखा है, अधोवस्त्र भी गिरते दिख रहे है। शिव प्रतिमा के चेहरे का भाव ऐसा दिखाई पड़ रहा है, मानो समस्त विश्व को भस्म कर निर्लिप्त भाव से निहार रहे है। एक ऐसा शिवलिंग भी इस स्थान पर पाया गया है, जिसमें 108 शिवलिंग बने हुये है। एक चतुर्भुजी शिवजी की प्रतिमा तोरन में कच्छप, मीन, नृसिंह, वाराह, राम, परशुराम, वामन-बलराम तथा बुद्ध तथा कल्कि को स्थापित किया गया है। महेशपुर नामक स्थान में रेणुका नदी के किनारे विशाल शिव मंदिर है। इस मंदिर का एक बड़ा भाग नष्ट प्राय है। महेशपुर ग्राम मुख्य रूप से शैव संस्कृति का केंद्र बिंदु दिखाई पड़ता है। यहीं पर भगवान शिव के मुख्य शिवलिंग के चारों ओर एकादश रूद्र स्थापित है।
त्रिधाम शिव मंदिर जांजगीर-चांपा एवं भोरमदेव बना खजुराहो
जांजगीर-चांपा स्थित 'त्रिधाम शिव मंदिरÓ प्रागैतिकहासिक काल का मंदिर माना जाता है। भारत वर्ष स्वर्ण युग काल के ऐतिहासिक चित्रण से परिपूर्ण यह मंदिर शिवभक्तों के आकर्षण का केंद्र रहा है। सृष्टि के कल्याणकर्ता भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर में महाशिवरात्रि के अवसर पर लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिये पहुंचते है। धर्म के अलावा यह मंदिर वास्तुकला का अनोखा संग्रहालय भी माना जा सकता है। मंदिर की सुंदरता और भव्यता के साथ शिव उपासकों द्वारा विभिन्न अवसरों पर मंदिर परिसर में आयोजन किये जाते रहे है। पुरातत्व की दृष्टि से भी इस मंदिर का महत्व अपने आप में सिद्ध होता रहा है। छत्तीसगढ़ प्रदेश के कबीरधाम जिले के अंतर्गत 11वीं शताब्दी में बनाये गये मंदिर  'भोरमदेवÓ का इतिहास भी शैव काल से जुड़ा हुआ है। मंदिर की आकर्षक वास्तुकला सैलानियों को आकर्षित करने में कामयाब हो रही है। जिला मुख्यालय से 21 किमी की दूरी पर स्थित यह मंदिर साकरी नदी के किनारे नागवंशी राजाओं द्वारा बनवाया गया था। मंदिर परिसर में स्थापित शिवलिंग और जलहरि अनेक रूपों और अनेक दिशाओं में होने से भगवान शिव की चारों दिशा में कृपा को बरसात प्रतीत हो रहा है। शिवधाम के रूप में अलग पहचान बना चुके भोरमदेव मंदिर की ख्याति खजुराहों से तुलना कर देखी जा रही है।
शिवरीनारायण में हैं चंद्रचूड़ महादेव
छत्तीसगढ़ के धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्रों में शिवरीनारायण का नाम प्रमुख रहा है। कहा जाता है कि इसी स्थान पर शबरी ने प्रभु राम को बेर खिलाये थे। उसी शबरी के नाम पर शबरीनारायण नाम बाद में शिवरीनारायण हो गया। यहीं पर नर-नारायण मंदिर के समीप शिवजी का एक अत्यंत प्राचीन मंदिर है। इस प्रसिद्ध मंदिर को चंद्रचूड़ महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है। चेदी संवत 919 में निर्मित यह मंदिर नारायण के इस क्षेत्र में अपवाद स्वरूप जाना जाता है। शिवरीनारायण से लगभग 3 किमी की दूरी पर खरौद नामक स्थान है, इस स्थान को शिव मंदिर तथा शैव मठो के कारण शिवकांक्षी कहा जाता है। शिव की विराट रूप की पूजा अंचल के लोग बुढ़ा महादेव के रूप में करते है। नगर के प्रवेश द्वारों पर तालाब एवं उनके किनारे शिव मंदिरों की कतार है। लक्ष्मणेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर भी यहीं स्थापित है। तीन सौ वर्ष पुराने आठवीं शताब्दी के मंदिर के गर्भगृह में एक अद्भुत शिवलिंग है, जिसमें सवा लाख छिद्र है। इस स्थान पर हर वर्ष फरवरी माह में मेला लगता है और महाशिवरात्रि के अवसर पर बड़ा मेला भी यहीं लगाया जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि शिवलिंग के सवा लाख छिद्र में सवा लाख चांवल के दाने चढ़ाने से हर मनोकामना पूर्ण होती है। भगवान शिव को प्रसन्न करने उनके भक्तों द्वारा मंदिर परिसर को इस महामंत्र से गुंजायमान किया जाता रहा है।
ऊँ ह्वौ ऊँ जँू स:, भूभुर्व: स्व. त्रयम्बकम्,
यजामहे सुगंधिम् पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारूकमिव वंंधनान्, मृत्योर्मुक्षियमाम्मृतात्
भूर्भुव: स्वरों जँू स: ह्वौं ऊँ।।
अर्थात समस्त संसार के पालनहार तीन नेत्रों वाले शिव की हम आराधना करते है। विश्व में सुरभि फैलाने वाले भगवान शिव मृत्यु न कि मोक्ष से हमें मुक्ति दिलायें।


                                          प्रस्तुतकर्ता
                                       (डा. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                          

बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

भारतीय संस्कृति ही सत्यं है। भारत ही शिवं है, शिव-पार्वती परिवार ही सुंदरम है.....

भारतीय संस्कृति ही सत्यं है। भारत ही शिवं है,

शिव-पार्वती परिवार ही सुंदरम है.....


पं. विनोद चौबे, 09827198828, Bhilai (C.g.)

प्रिय पाठकों,
विगत दिनों एक सवाल के जवाब में छ.ग. के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा था कि- जिस देश के लोगों को भारत ने कपड़ा पहनना सिखाया, उन लोगों द्वारा हमारी देश की संस्कृति पर सवाल उठाया जाना हास्यस्पद है। इस बयान से मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का विश्वपटल पर बतौर मुखर वक्ता के रूप में स्थापित करने का काम किया। ऐसा हो भी क्यों न क्योंकि विश्व की अति प्राचीन संस्कृति भारत की संस्कृति है, जो उसी तथाकथित अमेरिका के सिकागो धर्म सम्मेलन में गीता का पाठ पढ़ाने वाले स्वामी विवेकानन्द ने वासांसि जिर्णानि यथा विहाय का जीवन-सत्य-दर्शन सूत्र दिया था। अर्थात् वस्त्र का उपयोग गीता निर्माण से भी आकलन किया जाय तो तकरबीन 6000-7000 वर्ष पुरानी तो है ही।
इस लिहा•ा से तो कम से कम भारत के गंगा-जमुनी संस्कृति में पाश्चात्य संस्कृति का दंश देने वाले अथवा केन्द्र सरकार द्वारा तथाकथित तौर पर प्रगतिशिलता का पाठ पढ़ाकर अमेरिका के दबाव में भारतीय असंख्य हिन्दू जनमानस पर चोट पहुँचाते हुए सेतु समुद्रम परियोजना के तहत सदा-सदा के लिए आदर्श के प्रतीक भगवान राम के सेतु को तोडऩे पर अमादा है, क्या इसे भारतीय संस्कृति के अंतर्गत एक अच्छे भ्रातृ-प्रेम, रामराज्य- नीति सहित समाज में संजीवनी का काम करने वाली उन तमाम प्रेरक कथाओं में से एकता का प्रतीक एवं आज के एक लाख अढ़तीस हजार वर्ष पूर्व की नल-नील का वैज्ञानिकता से लवरेज इंजीनियरिंग दक्षता अर्थात् रामसेतु को केवल किताबों तक ही सिमटाकर दफन कर देना चाहती है।
 मित्रों आगामी महाशिवरात्री का महा पर्व आने वाला है जो 10 मार्च को मनाया जायेगा। आईए भगवान शिव के विलक्षण परिवार से अपने जीवन में उनके कुछ आदर्शों को उतारने का प्रयत्न करें। इस अंक को भगवान शिव पर आधारीत कुछ दुर्लभ जानाकरियों को आपके समक्ष प्रस्तुत करने का मेरा यही लक्ष्य है ताकि आप इस शिव परिवार एवं उनसे जुड़े दर्शन को समझ सकें।
आदर्श परिवार की जब भी कल्पना की जाती है, तो हमारे सामने शिव-परिवार का सुंदर चित्र प्रकट हो जाता है, त्याग, समर्पण, एकता, अनुशासन एवं प्रेम के गुणों से ओत-प्रोत। शिव-पार्वती भारतीय दर्शन का पर्याय हैं। सिंधु घाटी-सभ्यता से प्राप्त पशुपतिनाथ एवं मातृदेवी की मूर्तियां इसी बात का प्रमाण हैं। शिव-पार्वती आदर्श दांपत्य जीवन का भी आदर्श उदाहरण हैं। साहित्य, नृत्य, संगीत, लौकिक-जीवन, सभी में तो आशुतोष एवं शिवा मौजूद हैं।
प्राचीन मुद्राओं (सिक्कों) में भी शिव-पार्वती का अंकन मिलता है। हर्षवर्धन के सिक्कों पर शिव-पार्वती का अंकन है, तो यौधेयवंश की मुद्राओं पर कार्तिकेय का। विदेशी शक-पल्लव एवं कुषाण शासकों की मुद्राओं पर भी शिव-पार्वती का अंकन है। यानी, शिव-पार्वती सभी के अराध्य हैं। उनकी अराधना भी सरल, सहज-सुगम है। तभी, शिवालय के गर्भग्रह में सब प्रवेश कर सकते हैं, जबकि शेष मंदिरों के गर्भग्रहों में केवल पुजारी ही प्रवेश करते हैं। शिवपूजा के लिए दुर्लभ चीजों की आवश्यकता नहीं होती। सरलता से प्राप्त सामग्री से शिव का पूजन संभव है। शिव को जल व नाद अत्यंत प्रिय हैं। इसलिए शिव की अराधना जलाभिषेक के साथ स्वरों के नाद के माध्यम से की जाती है। ध्रुपद गायन में शिव-भक्ति नाद के जरिए ही की जाती है। शिव को नटराज भी कहा जाता है, क्योंकि शिव नृत्य के जन्मदाता हैं। उन्हें नटेश्वर भी कहते हैं। तंजौर की नटराज की कांस्य प्रतिमा सत्यं शिवं सुंदरम की अवधारणा का साक्षात रूप है।
शिव भी पार्वती को सम्मान देते हैं। गणेश एवं कार्तिकेय जैसे आज्ञाकारी पुत्र उनके परिवार में हैं। शेर, वृषभ (नंदी), मोर, मूषक व सर्प इंगित करते हैं कि विभिन्न स्वभाव वाले लोग भी परिवार में एक साथ मैत्री व प्यार से रह सकते हैं। शिव-पार्वती की पूजा संपूर्ण देश में की जाती है। शिव-पार्वती समभाव, प्रेम, त्याग के उदाहरण हैं। भारतीय धार्मिक जीवन पर दृष्टि डालें, तो शिव-पार्वती ही एकमात्र ऐसे देवी-देवता हैं, जिनका युगलपूजन किया जाता है। कुल मिलाकर भारतीय संस्कृति ही सत्यं है। भारत ही शिवं है, शिव-पार्वती परिवार ही सुंदरम है...।































छत्तीसगढ़ के संस्कारधानी भिलाई से प्रकाशित ।

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

सदा बसन्तम् हृदयारविन्द्रे भवम भवामि सहितं नमामि....

सदा बसन्तम् हृदयारविन्द्रे भवम भवामि सहितं नमामि....
बसन्त पंचमी के पावन पर्व पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ....।
भारत  अपनी  प्राकृतिक  शोभा  के  लिये  विश्व  विख्यात  है।  इसे  ऋतुओं  का  देश  कहा  जाता  है।ऋतु-  परिवर्तन   का   जो  सुन्दर  क्रम  हमारे  देश  में  है,  वह  अन्यत्र  दुर्लभ  है।बसन्त  ऋतु  की  शोभा  सबसे  निराली  है।  बसन्त  ऋतु  को  ऋतुराज  कहते  हैं क्योंकि  यह  ऋतु  सबसे  सुहावनी,  अद्भुत,  आकर्षक  और  मन  में  उमंग  भर  देने  वाली है।  सचमुच  बसन्त  की  बासन्ती  दुनिया  की  शोभा  ही  निराली  होती  है।  यह  ऋतु  प्रकृति  के  लिये  वरदान  बनकर  आती  है। प्रकृति  में  सर्वत्र  यौवन  के  दर्शन  होते  हैं।  सारा  वातावरण  सुवासित  हो  उठता  है। चम्पा,  माधवी,गुलाब,  चमेली आदि  की  सुन्दरता  मन  को  मोह  लेती  है। कोयल  की  ध्वनि  कानों  में  मिश्री  घोलती  है।  बसन्त  का  आगमन  मनुष्य  जगत  में  भी विशेष  उल्लास  एवं  उमंगों  का  संचार  करता  है।  कवि  एवं  कलाकार  इस  ऋतु से  विशेष  प्रभावित  होते  हैं।  उनकी  कल्पना  सजग  हो  उठती  है।  इस  ऋतु  एक  बड़ी  विशेषता  यह  है  कि  इन  दिनों  शरीर  में  नए  रक्त  का  संचार  होता  है।आहार- विहार  अगर  ठीक  रखा  जाए तो  स्वास्थ्य  की  उन्नति  होती  है। इस  ऋतु में  मीठी  और  तली  वस्तुएं  कम  ख़ानी  चसहिये। चटनी, कांजी, खटाई  आदि का  उपयोग  लाभदायक  है। इस  ऋतु  को  मधु  ऋतु  भी  कहा  गया  है। भगवान  श्रीकृष्ण  ने  गीता  में  कहा  है  कि  मैं  ऋतुओं  में  बसन्त  हूँ।   यह  ऋतु  केवल  प्राकृतिक  आन्नद  का  ही  स्रोत  नहीं  बल्कि  सामाजिक  आन्नद  का  भी  स्रोत  है।
‘बसन्त  भ्रमणं पथ्यम्’  अर्थात्  बसन्त  में  भ्रमण  करना  पथ्य  है।

पुरतःपश्य वसन्तः

प्रणय कामिनि कोमलहृदये,पुरतःपश्य वसन्तः,।
हा हतभाग्ये नववयशीले,निकषा चास्ति न कान्तः।।1
वहति समीरो मंदं मंदं,नीत्वा सौरभ खाद्यम्।
अतिकुलमाला मत्ता विपिने,जनयति गुंजा वाद्यम्।।
कोकिल कूजति रसालविटपे,मा भव भ्राता भ्रान्तः ।।2
धरा सज्जिता तस्याःवदने,दिव्या पीत शाटिका,
खगकुल कलरब गुंजित मधुरा,भव्या सुमन वाटिका।।
गगनं स्वच्छं धरा समृद्धा,भानुः प्रीत्या शान्तः।।3
गंगा नीरं पीत्वा तीरे,स्मृत्वा हर हर गंगे।
भाले भस्म कण्ठे माला,निवसन् साधु संगे।।
सरित् व¬रायाः कृपा प्रसादात्,शिष्टः कोपि न प्रान्तः4
प्रणयकामिनि कोमलहृदये,पुरतःपश्य वसन्तः।
हा हतभाग्ये नव वयशीले,निकषा चास्ति न कान्तः 
द्वारा - समर्थ श्री (संस्‍कृतगंगा फेसबुकवर्गे)