ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

कार्य के अनुसार लक्ष्मी साधना:

धनदायक वस्तुएं प्रकृति अपने में असंख्य निधियों को समेटे हुए है, जिसको इनका ज्ञान है, वह लाभ उठाता है। ऐसी बहुत सी वस्तुएं हैं जो सुख-समृद्धि के प्रभावों से ओत-प्रोत हैं। वनस्पतियों से लेकर प्रस्तरखण्ड और धातुएँ इनकी प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। ईश्वर ने प्रकृति को अपनी माया कहा है। एक पुरूष (ईश्वर) की माया उसकी स्त्री होती है। पुरूष प्रदत्त या अर्जित सभी सम्पत्ति की एकमात्र अधिकारिणी उसकी पत्नी होती है। ईश्वर ने भी अपने समस्त वैभव प्रदायक, समृद्धिदायक प्रभावों को प्रकृति में पृथक-पृथक रूप में व्यवस्थित किया है। पंच तत्व आदि तो प्रधान हैं ही कुछ वृक्षों के तो पत्ते तक धन प्राप्ति कराने में सहयोग करते हैं। ऐसी वस्तुओं की गणना यद्यपि संभव नहीं क्योंकि "कण-कण में भगवान हैं, के अनुसार प्रकृति में उपस्थित हर छोटी से छोटी वस्तु में सिद्धि-ऋ द्धि व्याप्त हैं।" उनमें से कुछ सुगम उपलब्ध वस्तुओं का और उनको प्रयोग में लेने का उल्लेख करेंगे। इस विषय वस्तु का प्रमाण प्रमुख तंत्र-शास्त्रों व कुछ प्रसिद्ध पुराणों में इनकी उपयोगिता का वर्णन है-

व्यापार में निरंतर लाभ पाने हेतु कुंडली में लग्न, द्वितीय, पंचम, नवम और एकादश भावों एवं उनके स्वामियों के शुभ संबंधों का विचार किया जाता है, परंतु कभी-कभी ऐसा देखने में आता है कि आर्थिक संपन्नता के योग कुंडली में मौजूद होने पर भी दशा-अन्तर्दशा, गोचर ग्रहों की प्रतिकूलता अथवा अन्य अदृश्य कारणों जैसे पितृ दोष, बंधन आदि से व्यापार में वांछित लाभ नहीं मिलता है ऐसे में कुछ उपाय हैं जिनसे लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
कार्य के अनुसार लक्ष्मी साधना:
मानसिक कष्ट, बंधन प्रकोप या भूत-प्रेत-पिशाच आदि की चपेट से परेशान लोगों को शनि प्रधान महाभैरवी लक्ष्मी की उपासना करनी चाहिए।
युद्धक्षेत्र, पर्वतारोहण एवं साहसी कार्यों में संलग्न लोग जो मंगल प्रधान होते हैं, उन्हें जया नामक लक्ष्मी की साधना करनी चाहिए।  औषधि-चिकित्सा एवं रसायन के व्यापार में जुड़े लोगों को कान्तार नामक लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करनी चाहिए।
जल, पेय पदार्थ आदि के व्यापारी वर्ग को किसी भी कारण से राजकीय प्रकोप में फंस जाने पर अथवा प्राकृतिक आपदाओं के आने पर तारा लक्ष्मी की अर्चना लाभ देती है।  उद्योगपतियों को वाणिज्य लक्ष्मी एवं अविवाहित, महत्वाकांक्षी और विदेशी मुद्रा, इलेक्ट्रोनिक्स के व्यवसाय (कम्प्यूटर, सॉफ्टवेयर आदि), आयात-निर्यात करने वाले लोगों को त्रिपुर सुन्दरी की पूजा-अर्चना से वांछित सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।
लक्ष्मी-नारायण उपासना :
लक्ष्मी की प्रसन्नता हेतु पूर्णमिा तिथि, गुरुपुष्य नक्षत्र अथवा अन्य शुभ योग देखकर, स्फटिक या कमलगट्टे की माला से निम्नलिखित में से किसी एक मंत्र का जप करें। ऊँ नमो योग माया महालक्ष्मी नारायणी नमोस्तुते। या ऊँ श्रीं ह्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं ऊँ महालक्ष्म्यै नम:। या ऊँ ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं। इसके अतिरिक्त श्रीसूक्त का नियमित पाठ करें व खीर, कमलगट्टे से हवन करें। गोपाल सहस्रनाम या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
विशेष लक्ष्मी अनुकम्पा हेतु : लक्ष्मी कृपा हेतु स्फटिक श्रीयंत्र (लगभग 125 ग्राम) स्वर्ण, रजत पत्र, पर अंकित श्री यंत्र, ताम्र पत्र या भोजपत्र या कागज पर श्री यंत्र की शुभ मुहूर्त में योग्य व्यक्ति से प्राण-प्रतिष्ठा कराकर घर, कार्यालय अथवा व्यापारस्थल पर स्थापित करें। फिर प्रतिदिन स्वयं अथवा योग्य ब्राह्मण द्वारा यंत्र की षोडशोपचार अथवा पंचोपचार पूजन कर निम्न मंत्र का श्रद्धापूर्वक कम से कम एक माला जप करना चाहिए। जप के लिए मोती, प्रवाल या रुद्राक्ष की माला लें और लाल रंग के ऊनी आसान पर बैठें। शुद्धता का पूर्ण ध्यान रखें।
मंत्र - दुर्गे स्मृता हरसि भीतिम शेषजन्तो: स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि। दारिद्रयदु:खभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता॥
धन प्राप्ति हेतु बगलामुखी प्रयोग:
शुभ मुहूर्त में इस साधना को प्रारंभ करें। चौकी पर पीत वस्त्र बिछाकर उस पर अष्टकमल बनाएं। फिर बगलामुखी देवी का चित्र अथवा बगलामुखी यंत्र की प्राण-प्रतिष्ठा कराकर उस पर स्थापित करें। स्वयं नहा धोकर पीला वस्त्र पहनें, पीला ऊनी आसन पर बैठें तथा पीले रंग की मिठाई (बेसन, बूंदी के लड्डू या केसर की बर्फी) का भोग लगाएं। गाय के घी का दीपक जलाएं, फिर न्यास ध्यान करके अतुल संपत्ति प्राप्ति हेतु संकल्प करते हुए मंत्र जप करें। आरंभ में जो जप संख्या हो, आगे उससे कम जप न करें। जप के अन्त में, खीर, खील आदि से दशांश हवन करें।
बगलामुखी मंत्र : ऊँ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्नां कीलय बुद्धिं न्नाशय ह्लीं ऊँ स्वाहा।
बाधामुक्त होकर धन पुत्रादि लाभ हेतु :
मंत्र : सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन-धान्य सुतान्वित: मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:।
बाधामुक्ति यंत्र एवं लक्ष्मी यंत्र के सम्मुख नियमपूर्वक इस मंत्र का जप करने से सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। तांत्रिक उपाय :(टोटके)
1. अपने घर में स्फटिक श्री यंत्र प्राण प्रतिष्ठा कराकर स्थापित करें। एक साबुत लाल गुलाब का फूल रोजाना उस पर चढ़ाएं। पूजा कराकर काली हल्दी गल्ले या तिजोरी में रखें। तांत्रिक वस्तुएं, हत्था, जोड़ी, सियार सिंगी, बिल्ली की जेर, दक्षिणावर्ती शंख, एकमुखी रुद्राक्ष, नागकेसर, मोर पंख आदि की पूजा कराकर घर में और तिजोरी में, कार्यस्थल में रखें। श्वेतार्क गणेश जी की स्थापना करें, रोज दर्शन करें। बुधवार को मूंग के लड्डू का भोग लगाएं।
2. पीपल के 21 पत्तों पर लाल चंदन से राम लिखकर रोज हनुमानजी पर चढ़ाएं। यह प्रयोग 22 दिनों तक लगातार करें। ध्यान रहे कि क्रम टूटे नहीं। इस प्रयोग में नियमितता एवं शुद्धता जरूरी है।
3. गुरुवार के दिन व्यापार वृद्धि हेतु श्यामा तुलसी के चारों ओर जमा खरपतवार हटाएं, उसे पीले रंग के कपड़े में बांधकर व्यापार स्थल पर किसी सुरक्षित जगह रख दें। किसी बरतन में सफेद सरसों इस प्रकार रखें कि वह दिखाई देती रहे और बरतन को कार्यस्थल में ऐसी जगह रख दें, जहां आने-जाने वालों का ध्यान उस पर पड़े।
बड़े काम की है कौड़ी :
कौडियां न केवल धन एवं समृद्धि की प्रतीक होती है बल्कि तंत्र-मन्त्र आदि में भी इनके अनेक प्रयोग होते है. यंहा आज कौडियों से सम्बंधित कुछ ऐसे ही प्रयोगों के विषय में जानकारी प्राप्त करने जा रहे है जो कि दीपावली के पावन पर्व पर हमारे लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है और कौड़ी के द्वारा हम अपनी मनोकामनाये पूर्ण कर सकने में सक्षम होंगे.
बच्चो को नजर से बचाने के लिए तथा निर्जीव वस्तुओं जैसे घर, वाहनादि को भी बुरी नजर से बचाने के लिए कौडियों का प्रयोग किया जाता है. शास्त्रों में उल्लेख है कि कौड़ी धारण करने से किसी भी प्रकार का जादू टोना, तांत्रिक प्रयोग अभिजात कर्मादि नुक्सान नहीं पहुंचा सकते है. आज भी विवाह के समय वर-वधु के हाथों में कौडियों से बने रक्षासूत्र बाँधने की प्रथा प्रचलित है साथ ही नए वाहन आदि नए मकानों की रक्षा के लिए चौखट पर काले धागे में पिरोकर कौडियां बाँधी जाती है.लक्ष्मी की सहोदरा होने के कारण इसमें लक्ष्मी का निवास माना जाता है. इसलिए दीपावली ले समय लक्ष्मी पूजन के साथ साथ कौडियों का पूजन करने से मां लक्ष्मी शीघ्र प्रसन्न होती है.
दीपावली के शुभ मुहूर्त में कौडियों को केसर से रंग कर पीले कपड़े में बांधकर पूजा स्थल पर रखें, लक्ष्मी पूजन पूर्ण होने के बाद इन कौडियों को तिजोरी या अलमारी में रखने से उस घर में लक्ष्मी का स्थायी निवास हो जाता है. व्यापारिक स्थल में भी गल्ले अथवा तिजोरी में दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन के समय प्रयुक्त की गयी कौडियों को रखने से व्यापारिक उन्नति होने लगती है.
यदि किसी व्यक्ति को नजर बहुत अधिक लगती है अथवा उसे अपने कार्य क्षेत्र में सफलता नहीं मिल रही हो तो ऐसे व्यक्ति को दीपावली के दिन लक्ष्मी के मन्त्रों से कौडियों को अभिमंत्रित कर पीले धागे में बाँध कर धारण कर लेना चाहिए. एक या दो कौड़ी धारण करे. गले या बाजू में धारण करे, इससे कार्य क्षेत्र में सफलता मिलती है तथा किसी प्रकार की नजर भी नहीं लगती है.
सामान्य रूप से भी दीपावली पूजन में प्रयोग लाई गयी कौडियों को पूजा स्थल में अवश्य रखना चाहिए. इससे घर में धन की कमी नहीं होती, और लक्ष्मी का सदा वास रहता है.
यदि व्यापार में किसी प्रकार की समस्या आ रही हो, तो दीपावली की रात्री को ग्यारह (11) कौडियों को हल्दी अथवा केसर से रंग कर श्री महालक्ष्मी के मन्त्र से पूजा कर व्यापार स्थल में स्थापित कर दें.इससे आपकी व्यापारिक समस्याए समाप्त हो जांएगी. यदि रोजगार प्राप्ति में बाधाएं आ रही हो अथवा नौकरी में उन्नति प्राप्त नहीं हो पा रही हो, तब भी इसी प्रकार का प्रयोग करना चाहिए.
हरसिंगार का बांदा -
हरसिंगार नामक एक पौधा है। किसी पौधे पर पुष्प लगने के बाद, फल लगने से पूर्व पुष्प जिस अवस्था में होता है, वही बांदा कहलाता है। बांदा में पुष्प व फल की मिश्रित गंध होती है। हरसिंगार का बांदा आर्थिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है तथा भवन के दोषों का निवारण भी करता है। शनिवार और मंगलवार के अतिरिक्त अन्य किसी वार को जबकि चंद्रमा हस्त नक्षत्र पर हों तब हरसिंगार का बाँदा घर में ले आएं और महालक्ष्मी के मंत्र से इसका पूजन करने के उपरांत लाल कपड़े में लपेट कर तिजोरी में रखने से धन और समृद्धि की बढ़ोत्तरी होती है, धन लाभ के नवीन अवसर प्राप्त होते हैं।
एकाक्षी नारियल :
नारियल को श्रीफल, खोपरा, गोला, कोकोनट आदि नामों से जाना जाता है। नारियल रेशेनुमा जड़ों से आवृत्त होता है। इन जड़ों को हटा देने पर अधिकांश नारियलों पर तीन काले रंग की बिन्दु जैसी आकृति दिखाई देती है, इनमें से दो नेत्रों तथा एक मुख का परिचायक होती है। किसी-किसी नारियल में एक नेत्र और एक मुख के रूप में मात्र दो ही निशान होते हैं, इसे "एकाक्षी नारियल" कहते हैं। इसे घर में रखना अत्यंत शुभ माना जाता है। यद्यपि इसकी उपलब्धता दुर्लभ होती है लेकिन प्रयास करने पर यह प्राप्त हो जाता है। एकाक्षी नारियल को लाल कपड़े में लपेटकर, सिंदूर और कुंकुम आदि से पूजा करनी चाहिये। जिस घर में एकाक्षी नारियल की पूजा होती है, वहाँ लक्ष्मी जी की कृपा होती है, अन्न व धन की कभी कमी नहीं आती। व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर पूजा की जाये तो व्यवसाय की वृद्धि होती है।
गोमती चक्र -
चक्राकार आकृति (पत्थर के टुकड़े) को ही गोमती चक्र कहते हैं चूंकि यह गोमती नदी से ही प्राप्त होता है और एक विशेष प्रकार के पत्थर पर निर्मित होता है अत: इसे "गोमती चक्र" कहते हैं। ग्यारह गोमती चक्रों को लाल कपड़े के आसन पर पूजा के स्थान पर रखने एवं प्रतिदिन उनकी केसर-चंदन से पूजा करते रहने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं। घर में  धन-धान्य की वृद्धि होती है। यह प्रयोग "रवि-पुष्य", "गुरू-पुष्य" या दीपावली की रात्रि से प्रारंभ किये जा सकते हैं। पूजा में "ऊँ श्रीं श्रियै नम:" मंत्र प्रयोग में लें। इन वस्तुओं की प्राप्ति सुलभ हो तो ये प्रयोग दीपावली की रात्रि में प्रयोग किया जाय लाख गुना फल की प्राप्ति होती है। फिर वह चाहे साधनात्मक हो या फिर आर्थिक, पूर्णता से युक्त हैं. उसी प्रकार हम सभी गृहस्थों को अपने घर में भी इस रहस्यमयी श्री यंत्र को घर में रखना चाहिए जिससे घर की सुख समृद्धि स्थायी रूप से बना रहे।
-ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे महाराज,09827198828

महालक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त :


- ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे महाराज,09827198828
महालक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त :
श्री महालक्ष्मी पूजन व दीपावली का महापर्व कार्तिक कृ्ष्ण पक्ष की अमावस्या में प्रदोष काल, स्थिर लग्न समय में मनाया जाता है. धन की देवी श्री महा लक्ष्मी जी का आशिर्वाद पाने के लिये इस दिन लक्ष्मी पूजन करना विशेष रुप से शुभ रहता है.
इस वर्ष दिपावली, 26 अक्तूबर, बुधवार के दिन मनाई जाएगी. इस दिन चित्रा नक्षत्र, परन्तु प्रदोषकाल के बाद स्वाती नक्षत्र का काल रहेगा, इस दिन प्रीति योग तथा चन्दमा तुला राशि में संचार करेगा. दीपावली में अमावस्या तिथि, प्रदोष काल, शुभ लग्न व चौघाडिय़ा मुहूर्त विशेष महत्व रखते है. बुधवार की दिपावली व्यापारियों, क्रय-विक्रय करने वालों के लिये विशेष रुप से शुभ मानी जाती है. यह कई वर्षों बाद अवसर मिला है कि बुधवार गणेश का वार है और उसी दिन लक्ष्मी पूजन के लिए दीपावली दोनो का संयोग गणेश व लक्ष्मी दोनो को प्रसन्न करने का उत्तम मुहूर्त है.
1. प्रदोष काल मुहूर्त कब
26 अक्तूबर, 2011 बुधवार के दिन छत्तीसगढ़ के रायपुर के आसपास के इलाकों में
सूर्यास्त सायं 5:27:37 से लेकर 7:51:37 तक प्रदोष काल रहेगा.
(देश अन्य सभी स्थानों के सूर्योदय कालिक समय के आधार पर स्थानीय प्रदोष काल निकाल लें.)
प्रदोष काल समय को दिपावली पूजन के लिये शुभ मुहूर्त के रुप में प्रयोग किया जाता है. प्रदोष काल में भी स्थिर लग्न समय सबसे उत्तम रहता है. इस दिन प्रदोष काल व स्थिर लग्न दोनों रात्रि 8:40 से लेकर 10: 41 का समय रहेगा.
प्रदोष काल का प्रयोग कैसे करें
प्रदोष काल में मंदिर में दीपदान, रंगोली और पूजा से जुड़ी अन्य तैयारी इस समय पर कर लेनी चाहिए तथा मिठाई वितरण का कार्य भी इसी समय पर संपन्न करना शुभ माना जाता है.
इसके अतिरिक्त द्वार पर स्वास्तिक और शुभ लाभ लिखने का कार्य इस मुहूर्त समय पर किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त इस समय पर अपने मित्रों व परिवार के बड़े सदस्यों को उपहार देकर आशिर्वाद लेना व्यक्ति के जीवन की शुभता में वृद्धि करता है. मुहूर्त समय में धर्मस्थलो पर दानादि करना कल्याणकारी होगा.
2. निशिथ काल
26 अक्तूबर, बुधवार के दिन निशिथ काल लगभग रात्रि 8:18 से 10: 50 तक रहेगा. स्थानीय प्रदेश के अनुसार इस समय में कुछ मिनट का अन्तर हो सकता है. निशिथ काल में अमृत की चौघडिय़ा 20:58 से 22:36 तक रहेगी. निशिथ काल में लाभ की चौघडिया भी रहेगी, व्यापारियों वर्ग के लिये लक्ष्मी पूजन के लिये इस समय की विशेष शुभता रहेगी.
दिपावली पूजन में निशिथ काल का
प्रयोग कैसे करें
धन लक्ष्मी का आहवाहन एवं पूजन, गल्ले की पूजा तथा हवन इत्यादि कार्य सम्पूर्ण कर लेना चाहिए. इसके अतिरिक्त समय का प्रयोग श्री महालक्ष्मी पूजन, महाकाली पूजन, लेखनी, कुबेर पूजन, अन्य मंन्त्रों का जपानुष्ठान करना चाहिए.
3. महानिशीथ काल
धन लक्ष्मी का आहवाहन एवं पूजन, गल्ले की पूजा तथा हवन इत्यादि कार्य सम्पूर्ण कर लेना चाहिए. इसके अतिरिक्त समय का प्रयोग श्री महालक्ष्मी पूजन, महाकाली पूजन, लेखनी, कुबेर पूजन, अन्य मंन्त्रों का जपानुष्ठान करना चाहिए.
26 अक्तूबर, बुधवार 2011 के रात्रि में 10:54 से लेकर अगले दिन प्राप्त: 01:30 मिनट तक महानिशीथ काल रहेगा. महानिशीथ काल में कर्क लग्न भी हों, तो विशेष शुभ माना जाता है. महानिशीथ काल और कर्क लग्न 10:55 से अगले दिन प्राप्त:01:18 मिनट तक रहेगा. महानिशीथ काल व कर्क लग्न एक साथ होने के कारण यह समय अधिक शुभ हो गया है. जो जन शास्त्रों के अनुसार दिपावली पूजन करना चाहते हो, उन्हें इस समयावधि को पूजा के लिये प्रयोग करना चाहिए.
महानिशीथ काल का दिपावली पूजन में प्रयोग कैसे करें
महानिशीथकाल में मुख्यत: तांत्रिक कार्य, ज्योतिषविद, वेद् आरम्भ, कर्मकाण्ड, अघोरी,यंत्र-मंत्र-तंत्र कार्य व विभिन्न शक्तियों का पूजन करते हैं एवं शक्तियों का आवाहन करना शुभ रहता है. अवधि में दीपावली पूजन के पश्चात गृह में एक चौमुखा दीपक रात भर जलता रहना चाहिए. यह दीपक लक्ष्मी एवं सौभाग्य में वृध्दि का प्रतीक माना जाता है.
खाता बही खरीदने का शुभ मुहूर्त :
विजया दशमी, गुरूवार 6.10.2011
दिन 12.00 बजे से दिन 1.30 लाभ
दिन 1.30 से दिन 3.00 अमृत
सायं 4.30 से 6.00 बजे तक शुभ
उपरोक्त चौघडिय़ा के शुभ मुहूर्त में उद्योग, व्यापार व दुकानों में रखे जाने वाले वार्षिक लेखा-जोखा प्रयुक्त खाता-बही का विजयादशमी के दिन खरीदी करना बेहद शुभ कारक माना जाता है।
गुरू पुष्य योग :
20 अक्टूबर 2011 (गुरूवार)
दिन 12.01 से 1.31 तक लाभ
दिन 1.31 से 3.01 तक अमृत
सायं 4.31 से सायं 5.59 तक शुभ
पुष्य नक्षत्र :
२1 अक्टूबर 2011 (शुक्रवार) को पुष्य नक्षत्र प्रात: 6.35 के पश्चात समाप्त हो जाने के कारण मुहूर्त का अभाव है।
धनतेरस :
24 अक्टूबर 2011 (सोमवार)
प्रात: 6.05 से 7.35 अमृत
प्रात: 9.05 से 10.35 शुभ
दिन 3.05 से 4.35 लाभ
सायं 4.35 से 6.05 अमृत
दीपावली :
26 अक्टूबर 2011 (बुधवार)
प्रात: 6.00 से 7.30 तक लाभ
प्रात: 7.30 से 9.00 तक अमृत
प्रात: 10.30 से 12 तक शुभ
गोधूलि मुहूर्त :
26 अक्टूबर 2011 (बुधवार)
सायं 5.00 से 6.39 तक
शुभ लग्न :
26 अक्टूबर 2011 (बुधवार)
वृषभ लग्न-
सायं 6.44 से 8.43 तक
(व्यापारी, उद्योग एवं
सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में)
मिथुन लग्न - रात्रि 8.43 से 10.56 तक
(शिक्षण संस्थान एवं मैकेनिकल, केमिकल अथवा रासायनिक पदार्थों के उद्योगों एवं व्यापारियों के लिए)
सिंह लग्न - रात्रि 1.12 से 3.22 तक
(स्थिर लक्ष्मी प्राप्ति हेतु तांत्रिक व सात्विक निशीथ कालीन लक्ष्मी प्राप्ति हेतु विशेष अनुष्ठान के लिए)

छत्तीसगढ़ में संस्कृत को चाहिए संजीवनी

छत्तीसगढ़ में संस्कृत को चाहिए संजीवनी
छत्तीसगढ़ संस्कृत विद्यामंडलम के अध्यक्ष डॉ. गणेश कौशिक के मुताबिक राज्य में संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन को बेहतर बनाने के अलावा रोजगारपरक बनाये जाने पर ज्यादा जोर दिया जायेगा, जो आगामी शिक्षा सत्र से राज्य में कम से कम 100 नए संस्कृत विद्यालय प्रारंभ करने की योजना है, राज्य के लिए बेहद आवश्यक था। प्रदेश में मरणासन्न शय्या पर कराहती संस्कृत-भाषा के लिए संजीवनी का काम करेगी,जरूरत है इस दिशा में कठोर कदम उठाने की।
छत्तीसगढ़ मेे संस्कृत के शताधिक विद्यालयों का खोला जाना स्वागतेय हैै, किन्तु आम जनमानस को संस्कृत के प्रति आकर्षित करना अत्यंत कठिन है। आज कोई भी छात्र का अभिभावक बच्चे को स्कूल व विद्यालय भेजने से पहले सम्भावनाओं को तलाशता है..? अतएव इस शिक्षा के विस्तार के साथ-साथ सम्भावनाओं और रोजगारपरक बनाने पर बल देना बेहद जरूरी होगा । प्रदेश सरकार द्वारा की जा रहीं शिक्षा कर्मियों के नियुक्तियों में संस्कृत के अध्यापकों के लिए सुरक्षित करना, पीएमटी, इंजीनियरिंग, शासकीय राजस्व आदि सभी क्षेत्रों में रोजगार मुहैया कराने,  जैसा ठोस कदम उठाना होगा। संस्कृत किसी वर्ग विशेष का शिक्षा नहीं बल्कि चहुँमुखी रोजगार शिक्षा के रूप में स्वयमेव आम जनमानस को अपनी तरफ आकर्षित करे।
क्योंकि यदि केन्द्रीय शिक्षा नीति पर बात की जाय तो पिछले कुछ दिनों पूर्व  त्रिभाषा फार्मूले की राष्ट्रीय भाषा नीति का उल्लंघन करते हुए सीबीएसई ने हाल ही में 9वीं-10वीं कक्षा के स्कूली पाठ्यक्रम के बाबत जो नया आदेश जारी किया है. उससे सन् 1992 में संसद द्वारा स्वीकृत राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर प्रश्नचिह्न तो लगता ही है, संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल संस्कृत भाषा के मौलिक अधिकारों पर भी कुठाराघात हुआ है. वर्षों से चले आ रहे पुराने सीबीएसई पाठ्यक्रम के अनुसार तृतीय भाषा या फिर अतिरिक्त छठे विषय के रूप में संस्कृत भाषा को पढ़ा जा सकता था किन्तु बोर्ड द्वारा जारी नई द्विभाषा नीति के लागू होने तथा अतिरिक्त छठे विषय के प्रावधान को हटा देने की वजह से स्कूलों में संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन की बची-खुची संभावना भी पूरी तरह से समाप्त हो गई है. सीबीएसई के इस नए फैसले से पब्लिक स्कूलों ने अब संस्कृत की पढ़ाई बंद करके उसके स्थान पर जर्मन और फ्रेंच भाषाओं को पढ़ाना शुरू कर दिया है इस कारण हजारों संस्कृत छात्रों-अध्यापकों का भविष्य खतरे में पड़ गया है.
संस्कृत के साथ हो रहे इस अन्याय को देखते हुए इसके संगठनों में गम्भीर प्रतिक्रिया हुई है. 'दिल्ली संस्कृत अकादमी' द्वारा आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोर्ड द्वारा जारी संस्कृत विरोधी शिक्षा नीति की घोर निंदा की गई थी.
'संस्कृत कमीशन' तथा ' यूजीसी'  की सिफारिश के अनुसार संस्कृत भाषा और साहित्य की वर्तमान संदर्भ में उपयोगिता को चरितार्थ करने के लिए स्कूली पाठ्यक्रम में भाषा का माध्यम चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता दी जानी चाहिए. किंतु सीबीएसई ने 'संस्कृत कमीशन' और 'यूजीसी' की इन सिफारिशों को दरकिनार करते हुए अपने तुगलकी फरमान द्वारा 9वीं-10 वीं कक्षा के प्रारम्भिक स्तर पर ही संस्कृत विषय का चयन करने वाले छात्रों के लिए संस्कृत भाषा का माध्यम अनिवार्य कर दिया ताकि छात्र इस भाषा को कठिन मानकर फ्रेंच या जर्मन पढ़ सकें. बोर्ड द्वारा अपनाई गए इस संविधान विरुद्ध भाषाई दुराग्रह का मुख्य कारण है संस्कृत को जन-सामान्य से दूर रखना और इसके राष्ट्रव्यापी प्रचार-प्रसार पर अंकुश लगाना ही साबित हुआ .
दरअसल, सीबीएसई का पुराना इतिहास रहा है कि वह  कभी मातृभाषा या कभी क्लासिकल भाषा बताकर संस्कृत को स्कूली पाठ्यक्रम से बाहर रखने की रणनीति बनाता आया है. सन् 1986 में जब सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति की बुनियाद रखी गई तब भी बोर्ड ने स्कूली पाठ्यक्रम से संस्कृत विषय को ही समाप्त कर दिया और लम्बे संघर्ष तथा सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से संस्कृत की पुन: बहाली हो सकी.
4 अक्टूबर 1994 को सर्वोच्च न्यायालय ने स्कूली पाठ्यक्रम में संस्कृत भाषा के महत्त्व को रेखांकित करते हुए अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि किसी देश की सीमा के साथ उसकी संस्कृति की रक्षा भी मुख्य राष्ट्रीय दायित्व होता है. हम भारतवासियों के लिए संस्कृत का अध्ययन देश की सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा के लिए किया जाता है. यदि शैक्षिक पाठ्यक्रम से संस्कृत को हतोत्साहित किया जाएगा तो हमारी संस्कृति की धारा ही सूख जाएगी. इन्हीं टिप्पणियों के साथ न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह तथा न्यायमूर्ति बी. एल. हनसेरिया ने सीबीएसई को स्कूली पाठ्यक्रम में संस्कृत को एक वैकल्पिक विषय के रूप में पढ़ाने का आदेश जारी किया. अदालत ने पाठ्यक्रम निर्माताओं को इस तथ्य से भी अवगत कराया कि संविधान की आठवीं अनुसूची में संस्कृत को इसलिए शामिल किया गया ताकि देश की संस्कृति को अभिव्यक्ति प्रदान करने वाली हिन्दी शब्दावली के विकास में मुख्य रूप से संस्कृत से सहयोग लिया जा सके.
संस्कृत कमीशन की रिपोर्ट हो या सर्वोच्च न्यायालय का फैसला सभी ने स्कूली पाठ्यक्रम में एक वैकल्पिक विषय के रूप में संस्कृत को पढ़ाए जाने की जरूरत इसलिए समझी ताकि इस भाषा के शिक्षण से छात्रों को अपने देश की सांस्कृतिक परम्पराओं का ज्ञान हो सके. संस्कृत पाठ्यक्रम से सम्बन्धित सन् 1988 की यूजीसी की रिपोर्ट के अनुसार स्कूली स्तर पर संस्कृत शिक्षा के तीन उद्देश्य बताए गए हैं-चरित्र निर्माण, बौद्धिक योग्यताओं का समुचित विकास तथा राष्ट्रीय धरोहर का संरक्षण. पर चिंता का विषय है कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन के राष्ट्रीय संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करने वाली संस्कृत भाषा आज संकट के दौर से गुजर रही है.
अभी कुछ वर्ष पूर्व अमेरिकी प्राच्यविद्या मनीषी प्रोफेसर सैल्डन पोलॉक जब केरल स्थित संस्कृत कालेज में व्याख्यान देने आए थे तो उन्होने भी चिंता व्यक्त की कि, जिस संस्कृत विद्या को अमेरिका आदि विभिन्न देशों में गहरी रुचि लेकर पढ़ाया जाता है वही संस्कृत अपने ही देश में अस्तित्व को बचाने के दौर से गुजर रही है. यदि भारत में संस्कृत को मर जाने दिया गया तो यह विश्व की एक बहुत बड़ी सांस्कृतिक धरोहर की हत्या होगी. सैल्डन पोलॉक के अनुसार ब्रिटिशकालीन उपनिवेशवादी शिक्षानीति जो अंग्रेजी के वर्चस्व को स्थापित करने के लिए सदैव प्रयासरत रहती है, संस्कृत शिक्षा को भारत में हतोत्साहित करती आई है.
गांधी जी ने 'संस्कृति को दबाने वाली अंग्रेजी भाषा को अंग्रेजों की तरह ही यहां से निकाल बाहर करने' के आग्रह से राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति में संस्कृत शिक्षा पर विशेष बल दिया था.
संस्कृत पिछले दस हजार वर्षों के भारतीय ज्ञान-विज्ञान की संवाहिका 'हैरिटेज' भाषा भी है. इसलिए भारतीय संसद द्वारा स्वीकृत 'संस्कृत कमीशन' की रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा व्यवस्था में संस्कृत को राष्ट्रीय अस्मिता के संरक्षण की दृष्टि से भी विशेष प्रोत्साहन दिया जाना जरूरी है.ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार ने संस्कृत शिक्षा के प्रति गंभीर होकर संस्कृत शिक्षा बोर्ड के अंतर्गत आगामी सत्र तक 100 संस्कृत विद्यालयों के खोले जाने व बोर्ड के अध्यक्ष गणेश कौशिक के अनुसार संस्कृत शिक्षा को रोजगार परक बनाने की पहल अत्यंत प्रशंसनीय है। लेकिन देखना यह है कि, राज्य सरकार द्वारा किया गया यह पहल क्या रंग लाता है।
- पं. विनोद चौबे (पत्रिका के संपादक)

भाजपा के रथ पर आडवाणी और विरथ कांग्रेस....

संपादकीय
भाजपा के रथ पर आडवाणी और विरथ कांग्रेस
- पं. विनोद चौबे
रथ आवाम से नहीं जोड़ता, जनता से दूर ले जाता है। रथ सामंती प्रतीक है। हमारी परंपरा में रावण रथी है, और रघुवीर विरथ। बावजूद उनको रथ पर सवार होना क्या जरूरी था क्या इसके अलावा और कोई दुसरा विकल्प नहीं था..? आडवाणी जी 'आदि रथयात्री  हैं। उनकी यात्रा के निहितार्थ सब जानते हैं।

लालकृष्ण आडवाणी का अपनी 38 दिन में 7600 किलोमिटर की  'जन चेतना यात्राÓ की शुरुआत जयप्रकाश नारायण के जयंती के अवसर पर उनके गांव छपरा के सिताब दियारा से करना प्रतीकात्मक रूप से खास महत्व का है। लोकनायक जयप्रकाश नारायण की स्वतंत्रता संग्राम और आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण में विशेष भूमिका रही, लेकिन आज की पीढ़ी उन्हें ज्यादातर 1970 के दशक के उस आंदोलन के लिए ही जानती है, जिसका केंद्रीय बिंदु भ्रष्टाचार मिटाना था।
आज लोकनायक की जयंती पर आडवाणी उनके गांव से भ्रष्टाचार विरोधी अपने अभियान पर निकलेंगे। आडवाणी लंबी रथयात्राओं के लिए जाने जाते हैं, लेकिन शायद पहली बार वे एक ऐसे मुद्दे को लेकर जनता के बीच उतरे हैं, जिसका परिप्रेक्ष्य व्यापक है। यह रथयात्रा 23 राज्यों से गुजरने वाली 40 दिन की इस यात्रा के दौरान मनमोहन सिंह सरकार उनके खास निशाने पर होगी। यहां एक दुसरे पहलु पर भी गौर करने की बात है कि रथ आवाम से नहीं जोड़ता, जनता से दूर ले जाता है। रथ सामंती प्रतीक है। हमारी परंपरा में रावण रथी है, और रघुवीर विरथ। बावजूद उनको रथ पर सवार होना क्या जरूरी था क्या इसके अलावा और कोई दुसरा विकल्प नहीं था..? आडवाणी जी 'आदि रथयात्री हैं। उनकी यात्रा के निहितार्थ सब जानते हैं।
देश उस मुकाम पर है जहां से राजनीति के सूत्र युवाओं के हाथ जा रहे हैं। देश के 72 करोड़ 99 लाख मतदाताओं में 50 प्रतिशत युवा हैं। राहुल गांधी मुकाबले में हैं। युवा आगे देख रहा है। रथ पीछे ले जाता है। इसलिए आडवाणी की रथयात्रा युवावर्ग को लुभाती नहीं है। शायद इसी सोच से संघ और भाजपा अपना नेता बदलना चाहते हैं। वे दूसरी पीढ़ी को सत्ता सौंपना चाहते हैं। दरअसल आडवाणी जी दो परिवारों के बीच फंसे हैं। एक उनका अपना परिवार है, जो उन्हें प्रधानमंत्री देखना चाहता है। उनकी दलील है कि मोरारजी तो 83 की उम्र में प्रधानमंत्री बने थे। फिर दादा की सेहत अच्छी है। दिमाग दुरुस्त है। दूसरा है संघ परिवार, जो किसी कीमत पर आडवाणी को अब मुख्यधारा में रहने देना नहीं चाहता। यही वजह है कि आडवाणी के इस रथयात्रा निकलने तक जो माहौल होना चाहिए सह इस बार माहौल पैदा करने में असमर्थ रही। पार्टी के बड़े नेताओं और मुख्यमंत्रियों ने हाथ खींच लिए हैं। पार्टी का यह रुख देख आडवाणी जी ने रथयात्रा नीतीश कुमार के हवाले कर दी है। लालकृष्ण आडवाणी ने निश्चित तौर पर भाजपा को सत्ता की राजनीति के सर्वश्रेष्ठ दिन दिखाए हैं। जनसंघ से भाजपा तक उनका योगदान बेजोड़ रहा है। उनकी पहली रथयात्रा ने पूरे देश में रामजान्मभूमि आंदोलन के लिए एक उफान पैदा किया था। आडवाणी की खुद की यात्रा भी कम रोचक नहीं है। पहले वह अटल बिहारी वाजपेयी के सहायक रहे। फिर उनके समकक्ष हुए। बाद में प्रतिद्वंद्वी बने। यह संयोग है कि वाजपेयी के प्रतिद्वंद्वी बनने के बावजूद आडवाणी तभी तक ताकतवर थे, जब तक वे वाजपेयी की छाया में थे। बाद में उन्हे लगा कि प्रधानमंत्री बनने के लिए अटल जैसा उदार चेहरा चाहिए। इसके लिए उन्होंने जिन्ना का सहारा ले लिया। बस यहीं से गड़बड़ हुई। इसके बाद संघ ने उनसे राजनैतिक नेतृत्व जबरन दूसरी पीढ़ी को दिलवाया। फिर नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी छीनी। अब आडवाणी क्या करें? एक- उन्हें चुनाव न लडऩे की घोषणा करनी चाहिए। दो- उन्हें जयप्रकाश नारायण की तरह व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का ऐलान करना चाहिए। खुद को सत्ता की दौड़ से बाहर बताना चाहिए। दरअसल लालकृष्ण आडवाणी के लिए यह तय करने का वक्त आ गया है कि वे राजनीति से सुनील गावस्कर की तरह शतक लगाकर रिटायर होंगे। या कपिलदेव की तरह रिटायर किए जाएंगें। फिलहाल, उनका रास्ता कपिलदेव की ओर जा रहा है।
हाल के घोटालों और विदेशों में जमा काले धन के सवाल से आडवाणी सत्ताधारी गठबंधन को घेरने की कोशिश करेंगे। पर्यवेक्षकों की निगाह इस पर होगी कि इस पर जनता की कैसी प्रतिक्रिया मिलती है? अगले चुनावों में भाजपा की रणनीति काफी कुछ इस प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगी।
अगर लोगों ने उत्साह दिखाया, तो भाजपा के लिए किसी अन्य मुद्दे की दरकार शायद नहीं रहेगी। उस हाल में पार्टी या संघ परिवार के लिए आडवाणी को दरकिनार करना भी कठिन हो जाएगा, जैसी मंशा उनके बीच हाल में दिखी है।
कुल मिलाकर नीतिश कुमार के हरी झंडी दिखाने के बाद आडवाणी की यह जनचेतना यात्रा प्रारंभ हुई और वहीं लालू प्रसाद यादव ने जय प्रकाश नारायण की इस पावन भूमि को दूषित करना बताया।

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

क्या वास्तव में रावण राक्षस था...?

क्या वास्तव में रावण राक्षस था...?
ब्रह्मा जी सृष्टी क्रम में अनेक जल जन्तु बनाये और उनसे समुद्र के जल की रक्षा करने के लिये कहा। तब उन जन्तुओं में से कुछ जन्तुओं ने ब्रह्मा जी से कहा कि हम इसका रक्षण (रक्षा) करेंगे और कुछ ने कहा कि हम इसका यक्षण (पूजा) करेंगे। इस पर ब्रह्माजी ने कहा कि जो रक्षण करेगा वह राक्षस कहलायेगा और जो यक्षण करेगा वह यक्ष कहलायेगा। इस प्रकार वे दो जातियों में बँट गये। राक्षसों में हेति और प्रहेति दो भाई थे। प्रहेति तपस्या करने चला गया, परन्तु हेति ने भया से विवाह किया जिससे उसके विद्युत्केश नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। विद्युत्केश के सुकेश नामक पराक्रमी पुत्र हुआ। सुकेश के माल्यवान, सुमाली और माली नामक तीन पुत्र हुये। तीनों ने ब्रह्मा जी की तपस्या करके यह वरदान प्राप्त कर लिये कि हम लोगों का प्रेम अटूट हो और हमें कोई पराजित न कर सके। वर पाकर वे निर्भय हो गये और सुरों, असुरों को सताने लगे। उन्होंने विश्वकर्मा से एक अत्यन्त सुन्दर नगर बनाने के लिये कहा। इस पर विश्वकर्मा ने उन्हें लंका पुरी का पता बताकर भेज दिया। वहाँ वे बड़े आनन्द के साथ रहने लगे। माल्यवान के वज्रमुष्टि, विरूपाक्ष, दुर्मुख, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, मत्त और उन्मत्त नामक सात पुत्र हुये। सुमाली के प्रहस्त्र, अकम्पन, विकट, कालिकामुख, धूम्राक्ष, दण्ड, सुपाश्र्व, संह्नादि, प्रधस एवं भारकर्ण नाम के दस पुत्र हुये। माली के अनल, अनिल, हर और सम्पाती नामक चार पुत्र हुये। ये सब बलवान और दुष्ट प्रकृति होने के कारण ऋ षि-मुनियों को कष्ट दिया करते थे।
भगवान विष्णु ने राक्षसों का संहार कर दियेे। जिसमें सेनापति माली सहित अनेक राक्षस मारे गये और शेष बचे हुये राक्षस सुमाली के नेतृत्व में लंका को त्यागकर पाताल में जा बसे और लंका पर कुबेर का राज्य स्थापित हुआ। राक्षसों के विनाश से दु:खी होकर सुमाली ने अपनी पुत्री कैकसी से कहा कि पुत्री! राक्षस वंश के कल्याण के लिये मैं चाहता हूँ कि तुम परम पराक्रमी महर्षि विश्वश्रवा के पास जाकर उनसे पुत्र प्राप्त करो। वही पुत्र हम राक्षसों की देवताओं से रक्षा कर सकता है।
पिता की आज्ञा पाकर कैकसी विश्रवा के पास गई। उस समय भयंकर आँधी चल रही थी। आकाश में मेघ गरज रहे थे। कैकसी का अभिप्राय जानकर विश्रवा ने कहा कि भद्रे! तुम इस कुबेला में आई हो। मैं तुम्हारी इच्छा तो पूरी कर दूँगा परन्तु इससे तुम्हारी सन्तान दुष्ट स्वभाव वाला होगा। मुनि की बात सुनकर कैकसी उनके चरणों में गिर पड़ी और बोली कि भगवन आप ब्रह्मवादी महात्मा हैं। आपसे मैं ऐसी दुराचारी सन्तान पाने की आशा नहीं करती। अत: आप मुझ पर कृपा करें। कैकसी के वचन सुनकर मुनि विश्रवा ने कहा कि अच्छा तो तुम्हारा सबसे छोटा पुत्र सदाचारी और धर्मात्मा होगा।
इस प्रकार कैकसी के दस मुख वाले पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम दशग्रीव (रावण) रखा गया। उसके पश्चात् कुम्भकर्ण, शूर्पणखा और विभीषण के जन्म हुये। दशग्रीव और कुम्भकर्ण अत्यन्त दुष्ट थे, किन्तु विभीषण धर्मात्मा प्रकृति का था। अपने भाई वैश्रवण(कुबेर) से भी अधिक पराक्रमी और शक्तिशाली बनने के लिये दशग्रीव ने अपने भाइयों सहित ब्रह्माजी की तपस्या की। ब्रह्मा के प्रसन्न होने पर दशग्रीव ने माँगा कि 'मैं गरुड़, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस तथा देवताओं के लिये अवध्य हो जाऊँ  '। रावण ने 'मनुष्य' से इसलिये नही कहा क्यों के वो मनुष्य को कमजोर तथा बलरहित समझता था। ब्रह्मा जी ने 'तथास्तु' कहकर उसकी इच्छा पूरी कर दी। विभीषण ने धर्म में अविचल मति का और कुम्भकर्ण ने वर्षों तक सोते रहने का वरदान पाया।वो एस वजह से कि इन्द्र ने माँ सरस्वती को कहा कि जब कुम्भकर्ण वरदान मांग रहा हो तब आप उसका ध्यान विचलित करे
फिर दशग्रीव ने लंका के राजा कुबेर को विवश किया कि वह लंका छोड़कर अपना राज्य उसे सौंप दे। अपने पिता विश्रवा के समझाने पर कुबेर ने लंका का परित्याग कर दिया और रावण अपनी सेना, भाइयों तथा सेवकों के साथ लंका में रहने लगा। लंका में जम जाने के बाद अपने बहन शूर्पणखा का विवाह कालका के पुत्र दानवराज विद्युविह्वा के साथ कर दिया। उसने स्वयं दिति के पुत्र मय की कन्या मन्दोदरी से विवाह किया जो हेमा नामक अप्सरा के गर्भ से उत्पन्न हुई थी। विरोचनकुमार बलि की पुत्री वज्रज्वला से कुम्भकर्ण का और गन्धर्वराज महात्मा शैलूष की कन्या सरमा से विभीषण का विवाह हुआ। कुछ समय पश्चात् मन्दोदरी ने मेघनाद को जन्म दिया जो इन्द्र को परास्त कर संसार में इन्द्रजित के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
-ज्योतिषाचार्य.पं.विनोद चौबे महाराज