ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे

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रविवार, 18 सितंबर 2011

प्रायवेट स्कूलों की मनमानी

प्रायवेट स्कूलों की मनमानी
एक ओर जहां सीसीई सिस्टम ने लोगों को चिंता में डाल दिया है वहीं दुर्ग जिले में प्रायवेट स्कूलों की मनमानी और फीस बढ़ोत्तरी जैसे कई मामलों में अंकुश लगाने में प्रशासनिक सुस्ती से पालक वर्ग खासा नाराज दिखाई दे रहा है। शहरी क्षेत्रों में एक प्रकार से निजी स्कूलों ने पालकों को लूटने में कहीं से कोई कसर बाकी नहीं रखी है। स्कूलों में ही कापी-किताब, ड्रेस, जूते-मोजे, टाई, स्कूल बैग सभी कुछ बिकने लगा है, पालकों पर बाध्यता है कि वे स्कूल की निश्चित दुकान से ही अपने बच्चों के लिये सामान खरीदें अगर उन्हें उस स्कूल में बच्चे को पढ़ाना है। हर वर्ष बिल्डिंग फंड, डोनेशन, कॉशन मनी व केपिटेशन फीस के नाम पर पालकों की जेब खाली की जा रही है। ज्ञान केन्द्रों पर अब खुले तौर पर व्यवसाय किया जाने लगा है। दुर्ग जिले में इसके विरोध में लगातार चलाये जा रहे आंदोलन के बाद जैसे-तैसे प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर शिकंजा कसने की कार्रवाई बलवती होती दिखाई पड़ी थी लेकिन इस संबंध में कलेक्टर का निर्देश भी अब महज कागजी बन कर उपहास का कारण बन गया है।
प्रतियोगी परीक्षा में को- स्कॉलिस्टिक नगण्य...
पं. रविशंकर शुल्क विश्वविद्यालय रायपुर के एक वरिष्ठ प्रोफेसर से जब मैंने चर्चा कि तो उन्होंने कहा कि सामान्यत: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश में अगर किसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा प्रयोग हुआ है तो वह है शिक्षा-प्रणाली। गैर-सरकारी और एनजीओ द्वारा किए गए कार्य और प्राप्त आंकड़ों के आधार एवं सरकारी महकमे के चंद चापलूस शिक्षाविदें और अधिकारियों की सांठ-गांठ से हमेशा शिक्षा पद्धतियों व नीतियों में परिवर्तन किया जाता रहा है। शासन द्वारा यह पहल आम बच्चों को ध्यान में रख कर की जाती है लेकिन जब आप अखिल भारतीय स्तर पर रोजगार के लिये सिविल सर्विस परीक्षा, बैंक, वैज्ञानिक अनुसंधान, डॉक्टर, इंजीनियरिंग की परीक्षा की ओर ध्यान देते हैं तो इसमें वहीं बच्चे सफल होते हैं जो विषय ज्ञान (स्कॉलिस्टिक एरिया) रखते हैं। यहां को-स्कॉलिस्टिक एरिया नगण्य है।


  हर माल एक रूपये में ...
की तर्ज पर सीसीई प्रणाली
च्च्आज भले ही स्कूली छात्र-छात्राओं व अभिभावकों द्वारा केन्द्र सरकार की नवीनतम शिक्षा प्रणाली ष्टशठ्ठह्लद्बठ्ठह्वशह्वह्य & ष्टशद्वश्चह्म्द्गद्धद्गह्यद्ब1द्ग श्व1ड्डद्यह्वड्डह्लद्बशठ्ठ स्4ह्यह्लद्गद्व (सीसीई सिस्टम) का विरोध न किया गया हो लेकिन आने वाले समय में यही वर्ग भारतीय शिक्षा-प्रणाली के इतिहास में पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की तरह वर्तमान मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल का नाम काले अक्षर में लिखेगा। जब विषय के मूल ज्ञान के अभाव में यही वर्ग बेरोजगारी की अनंत कतार में अपने भविष्य का आंकलन करेगा तब तक काफी देर हो चुकी होगी।ज्ज्
कपिल सिब्बल या उनके संरक्षण की चादर तले छिपे कई शिक्षाविद् भले आज लाल किला या इंडिया गेट पर चढ़ कर डंके की चोट पर इस बात का दावा करें कि उनकी सरकार शिक्षा के क्षेत्र में आमूल परिवर्तन करने कटिबद्ध है लेकिन सच्चाई यही है कि नई सीसीई शिक्षा प्रणाली एक ओर जहां आने वाले वर्षों में मूर्ख मानव संसाधन का एक विशाल जमघट खड़ा करने पर आमादा है वहीं सरकारी से गैर-सरकारी और निजी विद्यालयों में काम करने वाले शिक्षक-शिक्षिकाओं को छात्र-छात्राओं व पालकों के सामने आईने के सामने खड़ा कर दिया है। हालांकि वर्तमान सीसीई सिस्टम ने दसवीं के परिक्षा परिणाम में अनुत्तीर्ण हुए या अपेक्षा से कम अंक पाने वाले छात्र-छात्राओं द्वारा की जाने वाली खुदकुशी की घटनाओं  को प्रत्यक्ष रूप से कम किया है लेकिन ये परिणाम  सिर्फ  तात्कालीन हैं, इसके दूरगामी परिणाम तब काफी खतरनाक  रूख  दिखायेंगे जब  हाथ में डिग्री लेकर सड़कों पर नौकरी या रोजगार की तलाश में  यह वर्ग  दर-दर भटकेगा क्योंकि उस समय एक विशाल समूह के पास विषय के मूल ज्ञान का पर्याप्त अभाव होगा।
सीसीई सिस्टम की सबसे बड़ी च्च्खामीज्ज्
सीसीई सिस्टम की सबसे बड़ी खामी यह है कि इसने छात्र-छात्राओं  द्वारा परीक्षा में  प्राप्त अंकों  को गुप्त रखा है, उसे  ग्रेड में दर्शाया है ताकि परिक्षा परिणाम के तुरंत बाद (ऐसे समय ही छात्र-छात्रा खुदकुशी की ओर अग्रसर होते हैं) उन्हें अपने अंकों  का पता  न  चले, साथ ही कमजोर  छात्र-छात्राओं  को  परीक्षा उत्तीर्ण करने  हेतु  न्यूनतम अंक (30 से 40) ग्रेड  प्राप्त  करने के लिये तीन अवसर तो दिए गए हैं परंतु स्कूलों को यह भी निर्देश है कि किसी भी हालत में संबंधित बच्चे को उस वर्ग में अनुत्तीर्ण घोषित न किया जाये।
स्कॉलिस्टिक एरिया ए- में कुल नौ ग्रेड बनाये गये हैं :- ए-1 (91 से 100, ग्रेड पाइंट-10), ए-2 (81 से 90, ग्रेड पाइंट-9), बी-1 (71 से 80, ग्रेड पाइंट-8), बी-2 (61 से 70, ग्रेड पाइंट-7), सी-1 (51 से 60, ग्रेड पाइंट-6), सी-2 (41 से 50, ग्रेड पाइंट-5), डी (33 से 40, ग्रेड पाइंट-4), ई-1 (21 से 32) एवं ई-2 (00 से 20) जो मूलत: पांच ग्रेड ए+, ए, बी+, बी एवं सी ग्रेड के रूप में क्रियान्वित हुए हैं जबकि को-स्कॉलिस्टिक एरिया में तीन एरिया - लाईफ स्किल्स (ए+, ए और बी ग्रेड), एडिट्यूट एण्ड वैल्यू (ए+, ए, बी ग्रेड) और एक्टिविटी एण्ड क्लब (ए+, ए और बी ग्रेड) क्रियान्वित किये गये हैं।
कैसे जगायेंगे
च्च्अव्वल रहने की भावनाज्ज्
दुर्भाग्य यह है कि केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) अपनी स्थापना के 48 वर्षों बाद से जिस तरह इस नई प्रणाली को क्रियान्वित किया है वह भले अभिभावकों को देखने व सुनने में आकर्षित करता रहा हो लेकिन इसके क्रियान्वयन में अभिभावकों व बच्चों को जिस तरह से अंधकार में रखा गया वह बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ ही है। नई सीसीई प्रणाली ने जहां शिक्षक-शिक्षिकाओं को ओव्हर बर्डन किया है वहीं छात्र-छात्राओं को को-स्कोलास्टिक एरिया की ओर उन्मुख कर उन्हें विषय के मूल ज्ञान से किनारे कर दिया है। इतना ही नहीं, बच्चों के मन में यह बैठ गया है कि शिक्षक उन्हें किसी भी हालत में अनुत्तीर्ण घोषित नहीं कर सकता और न ही दण्डित कर सकता है (चाहे स्कूल में उनका कैसा भी व्यवहार क्यों न हो), सिवाय इसके कि वे (शिक्षक-शिक्षिकाएं) उनकी डायरी में उनके अभिभावक के नाम एक नोट लिख दें कि उनका बच्चा स्कूली वातावरण को विषाक्त कर रहा है।
पप्पू पास हो कर भी किस काम का....?
अगर कोई बच्चा डी ग्रेड लाता है, यानि उसके अंक 33-40 प्रतिशत के बीच हैं तो उसे अगले वर्ग में भेजना ही पड़ेगा। इतना ही नहीं ई-1 या ई-2 ग्रेड पाने वाले (00 से 32 अंक) बच्चों को इस प्रणाली के अनुरूप तीन अवसर  दिए जायेंगे ताकि वह डी ग्रेड प्राप्त कर अगले वर्ग में दाखिला ले सकें,  परंतु किसी भी हालत में  उस विद्यार्थी को शिक्षक अनुत्तीर्ण घोषित नहीं करेंगे। इस प्रणाली में स्कोलास्टिक एवं को-स्कोलास्टिक एरिया के तहत प्रत्येक स्कूल या शिक्षकों को 100 प्रतिशत में से 60 प्रतिशत अंक देने का प्रावधान है। अब अगर बच्चे को गणित या विज्ञान में या अंग्रेजी में मात्र 5 से 10 अंक मिले और प्रदत्त अधिकार के अधीन शिक्षक उसे उन एरिया में प्राप्त अंक को जोड़ कर और औसत अंक के आधार पर उत्तीर्ण घोषित कर देंगे तो ऐसे में बच्चा पास हो कर भी किस काम का....?
कार्यशैली से बढ़ी नाराजगी
-जारी है आंदोलन
गौरतलब हो कि डीईओ टीम के निरीक्षण के बाद जब कलेक्टर ने जनसुनवाई के लिए संयुक्त कलेक्टर पी तिर्की और डिप्टी कलेक्टर जीवन सिंह राजपूत को जिम्मेदारी सौंपी तो पैरेंट्स में आस जगी थी। पैरेंट्स ने तो राहत की उम्मीद पाल ली लेकिन जिला प्रशासन ही सुस्त होता चला गया। जनसुनवाई की रिपोर्ट कलेक्टर के टेबल पर देर से पहुंची। फाइल पर उन्होंने निर्णय लेकर डीईओ को कार्रवाई के निर्देश दे दिए। निर्देश की कापी डीईओ कार्यालय में दब गई। दोषी निजी स्कूल निश्चिंत हो गए। जिम्मेदार अधिकारी बताते हंै कि कलेक्टर के निर्देश के बाद तीन अधिकारियों की बैठक हुई जिसमें तकरीबन आधे घंटे तक मंत्रणा के बाद सीधे कहा गया कि कुछ मत करो। कागजी कार्रवाई वैसे ही रहने दो, मौखिक बात सुनो। हालांकि बैठक में मौजूद एक अधिकारी इससे सहमत नहीं थे। बाद में उन्होंने दूसरे अधिकारी से चर्चा भी की पर अपने बड़े अफसर के सामने जुबान खोलने हिम्मत नहीं जुटा पाए। इस तरह कलेक्टर का कागजी निर्देश बिसरा दिया गया। 4 जुलाई व 23 अगस्त को लोक शिक्षण विभाग संचालनालय व मंत्रालय से प्रायवेट स्कूलों के संबंध में आदेश जारी कर बिल्डिंग फंड, डोनेशन, कॉशन मनी व केपिटेशन फीस पर तत्काल रोक लगाने कहा गया था  लेकिन यह आदेश भी डीईओ ने ताक पर रख दिया।
कलेक्टर की कड़ी हिदायत के बाद भी प्रायवेट स्कूलों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया गया। गौरतलब हो कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में आये निर्देश कि निजी विद्यालय भी सूचना के अधिकार के दायरे में आयेंगे, के बाद जिले के निजी स्कूलों में खासी खलबली देखी जा रही है। कांग्रेस के युवा नेता सीजू एंथोनी लम्बे समय से निजी स्कूलों की मनमानी के खिलाफ संघर्ष करते रहे हैं। श्री एंथोनी ने ज्योतिष का सूर्य  से चर्चा में कहा कि उनका संघर्ष अभी रूका नहीं है। जिलाधीश की पहल के बाद इस मामले में लोगों के बीच आश जगी थी कि शिक्षा के व्यावसायीकरण पर अब लगाम लग सकेगी लेकिन निर्देश के बाद भी अमल में लाने वाले अधिकारी ढिलाई बरत रहे हैं। श्री एंथोनी ने कहा कि- कुछ दिन इंतजार किया जा रहा है अगर इसके बाद भी हालात जस के तस रहे तो क्षेत्र की जनता के साथ उग्र आंदोलन करने विवश होंगे जिसके लिये सीधे तौर पर जिला प्रशासन जिम्मेदार होगा ।
संतोष मिश्रा
पत्रकार, भिलाई
- संतोष मिश्रा

2009 से निरंतर २६ वां अंक '' ज्योतिष का सूर्य ''

2009 से निरंतर २६ वां अंक '' ज्योतिष का सूर्य '' इस बार दीपावली विशेषांक के रूप में नये साज-सज्जा के साथ दिल्ली, छत्तीसगढ़, झारखंड, उ.प्र, एवं मध्य प्रदेश के १००४ अधिकृत बुकस्टॉलों पर उपलब्ध। यह आवरण पृष्ठ प्रस्तुत है..
हिन्दी मेरी पहचान है...सम्पादकीय
भाषा न केवल अभिव्यक्ति का एक माध्यम है बल्कि वह चिंतन को भी प्रभावित करती है। उसके साथ उसके बोलने वालों की संस्कृति और संस्कार भी जुडे होते हैं। भाषा केवल मस्तिष्क को झकझोरनेवाली ही नहीं, वरन हृदय को छूनेवाली भी होती है और यह ताकत अपनी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा में विशेष रूप से होती है।
हमारे देश में अनेक भाषाएं हैं और सबकी अपनी-अपनी समृद्ध संस्कृति और परंपराएं हैं। लेकिन इसके बावजूद हमारा अतीत एक है, अतीत के हमारे अनुभव एक हैं तथा हमारा चिंतन एक है। राष्ट्रीय स्वाभिमान और स्वतंत्रता की लडाई में पूरे भारत ने एकजुट होकर भाग लिया था। अंग्रेजी दासता का अनुभव पूरे भारत को एक जैसा है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक का संपूर्ण भारत हमेशा एक जैसे विचारों और भावनाओं से आंदोलित रहा है। सभ्यता और संस्कृति के आरंभिक काल से ही इस एक से चिंतन ने पूरे देश में एक सी संवेदनाओं को जन्म दिया है। तभी तो उत्तर भारत में रचित वेदों के भाव ज्यों के त्यों दक्षिण में रचित तिरुक्कुरल के भावों से मिल जाते हैं। नरसी मेहता, नामदेव, संत तुकाराम, एकनाथ, कबीर, सूर, मीरा, तुलसी, गुरुनानक, शंकरदेव, चैतन्य महाप्रभु आदि संतों की शिक्षाएँ स्थानविभेद होने पर भी भाव साम्य रखती हैं। इसीलिए हमें एक ऐसी भाषा की आवश्यकता है, जो हमारे इस ऐक्य को एक भाषा में व्यक्त कर सके। अपनी विशिष्ट ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के कारण हिंदी ही वह भाषा हो सकती है।
किसी भी संप्रभु व लोकतांत्रिक देश की एक राष्ट्र मुद्रा, एक राष्ट्रगान, एक राष्ट्रध्वज व एक राष्ट्र्रभाषा होती है। भारत अनेक भाषाभाषी लोगों का देश है और सभी की अपनी-अपनी समृद्ध संस्कृति व परम्पराएं हैं। अत: संवैधानिक रूप से देश की भाषाओं को राष्ट्रीय भाषाओं का सम्मान प्राप्त है। इन सबके बीच सम्पर्क और सामंजस्य स्थापित करने हेतु हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया। हिंदी को सम्पर्क राजभाषा घोषित करने का सीधा और सरल सा कारण यह था कि देश में इस भाषा को बोलने और समझने वाले सबसे अधिक थे। आज देश के दो तिहाई राज्यों में सत्रह बोलियों के रूप में हिंदी का विस्तार है। हिंदी भारत में सबसे अधिक बोली व समझी जाने वाली तथा विश्व में सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली व समझी जानेवाली तीसरी बड़ी भाषा है। इसे दुनिया भर में एक अरब से अधिक लोग जानते, पढ़ते, समझते और बोलते हैं।
स्वतंत्र भारत की बागडोर संभालने वाले नेताओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे गृहमंत्री पी चिंदबरम ने राजभाषा विभाग द्वारा हिन्दी दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में  किसी सार्वजनिक मंच पर लोगों को पहली बार हिन्दी में सम्बोधित किया। माना जाता है  कि तमिल भाषी चिदंबरम को हिन्दी बोलने में कठिनाई होती है। परंतु हिन्दी के उत्थान के लिहाज से देखा जाये तो इस प्रकार के अंग्रेजियत के पुजारी नेताओं पर शर्म आती है। जो हिन्दी के उत्थान की बात करते हों लेकिन उन्हे हिन्दी बोलना नहीं आता है। आस्ट्रेलिया से पढ़ाई कर स्वदेश लौटे महात्मा गांधी  की मुलाकात गोपालकृष्ण गोखले जी से हुई और उन्होने गोपालकृष्ण गोखले जी को अपना आदर्श और गुरू मानते हुए। देश के आजादी की लड़ाई में सम्मिलित हो गए लेकिन उन्होने कभी अंग्रेजी में सम्बोधन नहीं किया बल्कि ब्रिटिश अधिकारियों से उनकी बात अंग्रेजी में ही होती थी।
हिंदी के मामले में ढुलमुल नीति अपनाते हुए उपनिवेशवादी मानसिकता रखने वाले अंग्रेजीपरस्त राजनेताओं की पश्चिमी जीवनशैली व सोच के दबाव में 10 वर्षों के लिए अंग्रेजी को हिंदी की स्थानापन्न भाषा घोषित कर दिया गया। परिणाम यह हुआ कि हिंदी को एकमेव राजभाषा बनाने का मुद्दा भाषावादी व प्रांतवादी राजनीति में उलझ गया और चौसठ वर्ष बीत जाने पर भी हिंदी अपना गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त नहीं कर पाई।
किसी भी भाषा का विकास उसको व्यवहार में लाने से होता है। भाषा को व्यवहार में लाने का काम जनता करती है। अत: हिंदी को सही अर्थों में राजभाषा बनाने का कार्य सरकार, विश्वविद्यालयों, लेखकों, पत्रकारों व चंद हिंदी प्रेमी बुद्धिजीवियों से अधिक हम सबका है। राष्ट्रीय गौरव व अस्मिता का मुद्दा मानकर हिंदी के लिए जनमानस में आंदोलन का भाव आना चाहिए।
प्रिय पाठकों , शुभ नवरात्रि एवं दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि आप सहित मित्रों के साथ हिन्दू, हिन्दी और भारतीय संस्कृति पर बतौर आंदोलित मन: स्थिति के साथ सदैव इस दिशा में प्रयास जारी रखें। ताकि अपने भारतीय संस्कृति के साथ राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त हिन्दी की रक्षा हो सके।
जय हिन्द.. जय भारत...

बुधवार, 14 सितंबर 2011

पी. चिदंबरम के हिन्दी बोल उनके लिए घातक

 पी. चिदंबरम के हिन्दी बोल उनके लिए घातक
आखिरकार पी. चिदंबरम को हिन्दी बोलना ही पड़ा महामहिम राष्ट्रपति जी के सामने क्योकि इन्हीं महाशय को कार्यक्रम की अध्यक्षता करना पड़ गया ।
शर्म आती ऐसे हिन्दुस्तान के राजनेताओं पर जिनको हिन्दी बिल्कुल भी बोलने नहीं आता। ऐसे में ये हिन्दुस्तान के संस्कृति और भाषा का क्या रक्षा करेंगे...उनके हिन्दी बोलने की बहादूरी पर महामहिम ने सरहना भी कीं।यदि इस शर्मनाक वाकया को विदेशी लोग देख रहे होंगे वे भारत के इस हिन्दी का क्या महत्त्व देंगे..चाहें जो हो लेकिन हिन्दी का श्राप इन महाशय के उपर तो अगले चुनाव में जरूर पड़ेगा...जिसका हूंकार एक बार फिर अन्ना ने भर दी है।

रविवार, 11 सितंबर 2011


शनि का साढेसाती तथा ढैय्या का फल (२०११)
                                            ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे महाराज

15 नवम्बर 2011 तक शनि कन्या राशि में रहेंगे, कन्या राशि के शनि का साढेसाती तथा ढैय्या का फल -
सिंह राशि पर साढेसाती समाप्ति की ओर है अर्थात उतरती है । यह समय व्यापार धनधान्य मान सम्मान सुखसम्पदा के लिये लाभदायी रहेगा।
कन्या   राशि पर साढेसाती भोग की है। शारीरिक कष्ट रक्त पित्त विकार स्त्री व सन्तान को कष्ट व्यापार में हानि राजभय तथा नाना प्रकार के कष्ट।
तुला राशि पर साढेसाती चढती हुई है। सुखसम्पति मिलेगी स्त्री सुख प्राप्त होगा कार्य तथा व्यवसाय में प्रगति होगी घर में मंगल कार्य होंगे।
कुम्भ राशि पर ढैय्या का प्रभाव रहेगा यह इस राशि के लिये लाभकारी रहेगी सुखसम्पति मिलेगी स्त्री सुख प्राप्त होगा कार्य तथा व्यवसाय में प्रगति होगी घर में मंगल कार्य होंगे।
मिथुन राशि के लिये ढैय्या हानिकारक शारीरिक कष्ट रक्त पित्त विकार स्त्री व सन्तान को कष्ट व्यापार में हानि राजभय तथा नाना प्रकार के कष्ट।
15 नवम्बर 2011 को शनि तुला में 10 बजकर 12 मिनट पर प्रवेश  करेंगे।
तुला राशि गत शनि का फल इस प्रकार रहेगा -
कन्या राशि पर साढेसाती अपने अन्तिम चरण में होगी। सुखसम्पति मिलेगी स्त्री सुख प्राप्त होगा कार्य तथा व्यवसाय में प्रगति होगी घर में मंगल कार्य होंगे। स्वास्थ ठीक रहेगा।
तुला राशि पर साढेसाती हृदय में होगी। सुखसम्पति मिलेगी स्त्री सुख प्राप्त होगा कार्य तथा व्यवसाय में प्रगति होगी। राजपक्ष से लाभ होगा,  घरेलू झंझट कर सकती है परेशान |
वृश्चिक राशि पर साढेसाती चढती हुई है। शारीरिक कष्ट रक्त पित्त विकार स्त्री व सन्तान को कष्ट व्यापार में हानि राजभय तथा नाना प्रकार के कष्ट।
कर्क राशि पर ढैय्या का प्रभाव रहेगा। शारीरिक कष्ट रक्त पित्त विकार स्त्री व सन्तान को कष्ट व्यापार में हानि राजभय तथा नाना प्रकार के कष्ट।  घर मे कलह।
मीन राशि पर भी ढैय्या का प्रभाव रहेगा। जीवन रहेगा संघर्षमय,  शारीरिक कष्ट रक्त पित्त विकार स्त्री व सन्तान को कष्ट व्यापार में हानि राजभय तथा नाना प्रकार के कष्ट।

 शनि का प्रभाव कम करने के उपाय -

शनि की साढेसाती तथा ढैय्या के प्रभाव को कम करने के हमारे ग्रन्थो में अनेक उपचार बतलाये गये हैं। जिनके प्रयोग से इसके कुप्रभाव से वचा जा सकता है। ये उपचार इस प्रकार हैं -

  1. शनि के वैदिक या बीज मंत्र का 23000 की संख्या में जाप करें।

  2. शनिवार के दिन हनुमान जी की आराधना, चालीसा का पाठ, सुन्दर काण्ड का पाठ करें।

  3. शनिवार के दिन तैलदान, शनि स्तोत्र का पाठ करें।

  4. नीलम रत्न धारण करना भी लाभकारी होता है परन्तु पहले किसी ज्योतिषी का परामर्श अवश्य ले लें।

  5. शनि का बीज मंत्र - ऊँ प्रां प्रीं पौं स: शनये नम:।

  6. शनि का वैदिक मंत्र - ऊँ शन्नौ देवीरभिष्टयऽआपोभवन्तु पीतये। शंय्योरभिस्रवन्तु न:।

  7. शनि का तांत्रिक मंत्र - ऊँ शं शनैश्चराय नम:।

  8. शनि शान्ति के लिये दान-वस्तु - लोहा, तिल, तैल, कृष्णवस्त्र, उडद, नीलम, कुथली,।

शनिवार, 10 सितंबर 2011

अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा (सम्पूर्ण)

अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा (सम्पूर्ण)
राशियों के अनुसार कैसे करें पूजन
भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को अनन्त चतुर्दशी कहा जाता है। धन,यश व बल की कामना को लेकर मनाया जाने वाला अनंत चतुर्दशी का पर्व भगवान अनन्त को सादर समर्पित है जो भगवान विष्णु का स्वरुप माने जाते हैं और अनन्त भगवान की पूजा करके संकटों से रक्षा करने वाला अनन्त सूत्र बांधा जाता है।
इस व्रत में अलोना (नमक रहित) व्रत रखा जाता है। इसमें उदयव्यापिनी तिथी ली जाती है, पूर्णिमा का समायोग होने से इसका फल और बढ़ जाता है। यदि माध्यह्यान तक चतुर्दशी रहे तो और भी अच्छा है। भगवान की साक्षात या कुशा से बनाई हुई सात कणों वाली शेष स्वरुप अनन्त की मूर्ति स्थापित करें। कहा जाता है कि जब पाण्डव जुए में अपना सारा राज-पाट हार कर वन में कष्ट भोग रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अनन्त चतुर्दशी का व्रत करने की सलाह दी थी। धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों तथा द्रौपदी के साथ पूरे विधि-विधान से यह व्रत किया तथा अनन्त सूत्र धारण किया। अनन्त चतुर्दशी-व्रत के प्रभाव से पाण्डव सब संकटों से मुक्त हो गए।

व्रत एवं पुजा विधान मंत्र :

राशिफल: अनंत व्रत करने से मिलता है धन, बल, यश!
स्नान के बाद व्रत के लिए यह संकल्प करें-

‘ममाखिलपापक्षयपूर्वकशुभफलवृद्धये श्रीमदनन्तप्रीतिकामनया अनन्तव्रतमहं करिष्ये।’
शास्त्रों में यद्यपि व्रत का संकल्प एवं पूजन किसी पवित्र नदी या सरोवर के तट पर करने का विधान हैं। तथापि ऐसा संभव न हो तो निवास व पूजा स्थान को स्वच्छ और सुशोभित करें। वहां कलश स्थापित कर उसकी पूजा करें। तत्पश्चात कलश पर शेषशायी भगवान्‌ विष्णु की मुर्ति रखें और मुर्ति के सम्मुख चौदह ग्रन्थि युक्त अनन्त सूत्र (कच्चे सूत का डोरा) रखें। इसके बाद ‘ॐ अनन्ताय नमः’ इस नाम मन्त्र से भगवान विष्णु सहित अनन्त सूत्र का षोडशोपचार पूर्वक गंध, अक्षत, धूप दीप, नैवेद्ध आदि से पूजन करें। "पुरुष सुक्त" व "विष्णु सहस्त्रनाम" का पाठ भी लाभकारी सिद्ध होता है। इसके बाद उस पूजित अनन्त सूत्र को यह मन्त्र पढ़कर पुरुष दाहिने और स्त्री बायें हाथ में बांध ले। यह डोरा अनन्त फल देने वाला और भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला होता है।

अनन्त संसार महासमुद्रे मग्नान्‌ समभ्युद्धर वासुदेव।

अनन्तरुपे विनियोजितात्मा ह्यनन्तरुपाय नमो नमस्ते॥

अनन्तसूत्र बांधने के बाद ब्राह्मण को नैवेध (भोग) तथा ब्रह्मण भोज करा कर स्वयं प्रसाद ग्रहण करना चाहिए और भगवान नारायण का ध्यान करते रहना चाहिए। पूजा के अनन्तर परिवारजनों के साथ इस व्रत की कथा सुननी चाहिए।

कथा का सार-

सत्ययुग में सुमन्तु नाम के एक मुनि थे। उनकी पुत्री शीला अपने नाम के अनुरूप अत्यंत सुशील थी। सुमन्तु मुनि ने उस कन्या का विवाह कौण्डिन्य मुनि से किया। कौण्डिन्य मुनि अपनी पत्नी शीला को लेकर जब ससुराल से घर वापस लौट रहे थे, तब रास्ते में नदी के किनारे कुछ स्त्रियां अनन्त भगवान की पूजा करते दिखाई पडीं। शीला ने अनन्त-व्रत का माहात्म्य जानकर उन स्त्रियों के साथ अनंत भगवान का पूजन करके अनन्त सूत्र बांध लिया। इसके फलस्वरूप थोडे ही दिनों में उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया। एक दिन कौण्डिन्य मुनि की दृष्टि अपनी पत्नी के बाएं हाथ में बंधे अनन्त सूत्र पर पड़ी, जिसे देखकर वह भ्रमित हो गए और उन्होंने पूछा-क्या तुमने मुझे वश में करने के लिए यह सूत्र बांधा है? शीला ने विनम्रता पूर्वक उत्तर दिया-जी नहीं, यह अनंत भगवान का पवित्र सूत्र है। परंतु ऐश्वर्य के मद में अंधे हो चुके कौण्डिन्य ने अपनी पत्नी की सही बात को भी गलत समझा और अनन्तसूत्र को जादू-मंतर वाला वशीकरण करने का डोरा समझकर तोड़ दिया तथा उसे आग में डालकर जला दिया। इस जघन्य कर्म व अपराध का परिणाम भी शीघ्र ही सामने आ गया। उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई। दीन-हीन स्थिति में जीवन-यापन करने में विवश हो जाने पर कौण्डिन्य ऋषि ने अपने अपराध का प्रायश्चित करने का निर्णय लिया। वे अनन्त भगवान से क्षमा मांगने हेतु वन में चले गए। उन्हें रास्ते में जो मिलता वे उससे अनन्तदेव का पता पूछते जाते थे। बहुत खोजने पर भी कौण्डिन्य मुनि को जब अनन्त भगवान का साक्षात्कार नहीं हुआ, तब वे निराश होकर प्राण त्यागने को उद्यत हुए। तभी एक वृद्ध ब्राह्मण ने आकर उन्हें आत्महत्या करने से रोक दिया और एक गुफा में ले जाकर चतुर्भुज अनन्त देव का दर्शन कराया।

भगवान ने मुनि से कहा-तुमने जो अनन्त सूत्र का तिरस्कार किया है, यह सब उसी का फल है। इसके प्रायश्चित हेतु तुम चौदह वर्ष तक निरंतर अनन्त-व्रत का पालन करो। इस व्रत का अनुष्ठान पूरा हो जाने पर तुम्हारी नष्ट हुई सम्पत्ति तुम्हें पुन:प्राप्त हो जाएगी और तुम पूर्ववत् सुखी-समृद्ध हो जाओगे। कौण्डिन्य मुनि ने इस आज्ञा को सहर्ष स्वीकार कर लिया। भगवान ने आगे कहा-जीव अपने पूर्ववत् दुष्कर्मो का फल ही दुर्गति के रूप में भोगता है। मनुष्य जन्म-जन्मांतर के पातकों के कारण अनेक कष्ट पाता है। अनन्त-व्रत के सविधि पालन से पाप नष्ट होते हैं तथा सुख-शांति प्राप्त होती है। कौण्डिन्य मुनि ने चौदह वर्ष तक अनन्त-व्रत का नियमपूर्वक पालन करके खोई हुई समृद्धि को पुन:प्राप्त कर लिया।

मेषःव्यय को नियंत्रित करें, मौज-मस्ती में खर्च बढ़ेगा।

क्या करें-मां लक्ष्मी को दूध से निर्मित नैवेद्य का भोग लगाएं।

क्या न करें-निवेश से बचें।

वृषभःविदेश प्रवास होगा जिससे व्यापारिक लाभ भी मिलेगा।

क्या करें-कूर्म पृष्ठ पर बने श्रीयंत्र या महालक्ष्मी यंत्र को घर के पूजा स्थल में स्थापित करें।

क्या न करें-यात्रा करने से बचें।

मिथुनःव्यापार वृद्धि व पारिवारिक सौहार्द हेतु किया गया परिश्रम सार्थक होगा।

क्या करें-श्री सुक्त का पाठ करें।

क्या न करें-धन का व्यय ना करें।

कर्कःसमय अनुकूल है विदेश से अच्छा समाचार प्राप्त कर सकेंगे।

क्या करें-हरे रंग का रुमाल अपने पास रखें।

क्या न करें-वाणी पर नियंत्रण न खोएं।

सिंहःसंतान के जिद्दी स्वभाव से आज संतान के भविष्य की चिंता रहेगी।

क्या करें-गाय को सरसों का तेल लगी रोटी खिलाएं।

क्या न करें-बड़ों का दिल ना दुखाएं।

कन्याःआज आपको अचानक आर्थिक लाभ का योग बनेगा।

क्या करें-वट वृक्ष के पत्ते पर कुमकुम से स्वस्तिक बनाकर उस पर साबुत चावल व एक सुपारी रखकर मां लक्ष्मी के मंदिर में चढ़ाएं।

क्या न करें-घर आये व्यक्ति को खाली हाथ ना जाने दें।

तुलाः आज प्रयास करने से आप अपना रुका हुआ धन वापस प्राप्त कर सकते हैं।

क्या करें-धनदा यंत्र घर में स्थापित कर दर्शन करें तो आशातीत लाभ होगा।

क्या न करें-धैर्य ना खोएं।

वृश्चिकःराजनैतिक दिशा में किए जा रहे प्रयास सफल सिद्ध होंगे।

क्या करें-भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर या मूर्ति के सम्मुख ॐ क्लीं कृष्णाय नम: का एक माला जाप तुलसी की माला से करें।

क्या न करें-वाहन तेज न चलाएं।

धनुः क्रोध को नियंत्रित करें, भाई या पड़ोसी से वैचारिक मतभेद हो सकते हैं।

क्या करें-चांदी का चंद्र यंत्र तथा मंगल यंत्र बनवाकर घर के मंदिर में स्थापित करें।

क्या न करें-किसी को पैसे उधार ना दें।

मकरः धार्मिक प्रवृत्ति में वृद्धि होगी। रुके कार्य सिद्ध होंगे।

क्या करें-ऋण्हर्ता मंगल स्तोत्र का पाठ करें।

क्या न करें-क्रोध ना करें।

कुम्भःससुराल पक्ष से लाभ होगा। व्यापारिक चिंता दूर होगी।

क्या करें-पक्षियों को गुड़ के साथ सतनाजा डालें।

क्या न करें-भाई से विवाद न करें।

मीनःकार्य का दबाव अधिक होगा, व्यर्थ की भागदौड़ रहेगी।

क्या करें-मछलियों को मिश्रीयुक्त उबले चावल दें।

क्या न करें-तनाव ना लें।