ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

सौभाग्य का प्रतीक है करवा चौथ

सौभाग्य का प्रतीक है करवा चौथ
- ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे
कल कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी करवा चौथ का पर्व है। इस पर्व के साथ कुछ शुभ एवं दुर्लभ संयोग भी बन रहे हैं,सिद्धि योग तथा चतुर्थी पर वृषभ का चंद्रोदय हो रहा है, जिसका स्वामी शुक्र है और शुक्र सौंदर्य एवं आभूषण का अधिपति ग्रह माना गया है, जो कि महिलाओं के जीवन में समृद्धि की वर्षा करेगा एवं शुभता लाएगा। सिद्धि योग सूर्योदय से शुरु होकर अपराह्न 3 बजे तक रहेगा। इस योग में व्रत आरंभ करने से विशेष फल की प्राप्ति होगी। जो सुख-समृद्धि और शुभता प्रदान करने वाला है।
इस दिन पति की दीर्घायु के लिए महिलाएं दिनभर निराहार रहकर व्रत करतीं हैं और रात्रि में चंद्र दर्शन कर पति के हाथ से जल पीकर व्रत को तोड़ती हैं ।
ऐसेे करें करवा चौथ व्रत
सर्वप्रथम करवा चौथ में प्रयुक्त होने वाली संपूर्ण सामग्री को एकत्रित करें। व्रत के दिन प्रात: स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोलकर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें। पूरे दिन निर्जल रहें। दीवार पर गेरू से फलक बनाकर पिसे चावलों के घोल से करवा चित्रित करें। इसे वर कहते हैं। चित्रित करने की कला को करवा धरना कहा जाता है। आठ पूरियों की अठावरी बनाएँ। हलुआ बनाएँ। पक्के पकवान बनाएँ। पीली मिट्टी से गौरी बनाएँ और उनकी गोद में गणेशजी बनाकर बिठाएँ। गौरी को लकड़ी के आसन पर बिठाएँ। चौक बनाकर आसन को उस पर रखें। गौरी को चुनरी ओढ़ाएँ। बिंदी आदि सुहाग सामग्री से गौरी का श्रृंगार करें। जल से भरा हुआ लोटा रखें। वायना (भेंट) देने के लिए मिट्टी का टोंटीदार करवा लें। करवा में गेहूँ और ढक्कन में शकर का बूरा भर दें। उसके ऊपर दक्षिणा रखें। रोली से करवा पर स्वस्तिक बनाएँ। गौरी-गणेश और चित्रित करवा की परंपरानुसार पूजा करें। पति की दीर्घायु की कामना करें। करवा पर 13 बिंदी रखें और गेहूँ या चावल के 13 दाने हाथ में लेकर करवा चौथ की कथा कहें या सुनें। कथा सुनने के बाद करवा पर हाथ घुमाकर अपनी सासुजी के पैर छूकर आशीर्वाद लें और करवा उन्हें दे दें। तेरह दाने गेहूँ के और पानी का लोटा या टोंटीदार करवा अलग रख लें। रात्रि में चन्द्रमा निकलने के बाद छलनी की ओट से उसे देखें और चन्द्रमा को अघ्र्य दें। इसके बाद पति से आशीर्वाद लें। उन्हें भोजन कराएँ और स्वयं भी भोजन कर लें।
पीली मिट्टी से बनी मूर्ति का महत्व :
दिन में पीली शुद्ध मिट्टी से गौरा-शिव एवं गणेशजी की मूर्ति बनाई जाती हैं। उन्हें पाटा पर लाल कपड़ा बिछाकर स्थापित कर सजाते हैं। पूजा के दूसरे दिन उन्हें घी-आटे के बने प्रसाद का भोग लगाकर विसजिर्त करते हैं।
मां गौरा को सिंदूर, बिंदी, चुन्नी तथा शिव को चंदन, पुष्प, वस्त्र पहनाते हैं। श्रीगणेशजी उनकी गोद में बैठते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में दीवार पर एक गेरू से फलक बनाकर चावल, हल्दी के आटे को मिलाकर करवाचौथ का चित्र अंकित करते हैं।

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

शिक्षा कैसी होगी, में किस दिशा में, क्षेत्र में,...

वर्तमान में प्रत्येक व्यक्ति उच्च शिक्षा पाना चाहता है अथवा अपनी सन्तान को उच्च शिक्षा दिलाना चाहता है जिससे वह भविष्य में अच्छी नौकरी या व्यापार करके सुख व समस्या रहित जीवन जी सके। दूसरे शब्दों में यह कह लीजिए कि प्रत्येक व्यक्ति सन्तान को उच्च शिक्षा  दिलाकर उसका अच्छा कैरियर बनाना चाहता है। उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए कुण्डली का चतुर्थ, पंचम एवं द्वितीय भाव में स्थित ग्रह व उनके स्वामियों की स्थिति, पंचमेश, चतुर्थेश, द्वितीयेश के साथ शुभ व अशुभ ग्रहों की स्थिति, दृष्टि व युति, दशमेश व दशम भाव की स्थिति के साथ-साथ चतुर्विशांश कुंडली, दशमांश कुंडली तथा कारंकाश कुंडली का अध्ययन शिक्षा, वाणी, बुद्धि तथा तर्कशक्ति आदि के बारे में बताता है।

 शिक्षा कैसी होगी, जातक भविष्य में किस दिशा में, क्षेत्र में, अपनी आजीविका प्राप्त करेगा व उसके सुखद भविष्य के लिए कौन-कौन क्षेत्र अच्छे रहेंगे, इन प्रश्नों के उत्तर एक ज्योतिषी जन्मकुंडली का विश्लेषण करके बता सकता है।
 कुण्डली के चतुर्थ भाव से विद्या, पंचम भाव से बुद्धि, द्वितीय भाव से वाणी, आठवें भाव से सामान्य ज्ञान एवं गुप्त विद्या तथा दशम भाव से विद्या जनित यश व आजीविका का भान होता है। इन सभी भावों में स्थित ग्रह, इनके स्वामी ग्रह आदि के विश्लेषण से जातक की शिक्षा व विद्या का क्षेत्र कैसा रहेगा तथा भविष्य कैसा होगा यह जाना जाता है।
शिक्षा प्राप्ति के कुछ अनुभूत ज्योतिष योगों की चर्चा करते हैं-
   1-यदि गुरु केंद्र(1,4,7व 10) में हो तो जातक बुद्धिमान होता है। गुरु उच्च अथवा स्वग्रही हो तो और अच्छा फल देता है।
 2-पंचम भाव में सूर्य सिंह राशि में हो तो जातक मनोनुकूल शिक्षा पूर्ण करता है।
    3-बुध पंचम में हो तथा पंचमेश बली होकर केंद्र में स्थित हो तथा शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक बुद्धिमान होता है।
4-पंचमेश उच्च का केंद्र या त्रिकोण में स्थित हो तो जातक पूर्ण शिक्षा पाता है।
5-गुरु शुक्र व बुध यदि केंद्र व त्रिकोण में एक साथ या अलग-अलग स्थित हों तथा गुरु उच्च, स्वग्रही या मित्र क्षेत्र में हो तो सरस्वती योग बनता है। ऐसे जातक पर सरस्वती की विशेष कृपा होती है।
6-दशमेश व पंचमेश का स्थान परिवर्तन अर्थात् दशम भाव का स्वामी पंचम में तथा पंचम भाव का स्वामी दशम में हो तो व्यक्ति अच्छी शिक्षा प्राप्त करता है।
7-बुध, चंद्रमा व मंगल पर शुक्र या गुरु की दृष्टि हो तो भी जातक बड़ा बुद्धिमान होता है।
  8-पंचम भाव में गुरु हो तो जातक अनेक शास्त्रों का ज्ञाता पुत्र व मित्रों से समृद्ध, बुद्धिमान व धैर्यवान होता है।
  9-लग्नेश यदि 12वें या 8वें भाव में हो तो जातक सिद्धि प्राप्त करता है और वह विद्या विशारद होता है।
10-चतुर्थेश सप्तम व लग्न में हो तो जातक बहुत सी विद्या का ज्ञाता होता है।
11-चंद्रमा से गुरु त्रिकोण में हो, बुध से मंगल त्रिकोण में और गुरु से बुध एकादश स्थान में हो तो जातक अच्छी शिक्षा प्राप्त  करके बहुत सा धन अर्जन करता है।
12-शिक्षा प्राइज़ में सूर्य चंद्र, बुध, गुरु, मंगल व शनि ग्रह की विशेष भूमिका है। इसके अतिरिक्त लग्नेश, पंचमेश व नवमेश तथा इन भावों का विश्लेषण भी उच्च शिक्षा प्राप्ति हेतु करना चाहिए। लग्नेश निर्बल हुआ तो बुद्धि व भाग्य व्यर्थ हो जाएंगे, यदि पंचम भाव निर्बल हुआ तो शरीर और भाग्य क्या करेंगे और यदि भाग्य कमजोर हुआ तो शरीर व बुद्धि व्यर्थ होंगे।
13-पंचमेश शुभ ग्रह हो और पंचमेश का नवांशपति भी शत्रु ग्रहों से युत व दृष्टा न हो तो उच्च शिक्षा प्राप्त होती है।
 14-गुरु केंद्र या त्रिकोण में होकर शनि, राहु, केतु से युत या दृष्ट हो तो जातक उच्च शिक्षा प्राप्त कर विद्वान बनता है।
15-गुरु द्वितीयेश होकर बलवान सूर्य व शुक्र से दृष्ट हो तो जातक व्याकरण शास्त्र का ज्ञाता होता है।
16-पंचम भाव व पंचमेश बुध व मंगल के प्रभाव में हो तो जातक व्?यापार संबंधी उच्?च शिक्षा प्राप्त करता है।
17-धन भाव में मंगल शुभ ग्रहों से दृष्ट हो या धनभाव में चंद्र, मंगल की युति हो व बुध द्वारा दृष्ट हो तो जातक गणित विषय का ज्ञाता होता है।
18-यदि द्वितीयेश से 8वें, 12वें शुभ ग्रह हों तो जातक प्रखर विद्वान होता है।
 19-लग्नेश, पंचमेश, नवमेश में परस्?पर युति या दृष्टि संबंध हो तो जातक उच्च शिक्षा प्राप्त करता है।
 20-गुरु व चंद्रमा एक-दूसरे के घर में हो तो चंद्रमा पर गुरु की दृष्टि हो तो सरस्वती योग होता है, जिससे जातक साहित्य, कला व काव्य में उच्च शिक्षा पाकर लोकप्रिय होता है।
21- गुरु लग्न में हो तथा चंद्र से तृतीय सूर्य, मंगल, बुध हो तो जातक विज्ञान विषय में उच्च शिक्षा पाकर वैज्ञानिक बनता है।
 22-यदि मेष लग्न हो और पंचम में बुध तथा सूर्य पर गुरु की दृष्टि पड़े तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
 23-यदि वृष लग्न हो और उसमें सूर्य बुध की युति लग्न, चतुर्थ या अष्टम में हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।  
 24-यदि मिथुन लग्न हो और लग्न में शनि, तृतीय में शुक्र तथा नवम में गुरु स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
25-यदि कर्क लग्न हो और उसमें लग्न में बुध, गुरु व शुक्र की युति हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
26-यदि सिंह लग्न हो और मंगल-गुरु की युति चतुर्थ, पंचम या एकादश भाव में हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
  27-यदि कन्या लग्न हो और उसमें एकादश भाव में गुरु, चंद्र तथा नवम भाव में बुध स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
28-यदि तुला लग्न हो और अष्टम में शनि गुरु द्वारा दृष्ट हो तथा नवम में बुध स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
 29-यदि वृश्चिक लग्न हो और उसमें बुध सूर्य हो तथा नवम भाव में गुरु चंद्र स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
30- यदि धनु लग्न हो और उसमें गुरु हो तथा पंचम में मंगल व चंद्र स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
 31- यदि मकर लग्न हो और उसमें शुक्र-मंगल की युति हो तथा पंचम भाव में चंद्र गुरु द्वारा दृष्ट हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
32- यदि कुंभ लग्न और एकादश भाव में चंद्र तथा षष्ठ भाव में गुरु स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
33- यदि मीन लग्न हो और उसमें गुरु षष्ठ, शुक्र अष्ठम, शनि नवम तथा मंगल-चंद्र एकादश भाव में हों तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
(आप अपनी कुण्डली में उक्त योगों को विचारकर शिक्षा संबंधी विश्लेषण कर सकते हैं।)

पितृ-ऋ ण

पितृ-ऋ ण
जन्म-कुण्डली में कुछ ग्रहों की खऱाब स्थिति या प्रभाव के कारण जातक जीवन में कई ऋ णों का भागी बन जाता है। इसके चलते जि़न्दगी में उसकी प्रगति पर भी असर पड़ता है, क्योंकि कुछ ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव अच्छे ग्रहों को भी सकारात्मक प्रभाव देने से रोक देते हैं। अत: ऐसी कुण्डली वाले लोगों को हमेशा इन ऋ णों से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए, ताकि ग्रह अपना सर्वश्रेष्ठ फल दे सकें। ऐसा करने से जातक अपना खुशनुमा और समृद्ध जीवन बना सकता है। अलग-अलग तरह के ऋ ण और उनकी वजह, जो जातक की जि़न्दगी पर असर डाल सकती हैं, ऐसे हालात से निपटने के लिए उपाय भी दिये गये हैं। इन उपायों को करने से पहले हमें शेष परिजनों की कुण्डलियों का भी अध्ययन करना चाहिए और सभी से बराबर रकम लेकर उस पैसे को इन उपायों में ख़र्च करना चाहिए। मसलन यदि हमें पितृ-ऋण की शान्ति के लिए उपाय करना है और परिवार में 15 लोग हैं, तो सभी से बराबर धन इक_ा कर फिर उसे दान करना चाहिए।
अगर परिवार में कोई व्यक्ति ऐसा है जो इस कार्य में सहभागिता नहीं करना चाहता हो या कोई भौतिक देह त्याग चुका है, तो भी उसे इस कार्य में गिना जाना चाहिए और शान्ति करने वाले को अपनी तरफ़ से उसका हिस्सा जमा रकम में मिला देना चाहिए। हालाँकि मिलाया गया यह अतिरिक्त हिस्सा उस व्यक्ति के असल हिस्से से 10 गुना अधिक होना चाहिए। ग़ौरतलब है कि लाल किताब के अनुसार परिवार में सभी ख़ून के संबंधी जैसे कि लड़की, पोती, बहू, बहन, दोहिता, पोता, बाबा, पड़दादा, बुआ, पुत्र, स्त्री, बहन, भांजा-भांजी आदि शामिल हैं। इस तरह उपाय करने से जातक ऋ ण से मुक्त हो जाता है, अन्यथा इन ऋणों के नकारात्मक परिणामों का ख़तरा उस सिर पर सदैव मंडराता रहता है।
इसलिए ज्योतिषी के लिए सबसे पहले कुण्डली में इन ऋ णों का पता लगाना निहायत ज़रूरी है। इसके बाद ही उसे अन्य भविष्यवाणियाँ और शान्ति के उपाय बताने चाहिए। जब तक ऋ णों से मुक्त होने के उपाय नहीं किए जाएंगे, तब तक बाक़ी उपाय करना भी निष्फल ही साबित होगा।
पितृ-ऋ ण
लक्षण :  लाल किताब के मुताबिक़ दूसरे, पाँचवें, नौवें या बारहवें भाव में जब शुक्र, बुध या राहु या फिर इनकी युति हो, तो जातक पर पितृ-ऋण माना जाता है।
वजह : इसका कारण किसी पास के मंदिर में तोड़-फोड़, पीपल के वृक्ष को काटना या कुल-पुरोहित का अपमान हो सकता है।
उपाय :1. परिवार के सभी सदस्यों से बराबर धन एकत्रित करके किसी मंदिर में दान करना।
2. किसी पीपल के वृक्ष को लगातार 43 दिन तक पानी देना।
आत्म-ऋ ण
लक्षण : लाल किताब के अनुसार पाँचवें भाव में जब शुक्र, शनि, राहु या केतु स्थित हों या इनमें से किसी की युति पंचम भाव में हो, तो जातक आत्म-ऋ ण का भागी माना जाता है।
वजह : इसका कारण पूर्वजों द्वारा परिवार के रीति-रिवाज़ों और परम्पराओं से अलग होना या परमात्मा में अविश्वास हो सकता है।
उपाय :सभी संबंधियों के सहयोग से सूर्य यज्ञ का आयोजन करना चाहिए।
मातृ-ऋ ण
लक्षण : लाल किताब के मुताबिक़ जब केतु कुण्डली के चौथे खाने में बैठा हुआ हो, तो जातक को मातृ-ऋ ण से ग्रसित माना जाता है।
वजह : इसका कारण यह हो सकता है कि जातक के कुल में किसी बड़े या पूर्वज ने विवाह या बच्चा होने के बाद अपनी माँ को नजऱअन्दाज़ किया हो अथवा माँ के दु:खी और उदास होने पर उसकी परवाह न की हो।
उपाय : बहते पानी या नदी में एक चांदी का सिक्का बहाना चाहिए।
भ्रातृ-ऋ ण या संबंधी-ऋ ण
लक्षण : लाल किताब के अनुसार जब बुध या शुक्र किसी कुण्डली के पहले या आठवें भाव में स्थित हों, तो उस जातक को भ्रातृ-ऋण या संबंधी-ऋण का भागी माना जाता है।
वजह : इसका कारण आपके किसी पूर्वज द्वारा किसी दोस्त या रिश्तेदार के खेत या घर में आग लगाना या फिर भाई या संबंधी के प्रति द्वेष का भाव हो सकता है। इसके अलावा इसकी एक वजह घर में बच्चे के जन्म या उत्सव विशेष के वक्त घर से दूर रहना भी हो सकता है।
उपाय : सभी परिजनों से रकम इक_ी करके किसी हक़ीम या वैद्य को दान करें।
स्त्री-ऋ ण
लक्षण : लाल किताब के अनुसार जब सूर्य, चन्द्र या राहु या उनकी युति कुण्डली के दूसरे अथवा सातवें भाव में हो, तो जातक स्त्री-ऋण से ग्रसित माना जाता है।
वजह : इसका कारण लोभ या विवाहेतर संबंधों के चलते पत्नी या परिवार की किसी स्त्री की हत्या की संभावना या किसी गर्भवती महिला को हानि पहुँचाना हो सकता है।
उपाय : दिन के किसी समय पर 100 गायों को हरा चारा खिलाया जाना चाहिए।
पुत्री-ऋ ण या भगिनी-ऋ ण
लक्षण : लाल किताब के मुताबिक़ बुध जब कुण्डली के तीसरे या छठे भाव में बैठा हो, तो जातक को इस ऋ ण का भागी माना जाता है।
वजह : इसकी वजह किसी की बहन या बेटी की हत्या या उन्हें परेशान करने की संभावना हो सकती है, या फिर किसी अविवाहित स्त्री या बहन के साथ विश्वासघात भी इसका कारण हो सकता है।
उपाय : सारे परिजन पीले रंग की कौडिय़ाँ लेकर एक जगह इक_ी करके जलाकर राख कर दें और उस राख को उसी दिन नदी में विसर्जित कर दें।
क्रूरता-ऋ ण
लक्षण : लाल किताब के अनुसार जब सूर्य, चन्द्रमा या मंगल या इनमें से किसी की युति कुण्डली के दसवें या बारहवें भाव में हो, तो जातक को इस ऋण से ग्रसित माना जाता है।
वजह : इसका कारण किसी की ज़मीन या पुश्तैनी घर ज़बरन हड़पना या फिर मकान-मालिक को उसके मकान या भूमि का पैसा न देना हो सकता है।
उपाय :अलग-अलग जगह के सौ मज़दूरों या मछलियों को सभी परिजन धन इक_ा करके एक दिन में भोजन कराएँ।
अजात-ऋ ण  या पैदा ही न हुए का ऋ ण
लक्षण : लाल किताब के मुताबिक़ जब सूर्य, शुक्र या मंगल या फिर इन ग्रहों की युति कुण्डली के बारहवें भाव में हो, तो जातक इस ऋण का भागी कहलाता है।
वजह : इसका कारण ससुराल-पक्ष के लोगों के साथ छल या फिर किसी को धोखा देने पर उसके पूरे परिवार का बर्बाद हो जाना है।
उपाय : सभी परिजनों से एक-एक नारियल लेकर उन्हें एक जगह इक_ा करें और उसी दिन नदी में प्रवाहित कर दें।
कुदरती ऋ ण
लक्षण : लाल किताब के अनुसार जब चन्द्रमा या मंगल कुण्डली के छठे भाव में स्थित हों, तो जातक इस ऋण से ग्रसित माना जाता है।
वजह : इसका कारण किसी कुत्ते को मारना या भतीजे से इतना कपट करना कि वह पूरी तरह बर्बाद हो जाए।
उपाय: 1. सौ कुत्तों को एक दिन में सभी परिजनों के सहयोग से दूध या खीर खिलानी चाहिए।
2. किसी विधवा की सेवा करके उससे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।
इस प्रकार के ऋण से मुक्त होने के लिए जो उपरोक्त उपाय दिये गयें हैं वह लालकिताब पर आधारित है।  इन उपायों को करने मात्र से संबंधित दोषों से सद्य: छुटकारा मिल जाता है।

अन्नकूट एवं गोवर्धन पूजा


अन्नकूट एवं गोवर्धन पूजा

दीपावली का अगला दिन, कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को गोवर्धन पूजन, गौ-पूजन के साथ-साथ अन्नकूट पर्व भी मनाया जाता है। इस दिन प्रात: ही नहा धोकर, स्वच्छ वस्त्र धारण कर अपने इष्टों का ध्यान करते हैं। इसके पश्चात अपने घर या फिर देव स्थान के मुख्य द्वार के सामने गोबर से गोवर्धन बनाना शुरू किया जाता है। इसे छोटे पेड़, वृक्ष की शाखाएँ एवं पुष्प से सजाया जाता है। पूजन करते समय यह श्लोक कहा जाता है, "गोवर्धन धराधार गोकुल त्राणकारक। विष्णुबाहु कृतोच्छाय गवां कोटिप्रदो भव।।"
यह गोवर्धन पूजा का दिन (प्रतिपदा) साल में साढे तीन शुभ मुहूर्तों में से एक माना जाता है। किसी भी काम की शुभ शुरुआत इस दिन की जा सकती है। आर्थिक दृष्टि से व्यापारी इस दिन से साल की नई शुरुआत मानते हैं। लक्ष्मी प्राप्ती की कामना करते हुए हिसाब-किताबों की हल्दी, कुमकुम, फूल अर्पण कर पूजा की जाती है। इस शुभ दिन से नई कापियों में हिसाब लिखना शुरू किया जाता है।
गोवर्धन कथा-
भगवान कृष्ण अपने सखा और गोप-ग्वालों के साथ गाएँ चराते हुए गोवर्धन पर्वत पर पहुँचे तो देखा कि वहाँ गोपियाँ 56 प्रकार के भोजन रखकर बड़े उत्साह से नाच-गाकर उत्सव मना रही हैं। श्रीकृष्ण के पूछने पर उन्होंने बताया कि आज वृत्रासुर को मारने वाले तथा मेघों व देवों के स्वामी इंद्र का पूजन होता है। इसे इंद्रोज यज्ञ कहते हैं। इससे प्रसन्न हो कर ब्रज में वर्षा होती है, अन्न पैदा होता है।
श्रीकृष्ण ने कहा कि इंद्र में क्या शक्ति है, उससे अधिक शक्तिशाली तो हमारा गोवर्धन पर्वत है।  अत: इन्द्र की बजाय गोवर्धन की पूजा होनी चाहिए ।
इंद्र इसे अपमान समझकर गुस्से में मूसला धार वर्षा करने लगे । बाल-ग्वाल भयभीत हो उठे। श्रीकृष्ण ने सभी को गोवर्धन पर्वत की शरण में चलने को कहा। श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर उठाकर छाता सा तान दिया और सभी की मूसलाधार हो रही वृष्टि से बचाया।यह चमत्कार देखकर इंद्रदेव को अपनी गलती पर पश्चाताप हुआ और वे श्रीकृष्ण से क्षमायाचना करने लगे। सात दिन बाद श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत नीचे रखा और ब्रजवासियों को प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का पर्व मनाने को कहा। तभी से यह पर्व के रुप में प्रचलित है।
गोवर्धन पूजा के साथ साथ गौ-पूजन की भी तैयारी आरम्भ हो जाती है। सुबह होते होते ही गायों को नहलाना-धुलाना, उन्हें विभिन्न अलंकारों से सजाना। कभी-कभी उनके मेहंदी भी लगा दी जाती है। उनका श्रृंगार होने के बाद उनकी गंध,अक्षत और फूल अर्पण कर पूजन किया जाता है। उनके पैर धो कर उनकी प्रदक्षिणा ली जाती है। "लक्ष्मीर्या लोक पालानाम् धेनुस्र्पेण संस्थिता। घृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु।" कह कर नैवेद्य अर्पित करते हैं। नैवेद्य में मिष्ठान्न का अहम स्थान होता है जो गायों को खिलाया जाता है। सायंकाल को इन पूजित गायों से पूजित गोवर्धन पर्वत का मर्दन कराना अच्छा माना जाता है। इस गोबर से घर आंगन को लीपा जाना शुभ होता है।
अन्नकूट महोत्सव
भगवान विष्णु अथवा उनके अवतार और अपने इष्ट देवता का इस दिन विभिन्न प्रकार के पकवान बनाकर, रंगोली मांडकर, बहुढंगी सजाकर, पके हुए चावलों को पर्वताकार अर्पित कर के पूजन किया जाता हैं। इसे छप्पन भोग की संज्ञा भी दी गई हैं।
पौराणिक दृष्टि से चूँकि कृष्ण ने इंद्र का मान-मर्दन किया था अत: इंद्र के स्थान पर कृष्ण के पूजन का विशेष महत्व है। कहते हैं कि इस पर्व का अनुष्ठान करने से भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह दिन पवित्र होने के बावजूद इस दिन चंद्रदर्शन वर्ज्य माना गया है। लोगों का विश्वास है कि इस दिन शाम को मार्गपाली और राजा बलि की पूजा करने तथा मार्गपाली के बंदनवार के नीचे होकर निकलने से सभी प्रकार की सुख शांति रहती है तथा कई रोग दूर हो जाते हैं।

रहस्यमय और अदभुत स्फटिक श्री यंत्र


रहस्यमय और अदभुत स्फटिक श्री यंत्र

भगवती महालक्ष्मी की कृपा प्राप्ति का सबसे प्रभावी उपाय है श्री यंत्र की विधिवत साधना. यह एक ऐसा विधान है जो अभूतपूर्व सफलता प्रदायक है. जब किसी भी अन्य उपाय से भगवती की प्रसन्नता प्राप्त न हो पा रही हो तो यह साधना विधान प्रयोग करना चाहिए. श्री यंत्र के बारे में कहा गया है कि.
चतु: षष्टया तंत्रै सकल मति संधाय भुवनम ।
स्थितस्तत्सिद्धि प्रसव परतंत्रै: पशुपति: ।
पुनस्त्वनिर्बन्धादखिल पुरूषार्थैक घटना ।
स्वतंत्रं ते तंत्रं क्षितितलमवातीतरदिदम ।

देवाधिदेव भगवान महादेव शिव ने इस सकल भुवन को 64 तंत्रो से भर दिया और फिर अपने दिव्य तापसी तेज से समस्त पुरूषार्थों को प्रदान करने में सक्षम श्री तंत्र को इस धरा पर प्रतिष्ठित किया. आशय यह कि श्री विद्या से संबंधित तंत्र ब्रह्?माण्ड का सर्वश्रेष्ठ तंत्र है जिसकी साधना ऐसे योग्य साधकों और शिष्यों को प्राप्त होती है जो समस्त तंत्र साधनाओं को आत्मसात कर चुके हों. इस साधना को प्रदान करने के लिए कहा गया है कि :-
गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नत:, पिता पुत्रो न दातव्यं गोपनीयं महत्वत: ...
इस विद्या को सप्रयास गोपनीय रखना चाहिये, यह इतनी गोपनीय विद्या है कि इसे पिता को पुत्र से भी छुपाकर रखना चाहिये
तंत्र के क्षेत्र में श्री विद्या को निर्विवाद रूप से सर्वश्रेष्ठ तथा सबसे गोपनीय माना जाता है. श्री विद्या की साधना का सबसे प्रमुख साधन है श्री यंत्र... इसकी विशिष्टता का अनुमान इसी बात से लगाया जाता है कि सनातन धर्म के पुनरूद्धारक, भगवान शिव का अवतार माने जाने वाले, जगद्गुरू आदि शंकराचार्य ने जिन चार पीठों की स्थापना की, उनमें उन्होने पूरी प्रामाणिकता के साथ श्री यंत्र की स्थापना की. जिसके परिणाम के रूप में आज भी चारों पीठ हर दृष्टि से,
श्री यंत्र खरीदते समय सावधानियां :
श्रीयंत्र को खरीदते समय विशेष रूप से यंत्र में बने कोंणों पर देना चाहिए, यदि यत्र्ंा का कोई भी कोंण खण्डित या अपूर्ण आकार में नहीं होना चाहिए ,  श्रीयंत्र के ऐसे टेढ़े-मेढ़े आकृति के होने से विपरीत फल भी देता है, क्योंकि तंत्र में त्रिकोण को अत्यंत महत्व दिया गया है. मुख्य रूप से दो प्रकार के त्रिकोणों का प्रयोग यंत्रों के निर्माण में किया जाता है. पहला अधोमुखी तथा दूसरा उर्ध्वमुखी. एक पुरूष रूपी शिव का प्रतीक है तथा दूसरा स्त्री रूपी शक्ति का प्रतीक होता है. इन दोनों त्रिकोणों के विविध संयोजनों से यंत्रों का निर्माण होता है.।
इन नौ त्रिकोणों के संयोग से निर्मित इस यंत्र के मध्य में स्थित त्रिकोण के अंदर इस यंत्र का हृदय भाग होता है जिसमें बिंदु प्रतीक के रूप में महाविद्या श्री त्रिपुरसुंदरी का वास होता है. इन नवत्रिकोणों को शरीर के नवद्वारों का प्रतीक है. इन नवत्रिकोणों को वृत्त के अंदर निर्मित किया जाता है. वृत्त के बाहर पहले अष्ट(आठ) दल वाला कमल होता है जो अष्ट सिद्धियों का प्रतीक है. पुन: वृत्त जो ब्रह्माण्ड का प्रतीक है के बाद षोडश (सोलह) दल वाला कमल होता है जो जीवन की संपूर्णता माने जाने वाले षोडश कलाओं का प्रतीक हैं. इसके बाहर चार द्वारों से युक्त आवरण होता है।
श्री यंत्र से होने वाले लाभ :
श्री यंत्र प्रमुख रूप से ऐश्वर्य तथा समृद्धि प्रदान करने वाली महाविद्या त्रिपुरसुंदरी महालक्ष्मी का सिद्ध यंत्र है. यह यंत्र सही अर्थों में यंत्रराज है. इस यंत्र को स्थापित करने का तात्पर्य श्री को अपने संपूर्ण ऐश्वर्य के साथ आमंत्रित करना होता है. कहा गया है कि :-
श्री सुंदरी साधन तत्पराणाम् , भोगश्च मोक्षश्च करस्थ एव....
अर्थात जो साधक श्री यंत्र के माध्यम से त्रिपुरसुंदरी महालक्ष्मी की साधना के लिए प्रयासरत होता है, उसके एक हाथ में सभी प्रकार के भोग होते हैं, तथा दूसरे हाथ में पूर्ण मोक्ष होता है. आशय यह कि श्री यंत्र का साधक समस्त प्रकार के भोगों का उपभोग करता हुआ अंत में मोक्ष को प्राप्त होता है. इस प्रकार यह एकमात्र ऐसी साधना है जो एक साथ भोग तथा मोक्ष दोनों ही प्रदान करती है, इसलिए प्रत्येक साधक इस साधना को प्राप्त करने के लिए सतत प्रयत्नशील रहता है.
इस अद्भुत यंत्र से अनेक लाभ हैं, इनमें प्रमुख हैं
 1. श्री यंत्र के स्थापन मात्र से भगवती लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है.
 2. कार्यस्थल पर इसका नित्य पूजन व्यापार में विकास देता है.
3. घर पर इसका नित्य पूजन करने से संपूर्ण दांपत्य सुख प्राप्त होता है.
4. पूरे विधि विधान से इसका पूजन यदि प्रत्येक दीपावली की रात्रि को संपन्न कर लिया जाय तो उस घर में साल भर किसी प्रकार की कमी नही होती है.
5. श्री यंत्र पर ध्यान लगाने से मानसिक क्षमता में वृद्धि होती है. उच्च यौगिक दशा में यह सहस्रार चक्र के भेदन में सहायक माना गया है.
6. यह विविध वास्तु दोषों के निराकरण के लिए श्रेष्ठतम उपाय है.
स्फटिक श्रीयंत्र-
   स्फटिक का बना हुआ श्री यंत्र अतिशीघ्र सफलता प्रदान करता है. इस यंत्र की निर्मलता के समान ही साधक का जीवन भी सभी प्रकार की मलिनताओं से परे हो जाता है.
    स्वर्ण श्रीयंत्र-
    स्वर्ण से निर्मित यंत्र संपूर्ण ऐश्वर्य को प्रदान करने में सक्षम माना गया है. इस यंत्र को तिजोरी में रखना चाहिए तथा ऐसी व्यवस्था रखनी चाहिये कि उसे कोई अन्य व्यक्ति स्पर्श न कर सके.
मणि श्रीयंत्र-
    ये यंत्र कामना के अनुसार बनाये जाते हैं तथा दुर्लभ होते हैं।
रजत (चांदी)श्रीयंत्र-
    ये यंत्र व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की उत्तरी दीवाल पर लगाए जाने चाहिये. इनको इस प्रकार से फ्रेम में मढवाकर लगवाना चाहिए जिससे इसको कोई सीधे स्पर्श न कर सके।
ताम्र श्रीयंत्र-
 ताम्र र्निमित यंत्र का प्रयोग विशेष पूजन अनुष्ठान तथा हवनादि के निमित्त किया जाता है. इस प्रकार के यंत्र को पर्स में रखने से अनावश्यक खर्च में कमी होती है तथा आय के नए माध्यमों का आभास होता है।
-ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे महाराज  ,098287198828