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मंगलवार, 19 जून 2012

हिन्दू धर्म की संस्कृति झलकती है रथयात्रा के महा पर्व में..ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे, भिलाई, दुर्ग छत्तीसगढ़, 9827198828


ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे,सम्पादक ''ज्योतिष का सूर्य'', राष्ट्रीय मासिक पत्रिका  भिलाई,दुर्ग छत्तीसगढ़, 9827198828
समुद्र की नीली चादर के शीतल आंचल में बसा उड़ीसा का पुरी, पूरी दुनिया में भगवान जगन्नाथ की मंदिर के लिए प्रसिध्दी पा चुका है। समुद्रतट के किनारे भगवान जगन्नाथ का भव्य मंदिर अपनी मनोहारी प्राकृतिक छटा के कारण धर्म और आस्था का केन्द्र बना हुआ है, पुरी के नीलमय समुद्र से गुजरने वाला समुद्री जहाज अपने यात्रियों सहित मंदिर के गगनचुम्बी गुम्बद और लहराती पताका को देख खुद को भाग्यशाली समझता है। महान तीर्थ स्थल के रूप में स्थापित इस धार्मिक आस्था वाले मंदिर में भगवान जगन्नाथ सहित उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की काष्ठ की बनी मूर्तियाँ श्रध्दालुओं को अनायास ही आकर्षित एवं लोमहर्षित करती आ रही है। पुराणों में आयी कथा के  अनुसार सभी मूर्तियों की प्राणप्रतिष्ठा राजा इन्द्रद्युम्न ने मंत्रोच्चारण व विधि विधान से स्वयं की थी। प्रतिवर्ष आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की द्वितीया को निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की यात्रा से पूर्व आज भी साफ-सफाई का जिम्मा राज परिवार ही उठा रहा है, इस यात्रा को च्च्गुण्डीच यात्राज्ज् भी कहा जाता है।
    भारतीय प़ृष्ठ भूमि पर मनाये जाने वाले अनेक पर्व त्यौहार और मेलो में भगवान जगन्नाथ रथयात्रा अलग स्थान रखती है। एक तो मंदिर में स्थापित मूर्तियां काष्ठ अथवा लकड़ ी की बनी होती है, दूसरा यह कि प्रतिवर्ष नई मूर्तियों का निर्माण भगवान के रंग रूप में एकरूपता बनाये हुये है, जिसे स्वये भगवान की कृपा ही माना जा सकता है। नीम की पवित्र लकड़ी से बनी मूर्तियों में भगवान के अपूर्ण हाथो केे पीछे भी कथानक होने की जानकारी दी जा रही है। कहते है मंदिर निर्माण से पूर्व भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्ति निर्माण का कार्य जिस कारीगर को सौंपा गया था, उसने राजा के समक्ष शर्त रखी थी की वह अकेले बंद कमरे में भगवान का रूप गढ़ेगा और पूर्णता के बाद स्वयं दरवाजा खोल दर्शन करायेगा। इससे पूर्व यदि किसी ने दरवाजा खोलकर भगवान को गढते उसे देखा तो वह काम को वही पर रोक देगा। हुआ भी यही उत्सुकता वश राजा ने स्वयं दरवाजा खोल दिया उस समय भगवान के हाथों की हथेली का निर्माण नही किया जा सका था, यही कारण है कि अब तक भगवान की मूर्तियां हथेली विहिन है।
    भगवान जगन्नाथ की यात्रा के लिये रथ का निर्माण केवल लकडिय़ों से ही किया जाता है। तीनों रथों में किसी भी प्रकार के लोहे के कीलों का उपयोग नही किया जाता है बल्कि लकड़ी से ही कील बनाये जाते है। अक्षय तृतीया अथवा भगवान परशुराम के जन्मदिन से भगवान के रथों का निर्माण कार्य प्रारंभ किया जाता है। साथ ही रथ निर्माण के लिये उपयोग में लायी जाने वाली लकडिय़ा बसंत पंचमी के दिन से इकठ्ठा करना शुरू कर दिया जाता है। पुराने रथों की लकडिय़ा मंदिर परिसर में ही नीलाम कर दी जाती है, जिसे श्रद्धालु खरीदनें के बाद अपने घरों के दरवाजे और खिड़किया बनाने में उपयोग में लाते है। ऐसा भी कहा जाता है कि मंदिर में स्थापित मूर्तियों का नवीन स्वरूप प्रतिवर्ष नही बनाया जाता है, बल्किी जिस वर्ष आषाढ़ मास में अधिक मास होता है, उसी वर्ष नई मूर्तियाँ गढ़ी जाती है। नई मूर्ति गढऩे का उत्सव नव कलेवर उत्सव के रूप में मनाया जाता है। भगवान की पूरानी मूर्तियों को मंदिर परिसर में ही च्च्कोयली बैकुण्ठज्ज् नामक स्थान पर भू-समाधि दे दी जाती है।
    भगवान जगन्नाथ मंदिर में रथ यात्रा आयोजन के लिये 3 अलग-अलग भव्य रथों का निर्माण किया जाता है। ये रथ भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र एवं बहन सुभद्रा के लिये पहचान स्वरूप अलग-अलग रंग रोगन द्वारा सजाये जाते है। भाई बलभद्र के लिये तैयार रथ को च्च्पाल ध्वजज्ज् नाम दिया जाता है, और इसे लाल एवं हरे रंग से आकर्षक रूप प्रदान किया जाता है। इसी तरह बहन सुभद्रा के रथ को च्च्दर्प-दलनज्ज् नामकरण करते हुए लाल एवं नीले रंग से सजाया जाता है तथा भगवान जगन्नाथ के लिये तैयार रथ को च्च्नंदीघोषज्ज् नाम से जाना जाता है, जिसे लाल एवं पीले रंग से नयनाभिराम रूप प्रदान किया जाता है। रथयात्रा वाले दिन सबसे आगे भाई बलभद्र का रथ उसके बाद बीच में बहन सुभद्रा का रथ और अंत में भगवान जगन्नाथ का च्च्नंदीघोष रथज्ज् पूजा अर्चना के बाद मंदिर परिसर से रवाना किया जाता है। जगह-जगह लाखों की संख्या में भक्तजन भगवान की आरती और पूजा करते दिखाई पड़ते है। रथ को श्रध्दालु भक्त रस्सी के माध्यम से खींचते हुये चलाते है, जिसे अपना हाथ लगाने धर्मावलंबियों के बीच प्रतिस्पर्धा का स्वरूप भी स्पष्ट रूप से  दिखाई पड़ता है।
    आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन विधिविधान सहित तैयार किये गये रथ पर भगवान को विराजित किया जाता है, आकर्षक वस्त्रों और श्रृगांरित रूप में भगवान के परम दर्शन भक्तों को एक अलग अनुभूति का आनंद दिलाता प्रतीत होता है। भगवान को रथ में लाकर उचित स्थान देने की प्रक्रिया को च्च्पहोन्द्री महोत्सवज्ज् कहा जाता है। जब रथ पूर्ण रूप से सज-धज कर भगवान सहित यात्रा के लिये तैयार हो जाता है तब पुरी के राजा पालकी में आकर स्वयं प्रार्थना करते है तथा प्रतिकात्मक रूप से रथ मंडप को झाडू से साफ करते है। इस परम्परा को च्च्छर-पहनराज्ज् कहा जाता है। इस प्रकार तैयारी के साथ शुरू की गई महान रथयात्रा गुण्डीच मंदिर जाकर विराम पाती है, जहां भगवान अपनी बहन और भाई के साथ नवमी तिथि तक रहते है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को सभी रथों को मुख्य मंदिर की ओर दिशा देते हुये पुनर्यात्रा प्रारंभ होती है। इस वापसी यात्रा को च्च्बहुदा यात्राज्ज् कहा जाता है। रथों के मुख्य मंदिर पहुंचने के बाद उनमें से मूर्तियों को नही उतारा जाता है, बल्कि एक दिन प्रतिमाये रथों में ही रहती है। आगामी दिवस एकादशि तिथि पर जब प्रात:काल मंदिर के द्वार खोले जाते है, तब भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का श्रृंगार विभिन्न आभूषणों तथा शुध्द स्वर्ण के गहनों से किया जाता है। इस धार्मिक प्रक्रिया का सुनबेसा कहा जाता है। भगवान की बापसी के बाद भक्तजनों को वितरित किया जाने वाला महाप्रसाद मंदिर परिसर में ही तैयार किया जाता है। इस महाप्रसाद में अरहर की दाल, चांवल, साग,दही व खीर जैसे व्यंजनों को शामिल किया जाता है। इस प्रकार भगवान जगन्नाथ की पवित्र यात्रा हिन्दु धर्मावलम्बियों को पूरे 10 दिन जोड़े रखती है इस दौरान भक्तगण अपने घरों में पूजा पाठ आदि न करते हुये इन्ही आयोजनों में भागीदारी कर रहे होते है।

सुन्दर है सुंदरकांड

ज्योतिष का सूर्य 

सुन्दर है सुंदरकांड

ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे.

मित्रों शुभ सन्ध्या, आज मंगलवार है आईए कुछ टूटे-फूटे शब्दों में कलियुग के प्रत्यक्ष देव श्री हनुमानजी के बारे में चर्चा करते हैं...गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस के सप्त सोपानों में 60 दोहे के 'सुन्दरकांड' का नाम ''सुन्दर'' क्यों रक्खा..और कितने बार सुन्दर शब्द का प्रयोग किया गया है..तो मित्र प्रवरों मानस में आठ बार सुन्दर शब्द आया है ...
1) सिन्धु तीर एक भूधर सुन्दर.
2)कनक कोट बिचित्र मणि कृत सुंदरायतना घना
3)श्याम सरोज दाम सम सुन्दर ! प्रभु भुज करी कर सम दसकंधर !!
4)तब देखि मुद्रिका मनोहर ! राम नाम अंकित अति सुन्दर !!
5) सुनहु मातु मोहि अतिशय भूखा ! लागी देखि सुन्दर फल रूखा !!
6)सावधान मन करी पुनि संकर ! लागे कहाँ कथा अति सुन्दर !!
7) हरषी राम तब कीन्ह पयाना ! सगुण भये सुन्दर सुभ नाना !!
8) शठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती ! सहज कृपन सन सुन्दर नीती !!
गोस्वामीजी ने इस प्रकार आठ बार सुन्दर शब्द का प्रयोग करने के पिछे बहुत बड़ा राज है क्योंकि...जैसा कि आप सभी जानते होंगे कि जब....... सप्तर्षियों ने शिवजी में आठ अवगुण कहे थे:
"निर्गुण निलज कुबेष कपाली ! अकुल अगेह दिगंबर ब्याली !!
इसलिए शिवजी ने हनुमान अवतार धारण कर लिया ताकि मुझमे आठ
गुण आ जाएँ:
अतुलितबलधामं स्वर्णशैलाभ्देहम,
             दनुजवन कृशानुम ज्ञानिनामाग्रगण्यम!
सकल्गुनानिधानाम वानारानामधीशम,
                    रघुपतिवरदूतम वातजातं नमामि !!
और इसलिए सुन्दरकाण्ड की शुरुआत 'ज' अक्षर से हुई है
"जामवंत के वचन सुहाए"
जो की वर्णमाला का आठवां अक्षर है!

सुन्दरकाण्ड के अन्तमें फलश्रुति बताते हुए गोस्वामीजी लिखते हैं-
    सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान ।
    सारद सुनहिं ते तरहिं भव सिन्धु बिना जलजान ॥
     भगवान श्री रामजी का चरित्र समस्त मंगलों को  देनेवाला है, और जो लोग इसका आदरपूर्वक पठन चिंतन एवं मनन करते हैं वे इस संसार समुद्रको बिना जहाज के ही पार कर लेते हैं। गोस्वामीजी ने आष्वासन देते हुए कहा है कि जिसके हृदय में भगवान राम तथा श्री हनुमानजीका यह संवाद आ जाएगा उसे भगवान श्री राम के चरणों की भक्ति अवष्य प्राप्त होगी ।
भगवान राम की यह कथा अत्यन्त सुन्दर है। सुन्दरता को सुन्दर करने वाली श्रीसीताजी तथा परम सुन्दर भगवान श्रीराम की उपलब्धी सुन्दरकाण्ड के द्वारा होती है। और सुन्दरकाण्ड का फल भी यही है-
         यह सम्वाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥ 5/33/4
     इस काण्ड में एक ओर यदि विभीषणजी को राज्य मिला तो दूसरी ओर हनुमानजी को भक्ति मिली।  इसका अभिप्राय है कि इसके द्वारा सकाम की कामना पूर्ण होती है तथा निष्काम को सेवा की प्राप्ति होती है। इसका अभिप्राय है कि जिस व्यक्ति को जो भी वस्तु चाहिए वह इस सुन्दरकाण्ड के माध्यम से प्राप्त कर सकता है। सुन्दरकाण्ड की इन सुन्दर बातों का चिंतन मनन करके सुन्दर विचारों का आश्रय लेकर अपने जीवन को सुन्दर व उच्चतम बनाने का संकल्प करें। सुन्दरकाण्ड के तत्व को प्रतिपादन करने में हो सकता है कही त्रुटि रह गयी हों तो कृपया क्षमा करें इसमें जो विचार आपको अच्छे लगे उनको आप ग्रहण कीजिए तथा त्रुटिपूर्ण विचारों को मेरी अपनी भूल समझकर क्षमा कीजिए। सुन्दरकाण्ड के विचारों को आत्मसात करने तथा आदर्श एवं उच्चतम जीवन तथा भक्तिपथ पर अग्रसर होने की शक्ति हनुमानजी सब को प्रदान करें, यही प्रभु चरणों में नम्र प्रार्थना ।
विशेष सूचना- (यह आलेख मेरा न समझा जाये यह संत वाक्यों का संकलन)

 

ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद चौबे....संपादक  '' ज्योतिष का सूर्य '' राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, भिलाई

शुक्रवार, 15 जून 2012

लिङ्गांष्टकम्

मित्रों शुभ सन्ध्या, आप सभी के लिए.....आप सभी प्रतिदिन इस स्तोत्र का पाठ करें आप सभी की मनोकामनाएं भगवान शिव पूर्ण करेंगे।

!!अथ लिङ्गांष्टकम्!!


ब्रह्ममुरारि-सुरार्चितलिङ्गं निर्मल-भासित-शोभिन-लिङ्गम्।
जन्मज-दु:खविनाशक- लिङ्गतत्प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम्।।1।।

देवमुनि-प्रवरार्चित लिङ्गं कामदडं करुणाकरलिङ्गम्।
रावणदर्प-विनाशन लिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।2।।

सर्वसुगन्धि- सुलेपितलिङ्गं बुद्धि-विवर्धन-कारणलिङ्गम्।
सिद्ध-सुरा-सुर-वन्दितलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।3।।

कनक-महामणि भूषितलिङ्गं फणिपति-वेष्टित-शोभितलिङ्गं।
दक्षसुयज्ञ-विनाशकलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।4।।

कुमकुम-चंदन लेपितलिङ्गं पंकजजहार-सुशोभित लिङ्गम्।
सञ्चित-पाप विनाशन लिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।5।।

देवगणर्चित-सेवितलिङ्गं भावैर्भक्तिर्भिरेव च लिङ्गम्।
दिनकरकोटि-प्रभाकर लिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम्।।6।।

अष्टदलोपरि वेष्टितलिङ्गं सर्वसमुद्भव कारणलिङ्गम्।
अष्टदरिद्र-विनाशितलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।7।।

सुरगुरु-सुरवर पूजतलिङ्गं सुरवनपुष्प-सदार्चितलिङ्गम््।।
परात्परं परमात्मक लिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्।।8।।

लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं य: पठेच्छिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते।।9।।

इति श्रीलिङ्गाष्टकम् स्त्रोत्रं समाप्तम्।।



निवेदकः >>>>>>>>>>>>>>>>ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे

व्यभिचारी ही चण्ड-मुण्ड हैं आज की महिलाओं को चण्डी बनकर इनका नाश़ करना चाहिए- पं.विनोद चौबे

व्यभिचारी ही चण्ड-मुण्ड हैं आज की महिलाओं को चण्डी बनकर इनका नाश़ करना चाहिए- पं.विनोद चौबे


धमधा के धरमपुरा (बरहापुर) ग्राम में स्थित तिवारी कृषि फार्म हॉऊस में आयोजित श्रीमद् देवी भागवत कथा के नववें दिन व्यासपीठ से ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे ने बताया कि संसार में प्रवृत्ती-वृत्ती रूपी आज भी चण्ड-मुण्ड जैसे असुर विद्यमान हैं जिनके द्वारा पराई स्त्रीयों पर काम-वासना की दृष्टि से दृष्टिपात कर समाज में व्यभिचार को बढ़ावा देते हैं, ऐसे कामासक्त आसुरी प्रवृत्ती वाले राक्षसों से बचाव के लिए माँ भगवती जैसा स्वयं महिलाओं को चण्डी का रूप धारण कर उन चण्ड-मुण्डों को मान-सम्मान और मर्यादा रूपी युद्ध में आज की महिलाओं को सामने आकर इन राक्षसों को इस युद्ध में पराजित करना होगा। शुम्भ-निशुम्भ भी काम-वासना के प्रतीक हैं, वहीं धूम्रलोचन ही लोक मर्यादा भूलकर आज अश्लिल-साहित्यों के माध्यम से आमजनमानस में काम (वासना) की आसक्ती को फैलाने का काम करता है, जिसके कारण छोटे-छोटे बच्चे भी काम-वासना की गिरफ्त में आकर वासना की तृप्ती के लिए स्वजनों को हवस का शिकार बनाने में अन्धे हो जाते हैं, उपरोक्त सभी राक्षसों से बचने के लिए श्रीमद्देवीभागवत के अष्टम स्कन्ध में स्वयं देवी द्वारा पुरूष-स्त्री में कोई भेद नहीं नहीं है ऐसा जानकर भक्तों के अन्दर इस प्रकार की काम-वासना और हवस जैसा सामाजिक अभिशाप समाप्त हो जाता है। और वह भक्त अपनी स्त्री के अलावा अन्य सभी स्त्रीयों को मातृवत समझने लगता है, जरूरत है समाज में श्रीमद्देवीभागवत के इन प्रेरक प्रसंगों को जन-जन तक पहुँचाने की। इससे स्वस्थ भारत सुखी भारत बन सकता है, साथ ही जगतजननी मैय्या दुर्गा के प्रति सच्ची भक्ति का मार्ग भी प्रशस्त होता है।
आचार्य पं. कृष्णदत्त त्रिपाठी ने पंचांग पूजन के अलावा 11 कन्याओं का पूजन कराये। केशव प्रसाद, महेश चौधरी (लक्ष्मीकांत प्यारेलाल) एवं बबलु शुक्ल ने सुन्दर भजनों से शमा बांधे रक्खा।
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से डॉ.शम्भुदयाल तिवारी, जयप्रसाद तिवारी (गुरूजी), विजय प्रसाद तिवारी , गिरीशपति तिवारी, काशीराम देवांगन, फिरन्ता साहू (पूर्व जनपद सदस्य), कुंवास साहू, लखन वर्मा, बीवीरसिंह ठाकुर, नारद यादव, खेलन यादव, रामनारायन शर्मा, भगवन्ता साहू, गांधी साहू, लतेल साहू आदि बड़ी संख्या में श्ररद्धालु उपस्थित थे।

रविवार, 10 जून 2012

आत्महत्या करना जन्मजन्मांतर चाण्डाल बनने को न्यौता देना है- पं.विनोद चौबे


आत्महत्या  करना  जन्मजन्मांतर  चाण्डाल  बनने  को  न्यौता  देना  है-  पं.विनोद  चौबे


 धमधा के धरमपुरा (बरहापुर) ग्राम में स्थित तिवारी कृषि फार्म हॉऊस में आयोजित श्रीमद् देवी भागवत कथा के छठवे दिन व्यासपीठ से ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे ने राजा  सत्यव्रत   की कथा सुनाते हुए बताया कि पूर्व  में सूर्यवंशी  राजा  सत्यव्रत  एवं  हरिश्चन्द्र आदि  राजाओं  के  राजधर्म  को आजके  राजनेता अनुकरण  करें तो निश्चित  ही  आज  भी  सतयुग  का सुख  और शांति के साथ  ही  साथ  देश   और  प्रदेश   समृद्ध  हो जायेगा।
राजा सत्यव्रत  ने  सदेह  स्वर्ग  जाने  के लिए  वशिष्ठजी  से  यज्ञ  करने  को  कहता है लेकिन  ऋषि  वशिष्ठ  राजा सत्यव्रत  को ऐसे  यज्ञ  करने  से मना कर  देने  पर  सत्यव्रत  ने दूसरे  किसी  ऋषि  से यज्ञ  करने  की  बात  करता  है  जिसे  मृत्युलोक  के  धर्मसूत्रों  के  अनुसार  विधि  व्यवस्था  का  अपमान  समझ  कर उस  राज-ा  सत्यव्रत  को  चाण्डाल  होने  का  शाप  दे देते  हैं,  और  राजा  सत्यव्रत  चाण्डाल  बन  जाता  है   और  वह अपने  पुत्र  हरिश्चन्द्र  को  राज्यभार  देकर  जंगल  चला  जाता  है।  वहाँ  राजा सत्यव्रत  को  विश्वामित्र  से  मुलाकात  होती  है  और  विश्वामित्र  ने  उस  राजा  को सदेह  स्वग्ग  लोक  भेजने  लिए 24  लाख  गायत्री  मंत्र  का  महापुरश्चरण  करते  हैं,  जिसके  बाद  वह  स्वर्गलोक  सदेह  जाता  है। लेकिन  जब  वह  राजा  सत्यव्रत  चाण्डाल  बन  गया  था  तब  वह  अपने  मन  में  विचार  किया  कि  यदि  मैं  अपने  आपको  मार  देता  हुँ  ,  तो  इसे  आत्महत्या  की  संज्ञा  दी  जायेगी  अतः  शास्त्रों  में  आत्महत्या  करने  से जन्म-जन्मांतर  चाण्डाल  होना  बताया  गया  है,
आत्महत्या भवेन्नूनं पुनर्जन्मनि जन्मनि।
श्वपचत्वं  च  शापश्च  हत्यादोषाद्भवेदपि।।
  अतएव  इस   जन्म  में वशिष्ठ  के  शाप से  केवल  एक  जन्म चाण्डाल  बना  हुँ, यदि मैं  आत्महत्या  करता  हुँ,  तो  मुझे  कई  जन्मों  तक  चाण्डाल  बनना  पड़ेगा।
पं.चौबे  ने इस  दृष्टान्त  के  माध्यम  से  समाज  में  बढ़ती  आत्महत्याओं  लम्बी  फेहरिश्त  को  समूल  समाप्त  करने  के  लिए  आज  जरूरत  है  श्रीमद्देवीभागवत  के  इन  कथा  प्रसंगों   को   सुनकर  जीवन  में  उतारने  की।
आचार्य   पं. कृष्णदत्त  त्रिपाठी  ने  पंचांग  पूजन  के  अलावा  11  कन्याओं  का  पूजन  कराये। केशव  प्रसाद,  महेश   चौधरी  (लक्ष्मीकांत  प्यारेलाल)  एवं  बबलु  शुक्ल  ने सुन्दर  भजनों  से  शमा  बांधे  रक्खा।


कार्यक्रम  में  प्रमुख  रूप  से  डॉ.शम्भुदयाल  तिवारी,  जयप्रसाद  तिवारी (गुरूजी),  विजय प्रसाद  तिवारी  ,  गिरीशपति  तिवारी,  काशीराम  देवांगन, फिरन्ता  साहू (पूर्व  जनपद  सदस्य),  कुंवास  साहू,  लखन  वर्मा,  बीवीरसिंह  ठाकुर, नारद  यादव,  खेलन  यादव, रामनारायन  शर्मा, भगवन्ता  साहू,  गांधी  साहू,  लतेल  साहू  आदि  बड़ी संख्या  में श्ररद्धालु  उपस्थित  थे।

आजकल के राजनेताओं को राजा हरिश्चन्द्र राजधर्म की सीख लेनी चाहिए- पं.विनोद चौबे


आजकल  के  राजनेताओं  को  राजा  हरिश्चन्द्र  राजधर्म  की  सीख  लेनी  चाहिए-  पं.विनोद  चौबे

 धमधा के धरमपुरा (बरहापुर) ग्राम में स्थित तिवारी कृषि फार्म हॉऊस में आयोजित श्रीमद् देवी भागवत कथा के छठवे दिन व्यासपीठ से ज्योतिषाचार्य पं.विनोद चौबे ने राजा  हरिश्चन्द्र   की कथा सुनाते हुए बताया 
आगे  श्री  चौबे  ने   राजा  हरिश्द्र का  उपाख्यान   सुनाते  हुए  बताये  की  जब  सत्यवादी  राजा  हरिश्चन्द्र  अपने  पत्नी, पुत्र   और  स्वयं  को  काशी  में  विक्रय  कर  दिये  और  कुछ  ही  दिनो  बाद  उनके  पुत्र  रोहित  को  सर्प  के  डँसने  से  मौत  हो  गई  और  उस  रोहित  के  मृत  शरीर  को  श्मसान  में  राजा  हरिश्चन्द्र  ने  कर  लेकर  लकड़ी  के  चिता  पर  जलाने  को  उद्दत  हुए  उस  समय  महामाया देवी  का  वहाँ प्राकट्य हो  जाता  है,  और  वहाँ  सभी  देवता  वहाँ  उपस्थित  हो  जाते  हैं,  माँ  की  कृपा  से  पुत्र  रोहित  जीवीत  हो  जाता  है,  और राजा  हरिश्चन्द्र  को  भगवान  विष्णु  के  दूत  वहाँ  विमान  लेकर आते  हैं, राजा  से  कहते  हैं  आप  अब  स्वर्गलोक  चलें।  ऐसा  कहने  पर  राजा  हरिश्चन्द्र  ने  कहाकि  मैं अपनी पत्नी शैव्या  के  साथ  ही  स्वर्गलोक  नहीं  जाऊंगा  बल्कि  अपने  राज्य  की  प्रजा  के  साथ  जाऊंगा,  नहीं  मैं  अकेले  स्वर्गलोक   न  जाकर  अपनी  प्रजा  की  सेवा  करूंगा।  इस  प्रकार  राजा  हरिश्चन्द्र   राजा  हरिश्चन्द्र  ने  अपनी  प्रजा  के  प्रति  वात्सल्यता   दिखाकर  आजके  राजनेताओं  को  राजधर्म  का  मार्ग  दिखाया,  जो  आज  के  राजनेताओं  के  लिए  प्रेरणा श्रोत  है।  जहाँ  एक  तरफ  देश  में  व्याप्त  भ्रष्टाचार  से  देश  की  अर्थव्यवस््था  चरमरा  गई  वहीं  यदि  प्रजावात्सलल्य  इन  नेताओं  में  होती  तो  आज  भ्रष्टाचार  रूपी  आसुरी  प्रवृत्ति  से  भारत  देश  परे  होकर  विश्वगुरू  बन  जाता।
आचार्य   पं. कृष्णदत्त  त्रिपाठी  ने  पंचांग  पूजन  के  अलावा  11  कन्याओं  का  पूजन  कराये। केशव  प्रसाद,  महेश   चौधरी  (लक्ष्मीकांत  प्यारेलाल)  एवं  बबलु  शुक्ल  ने सुन्दर  भजनों  से  शमा  बांधे  रक्खा।

कार्यक्रम  में  प्रमुख  रूप  से  डॉ.शम्भुदयाल  तिवारी,  जयप्रसाद  तिवारी (गुरूजी),  विजय प्रसाद  तिवारी  ,  गिरीशपति  तिवारी,  काशीराम  देवांगन, फिरन्ता  साहू (पूर्व  जनपद  सदस्य),  कुंवास  साहू,  लखन  वर्मा,  बीवीरसिंह  ठाकुर, नारद  यादव,  खेलन  यादव, रामनारायन  शर्मा, भगवन्ता  साहू,  गांधी  साहू,  लतेल  साहू  आदि  बड़ी संख्या  में श्ररद्धालु  उपस्थित  थे।