कुष्माण्डेति चतुर्थकम्...
!!सुप्रभात !! यथा योग्य मंगल आशीष, प्रणाम, वंदन, अभिनंदन !!
नवरात्र का आ चतुर्थ दिन अर्थात चतुर्थी तिथि है, आज कूष्मांडा देवी की पूजा अर्चना की जाती है | यह सृष्टि की आदिस्वरूपा आदिशक्ति है | इसका निवास सूर्यमंडल के भीतरी भाग में माना जाता है | अतः इनके शरीर की कान्ति भी सूर्य के ही सामान दैदीप्यमान और भास्वर है | मैं ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे 9827198828 बहुत जिम्मेदारी के साथ यह कह सकता हुं कि आध्यात्मिक पृष्ठभूमि पर कुष्माण्डा भगवती को 'अनाहद चक्र' की अधिष्ठात्री हैं ! देवी का चतुर्थ रूप कूष्माण्डा देवी का माना जाता है | कुत्सितः ऊष्मा कूष्मा – त्रिविधतापयुतः संसारः, स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्याः स कूष्माण्डा – अर्थात् त्रिविध तापयुक्त संसार जिनके उदर में स्थित है वे देवी कूष्माण्डा कहलाती हैं | इस रूप में देवी के आठ हाथ माने जाते हैं | इनके हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमलपुष्प, सुरापात्र, चक्र, जपमाला और गदा दिखाई देते हैं | यह रूप देवी का आह्लादकारी रूप है और माना जाता है कि जब कूष्माण्डा देवी आह्लादित होती हैं तो समस्त प्रकार के दुःख और कष्ट के अन्धकार दूर हो जाते हैं | क्योंकि यह रूप कष्ट से आह्लाद की ओर ले जाने वाला रूप है, अर्थात् विनाश से नवनिर्माण की ओर ले जाने वाल रूप, अतः यही रूप सृष्टि के आरम्भ अथवा पुनर्निर्माण की ओर ले जाने वाला रूप माना जाता है |
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च ।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥
स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता ।
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः ।।
!! ऊँ नमश्चण्डिकायै!!
आपका दिन शुभ हो..
-ज्योतिषाचार्य पण्डित विनोद चौबे, संपादक- 'ज्योतिष का सूर्य' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, शांति नगर, भिलाई, जिला - दुर्ग (छ़ग़) मोबा.नं. 9827198828
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आपके विचारों का स्वागत है...